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Tuesday, April 2, 2019

चुनाव में होता है तू डाल-डाल मैं पात-पात का खेल


समय बदलने के साथ चुनाव के तौर तरीकों में भी बदलाव आया है और आता जा रहा है. कहा जाता है कि प्रेम और युद्ध में सब कुछ ज़ायज़ होता है. चुनाव भी एक तरह का युद्ध ही तो है, उसे भी लड़ा ही जाता है, और इसलिए यहां भी जायज़-नाजायज़ के बीच की सीमा रेखा बहुत पतली होती है. उसे लांघने का आकर्षण जितना दुर्निवार होता है, लांघ जाना  भी उतना ही आसान होता है. सुरक्षा के नित नए प्रबंध किये जाते हैं और उसी तेज़ी के साथ उनके तोड़ भी निकाल लिये जाते हैं. तू डाल-डाल मैं पात-पात का खेल चलता रहता है. यह समय इण्टरनेट और सोशल मीडिया  का है और आजकल चुनाव जितने ज़मीन पर लड़े जाते हैं उतने ही इन माध्यमों पर भी लड़े जाते हैं. अमरीका के राष्ट्रपति चुनाव में ही नहीं हमारे अपने देश में होने वाले बड़े और छोटे चुनावों में भी हमने इन माध्यमों का उपयोग-दुरुपयोग होते खूब देखा है. अभी हाल में  सम्पन्न हुए यूक्रेन के राष्ट्रपति के चुनाव में एक बार फिर यह मुद्दा ज़ोर-शोर से उठा है कि फ़ेसबुक का प्रयोग चुनाव परिणामों को प्रभावित करने के लिए किया जा रहा है. बात केवल प्रभावित करने की होती तो भी ठीक था. पीड़ा की बात यह रही कि इस माध्यम पर मिथ्या एवम दुष्प्रचार के लिए इस्तेमाल हो जाने के आरोप लगे. वैसे 2016 के अमरीकी चुनावों के अनुभवों से सबक लेते हुए फ़ेसबुक ने अपनी सुरक्षा व्यस्था को और ज़्यादा चाक चौबंद कर डालने के प्रयास और दावे किये. जनवरी में इसने एक सौ पचास फर्ज़ी खातों को बंद कर दिया और फिर कुछ समय बाद रूस से सम्बद्धता  रखने वाले ऐसे करीब दो हज़ार पृष्ठों, समूहों और खातों को प्रतिबंधित कर दिया जो यूक्रेन के बारे में मिथ्या सामग्री पोस्ट कर रहे थे. याद दिलाता चलूं कि यूक्रेन के मामले में रूस गहरी दिलचस्पी रखता है और उस पर प्राय: यूक्रेन  की राजनीति को प्रभावित करने के प्रयासों के आरोप लगते रहते हैं.  लेकिन अंतत: यही साबित हुआ कि ताले तो साहूकारों के लिए होते हैं, चोरों के लिए नहीं.

यूक्रेन की घरेलू गुप्तचर  सेवा एसबीयू की पड़ताल से पता चला कि फ़ेसबुक की नई सुरक्षा व्यवस्था को धता बनाने के लिए यूक्रेनी नागरिकों का ही इस्तेमाल किया गया. ऐसे यूक्रेनी नागरिकों को तलाश किया गया जो कुछ धन लेकर कुछ समय के लिए या हमेशा के लिए अपने फ़ेसबुक खातों का प्रयोग अन्यों को करने की छूट दे दें. यह एक तरह से अपने खाते को किराये पर देने की बात हुई. और इस तरह यूक्रेनी नागरिकों के फ़ेसबुक खातों से अन्य निहित स्वार्थ वाले लोग वह सामग्री पोस्ट करने लगे जिससे यूक्रेन के चुनावों पर असर पड़े. इस सामग्री में राजनीतिक विज्ञापन और दलों व प्रत्याशियों के बारे में दुष्प्रचार वाली सामग्री शामिल थी. यूक्रेन की गुप्तचर सेवा ने पता लगा लिया कि इस तरह की ज़्यादा सामग्री रूस से पोस्ट की गई, भले ही जिन खातों वह पोस्ट की गई वे यूक्रेनी नागरिकों के नाम पर थे. फ़ेसबुक की सुरक्षा में सेंध लगाने वालों  ने यूक्रेन के राष्ट्रपति पद के एक अग्रणी  प्रत्याशी ज़ेलेंस्की तक को नहीं बख़्शा. उनके असल फेसबुक खाते से मिलते-जुलते बेहिसाब फर्ज़ी खाते बना डाले गए और उन पर तमाम तरह की मिथ्या और दुर्भावनापूर्ण सामग्री पोस्ट कर दी गई. लोगों के लिए यह जानना मुश्क़िल था कि ज़ेलेंस्की का असली खाता कौन-सा है और फर्ज़ी खाता कौन-सा. शिकायत की जाने पर फ़ेसबुक ने ऐसे बहुत सारे फर्ज़ी खातों  को निष्क्रिय किया और खुद ज़ेलेंस्की की अपनी टीम ने भी इस तरह के फर्ज़ी खातों  के खिलाफ एक ज़ोरदार अभियान चलाकर इन्हें बेअसर  करने का प्रयास किया.

