Tuesday, August 13, 2019

रिश्तों की मज़बूती के लिए अच्छी नींद भी बहुत ज़रूरी !


यह बात सन 2012 में ही सामने आ चुकी थी. एक संस्था बेटर स्लीप काउंसिल ने अपने सर्वे में पाया था कि हर चार में से एक दम्पती रात को बेहतर और अबाधित निद्रा लेने के लिए अलग-अलग सोते हैं. इसी बात को आगे बढ़ाया पिछले बरस एक रिसर्च कम्पनी वन पोल ने. उसने एक शैया निर्माता कम्पनी के  लिए किये गए सर्वे में पाया कि अमरीका के कुल दो हज़ार  उत्तरदाताओं में से छियालीस प्रतिशत की आकांक्षा अपने जीवन साथियों से अलग शयन करने की थी. असल में आहिस्ता-आहिस्ता  पूरी दुनिया में यह हो रहा है कि दम्पती अलग-अलग कमरों में या फिर कम से कम अलग अलग पलंगों पर सोना पसंद करने लगे हैं. और जैसे हमें चौंकाने के लिए इतना ही पर्याप्त न हो, न्यूयॉर्क शहर की एक जानी-मानी मनश्चिकित्सक ने तो यह तक कह दिया था कि “कुछ दम्पतियों का तो यह खयाल भी है कि अलग-अलग सोने से उनके रिश्ते और मज़बूत हो गए हैं.” अपनी बात को स्पष्ट करते हुए उन्होंने बताया कि ऐसे दम्पतियों का कहना था कि एक दूसरे की भिन्न भिन्न आदतों के कारण नींद में आने वाले ख़लल से मुक्ति की कल्पना ही उनके लिए इतनी सुकून दायक थी कि वे लोग अतीत में एक दूसरे की जिन बातों से क्षुब्ध होते थे उनको भुलाकर  अपने रिश्तों की अन्य सुखद बातों पर ध्यान केंद्रित कर पा रहे थे. 

इस सारी बात के मूल में यह हक़ीक़त है कि एक ही शयन कक्ष में सोने वाले युगल अपने साथी की बहुत सारी बातों, जैसे खर्राटे भरना, मुंह से बदबू आना, नींद में करवटें बदलना या हाथ-पांव चलाना, उजाले में नींद आने का अभ्यास  वगैरह के कारण परेशान होते हैं. यह परेशानी जब अधिक बढ़ जाती है तो इससे स्वास्थ्य  विषयक अनेक दिक्कतें तो पैदा होती ही हैं, चिड़चिड़ाहट भी बढ़ने लगती है और इन सबकी परिणति वैवाहिक सम्बंधों के बिगड़ने में होती है. सन 2016 में जर्मनी की न्यूरेम्बर्ग यूनिवर्सिटी में हुए एक शोध कार्य से पता चला कि नींद में ख़लल और रिश्तों में तनाव इन दोनों में चोली-दामन का साथ है. वैसे, सन 2013 में कोलम्बिया यूनिवर्सिटी,  बर्कले में हुए एक शोध में यह बात पहले ही कही जा चुकी थी कि पति पत्नी में से किसी एक की नींद विषयक आदतों की वजह से जब दूसरे की नींद खराब होती है तो उसका सीधा असर उनके वैवाहिक सम्बंधों पर पड़ता है. और इसलिए समझदार दम्पती  एक दूसरे की सुविधा-असुविधा का खयाल कर सप्ताह में कुछ दिन अलग-अलग कमरों में सोने लगे हैं. वे कहते हैं कि यह चुनाव से ज़्यादा किसी समस्या के व्यावहारिक समाधान  का मामला है.

इस समाधान के अनेक रूप हैं. कमरे अलग हो सकते हैं, या फिर एक ही कमरे में बिस्तर अलग-अलग हो सकते हैं. वैसे इस समस्या पर अधिक विचार पश्चिम में हुआ है और या फिर हमारे यहां सुविधा सम्पन्न लोगों में, क्योंकि शेष के पास तो वैसे ही कोई विकल्प नहीं होता है. उन्हें तो जो है और जैसा  है में ही ज़िंदगी बितानी होती है.  वैसे भी पश्चिम में व्यक्तिवाद,  निजी स्पेस और अपनी शर्तों पर जीवन जीने का का आग्रह हमारे यहां की तुलना में बहुत ज़्यादा है. अब देखिये ना, बाल्टीमोर की 45 वर्षीया टीना कूपर की शिकायत है कि उन्हें देर रात तक जगे रहना अच्छा लगता है जबकि उनके जीवन साथी की आदत सुबह सबेरे जल्दी उठ जाने की है. उन्हें उठते ही सूरज की रोशनी को देखना पसंद है जबकि टीना जी को यह सुखद नहीं लगता. वे घुप्प अंधेरा पसंद करती हैं. उन्हें कुछ आवाज़ों में नींद आती है जबकि उनके साथी को नींद में डूबने के लिए गहरे सन्नाटे की तलब होती है. उनके साथी को कठोर गद्दे पर नींद आती है जबकि खुद उन्हें मुलायम और तकियों से भरा गद्दा अच्छा लगता है. अब आप ही सोचिये कि जिनकी आदतों और रुचियों में इतना ज़्यादा फ़र्क़ हो वे भला एक बिस्तर तो क्या एक कमरे में भी कैसे सो सकते हैं?

इस सारी चर्चा का एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि बहुत सारी शोधों और अध्ययनों से यह बात  पता चली है कि पुरुषों की तुलना में स्त्रियां अपने जीवन साथी की अनुचित हरकतों और आदतों से अधिक प्रभावित होती हैं और इसलिए वे ही समस्या के इस समाधान का अधिक पक्ष भी लेती हैं. सन 2007 में एक जर्नल स्लीप एण्ड बायोलॉजिकल रिद्म्स में इस तरह का अध्ययन प्रकाशित हो चुका है और उसे प्राय: उद्धृत किया जाता है.

भले ही हम लोग यह मानने के अभ्यस्त रहे हैं कि दम्पती की रात एक कमरे में बीतनी चाहिए, न्यूयॉर्क के एक बड़े मनोवैज्ञानिक की यह बात भी ग़ौर तलब तो है ही: “जो युगल अलग-अलग कमरों में सोते हैं वे एक दूसरे के साहचर्य को मिस भी करते हैं और यह बात उनके दाम्पत्य जीवन को अधिक उत्तेजक और दिलकश बना देती है.”

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 13 अगस्त, 2019 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, August 6, 2019

कदम गिनें नहीं, चलने का आनंद लें!


हम बचपन से सुनते आए हैं कि घूमना सेहत के लिए फायदेमंद होता है, और इसलिए भरसक यह कोशिश करते हैं कि जितना सम्भव हो पैदल चल लें. कुछ बरस पहले तक हम सुबह या शाम घूम लिया करते थे और यह सोच कर संतुष्ट हो जाते थे कि आज हम दो किलोमीटर घूमे या तीन किलोमीटर. फिर आहिस्ता आहिस्ता हमारे घूमने की नाप जोख करने वाले उपकरण आ गए तो उनकी मदद से हम अपने घूमने का हिसाब-किताब रखने लगे. पीडोमीटर, स्मार्ट वॉचेज़ या स्मार्ट फोन के  विभिन्न एप्स – जिसको जो सुविधाजनक और अपनी पहुंच के भीतर लगे वो उसी की मदद से आजकल अपने पैदल चलने का लेखा-जोखा  रख लेता है. वैसे बहुत लोग अब भी इन सबसे मुक्त रहकर ही घूमते हैं.

जो लोग किसी आधुनिक उपकरण की सहायता से अपने घूमने का रिकॉर्ड रखते हैं उनके लिए  घूमने का आदर्श पैमाना है दस हज़ार कदम. यानि अगर आप हर रोज़ दस हज़ार कदम चल लिये हैं तो मान लें कि आपने अपनी घूमने की दैनिक ज़रूरत पूरी कर ली है. जैसे ही आप दस हज़ार कदम चल लेते हैं, आपके स्मार्ट फोन में स्थापित एप हरे रंग की पट्टियों से बना एक गुलदस्ता नुमा उपहार आपको प्रदान कर आपका हौंसला बढ़ाता है. हर एप में इस उपहार की आकृति अलग-अलग होती है, लेकिन दस हज़ार कदम पूरे करते ही आपकी पीठ थपथपाई ज़रूर जाती है. क्या आपने कभी जानने का प्रयास किया है कि यह दस हज़ार कदम का पैमाना बना कैसे? मैं तो यही सोचता था कि बड़े बड़े विशेषज्ञों ने बरसों शोध और परीक्षण कर यह जाना होगा कि हमें स्वस्थ रहने के लिए हर दिन कम से कम दस हज़ार कदम चलना चाहिए.

