Wednesday, September 10, 2008

सच्चाई ज़रूरी है आज के अतिवादी समय में

पुलिट्ज़र पुरस्कार विजेता पत्रकार रोन सस्किण्ड की हाल ही में प्रकाशित किताब ‘द वे ऑफ द वर्ल्ड: ए स्टोरी ऑफ ट्रुथ एण्ड होप इन एन एज ऑफ एक्स्ट्रीमिज़्म’ ने इन दिनों अमरीका को बड़ी असहज स्थिति में डाल रखा है. किताब में कुछ बेहद सनसनीखेज रहस्योद्घाटन किए गए हैं. बात इतनी आगे बढ़ गई है कि सीनेट सेलेक्ट कमिटी ऑन इण्टेलीजेंस और हाउस ज्यूडिशियरी कमिटी को कहना पड़ा है कि रोन ने जो खुलासे किए हैं, उनकी पड़ताल की जाएगी. वैसे, जैसा इस तरह के मामलों में हमेशा होता है, सम्बद्ध पक्षों ने खण्डन का कर्मकाण्ड पूरा कर लिया है. आखिर रोन ने ऐसा क्या कह दिया है इस किताब में? रोन ने कहा है कि 2003 में व्हाइट हाउस ने अमरीकी गुप्तचर एजेंसी सी आई ए को आदेश दिया था कि वह ईराक़ और अल-कायदा की नज़दीकी प्रकट करने वाले जाली दस्तावेज़ तैयार और प्रचारित करे. आदेश का पालन करते हुए सी आई ए ने एक जाली पत्र तैयार किया. पत्र ईराक़ी गुप्तचर सेवा के प्रमुख हाब्बुश ने सद्दाम हुसैन को ‘लिखा’ था. एक जुलाई 2001 की तारीख वाले इस पत्र में कहा गया कि 9 सितम्बर की घटना के रिंग लीडर मोहम्मद अत्ता को इस काण्ड के लिए ईराक़ में प्रशिक्षित किया गया. रोन कहते हैं कि इस जाली पत्र ने व्हाइट हाउस की सारी समस्याएं हल कर दीं.
रोन की यह किताब अनेक दस्तावेज़ी साक्ष्यों के हवाले से बताती है कि बुश प्रशासन युद्ध के कई सप्ताह पहले ईराक़ी गुप्तचर सेवा के प्रमुख से यह जान चुका था कि ईराक़ के पास महाविनाश के हथियार नहीं हैं. लेकिन इस सच्चाई को झुठलाते हुए ईराक़ी गुप्तचर सेवा के प्रमुख से अमरीकियों को यह भरोसा दिलवाने वाला पत्र लिखवाया गया कि ईराक़ के पास महाविनाश के हथियार हैं और उसकी संलग्नता अल-क़ायदा के साथ है. अमरीका ने गुप्तचर सेवा प्रमुख को इस ‘सेवा’ के बदले पचास लाख डॉलर प्रदान किए.
ये और ऐसे अनेकानेक सनसनीखेज खुलासे करते हुए पुस्तक के लेखक रोन सस्किण्ड कहते हैं कि एक देश के रूप में अमरीका पथभ्रष्ट हो गया है और वह नैतिक सत्ता, जो कि उसके अस्तित्व का आधार है, उसके हाथ से फिसल चुकी है. रोन बेहद भावपूर्ण शब्दों में अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहते हैं कि इस समय की सबसे बड़ी चुनौती -आतंकवादियों के हाथों में आणविक हथियार– का सामना करने वाली नैतिक नेतृत्व क्षमता अमरीका खो चुका है. किताब के अनेक केन्द्रीय विचारों में से एक है कथनी और करनी के बीच की बढती खाई, अमरीकी सरकार और अधिकारियों द्वारा की जाने वाली नैतिकता की बड़ी-बड़ी बातें, हवाई वक्तव्य और उनके बरक्स उसकी काली करतूतें. किताब में एक जगह बेनज़ीर भुट्टो को यह कहते हुए उद्धृत किया गया है, “रोन, मैं अपनी तमाम ज़िन्दगी इन प्रजातांत्रिक मूल्यों की बात करती रही हूं, लेकिन पिछले महीने ही मुझे उनकी ताकत का एहसास हुआ है.” किताब में खूब सारी घटनाएं और अनेक याद रह जाने वाले किरदार हैं. बेनज़ीर भुट्टो मुशर्रफ से पूछती हैं कि क्या उनकी जान की रक्षा की जाएगी? और इसके जवाब में मुशर्रफ कहते हैं कि “यह इस बात पर निर्भर करता है कि हमारे रिश्ते कैसे रहते हैं. इसे अच्छी तरह समझ लें.” रोन टिप्पणी करते हैं कि यह उत्तर किसी माफिया डॉन की धमकी जैसा लगता है. रोन यह भी बताते हैं कि अपने आखिरी दिनों में बेनज़ीर को यह समझ में आ गया था कि अमरीका ने आदर्श को एक तरफ रख कर अवैध सत्ता से हाथ मिलाते हुए उन्हें दर किनार करना शुरू कर दिया था.
किताब अमरीकी सरकार द्वारा मानवाधिकार हनन के अनेक प्रसंगों, और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर किए जाने वाले अगणित हमलों के प्रसंग उजागर करती हुई ऐसे अनेक चरित्रों को सामने लाती है जो अन्धेरे में रोशनी की मानिन्द हैं. ऐसा ही एक चरित्र है संयुक्त राष्ट्र संघ की शरणार्थी आयुक्त वेण्डी चेम्बरलिन का. वेण्डी कहती हैं, “अगर पूरे दिन के काम के बाद, शाम को आप यह पाएं कि आपने अपनी शपथ का पूरा निर्वाह किया है तो फिर आपका कोई शत्रु हो ही नहीं सकता, और अगर हो भी तो वह अपराजेय नहीं हो सकता.”
किताब आज के आपाधापी और मूल्यहीनता के समय में, जबकि सच्चाई, न्याय और जवाबदेही केवल शब्दों तक सिमट कर रह गई है नैतिक मूल्यों की ज़रूरत को बहुत प्रखरता से रेखांकित करती है.
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Discussed book:
The Way of the World: A Story of Truth and Hope in an Age of Extremism
By Ron Suskind
Published by Harper
432 pages , Hardcover
US $ 27.95

राजस्थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्ट में मेरे पाक्षिक कॉलम 'किताबों की दुनिया' में 07 सितम्बर, 2008 को प्रकाशित आलेख का असम्पादित रूप.








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Sunday, August 10, 2008

जान लेवा भी साबित हो सकती हैं कुछ मेडिकल मिथ्स

चिकित्सा विषयक हज़ारों मिथ्स यानि मन-गढंत बातें सदियों से प्रचलित हैं. उन्हें इतनी बार दुहराया गया है कि वे हमें एकदम प्रामाणिक लगने लगी हैं. वर्तमान सूचना क्रांति ऐसी बातों के भण्डार में और भी वृद्धि करती जा रही है. अगणित वेब साइट्स पर ऐसी बहुत सारी जानकारियां, सूचनाएं और सलाहें सर्व सुलभ हैं जिनका कोई उचित आधार नहीं है. ऐसी बहुत सारी बातें फॉर्वर्डेड मेल्स के माध्यम से और भी अधिक प्रसारित होने लगी हैं. हम इन्हें प्रामाणिक मान कर अपनी या औरों की बेशकीमती ज़िन्दगी से निरंतर खिलवाड़ करते रहते हैं. पेंसिलवेनिया विश्वविद्यालय में कैंसर शल्यचिकित्सक और एन बी सी न्यूज़ की चीफ मेडिकल एडिटर डॉ नैंसी एल स्नाइडरमैन ने अपनी सद्य प्रकाशित पुस्तक “मेडिकल मिथ्स देट केन किल यू एण्ड द 101 ट्रुथ्स देट विल सेव, एक्सटेण्ड एंड इम्प्रूव युअर लाइफ” में सात खण्डों में बांटकर ऐसी ही 101 मनगढंत मिथ्स का परीक्षण किया है और हमें एक स्वस्थ जीवन शैली की राह दिखाई है.

स्नाइडरमैन कहती हैं कि ऐसी कुछ बातें मात्र बेहूदा होती हैं और कुछ पर्याप्त हानिप्रद, लेकिन हमें तो सभी पर विचार कर उनको कसौटी पर कसना चाहिए ताकि मिथ और यथार्थ को अलग कर हम अपनी ज़िन्दगी को न केवल बेहतर बना सकें, बल्कि बचा भी सकें. वे एक मिथ का ज़िक्र करती है जो यह सलाह देती है कि हार्ट अटैक के समय ज़ोर-ज़ोर से खांसना चाहिए. स्नाइडरमैन कहती हैं कि इस मिथ का कोई आधार नहीं है और यह सलाह प्राणघातक सिद्ध हो सकती है. एक अन्य मिथ, जो पिछले दिनों फॉर्वर्डेड मेल्स के कारण खूब प्रचारित हुई है यह बताती है कि खाना खाने के साथ या उसके बाद ज़्यादा ठण्डे पानी का प्रयोग कैंसर को बढावा देता है. मिथ के अनुसार, ठण्डा पानी भोजन में शामिल फैट यानि वसा को जमा देता है और जमी हुई फैट पेट की अम्ल से मिलकर कैंसर को बढावा देती है. स्नाइडरमैन के अनुसार यह एकदम बेहूदा मिथ है. ऐसी ही एक मिथ है कि कॉलेस्ट्रॉल घटाने की दवा से लिवर खराब होता है. लेखिका कम से कम आठ गिलास पानी रोज़ पीने वाली सलाह को भी ऐसी ही बेमानी मिथों में गिनती हैं. लेकिन एक दूसरी तरह की मिथ का खण्डन करती हुई वे यह बताना भी नहीं भूलती कि रक्तदान से हृदय रोग होने के खतरे में कमी आती है. इसी तरह वे इस मिथ का भी पुरज़ोर शब्दों में खण्डन करती हैं कि कान का मैल साफ करने के लिए रुई वाली डण्डी (कॉटन स्वाब) का प्रयोग किया जाना चाहिए. वे आगाह करती हैं कि इससे मैल कान में और गहरे धंस सकता है और उसकी परिणति श्रवण क्षमता में कमी में भी हो सकती है. इस मिथ का खण्डन वे एक मिथ बन चुकी मेडिकल सलाह से करती हैं, कि अपने कान में आप कुहनी से छोटी कोई चीज़ न डालें!

किताब में स्नाइडरमैन ने जिन सात मुख्य मिथों की चर्चा की है वे हैं: वार्षिक स्वास्थ्य परीक्षण बेमानी है, टीकाकरण केवल शिशुओं के लिए है, डॉक्टर कोई पक्षपात नहीं करते, हम कैंसर के खिलाफ लड़ाई हार रहे हैं, हृदय रोग और हृदयाघात सिर्फ बूढों को होता है, हर प्राकृतिक चीज़ सुरक्षित होती है, और मानसिक रोगों से छुटकारा आपके अपने वश की बात है. ये सारी मिथें आधारहीन हैं. इन्हीं सात विषयों पर चर्चा करते हुए स्नाइडरमैन ने 101 मिथों की चर्चा व परीक्षा की है. उनकी कुछ सलाहें ध्यान देने योग्य हैं :

-आप अपनी ज़रूरत, स्वास्थ्य और पारिवारिक इतिहास के अनुसार वार्षिक स्वास्थ्य परीक्षण ज़रूर कराएं.

-कोई भी टीका पूरी ज़िन्दगी प्रभावी नहीं रहता. तीस की उम्र के बाद बूस्टर डोज़ ज़रूरी हो जाती है. नए निकले वैक्सीनों की जानकारी भी लेते रहें.

-कैंसर कोई एक बीमारी नहीं, सैंकड़ों बीमारियों के समूह का नाम है. कैंसर के इलाज़ की दिशा अब उसके उपचार से हटकर नियंत्रण की तरफ है.

-हृदय रोग किसी भी उम्र में हो सकता है.
-यह कभी न समझें कि जो प्राकृतिक है, वह सदा ही सुरक्षित है. प्राकृतिक तो तम्बाकू भी है और संखिया भी. ये कहां सुरक्षित हैं? इसके विपरीत, वे बहुत सारी दवाइयां जो प्राकृतिक नहीं हैं, मानवता के लिए जीवन-रक्षक भी सिद्ध हुई हैं.

स्नाइडरमैन जहां ऐसी मिथ्स की बढती संख्या पर चिंतित होती हैं वहीं वे यह कहना भी नहीं भूलती कि बहुत सारी मिथ्स समय के साथ अपने आप नष्ट भी हो जाती हैं. जैसे, पहले यह माना जाता था कि बुखार के लिए कोई दवा नहीं ली जानी चाहिए लेकिन अब कोई ऐसा नहीं मानता. फिर भी, स्नाइडरमैन बहुत ज़ोर देकर यह कहती हैं कि बीमारियों के खिलाफ लड़ाई में हमारे दो सबसे बड़े दुश्मन हैं अज्ञान और निजी विश्वास. उनका कहना है कि इनसे मुक्ति पाकर हम बीमारियों के खतरों से पूरी तरह मुक्त भले ही न हो पाएं, उस राह पर अवश्य बढेंगे. वे सेल्फ डाइग्नोसिस को बहुत खतरनाक मानते हुए इससे बचने की सलाह देती हैं.

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Discussed book:
Medical Myths That Can Kill You: And the 101 Truths That Will Save, Extend, and Improve Your Life
By Nancy L. Md Snyderman
Published by: Crown
288 pages, Hardcover
US $ 24.95

राजस्थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्ट में मेरे नए पाक्षिक कॉलम 'किताबों की दुनिया' के अंतर्गत दिनांक 10 अगस्त 2008 को प्रकाशित आलेख का किंचित विस्तृत रूप.










