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Tuesday, July 17, 2018

ताकि बन सके मौत का आना भी एक उत्सव!


जीवन और मृत्यु शाश्वत हैं, यह बात हर कोई जानता है लेकिन इसके बावज़ूद इनमें से एक, यानि मृत्यु का खयाल ही हर किसी को विचलित कर देता है. मिर्ज़ा ग़ालिब ने क्या खूब कहा है कि मौत का एक दिन मुअय्यन (निश्चित) है/ नींद क्यों रात भर नहीं आती.  गोपालदास नीरज ने इसी बात को इस तरह कहा है: न जन्म कुछ न मृत्यु कुछ बस इतनी सी ही बात है/  किसी की आंख खुल गई किसी को नींद आ गई. लेकिन शायर और कवि चाहे जो कहें,  मृत्यु का नाम ही इतना डरावना होता है कि उसे सुनते ही हर कोई हिल जाता है. हम अपने चारों तरफ़ देखते हैं कि चलाचली की वेला में हर सम्भव प्रयास किए जाते हैं कि मृत्यु को स्थगित किया जा सके. अपनी सामर्थ्य के अनुसार  पानी की तरह पैसा बहाया जाता है, डॉक्टरों वैद्यों की चिरौरी की जाती है और अगर उस तरह की आस्था हो तो तमाम देवी देवताओं के यहां गुहार लगाई जाती है. लेकिन ग़ालिब मिथ्या  फिर भी साबित नहीं हो पाते हैं!

सारी दुनिया में स्वास्थ्य की स्थितियां सुधरती जा रही हैं, चिकित्सा सुविधाएं बेहतर होती जा रही हैं और इनके फलस्वरूप अधिक उम्र वाले लोगों की तादाद भी बढ़ती जा रही है. लेकिन जब उन्हें यमराज का बुलावा आता है तो उनके परिजन, जो स्वभावत: उनकी तुलना में युवा होते हैं, उन्हें अस्पताल ले जाते हैं और विभिन्न किस्म के जीवन रक्षक उपकरणों की सहायता से उनके जीवन के विराम  चिह्न को आगे धकेलने का हर सम्भव प्रयास करते हैं. ऐसे में बहुत बार परिवार के वृद्धजन को अपने जीवन के आखिरी दिनों का बहुत सारा हिस्सा अस्पताल के बिस्तर पर कई तरह के जीवन रक्षक उपकरणों के तारों और नलियों से घिरे हुए व्यतीत करना पड़ता है और बहुत बार वहीं से वे जीवन को अलविदा भी कह देते हैं. मृत्यु को लेकर करीब-करीब सारी दुनिया में एक ऐसी संवाद हीनता व्याप्त है कि कभी कोई अस्पताल के बेड  पर लेटे उस वृद्ध या वृद्धा से तो पूछता ही नहीं है कि आखिर वो ख़ुद क्या चाहता है!

ऐसे में ऑस्ट्रेलिया के क्वींसलैण्ड मेडिकल असोसिएशन का एक प्रस्ताव नई रोशनी लेकर आया है. असोसिएशन ने एक डेथ लैसन यानि मृत्यु के पाठ का प्रस्ताव किया है. यह पाठ किसी अतिरिक्त अथवा नए विषय के रूप में नहीं पढ़ाया जाएगा, अपितु इसकी विषय वस्तु को वर्तमान विषयों जैसे जीव विज्ञान, औषध विज्ञान और नीति शास्त्र जैसे विषयों  में ही  शामिल कर लिया जाएगा. इस विषय की ज़रूरत के बारे में बताते हुए असोसिएशन  से सम्बद्ध डॉ रिचर्ड रिड ने बताया है कि उनका उद्देश्य यह है कि युवा अपने मां-बाप और दादा-दादी से उनके जीवन के अंत को  लेकर सहजता से बात कर सकें और यह जान सकें कि वे अपना अंतिम समय किस तरह बिताना चाहते हैं. अब तक सारी दुनिया में लोग मौत के विषय पर बात करने से कतराते हैं. अगर युवाओं को इसके लिए मानसिक तौर पर तैयार कर दिया जाए तो वे इस बारे में बेहतर निर्णय कर सकेंगे कि उनके निकटस्थ परिजनों का आखिरी समय किस तरह व्यतीत हो. असल में, डॉ रिड कहते हैं कि युवा यह जानते ही नहीं है कि वे अपने निकटस्थ लोगों का आखिरी समय और ज़्यादा सुखद बना सकते हैं. अभी स्थिति यह है कि ऑस्ट्रेलिया में मात्र पंद्रह प्रतिशत लोग ही अपने घर में अपने परिवार जन के बीच रहकर आखिरी सांस  ले पाते हैं, शेष  पिच्चासी  प्रतिशत को यह छोटी-सी खुशी भी नसीब नहीं होती है और वे अस्पताल के बेगाने माहौल में ही दम तोड़ने को मज़बूर होते हैं. बहुत छोटी-सी तैयारी से उन्हें यह सुख प्रदान किया जा सकता है. डेथ लैसन इसी दिशा में उठाया गया एक क़दम है.