लेकिन आप भी यह जानकर चौंक उठेंगे कि ऐसा नहीं है. अगर अनुमति दें तो इस रहस्य पर से पर्दा हटा ही दूं! हुआ यह कि जब 1964 में जापान की राजधानी टोकियो में ओलम्पिक खेल होने वाले थे तो वहां की पीडोमीटर बनाने वाली एक कम्पनी ने अपना उपकरण बेचने के लिए एक ज़ोरदार विज्ञापन अभियान चलाया. पीडोमीटर यानि आपके कदमों की गणना करने वाला उपकरण. उस कम्पनी ने अपने पीडोमीटर का नाम रखा था – मेन पो काई. जापानी भाषा में इन तीन शब्दों के अर्थ ये हैं: मेन = दस हज़ार, पो = कदम, और काई = मीटर या गणना यंत्र. अब इसे संयोग कहें या कुछ और, कि यह उपकरण बेहद कामयाब साबित हुआ. कम्पनी ने तो भारी मुनाफा कमाया ही, यह दस हज़ार की संख्या भी लोगों की स्मृति में अड्डा जमा कर बैठ गई. बाद में कुछ छोटे-मोटे शोध भी हुए जिनमें पांच हज़ार कदम चलने से होने वाले फायदों की तुलना दस हज़ार कदम चलने से होने वाले फायदों से की गई, और तब यह निष्कर्ष तो निकलना ही था कि जितना ज़्यादा चलोगे उतना फायदे में रहोगे. लेकिन यह एक तथ्य है कि दस हज़ार कदमों को लेकर अब तक बाकायदा कहीं कोई शोध नहीं हुई है. अलबत्ता हार्वर्ड मेडिकल स्कूल में मेडिसिन की प्रोफ़ेसर आई मीन ली और उनकी टीम ने सत्तर पार की सोलह हज़ार स्त्रियों पर एक शोध कर यह जानने का प्रयास अवश्य किया है कि उनके चलने और उनकी मृत्यु के बीच क्या सम्बंध है. उन्होंने भी यह पाया कि जो स्त्री जितना ज़्यादा चलती थी वो उतने ही ज़्यादा समय तक जीवित रही. लेकिन इस शोध में यह भी पता चला कि ज़्यादा चलने का लाभ केवल साढ़े सात हज़ार कदमों तक ही सीमित रहा, इससे ज़्यादा चलने पर या तो कोई अतिरिक्त लाभ नहीं हुआ या लाभ कम हो गया.  वैसे  इस शोध  के परिणामों पर विश्वास करते समय इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि यह सत्तर पार की स्त्रियों तक ही सीमित था.

कदमों की यांत्रिक गणना की अपनी सीमाएं हैं, जिन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता. पहली बात तो यह कि यंत्र के लिए बहुत तेज़ गति से चलना और एकदम धीमी गति से टहलना दोनों एक ही बात हैं. ये भी चार कदम और वो भी चार कदम. जबकि हर कोई जानता है कि धीमे और तेज़ चलने के प्रभाव व परिणाम एक से नहीं हो सकते. इसलिए कदमों की इस गणना को एक स्थूल आकलन ही माना जाना चाहिए. दूसरी ख़ास बात जिसकी तरफ ध्यान जाना ज़रूरी है वह यह है कि कदमों की यह यांत्रिक गणना आपका ध्यान उस आनंद से भटका देती है जो पैदल चलने से आपको मिलता है. यह बात ड्यूक विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान के एक प्रोफ़ेसर जॉर्डन एटकिन  ने कही है. उन्होंने एक अध्ययन कर यह बताया है कि भले ही अपने कदमों की यांत्रिक गणना करने वाले लोग चले ज़्यादा हों, उन्हें ऐसा करके आनंद कम मिला.

हमने तो सारी बातें आपके सामने रख दी हैं. अब आप खुद तै कर लें कि आपको कितने कदम चलना है, और कदम गिनकर चलना है या चलने का सच्चा आनंद लेकर चलना है!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 06 अगस्त, 2019 को  पैदल चलने की यांत्रिक गणना की सीमाएंशीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.

Tuesday, July 30, 2019

इस ऑरकेस्ट्रा के वाद्य यंत्र सब्ज़ियों से बनते हैं!


ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना (जिसका जर्मन उच्चारण वीन है) जितनी अपनी खूबसूरती के लिए जानी जाती है उतनी ही अपनी सांगीतिक विरासत के लिए भी जानी जाती है. लुडविग वान बीथोवन, वोल्फ़गांक आमडेयुस मोत्सार्ट  और योहानेस  ब्राम्स जैसे शिरोमणि संगीतकारों  की यह धरती  इधर एक विलक्षण ऑरकेस्ट्रा की वजह से चर्चा में है. अपनी विलक्षणता की वजह से यह ऑरकेस्ट्रा न केवल गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में प्रवेश पा चुका है, इसके अनुकरण भी होने लगे हैं.

निश्चय ही आप यह पढ़कर चौंक उठेंगे कि इस ऑरकेस्ट्रा के वाद्य यंत्र धातु, लकड़ी  या चमड़े की बजाय ताज़ा फलों और सब्ज़ियों से बनाए जाते  हैं और इसलिए इसका नाम ही है वेजिटेबल ऑरकेस्ट्रा. पिछले इक्कीस बरसों से दस वाद्य यंत्रों वाला यह ऑरकेस्ट्रा दुनिया भर के संगीत रसिकों को अपना सुरीला और ताज़ा सब्ज़ियों की मोहक गंध से भरा संगीत सुना कर चमत्कृत कर रहा है. अब तक यह ऑरकेस्ट्रा करीब तीन सौ शो कर चुका है और इसका हर शो हाउस फुल रहा है. ऑरकेस्ट्रा विख्यात रॉयल एलबर्ट हॉल लंदन और शांघई आर्ट्स सेण्टर में भी अपनी कला का प्रदर्शन कर चुका है. हाल  में इसने यूक्रेन के महल में पॉल मैकार्टनी के साठवें जन्म दिन पर भी अपनी स्वर लहरियां बिखेरीं. न सिर्फ़ इतना, इस ऑरकेस्ट्रा ने हाल ही में अपना चौथा एलबम भी ज़ारी किया है जिसे खूब सराहा जा रहा है.

वेजिटेबल ऑरकेस्ट्रा के संस्थापक सदस्य माथियास मायन्हार्टर बताते हैं कि इसकी शुरुआत मज़ाक-मज़ाक में हो गई. वे बताते हैं कि इस ऑरकेस्ट्रा के तीन अन्य सदस्यों के साथ वे वियना विश्वविद्यालय में आयोजित एक परफॉर्मेंस आर्ट फेस्टिवल में सहभागिता कर रहे थे. गपशप के दौरान एक सवाल यह उभरा कि किस चीज़ पर संगीत रचना सबसे ज़्यादा मुश्क़िल हो सकता है. यह एक संयोग ही था कि वे लोग उस समह सब्ज़ियों से बना सूप पी रहे थे. बात में से बात निकलती गई और इस तरह जन्म हुआ इस वेजिटेबल ऑरकेस्ट्रा का. इसका नाम वेजिटेबल ऑरकेस्ट्रा है तो यह आपने अनुमान लगा ही लिया होगा कि इसके तमाम वाद्य यंत्र सब्ज़ियों से निर्मित होते हैं.  और यह कहना अनावश्यक है कि धातु या लकड़ी की तुलना में सब्ज़ियों की अपनी बहुत अधिक सीमाएं हैं. पहली बात तो यह कि सब्ज़ियों से बने वाद्ययंत्रों की उम्र बहुत कम होती है. जैसे ही सब्ज़ी बासी होकर मुरझाने लगती है उसकी संगीत निर्माण की क्षमता भी ख़त्म होने लगती है. यही कारण है कि हर प्रस्तुति से पहले सुबह-सुबह इस ऑरकेस्ट्रा के तमाम सदस्य स्थानीय सब्ज़ी बाज़ार जाते हैं और बड़ी बारीकी से पड़ताल कर अपनी पसन्द व काम की सब्ज़ियां चुनते हैं. कद्दू, प्याज़, कुम्हड़े, बैंगन, खीरा, ककड़ी और भी न जाने क्या-क्या वे चुनते और खरीदते हैं. उनकी दिक्कत इस बात से और ज़्यादा बढ़ जाती है कि हर सब्ज़ी हर जगह नहीं मिलती. इतना ही नहीं एक जगह जो सब्ज़ी जैसी मिलती है, यह भी ज़रूरी नहीं कि दूसरी जगह भी वह सब्ज़ी वैसी ही मिले. और इन विभिन्नताओं की वजह से इन्हें बार-बार अपने वाद्य यंत्रों को लेकर प्रयोग करने पड़ते हैं. अब तक ये लोग कोई डेढ़ सौ वाद्य यंत्र इन किसम-किसम की सब्ज़ियों से बना चुके हैं. वाद्य यंत्रों की और उनसे उत्पन्न संगीत की निरंतर बदलती स्वर लहरियों के कारण ये लोग किसी रूढ़ किस्म के और लिपि बद्ध  संगीत को प्रस्तुत करने की बजाय हर बार नया कुछ रचते और प्रस्तुत करते हैं.