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Thursday, July 24, 2008

अतार्किक व्यवहार का अदम्य आकर्षण

हम सोचते हैं कि मानव अधिकांश स्थितियों में बहुत बुद्धिसंगत तरीके से सोचते हैं, खास तौर पर व्यापार के मामलों में या कामकाजी जीवन जैसे मामलों में जहां बुद्दिसंगतता आवश्यक मानी जाती है. शेयर्स के भाव गिरते हैं, फिर भी आप उन्हें बेचने से बचते हैं. लोग मृत रिश्तों को भी ढोते रहते हैं. तमाम खतरों से परिचित होते हुए भी लोग प्रेम करने का दुस्साहस करते हैं. लेकिन ओरी और रोम ब्राफमान कहते हैं कि हम प्राय: बुद्धिसंगत तरीके से नहीं सोचते. अपनी नई किताब स्वे: द इर्रेसिस्टिबल पुल ऑफ इर्रेशनल बिहेवियर में ये ब्राफमान भ्राता, एक व्यापारी और दूसरा मनोवैज्ञानिक, इसी विधा की बहुचर्चित किताबों फ्रीकोनोमिक्स और ब्लिंक (दोनों किताबों की चर्चा इस कॉलम में की जा चुकी है) के विमर्श को आगे बढाते हुए एक बार फिर से मानव मन की अतल गहराइयों में उतर कर उसकी अतार्किकता की तरफ हमारा ध्यान आकर्षित करते हैं. मनुष्य के इसी इर्रेशनल यानि अतार्किक व्यवहार को उन्होंने स्वे करना कहा है, यानि डिगना, झूलना, झुकना.
ब्राफमान भ्राताओं ने अपनी किताब की शुरुआत एक प्रभावशाली उदाहरण से की है. 1977 में के एल एम का एक वायुयान दुर्घटनाग्रस्त हुआ था, जिसमें उसके 584 यात्री मारे गए थे. इस दुर्घटना को उडान इतिहास की भीषणतम दुर्घटना के रूप में स्मरण किया जाता है. लेखकों ने विश्लेषण करके बताया है कि रास्ता बदले जाने के बाद पायलट अपनी मंज़िल पर पहुंचने के बारे में इतना अधिक फोकस्ड था कि वह एक नितांत बेतुके निर्णय की तरफ स्वे कर गया जिसकी परिणति इस हादसे में हुई. किताब का प्रत्येक अध्याय किसी दिलचस्प विचार से प्रारम्भ होता है, और फिर कुछ ऐसी चर्चा की जाती है जो पहली नज़र में अतार्किक लगती है, लेकिन लेखक के विश्लेषण के बाद आप खुद सोचते हैं कि बात तो ठीक है.
सामाजिक मनोविज्ञान, व्यवहारवादी अर्थशास्त्र और संगठनात्मक व्यवहार के क्षेत्र में हुई नवीनतम शोधों के आधार पर हमारे जीवन के विविध क्षेत्रों के जिन महत्वपूर्ण स्वे’ज़ की चर्चा इस किताब में की गई है वे ये हैं:
-प्राय: हम सम्भावित नुकसानों के प्रति ज़रूरत से ज़्यादा रिएक्ट कर जाते हैं और दूरगामी परिणामों की बजाय निकटगामी परिणामों पर अधिक केन्द्रित रहते हैं.

-कोई नुकसान जितना ही ज़्यादा अहम होता है हम उसके प्रति उतने ही विमुख रहते हैं यानि हम यह दिखाते हैं कि वह नुकसान हमें अधिक प्रभावित नहीं कर रहा.
-हम प्रतिबद्धता के व्यापक सम्मोहन से ग्रस्त रहते हैं. जब हम किसी रिश्ते, निर्णय या जीवन की स्थिति से लगाव महसूस करते हैं तो हमारे लिए यह बहुत मुश्किल होता है कि हम बेहतर उपलब्ध विकल्पों पर नज़र भी डालें.
-मनुष्यों में एक प्रवृत्ति यह होती है कि वे किसी व्यक्ति या वस्तु पर कुछ खास गुण आरोपित कर लेते हैं और ऐसा करते हुए अक्सर तथ्यों की अनदेखी कर जाते हैं. इसी को मूल्य आरोपण कहा जाता है.
-मनुष्यों में एक और प्रवृत्ति यह होती है कि आरम्भिक राय के आधार पर व्यक्तियों, वस्तुओं या विचारों पर लेबल लगा लेते हैं और फिर उस लेबल पर पुनर्विचार नहीं करते. इसे निदान का पूर्वाग्रह कहा जाता है.
-हम लोग दूसरों को डिगाते रहते हैं और दूसरों के कारण खुद भी डिगते रहते हैं. लेखकों ने इसे गिरगिटी प्रभाव नाम दिया है.
-लोग साफ सुथरा व्यवहार करना चाहते हैं और दूसरों से भी ऐसी ही आशा रखते हैं.

- हम किसी काम को या तो स्वार्थ की निगाह से परखते हैं या परोपकार की निगाह से. लेकिन एक साथ दोनों निगाहों से कभी नहीं देखते.
-समूह हमारी तर्क क्षमता को बहुत अधिक प्रभावित करते हैं.
किताब के अंत में लेखक ने ऐसी अनेक युक्तियां सुझाई हैं जिनके प्रयोग से हम अपने बेतुके व्यवहार –या स्वे- पर काबू पा सकते हैं. लेकिन ये युक्तियां प्रभावी हो सकती हैं या नहीं, यह आपके नज़रिये पर निर्भर करता है. मुझे तो लगा कि ज़्यादातर युक्तियां नितांत सरलीकृत उपदेश हैं. जैसे, लेखक कहते हैं कि अपने बिगडे सोच पर, जो कि मूल्य आरोपण की परिणति होता है, पार पाने के लिए आप चीज़ों को उस रूप में देखें जैसी कि वे असल में हैं, न कि जैसी दिखाई देती हैं. सिद्धांतत: बात ठीक है, लेकिन इस पर अमल कितना सम्भव है? फिर भी, अगर इस तरह के आदर्शीकृत सुझावों की बात अलग छोड दें तो किताब की महता असंदिग्ध है, इसलिए कि इसके माध्यम से हम मानवीय व्यवहार को और अधिक बारीकी से समझ पाते हैं, अपने तथा औरों के अतार्किक व्यवहार की तह में जा सकते हैं और उसके प्रति अधिक सदय तथा सम्वेदनशील हो सकते हैं. इतना भी कम नहीं है.

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Discussed book:
Sway: The Irresistible Pull of Irrational Behaviour
By Ori Brafman & Rom Brafman
Published by: Doubleday Business
Hardcover, 224 pages
US $ 21.95








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Thursday, July 17, 2008

कामयाबी का राज़

स्टार ट्रैक के स्क्रिप्ट लेखक और स्टीफेन हॉकिंग की बहु चर्चित पुस्तक ‘अ ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम’ के सह लेखक के रूप में सुविख्यात लिओनार्ड म्लोदिनोव की नई किताब द ड्रंकर्ड्स वॉक: हाउ रैण्डमनेस रूल्स अवर लाइव्ज़ यह बताती है कि हमारी ज़िन्दगी में संयोगों और आकस्मिकता की क्या अहमियत है. खुद म्लोदिनोव एक विश्वविद्यालय में भावी वैज्ञानिकों को रैण्डमनेस यानि बेतरतीबी के बारे में पढाते हैं. किताब बहुत दिलचस्प तरीके से हमें इस बात का एहसास कराती है कि दुनिया किस तरह चलती है, और इस बारे में हम जो जानते हैं, वह कितना अल्प है. इस किताब में म्लोदिनोव गुज़रे समय के महानतम लोगों से लगाकर आज के मामूली लोगों तक की ज़िन्दगी और क्रिया कलाप के अनेक प्रसंग सामने लाकर हमारी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में बेतरतीबी या आकस्मिकता, संयोग और सम्भाव्यता की भूमिका को उजागर करते हैं और यह बताते हैं कि कैसे एक साधारण बातचीत या किसी बडी आर्थिक क्षति- इन सबकी अहमियत को हम ग़लत तरह से ग्रहण करते हैं.

दर असल ड्रंकर्ड्स वॉक एक गणितीय अभिव्यक्ति है जो किसी तरतीब हीन गति को अभिव्यक्त करती है. इस अभिव्यक्ति को अपनी किताब का शीर्षक बना कर लेखक म्लोदिनोव ने कहना चाहा है कि हमारी ज़िन्दगी का अधिकांश पहले से केवल उतना ही पूर्वानुमेय होता है जितना किसी मधुशाला से ताज़ा-ताज़ा निकले लडखडाते आदमी के क़दम. यानि किसी शराबी के कदमों का बहुत कम पूर्वानुमान लगाया जा सकता है.
म्लोदिनोव अपनी किशोरावस्था को याद करते हैं और कहते हैं कि वे मोमबत्तियों की पीली लौ को बेतरतीबी से हिलते-डुलते देखा करते थे. तब वे सोचते कि मोमबत्तियों की लौ की हलचल में निश्चय ही कोई तार्किक क्रम होता है और वैज्ञानिक ज़रूर ही उस क्रम को समझ सकते होंगे. लेकिन उन्हीं दिनों उनके पिता ने उनसे कहा कि ज़िन्दगी ऐसी नहीं होती. कई बार बहुत कुछ ऐसा घट जाया करता है जिसकी पहले से कल्पना नहीं की जा सकती. खुद उनकी ज़िन्दगी का एक वाकया इस बात की पुष्टि करता है.

म्लोदिनोव के पिता एक नाज़ी यातना शिविर में क़ैद थे. जब भूख असहनीय हो गई तो उन्होंने एक बेकरी से डबल रोटी चुरा ली. बेकरी के मालिक और गेस्टापो ने मिलकर सारे संदिग्धों को एक क़तार में खडा कर पूछा कि डबलरोटी किसने चुराई है. जब किसी ने अपना अपराध स्वीकार नहीं किया तो उन्होंने सैनिकों को हुक्म दिया कि वे इन लोगों को एक-एक करके उस वक़्त तक शूट करते रहें जब तक कोई अपना अपराध स्वीकार न कर ले या सारे ही मर न जाएं. ऐसे में दूसरों की जान-बचाने के लिए म्लोदिनोव के पिता आगे आए. बाद में उन्होंने अपने बेटे से कहा कि उन्होंने किसी महानता की वजह से ऐसा नहीं किया. इसलिए किया कि मरना तो हर हाल में था: ज़ुर्म कुबूल करके भी, चुप रहके भी. पिता को बेकरी वाले ने एक अच्छी नौकरी पर अपने सहायक के तौर पर रख लिया. पिता ने म्लोदिनोव से कहा कि यह सब संयोग नहीं तो और क्या था? अगर ऐसा न होकर कुछ भी और हुआ होता तो तुम्हारा जन्म ही नहीं हुआ होता. यानि तुम्हारे जन्म में तुम्हारी तो कोई भूमिका नहीं थी. इसी क्रम को आगे बढाते हुए खुद म्लोदिनोव ने सोचा कि उन्हें तो अपने होने के लिए हिटलर का आभारी होना चाहिए क्योंकि जर्मनों ने उनके पिता की पत्नी और दो बच्चों को मारकर उनकी पिछली ज़िन्दगी की स्लेट को पोंछ दिया था. अगर युद्ध न हुआ होता और उनके पिता ने न्यूयॉर्क पलायन न किया होता तो म्लोदिनोव की मां से उनकी मुलाक़ात ही न हुई होती. और तब उनके दो भाइयों का जन्म ही न हुआ होता.

निजी अनुभवो से हटकर एक सार्वजनिक प्रसंग के माध्यम से भी म्लोदिनोव यही बात कहते हैं. वे कहते हैं कि आज जे के रॉलिंग की हैरी पॉटर की लोकप्रियता असन्दिग्ध है. लेकिन प्रकाशकों ने इसे एक-दो नहीं पूरे नौ बार अस्वीकृत किया था. हम हिन्दुस्तानी चाहें तो अमिताभ बच्चन के शुरुआती दौर को भी याद कर सकते हैं जब उनकी आवाज़ और कद काठी को अस्वीकार किया गया था. इसीलिए म्लोदिनोव कहते हैं कि किसी फिल्म की सफलता-असफलता ऐसे बहुत सारे तत्वों पर निर्भर करती है जिन पर किसी का कोई नियंत्रण नहीं होता.

यही वजह है कि म्लोदिनोव कहते हैं कि हमारी ज़िन्दगी की रूपरेखा तो मोमबत्ती की लौ की मानिन्द होती है. बहुत सारी आकस्मिक घटनाएं, जैसे हवा के झोंके, उस लौ को अनेकानेक दिशाओं की तरफ धकेलती हैं और उनके मुक़ाबिल खुद लौ का अस्तित्व उसका भविष्य तै करता है. इसलिए न तो ज़िन्दगी की दिशा और उसकी गति की कोई व्याख्या की जा सकती है और न उसका पूर्वानुमान किया जा सकता है.

म्लोदिनोव कहते हैं कि ऐसी तमाम अनिश्चितताओं के बीच समझदारीपूर्ण निर्णय करना और सही विकल्प चुनना खास तरह की दक्षता की मांग करता है, और दूसरी सारी दक्षताओं की तरह इस दक्षता को भी अनुभव व श्रम से निरंतर विकसित किया जा सकता है. लेकिन, याद रखें, ज़िन्दगी के खेल में भले ही कुछ खिलाडी दूसरों से बेहतर हों, उनकी हार-जीत में रैण्डमनेस की भूमिका सर्वोपरि होती है.

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Discussed book:
The Drunkard’s Walk: How Randomness Rules Our Lives
By Leonard Mlodinow
Published by Pantheon
Hardcover, 272 pages
US $ 24.95

राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट जस्ट जयपुर में मेरे साप्ताहिक कॉलम वर्ल्ड ऑफ बुक्स के अंतर्गत 17 जुलाई, 2008 को प्रकाशित.








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Thursday, July 10, 2008

मानवीय इतिहास के सबसे खतरनाक क्षण को याद करते हुए

अब तक यह माना जाता रहा है कि 1962 के मिसाइल क्राइसिस के बारे में जितना लिखा जा सकता था, सब लिखा जा चुका है. लेकिन हाल ही में प्रकाशित वाशिंगटन पोस्ट के अनुभवी रिपोर्टर माइकेल डॉब्ब्स की किताब वन मिनट टु मिडनाइट: केनेडी, ख्रुश्चेव, एण्ड कास्त्रो ऑन द ब्रिंक ऑफ न्युक्लियर वार को पढकर लगता है कि काफी कुछ अब तक अनकहा और अनजाना ही था. बेलफास्ट, आयरलैण्ड में जन्मे माइकेल डॉब्ब्स का ज़्यादा समय साम्यवाद के पतन का अध्ययन करने में बीता है और उनकी एक किताब ‘डाउन विद बिग ब्रदर: द फॉल ऑफ सोवियत एम्पायर’ 1997 के पेन अवार्ड्स की अंतिम सूची तक पहुंच चुकी है.

