बहुत दिनों से याद करने की कोशिश कर
रहा हूं कि उनसे पहली मुलाकात कब, कहां और कैसे हुई थी, लेकिन कुछ भी
याद नहीं आ रहा है. मैं उम्र के जिस मुकाम पर पहुंच गया हूं, वहां ऐसा होना
अस्वाभाविक भी नहीं है. इतनी दूर की तो छोड़िए, बहुत नज़दीक की, बल्कि सामने की बातें भी कहां याद
रहती हैं. स्मृति भी शायद अपनी सुविधा से काम करती है. वह बहुत कुछ बचाकर रखती है
और बहुत कुछ, जाने
क्यों, धीरे-धीरे
धुंधला देती है. कुछ अनुमान लगाता हूं तो जो धुंधली-सी तस्वीर उभरती है, उसके अनुसार
शायद अस्सी के दशक में उनसे पहली मुलाकात हुई होगी. उनसे अर्थात डॉ. सूरज पालीवाल
से.
वे तब जोधपुर के जयनारायण व्यास
विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक थे और मैं उनसे लगभग दो सौ किलोमीटर दूर
सिरोही नाम के एक छोटे-से कस्बे के राजकीय महाविद्यालय में हिंदी का प्राध्यापक
था. वह समय राजस्थान में साहित्यिक सक्रियता के लिहाज से अनुपम था. राजस्थान
साहित्य अकादमी एक के बाद एक कार्यक्रम किए जा रही थी और अलग-अलग जगहों पर बहुत-सी
संस्थाएं अपने-अपने आयोजन भी करती थीं. जोधपुर में अंतर प्रांतीय कुमार साहित्य
परिषद ऐसी ही एक संस्था थी,
जो
श्री नेमिचंद्र जैन ‘भावुक’ (अब स्वर्गीय) के वत्सल व्यक्तित्व की छांह में पूरे
पश्चिमी राजस्थान में साहित्यिक आयोजन करती रहती थी.
इन सारे आयोजनों का एक अतिरिक्त लाभ
यह था कि लेखकों को मिलने-जुलने के खूब अवसर मिलते थे और इन्हीं अवसरों के कारण
उनके बीच आत्मीय रिश्ते बनते थे. तब के साहित्यिक आयोजन कम खर्च वाले, कम संसाधनों
वाले और कम चमक-दमक वाले हुआ करते थे, लेकिन उनमें एक ऐसी गर्माहट होती थी जो अब शायद
दुर्लभ हो गई है. वहां रचनाकार मुक्त भाव से सहजीवन का आनंद लेते हुए साहित्यिक
चर्चाएं करते थे. किसी एक बड़े हॉल में गद्दे बिछे हुए हैं और बीस-तीस-चालीस-पचास
लेखक उन पर लेटे-अधलेटे हुए गपशप कर रहे हैं. कोई अपनी नई कविता सुना रहा है, कोई किसी कहानी
पर बहस कर रहा है, कोई
किसी लेखक की नकल उतार रहा है और कोई बस चुपचाप दूसरों की बातें सुनकर आनंदित हो
रहा है. साहित्य वहां केवल मंच पर नहीं होता था, जीवन में भी होता था. यह अनिर्वचनीय
सुख था, जिसे
बाद की सुविधा-संस्कृति ने हमसे जाने-अनजाने छीन लिया.
तो ऐसे ही किसी आयोजन में डॉ. सूरज
पालीवाल से पहली मुलाकात हुई होगी. जोधपुर में, या बाड़मेर में, या जैसलमेर में या मेरे अपने सिरोही
में. निश्चित रूप से कह पाना अब संभव नहीं है. तब हम दोनों युवा थे. (वे आज भी
युवा हैं.) और शायद युवावस्था की यही खूबी होती है कि वह परिचयों को बहुत जल्दी
आत्मीयताओं में बदल देती है.
एक संयोग यह भी बना कि उन दिनों मेरा
जोधपुर जाना खूब होता था. तीन कारण थे. एक तो हम सिरोही वालों के लिए निकटतम
आकाशवाणी केंद्र जोधपुर था,
अत:
प्रसारण के लिए वहां से निमंत्रण आते रहते थे. दूसरा यह कि पहले मेरा बेटा और फिर
बेटी जोधपुर के एम.बी.एम. इंजीनियरिंग कॉलेज (अब विश्वविद्यालय) के विद्यार्थी रहे, तो उनसे मिल
लेने, बल्कि
उन्हें संभालने का चाव रहता. और तीसरा, मेरा ससुराल भी जोधपुर में ही था, इसलिए
पारिवारिक कारणों से भी वहां जाना होता रहता था.
