उपन्यास की शुरुआत एक रोचक दृश्य से होती है. अर्जुन अपने पिता को गर्भवती मां के साथ प्रणय रत देख लेता है. हालांकि वह उन्हें महज़ 1.67 सेकण्ड के लिए देखता है, लेकिन अब तक प्रणय के बारे में उसने जो भी जाना है, खास तौर पर अमरीका के माध्यम से, वह सब झन्न से टूट-बिखर जाता है. अर्जुन अपने पिता से सीधे पूछता है, “आप और मां लगातार बच्चे क्यों पैदा किए जा रहे हो?” इस सवाल से हतप्रभ पिता राकेश कुछ सोच कर जवाब देते हैं, “बेटा, मैंने तुम्हें योगराज कमीशन की रिपोर्ट के बारे में बताया तो था. फिर? तुम तो जानते ही हो कि मैं धर्मान्ध नहीं हूं लेकिन आयोग ने जो कुछ कहा वह सौ फीसदी स्पष्ट है. हमें देश में ज़्यादा हिन्दुओं की ज़रूरत है.” बेटा तिलमिलाकर सवाल करता है, “तो मैं, बल्कि हम सब, आपके लिए सिर्फ राजनीतिक मोहरे हैं?” बाप सफाई देते हुए कहता है, “ नहीं, बेटा. लेकिन तुम तो जानते ही हो कि ये लोग.... इनके तो एक से ज़्यादा बीबियां होती हैं और इनके परिवार बढते रहते हैं, जबकि.....” अर्जुन तल्खी से पूछता है, “क्या आपको मेरा नाम भी याद है?”
लेकिन यह इस उपन्यास का एक पक्ष है. लेखक बहुत कौशल से अर्जुन के इस सवाल के बहाने राकेश को उसके अतीत में ले जाता है. वह याद करता है कि कैसे उसे चालाकी से वर्तमान पत्नी के साध बांध दिया गया था. इस स्मृति और बेटे के सवाल से व्यथित हो वह अपने मंत्री पद से इस्तीफा दे देता है. वैसे इस्तीफा उसके लिए कोई नई बात नहीं है, वह पहले भी 62 बार इस्तीफा दे चुका है. जितनी दुश्वारियां उसकी ज़िन्दगी में है, उनसे कम इस उपन्यास के अन्य पात्रों की ज़िन्दगी में नहीं हैं. राकेश की गर्भवती पत्नी संगीता बहुत दुखी है. वजह यह कि उसके प्रिय सीरियल का नायक मर गया है. न केवल संगीता, बल्कि देश भर की औरतें शोक में डूबी हैं और उन्होंने एक राष्ट्र व्यापी हड़ताल की धमकी तक दे रखी है. उधर अर्जुन अपनी स्कूल बस की खूबसूरत सहयात्री आरती को अपने रॉक बैण्ड की कथाएं सुना कर लुभाना चाहता है, लेकिन दिक्कत यह कि उसका कोई रॉक बैण्ड है ही नहीं.
राकेश की घरेलू और राजनीतिक ज़िन्दगी के हास्यास्पद प्रसंग इन सारे किरदारों की ज़िन्दगी की दुश्वारियों की विडम्बना को और गहरा जाते हैं. राकेश आहूजा की सरकार की करतूतें, उसकी पत्नी की टूटी-फूटी अंग्रेज़ी, और बेटे की संगीत विषयक हरकतें उपन्यास में हास्य के गहरे रंग भरती हैं. कथा बहु आयामी है. उपन्यास के ट्रेज़ेडी-कॉमेडी के सुविचारित मेल को इसकी सधी हुई भाषा और ज़्यादा प्रभावोत्पादक बनाती है. एक उदाहरण देखें. लेखक दिल्ली के भीषण ट्रैफिक का वर्णन करते हुए कहता है, “वे लोग कारों के अंतहीन काफिले में शरीक थे, वह काफिला जो फेफड़ों के कैंसर की धीमी तीर्थ यात्रा पर था.” इसी तरह वह युवा अर्जुन की सांगीतिक ‘प्रतिभा’ को इस तरह व्यक्त करता है: “उसकी आवाज़ ठीक वैसी ही थी जैसी कि किसी बड़े बांध से पानी के पहले रिसाव की होती है. वह भयावह थी क्योंकि यह तो शुरुआत थी और उसका भीषण रूप अभी शेष था.”
उपन्यास पढते हुए यह कहीं भी नहीं लगता कि यह एक 24 वर्षीय रचनाकार की कृति है, और वह भी प्रथम कृति. अपने व्यंग्यात्मक लहज़े और जीवन के मार्मिक क्षणों की अचूक पकड़ के कारण इसे भुला पाना कठिन है. यही है इसकी सफलता का राज़.
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Discussed book:
Family Planning (A Novel)
By Karan Mahajan
Published by Harper Collins Publishers
288 pages
US $ 13.95
राजस्थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्ट में मेरे पाक्षिक कॉलम किताबों की दुनिया के अंतर्गत 25 ज़नवरी 2009 को प्रकाशित.