अक्टूबर, 1962 में, जब शीत युद्ध अपने उफान पर था, संयुक्त राज्य अमरीका और सोवियत संघ क्यूबा में मिसाइलों की तैनाती के मुद्दे पर तेज़ी से आणविक संघर्ष की दिशा में बढते प्रतीत हो रहे थे. डॉब्ब्स ने अब तक अछूते अमरीकी, सोवियत और क्यूबाई दस्तावेजों, साक्ष्यों और चित्रों को खंगाल कर क्यूबाई मिसाइल संकट पर अब तक की सर्वाधिक आधिकारिक पुस्तक की रचना की है. कुछ चौंकाने वाले नए प्रसंग उजागर कर डॉब्ब्स यह बताने में पूरी तरह सफल होते हैं कि दुनिया महायुद्ध और महाविनाश के कितना नज़दीक पहुंच गई थी.

इस किताब में पहली बार हमें गुआण्टानामो स्थित अमरीकी नौसैनिक ठिकानों को तबाह कर डालने के ख्रुश्चेव के इरादों का दिल दहला देने वाला वृत्तांत पढने को मिलता है. यह भी पढने को मिलता है कि कैसे गलती से एक अमरीकी जासूसी वायुयान सोवियत संघ के आकाश में उडान भरने लगा था. क्यूबा में सी आई ए एजेण्ट्स की गतिविधियों और एक अमरीकी टी 106 जेट वायुयान की, जिसमें आणविक हथियार भरे थे, क्रैश लैण्डिंग का ब्यौरा भी हमें पढने को मिलता है.

डॉब्ब्स हमें व्हाइट हाउस और क्रेमलिन के भीतर ले जाते हैं और हम यह जान पाते हैं कि किस तरह विचारधारात्मक सन्देहों ने केनेडी और ख्रुश्चेव जैसे विवेकी और बुद्धिमान नेताओं के बीच की दूरियां बढा दीं और कैसे वे युद्ध की आशंका से व्यथित हुए. हम देखते हैं कि ये दोनों नेता आणविक युद्ध की भयावह हक़ीक़तों को पहचानते हैं, लेकिन दूसरी तरफ कास्त्रो हैं जो वैसे तो कभी भी पारम्परिक राजनीतिक सोच के प्रवाह में नहीं बहते, लेकिन एक मसीही सपना पाले रहते हैं कि उन्हें तो इतिहास ने एक खास मिशन के लिए चुना है. जैसे-जैसे नए प्रसंग उजागर होते हैं, डॉब्ब्स हमें क्यूबा की निगरानी कर रहे अमरीकी जहाजों के डैक्स पर ले जाते हैं, मियामी की गलियों की सैर कराते हैं जहां कास्त्रो विरोधी निर्वासित उनके तख्ता पलट की योजना बनाने में जुटे हैं.
डॉब्ब्स बताते हैं कि ख्रुश्चेव कास्त्रो को ‘एक बेटे की तरह’ प्यार करते थे, लेकिन साथ ही उनकी भावनात्मक स्थिरता के बारे में आशंकित भी रहते थे. इसीलिए वे कास्त्रो के हाथों में आणविक हथियार सौंपने को तैयार नहीं थे. और जहां तक कास्त्रो का सवाल है, उनकी पूरी रणनीति ही चुनौती पर आधारित थी. वे अपने शत्रुओं के समक्ष ज़रा भी कमज़ोर नहीं पडना चाहते थे. वे किसी मक़सद के लिए अपने देशवासियों को साथ लेकर मरने को तैयार थे. अगर मौका आता, वे क्यूबा की धरती पर अमरीकी घुसपैठ रोकने के लिए आणविक युद्ध शुरू करने की अनुमति देने में क़तई नहीं हिचकिचाते.
डॉब्ब्स ने यह किताब नई पीढी के पाठकों को 27 अक्टूबर 1962 के उस स्याह शुक्रवार की तथा उसकी पूर्ववर्ती घटनाओं की जानकारी देने के लिए लिखी है, जिसे इतिहासकार आर्थर एम श्लेसिंगर ने मानवीय इतिहास का सबसे खतरनाक क्षण कह कर पुकारा था. किताब अमरीकी, रूसी और क्यूबाई तीनों पक्षों के चरित्रों के मानवीय पक्ष को बखूबी उभारती है. इससे पता चलता है कि असल संकट केनेडी और ख्रुश्चेव के सीधे टकराव का नहीं था. संकट तो पैदा हुआ एक के बाद एक अप्रत्याशित रूप से घटित होने वाली घटनाओं के कारण. और फिर जब एक बार युद्ध के नगाडे बजने ही लग गए तो उन्हें रोकना किसी के भी वश में नहीं रह गया. उस स्याह शुक्रवार को, जब दोनों ही पक्षों को महसूस हुआ कि अब स्थितियों पर उनकी पकड नहीं रह गई है तो बजाय टकराने के, वे एक दूसरे की विपरीत दिशाओं में चले गए. केनेडी पर यह दबाव डाला जा रहा था कि वे प्रक्षेपास्त्रों के ठिकानों पर बमबारी करें और क्यूबा पर हमला कर दें. समझा जा सकता है कि अगर उन्होंने ऐसा कर दिया होता तो तो सोवियत संघ भी अमरीकी आक्रामक ताकतों का सामना अपने आणविक हथियारों से ज़रूर करता. फिर क्या हुआ होता, इसकी कल्पना ही हमें दहशत से भर देती है.

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Discussed book:
One Minute to Midnight: Kennedy, Khrushchev, and Castro on the Brink of Nuclear War
By Michael Dobbs
Published by: Knopf Publishing Group
Hardcover, 448 pages
US $ 28.95

राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट जस्ट जयपुर में मेरे साप्ताहिक कॉलम वर्ल्ड ऑफ बुक्स के अंतर्गत 10 जुलाई, 2008 को प्रकाशित.






मानवीय इतिहास के सबसे खतरनाक क्षण को याद करते हुए


अब तक यह माना जाता रहा है कि 1962 के मिसाइल क्राइसिस के बारे में जितना लिखा जा सकता था, सब लिखा जा चुका है. लेकिन हाल ही में प्रकाशित वाशिंगटन पोस्ट के अनुभवी रिपोर्टर माइकेल डॉब्ब्स की किताब वन मिनट टु मिडनाइट: केनेडी, ख्रुश्चेव, एण्ड कास्त्रो ऑन द ब्रिंक ऑफ न्युक्लियर वार को पढकर लगता है कि काफी कुछ अब तक अनकहा और अनजाना ही था. बेलफास्ट, आयरलैण्ड में जन्मे माइकेल डॉब्ब्स का ज़्यादा समय साम्यवाद के पतन का अध्ययन करने में बीता है और उनकी एक किताब ‘डाउन विद बिग ब्रदर: द फॉल ऑफ सोवियत एम्पायर’ 1997 के पेन अवार्ड्स की अंतिम सूची तक पहुंच चुकी है.

अक्टूबर, 1962 में, जब शीत युद्ध अपने उफान पर था, संयुक्त राज्य अमरीका और सोवियत संघ क्यूबा में मिसाइलों की तैनाती के मुद्दे पर तेज़ी से आणविक संघर्ष की दिशा में बढते प्रतीत हो रहे थे. डॉब्ब्स ने अब तक अछूते अमरीकी, सोवियत और क्यूबाई दस्तावेजों, साक्ष्यों और चित्रों को खंगाल कर क्यूबाई मिसाइल संकट पर अब तक की सर्वाधिक आधिकारिक पुस्तक की रचना की है. कुछ चौंकाने वाले नए प्रसंग उजागर कर डॉब्ब्स यह बताने में पूरी तरह सफल होते हैं कि दुनिया महायुद्ध और महाविनाश के कितना नज़दीक पहुंच गई थी.

इस किताब में पहली बार हमें गुआण्टानामो स्थित अमरीकी नौसैनिक ठिकानों को तबाह कर डालने के ख्रुश्चेव के इरादों का दिल दहला देने वाला वृत्तांत पढने को मिलता है. यह भी पढने को मिलता है कि कैसे गलती से एक अमरीकी जासूसी वायुयान सोवियत संघ के आकाश में उडान भरने लगा था. क्यूबा में सी आई ए एजेण्ट्स की गतिविधियों और एक अमरीकी टी 106 जेट वायुयान की, जिसमें आणविक हथियार भरे थे, क्रैश लैण्डिंग का ब्यौरा भी हमें पढने को मिलता है.

डॉब्ब्स हमें व्हाइट हाउस और क्रेमलिन के भीतर ले जाते हैं और हम यह जान पाते हैं कि किस तरह विचारधारात्मक सन्देहों ने केनेडी और ख्रुश्चेव जैसे विवेकी और बुद्धिमान नेताओं के बीच की दूरियां बढा दीं और कैसे वे युद्ध की आशंका से व्यथित हुए. हम देखते हैं कि ये दोनों नेता आणविक युद्ध की भयावह हक़ीक़तों को पहचानते हैं, लेकिन दूसरी तरफ कास्त्रो हैं जो वैसे तो कभी भी पारम्परिक राजनीतिक सोच के प्रवाह में नहीं बहते, लेकिन एक मसीही सपना पाले रहते हैं कि उन्हें तो इतिहास ने एक खास मिशन के लिए चुना है. जैसे-जैसे नए प्रसंग उजागर होते हैं, डॉब्ब्स हमें क्यूबा की निगरानी कर रहे अमरीकी जहाजों के डैक्स पर ले जाते हैं, मियामी की गलियों की सैर कराते हैं जहां कास्त्रो विरोधी निर्वासित उनके तख्ता पलट की योजना बनाने में जुटे हैं.


डॉब्ब्स बताते हैं कि ख्रुश्चेव कास्त्रो को ‘एक बेटे की तरह’ प्यार करते थे, लेकिन साथ ही उनकी भावनात्मक स्थिरता के बारे में आशंकित भी रहते थे. इसीलिए वे कास्त्रो के हाथों में आणविक हथियार सौंपने को तैयार नहीं थे. और जहां तक कास्त्रो का सवाल है, उनकी पूरी रणनीति ही चुनौती पर आधारित थी. वे अपने शत्रुओं के समक्ष ज़रा भी कमज़ोर नहीं पडना चाहते थे. वे किसी मक़सद के लिए अपने देशवासियों को साथ लेकर मरने को तैयार थे. अगर मौका आता, वे क्यूबा की धरती पर अमरीकी घुसपैठ रोकने के लिए आणविक युद्ध शुरू करने की अनुमति देने में क़तई नहीं हिचकिचाते.

डॉब्ब्स ने यह किताब नई पीढी के पाठकों को 27 अक्टूबर 1962 के उस स्याह शुक्रवार की तथा उसकी पूर्ववर्ती घटनाओं की जानकारी देने के लिए लिखी है, जिसे इतिहासकार आर्थर एम श्लेसिंगर ने मानवीय इतिहास का सबसे खतरनाक क्षण कह कर पुकारा था. किताब अमरीकी, रूसी और क्यूबाई तीनों पक्षों के चरित्रों के मानवीय पक्ष को बखूबी उभारती है. इससे पता चलता है कि असल संकट केनेडी और ख्रुश्चेव के सीधे टकराव का नहीं था. संकट तो पैदा हुआ एक के बाद एक अप्रत्याशित रूप से घटित होने वाली घटनाओं के कारण. और फिर जब एक बार युद्ध के नगाडे बजने ही लग गए तो उन्हें रोकना किसी के भी वश में नहीं रह गया. उस स्याह शुक्रवार को, जब दोनों ही पक्षों को महसूस हुआ कि अब स्थितियों पर उनकी पकड नहीं रह गई है तो बजाय टकराने के, वे एक दूसरे की विपरीत दिशाओं में चले गए. केनेडी पर यह दबाव डाला जा रहा था कि वे प्रक्षेपास्त्रों के ठिकानों पर बमबारी करें और क्यूबा पर हमला कर दें. समझा जा सकता है कि अगर उन्होंने ऐसा कर दिया होता तो तो सोवियत संघ भी अमरीकी आक्रामक ताकतों का सामना अपने आणविक हथियारों से ज़रूर करता. फिर क्या हुआ होता, इसकी कल्पना ही हमें दहशत से भर देती है.

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Discussed book:

One Minute to Midnight: Kennedy, Khrushchev, and Castro on the Brink of Nuclear War

By Michael Dobbs

Published by: Knopf Publishing Group

Hardcover, 448 pages

US $ 28.95

राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट जस्ट जयपुर में मेरे साप्ताहिक कॉलम 'वर्ल्ड ऑफ बुक्स' के अन्तर्गत 10 जुलाई, 2008 को प्रकाशित.