ताज़ा सब्ज़ियां खरीदने के बाद ये उन्हें लेकर  वहां आते हैं जहां शाम को इन्हें अपनी प्रस्तुति देनी होती है. वहां ये लाई गई सब्ज़ियों को विभिन्न चाकुओं और अन्य उपकरणों की मदद से छील-काट कर या खोखला कर वाद्य यंत्रों में बदलते हैं, उन्हें इस्तेमाल कर रिहर्सल जैसा कुछ करते हैं और फिर बड़ी सावधानी से उन सब्ज़ी निर्मित अनूठे वाद्य यंत्रों को गीले कपड़ों में लपेट कर सुरक्षित रखते हैं. इसके बाद शाम को ये उन्हीं वाद्य यंत्रों से सुरों का जादू जगाते हैं. लोग बड़ी उत्सुकता  से इन्हें देखते-सुनने आते हैं.  आने की पहली वजह तो इस ऑरकेस्ट्रा का अनूठापन ही होती है, लेकिन जैसे जैसे शाम आगे बढ़ती है, इन कलाकारों की साधना अपना जादू जगाने लगती है, लोग इनके सुरों के सम्मोहन में कैद हो जाते हैं. लेकिन जैसे-जैसे सुरों का यह कारवां आगे बढ़ता जाता है वैसे वैसे सब्ज़ियों से बने वे वाद्य यंत्र अपनी ताज़गी खोने लगते हैं. और तब एक-एक करके ये कलाकार अपने इन वाद्य यंत्रोंको श्रोताओं की तरफ उछालते हुए अपने कंसर्ट का रोचक समापन करने लगते हैं. कंसर्ट का यह आखिरी चरण श्रोताओं को दिलचस्प  भी लगता है और कारुणिक भी. बहुत सारे भावुक श्रोता तो कलाकारों से मांग-मांग कर इन वाद्य यंत्रों को बतौर स्मृति चिह्न अपने साथ ले जाते हैं. कभी-कभार  ऑरकेस्ट्रा के ये सदस्य अपने वाद्य यंत्रों को श्रोताओं को उपहार में देने की बजाय खुद ही उनका उपभोग कर लेते हैं – सूप बनाकर.

है ना रोचक बात!
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 30 जुलाई, 2019 को किंचित परिवर्तित शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, July 23, 2019

ईमानदारी हमारी कल्पना से कहीं ज़्यादा


वर्ष 2013 से 2016 के बीच चालीस देशों के तीन सौं पैंतीस शहरों में एक ख़ास शोध परीक्षण किया गया. हर देश में पांच से आठ बड़े शहर इस परीक्षण के लिए चुने गए थे. शोध कर्ताओं ने अलग-अलग जगहों पर कुल सत्रह हज़ार वॉलेट ग़लतीसे गिरा दिये. इनमें से कुछ वॉलेट्स में लगभग साढ़े तेरह अमरीकी डॉलर की समतुल्य स्थानीय मुद्रा थी. कुछ वॉलेट्स में कोई धन राशि नहीं थी लेकिन उनके स्वामीगण के नाम पते वाले बिज़नेस कार्ड्स या अन्य कुछ दस्तावेज़ थे.

भारत में भी आठ शहरों में यह शोध परीक्षण किया गया था. यहां इसका स्वरूप यह था कि अलग-अलग शोधकर्ताओं ने यह प्रदर्शित किया कि उन्हें बैंक, थिएटर, होटल, पुलिस स्टेशन, डाकघर या अदालत जैसे सार्वजनिक भवनों में कोई चार सौ वॉलेट्स पड़े मिले हैं. इन शोधकर्ताओं ने सम्बद्ध भवनों के स्वागतकर्ताओं या सुरक्षा गार्ड्स को ये वॉलेट्स सौंप दिये. इन वॉलेट्स में से कुछ में हरेक में दो सौ तीस  रुपये की करेंसी थी, तो कुछ में कोई धन राशि नहीं थी. लेकिन इन सभी वॉलेट्स में एक जैसे तीन विज़िटिंग कार्ड्स थे जिन पर सम्बद्ध व्यक्ति का नाम और उसका ईमेल  पता छपा हुआ था. इसके अलावा हर वॉलेट में एक सूची थी जिस पर खरीदी जाने वाली कुछ किराना सामग्री लिखी हुई थी और एक चाबी थी. वॉलेट्स को स्वागतकर्ताओं या सुरक्षा गार्ड्स को सौंप देने के बाद शोध परीक्षण टीम के कुछ सदस्यों ने उन वॉलेट्स के स्वामियों की भूमिका निबाहते हुए यह परखा कि कितने लोग उन वॉलेट्स को लौटाने का प्रयास करते हैं.

यह सारा शोध परीक्षण इस बात की पड़ताल के लिए था कि दुनिया में ईमानदारी किस सीमा तक मौज़ूद है. सामान्यत: तो यही माना जाता है कि लोग थोड़े से फायदे के लिए अपना ईमान धर्म सब भूल जाते हैं. लेकिन इस प्रयोग के जो परिणाम साइंस पत्रिका में प्रकाशित हुए हैं वे खासे चौंकाने वाले हैं. इन परिणामों से पता यह चलता है कि दुनिया में ईमानदारी हमारी कल्पना से कहीं ज़्यादा मात्रा में मौज़ूद है. शोधकर्ताओं का निष्कर्ष यह था कि “जैसे जैसे बेईमानी की वजह से बड़े फायदे नज़र आने लगते हैं, लोगों में ऐसा करने की आकांक्षा तीव्र होती जाती है, लेकिन इसी के साथ यह बात भी है कि लोगों में खुद को चोर के रूप में देखने का मनोवैज्ञानिक भय भी सर उठाने लगता है और बहुत बार यही भय उनकी बेईमानी करने की इच्छा पर भारी पड़ जाता है.”

अब ज़रा इस शोध के परिणामों पर भी एक नज़र डाल लेते हैं. जिन चालीस देशों में यह शोध परीक्षण किया गया उनमें से अड़तीस देशों के लोगों ने उन वॉलेट्स को लौटाने में विशेष रुचि दिखाई जिनमें पैसे थे. भारत में इस प्रयोग के तहत अहमदाबाद ,बेंगलुरु, कोयम्बटूर, हैदराबाद, जयपुर, कोलकाता, मुम्बई और दिल्ली इन आठ शहरों में तीन सौ चौदह पुरुषों और छियासी स्त्रियों ने ये वॉलेट्स विभिन्न सार्वजनिक इमारतों में स्वागतकर्ताओं या सुरक्षा कर्मियों को दिये. पाया गया कि उन लोगों ने पैसों वाले वॉलेट्स में से तियालीस प्रतिशत वॉलेट्स उनके स्वामियों को लौटा दिए, जबकि जिनमें कोई धन राशि नहीं थी उनमें से मात्र बाइस प्रतिशत वॉलेट्स ही लौटाए गए. पैसों वाले वॉलेट्स लौटाने के मामले में बेंगलुरु और हैदराबाद क्रमश: छियासठ और अट्ठाईस प्रतिशत के साथ सबसे ऊपर और सबसे नीचे रहे. बिना पैसों वाले वॉलेट्स लौटाने के मामले में कोयम्बटूर अट्ठावन  प्रतिशत के साथ अव्वल रहा. इस मामले में दिल्ली मात्र बारह प्रतिशत के साथ सबसे फिसड्डी रहा. और हां, वॉलेट्स लौटाने के मामले में स्त्रियां पुरुषों से बहुत आगे रहीं. भारत में यह प्रयोग करने वालों को कुछ रोचक अनुभव भी हुए. एक सार्वजनिक भवन के सुरक्षा प्रभारी ने यह शोध करने वाले से ही भवन में प्रवेश करने देने के लिए रिश्वत मांग ली. उस प्रभारी ने जमा कराया हुआ वॉलेट लौटाने का भी कोई प्रयास नहीं किया.

