
जब हम छोटे थे, बार-बार पढ़ने को मिला करता था, ‘भारत एक कृषि प्रधान देश है’. तब से अब तक काफी कुछ बदल चुका है. अब अपने चारों तरफ नज़र डालता हूं तो मेरा मन करता है कि कहूं, ‘भारत निषेध प्रधान देश है’. जैसे मना करना हमारा राष्ट्रीय शौक, नहीं-नहीं स्वभाव है. आप अपने आस-पास की तमाम दीवारों को देख लीजिए. थूकना मना है, फालतू बैठना मना है, फूल तोड़ना मना है, घास पर चलना मना है, धूम्रपान करना मना है, चलती बस से शरीर का कोई अंग बाहर निकालना मना है, गंदगी फैलाना मना है, शोर करना मना है, इस पानी से हाथ धोना मना है..... और ऐसे अनगिनत निर्देश वाक्य आपको भी याद आ जाएंगे. कभी-कभी लगता है कि हमारे यहां सब कुछ करना मना ही है, कुछ भी करने की इजाज़त नहीं है. यही शायद हमारा राष्ट्रीय स्वभाव है.
लेकिन ज़रा ठहरिये. ऊपर मैंने जो वाक्य लिखे हैं, उनमें से ज़्यादातर ज़रूरी भी हैं. लोग चाहे जहां थूक देते हैं, इसलिए लिखना पड़ता है कि थूकना मना है. लोग हर कहीं कचरा फेंक देते हैं, इसलिए लिखना पड़ता है कि गन्दगी फैलाना मना है. अब यह बात अलग है कि लिखने वाले लिख कर अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेते हैं और करने वाले फिर भी अपनी मनमानी करते रहते हैं. मुझे तो यह भी लगता है कि शायद निषेधों की अतिशयता ही उन्हें निष्प्रभावी बना डालती है. अगर आप बीस बातों के लिए मना न करके सिर्फ एक या दो बातों के लिए ही मना करें तो शायद उस मना का कुछ अधिक प्रभाव भी हो.
अभी ऊपर मैंने जिन निषेधों का ज़िक्र किया वे आवश्यक निषेध हैं. लेकिन हमारे निषेध प्रेमी स्वभाव की वजह से ऐसे भी अनेक निषेध प्रचलन में आ गए हैं जिनकी वस्तुत: कोई ज़रूरत ही नहीं है. ऐसा ही एक निषेध है ‘यहां फोटो खींचना मना है’. आम तौर पर यह निषेध पर्यटन स्थलों पर देखने को मिलता है. पहले इस निषेध वाक्य को सरकारी भवनों पर भी लटकाने की परम्परा थी. मेरे शहर में बिजली घर के ग्रिड सब स्टेशन पर बहुत लम्बे समय तक फोटो खींचने की मनाही लटकी रही थी. और मैं सदा यह सोचता था कि कौन मूर्ख होगा जो इस बदसूरत निर्मिति का फोटो खींचने में अपने कम से कम दसेक रुपये (वो ज़माना डिजिटल फोटोग्राफी से पहले का था) बर्बाद करेगा! बाद में किसी ने समझाया कि सुरक्षा कारणों से यह निषेध लागू किया गया था. तब भी मुझे लगता था कि किसी को कोई विध्वंसात्मक हरक़त करने के लिए ही अगर इस निर्मिति का फोटो खींचना होगा तो क्या वो इतना मूर्ख होगा कि सामने खड़े होकर इसका फोटो खींचेगा? वो किसी अत्याधुनिक तकनीक (जैसे हवाई छायांकन) का उपयोग करके फोटो नहीं ले लेगा?