इस मामले पर फ़ेसबुक प्रशासन का कहना है कि जैसे जैसे हम अपनी सुरक्षा को कड़ी करते जाएंगे इसमें सेंध लगाने वाले भी नए नए तरीके इज़ाद करते जाएंगे. लेकिन इसके बावज़ूद यह सच है कि हमारा हर प्रयास इन ताकतों के इरादों को एक हद तक तो नाकामयाब  करता ही है. इस संदर्भ में उनका यह कहना भी तर्क संगत लगता है कि राजनीतिक दल भी अपने प्रतिपक्षियों के खिलाफ झूठी बातें फैलाने के लिए पेशेवर कम्पनियों वगैरह का इस्तेमाल करने से बाज़ नहीं आते हैं. फ़ेसबुक के इन कथनों की पुष्टि खुद यूक्रेन  के कुछ अधिकारियों और राजनीतिज्ञों ने भी की है और कहा है कि खुद उम्मीदवार भी अपने प्रतिपक्षियों के खिलाफ मिथ्या जानकारियां प्रसारित करने में संकोच नहीं करते हैं. इस संदर्भ में यूएनओ में रूस के प्रथम उप स्थायी प्रतिनिधि द्मित्री पोलियांस्की का यह कथन भी अर्थपूर्ण है कि सोशल मीडिया तो एक खुला मंच  है और यह बहुत स्वाभाविक है कि लोग अपने अपने हितों को साधने के लिए इसका इस्तेमाल  करें.
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ इधर के अंतर्गत मंगलवार, दिनांक चार अप्रैल 2019 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, May 20, 2014

स्वस्थ समाज और मज़बूत लोकतंत्र के लिए

देश में चुनाव सम्पन्न हो गए और नई सरकार की तस्वीर साफ हो गई है. इस बार के चुनाव कई मामलों में बेहद अनूठे रहे. वैसे तो हर बार यही कहा जाता है कि परिणाम  अप्रत्याशित रहे हैं, लेकिन इस बार के परिणाम ज़्यादा ही  अप्रत्याशित रहे हैं. इतने एक पक्षीय फैसलों की तो घोर से घोर समर्थकों ने भी आशा नहीं की थी. निश्चय ही यह उम्मीद की जानी चाहिए कि नई सरकार बिना किसी दबाव और समझौतों के काम करेगी, आम जन के जीवन को बेहतर बनाने के लिए कार्य करेगी और जनाकांक्षाओं पर खरी उतरेगी.

इस बार के चुनावी माहौल में दो बातें बहुत ख़ास रही हैं. इन चुनावों में जितनी कटुता देखने को मिली, और एक दूसरे के प्रति जितनी  ख़राब भाषा का प्रयोग किया गया वैसा अब तक कभी नहीं हुआ था. वैसे इस बार के चुनावों को लोगों के अनुपम हास्य बोध के लिए भी याद किया जाना चाहिए. अपने चहेते नेताओं और दलों के पक्ष का समर्थन करने के लिए विरोधियों को लेकर जैसे-जैसे लतीफे,  प्रसंग, कार्टून वगैरह  रचे गए वैसे और उतनी मात्रा में शायद ही पहले कभी रचे गए हों. लेकिन यहां भी अधिकतर यह प्रवृत्ति देखने को मिली कि हम तो सबका कैसा भी मखौल उड़ा सकते हैं लेकिन हमारी तरफ देखने की कोई ज़ुर्रत भी न करे! अब जब चुनाव सम्पन्न हो चुके हैं, यह उम्मीद की जानी चाहिए कि इस सब अप्रिय बातों को भुला दिया जाएगा और पूरी सद्भावना और सदाशयता के साथ काम किया और करने दिया जाएगा.