इन सब में एक बात और जोड़ दूं तो बात
आगे बढ़े. मेरा ससुराल, बच्चों
का कॉलेज और डॉ. सूरज पालीवाल का निवास—ये तीनों एक किलोमीटर से भी कम दूरी की
परिधि में थे. तो जब भी जोधपुर जाना होता, मैं डॉ. सूरज पालीवाल के घर भी चला जाता. यह उनके
व्यक्तित्व का ही कमाल था —उनके भी और डॉ. शोभा जी के भी— कि मुझे कभी भी उनके घर
जाने में संकोच नहीं हुआ. ऐसा लगता ही नहीं था कि मैं किसी के घर ‘मिलने’ जा रहा
हूं. लगता था, अपने
ही किसी आत्मीय के यहां जा रहा हूं. खूब गपशप होती, थोड़ी साहित्यिक चर्चाएं भी होतीं.
शोभा जी का आत्मीय आतिथ्य तो होता ही. चाय, खाना और बातचीत—इन तीनों का ऐसा मेल कि जाने का
समय हमेशा कुछ पहले ही निकल जाता था.
फिर एक दिन पालीवाल जी का पहला
कहानी-संग्रह आया—‘टीका प्रधान’—और जोधपुर में उस पर एक गोष्ठी की योजना
बनी. पालीवाल जी ने मुझसे भी आग्रह किया कि मैं उस गोष्ठी के लिए जोधपुर आऊं और
उनके कहानी-संग्रह पर अपनी बात कहूं. उन दिनों बहुत-सी गोष्ठियों में मैंने सिरोही
से जाकर भागीदारी की थी. बड़े रोचक अनुभव हैं उन गोष्ठियों के. लेकिन वह चर्चा फिर
कभी.
पालीवाल जी की किताब पर चर्चा के लिए
मैं जोधपुर आया, गोष्ठी
में भागीदारी की और शायद उस शाम पालीवाल जी के निवास पर शोभा जी के स्वादिष्ट
आतिथ्य का सुख भी लिया. यह सुख बाद में भी अनेक बार मिला. पालीवाल जी पदोन्नत
होते-होते विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रोफ़ेसर बने, संकाय के
अधिष्ठाता बने और इन विभिन्न पदों पर रहते हुए कई बार उन्होंने मुझे वहां बुलाया
भी — खास तौर पर पुनश्चर्या पाठ्यक्रमों में व्याख्यान देने के लिए. जब भी ऐसे
किसी आधिकारिक और औपचारिक कार्यक्रम के लिए जोधपुर जाना हुआ, पालीवाल युगल
का सायंकालीन आतिथ्य अवश्य ही प्राप्त हुआ. आधिकारिक कार्यक्रम समाप्त हो जाता था, लेकिन असली
कार्यक्रम जैसे उसके बाद शुरू होता था.
समय बीतता गया और पालीवाल जी महात्मा
गांधी केंद्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में प्रोफ़ेसर बनकर चले गए. उनके बाद, कुछ समय बाद
शोभा जी भी अपनी सरकारी नौकरी छोड़ वहीं चली गईं. जोधपुर में मेरा एक घर कम हो
गया. फिर धीरे-धीरे मेरा भी जोधपुर जाना कम होता गया और बाद में तो सिरोही छूट ही
गया. इससे मेरे लिए जोधपुर और दूर हो गया. स्वाभाविक ही था कि हमारा मिलना-जुलना
कम हो गया. लेकिन जब भी मिले, मन आश्वस्त हुआ कि हमारी आत्मीयता में कोई कमी
नहीं आई है. वह जस की तस है. रिश्तों की एक खूबी शायद यही होती है कि उनके लिए लगातार
मिलते रहना जरूरी नहीं होता. कुछ रिश्ते समय के साथ बने रहते हैं, भले ही उनके
बीच मुलाकातों का अंतराल बढ़ता जाए.