इसी प्रयोग को एक और प्रयोग से भी जोड़ कर देखा जा सकता है जिसमें एक विख्यात अमरीकी विश्वविद्यालय की डॉरमिट्री में रखे छह रेफ्रिजिरेटरों में कोका कोला के कुछ कैन रख दिये गए और कुछ रेफ्रिजिरेटरों में पेपर प्लेट्स में एक एक डॉलर के नोट रख दिये गए. बहत्तर घण्टों के बाद पाया गया कि कोका कोला की सारी कैन तो इस्तेमाल कर ली गईं लेकिन किसी ने एक भी नोट नहीं उठाया. इन प्रयोगों से एक निष्कर्ष यह भी निकलता है कि  लोग पैसों को लेकर अधिक ईमानदार होते हैं. वैसे, यह भी सोचा जा सकता है कि जिन लोगों ने बग़ैर पैसों वाले वॉलेट्स को लौटाने में दिलचस्पी नहीं दिखाई हो सकता है वे व्यस्त रहे हों, या भूल ही गए हों. फिर भी, कुल मिलाकर यह तो सही है कि दुनिया उतनी बुरी नहीं है, जितनी हम सोचते हैं!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, दिनांक 23 जुलाई, 2019 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.

Tuesday, July 16, 2019

सोलोथर्न शहर में कभी बारह नहीं बजते!


स्विटज़रलैण्ड के उत्तर पश्चिम में आरे के किनारे और वेइसेंस्टीन ज़ुरा पहाड़ियों के तल में स्थित सोलोथर्न शहर की गिनती इस देश के सबसे खूबसूरत शहरों में होती है. इतालवी भव्यता, फ्रांसिसी सौंदर्य और जर्मन व्यावहारिकता की त्रिवेणी से सज्जित यह शहर बर्न से मात्र तीस किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. सोलहवीं से अठारहवीं शताब्दी के बीच यह शहर फ्रांसिसी राजा के राजदूत का निवास स्थान भी रहा और इसलिए आज इसे राजदूत का नगरनाम से भी जाना जाता है. ये तमाम बातें अपनी जगह, और इस शहर की एक ख़ासियत अपनी जगह. और वह ख़ासियत है इस शहर का अंक ग्यारह से ख़ास लगाव. यह लगाव इतना गहरा है कि शहर  की अधिकांश निर्मितियों  और उनके डिज़ाइन में इस अंक की उपस्थिति को देखा जा सकता है. यहां चर्चों और चैपलों की संख्या ग्यारह-ग्यारह है. इस शहर में ग्यारह ऐतिहासिक फव्वारे, ग्यारह संग्रहालय और कुल ग्यारह  ही टॉवर हैं.

करीब दो हज़ार साल पहले रोमनों द्वारा बसाए गए इस शहर का सबसे बड़ा आकर्षण है यहां का सेंट उर्सूस गिरजाघर. अगर आपको इस शहर में ग्यारह की उपस्थिति का जादू देखना हो तो इस गिरजाघर से बेहतरीन जगह और कोई नहीं हो सकती. एक इतालवी वास्तुविद गेटानो मेटियो पिसोनी द्वारा इस गिरजे का निर्माण ग्यारह वर्षों में किया गया. इसमें सीढ़ियों की ग्यारह कतारें हैं. सीढ़ियों के दोनों तरफ दो भव्य फव्वारे हैं जिनमें से हरेक में ग्यारह-ग्यारह खूबसूरत नलों से पानी की धार निकलती है. गिरजे के कुल ग्यारह द्वार हैं और इसकी ऊंचाई ग्यारह-ग्यारह मीटर के तीन हिस्सों से निर्मित है. शीर्ष पर जो गुम्बद है उसमें ग्यारह घण्टे हैं जिनकी सुमधुर ध्वनि दूर से सुनाई देती है. ऐसा माना जाता है कि वास्तुविद पिसोनी को तत्कालीन सरकार ने यह आदेश दिया था कि वह इस गिरजे के निर्माण में ग्यारह का विशेष ध्यान रखे, और उसने ऐसा ही किया. इस हद तक ऐसा किया कि इस गिरजे की एक वेदी में ग्यारह प्रकार के संगमरमर प्रयुक्त किये. गिरजे में कुल ग्यारह वेदियां हैं. वहां आराधकों के बैठने के लिए जो बेंचें लगी हुई हैं वे भी ग्यारह-ग्यारह की कतार में हैं.

जब आप यह जानने का प्रयास करते हैं कि आखिर क्यों इस शहर को ग्यारह की संख्या से इतना ज़्यादा लगाव है, तो बहुत सारी व्याख्याएं सुनने को मिलती हैं. दंतकथा प्रेमी बताते हैं कि प्राचीन काल में इस शहर के निवासी बहुत कड़ी मेहनत करते थे लेकिन उन्हें उसका पुरस्कार नहीं मिलता था. तब वेइसेंस्टीन की पहाड़ियों से कुछ चमत्कारी बौने अवतरित हुए और उन्होंने इस नगर के वासियों को उनका प्राप्य दिलवाया. नगरवासियों ने उन बौनों के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए ग्यारह की संख्या को अपनाया. यह तो हुई दंतकथा. एक अन्य व्याख्या का सम्बंध यहां के लोगों की धार्मिक आस्थाओं से है. वे यह मानते थे कि ग्यारह की संख्या धार्मिक रूप से पवित्र है. अंक शास्त्र भी यह मानता है कि तमाम अंकों में से ग्यारह का अंक सर्वाधिक अंत: प्रज्ञाजन्य है और इसका सीधा रिश्ता  आस्था और  आध्यात्मिकता के साथ है. एक मत यह भी है कि धर्मशास्त्र के अनुसार देवदूतों की कुल संख्या बारह थी लेकिन उससे एक कम यानि  ग्यारह का सम्बंध और अधिक पाने की आकांक्षा से जुड़ता है. और शायद आज भी इस शहर के नागरिक यही मानते हैं कि ग्यारह को अपने जीवन में इतना महत्व देकर वे यह साबित कर रहे हैं कि वे जो है उससे बेहतर के आकांक्षी हैं. ग्यारह के प्रति इस लगाव की कुछ अन्य व्याख्याएं भी प्रचलित हैं. जिन्हें इतिहास में रुचि  है वे यह बताते हैं कि सन 1481 में सोलोथर्न शहर स्विस संघ का ग्यारहवां केण्टन (प्रांत) बना था और सोलहवीं शताब्दी  तक आते-आते यह केण्टन ग्यारह प्रोटेक्टोरेट्स (एक तरह से छोटे प्रांतों) में विभाजित हो गया था. और अधिक पड़ताल करने पर  यह भी पता चलता है कि शहर के इतिहास में ग्यारह की संख्या का पहला उल्लेख सन 1252 में मिलता है जब इस शहर के लिए जो पहली नगर परिषद बनी उसमें ग्यारह सदस्य चुने गए थे.

ग्यारह के प्रति लगाव के मूल में चाहे जो भी कारण हों, आज स्थिति यह है कि इस शहर की रोज़मर्रा की ज़िंदगी में भी ग्यारह की बहुत अधिक महत्ता है. बच्चे अपना ग्यारहवां जन्म दिन विशेष उल्लास के साथ मनाते हैं. उस दिन खास  समारोह आयोजित किया जाता है. और जब हर जगह ग्यारह का महत्व है, तो भला बाज़ार उससे कैसे अछूता रह सकता है? बीयर, चॉकलेट जैसे अनेक उत्पादों के ब्राण्ड नामों में ग्यारह की उपस्थिति देखी जा सकती है. ग्यारह वर्ष पुरानी मदिरा बहुत लोकप्रिय है. सबसे मज़ेदार बात तो यह है कि यहां के टाउन स्क्वायर पर एक विशाल घड़ी लगी हुई है. उस घड़ी के डायल पर एक से ग्यारह तक की संख्याएं ही अंकित हैं. यानि यहां कभी बारह बजते ही नहीं हैं!
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अन्तर्गत मंगलवार, दिनांक 16 जुलाई, 2019 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.  