दूसरी बात जो ग़ौर तलब है वह यह कि इन चुनावों में पहली बार पर सोशल मीडिया, विशेष रूप से फेसबुक, ट्विट्टर,  वाट्सएप्प आदि  का इतने बड़े पैमाने इस्तेमाल हुआ. वैसे तो इस इस्तेमाल की पदचाप हाल ही में सम्पन्न हुए विधान सभा चुनावों में भी  काफी साफ सुनाई दी थी और एक नए जन्मे दल के लिए कहा गया था कि उसने इस माध्यम का बहुत सशक्त प्रयोग किया है, लेकिन इस संसदीय चुनाव में यह प्रयोग और बड़े पैमाने पर हुआ. लगभग सभी  राजनीतिक दलों ने बहुत योजनाबद्ध रूप से इन माध्यमों को अपने पक्ष  में इस्तेमाल किया और  इस कुशलता के साथ किया कि वे अपने समर्थकों को भावनात्मक रूप से अपने साथ इस हद तक जोड़ने में कामयाब रहे कि राजनीतिक पक्षधरता और संलग्नता निजी और पारिवारिक सम्बन्धों तक पर भारी पड़ गई. मैं कल ही यहां यहां बैंगलोर में एक ख़बर पढ़ रहा था कि दो परिपक्व और खासे शिक्षित युवाओं में बरसों पुरानी  गहरी दोस्ती सिर्फ इसी बात पर टूट गई कि उनमें से एक किसी एक राजनीतिक दल का कट्टर समर्थन कर रहा था. हम लोग जो फेसबुक पर सक्रिय हैं, उन्होंने भी यह बात लक्षित की है कि इस चुनाव के दौरान ‘अनफ्रेण्ड’ करने का कारोबार कुछ ज़्यादा ही चला है.

निश्चय ही इस पूरे सिलसिले में अपने राजनीतिक विचार के प्रति हमारी गहरी संलग्नता के साथ ही दूसरे के विचार और उसकी भावनाओं के प्रति असहिष्णुता की भूमिका को नज़र अन्दाज़ नहीं किया जा सकता है. अलग राजनीतिक विचारों का होना अस्वाभाविक और असामान्य बात नहीं है. यह तो प्रजातंत्र का मूल है. विचार वैभिन्य जितना देश या समाज में हो सकता है, उतना ही परिवार और दोस्तों के  बीच  भी हो सकता है. हम अलग-अलग विचार और पसन्द नापसन्द रखकर भी साथ रह सकते हैं, और प्रेम से रह सकते हैं – इस बात पर ज़ोर देने की बेहद ज़रूरत इन चुनावों ने महसूस कराई है. असल में, अब तक यह बात कि हमारा मत किसको जाएगा, गोपनीय रहती आई है और इस वजह से बहुत सारे टकरावों से भी हम बचे  रहे हैं. राजनीतिक दलों के प्रचारक अपना काम  करते रहे और मतदाता अमन चैन की ज़िन्दगी जीता रहा. लेकिन इस बार, कदाचित पहली बार, सोशल मीडिया पर लोगों ने अपनी पसन्द  खुलकर बताई और न सिर्फ यह किया, बल्कि जिनकी पसन्द उनसे भिन्न थी, उन पर तमाम तरह के उचित-अनुचित, सही ग़लत  प्रहार भी किए. एक तरह से आम मतदाता भी पार्टी का प्रचारक बन कर उभरा.  सारी खुराफत की जड़ यही बात  थी. अब इसके मूल में बहुत सारी बातें हो सकती हैं. हो सकता है ऐसा इसलिए हुआ हो कि देश का एक बड़ा वर्ग परिवर्तन के लिए व्याकुल था और वह उससे कम के लिए क़तई प्रस्तुत नहीं था. और भी बहुत  कुछ इसके मूल  में हो सकता है, जिसका विश्लेषण यहां प्रासंगिक नहीं होगा. लेकिन अब, जबकि वह परिवर्तन  हो चुका है, यह बहुत ज़रूरी है कि इस दौर की तमाम कटुताओं को खुले मन से विस्मृत कर दिया जाए, और न सिर्फ इतना बल्कि यह भी सोचा जाए कि भविष्य में इससे कैसे बचा जाएगा. चुनाव फिर होंगे, हर पाँच  बरस में होंगे. फिर हम किसी के पक्ष में और किसी के प्रतिपक्ष में होंगे. लेकिन हमारी पारस्परिक सद्भावना कभी आहत न हो, हमारे विचारों के कारण हमारे निजी और पारिवारिक रिश्ते तनिक भी क्षतिग्रस्त न हों, इसका ध्यान  ज़रूर रखा जाना चाहिए. यह बात एक मज़बूत  लोकतंत्र के लिए जितनी ज़रूरी है उतनी ही ज़रूरी एक स्वस्थ और परिपक्व समाज के लिए भी है.

