क्या यह औपचारिकता संसाधनों की बरबादी नहीं है? मैं तो कई बार अपने मित्रों से मज़ाक-मज़ाक में कहा करता था कि अगर अतिथि जी को प्रति माला की दर से दस रुपये भी भेंट कर दिए जाएं तो उन्हें अधिक प्रसन्नता होगी. शायद ऐसी ही कुछ मानसिकता रही होगी, कि जब मेरा वश चला, मैंने इस माल्यार्पण की रस्म को टाला. मंच से कह दिया गया कि हम अमुक-अमुक जी का स्वागत करते हैं. अधिकांश ने इसे पसन्द किया, एकाध ने घुमा-फिरा कर अपनी अप्रसन्नता भी सम्प्रेषित की. जो भी हो, जब मेरा वश चला, मैंने माल्यार्पण की निरर्थक और फिज़ूलखर्ची वाली रस्म को टाला. मुझे याद है कि राजस्थान के एक राजनेता ने भी यह नीतिगत घोषणा कर रखी थी कि उन्हें मालाएं नहीं पहनाई जाएं. वैसे, किसी भी राजनेता के लिए ऐसी घोषणा करना कितना कठिन होगा, हम कल्पना कर सकते हैं.
ऐसे में आज जयपुर में एक आयोजन में एक सुखद अनुभव हुआ, और मेरा मन हुआ कि उसे आप सबके साथ साझा करूं. आज यहां राजस्थान प्रौढ़ शिक्षण समिति के तत्वावधान में चिल्डृन्स बुक ट्रस्ट, दिल्ली ने बाल साहित्य पर एक सेमिनार का आयोजन किया. सी बी टी ने अतिथियों का स्वागत किया, लेकिन पुष्प मालाओं से नहीं, बल्कि एक अनूठे और सार्थक तरीके से. आयोजकों ने अपने विशिष्ट अतिथिगण का स्वागत करते हुए उन्हें पुस्तक का पैकेट भेंट किया. कहना अनावश्यक है कि अतिथिगण के लिए भी उस पैकेट को (माला की तरह) टेबल पर छोड़ जाने की कोई पारम्परिक विवशता नहीं थी. हर अतिथि अपना उपहार अपने साथ ले गया. और, एक सारस्वत आयोजन में पुस्तक भेंट करके स्वागत करने से बेहतर और क्या हो सकता है, मैं तो नहीं सोच पा रहा हूं.
कितना अच्छा हो कि हम पुस्तक भेंट कर स्वागत करने की इस परम्परा को लोकप्रिय बनाएं. इससे अतिथि को आपके स्वागत के स्मृति चिह्न को लम्बे समय तक अपने साथ रखने का अवसर मिलेगा, पुस्तक संस्कृति विकसित होगी, और फूलों की बेकद्री पर रोक लगेगी.
आप क्या सोचते हैं?