डॉ रिड  का सोच यह है कि स्कूली पाठ्यक्रम में बच्चों को ज़रूरी कानूनों और उनके नैतिक कर्तव्यों के बारे में तो पढ़ाया ही जाए, इच्छा मृत्यु के बारे में भी बताया जाए ताकि वे अपने परिजनों से संवाद कर यह जान सकें कि वे किस तरह का और किस हद तक इलाज़ चाहते हैं और अपने अंतिम समय के बारे में उनकी परिकल्पना क्या है. यह सब जानने के बाद परिवार के लोग जाने को तैयार बैठे अपने साथी के बारे में अधिक विवेकपूर्ण और मानवीय निर्णय कर सकेंगे, ऐसा निर्णय जो न केवल प्रियजन की इच्छा के अनुकूल हो, कानून सम्मत भी हो. डॉ रिड का खयाल है कि अगर उनका प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता है तो इससे एक बेहतर शुरुआत होगी और मेक्सिको तथा आयरलैण्ड की भांति ऑस्ट्रेलिया में भी मृत्यु अवसाद की बजाय उत्सव का विषय बन सकेगी. उल्लेखनीय है कि इन देशों में बाकायदा मृत्यु का उत्सव मनाया जाता है.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 17 जुलाई, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, August 5, 2014

हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी

हर आदमी में होते हैं    दस-बीस आदमी
 जिसको भी देखना  हो  कई बार देखना |
आज जाने क्यों निदा फाज़ली साहब का यह शे’र बहुत याद आ रहा है. क्या आपके साथ भी कभी ऐसा होता है कि बिना किसी बात के कोई बात याद आ जाए? और जब यह शे’र याद आ गया तो मुझे बहुत सारे ऐसे लोकप्रिय गायक याद आने लगे जिनकी लोकप्रियता उनके गाये बड़े हल्के, बल्कि चालू गानों की वजह से है, लेकिन आहिस्ता-आहिस्ता पता चला कि असल में तो वे बड़े संज़ीदा और गुणी गायक हैं. जब गुणी होने से  रोजी रोटी का जुगाड़ नहीं बैठा तो अपनी गाड़ी को दूसरी दिशा में ले जाने को विवश  हुए. कुछ ऐसा ही हाल हमारे  बहुत सारे कवियों का भी है. आज उनकी जो छिछोरी और लगभग अस्वीकार्य छवि बन गई है, वह कदाचित उनकी विवशता की देन है. अब इस बात पर तो बहस हो सकती है कि क्या वह विवशता वाकई विवशता थी, या अधिक वैभव पूर्ण जीवन की ललक उन्हें उस तरफ़  ले गई, लेकिन उनकी समझ, उनकी संवेदनशीलता और उनकी काबिलियत असंदिग्ध है. यह बात करते हुए मुझे अनायास काफी पुराना एक प्रसंग याद आ रहा है. अपनी नौकरी के शुरुआती बरसों में, सन सत्तर के दशक के पूर्वार्द्ध  तक  मैं चित्तौड़ में पदस्थापित रहा. उस ज़माने में चित्तौड़-भीलवाड़ा में कवि सम्मेलन खूब ही हुआ करते थे.  बहुत बड़े-बड़े कवि सम्मेलन. दस-पन्द्रह हज़ार की उपस्थिति और सारी-सारी रात चलने वाले. नीरज, काका हाथरसी, बालकवि बैरागी,  सोम ठाकुर, संतोषानंद  आदि उन दिनों कवि सम्मेलनों के सुपर  स्टार हुआ करते थे. अगर कोई कवि लालकिले पर आयोजित होने वाले कवि सम्मेलन में काव्य पाठ कर आता था तो जैसे उसके सुर्खाब के पर लग जाया करते थे.