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत 20 मई, 2014 को आम मतदाता बनकर उभरा पार्टी प्रचारक शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Wednesday, April 16, 2014

आंखों देखी बनाम कानों सुनी


अभी कल ही हैदराबाद से एक बहुत पुराने मित्र का बड़ा आत्मीयता भरा पत्र आया. उन्होंने एक अखबार की कतरन संलग्न करते हुए लिखा कि वे शीर्षक देख कर इस ‘आंखों देखी’ नामक फिल्म को देखने गए, लेकिन निराश हुए. निराश होने की वजह यह थी कि शीर्षक से उन्हें लगा था कि यह फिल्म मेरी इसी से मिलते-जुलते शीर्षक (आंखन देखी) वाली किताब पर आधारित होगी, जबकि वास्तव में ऐसा नहीं था. वैसे यह फिल्म ‘आंखों देखी’ इधर की सबसे ज़्यादा चर्चित और प्रशंसित फिल्मों में से एक है. फिल्म की प्रशंसा देश में ही नहीं विदेश में भी हुई है. इसे साउथ एशियन इण्टरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में बेस्ट फीचर फिल्म का ऑडिएंस अवार्ड भी मिला है और अब इसे 12 वें एनुअल इंडियन फिल्म फेस्टिवल ऑफ लॉस एंजेलिस (आईएफएफएलए) के अंतर्गत लॉस एंजेलिस में भी दिखाया जाएगा.

फिल्म की कहानी बड़ी रोचक है. पुरानी दिल्ली की एक संकड़ी गली के दो कमरों और एक दालान वाले छोटे-से मकान में पचास पार के बाऊजी अपने भरे-पूरे परिवार के साथ रहते हैं. जगह कम है लेकिन परिवार खुश है. हालात कुछ ऐसे बनते हैं कि बाऊजी एक दिन अचानक यह तै कर लेते हैं कि वो सिर्फ उसी बात पर यकीन करेंगे जो उन्होंने अपनी आंखों से देखी होगी. और इसके बाद उनकी ज़िंदगी दुश्वार होने लगती है. वे यह मानने को तैयार नहीं हैं कि भारत का प्रधान मंत्री कौन है, वे यह मानने को तैयार नहीं है कि आज कौन-सा वार है, वे यह मानने को तैयार नहीं हैं कि पृथ्वी गोल है, क्योंकि उन्हें लगता है कि अगर वे किसी गोले पर चलें तो गिर पड़ेंगे. वे यह भी मानने को तैयार नहीं हैं कि शेर दहाड़ता है, क्योंकि उन्होंने उसे कभी दहाड़ते हुए नहीं सुना है. वे अपनी ट्रेवल एजेण्ट की नौकरी छोड़ देते हैं क्योंकि वे किसी को एम्सटर्डम यात्रा का प्लान इसलिए नहीं बेच पाते हैं कि वे खुद कभी वहां नहीं गए हैं. उनका परिवार उनसे तंग आने लगता है. उधर उनका छोटा भाई ऋषि जिसे वे बेहद चाहते हैं, सपरिवार उनका घर छोड़ कर दूसरी जगह रहने चल जाता है. इस बात से बाऊजी बहुत आहत होते हैं और बीमार पड़ जाते हैं. जब उनकी पत्नी यह कहती है कि उनकी असली बीमारी तो यह है कि वे बोलते बहुत ज़्यादा हैं, तो वे बोलना भी बंद कर देते हैं. लेकिन इससे उन्हें लगता है कि वे चीज़ों पर ज़्यादा अच्छी तरह ध्यान केंद्रित कर पा रहे हैं.