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Tuesday, July 8, 2008

साहित्यिक पुरस्कारों पर विवाद

राजस्थान की साहित्यिक दुनिया में इन दिनों बडा उद्वेलन है. कारण है राजस्थान साहित्य अकादमी के तीन ताज़ा निर्णय. राजस्थान साहित्य अकादमी ने हाल ही में अपने दो पुरस्कार बन्द या समाप्त करने की घोषणा की है. एक है साहित्यिक पत्रकारिता के लिए दिया जाने वाला प्रकाश जैन पुरस्कार, और दूसरा है अंतरप्रांतीय साहित्य बन्धुत्व अनुवाद पुरस्कार. कारण यह बताया गया कि विगत कुछ वर्षों से इन पुरस्कारों के लिए वांछित प्रविष्टियां प्राप्त नहीं हो रही थीं. प्रांत के साहित्यकारों की नाराज़गी इन कारणों से है. एक तो यह कि ‘लहर’ के यशस्वी सम्पादक प्रकाश जैन के नाम पर दिया जा रहा पुरस्कार बन्द कर अकादमी ने अपनी तरह से उनकी स्मृति के साथ अपमानजनक व्यवहार किया है, और दूसरे यह कि साहित्यिक पत्रकारिता और अनुवाद की महत्ता को नकारा गया है. और जहां तक अकादमी के इस विचार का प्रश्न है कि इन पुरस्कारों के लिए प्रविष्टियां प्राप्त नहीं हो रही थी, तो पहले तो यह देखा जाना चाहिए कि क्या राजस्थान में साहित्यिक पत्रकारिता और अनुवाद के क्षेत्र में तालाबन्दी हो गई है? न तो कोई साहित्यिक पत्रिका निकल रही है और न अनुवाद किये जा रहे हैं? ऐसा नहीं है. तो फिर सवाल यह उठना चाहिए कि क्या कारण है कि लोग इन पुरस्कारों के लिए प्रविष्टियां ही नहीं भेजते? कहीं इस बात का सम्बन्ध अकादमी की प्रतिष्ठा के क्षरण से तो नहीं है? लेकिन इस बात पर भला अकादमी के कर्ता धर्ता तो क्यों विचार करने लगे? लोग लाख कहें कि अकादमी की पत्रिका ‘मधुमती’ का स्तर बहुत गिर गया है, इतना कि अब स्तर बचा ही नहीं है, तो भी इस पत्रिका के सम्पादक को क्यों चिंता हो? आखिर आत्ममुग्धता भी कोई चीज़ होती है!
दूसरी बात जिसने लोगों को उद्वेलित किया है वह है जीवित लेखकों द्वारा अपने नाम पर पुरस्कार घोषित करवाना. भगवान अटलानी और सरला अग्रवाल ने अकादमी को कुछ राशि दी और अकादमी ने उनके नाम पर पुरस्कार देने की घोषणा कर दी. साहित्य की दुनिया में अपने नामों पर या अपने निकट के लोगों के नाम पर पुरस्कार का सिलसिला पुराना है, और इसमें कोई बडी आपत्ति भी नज़र नहीं आती. अगर मुझे लगे कि मेरे पास काफी पैसा है और उसका सदुपयोग मैं किसी को पुरस्कृत करके करना चाहता हूं, तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है. इस बात से भी कोई फर्क़ नहीं पडता कि यह ‘मैं’ कोई लेखक है या व्यवसायी या राजा या तस्कर. आखिर ऐसे अनेक लोगों के नाम पर शिक्षण संस्थान भी तो हैं! किसी को इनका पुरस्कार ग्रहण करना हो, करे; न करना हो अस्वीकार कर दे. गडबड तब होती है जब निजी और सार्वजनिक का गठबन्धन होता है. भगवान अटलानी और सरला अग्रवाल अपने स्तर पर पुरस्कार देते, किसी को आपत्ति नहीं होती. आपति की बात यह है कि जनता के पैसों से संचालित एक सार्वजनिक संस्थान राजस्थान साहित्य अकादमी ने ये निजी नाम वाले पुरस्कार देने की घोषणा की है. शायद जीवन के अन्य क्षेत्रों में आ रही पी पी पी (पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप) की अवधारणा का यह साहित्य की दुनिया में प्रवेश है. लेकिन, अगर हम इसी तर्क को थोडा आगे तक ले जाएं तो इस व्यवस्था की विसंगति सामने आ जाएगी. मान लीजिए कोई लेखक, या कोई भी अन्य व्यक्ति, जिसके पास बहुत सारा धन है, यह कहे कि मैं पूरी राजस्थान साहित्य अकादमी को ही खरीदना चाहता हूं, या कि अपने नाम पर करवा लेना चाहता हूं तो क्या होगा? कल आप घसीटामल राजस्थान साहित्य अकादमी बना देंगे? हो सकता है कुछ लोगों को इस पर कोई ऐतराज़ न हो, लेकिन अन्य बहुतों को है. जीवन में कुछ चीज़ें तो साफ-सुथरी बची रहें, यह जिनकी आकांक्षा है, उन को ऐतराज़ है.
फिर एक बात और हुई. इसी अकादमी ने दो पुरस्कार और शुरू किए. डॉ लक्ष्मीमल्ल सिंघवी के नाम पर अंतरराष्ट्रीय स्तर का सर्वोच्च अकादमी पुरस्कार, और हनुमान प्रसाद पोद्दार के नाम पर राष्ट्रीय स्तर का सर्वोच्च अकादमी पुरस्कार. जिन्हें स्मरण न हो उन्हें करा दें कि सिंघवी जी एक सुविख्यात न्यायविद थे और अधिक से अधिक हिन्दी सेवी थे, तथा पोद्दार जी सुपरिचित धार्मिक (साहित्यिक नहीं) पत्रिका ‘कल्याण’ के संस्थापक-संपादक थे. अकादमी प्रांत की सीमाओं से बाहर निकल कर देश और दुनिया तक अपने पंख फैला रही है, यह अच्छा है. लेकिन अगर घर की उपेक्षा करके बाहर दिया जलाना चाहती है तो चिंत्य है. एक तरफ तो उसके पास राजस्थान में काम करने केलिए पर्याप्त संसाधन नहीं है, तभी तो लोगों के पैसों से पुरस्कार शुरू करने पड रहे हैं, और दूसरी तरफ वह अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कार देना चाह रही है. यह कितना वाज़िब है? और फिर पुरस्कार किनके नाम पर? इनका साहित्यिक अवदान है ही नहीं, या बहुत अल्प है. और याद कीजिए कि जिनका है,(मेरा इशारा प्रकाश जैन की तरफ है) उनके नाम वाले पुरस्कार को साथ-साथ बन्द भी कर रही है.

तो, कोढ में खाज यह कि ये तीनों चीज़ें एक साथ हो गईं. पता नहीं यह आकस्मिक है या सुचिंतित, लेकिन एक तरफ तो प्रकाश जैन का नाम मिटाने की चेष्टा हुई और दूसरी तरफ दो लेखकों को जैसा-तैसा अमरत्व प्रदान करने की कोशिश हुई. और तीसरी तरफ दो साहित्येतर व्यक्तियों के नाम पर राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार शुरू कर उन्हें साहित्यिक अमरत्व प्रदान करने की चेष्टा की गई. तो इस कॉकटेल ने लोगों को और ज़्यादा परेशान किया है. प्रकाश जैन का साहित्यिक पत्रकारिता में जो अवदान है उसे कोई बे-पढा लिखा ही नकारेगा. उनके नाम से चल रहे पुरस्कार को बन्द करना निश्चय ही उनकी स्मृति का अपमान है. जिन लेखकों के नाम पर पुरस्कार शुरू किए जा रहे हैं, उनके महत्व पर कोई टिप्पणी गैर ज़रूरी है. इसलिए गैर ज़रूरी है ये पुरस्कार उनके साहित्यिक महत्व की वजह से नहीं, उनके धन-बल की वजह से शुरू किए जा रहे हैं, इसलिए टिपणी अनावश्यक होगी. इतना ज़रूर है कि इस सन्दर्भ में स्वयंप्रकाश की एक कहानी ‘चौथमल पुरस्कार’ बेसाख्ता याद आती है. और जहां तक राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों की बात है उसमें ये दोनों बातें जुड जाती हैं: जिनके नाम पर पुरस्कार उनके साहित्यिक महत्व पर प्रशन चिह्न और इन पुरस्कारों की ज़रूरत.

राजस्थान साहित्य अकादमी के इन निर्णयों ने एक बार फिर इस संस्थान की रीति-नीति को विमर्श के दायरे में ला खडा किया है. इस संस्थान की और तमाम सार्वजनिक संस्थानों की. जिन्होंने ऐसे निर्णय किए, स्वाभाविक है कि वे इन्हें डिफेण्ड करेंगे, कर रहे हैं. लेकिन बजाय किसी ज़िद के, बेहतर हो, इस तरह के मुद्दों पर खुले मन से विचार हो. आखिर इस तरह के फैसलों के परिणाम दूरगामी हुआ करते हैं. सार्वजनिक और निजी की लक्ष्मण रेखाएं तो तै की ही जानी चाहिए.







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Thursday, July 3, 2008

दूसरों की नज़रों में हम

“इस बात की तो किसी ने ख्वाब में भी कल्पना नहीं की होगी कि तीन हज़ार सालों के जातिगत भेदभाव के बाद तथाकथित पिछडी जाति की एक महिला देश के सर्वाधिक जनसंख्या वाले राज्य की मुख्यमंत्री बन जाएगी. लेकिन दो बार ऐसा हो गया. इसी तरह, 2004 में भारत में जो हुआ वह तो मानवता के इतिहास में अभूतपूर्व है. एक अरब से ज़्यादा आबादी वाले इस दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्र में चुनाव हुआ और एक कैथोलिक राजनीतिक नेता (सोनिया गांधी) ने एक सिख के लिए देश के प्रधानमन्त्री पद का त्याग किया. और बात यहीं खत्म नहीं होती. सिख मनमोहन सिंह को शपथ दिलाई देश के मुस्लिम राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने. यह याद रहे कि देश की 81 प्रतिशत आबादी हिन्दू है.:”

इस और ऐसी ही अनेक टिप्पणियों से भरी रोचक किताब इन स्पाइट ऑफ द गॉड्स: द राइज़ ऑफ मॉडर्न इण्डिया में ब्रिटिश पत्रकार एडवर्ड लूसे ने तेज़ी से उभर रही आर्थिक और भू-राजनीतिक ताकत भारत की विकास यात्रा की पडताल की है, उसके अवरोधकों को रेखांकित किया है और विकास की गति तेज़ करने के लिए सुझाव दिए हैं. एडवर्ड लूसे 2001 से 2005 तक नई दिल्ली में फाइनेंशियल टाइम्स के दक्षिणी एशिया ब्यूरो चीफ रहे है और आजकल इसी पत्र के वाशिंगटन कमेंटेटर हैं. उनकी पत्नी भारतीय है. इस किताब के लिए लूसे ने महत्वपूर्ण राजनेताओं, धर्म गुरुओं, आर्थिक विश्लेषकों से लगाकर ग्रामीण मज़दूरों तक से बात की और खूब यात्राएं की. यह किताब रिपोर्ताज और विश्लेषण का अनूठा मिश्रण है और भारतीय समाज और व्यवस्था की जटिलताओं को बखूबी उभारती है. लूसे जल्दबाजी और भावुकता में कोई टिप्पणी करने की बजाय आंकडों और तथ्यों से पुष्ट बात कहकर अपनी बात को प्रामाणिकता प्रदान करते हैं.

सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत की उपलब्धियों, आर्थिक विकास और महाशक्ति बनने के दावों के बरक्स अनेक अध्ययनों ने यह बताया है कि दिया तले अन्धेरा भी घना है. एक अध्ययन के अनुसार, भारत में हज़ार लोगों के पीछे मात्र चौरासी टेलीविजन सेट्स हैं, जबकि अमरीका में नौ सौ अडतीस हैं. भारत में प्रति हज़ार 7.2 पर्सनल कम्प्यूटर हैं, ऑस्ट्रेलिया में 564.5 हैं. भारत में इण्टरनेट अभी महज़ दो प्रतिशत को सुलभ है, मलेशिया में चौंतीस प्रतिशत को. भारत की श्रम शक्ति का महज़ पांच प्रतिशत ही औपचारिक रूप से नियोजित है, यानि मात्र साढे तीन करोड लोगों को ही रोज़गार सुरक्षा सुलभ है. लगभग इतनी ही आबादी इनकम टैक्स देती है. भारत के तीस करोड लोग अडसठ लाख ऐसे गांवों में निवास करते हैं जहां शुद्ध पेय जल तक ठीक से सुलभ नहीं है. ज़्यादातर झोंपडियां गोबर से बनी हैं, चूल्हे जिस तरह जलाये जाते हैं उससे श्वास सम्बन्धी बीमारियां उग्र होती हैं. देश की पैसठ प्रतिशत जनसंख्या ही पढ सकती है. गांवों में तो साक्षरता दर मात्र तैंतीस प्रतिशत ही है. याद रखें, चीन में यह दर नब्बे प्रतिशत है. लेकिन, भारत के विकास में अवरोधक तत्वों की चर्चा करते हुए भी लूसे भारत में चीन का मॉडल अपनाने की हिमायत नहीं करते.

1991 से पहले भारत में कोटा-परमिट राज था. पी वी नरसिंहा राव ने उसे बदला. विदेशी निवेश भी बढा, और काफी कुछ बदला. टेलीविजन चैनल एक से एक सौ पचास तक पहुंचे, सडकों पर कारों के नए मॉडल्स आए, नई दुकानें और मॉल खुले और उनमें नई तरह के उत्पाद दिखाई देने लगे. फिर भी भारत के उभरते मध्यवर्ग, शिक्षित शहरी अभिजात वर्ग और गांवों में रह रहे गरीबों के बीच असमानता की खाई न केवल बनी हुई है, और गहरी हुई है. लूसे ने इसी तरह के अंतर्विरोधों से अपनी किताब का ताना-बाना बुना है. किताब का शीर्षक भी ऐसे ही एक अंतर्विरोध को उजागर करता है और बाद में एक जगह वे भारत के अभ्युदय पर अचरज करते हुए कहते हैं कि भारत एक तरफ तो एक महत्वपूर्ण राजनीतिक और आर्थिक ताकत बनता जा रहा है और दूसरी तरफ अभी भी एक धार्मिक, आध्यात्मिक और कुछ मानों में अन्धविश्वासी समाज बना हुआ है.

आर्थिक सुधारों के बावज़ूद लाल फीताशाही में कमी नहीं आई है और व्यापक भ्रष्टाचार आर्थिक प्रगति को रोके हुए है. लूसे केरल के हाइवे विभाग के मुखिया वी जे कुरियन का हवाला देते हुए बताते हैं कि वे कुछ साल पहले कोच्चि में एक हवाई अड्डा बनाना चाहते थे. उन्हें दो लाख डॉलर की रिश्वत का प्रस्ताव दिया गया कि वे रनवे निर्माण के लिए सबसे कम दर वाली बोली को अस्वीकार कर उससे अधिक दर वाली बोली को मंज़ूरी दे दें. उन्होंने जब इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया तो उनका तबादला एक अन्य कम महत्वपूर्ण पद पर कर दिया गया. ऐसे अनेक प्रसंग इस किताब को रोचक बनाते हैं. लूसे भारत की तरक्की के लिए जिन बातों को ज़रूरी मानते हैं वे हैं – ऊर्जा, सार्वजनिक स्वास्थ्य और गरीबी उन्मूलन. वे नियोजन विरोधी श्रम कानूनों को भी बदलने पर बल देते हैं

लूसे भारत की चर्चा करते हुए भारत से बाहर भी निकलते हैं. वे यह भी पडताल करते हैं कि भारत और चीन का उभरना दुनिया के भू राजनीतिक मानचित्र को कैसे प्रभावित करेगा. वे बताते हैं कि कैसे भारत और चीन के रिश्तों में बदलाव आया है और कैसे वही अमरीका जो शीत युद्ध के समय भारत को शक़ की निगाहों से देखता था, अब चीन की उभरती ताकत को संतुलित करने के लिए इसके निकट आता जा रहा है.