Tuesday, July 9, 2019

यंत्रणा से गुज़रने पर कानूनी लड़ाई, ताकि कोई और न झेले


पिछले बरस न्यूयॉर्क के उत्तरी इलाके ब्रॉन्क्स की एक जेल में बंद कैदी को जब प्रसव वेदना शुरु हुई तो उसे एक नज़दीकी अस्पताल ले जाया गया. यह सामान्य बात थी, लेकिन इसमें असामान्यता यह थी कि उस महिला को बाकायदा हथकड़ी और बेड़ियों में अस्पताल ले जाया गया. वैसे, न्यूयॉर्क राज्य के कानून के अनुसार  गर्भवती कैदी को प्रसव वेदना और प्रसव के समय जंजीरों में बांध  कर नहीं रखा जा सकता, लेकिन जो पुलिस कर्मी उन्हें अस्पताल  लेकर गए उन्होंने इस निषेध की परवाह नहीं की. बाद में अपने बचाव में उन्होंने कहा कि वे तो गश्त के लिए निर्धारित निर्देशों का पालन करने को विवश थे जिसके अनुसार कैदी की सुरक्षा  सर्वोपरि होती है. और इसीलिए उस महिला को प्रसव वेदना और फिर प्रसव के दौरान भी जंजीर से बांध कर रखा गया और उसके एक हाथ की हथकड़ी को पलंग से बांधे  रखा गया.  इसी अवस्था में उस महिला ने एक बेटी को जन्म दिया.

इस महिला का प्रकरण सामने आने के बाद यह खोजबीन शुरु  हुई कि पूरे अमरीका में कुल कितनी गर्भवती स्त्रियां जेलों में हैं. और तब पता चला कि इस तरह के कोई प्रामाणिक आंकड़े उपलब्ध ही नहीं हैं. लेकिन स्थिति का थोड़ा अनुमान जॉन्स हॉपकिंस मेडिसिन द्वारा किए गए एक सर्वे के आंकड़ों से लगाया जा सकता है जिनके अनुसार सन 2016 व 2017 में संघीय व बाईस राज्य की जेलों में कम से कम चौदह सौ गर्भवती  स्त्रियां कैद थीं.  न्यूयॉर्क राज्य ने इस सर्वे के लिए भी जानकारियां उपलब्ध कराने से यह कहते हुए मना कर दिया था कि उसके पास इसके लिए समुचित स्टाफ नहीं है. वैसे, अमरीका के ज़्यादातर  राज्यों में गर्भवती महिलाओं को जंजीर से बांधे रखना वैध है. हां, इतना ज़रूर है कि डॉक्टरों और शोधकर्ताओं की इस चेतावनी के बाद कि गर्भावस्था में इस तरह का बर्ताव स्त्री और गर्भस्थ  शिशु के लिए प्राणघातक साबित हो सकता है, बहुत सारे राज्य अपने सम्बद्ध कानूनों में सुधार की दिशा में अग्रसर हो रहे हैं. पिछले बरस अमरीकी कॉंग्रेस ने संघीय जेलों और संयुक्त राज्य मार्शल सेवाओं की हिरासत में बेड़ियों के इस्तेमाल को प्रतिबंधित कर दिया था. इस बरस कई अन्य राज्यों ने गर्भवती महिलाओं को जंजीरों से जकड़ने पर रोक लगा दी है. कुछ राज्य (जैसे कैरोलिना) अभी भी इस रोक को लागू करने पर विचार  कर रहे हैं और कम से कम एक राज्य (टेनेसी) ऐसा भी है जिसने इस तरह की रोक लगाने का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया है.

जंजीर की मुखालिफत करने वाले कुछ कानूनों में  गर्भवती स्त्रियों को केवल उनकी प्रसव वेदना अथवा  प्रसव के समय जंजीर से मुक्ति देने का प्रावधान है तो  कुछ राज्यों जैसे न्यूयॉर्क में यह व्यवस्था है कि गर्भवती होने के किसी भी समय में तथा प्रसव के बाद कुछ समय तक अगर उस कैदी महिला को एक से दूसरी जगह ले जाया जाता है तो उसे जंजीर में जकड़ कर न ले जाया जाय. लेकिन करीब करीब सारे कानून यह कहते हैं कि अगर उस महिला के कारण हवाई यात्रा में किसी खतरे की आशंका हो अथवा खुद उस महिला या अन्यों  की सुरक्षा को कोई खतरा हो तो यह निषेध अप्रभावी होगा.

हम फिर उस महिला के प्रकरण पर लौटते  हैं. अपने साथ हुए व्यवहार को उस महिला ने न्यायालय में चुनौती दी. उस 28 वर्षीया अनाम महिला ने कहा कि वह नहीं चाहती है कि जिस तरह का अमानवीय व्यवहार उसे सहना पड़ा वैसा किसी भी और महिला को सहन करना पड़े. न्यायालय ने उसको सहानुभूतिपूर्वक सुना. महिला का आरोप था कि उसके साथ  किया गया बर्ताव अमानवीय था और उस से राज्य के नियमों का उल्लंघन  हुआ है.  आखिरकार न्यूयॉर्क नगर प्रशासन को उस महिला को छह लाख दस हज़ार डॉलर की मुआवज़ा राशि देकर अपना मान बचाना पड़ा. वैसे न्यूयॉर्क नगर प्रशासन ने अपनी टांग ऊपर रखते हुए यह अवश्य कहा कि उन्होंने कुछ भी ग़लत नहीं किया है. लेकिन इसी के साथ सबसे ख़ास बात यह कि इस महिला के प्रकरण के बाद वहां का पुलिस प्रशासन अपने गश्त विषयक नियमों पर पुनर्विचार करते हुए उन्हें संशोधित करने की दिशा में सक्रिय हो गया है.

न्यायालय में अपनी विजय पर हर्षित उस महिला की प्रतिक्रिया बड़ी संज़ीदा थी. उसने कहा कि उसे इस बात की खुशी है कि उसकी इस कानूनी लड़ाई के कारण भविष्य में अन्यों को उस तरह के त्रासद अनुभव से गुज़रने की यंत्रणा से मुक्ति मिल सकेगी जिस तरह के अनुभव से उसे गुज़रना पड़ा है. उसने यह भी कहा कि वो अपने परिवार जन को या किसी भी नज़दीकी व्यक्ति को वह सब नहीं बताना चाहेगी जो उसको सहना पड़ा है. वह यह भी नहीं चाहेगी कि उसकी बेटी को कभी भी यह पता चले कि उसका जन्म किन हालात में हुआ. और यही वजह है कि उसने अपना नाम गोपनीय रखने का आग्रह किया है.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न  दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, दिनांक 09 जुलाई, 2019 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.


Tuesday, July 2, 2019

किम के 'किमोनो' ब्राण्ड से जापानी आहत !


अपने देश में हम आए दिन किसी न किसी मुद्दे पर कुछ लोगों की भावनाएं आहत होने के बारे में पढ़ते सुनते रहते हैं. कभी कोई लेख, तो कभी कोई गाना तो कभी कोई फिल्म किसी न किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचा देते हैं और उसके बाद कभी धरना, तो कभी प्रदर्शन, कभी बंद तो कभी तोड़ फोड़ का सिलसिला चल निकलता है. हमें लगता था कि हमारी ही भावनाएं इतनी नाज़ुक हैं कि ज़रा-सी बात पर आहत हो जाती हैं, अब जब सुदूर जापान से वहां के निवासियों की भावनाएं आहत खोने की ख़बर आई है तो लगता है कि भावनाएं  और  जगह भी इतनी ही  नाज़ुक होती हैं.