और इसी के साथ, कुछ लोगों को यह भी लगता है कि उनकी बात में दम है, और वे एक पहुंचे हुए इंसान हैं. वे उनके अनुयायी बन जाते हैं. फिल्म में काफी कुछ घटित होता है. उस सबकी चर्चा यहां अनावश्यक है.
मैं तो यह सोच रहा हूं कि अगर हम सब भी अपनी ज़िंदगी का मूल मंत्र इस बात को बना लें कि जो अपनी आंखों से देखेंगे उसी पर विश्वास करेंगे तो क्या होगा? क्या ऐसी कोई ज़िद करने से ज़िंदगी सहज स्वाभाविक रूप से चल सकती है? कल्पना कीजिए कि कोई आपसे पूछे कि आपके पिता कौन थे, तो आप क्या जवाब देंगे? अगर आपकी यह ज़िद आपके स्कूली जीवन में ही शुरु हो जाए तो आपकी पढ़ाई का क्या होगा? इतिहास में तो आप कभी पास हो ही नहीं सकेंगे. आपने न अकबर को देखा है न अशोक को! कमोबेश भूगोल का भी यही हाल होगा. जब इस फिल्म के बाऊजी ही पृथ्वी को गोल नहीं मानते हैं तो आप भला क्यों मानने लगे?

मज़ेदार हालात तो चुनाव के दौरान पैदा होंगे. कल्पना कीजिए कि तमाम लोग इस बात का निर्वाह कर रहे हैं जो उन्होंने अपनी आंखों से देखा है वही कहेंगे और उसी पर भरोसा करेंगे, तो हमारे चुनावों के सबसे बड़े मुद्दों में से एक, भ्रष्टाचार तो जड़-मूल से ही ख़त्म हो जाएगा. आखिर किसने किसका भ्रष्टाचार देखा है? मैं तो सोच-सोचकर हैरान और हलकान हूं कि अगर ऐसा हो जाए तो चुनाव लड़ा किन बातों पर जाएगा? इस बात पर कि दो उम्मीदवारों में से कौन ज़्यादा गोरा या कौन ज़्यादा फिट है? हो सकता है तब दो या दो से ज़्यादा उम्मीदवारों के बीच खाने-पीने की या कुश्ती की प्रतियोगिता रखी जाए और इन्हीं आधारों पर उनकी जीत-हार घोषित की जाए! वैसे, अगर ऐसा हो जाए तो बुरा भी क्या है? आज चुनावों में जो कटुता, कर्कशता, भोण्डापन, भद्दापन, बदमज़गी बढ़ते जा रहे हैं, उनसे तो निज़ात मिलेगी!

आपका क्या ख़याल है?
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, दिनांक 15 अप्रेल, 2014 को जब ज़िद ने कर दिया जीना दुश्वार शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.

Tuesday, March 25, 2014

सलाम कीजिए...आली जनाब आए हैं!

कमलेश्वर के उपन्यास काली आंधीपर आधारित आंधी फिल्म में गुलज़ार साहब का लिखा हुआ एक गीत था: 'सलाम कीजिए..आली जनाब आए हैं. ये पाँच सालों का देने हिसाब आए हैं..'इन दिनों चारों तरफ़ इन्हीं  आली जनाबों की धूम है. लेकिन एक फर्क़ है. फर्क़ यह है कि आजकल आली जनाब अपने पांच सालों का हिसाब देने की बजाय दूसरों के पांच सालों का हिसाब मांगने में ज़्यादा रुचि लेते हैं. वैसे इससे कोई ज़्यादा फर्क़ नहीं पड़ता. ये लोग आपस में ही एक दूसरे को इतना बेपर्दा किए दे रहे हैं कि हिसाब देने न देने की कोई अहमियत नहीं रह गई है. इन सबके बारे में जान कर बेचारा मतदाता शायर खलिश बडौदरा की तरह सोच रहा है: ऐसे-वैसे कैसे-कैसे हो गए/ कैसे-कैसे ऐसे-वैसे हो गए! 

चुनाव के दिनों में जो कुछ भी होता है वो सब हो रहा है. जनता या देश की सेवा के लिए अपनी भूली-बिसरी ललक का यकायक याद आ जाना, टिकिटों  के लिए मारा-मारी, रूठना-मनाना, एक से दूसरे दल में आना-जाना, एक चुनाव क्षेत्र की भरपूर सेवा कर लेने के बाद दूसरे चुनाव क्षेत्र का रुख करना, कहीं टिकिट लेने के लिए तो कहीं टिकिट न लेने के लिए अजीबो-गरीब तर्क देना, अपनी कमीज़ को दूसरों की  कमीज़ से उजला बताना, अपने दागों को अच्छा साबित करना सब कुछ हो रहा है.