और फिर समय ने एक और करवट ली. मैं तो
रिटायर होकर जयपुर में बस ही गया था, पालीवाल दंपती भी वर्धा से रिटायर होकर जयपुर ही
आ बसे. लगा, हमारे
अच्छे दिन आ गए. लेकिन ये अच्छे दिन तब आए जब पालीवाल लोग और अग्रवाल लोग इन अच्छे
दिनों का सुख लेने की बहुत सारी क्षमताएं गंवा चुके थे. उम्र अपने साथ बहुत कुछ ले
जाती है—समय, स्वास्थ्य, सहज आवागमन और
कभी-कभी वह बेफिक्री भी, जिसके
सहारे मित्र घंटों बैठे रह सकते थे.
इसके अलावा उन्होंने तो घर भी बहुत
दूर लिया. इतनी दूर कि मुझ जैसे छोटे कस्बे में जिंदगी बिताने वाले को लगे कि एक
से दूसरी कॉलोनी में नहीं,
एक से
दूसरे शहर जा रहे हैं. लेकिन इसके बावजूद यह तसल्ली है कि हम जिस आकाश के नीचे
सांस ले रहे हैं, वह एक
ही शहर का है. भले ही अब उम्र जनित सीमाओं के कारण बहुत जल्दी-जल्दी मिलना नहीं
होता, यह
प्रतीति तो रहती है कि हम एक ही शहर में हैं. और कभी-कभी एक ही शहर में होना भी एक
तरह की आत्मीय निकटता होती है.
पालीवाल जी सही अर्थों में वैसे
शिक्षक हैं, जिनसे
आदर्श शिक्षक की परिकल्पना हमारे मन में आकार लेती है. मैं तो यही तसव्वुर करता
हूं कि एक उम्दा शिक्षक हर वक्त किताबों और नए विचारों से घिरा रहे. पालीवाल जी
मेरी हिंदी के ऐसे ही विरल शिक्षक हैं. मैं ‘विरल’ क्यों लिख रहा हूं, यह समझने वाले
समझ जाएंगे और जो न समझें,
वे
बहुत सहजता से मेरे लिखे इस शब्द को नज़रअंदाज कर सकते हैं.
पालीवाल जी नए से नया पढ़ते हैं और
मुझे पिछले कई बरसों में उनसे हुई एक भी ऐसी मुलाकात याद नहीं है, जब उन्होंने
अपनी ताजा पढ़ी किसी किताब की चर्चा न की हो. एक बार वे बता रहे थे कि उनका पढ़ने
का समय सुबह तीन से छह बजे का तो फिक्स्ड है ही. सुबह के उन तीन घंटों में वे किस
तरह अपने को किताबों के हवाले कर देते हैं, यह सुनना ही मेरे लिए आश्चर्य का विषय था. हममें
से बहुत-से लोग किताबें पढ़ना चाहते हैं, पढ़ने की योजनाएं बनाते हैं, किताबें खरीदते
हैं और फिर किसी सुविधाजनक समय की प्रतीक्षा करते रहते हैं. पालीवाल जी उन दुर्लभ
लोगों में हैं जो अपने पढ़ने के लिए समय निकालते नहीं, समय बनाते हैं.
वे किसी किताब को पढ़ते हैं तो इतनी
तन्मयता से पढ़ते हैं कि उस पर घंटों बात कर सकते हैं, बल्कि करते ही
हैं. किसी भी नई किताब के बारे में उन्हें सुनना एक समृद्ध करने वाला अनुभव होता
है. किताब के कथानक से आगे जाकर उसके भीतर के विचार, लेखक की दृष्टि, भाषा, शिल्प और उसके
साहित्यिक संदर्भों तक वे सहजता से पहुंच जाते हैं. इस मामले में उनकी स्मृति भी
विलक्षण है. मुझे तो कल पढ़ी हुई किताब के बारे में भी इस तरह चीजें याद नहीं
रहतीं! वे नए से नए उपन्यास पढ़ते हैं और न केवल पढ़ते हैं, उन पर नियमितता
से लिखते भी हैं. पढ़ना उनके लिए निजी आनंद भर नहीं है; वह उनके
अध्यापक और आलोचक होने की जिम्मेदारी का भी हिस्सा है.