कई मन्दिरों के बाहर भी फोटो खींचने की मनाही अंकित होती है. कुछ जगहों पर पूरे मंदिर का और कुछ जगहों पर केवल देव विग्रह का छायांकन वर्जित होता है. कुछ जगहों पर कोई निषेध नहीं होता. निषेध करने वालों का तर्क यह होता है कि फोटोग्राफी करने वाले मंदिर में अपेक्षित शालीनता का उल्लंघन कर जाते हैं इसलिए उन्हें फोटोग्राफी का निषेध करना पड़ता है. यह बात उपयुक्त भी लगती है. अगर कोई उत्साही युगल देव प्रतिमा के सामने खड़े होकर किसी अंतरंग मुद्रा में फोटो खिंचवाए तो अन्य भक्तगण का बुरा मानना स्वाभाविक है. और देव प्रतिमा के सामने ही क्यों पूरे ही मन्दिर परिसर में भी ऐसा करना अवांछित माना जाएगा. जिन मन्दिरों के प्रबंधकगण किसी भी तरह का निषेध नहीं करते हैं वे शायद वहां आने वालों के विवेक पर अधिक विश्वास करते हैं.
कुछ ऐतिहासिक या पर्यटक महत्व के दर्शनीय स्थलों में इसलिए छायाचित्रांकन का निषेध कर दिया जाता है कि वहां का प्रबंधन खुद वहां के छायाचित्र बेचता है और चाहता है कि अगर आपको उस स्थल की किसी स्मृति को संजो कर ले जाना है तो आप उन्हें इसका मोल चुकाएं. कहना अनावश्यक है कि यह शुद्ध व्यावसायिक दृष्टि वाला निषेध है. कुछ अन्य जगहों पर आपको कैमरे का इस्तेमाल करने के लिए अतिरिक्त शुल्क भी देना होता है. यह भी व्यावसायिक नज़रिया ही है.
अपनी ताज़ा मैसूर यात्रा के दौरान मैंने मैसूर के विश्वविख्यात राजमहल में छायांकन का ऐसा निषेध देखा जो मुझे बहुत अटपटा लगा. असल में इसी निषेध ने मुझे यह टिप्पणी लिखने को प्रेरित भी किया. मैसूर पैलेस में प्रवेश करते ही आपको पता चल जाता है कि वहां भीतर कैमरा ले जाना मना है. प्रवेश द्वार के पास ही उन्होंने यह व्यवस्था भी कर रखी है कि आप अपने कैमरे वहां जमा करा दें. बाकायदा एक रसीद और जिस लॉकर में आपका कैमरा रखा गया है उसे बन्द करके उसकी चाबी आपको दे दी जाती है. वहां लिखा तो यह हुआ है कि यह सुविधा निशुल्क है, लेकिन उसका शुल्क लिया जाता है. शायद शुल्क लेने का निर्णय बाद का हो और सूचना पट्ट पर तदनुसार संशोधन नहीं हो पाया हो. बहरहाल, पर्यटकों के कैमरों को सुरक्षित रखने की यह व्यवस्था तो मुझे बहुत अच्छी लगी.
लेकिन मेरे मन में सवाल यह उठ रहा है कि क्या इस व्यवस्था की कोई ज़रूरत भी थी? एक पूरा कमरा और दो-तीन लोग इस व्यवस्था में लगे हुए हैं. इन लोगों की तनख्वाह पर भी ठीक-ठाक खर्च होता होगा. पर्यटक को भी कई बार अपने कैमरे जमा करवाने या उन्हें वापस लेने के लिए लम्बी कतार की यातना सहनी पड़ती होगी.