जापानियों की भावनाएं आहत हुई हैं एक प्रख्यात अमरीकी  अभिनेत्री, मॉडल, टीवी स्टार, और व्यवसायी किम कार्दशियन की वजह से. किम को उनके एक रियलिटी शो कीपिंग अप विद द कार्दशियनस  के लिए ख़ास तौर पर जाना जाता है. किम ने हाल में भीतर पहनने वाले कपड़ों की एक बड़ी शृंखला लॉंच की है. जिस लेबल के अंतर्गत उन्होंने यह शृंखला लॉंच की है उसका नाम उन्होंने रखा है किमोनो. और यही नाम फसाद की जड़ है. असल में किमोनो एक जापानी परिधान का नाम है जिसे पारम्परिक रूप से औपचारिक अवसरों पर पहना जाता है. किमोनो एक लम्बा-सा चोगेनुमा परिधान होता है. इसकी आस्तीनें चौड़ी होती हैं और इसे  एक कमरबंद से बांधा जाता है. इसका प्रयोग प्राय: बतौर जैकेट किया जाता है. अब क्योंकि यह पारम्परिक जापानी परिधान है, बहुत सारे जापानियों को इस बात से सख़्त आपत्ति है कि एक पारम्परिक औपचारिक परिधान के नाम से भीतर पहनने वाले वस्त्र क्यों बेचे जा रहे हैं! अनेक जापानियों ने किम के इस नामकरण को उनके अज्ञान का परिचायक बताते हुए अनुपयुक्त बल्कि सांस्कृतिक रूप से अपमानजनक तक कह दिया है.

युका ओहिश नामक एक महिला ने अपनी आपत्ति इस तरह व्यक्त की है: "अपने उत्पाद/कम्पनी को एक जापानी नाम देना आपके लिए आकर्षक हो सकता है, लेकिन हम इस बात से बहुत आहत महसूस कर रहे हैं कि इस शब्द का प्रयोग एक ऐसे उत्पाद के लिए किया जा रहा है जिसका उससे कोई लेना-देना ही नहीं है. इस तरह हमारी संस्कृति को ठेस पहुंचाई जा रही है." युको कातो नामक एक जापानी पत्रकार ने लिखा कि "आपके अण्डरवियर बहुत उम्दा हैं, लेकिन पारम्परिक जापानी परिधानों से लगाव रखने वाली मुझ जैसी जापानी स्त्री के के लिए इस नामकरण का औचित्य समझ से परे है. कृपया इस नामकरण पर पुनर्विचार करें." इस पत्रकार ने अपनी आपत्ति को और स्पष्ट करते हुए आगे लिखा है, "कुल मिलाकर बात यह है कि आपने अण्डरवियरों की एक शृंखला तैयार की है और उसे 'पारम्परिक जापानी परिधान' का नाम  देकर बेच रही हैं." एक अन्य जापानी ने और उग्र होते हुए लिखा है, "जापानी संस्कृति की हत्या करने के लिए आपका आभार. लेकिन मेरी संस्कृति आपके हाथों का खिलौना नहीं है. क्या आपके मन में उन लोगों के प्रति तनिक भी  सम्मान का भाव नहीं है जो आपके परिवार के नहीं हैं? आपने इस उत्पाद को तैयार करने में पूरे पंद्रह साल लगाए हैं लेकिन इतने बरसों में आप एक भी सांस्कृतिक सलाहकार नहीं तलाश पाईं." 

इन और इस तरह की अनेक आपत्तियों का जवाब देते हुए किम ने एक बयान ज़ारी कर कहा है कि उनकी मंशा ऐसे किसी परिधान को डिज़ाइन या ज़ारी करने की नहीं है जो किसी भी तरह किसी पारम्परिक परिधान से मिलता-जुलता हो या उसका अनादर करने वाला हो. उन्होंने यह भी कहा है कि उनके मन में जापानी संस्कृति में विद्यमान किमोनो के महत्व के प्रति गहरा सम्मान है. लेकिन उन्होंने यह भी कह दिया कि अपने परिधानों की शृंखला का नाम बदलने का उनका कोई इरादा नहीं है. वैसे, जहां जापानी मूल के लोग किम की इस परिधान शृंखला के नामकरण को लेकर आहत और आक्रोशित हैं वहीं ऐसे लोग भी हैं जो खुलकर और सुविचारित तर्कों के साथ  किम का समर्थन कर रहे हैं. ऐसे लोगों में से एक हैं अमरीकी अभिनेत्री और गायिका टिया कैरेर. टिया ने लिखा है, "मैं एक फिलिपिनो हूं और मैं किमोनो पहनती हूं. मुझे यह समझ में नहीं आता कि मैं किमोनो क्यों नहीं पहन सकती? मैं जापानी कपड़े पहनती हूं, चीनी कपड़े पहनती हूं. क्या मुझे केवल फिलिपिनो वेशभूषा तक ही  सीमित रहना चाहिए? हम एक बहु-सांस्कृतिक, बहु-प्रजातीय दुनिया में जी रहे हैं. इसलिए यह बात  मेरी समझ से परे है. मैंने किम को किमोनो पहने देखा है. वो अगर अपनी कम्पनी का नाम किमोनो रखती है तो इसमें क्या ग़लत है?" टिया ने बहुत तल्ख़ होते हुए पूछा है कि आखिर हम कहां जा रहे हैं? क्या हमें हर बात के लिए सांस्कृतिक पुलिस से इजाज़त लेनी होगी?"

उनके सवाल में दम तो है!
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत  मंगलवार, दिनांक  02 जुलाई, 2019 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.



Tuesday, June 25, 2019

लड़कियां शादी के बाद सरनेम नहीं बदलना चाहती हैं !


दुनिया के ज़्यादातर समाजों और देशों में यह चलन है कि विवाह के बाद लड़की अपना कुलनाम (सरनेम)  बदल कर अपने पति का कुलनाम अपना लेती है. उदाहरण के लिए मेरी पत्नी विवाह पूर्व अपने पिता का कुलनाम गुप्ता प्रयुक्त करती थीं,  विवाहोपरान्त वे गुप्ता नहीं, अग्रवाल कुलनाम काम में लेने लगीं. भारत जैसे परम्परा प्रधान देश में इस बात का अपवाद वे लोग रहे जो कला संस्कृति आदि के ऐसे क्षेत्रों में कार्यरत थे या हैं जहां कुलनाम बदलने से पहचान का संकट पैदा हो सकता था. यही कारण है  कि कथाकार मन्नू भण्डारी (राजेंद्र यादव से विवाह के बाद भी) मन्नू यादव नहीं हुईं या सुधा अरोड़ा सुधा भाटिया नहीं हुईं. वैसे सबने ऐसा नहीं किया. बहुतों ने परम्परा का अनुसरण भी किया. लेकिन जैसे-जैसे नया सोच प्रमुखता पाने लगा, इस बात पर सवाल उठाये जाने लगे कि आखिर लड़की ही क्यों अपना कुलनाम बदले? इस सवाल का  सकारात्मक जवाब देते हुए कुछ पुरुषों ने भी विवाहोपरान्त अपना कुलनाम  बदल पत्नी का कुलनाम अंगीकार किया, और कुछ स्त्रियों ने समझौते का मार्ग अपनाते हुए अपना विवाहपूर्व का कुलनाम बरक़रार रखते हुए उसके साथ पति का कुलनाम भी जोड़ लिया. इस तरह कुछ स्त्रियों ने एक की बजाय दो कुलनाम धारण कर अपने विवाह पूर्व  के कुलनाम को भी अपने साथ जोड़े रखा. इसका एक उदाहरण अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी कुंद्रा के नाम में देखा जा सकता है. लेकिन बहुतों के लिए दो कुलनाम  अपना लेना भी स्त्री पुरुष समानता का परिचायक नहीं है. यहां एक सवाल यह भी उठता है कि पुरुष और स्त्री में से किसका कुलनाम पहले प्रयुक्त किया  जाए, और क्यों! एक व्यावहारिक दिक्कत भी इसमें है  और वह यह कि जैसे जैसे वंश आगे बढ़ता जाएगा, नाम के साथ और कुलनाम  जुड़ते जाएंगे और पांच सात पीढ़ियों के बाद तो नाम इतना लम्बा हो जाएगा कि लेख जैसा लगने लगेगा.