.

मैंने कहा था कि लूसे अपनी इस किताब के कथनों को आंकडों के ज़रिये प्रामाणिक बनाने का प्रयास करते हैं. लेकिन यहां यह समझ लेना भी ज़रूरी है कि भारत जैसे विविधता वाले देश में आंकडे कभी भी सही तस्वीर पेश नहीं कर सकते. यही इस किताब की एक बडी सीमा भी है. किताब की एक दूसरी सीमा इसका शीर्षक है, जो किताब की विषय वस्तु से मेल नहीं खाता. फिर भी, किताब दिलचस्प है और यह बताती है कि दूसरे हमें किस तरह देखते हैं.
◙◙◙

Discussed book:
In Spite of the Gods: The Rise of Modern India
By Edward Luce
Published by: Anchor
Paperback, 416 pages
US $ 14.95

राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट जस्ट जयपुर में मेरे साप्ताहिक कॉलम 'वर्ल्ड ऑफ बुक्स' के अंतर्गत 3 जुलाई 2008 को प्रकाशित.

दूसरों की नज़रों में हम



“इस बात की तो किसी ने ख्वाब में भी कल्पना नहीं की होगी कि तीन हज़ार सालों के जातिगत भेदभाव के बाद तथाकथित पिछडी जाति की एक महिला देश के सर्वाधिक जनसंख्या वाले राज्य की मुख्यमंत्री बन जाएगी. लेकिन दो बार ऐसा हो गया. इसी तरह, 2004 में भारत में जो हुआ वह तो मानवता के इतिहास में अभूतपूर्व है. एक अरब से ज़्यादा आबादी वाले इस दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्र में चुनाव हुआ और एक कैथोलिक राजनीतिक नेता (सोनिया गांधी) ने एक सिख के लिए देश के प्रधानमन्त्री पद का त्याग किया. और बात यहीं खत्म नहीं होती. सिख मनमोहन सिंह को शपथ दिलाई देश के मुस्लिम राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने. यह याद रहे कि देश की 81 प्रतिशत आबादी हिन्दू है.:”

इस और ऐसी ही अनेक टिप्पणियों से भरी रोचक किताब इन स्पाइट ऑफ द गॉड्स: द राइज़ ऑफ मॉडर्न इण्डिया में ब्रिटिश पत्रकार एडवर्ड लूसे ने तेज़ी से उभर रही आर्थिक और भू-राजनीतिक ताकत भारत की विकास यात्रा की पडताल की है, उसके अवरोधकों को रेखांकित किया है और विकास की गति तेज़ करने के लिए सुझाव दिए हैं. एडवर्ड लूसे 2001 से 2005 तक नई दिल्ली में फाइनेंशियल टाइम्स के दक्षिणी एशिया ब्यूरो चीफ रहे है और आजकल इसी पत्र के वाशिंगटन कमेंटेटर हैं. उनकी पत्नी भारतीय है. इस किताब के लिए लूसे ने महत्वपूर्ण राजनेताओं, धर्म गुरुओं, आर्थिक विश्लेषकों से लगाकर ग्रामीण मज़दूरों तक से बात की और खूब यात्राएं की. यह किताब रिपोर्ताज और विश्लेषण का अनूठा मिश्रण है और भारतीय समाज और व्यवस्था की जटिलताओं को बखूबी उभारती है. लूसे जल्दबाजी और भावुकता में कोई टिप्पणी करने की बजाय आंकडों और तथ्यों से पुष्ट बात कहकर अपनी बात को प्रामाणिकता प्रदान करते हैं.

सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत की उपलब्धियों, आर्थिक विकास और महाशक्ति बनने के दावों के बरक्स अनेक अध्ययनों ने यह बताया है कि दिया तले अन्धेरा भी घना है. एक अध्ययन के अनुसार, भारत में हज़ार लोगों के पीछे मात्र चौरासी टेलीविजन सेट्स हैं, जबकि अमरीका में नौ सौ अडतीस हैं. भारत में प्रति हज़ार 7.2 पर्सनल कम्प्यूटर हैं, ऑस्ट्रेलिया में 564.5 हैं. भारत में इण्टरनेट अभी महज़ दो प्रतिशत को सुलभ है, मलेशिया में चौंतीस प्रतिशत को. भारत की श्रम शक्ति का महज़ पांच प्रतिशत ही औपचारिक रूप से नियोजित है, यानि मात्र साढे तीन करोड लोगों को ही रोज़गार सुरक्षा सुलभ है. लगभग इतनी ही आबादी इनकम टैक्स देती है. भारत के तीस करोड लोग अडसठ लाख ऐसे गांवों में निवास करते हैं जहां शुद्ध पेय जल तक ठीक से सुलभ नहीं है. ज़्यादातर झोंपडियां गोबर से बनी हैं, चूल्हे जिस तरह जलाये जाते हैं उससे श्वास सम्बन्धी बीमारियां उग्र होती हैं. देश की पैसठ प्रतिशत जनसंख्या ही पढ सकती है. गांवों में तो साक्षरता दर मात्र तैंतीस प्रतिशत ही है. याद रखें, चीन में यह दर नब्बे प्रतिशत है. लेकिन, भारत के विकास में अवरोधक तत्वों की चर्चा करते हुए भी लूसे भारत में चीन का मॉडल अपनाने की हिमायत नहीं करते.

1991 से पहले भारत में कोटा-परमिट राज था. पी वी नरसिंहा राव ने उसे बदला. विदेशी निवेश भी बढा, और काफी कुछ बदला. टेलीविजन चैनल एक से एक सौ पचास तक पहुंचे, सडकों पर कारों के नए मॉडल्स आए, नई दुकानें और मॉल खुले और उनमें नई तरह के उत्पाद दिखाई देने लगे. फिर भी भारत के उभरते मध्यवर्ग, शिक्षित शहरी अभिजात वर्ग और गांवों में रह रहे गरीबों के बीच असमानता की खाई न केवल बनी हुई है, और गहरी हुई है. लूसे ने इसी तरह के अंतर्विरोधों से अपनी किताब का ताना-बाना बुना है. किताब का शीर्षक भी ऐसे ही एक अंतर्विरोध को उजागर करता है और बाद में एक जगह वे भारत के अभ्युदय पर अचरज करते हुए कहते हैं कि भारत एक तरफ तो एक महत्वपूर्ण राजनीतिक और आर्थिक ताकत बनता जा रहा है और दूसरी तरफ अभी भी एक धार्मिक, आध्यात्मिक और कुछ मानों में अन्धविश्वासी समाज बना हुआ है.

आर्थिक सुधारों के बावज़ूद लाल फीताशाही में कमी नहीं आई है और व्यापक भ्रष्टाचार आर्थिक प्रगति को रोके हुए है. लूसे केरल के हाइवे विभाग के मुखिया वी जे कुरियन का हवाला देते हुए बताते हैं कि वे कुछ साल पहले कोच्चि में एक हवाई अड्डा बनाना चाहते थे. उन्हें दो लाख डॉलर की रिश्वत का प्रस्ताव दिया गया कि वे रनवे निर्माण के लिए सबसे कम दर वाली बोली को अस्वीकार कर उससे अधिक दर वाली बोली को मंज़ूरी दे दें. उन्होंने जब इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया तो उनका तबादला एक अन्य कम महत्वपूर्ण पद पर कर दिया गया. ऐसे अनेक प्रसंग इस किताब को रोचक बनाते हैं. लूसे भारत की तरक्की के लिए जिन बातों को ज़रूरी मानते हैं वे हैं – ऊर्जा, सार्वजनिक स्वास्थ्य और गरीबी उन्मूलन. वे नियोजन विरोधी श्रम कानूनों को भी बदलने पर बल देते हैं

लूसे भारत की चर्चा करते हुए भारत से बाहर भी निकलते हैं. वे यह भी पडताल करते हैं कि भारत और चीन का उभरना दुनिया के भू राजनीतिक मानचित्र को कैसे प्रभावित करेगा. वे बताते हैं कि कैसे भारत और चीन के रिश्तों में बदलाव आया है और कैसे वही अमरीका जो शीत युद्ध के समय भारत को शक़ की निगाहों से देखता था, अब चीन की उभरती ताकत को संतुलित करने के लिए इसके निकट आता जा रहा है.

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मैंने कहा था कि लूसे अपनी इस किताब के कथनों को आंकडों के ज़रिये प्रामाणिक बनाने का प्रयास करते हैं. लेकिन यहां यह समझ लेना भी ज़रूरी है कि भारत जैसे विविधता वाले देश में आंकडे कभी भी सही तस्वीर पेश नहीं कर सकते. यही इस किताब की एक बडी सीमा भी है. किताब की एक दूसरी सीमा इसका शीर्षक है, जो किताब की विषय वस्तु से मेल नहीं खाता. फिर भी, किताब दिलचस्प है और यह बताती है कि दूसरे हमें किस तरह देखते हैं.
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Discussed book:
In Spite of the Gods: The Rise of Modern India
By Edward Luce
Published by: Anchor
Paperback, 416 pages
US $ 14.95

राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट जस्ट जयपुर में मेरे साप्ताहिक कॉलम वर्ल्ड ऑफ बुक्स के अंतर्गत 3 जुलाई, 2008 को प्रकाशित.











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Wednesday, July 2, 2008

क्या आपके मन में खोट है?

पिछले दिनों कुछ चड्डियों के विज्ञापन (कु)चर्चा में रहे थे. कारण जाहिर है, अश्लीलता था. अब अश्लीलता का मामला ज़रा टेढा होता है. जो शुद्ध सात्विक लोग हैं वे बाबा तुलसीदास को भी याद कर सकते हैं – जाकि रही भावना जैसी! यानि अश्लीलता किसी तस्वीर या सन्देश में नहीं होती, ग्रहण करने वाले के मन में होती है. वे विज्ञापन तो बडे मासूम थे, अब अगर आपके ही मन में गन्दगी हो तो कोई क्या करे?

इधर ऐसे ही दो और विज्ञापन देखने को मिले हैं. लगता है विज्ञापन दाताओं का कौशल चड्डी से हटकर अब मोबाइल फोन तक पहुंच गया है.

पहले ज़रा विज्ञापन की बात कर लूं. पहले विज्ञापन में एक मर्द बनियान पहन कर सोया हुआ है, उसके पास एक कुछ उदास-सी लडकी बैठी है, शमीज़ जैसा कुछ पहने हुए और वह मानो कह रही है, “विश युअर बैटरी हेड मोर स्टैमिना?’ यानि काश! तुम्हारी बैटरी में और क्षमता/ताकत होती? और इस तस्वीर के पास ही विज्ञापित मोबाइल हैण्डसेट की तस्वीर है जिसके नीचे बारीक अक्षरों में, जो करीब-करीब अपठनीय हैं, इस हैण्डसेट के अन्य गुणों के अलावा ‘स्टैमिना बैटरी’ भी लिखा है. यानि इसकी बैटरी स्टैमिना वाली है. अब, विज्ञापन दाता को बैटरी का स्टैमिना बताने के लिए एक सोये हुए पुरुष और जागी हुई उदास युवती की तस्वीर देनी पडी है. क्या दोनों में कोई रिश्ता बनता है? क्या पति के फोन की बैटरी बहुत जल्दी चुक गई और इसलिए वह सो गया, और स्त्री उदास है? या यहां किसी और बैटरी की तरफ संकेत है, जो जल्दी चुक गई, मर्द सो गया, और स्त्री उदास है? निश्चय ही विज्ञापन देने वालों ने इस युगल की तस्वीर देकर मोबाइल की बैटरी जल्दी चुक जाने की पीडा व्यक्त की है. सही भी है. किसी से बात कर रहे होंगे और बैटरी खत्म हो गई. पुरुष बेचारा शर्मिन्दा होकर सो गया. लडकी उदास बैठी है. उदास न हो तो क्या करे? काश बैटरी में ज़्यादा दम होता. कहिये, आपको भी यही समझ आया न?

अब इसी श्रंखला का दूसरा विज्ञापन. दो युवतियां. आंखों में एक खास तरह की चमक, जिसे चाहें तो ‘सेक्सी’ कह सकते हैं, क्लीवेज दिखाती हुई. कह रही हैं, “कैन यू हैण्डल बोथ?’ यानि क्या तुम (हम) दोनों को सम्भाल सकते हो? अगर आप इस कथन का कोई खास मतलब निकालते हैं तो खोट आपके मन में है. इसलिए कि पास ही एक मोबाइल हैण्डसेट की तस्वीर है, और उसके नीचे, सूक्ष्म अक्षरों में बता दिया गया है कि यह ‘डुएल सिम’ वाला है, यानि यह दो सिम हैण्डल कर सकता है. अब अगर इस लिखावट को पढने में मुझे ज़ोर पड रहा है तो यह मेरी अंखों (या उम्र) का कसूर है. विज्ञापन देने वाले की नीयत तो एकदम पाक साफ है.

लेकिन क्या करूं? मेरे लिए यह समझना थोडा कठिन है कि ये उत्तेजक आंखें, युवा देह जब कह रही हैं कि ‘कैन यू हैण्डल बोथ” तो ये मोबाइल फोन की भूमिका अदा कर रही हैं. इन युवतियों को देख कर मेरे मन में तो किसी भी तरह दोहरी सिम वाली मोबाइल का खयाल नहीं आता. आपके मन में आता है? अगर आता है तो आप के मन में खोट नहीं है. मैं स्वीकार करता हूं कि मेरे मन में खोट है.