इनमें से हरेक अपनी जीत के प्रति पूरी तरह आश्वस्त है, या कम से कम आश्वस्त होने का दिखावा  कर रहा है, ताकि माहौल  बना रहे. टिकिट मिल जाने के बाद अपने समर्थकों के साथ जुलूस में जाकर नामांकन पत्र  दाखिल किए जाएंगे और उसके बाद पूरी विनम्रता से मतदाता को एहसास कराया जाएगा कि पितु मातु सहायक स्वामी सखाजो भी हो तुम्हीं हो. तुम्हीं  मेरे मंदिर, तुम्हीं  देवता हो. कम से कम वोटिंग मशीन पर बटन दबाने तक तो हो ही. बाद की बाद में देखी जाएगी. फिर तुम कहां, हम कहां! ढूंढते रह जाओगे!

यह सब पिछले चुनावों में भी हुआ था, उससे पिछले में भी, उससे भी पिछले में भी, और इंशाअल्लाह आगे भी होता रहेगा. और इस सबके बीच हमारा जनतंत्र परिपक्व होता रहेगा, आगे बढ़ता रहेगा, मज़बूत होता रहेगा. हम सब भी इन  सबका भरपूर आनंद लेते हैं. जब हम लोग छोटे थे तब राजनीतिक दलों वाले बिल्ले वगैरह बांटा करते थे और हम बच्चे बड़ी हसरत भरी निगाहों से दाताओं को ताका करते थे. अब जीवन स्तर ऊंचा उठ गया है, उनका भी और हमारा भी. आज बच्चे, कम आय वालों की बस्तियों के बच्चे  तक,  बिल्लों जैसी तुच्छ  चीज़ों के लिए नहीं भागते हैं. निर्वाचन विभाग ने उम्मीदवारों द्वारा किए जाने वाले खर्च की सीमा यों ही तो नहीं बढ़ाई है. चुनाव बहुत तेज़ी से हाई टेक हुए हैं. हाई टेक भी और हाई प्रोफाइल भी. अब उम्मीदवार मतदाता के दर पर आने की जहमत भी कम ही उठाते हैं. इसकी जगह बड़ी सभाओं, उनके लाइव टेलीकास्टों और सोशल मीडिया के भरपूर प्रयोग ने ले ली है. प्रचार के तरीके अधिक परिष्कृत और अधिक अप्रत्यक्ष होते जा रहे हैं. इन तमाम बातों का असर यह ज़रूर हो रहा है कि अब कम साधन सम्पन्न उम्मीदवार या दल के लिए चुनाव  जीतना तो दूर, लड़ना भी दुश्वार होता जा रहा है. बात सब आम की करते हैं, लेकिन होते ख़ास हैं. वो दिन हवा हुए जब लोग साइकिल पर घूम कर या ज़्यादा से ज़्यादा किसी जर्जर जीप पर सवार  होकर चुनाव जीत लिया करते थे. अब नेता तो  दूर रहा, कार्यकर्ता भी इन विनम्र  साधनों से काफी ऊपर उठ चुका है.

बदलाव पर आप चाहे जितना रोना-धोना कर लें, या शालीन भाषा में कहें तो विमर्श कर लें, वो होकर रहता है. उसे रोक पाना नामुमकिन होता है. लेकिन इन तमाम  बदलावों के बीच एक बात अभी भी जस की तस है, और वो है नेता और जनता का रिश्ता. आपने मरहूम अहमद फ़राज़ साहब की ये ग़ज़ल ज़रूर सुनी होगी. तमाम नामचीन गायकों ने इसे गाया है. एक दफ़ा फिर इस ग़ज़ल के चंद अशआरों को सुनिये और सुनते हुए महबूब की बजाय अपने लीडर का तसव्वुर कीजिए. शायद कुछ मज़ा आए:

रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ
, फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ

पहले से मरासिम[1] न सही, फिर भी कभी तो
रस्मो-रहे-दुनिया ही निभाने के लिए आ

किस-किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम
तू मुझसे ख़फ़ा है, तो ज़माने के लिए आ 

अब तक दिले-ख़ुशफ़हम[2] को हैं तुझसे उमीदें
ये आख़िरी शम्ऐं भी बुझाने के लिए आ

जैसे तुम्हें आते हैं न आने के बहाने 
ऐसे ही किसी रोज़ न जाने के लिए आ



[1] मेल-जोल
[2] शीघ्र बात समझ जाने वाला दिल
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत 25 मार्च, 2014 को प्रकाशित आलेख का मूल पाठ! 