तो हुआ यह कि किसी कवि सम्मेलन में नीरज हमारे शहर में आए. तब तक फिल्मों में भी वे काफी कामयाब हो चुके थे और हर कवि सम्मेलन में उनसे मेरा नाम जोकर, शर्मीली, प्रेम पुजारी, छुपा रुस्तम वगैरह के उनके लिखे लोकप्रिय गीतों को सुनाने की फरमाइश की जाती थी और वे भी खुशी-खुशी उन फरमाइशों को पूरा करते थे. ज़ाहिर है कि इस तरह की रचनाओं और कुछ और लोकप्रिय गीतों जैसे कारवां गुज़र गया वगैरह में ही सारा समय बीत जाता और वे  नया कुछ तो कभी सुना ही नहीं पाते. मैं उनसे मिलने गया और बातों का सिलसिला कुछ ऐसा  चला कि मैं उनसे यह कह बैठा कि कवि सम्मेलनों में उनसे  फिल्मी गाने सुन कर मुझे बहुत निराशा होती है. और भी काफी कुछ कह दिया मैंने उनसे. उन्होंने बहुत धैर्य से मेरी बातें सुनी और फिर बड़ी शालीनता से मुझसे दो बातें कही. एक तो यह कि इन सब बातों से वे भी परिचित हैं, लेकिन यह उनकी मज़बूरी है कि जिन लोगों ने अच्छे  खासे पैसे देकर उन्हें बुलाया है, उन्हें वे खुश करें. और दूसरी यह कि उनके पास भी अच्छी और नई कविताएं हैं, लेकिन उन्हें सुनने वाले कहां हैं? इसके जवाब में मैंने उनसे कहा कि सुनने वाले तो हैं लेकिन उनके पास आपको देने के लिए  बड़ी धन राशि  नहीं है. नीरज जी ने कहा कि अगर सच्चे कविता सुनने वाले मिलें तो वे बिना पैसे लिये भी उन्हें अपनी कविताएं सुनाने को तैयार हैं. उनके इस प्रस्ताव को मैंने तुरंत लपक  लिया और उन्हें अपने कॉलेज में काव्य पाठ के लिए ले गया. विद्यार्थियों से मैंने कहा कि नीरज जी बिना एक भी पैसा लिए हमारे यहां केवल इसलिए आए हैं कि हम उनसे सिर्फ और सिर्फ कविताएं सुनना चाहते हैं,  इसलिए आप उनसे कोई फरमाइश न करें. जो वे सुनाना चाहें वह सब उन्हें सुनाने दें. और आज मैं इस बात को याद करके चमत्कृत होता हूं कि नीरज जी ने लगभग दो घण्टे अपनी बेहतरीन  कविताएं सुनाईं, और मेरे विद्यार्थियों ने पूरी तल्लीनता और मुग्ध भाव से उन्हें सुना. इसके बाद मैंने ही नीरज जी  से अनुरोध किया कि हमारे विद्यार्थियों ने इतने मन से आपको सुना है, अब अगर आप इनकी पसन्द के दो एक गीत भी सुना दें तो बहुत मेहरबानी होगी. और नीरज जी की उदारता कि उन्होंने विद्यार्थियों की फरमाइश पर अपने सारे लोकप्रिय फिल्मी गीत भी एक-एक करके सुना दिए !  लेकिन उस दिन मुझे महसूस हुआ कि ‘छुपे रुस्तम हैं हम क़यामत की नज़र रखते हैं’ और ‘ओ मेरी शर्मीली’  जैसे गाने लिखने और सुनाने वाले नीरज के भीतर एक कवि उदास और इस इंतज़ार में बैठा है कि कोई आए और उससे कुछ सुनने की इच्छा ज़ाहिर करे! शायद यही हाल आज के बहुत सारे लोकप्रिय कलाकारों का भी है. लेकिन उनकी सुनता कौन है?

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अन्तर्गत मंगलवार, दिनांक 05 अगस्त 2014 को हर आदमी में  छिपे होते हैं दस-बीस आदमी शीर्षक से प्रकाशित लेख का मूल पाठ.