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Thursday, June 26, 2008

एक और दिन ऐसा

‘ट्यूज़डेज़ विद मॉरी’ और ‘फाइव पीपुल यू मीट इन हेवन’ जैसी बेस्टसेलर किताबों के लेखक मिच एल्बॉम का पेपरबैक संस्करण में हाल ही में आया उपन्यास फोर वन मोर डे उन आंतरिक संघर्षों को उजागर करता है जिनसे हममें से हरेक को कभी न कभी जूझना पडता है. मानवीय सम्बन्धों में, चाहे वे परिवारजन के हों, मित्रों के हों या अजनबियों के, कभी-न-कभी मन में यह बात आती ही है कि क्या हम इनका निर्वाह और ज़्यादा बेहतर तरीके से नहीं कर सकते थे? और जो बीत चुका है उसके सन्दर्भ में यह सवाल भी उठता है कि अब क्या किया जा सकता है!

‘फोर वन मोर डे’ उपन्यास का आधार यह विचार है कि अगर आपको जीवन का एक और दिन एक ऐसे व्यक्ति के साथ बिताने को मिले जो अब आपकी ज़िन्दगी में नहीं है, तो वह व्यक्ति कौन होगा! उपन्यास के केन्द्रीय चरित्र चार्ल्स ‘चिक’ बेनेटो के लिए तो यह व्यक्ति उसकी मां है. उपन्यास के प्रारम्भ में हम पाते हैं कि एक अवसाद भरी रात में चार्ल्स, अधेड उम्र का शराबी, आत्म हत्या करने के कगार पर है. उसका काम काज और परिवार सब टूट-बिखर चुके हैं. धीरे-धीरे हम इस चार्ल्स के जीवन से परिचित होते हैं. बचपन में उसके पिता कहा करते थे कि या तो तुम मामा’ज़ बॉय हो सकते हो या पापा’ज़ बॉय; दोनों एक साथ नहीं हो सकते. चार्ल्स ने पिता का लाडला होना चुना. न केवल चुना, अपनी युवावस्था पिता को खुश करने में झोंक भी डाली. पिता ने चाहा कि वह बेसबॉल खेले, तो उसने खेला. यहां तक कि जब चार्ल्स 11 साल का था, तब उसके पिता हालांकि उसे छोड गये, फिर भी उसने बेसबॉल चैम्पियन बनने के उनके सपने से नाता नहीं तोडा. आखिर वह एक छोटी टीम का सदस्य बना और धीरे-धीरे तरक्की करता चला.

इस सबके साथ उसकी मां पोसी ने बमुश्किल उसे पाला पोसा, बहिन रॉबर्टा ने भी उसके लिए अनेक त्याग किए. चार्ल्स उम्र भर अपने पिता को ही खुश करने में लगा रहा, मां की उपेक्षा करके भी. एक हादसे में उसकी टांग चोटग्रस्त होती है तो बेसबॉल का बडा खिलाडी बनने का उसका (असल में तो उसके पिता का) ख्वाब चकनाचूर हो जाता है. तब चार्ल्स को महसूस होता है कि पिता से उसका रिश्ता तो इस खिलाडी वाले कैरियर की नींव पर टिका था. उसके जेह्न से पिता धीरे-धीरे धूमिल होने लगते हैं और वह अपना ग़म ग़लत करने के लिए शराब का सहारा लेता है. इसी दौरान उसकी नौकरी भी छूट जाती है. वह यह भी पाता है कि उसके आर्थिक संकटों से उबरने में उसके पिता उसकी तनिक भी मदद नहीं करते. तब उसे एहसास होता है कि उसने अपनी मां की तो घोर उपेक्षा की थी. लेकिन तब तक मां को मरे को आठ साल बीत चुके हैं. उसे एक और गहरा आघात इस बात का लगता है कि खुद उसकी बेटी उसे न तो अपनी शादी के बारे में बताती है और न उसमें उसे बुलाती है. इन सबसे व्यथित होकर वह आत्महत्या का इरादा बनाता है. यही है इस उपन्यास का प्रस्थान बिन्दु!

लेकिन, आत्महत्या से पहले वह अपने छोटे-से गांव जाता है और संयोगवश अपने पुराने घर जा पहुंचता है. वहां पहुंच कर वह स्तब्ध रह जता है. उसकी मां, जो आठ साल पहले मर चुकी है, अब भी वहीं रह रही है और वह उसका स्वागत ऐसे करती है जैसे इस बीच कुछ हुआ ही नहीं है. और फिर बीतता है एक और दिन, आम दिन, ऐसा दिन जो हममें से हरेक बिताना चाहता है. अपने खोये मां-बाप के साथ, परिवार की भूली बिसरी बातें करते हुए, अपने किये - न किये के लिये क्षमा याचना करते हुए. इसी बातचीत के दौरान उसे अपनी मां के किये बहुत सारे ऐसे त्यागों का पता चलता है जिनसे वह अब तक अनजान था. मां उसे ढाढस बंधाती है और वह आत्महत्या का इरादा छोड अपनी ज़िन्दगी की पटरी से उतरी गाडी को फिर से पटरी पर लाने का निश्चय करता है.

इस कथा को बहुत आसानी से भूत-प्रेत की कथा कह कर खारिज किया जा सकता है. लेकिन सोचिए, क्या हर परिवार के पास इस तरह की कोई प्रेत कथा नहीं होती? जो लोग दुनिया छोड चुके हैं वे भी तो हमारी स्मृति में बने रहते हैं. अगर उन्हें भूत-प्रेत कह दिया जाए तो क्या हर्ज़ है? एक और बात, जब आप चार्ल्स और उसकी मां की बातचीत पढते हैं तो जो मानसिक विरेचन होता है और जैसी नैतिक सलाह आपको मिलती है, लगता है कि वह इस प्रविधि से ही सम्भव थी. पूरा उपन्यास एक ही बात कहता है और वह यह कि जीवन में सबसे बडी अहमियत प्रेम की है. वैसे, मिच घुमा फिराकर यही बात अपनी हर कृति में कहते हैं. आज के टूटते-दरकते मानवीय सम्बन्धों वाले विकट समय में इस सन्देश की कितनी ज़रूरत है, यह कहने की आवश्यकता नहीं.

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Discussed book:
For One More Day
By Mitch Albom
Published by: Hyperion
Paperback, 197 pages
US $ 10.80

राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट 'जस्ट जयपुर' में मेरे साप्ताहिक कॉलम वर्ल्ड ऑफ बुक्स के अंतर्गत 26 जून 2008 को प्रकाशित.








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Thursday, June 12, 2008

असल चुनौती है उम्मीद खोजना

अमरीकी राष्ट्रपति पद के प्रबल प्रत्याशी बराक ओबामा की दूसरी किताब द ऑडेसिटी ऑफ होप: थॉट्स ऑन रिक्लेमिंग द अमेरिकन ड्रीम एक ऐसी राजनीतिक किताब है जो न तो अपने प्रतिपक्षियों पर दोषारोपण करती है, न ‘हम बनाम तुम’ का वाक युद्ध रचती है. यह किताब अपने बहुलांश में बहुत सारे नीतिगत मुद्दों, जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, ईराक में युद्ध वगैरह पर ओबामा का पक्ष प्रस्तुत करती है. यह करते हुए ओबामा अपने पाठक का ध्यान उन अमरीकी समानताओं और मूल्यों की तरफ भी आकृष्ट करते हैं जो राजनीतिक मत वैभिन्य के बावज़ूद बरकरार हैं. ओबामा बडी समस्याओं के लिए आम सहमति के समाधानों की तलाश करते हुए परस्पर विरोधी विचारों को समझने की ज़रूरत पर बल देते हैं. लेकिन, यह समझौता नहीं है. यही है उम्मीद की साहसिकता, ऑडेसिटी ऑफ होप, जिसे ओबामा ने एक चर्च में प्रवचन सुनते हुए ग्रहण किया था. खुद ओबामा ने अपनी इस किताब पर बोलते हुए कहा है, “गलतियां ढूंढना आसान है. असल चुनौतियां तो उम्मीद तलाशने में हैं.”

किताब की महत्ता उस विज़न में है जो ओबामा अमरीकी राजनीति के लिए पेश करते हैं. यह एक ऐसा विज़न है जो सबको साथ लेकर चलना चाहता है. ओबामा की खासियत ही यह है कि वे विविध परिदृश्यों के ताने-बाने से एक सुसंगत और सुगठित समग्र रचते हैं. इसी कारण यह किताब आज की जटिल होती जा रही दुनिया में अमरीकी अस्मिता और उसकी भूमिका के लिए एक उत्तर-आधुनिक वृत्तांत रचती है. ओबामा मुख्यधारा की राजनीति के दबावों और तनावों को भली-भांति समझ कर खासकर रिपब्लिकन शैली की विभेदक पक्षधरता के विरोध में खडे होकर व्यापक अमरीकी मूल्यों पर आधारित बीच की राजनीति का पक्ष लेते हैं. ऐसा करते हुए वे कहीं-कहीं अंतर्विरोधी भी हो जाते हैं. जैसे, वे मुक्त व्यापार का समर्थन करते हैं लेकिन अमरीकी कामगारों पर उसके दुष्प्रभाव से व्यथित भी होते हैं, फिर जैसे अपने इस परस्पर विरोधी स्टैण्ड को कुछ दुरुस्त करते हुए आधे मन से यह भी जोडते हैं कि अंतत: तो शिक्षा, विज्ञान और नवीनीकरणीय ऊर्जा को ज़्यादा सहयोग देकर अर्थव्यवस्था पर भूमंडलीकरण के कुप्रभावों की भरपाई की जा सकेगी. अवसर बढाने के लिए भी वे शिक्षा, विज्ञान, तकनीकी और ऊर्जा के क्षेत्र में अधिक सार्वजनिक निवेश की पैरवी करते हैं. ऐसा, हालांकि 1970 से ही हो रहा है, लेकिन ओबामा को लगता है कि इसमें राष्ट्रीय महता की भावना का अभाव रहा है. इसी तरह वे राजनीतिज्ञों पर धन संग्रह, विभिन्न हित-समूहों, मीडिया, सौदेबाजी वगैरह के कारण बढते दबावों और उनकी समझौता परस्ती की चिंता करते हैं, लेकिन उस चिंता से बाहर नहीं निकल पाते.

ज़ाहिर है कि किताब का सम्बन्ध अमरीकी जीवन और राजनीति से है, लेकिन इसे पढते हुए बार-बार लगता है कि हम अपने देश के बारे में पढ रहे हैं. जब हम ओबामा का यह कथन पढते हैं कि संविधान को जन्म देने वाले सिद्धांतों की तरफ लौटकर ही अमरीकी अपने देश की टूट-फूट चुकी राजनीतिक प्रक्रिया को दुरुस्त कर सकते हैं और उस सरकार को फिर से काम-चलाऊ बना सकते हैं जो लाखों आम अमरीकियों से कट चुकी है, तो लगता है कि यह बात हमारे देश के बारे में भी तो कही जा सकती है.

ओबामा इस किताब की भूमिका में एक दिलचस्प घटना याद करते हैं. लगभग दस बरस पहले, जब उन्होंने पहली बार चुनाव लडा, वे जगह-जगह लोगों से मिलते, और हर बार घुमा फिराकर उनसे एक ही सवाल पूछा जाता, “आप तो खासे भले इंसान लगते हैं. आप राजनीति की गन्दी दुनिया में क्यों जा रहे हैं?” ओबामा इस आम धारणा का विश्लेषण भी करते हैं और कहते हैं कि राजनीति कर्मियों के वचन भंग की लम्बी परम्परा के कारण ऐसी धारणा बनी और मज़बूत हुई है. सोचें, क्या भारत में भी ऐसा ही नहीं हुआ है?

किताब में ऐसा ही एक और मार्मिक प्रसंग है जहां ओबामा व्हाइट हाउस में जॉर्ज डब्ल्यू बुश से हुई एक मुलाक़ात को याद करते हैं. बुश ने बडी गर्मजोशी से उनसे हाथ मिलाया, और फिर पास ही खडे अपने सेवक की तरफ मुडे. सेवक ने तुरंत उनके हाथ पर खूब सारा सेनिटाइज़र (एक तरह का साबुन) डाल दिया. राष्ट्रपति जी अपने इस मेहमान की तरफ भी थोडा-सा सेनिटाइज़र बढाते हैं, यह कहते हुए कि “अच्छी चीज़ है. इससे आप जुकाम से भी बचे रहते हैं.”

किताब की एक बहुत बडी विशेषता इसकी भाषा है. ‘उनकी आंखों में दुर्व्यवस्था की कौंध थी’, ‘कम्बल की झीनी ऊष्मा’, ‘अपने कूल्हों पर अनाम शिशुओं को टिकाए’ जैसे वाक्यांश और अपने बीबी-बच्चों से दूर वाशिंगटन डी सी में रहने की पीडा को ‘उनके आलिंगन की ऊष्मा और उनकी त्वचा की मधुर गंध के लिए तडपता हुआ’ कहकर व्यक्त करने वाला यह राजनीतिज्ञ अपनी भाषा की काव्यात्मक संवेदनशीलता से भी कम प्रभावित नहीं करता.


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Discussed book:
The Audacity of Hope: Thoughts on Reclaiming American Dream
By: Barrack Obama
Published By: Crown Publishing Group
Hardcover, 384 pages
US $ 25.00


राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट जस्ट जयपुर में मेरे साप्ताहिक कॉलम वर्ल्ड ऑफ बुक्स के अंतर्गत 12 जून, 2008 को प्रकाशित.








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Thursday, June 5, 2008

छीन लिया बचपन

सितम्बर, 2007. सेण्ट जॉर्ज का खचाखच भरा एक न्यायालय कक्ष. बहुविवाही पंथ के मुखिया वारेन जेफ्स के खिलाफ एलिसा वॉल की दिल दहला देने वाली गवाही कि किस तरह जेफ्स ने उसे 14 बरस की कच्ची उम्र में अपने चचेरे भाई से शादी के लिए बाध्य किया. एलिसा वॉल की इस मर्मांतक गवाही को जेफ्स के खिलाफ सबसे अधिक प्रभावी प्रमाण माना गया. इसी गवाही ने दुनिया के सामने यह उजागर किया कि किस तरह और किस हद तक जाकर जेफ्स अपने इस गुप्त पंथ की औरतों को नियंत्रित करता था.