Tuesday, December 10, 2013

आगे की सुध ले....

चुनावों का एक दौर  पूरा हुआ. कुछ लोगों ने इसे  सत्ता का सेमी फाइनल भी कहा. और भी बहुत कुछ कहा. लेकिन फिलहाल मैं अभिव्यक्ति  पर, शब्दों के प्रयोग पर कोई विमर्श  शुरु नहीं कर रहा हूं. इसकी बजाय दो-तीन बातों पर आप सबका ध्यान खींचना चाह रहा हूं.

पहली बात तो यह कि करीब-करीब सब जगह इस बार रिकॉर्ड मतदान  हुआ. आज़ादी के इतने बरसों बाद हमारा मतदाता जागरूक होकर अपने मताधिकार का प्रयोग करने में अधिक सजग हुआ है, यह तो खुशी की बात है ही, प्रसन्नता इस बात की भी है कि निर्वाचन विभाग ने विभिन्न संचार माध्यमों का सदुपयोग कर मतदान के पक्ष में माहौल बनाया और अन्य बहुत सारे घटकों ने इस माहौल को अपना समर्थन देकर मज़बूत किया. परिणाम हम सबके सामने है. इससे यह भी भरोसा होता है कि अगर कोई काम मन लगाकर किया जाए तो उसके परिणाम भी निश्चित  रूप से सामने आते  हैं.

दूसरी बात यह है कि इस बार चुनाव परिणाम बहुत अप्रत्याशित रहे हैं. शायद  हर दफ़ा रहते हैं, लेकिन इस बार कुछ अधिक रहे. न जीतने वालों ने इतनी बड़ी जीत की उम्मीद की थी और न हारने वालों ने इतनी बड़ी हार की आशंका मन में रखी थी. ख़ास तौर पर अपने प्रांत राजस्थान में. मीडिया के अनुमान, एक्ज़िट पोल, ओपीनियन पोल, पण्डितों की भविष्यवाणियां – सब पीछे रह गए. यह अलग बात है कि परिणाम आ जाने के बाद पण्डित लोग (मेरा मतलब है राजनीतिक पण्डित लोग) अपनी-अपनी तरह से इन परिणामों की व्याख्या करते हुए दर्शा रहे हैं कि यह तो होना ही था. मेरा मन करता है कि उनसे पूछूं कि हुज़ूर अगर आप जानते थे तो पहले क्यों नहीं बोले? लेकिन फिर लगता है कि कुछ न कुछ कहना उनकी भी तो विवशता है. अब इस विवशता में वे अगर अपनी विद्वत्ता का भी थोड़ा तड़का लगा रहे हैं, तो इसे क्षम्य माना जाना चाहिए. लेकिन ये जो परिणाम सामने आए हैं, मुझे लगता है कि ये जाने वाली सरकार के लिए तो महत्व रखते ही हैं, आने वाली सरकार के लिए उससे भी अधिक महत्व रखते हैं. इन परिणामों  के बाद हमारे जन प्रतिनिधियों को, राजनीतिक दलों को, शासकों को, सरकारों  को यह बात समझ में आ जानी चाहिए कि जनता न तो सहन करती है और न माफ़. वो अब इतनी समझदार हो गई है कि उसके हाथ में जो ताकत है उसका इस्तेमाल कर आपको अर्श पर ले जा सकती है तो फर्श पर भी पटक सकती है. यानि आप उसकी उपेक्षा न करें.

और यह बात इस बार जो सरकार बनने वाली है उसके लिए तो और अधिक महत्व रखती है. इसलिए रखती है कि आज़ादी के बाद हमारे प्रांत की यह कदाचित पहली ऐसी सरकार होगी जिसके सामने इतना छोटा विपक्ष होगा. लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका को कम करके नहीं आंका जाना चाहिए, लेकिन इस बार जनता जनार्दन ने जो जनादेश दिया है उसमें संभवत: सत्ता पक्ष को ही यह दायित्व भी सौंप दिया है कि अपने कामों की निगरानी भी वह खुद करे. यह बहुत बड़ा दायित्व है. इस सरकार को निरंकुश हो जाने के फिसलन भरे किंतु मोहक मार्ग से खुद अपना बचाव करना होगा.