भारत में भले ही यह सवाल बहुत अहम न हो, पश्चिम में, जहां से स्त्री मुक्ति और स्त्री समानता का वर्तमान  विमर्श सारी दुनिया में फैला है वहां इस समस्या के नए नए समाधान खोजे जा रहे हैं और उन पर चर्चाएं भी खूब हो रही हैं. हाल में वाशिंगटन डी.सी. अमरीका की एक बत्तीस वर्षीया चीफ़ एक्ज़ीक्यूटिव शैरॉन गोल्डबर्ग ने जब योनाथन क्विक से विवाह करने का निर्णय किया तो उन दोनों ने इस मसले पर खूब गहनता से विचार विमर्श किया. उनके इस विमर्श की परिणति  इस बात में हुई कि विवाह के बाद वे दोनों अपने-अपने वर्तमान कुलनाम त्याग कर एक नए कुलनाम गोल्डक्विक का प्रयोग करने लगेंगे. ज़ाहिर है कि यह नया कुलनाम उन दोनों के वर्तमान कुलनामों का मिश्रण है. उनका सोच यह है कि अंतत: विवाह भी तो एक नए परिवार  का सृजन है, तो फिर नया कुलनाम भी क्यों न सृजित कर लिया जाए! वैसे विवाह के बाद स्त्री पति का नाम अपनाये या नहीं, इस बात को लेकर अमरीकी समाज में पर्याप्त खुलापन पहले से विद्यमान रहा है लेकिन यह खुलापन कुलनाम को अपनाने या न अपनाने तक ही सीमित रहा है. दो कुलनामों को मिलाकर नया कुलनाम रचने का यह सिलसिला अपेक्षाकृत नया है. इस बदलाव को एक और नव विवाहित युगल ने कुछ दूसरे अंदाज़ में अपनाया है. रैचेल एकॉफ ने जब ली लेविटर से विवाह किया तो उन दोनों ने अपने-अपने कुलनाम बरक़रार रखे, लेकिन यह तै किया कि उनके बच्चे एक नए कुलनाम का प्रयोग करेंगे. यह कुलनाम होगा – लेविकॉफ जो ज़ाहिर है कि इन दोनों के कुलनामों को मिलाकर बनाया गया है.

मां-बाप के कुलनाम बाद वाली पीढ़ियां भी काम में लें, यह रिवायत इंगलैण्ड में बारहवीं शताब्दी के आसपास चलन में आई थी. असल में तब वहां बहुत थोड़े से नाम चलन में थे और इस कारण किसी छोटे-से गांव में पंद्रह बीस रॉबर्ट और तीस-चालीस जेम्स मिल जाया करते थे. एक रॉबर्ट को दूसरे से अलग करके पहचानने और सम्पत्ति का सही उत्तराधिकारी निर्धारित करने के लिए कुलनाम की ज़रूरत पड़ी. अब क्योंकि स्त्रियों  को भी सम्पत्ति ही माना जाता था, वे भी पति का कुलनाम धारण करने लगीं.

लेकिन दो कुलनामों को मिलाकर नया कुलनाम बनाने से भी समस्या का समाधान नहीं हो रहा है. इसलिए नहीं हो रहा है कि बहुत सारे पुरुष (और स्त्रियां  भी) अपने वर्तमान कुलनाम से इतना गहरा जुड़ाव महसूस करते हैं कि वे उसे छोड़ना नहीं चाहते हैं. जो लोग बहुत सम्पन्न या अत्यधिक प्रतिष्ठित हैं वे भी इस बात के लिए तैयार नहीं हैं कि जिस कुलनाम से उनकी प्रतिष्ठा प्रदर्शित  होती है उसे छोड़ दें. भला कोई टाटा-बिड़ला-अम्बानी-बच्चन अपना कुलनाम कैसे छोड़ सकता है? फिर नया कुलनाम अपनाने की एक व्यावहारिक कठिनाई भी नज़र अंदाज़  नहीं की जा सकती है. कठिनाई यह कि अमरीका जैसे देशों में एक कुलनाम को त्याग कर दूसरा कुलनाम अपनाना खासा झंझट का और खर्चीला काम है.

लेकिन इन तमाम उलझनों  और असुविधाओं के बावज़ूद स्त्री समानता के पक्षधर पुरानी रिवायत को ज़ारी रखने को तैयार नहीं हैं. वैसे भी, बदलाव तो आहिस्ता-आहिस्ता ही होता है. क्या पता दो-चार सौ बरसों बाद कुलनाम लुप्त ही हो जाएं!
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गगत मंगलवार, 25 जून, 2019 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, June 18, 2019

उनके लिए तो किसी की मृत्यु भी एक व्यवसाय है!

लीजिए साहबकैलिफोर्निया की एक स्टार्ट अप कम्पनी ने लोगों के  समग्र जीवनानंत  अनुभव को नया आकार  देने का बीड़ा उठाया है. बैटर प्लेस फॉरेस्ट्स नामक इस कम्पनी ने दावा किया है कि वह जीवन के अंत के सम्पूर्ण अनुभव को पूरी तरह बदल देगी. अभी तक तो होता यह रहा है कि जैसे ही कोई व्यक्ति आखिरी सांस  लेता है उसके परिजन पारम्परिक विधि से उसके अंतिम संस्कार की तैयारियों में जुट जाते हैं. विभिन्न समाजों में  इन अंतिम संस्कारों के रूप अलग-अलग हैं. मसलन कहीं देह को सुपुर्दे  ख़ाक किया जाता है तो कहीं उसे अग्नि को समर्पित किया जाता है. पश्चिम में जहां ईसाई धर्म के मानने वाले अधिक हैंसामान्यत: शव को ताबूत में रखकर पृथ्वी को समर्पित कर दिया जाता है.

अमरीका जैसे हर चीज़ में व्यावसायिक सम्भावनाएं तलाश कर लेने वाले समाज में मृत्यु को भी एक बड़े उद्यम और व्यवसाय के रूप में स्थापित कर लिया गया है. और जब जीवन में सब कुछ पर महंगाई की मार पड़ रही है तो भला मौत पर उसका असर कैसे न हो! एक मोटे अनुमान के अनुसार हाल के बरसों में अमरीका में अंतिम संस्कार की लागत में दुगुनी वृद्धि हो चुकी है. ऐसा बताया जाता है कि अब अमरीका में एक शव के  अंतिम संस्कार की लागत सामान्यत: पंद्रह से बीस हज़ार डॉलर के आसपास होने लगी है. और जैसे इतना ही काफ़ी न होबढ़ते शहरीकरण के कारण कब्रस्तानों के लिए ज़मीन का टोटा भी होता जा रहा है. इन बातों का एक असर यह भी हुआ है कि अब बहुत सारे अमरीकी भी पारम्परिक अंतिम  संस्कार की बजाय दाह संस्कार का वरण करने लगे हैं. इस बदलाव के बावज़ूद अमरीका में अंतिम संस्कार का बाज़ार काफ़ी बड़ा है. लगभग 20 बिलियन डॉलर प्रतिवर्ष. इसी बड़े बाज़ार और घटती ज़मीन ने बैटर प्लेस फॉरेस्ट्स जैसे स्टार्ट अप को इस नवाचार के लिए प्रेरित किया है.

बैटर प्लेस फॉरेस्ट्स वाले अलग-अलग जगहों पर खूब सारी ज़मीन खरीद रहे हैं  और उस ज़मीन के छोटे-छोटे  हिस्से लोगों को इस आश्वासन के साथ बेच रहे हैं  कि उसे यथावत रखा जाएगाउसका कोई विकास नहीं किया जाएगा. विकास से यहां आशय आधुनिक निर्माण आदि से है. हांइस ज़मीन पर तरह तरह के पेड़ लगाए गए हैं और ऐसे हज़ारों पेड़ भावी मृतकों को बेचे जा चुके हैं. मौत के बाद के जीवन’  के लिए चिंतित लोग वहां जाते हैंअपनी पसंद का पेड़ चुनते  हैं और उनके नाम की एक पट्टिका वहां लगा दी जाती है. बहुत सारे लोग पेड़ विहीन ज़मीन भी चुनते हैं. ऐसे लोगों में से जब किसी का निधन होता है तो उसकी राख व अस्थियां खाद आदि के साथ मिश्रित कर उस ज़मीन में या उस पेड़ की जड़ों में डाल दी जाती है. कम्पनी का वादा है कि अगर कभी ऐसा कोई पेड़ मर गया तो उसकी जगह उसी प्रजाति का नया पेड़ लगा दिया जाएगा. कम्पनी का करोबार ठीक चल रहा है. अभी उसमें पैंतालीस लोग काम कर रहे हैं और अगर कम्पनी के दावों पर विश्वास करें तो हज़ारों लोगों ने वहां अपने अंतिम संस्कार के लिए पेड़ खरीद लिये हैं.