लेकिन पालीवाल जी की स्मृति का एक और
आयाम है, और वह
बहुत दिलचस्प भी है. उन्हें निजी जीवन की घटनाएं पूरे ग्राफिक डिटेल्स में याद
रहती हैं. न केवल याद रहती हैं, वे उन्हें सुनाते भी बहुत मजे लेकर हैं. वही मिर्ज़ा
ग़ालिब वाली बात—‘ज़िक्र उस परी-वश का और फिर बयां अपना...’ साहित्यिक
दुनिया के लोगों के साथ उनके इतने लंबे और इतने विविध संबंध रहे हैं कि उनके पास
प्रसंगों का एक पूरा चलता-फिरता संग्रहालय है.
अपने पद और साहित्यिक सक्रियता के
कारण उनका साहित्य की दुनिया के बाशिंदों से बहुत नियमित रूप से मिलना-जुलना होता
रहा है. ये मेल-मुलाकातें
उनके स्मृति-कोश को निरंतर समृद्ध करती रही हैं. मैं तो उनसे जब भी मिलता हूं, इस बात का
आकांक्षी रहता हूं कि वे ऐसे रोचक प्रसंग साझा करें, और वे कभी निराश भी नहीं करते. एक
प्रसंग से दूसरा प्रसंग निकलता है, फिर तीसरा और देखते-देखते कोई पूरा समय खंड हमारे
सामने जीवित हो उठता है. उनकी बातचीत में साहित्यिक दुनिया के लोग केवल नाम नहीं
रह जाते, वे
अपने स्वभाव, अपनी
आदतों, अपनी
खूबियों और कमजोरियों के साथ हमारे सामने चलने-फिरने लगते हैं.
कहना अनावश्यक है कि ऐसे प्रसंगों
में अधिकांश बहुत निजी, अंतरंग
और प्रायः अनुद्धरणीय होते हैं. इसलिए उन्हें यहां लिख देना संभव भी नहीं और उचित
भी नहीं. लेकिन मैं हमेशा यह सोचता हूं कि अगर पालीवाल जी इन प्रसंगों को लिख दें
तो हम कांति कुमार जैन की अनुपस्थिति के त्रास से कुछ त्राण पा सकते हैं. कांति
कुमार जैन ने जिस तरह संस्मरण को साहित्यिक गरिमा और निजी विनोद के अद्भुत मेल में
बदल दिया था, वैसी
ही संभावना मुझे पालीवाल जी में भी दिखाई देती है. उनके पास सामग्री है, स्मृति है, लोगों को निकट
से देखने की दृष्टि है और सबसे बड़ी बात—उन्हें सुनाने की कला आती है.
शायद यही कारण है कि सूरज पालीवाल को
याद करते हुए मुझे केवल एक कथाकार, आलोचक या शिक्षक याद नहीं आते. मुझे एक ऐसा
आत्मीय व्यक्ति याद आता है,
जिसके
साथ बीते हुए समय का एक-एक पल भी याद आता है. जोधपुर के वे दिन, सिरोही से की
गई यात्राएं, साहित्यिक
गोष्ठियों के वे गद्दे, देर
रात तक चलने वाली बातचीत,
शोभा
जी का आतिथ्य, किताबों
पर होने वाली बहसें और बीच-बीच में जीवन के छोटे-बड़े किस्से—सब एक साथ लौट आते
हैं.
और तब लगता है कि शायद पहली मुलाकात
की तारीख, जगह और
अवसर याद न रहना उतना महत्वपूर्ण नहीं है. महत्वपूर्ण यह है कि कोई व्यक्ति हमारी
स्मृति में किस तरह और कितनी गहराई से बसा हुआ है. सूरज पालीवाल मेरे लिए ऐसे ही
व्यक्ति हैं. पहली मुलाकात कब हुई, यह मुझे याद नहीं; लेकिन यह अच्छी तरह याद है कि वह
मुलाकात धीरे-धीरे एक आत्मीय संबंध में बदल गई और वह संबंध इतने वर्षों और इतनी
दूरियों के बाद भी बना हुआ है. उम्र ने भले ही मुलाकातों के बीच की दूरी बढ़ा दी
हो, आत्मीयता
की दूरी नहीं बढ़ाई है. शायद सच्चे रिश्तों की यही सबसे बड़ी पहचान है.
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