अब, एलिसा वॉल ने लिज़ा पुलिट्ज़र के साथ मिलकर अपनी ताज़ा किताब स्टोलन इन्नोसेन्स: माय स्टोरी ऑफ ग्रोइंग अप इन अ पॉलीगेमस सेक्ट, बिकमिंग अ टीन एज ब्राइड, एण्ड ब्रेकिंग फ्री ऑफ वारेन जेफ्स में एक करीब-करीब अविश्वसनीय लेकिन प्रेरक वृत्तांत के माध्यम से यह बताया है कि कैसे वह फण्डामेंटलिस्ट चर्च ऑफ लेटर डे सेंट्स (FLDS) के चंगुल से मुक्त हो सकी और कैसे अमरीका के सर्वाधिक कुख्यात अपराधियों में से एक, वारेन जेफ्स, को सज़ा दिलवा सकी. एफ एल डी एस की भीतरी ज़िन्दगी को एक बालिका की मासूम नज़रों से देखते-परखते हुए एलिसा अपनी ऊबड-खाबड युवावस्था का मार्मिक वर्णन तो करती ही है, अतीत में जाकर यह भी बताती है कि कैसे उसके परिवार का अशांत अतीत उसके दृढ निश्चय से टकराया और यह तै कर लिया गया कि उस जैसी ‘ज़िद्दी’ लडकी को केवल शादी के ज़रिये ही नियंत्रित किया जा सकता है. यह सब बयान करते हुए एलिसा यह भी बताती है कि जेफ्स का चर्च यानि अपने पंथ पर कितना गहरा असर था और कैसे उसने अपने इस असर का दुरुपयोग करके चर्च के पहले से कट्टर विचारों को नई खतरनाक दिशाओं में मोड दिया.

एलिसा अपनी शादी के माहौल का बडा सजीव चित्रण करती है कि कैसे उसकी मां लगभग ज़बर्दस्ती उससे इस शादी के लिए हां भरवाती है. और शादी? 14 साल की एलिसा विवाह के शारीरिक पक्ष से नितांत अपरिचित, लेकिन पति के लिए जैसे वही सब कुछ! उसका बचपन जैसे चूर-चूर हो जाता है क्योंकि उसे जेफ्स के निर्देशानुसार अपने पति को ‘तन, मन और आत्मा के साथ’ पूरी तरह समर्पित होना ही है. उसके पास न तो पैसा है और न बाहरी दुनिया की कोई समझ और जानकारी, सो इस यातना भरी क़ैद से कोई निज़ात भी नहीं है. प्रेम विहीन रिश्ते की सारी यातना झेलते-झेलते. हालात इतने बिगडते हैं कि उसे अपने उप्तीडक पति की शैया संगिनी बनने की बजाय खुले में ट्रक में रात बिताना अधिक सुखद लगता है.

लेकिन उन स्याह दिनों में भी उसके मन में इस उम्मीद की एक लौ झिलमिलाती रहती है कि कभी तो उसे इस यातना गृह से मुक्ति मिलेगी. और ऐसा होता भी है. अचानक एक अजनबी लामोण्ट बार्लो उसकी ज़िन्दगी में आता है. परिचय दोस्ती में बदलता है, दोस्ती रोमांस में ढलती है और यह रिश्ता उसे अंतत: अपने त्रासद अतीत और चर्च की जंजीरों से आज़ाद होने की ताकत देता है. किताब में एलिसा उस कठिन समय का मार्मिक वर्णन करती है जब वह अपने पंथ से बाहर निकल कर जेफ्स के विरुद्ध इसलिए आवाज़ बुलन्द करती है कि जो लडकियां अभी भी चर्च की जंजीरों में क़ैद हैं उन्हें भी यातनाओं से मुक्ति मिल सके.

किताब सत्य और तथ्य पर आधारित है लेकिन लेखिका का अन्दाज़े-बयां और घटनाक्रम की रोमांचक विलक्षणता इसे उपन्यास की–सी रोचकता प्रदान करते हैं. एलिसा के बचपन की स्मृतियां, जहां वह अपनी तीन माताओं के साथ रहती है, और उन तीनों औरतों की आपसी ईर्ष्याएं और शत्रुताएं! और इन्हीं के बीच से उभरता है एलिसा की अपनी मां शेरॉन स्टीड का चरित्र, जिसके लिए महाकवि निराला की पंक्ति याद आती है, “दुख ही जीवन की कथा रही”. कभी सौत के लिए उसे घर से निकाला जाता है तो कभी उसके लिए सौत को. लेकिन सारी टूट-फूट के बीच भी अपने पंथ में उसकी आस्था अडिग रहती है. हालांकि एलिसा के बडे भाई-बहनों का एक-एक कर इन आस्थाओं से मोह-भंग होता रहता है और वे परिवार से अपने रिश्ते तोडते जाते हैं. इन सबका गहरा असर एलिसा के कच्चे मन पर पडता है, और खुद शेरॉन पर भी. अंतत: शेरॉन भी परिवार के माहौल से टूट-बिखर कर फ्रेड जेसोप की तरफ झुकती है और फिर उससे शादी कर लेती है. बाद में, यही अंकल फ्रेड एलिसा की शादी उसके चचेरे भाई एलेन स्टीड से कराने का ज़िम्मेदार सिद्ध होता है.

निश्चय ही एलिसा के जीवन की यह त्रासद कथा उसके अपने परिवेश की निर्मिति है. लेकिन, उसकी यह करुण कथा परिवार, शिक्षा, आस्थाओं, धार्मिक पंथों और उनके मुखियाओं के बारे में बडे तथा महत्वपूर्ण सवाल उठाती है. आस्था लोगों को किस हद तक अंधा कर देती है, यह तब ज़ाहिर होता है जब मां एलिसा से कहती है कि अपने धर्म से लडने से तो अच्छा था कि तुम मर गई होती!

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Discussed book:
Stolen Innocence: My Story of Growing Up in a Polygamous Sect, Becoming a Teenage Bride,and Breaking Free of Warren Jeffs
By Elissa Wall and Lisa Pulitzer
Published by: William Morrow
Hardcover, 448 pages
US $ 25.95

राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट जस्ट जयपुर में मेरे साप्ताहिक कॉलम वर्ल्ड ऑफ बुक्स के अंतर्गत 05 जून 2008 को प्रकाशित.








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Sunday, June 1, 2008

तो फिर भगवान ही मालिक है....


राजस्थान में पिछले लगभग एक सप्ताह से एक बडे आन्दोलन की वजह से जन-जीवन बुरी तरह दुष्प्रभावित है. जन-धन की अपार हानि हुई है और लोगों को भयंकर असुविधाओं का सामना करना पड रहा है. राज्य के आधे ज़िलों में इस आन्दोलन का असर है. आन्दोलन राजस्थान की सीमाओं को पार कर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र को भी अपनी लपटों से झुलसा चुका है. जिन मांगों को लेकर यह आन्दोलन हुआ है, उन्हीं मांगों को लेकर ठीक एक बरस पहले भी ऐसा ही आन्दोलन हुआ था. यहां हम इस आन्दोलन के पीछे की मांगों के औचित्य पर कोई चर्चा नहीं करना चाहते. वह अलग से चर्चा और बहस का विषय है. महत्वपूर्ण और विचारणीय बात यह है कि एक स्वस्थ प्रजातंत्र में क्या इस तरह के आन्दोलन की कोई जगह होनी चाहिए? मेरा ज़ोर इस तरह पर है. इस तरह का, यानि जिसमें हिंसा हो, गोलियां चलें, बसों के शीशे तोडे जाएं, चलती गाडियों पर पथराव किए जाएं, रेलों की पटरियां उखाडी जाएं, सम्पत्ति का -चाहे निजी हो या सार्वजनिक- नुकसान किया जाए, लोगों को अपने काम पर जाने से रोका जाए, रास्ते रोके जाएं, रेलों बसों का संचालन बन्द करना पडे, सैंकडों हज़ारों लोगों को रोजी रोटी से महरूम रहना पडे, आदि. और यह सब इसलिए कि समाज का एक वर्ग सरकार से कुछ चाहे और सरकार वह न देना चाहे या न दे सकती हो. अगर यह उचित है और यही होना है तो फिर मैं यह जानना चाहूंगा कि यह एक सभ्य समाज है या जंगल की दुनिया? ऐसी दुनिया, जिसमें बाहुबल ही सब कुछ है! समाज का एक वर्ग अपनी ताकत के बल पर यह ज़िद ठान ले कि जो उसे चाहिए वह लेकर रहेगा. अगर एक साथ कई वर्ग ऐसा करने लगें तो? कल्पना करके ही डर लगने लगता है. वैसे, इसी आन्दोलन वाली मांग के सन्दर्भ में हम इस भयावह स्थिति के कगार पर जाकर पिछले ही साल लौटे हैं. अब भी पता नहीं कि वैसा खतरा हमसे कितनी दूर है!
लेकिन, जैसा मैंने अभी कहा मैं यहां इस आन्दोलन की मांगों के औचित्य पर कोई चर्चा नहीं कर रहा. इसलिए नहीं कि उस पर मेरे कोई विचार नहीं हैं. बल्कि इसलिए कि मैं उससे पहले एक आधारभूत मुद्दे पर बात करना चाहता हूं.
सोचिए, एक वर्ग अपनी कोई मांग सरकार के सामने रखता है और कहता है कि आप इस मांग पर विचार कर इसे अमुक तारीख तक पूरा कीजिए. वह वर्ग सरकार को पर्याप्त समय देता है कि सरकार उस मांग को पूरा करने की दिशा में कुछ करे, अगर मांग पूरा करना किसी भी कारण सम्भव न हो, या तुरंत पूरा करना सम्भव न हो, सरकार के अधिकार क्षेत्र के बाहर हो, तो भी इस समय में सरकार उस पक्ष से बात तो कर ही सकती है. लेकिन सरकार कुछ नहीं करती. मुहावरे की भाषा में कहें तो सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती. न केवल इतना, वह वर्ग एक बडे आन्दोलन की तैयारी करता रहता है और सरकार के आंख कान ज़रा भी हरकत में नहीं आते. यानि अपनी इण्टेलीजेंस से भी सरकार को उस वर्ग के आन्दोलन की भीषण तैयारियों की कोई सूचना नहीं मिलती. और आन्दोलन शुरू हो जाता है. तब भी सरकार आन्दोलनकारियों से कोई सम्वाद नहीं करती. आखिर सरकार तो सरकार होती है ना! वह भला कैसे ऐसे वैसों से बात कर सकती है? लेकिन जब पानी हद से गुज़रने लगता है तो सरकार के हाथ-पांव फूलने लगते हैं. लेकिन तब तक आन्दोलनकारी ऐसे मुकाम पर पहुंच चुके होते हैं कि वहां से उनके लिए पीछे हटना मुमकिन नहीं रह जाता...
सवाल यह है कि क्या प्रजातंत्र में ऐसा होना चाहिए? क्या जनता की बात सरकार को नहीं सुननी चाहिए? मैं केवल सुनने की बात कर रहा हूं, न कि मांग पूरी करने की. हम जानते हैं कि प्रारम्भिक स्तर पर बहुत सारी समस्याएं संवाद से ही सुलझ जाती हैं, ठीक उसी तरह जिस तरह कोई मामूली चोट लगे तो छोटा-मोटा प्राथमिक उपचार ही काफी होता है, लेकिन जब उस चोट की उपेक्षा की जाती है तो चोट को घाव में और घाव को नासूर में तब्दील होते वक़्त नहीं लगता. तो, सरकार अपनी प्रजा से बात न करे यह बहुत बडी गडबड है. यहां यह बात भी सामने आएगी कि जनता की सरकार से इतनी अधिक अपेक्षाएं होती हैं कि उन्हें पूरा करना तो दूर, सुनना भी सम्भव नहीं होता. और यहीं यह बात भी सामने आएगी, कि ऐसा तभी होता है जब सरकार चन्द लोगों तक सिमट कर रह जाए. सरकार का मतलब केवल मुख्य मंत्री या मंत्री मण्डल ही नहीं होता, विधायक भी सरकार है, पार्षद भी सरकार है, हर जन प्रतिनिधि सरकार है. आखिर जनता और सरकार के बीच इतनी दूरी क्यों हो? दूरी केवल चुनाव के वक़्त पाटी जाए और फिर सरकार अपने महलों में घुस कर ‘प्रवेश निषेध’ का बोर्ड लटका दे, तो ऐसा ही होगा. जिन्हें जनता ने चुना है वे जनता से संवाद भी न कर सकें, तो यह माना जाना चाहिए वे सही जन प्रतिनिधि नहीं हैं. और यह भी कि जनता ने अपने प्रतिनिधि चुनने में गलती की है. गलती की है तो सज़ा भी भुगतनी ही पडेगी. और वही सज़ा आज हम सब भुगत रहे हैं. वरना यह तो नहीं होना था न कि जनता एक तरफ, यानि जनता का एक बडा हिस्सा, और सरकार दूसरी तरफ. मैं फिर कह रहा हूं कि इस आन्दोलन की मांगों के औचित्य पर मैं यहां कोई टिप्पणी नहीं कर रहा. लेकिन अगर दस बीस पचास हज़ार लोग भी कोई मांग रख रहे हैं तो ऐसा कैसे कि उनके प्रतिनिधि न तो उस मांग से सहमत हैं और न वे अपने उन मतदाताओं को समझा पा रहे हैं कि तुम्हारी मांग गलत है! आप किसी भी आन्दोलन को याद कर लीजिए, जनता के निर्वाचित प्रतिनिधि सदा ही कोई स्टैंड लेने से कतराते हैं. इसलिए कि वे अपने मतदाताओं को नाराज़ नहीं करना चाहते. न केवल इतना, वे चुनाव के वक़्त या कि किसी भी आन्दोलन के वक़्त, अगर वह उनके प्रतिपक्षी द्वारा चलाया जा रहा हो, किसी भी हद तक जाकर अव्यावहारिक वादे करने से नहीं चूकते.