इस तरह अपने अंतिम संस्कार के लिए ज़मीन और पेड़ आरक्षित करने का न्यूनतम खर्च तीन हज़ार डॉलर है. इस राशि में किसी सामान्य प्रजाति का नया लगाया पौधा मिलता हैजबकि जो लोग तीस हज़ार डॉलर तक खर्च करने की हैसियत रखते हैं उन्हें दुर्लभ और महंगी  प्रजाति का  विकसित पेड़ मिल जाता है. और हांजो लोग और भी कम खर्च करना चाहते हैं वे मात्र नौ सौ सत्तर डॉलर खर्च कर किसी सामुदायिक वृक्ष की जड़ों में अपना डेरा डालने का अधिकार प्राप्त कर सकते हैं. कुछ लोग अपने लिए कोई अकेला खड़ा पेड़ चुनते हैं तो कोई मौत के बाद भी समूह में रहने की ललक के साथ समूह में लगाए गए पेड़ों में से एक का चुनाव कर लेते हैं. एक और बात. क्योंकि ज़माना तकनीक का है तो मौत के बाद भी तकनीक का दामन थामे रहा जा सकता है. जो लोग अपनी जेब थोड़ी और ढीली कर सकते हैं वे अपना एक डिजिटल मेमोरियल वीडियो भी बनवा सकते हैं ताकि जब कोई उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करने आए तो वो बारह मिनिट का यह वीडियो देख उनकी यादों में डूब सके. 

स्टार्ट अप की इस योजना की कामयाबी पर बहुतों को संशय भी है. उन्हें लगता है कि जब रात को चुपचाप जाकर किसी खाली पड़ी ज़मीन पर अपने प्रियजन के अंतिम अवशेष को निशुल्क विसर्जित किया जा सकता है तो भला इतनी बड़ी राशि कोई क्यों खर्च करेगायह देखना दिलचस्प  होगा कि मृत्यु के इस कारोबार की परिणति क्या होती है!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के  अंतर्गत मंगलवार, दिनांक 18 जून, 2019 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Wednesday, June 12, 2019

अब विवाद फ्रेंच फ्राइ के जन्म स्थान का


अपने देश में रसगुल्ले की व्युत्पत्ति को लेकर चले विवाद से हम सब भली भांति परिचित हैं. सामान्यत: यह माना जाता रहा है कि इसका जन्म बंगाल में हुआ, और हममें से बहुत सारे लोग बंगाली मिठाईके प्रतिनिधि के तौर पर रसगुल्ले को ही जानते हैं.  लेकिन इस धारणा को चुनौती  दी उड़ीसा ने. कहते हैं कि इस मिठाई का जन्म पुरी के जगन्नाथ मंदिर में हुआ था. एक प्रचलित कहानी के मुताबिक रथयात्रा के बाद जब भगवान जगन्नाथ वापस लौटे तो उन्होंने दरवाजा बंद पाया क्योंकि देवी लक्ष्मी उनसे नाराज थीं. उनकी नाराजगी इस वजह से थी कि जगन्नाथ उन्हें अपने साथ नहीं ले गए थे. रूठी देवी को मनाने के लिए जगन्नाथ ने उन्हें रसगुल्ला पेश किया और इसे पाकर देवी प्रसन्न हो गईं. रसगुल्ला उड़ीसा में 13वीं शताब्दी से बन रहा है. अभी भी रथयात्रा के बाद जब भगवान वापस मंदिर पहुंचते हैं तो रसगुल्ले ही उन्हें देवी के क्रोध से बचाते हैं. लेकिन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उड़ीसा के इन तमाम तर्कों को नकार दिया गया और पश्चिम बंगाल को जीआई टैग यानि जियोग्राफिकल इंडिकेशन दे दिया गया. यानि अब आधिकारिक रूप से यह  माना जा चुका है कि रसगुल्ले की उत्पत्ति बंगाल में हुई थी. 
हमारे रसगुल्ला विवाद का तो पटाक्षेप हो गया, लेकिन अब दुनिया के दूसरे छोर पर एक अन्य खाद्य पदार्थ को लेकर कई देश अपने-अपने दावे प्रस्तुत कर रहे हैं. यह खाद्य पदार्थ है फ्रेंच फ्राइ. जी बिल्कुल वही फ्रेंच  फ्राई जो आलू के लम्बे लम्बे टुकड़ों को तलकर तैयार की जाती है. आम तौर पर हम लोग इसे एक अमरीकी उत्पाद मानते हैं क्योंकि हमारे पास तो यह लोकप्रिय अमरीकी फास्ट फूड रेस्तराओं की श्रंखलाओं के माध्यम  से ही पहुंचा है. लेकिन इसकी वंशावली का मामला बहुत पेचीदा है. हाल में बेल्जियम ने यूनेस्को के दरबार में एक गुहार लगाई है कि फ्रेंच फ्राइ को बेल्जियन सांस्कृतिक विरासत के रूप में मान्यता प्रदान  की जाए. ज़ाहिर है कि जब गुहार लगाई है तो पर्याप्त प्रमाण और तर्क भी प्रस्तुत किए ही होंगे. इसके नाम में भले ही फ्रांस  शामिल हो, फ्राइ के इतिहास के विशेषज्ञ  बेल्जियम के एक नामी शेफ़ एल्बर्ट वर्डेयेन का कहना है कि “अमरीकी लोग इसे फ्रेंच फ्राइ कहते हैं, लेकिन यह फ्रेंच फ्राइ नहीं है. असल में तो यह फ्रेंचभाषी (बेल्जियम की) फ्राइ है.” आम धारणा भी यही है कि अपने मूल रूप में फ्राइ का जन्म फ्रेंचभाषी बेल्जियम के नामुर नगर में हुआ. असल में वहां के  निवासी तली हुई मछली के शौकीन थे. लेकिन जब 1680 की सर्दियों में वहां की मीयूज़ नामक प्रमुख नदी जम गई तो लोगों ने अपनी तली हुई मछली खाने की तलब को तले हुए आलू खाकर पूरा किया. और इस तरह इस व्यंजन का जन्म हुआ. जहां तक इसके वर्तमान नाम का सवाल है, माना जाता है कि प्रथम विश्वयुद्ध के समय फ्रेंचभाषी बेल्जियम में तैनात अमरीकी सैनिकों ने इन तले हुए आलुओं को फ्रेंच फ्राइ कहना शुरु किया और अब यही  नाम सर्व स्वीकृत है.
लेकिन पाक कला के बहुत सारे इतिहासकार इस धारणा से सहमत नहीं हैं. पियरे लेकलर्क उनमें से एक हैं. वे इस धारणा को अस्वीकार करते हुए  कहते हैं कि चाहे आप यह मान भी लें कि इस व्यंजन का जन्म नामुर में हुआ, 1680 की बात गले नहीं उतरती है क्योंकि उस इलाके में आलू 1735 से पहले होते ही नहीं थे. उनकी दूसरी असहमति तलने को लेकर है. उनका तर्क है कि अठारहवीं शताब्दी में तेल वगैरह वसा पदार्थ सामान्य जन के लिए विलासिता माने जाते थे. मक्खन बहुत महंगा था, पशु वसा दुर्लभ  थी और वनस्पतिजन्य वसा भी बड़ी कंजूसी से काम में ली  जाती थी. किसान लोग इस बेशकीमती वसा को तलने जैसे काम में बर्बाद करने की बजाय ब्रेड पर लगाकर या सूप में डालकर सीधे ही खाना ज़्यादा उपयुक्त समझते थे. पियरे लेकलर्क का कहना है कि यह बात शायद ही कभी पता चल सके कि तले हुए आलू के इस व्यंजन का आविष्कार किसने और कहां किया. लेकिन इतना निश्चित है कि यह उत्पाद फेरीवालों की देन है. और शायद  इसी वजह से इसका जन्म प्रमाण पत्र हासिल कर सकना लगभग असम्भव है.
अब बहुत सारे लोग इस पचड़े में न पड़कर मात्र यह स्वीकार कर संतुष्ट  हो जाना चाहते हैं कि जन्म इसका चाहे जहां हुआ हो, आज प्रमुखत: यह एक अमरीकी व्यंजन है क्योंकि औसतन एक अमरीकी साल में 29 पाउण्ड फ्रेंच फ्राइ उदरस्थ कर लेता है. अमरीका के पड़ोसी देश कनाडा का भी  इसकी लोकप्रियता के प्रसार में बड़ा योगदान है. वहां की एक कम्पनी फ्रोज़न फ्रेंच फ्राइ की दुनिया की सबसे बड़ी निर्मात्री है. शुक्र है कि अब तक अमरीका या  कनाड़ा से इस व्यंजन पर अपनी दावेदारी नहीं ठोकी है.
वैसे, जो फ्रेंच फ्राइ के स्वाद के दीवाने हैं उन्हें इस बात से फर्क़ भी क्या पड़ने वाला है कि इसका जन्म किस देश में हुआ! 

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत बुधवार, दिनांक 12 जून, 2019 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.