लेकिन पहला सवाल तो यही कि एक महल, जिसे आप टिकिट बेच कर और भरपूर प्रचार कर दिखा रहे हैं, अगर कोई उसके फोटो ले तो आपको आपत्ति क्यों हो? यह तो गुड़ खाये और गुलगुलों से परहेज़ करे जैसी बात हुई ना! समझने की बात तो यह है कि अगर कोई उसका फोटो खींचेगा तो वह अप्रत्यक्ष रूप से उस महल का प्रचार ही करेगा. जब भी हम अपने मित्रों परिजनों को अपनी यात्रा की तस्वीरें दिखाते हैं तो वे भी उन स्थलो के सौन्दर्य से प्रभावित हुए बग़ैर नहीं रहते हैं और उनके मन में भी उन स्थलों की यात्रा करने की चाहत जागती है. इस तरह उस स्थल का प्रचार ही होता है. फोटोग्राफी से उस इमारत का कुछ भी नहीं बिगड़ता है. फिर मनाही क्यों? शायद इसीलिए कि निषेध हमारे स्वभाव का एक अंग बन चुका है.
यहां मैंने एक बात और लक्ष्य की जिससे मुझे इस मनाही की मूर्खता पर गुस्सा भी आया और हंसी भी. इस महल में कैमरे ले जाना निषिद्ध है (हालांकि बहुत कड़ाई से तलाशी वगैरह न होने की वजह से कुछ ‘वीर’ लोग अपने कैमरे ले भी आए और उनका इस्तेमाल करते रहे) लेकिन मोबाइल पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है. अब आजकल सामान्य से सामान्य मोबाइल फोन में भी काम चलाऊ कैमरा तो होता ही है और थोड़े बेहतर मोबाइल हैण्ड सेटों में तो खासे उम्दा कैमरे होते हैं. अभी नोकिया ने तो इकतालीस मेगापिक्सल वाला कैमरा निकाल कर सबको पीछे छोड़ दिया है. लोग अपने मोबाइल कैमरों का भरपूर इस्तेमाल कर रहे थे. यानि प्रकारांतर से, रोक सिर्फ कैमरे पर थी, फोटोग्राफी पर नहीं. शायद वहां व्यवस्था करने वालों को लगा हो कि मोबाइल का भीतर ले जाना वर्जित करना व्यावहारिक नहीं होगा. लेकिन उनका ध्यान शायद इस बात पर नहीं गया कि मोबाइल से फोटोग्राफी भी की जा सकती है. और इस तरह उनका फोटोग्राफी पर रोक का इरादा महज़ एक मज़ाक बन कर रह गया.
मुझे लगता है कि अब समय आ गया है कि हमारे पर्यटक स्थलों के प्रबंधक इस बात पर खुले मन से विचार करें कि क्या फोटोग्राफी पर प्रतिबंध लगाना उचित है, और व्यावहारिक भी? अपनी विदेश यात्राओं के दौरान मैंने पाया है कि वहां फोटोग्राफी पर न केवल कोई प्रतिबंध नहीं होता है, इसके विपरीत वे लोग बाकायदा सूचना पट्ट लगाकर आपको यह और बताते हैं कि अगर आप यहां से फोटो लेंगे तो अच्छा आएगा. फोटोग्राफी के लिए अलग से पैसे ले लेने की बात भी उस ज़माने में भले ही उपयुक्त रही हो जब कैमरों का प्रचलन बहुत कम था और विशिष्ठ (और धनी ) लोग ही कैमरे रखा करते थे. अब कैमरों के सस्ते, सुलभ और आम आदमी की पहुंच में आ जाने के बाद, डिजिटल फोटोग्राफी के चलन से फोटोग्राफी के इस शौक़ के सस्ता हो जाने के बाद और मोबाइल हैण्ड सेटों में कैमरों के आ जाने की वजह से लगभग हर हाथ में कैमरा पहुंच जाने के बाद, किसी तरह के प्रतिबन्ध का कोई अर्थ ही नहीं रह गया है. और फिर प्रतिबन्ध हो भी क्यों?
और जो बात यहां मैंने फोटोग्राफी के सन्दर्भ में कही है वही बात बहुत सारे अन्य निषेधों पर भी लागू होती है. लेकिन उसकी चर्चा फिर कभी.
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जयपुर से प्रकाशित दैनिक नवज्योति में 29 जुलाई, 2012 को प्रकाशित.