दूसरी बात, सरकार की ताकत की. एक वर्ग या समूह आन्दोलन की चेतावनी देता है, उसकी तैयारी करता है. सरकार उसे रोक पाने में कतई समर्थ नहीं रहती. पहले तो उसे पता ही नहीं चलता और फिर उस आन्दोलन को कुचलना उचित या सम्भव नहीं रह जाता. क्या यह क्षम्य है? इस आन्दोलन में जो जन-धन की हानि हुई है, रेलों की पटरियां उखाडी गई हैं, सम्पत्ति का नाश किया गया है, मानवीय दिवसों का नुकसान किया गया है, उस सब का नुकसान किसे उठाना पडेगा? आपको और मुझे! हम क्यों उठायें यह नुकसान? करे कोई भरे कोई! क्या इसकी जवाबदेही नही तै होनी चाहिए?
यह सब कहते हुए मैंने एक बात अब तक नहीं कही है. जब मैं प्रजातंत्र की बात करता हूं तो प्रजा के तंत्र की बात करता हूं. एक ऐसा तंत्र जिसमें हम सब एक बडे तंत्र के हिस्से हैं. क्या हमने, यानि इस देश के आम नागरिक ने अपनी कोई ज़िम्मेदारी समझी है? एक पूरे प्रांत में आन्दोलन करने वाले लोग कितने हैं और वे कितने जो उस आन्दोलन से असहमत या अलग हैं? अगर प्रतिशत में बात करें तो शायद 5 और 95 होंगे. या इससे कुछ कम ज़्यादा. तो, बडा हिस्सा तो उनका है जो इस सारी तोड फोड से सहमत नहीं है. वह बडा हिस्सा क्या कर रहा है? एक वर्ग ‘बन्द’ की घोषणा करता है, सारे लोग चुपचाप बन्द कर देते हैं, यह कहते हुए कि ‘कौन झगडा मोल ले?’ शायद सरकार भी यही सोचती है. शायद नहीं, निश्चित रूप से. जो वर्ग मांग कर रहा है, उसे मना करके क्यों नाराज़ किया जाए? चलो गेंद केन्द्र के पाले में फेंक देते हैं. वैसे मांग पूरी कर भी देते, अगर दूसरे वर्ग की नाराज़गी का डर नहीं होता. अपनी जेब से क्या जा रहा है? बडे ‘पैकेज’ यही सोच कर तो घोषित किए जाते हैं. उनकी जेब से कुछ नहीं जा रहा, लेकिन जिनकी जेब से जा रहा है वह भी तो चुप है. यानि आप और हम.

हालात बहुत गंभीर हैं. आप जितना सोचते हैं उतने ही भयाक्रांत होते हैं. कभी शिव मंगल सिंह सुमन ने लिखा था, ‘मेरा देश जल रहा कोई नहीं बुझाने वाला.’ जो मेरे प्रांत राजस्थान में हो रहा है कमोबेश वही अन्य प्रांतों में, पूरे देश में हो रहा है. लेकिन, सोचिए, बुझाने वाला क्या किसी और लोक से आएगा? कहीं ऐसा तो नहीं कि इस निष्क्रिय उदासीनता के मूल में यह उम्मीद छिपी है कि ‘यदा यदा ही धर्मस्य...’. जब भी द्रौपदी पर संकट आएगा, भगवान उसकी मदद को हाज़िर हो जाएंगे.... यह कि हमारी मदद करने आसमां से फरिश्ते उतर कर आयेंगे. हमें कुछ करने की क्या ज़रूरत है? अगर ऐसा है तो फिर भगवान ही मालिक है!
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तो फिर भगवान ही मालिक है....

राजस्थान में पिछले लगभग एक सप्ताह से एक बडे आन्दोलन की वजह से जन-जीवन बुरी तरह दुष्प्रभावित है. जन-धन की अपार हानि हुई है और लोगों को भयंकर असुविधाओं का सामना करना पड रहा है. राज्य के आधे ज़िलों में इस आन्दोलन का असर है. आन्दोलन राजस्थान की सीमाओं को पार कर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र को भी अपनी लपटों से झुलसा चुका है. जिन मांगों को लेकर यह आन्दोलन हुआ है, उन्हीं मांगों को लेकर ठीक एक बरस पहले भी ऐसा ही आन्दोलन हुआ था. यहां हम इस आन्दोलन के पीछे की मांगों के औचित्य पर कोई चर्चा नहीं करना चाहते. वह अलग से चर्चा और बहस का विषय है. महत्वपूर्ण और विचारणीय बात यह है कि एक स्वस्थ प्रजातंत्र में क्या इस तरह के आन्दोलन की कोई जगह होनी चाहिए? मेरा ज़ोर इस तरह पर है. इस तरह का, यानि जिसमें हिंसा हो, गोलियां चलें, बसों के शीशे तोडे जाएं, चलती गाडियों पर पथराव किए जाएं, रेलों की पटरियां उखाडी जाएं, सम्पत्ति का -चाहे निजी हो या सार्वजनिक- नुकसान किया जाए, लोगों को अपने काम पर जाने से रोका जाए, रास्ते रोके जाएं, रेलों बसों का संचालन बन्द करना पडे, सैंकडों हज़ारों लोगों को रोजी रोटी से महरूम रहना पडे, आदि. और यह सब इसलिए कि समाज का एक वर्ग सरकार से कुछ चाहे और सरकार वह न देना चाहे या न दे सकती हो. अगर यह उचित है और यही होना है तो फिर मैं यह जानना चाहूंगा कि यह एक सभ्य समाज है या जंगल की दुनिया? ऐसी दुनिया, जिसमें बाहुबल ही सब कुछ है! समाज का एक वर्ग अपनी ताकत के बल पर यह ज़िद ठान ले कि जो उसे चाहिए वह लेकर रहेगा. अगर एक साथ कई वर्ग ऐसा करने लगें तो? कल्पना करके ही डर लगने लगता है. वैसे, इसी आन्दोलन वाली मांग के सन्दर्भ में हम इस भयावह स्थिति के कगार पर जाकर पिछले ही साल लौटे हैं. अब भी पता नहीं कि वैसा खतरा हमसे कितनी दूर है!
लेकिन, जैसा मैंने अभी कहा मैं यहां इस आन्दोलन की मांगों के औचित्य पर कोई चर्चा नहीं कर रहा. इसलिए नहीं कि उस पर मेरे कोई विचार नहीं हैं. बल्कि इसलिए कि मैं उससे पहले एक आधारभूत मुद्दे पर बात करना चाहता हूं.
सोचिए, एक वर्ग अपनी कोई मांग सरकार के सामने रखता है और कहता है कि आप इस मांग पर विचार कर इसे अमुक तारीख तक पूरा कीजिए. वह वर्ग सरकार को पर्याप्त समय देता है कि सरकार उस मांग को पूरा करने की दिशा में कुछ करे, अगर मांग पूरा करना किसी भी कारण सम्भव न हो, या तुरंत पूरा करना सम्भव न हो, सरकार के अधिकार क्षेत्र के बाहर हो, तो भी इस समय में सरकार उस पक्ष से बात तो कर ही सकती है. लेकिन सरकार कुछ नहीं करती. मुहावरे की भाषा में कहें तो सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती. न केवल इतना, वह वर्ग एक बडे आन्दोलन की तैयारी करता रहता है और सरकार के आंख कान ज़रा भी हरकत में नहीं आते. यानि अपनी इण्टेलीजेंस से भी सरकार को उस वर्ग के आन्दोलन की भीषण तैयारियों की कोई सूचना नहीं मिलती. और आन्दोलन शुरू हो जाता है. तब भी सरकार आन्दोलनकारियों से कोई सम्वाद नहीं करती. आखिर सरकार तो सरकार होती है ना! वह भला कैसे ऐसे वैसों से बात कर सकती है? लेकिन जब पानी हद से गुज़रने लगता है तो सरकार के हाथ-पांव फूलने लगते हैं. लेकिन तब तक आन्दोलनकारी ऐसे मुकाम पर पहुंच चुके होते हैं कि वहां से उनके लिए पीछे हटना मुमकिन नहीं रह जाता...
सवाल यह है कि क्या प्रजातंत्र में ऐसा होना चाहिए? क्या जनता की बात सरकार को नहीं सुननी चाहिए? मैं केवल सुनने की बात कर रहा हूं, न कि मांग पूरी करने की. हम जानते हैं कि प्रारम्भिक स्तर पर बहुत सारी समस्याएं संवाद से ही सुलझ जाती हैं, ठीक उसी तरह जिस तरह कोई मामूली चोट लगे तो छोटा-मोटा प्राथमिक उपचार ही काफी होता है, लेकिन जब उस चोट की उपेक्षा की जाती है तो चोट को घाव में और घाव को नासूर में तब्दील होते वक़्त नहीं लगता. तो, सरकार अपनी प्रजा से बात न करे यह बहुत बडी गडबड है. यहां यह बात भी सामने आएगी कि जनता की सरकार से इतनी अधिक अपेक्षाएं होती हैं कि उन्हें पूरा करना तो दूर, सुनना भी सम्भव नहीं होता. और यहीं यह बात भी सामने आएगी, कि ऐसा तभी होता है जब सरकार चन्द लोगों तक सिमट कर रह जाए. सरकार का मतलब केवल मुख्य मंत्री या मंत्री मण्डल ही नहीं होता, विधायक भी सरकार है, पार्षद भी सरकार है, हर जन प्रतिनिधि सरकार है. आखिर जनता और सरकार के बीच इतनी दूरी क्यों हो? दूरी केवल चुनाव के वक़्त पाटी जाए और फिर सरकार अपने महलों में घुस कर ‘प्रवेश निषेध’ का बोर्ड लटका दे, तो ऐसा ही होगा. जिन्हें जनता ने चुना है वे जनता से संवाद भी न कर सकें, तो यह माना जाना चाहिए वे सही जन प्रतिनिधि नहीं हैं. और यह भी कि जनता ने अपने प्रतिनिधि चुनने में गलती की है. गलती की है तो सज़ा भी भुगतनी ही पडेगी. और वही सज़ा आज हम सब भुगत रहे हैं. वरना यह तो नहीं होना था न कि जनता एक तरफ, यानि जनता का एक बडा हिस्सा, और सरकार दूसरी तरफ. मैं फिर कह रहा हूं कि इस आन्दोलन की मांगों के औचित्य पर मैं यहां कोई टिप्पणी नहीं कर रहा. लेकिन अगर दस बीस पचास हज़ार लोग भी कोई मांग रख रहे हैं तो ऐसा कैसे कि उनके प्रतिनिधि न तो उस मांग से सहमत हैं और न वे अपने उन मतदाताओं को समझा पा रहे हैं कि तुम्हारी मांग गलत है! आप किसी भी आन्दोलन को याद कर लीजिए, जनता के निर्वाचित प्रतिनिधि सदा ही कोई स्टैंड लेने से कतराते हैं. इसलिए कि वे अपने मतदाताओं को नाराज़ नहीं करना चाहते. न केवल इतना, वे चुनाव के वक़्त या कि किसी भी आन्दोलन के वक़्त, अगर वह उनके प्रतिपक्षी द्वारा चलाया जा रहा हो, किसी भी हद तक जाकर अव्यावहारिक वादे करने से नहीं चूकते.

दूसरी बात, सरकार की ताकत की. एक वर्ग या समूह आन्दोलन की चेतावनी देता है, उसकी तैयारी करता है. सरकार उसे रोक पाने में कतई समर्थ नहीं रहती. पहले तो उसे पता ही नहीं चलता और फिर उस आन्दोलन को कुचलना उचित या सम्भव नहीं रह जाता. क्या यह क्षम्य है? इस आन्दोलन में जो जन-धन की हानि हुई है, रेलों की पटरियां उखाडी गई हैं, सम्पत्ति का नाश किया गया है, मानवीय दिवसों का नुकसान किया गया है, उस सब का नुकसान किसे उठाना पडेगा? आपको और मुझे! हम क्यों उठायें यह नुकसान? करे कोई भरे कोई! क्या इसकी जवाबदेही नही तै होनी चाहिए?
यह सब कहते हुए मैंने एक बात अब तक नहीं कही है. जब मैं प्रजातंत्र की बात करता हूं तो प्रजा के तंत्र की बात करता हूं. एक ऐसा तंत्र जिसमें हम सब एक बडे तंत्र के हिस्से हैं. क्या हमने, यानि इस देश के आम नागरिक ने अपनी कोई ज़िम्मेदारी समझी है? एक पूरे प्रांत में आन्दोलन करने वाले लोग कितने हैं और वे कितने जो उस आन्दोलन से असहमत या अलग हैं? अगर प्रतिशत में बात करें तो शायद 5 और 95 होंगे. या इससे कुछ कम ज़्यादा. तो, बडा हिस्सा तो उनका है जो इस सारी तोड फोड से सहमत नहीं है. वह बडा हिस्सा क्या कर रहा है? एक वर्ग ‘बन्द’ की घोषणा करता है, सारे लोग चुपचाप बन्द कर देते हैं, यह कहते हुए कि ‘कौन झगडा मोल ले?’ शायद सरकार भी यही सोचती है. शायद नहीं, निश्चित रूप से. जो वर्ग मांग कर रहा है, उसे मना करके क्यों नाराज़ किया जाए? चलो गेंद केन्द्र के पाले में फेंक देते हैं. वैसे मांग पूरी कर भी देते, अगर दूसरे वर्ग की नाराज़गी का डर नहीं होता. अपनी जेब से क्या जा रहा है? बडे ‘पैकेज’ यही सोच कर तो घोषित किए जाते हैं. उनकी जेब से कुछ नहीं जा रहा, लेकिन जिनकी जेब से जा रहा है वह भी तो चुप है. यानि आप और हम.

हालात बहुत गंभीर हैं. आप जितना सोचते हैं उतने ही भयाक्रांत होते हैं. कभी शिव मंगल सिंह सुमन ने लिखा था, ‘मेरा देश जल रहा कोई नहीं बुझाने वाला.’ जो मेरे प्रांत राजस्थान में हो रहा है कमोबेश वही अन्य प्रांतों में, पूरे देश में हो रहा है. लेकिन, सोचिए, बुझाने वाला क्या किसी और लोक से आएगा? कहीं ऐसा तो नहीं कि इस निष्क्रिय उदासीनता के मूल में यह उम्मीद छिपी है कि ‘यदा यदा ही धर्मस्य...’. जब भी द्रौपदी पर संकट आएगा, भगवान उसकी मदद को हाज़िर हो जाएंगे.... यह कि हमारी मदद करने आसमां से फरिश्ते उतर कर आयेंगे. हमें कुछ करने की क्या ज़रूरत है? अगर ऐसा है तो फिर भगवान ही मालिक है!
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