कभी-कभी मुझे लगता है कि हमारे देश में किसी भी सरकार के लिए जनाकांक्षाओं की कसौटी पर खरा उतरना नामुमकिन है. अगर आप एक नागरिक के रूप में मुझसे जानना चाहें तो मेरी तमन्ना यही होगी  कि मुझसे कम से कम टैक्स लिया जाए और सरकार  मुझे ज़्यादा से ज़्यादा दे. मेरे सारे काम वो करे. आम लोगों की इस अव्यावहारिक तमन्ना को कोई पूरा नहीं कर सकता. लेकिन दो चीज़ें तो हो ही सकती हैं. एक तो यह कि टैक्स लेने और सुविधाएं देने के बीच वाज़िब संतुलन बनाया जाए, और दूसरे यह कि जनता को यह भरोसा दिलाया जाए कि जितना उससे लिया जा रहा है, उसका सदुपयोग हो रहा है. अब तक की त्रासदी यही रही है कि लोगों को लगा है कि उनसे टैक्स आदि के रूप में जो लिया जा रहा है उसका सही उपयोग नहीं हो रहा है.

और एक आखिरी बात. अब तक तो यही देखने में आया है कि चुनाव से पहले जो लोग मतदाता को यह एहसास दिलाते नज़र आते थे कि मतदाता ही सर्वोपरि है, चुनाव परिणाम आने और विजयी हो जाने के बाद  वे पहुंच से परे हो जाते हैं. जनता की सुध उन्हें पूरे पाँच बरस बाद ही आती है. जो लोग जीत कर आए हैं, उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि अब जनता इस बात को स्वीकार नहीं करने वाली है. उन्हें पूरे पाँच  बरस अपने मतदाताओं से जीवंत सम्पर्क बनाए रखना  होगा, और उनकी आशाओं-आकांक्षाओं की न केवल खोज-खबर  लेनी होगी, उनकी पूर्ति के लिए यथासम्भव  प्रयास भी करते रहना होगा. अगर ऐसा न किया गया तो जनता को 2013 को दुहराने में कोई संकोच नहीं होगा.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम 'कुछ इधर कुछ उधर' में 10 दिसम्बर, 2013  को प्रकाशित टिप्पणी का मूल आलेख.       

Tuesday, November 26, 2013

चुनावी ड्यूटियों के मज़ेदार अनुभव

राजनीतिक दलों, उम्मीदवारों और आम जनता के लिए चुनाव का चाहे जो मतलब हो, अधिकांश  सरकारी कर्मचारियों के लिए तो चुनावी ड्यूटी एक बहुत बड़े संकट का पर्याय होती है. तीन-चार दिन घर से बाहर, किसी अजनबी और सुविधा विहीन जगह पर रहना और एक ऐसे महत्वपूर्ण दायित्व का निर्वहन करना जिसमें किसी छोटी  से छोटी चूक की बहुत बड़ी सज़ा अवश्यम्भावी हो,  भला किसको रास आ सकता है? शायद यही वजह है कि हर चुनाव के समय सरकारी कर्मचारी इन ड्यूटियों से मुक्ति पाने के लिए तमाम तरह के जुगाड़ करते देखे जाते हैं. लेकिन फिर भी ड्यूटी तो करनी ही  होती  है, लोग करते भी हैं, और उसके मज़े भी लेते हैं.

अपनी तीन दशक लम्बी  नौकरी में मैंने नगरपालिका से लगाकर लोक सभा तक के तमाम चुनाव करवाए हैं. कॉलेज के चुनाव तो खैर करवाए ही हैं और अब बिना किसी संकोच के कह सकता हूं कि जिसने कॉलेज के चुनाव करवा लिए वो कहीं के भी चुनाव को दांये-बांये हाथ का नहीं, हाथ की एक उँगली का खेल समझ सकता है. हमने भी इसी भाव से तमाम चुनाव करवाए और खूब मज़े लेकर करवाए. अब पीछे मुड़ कर देखता हूं तो याद आता है कि हमें चुनाव का सबसे रोचक हिस्सा उसका प्रशिक्षण लगता था. प्रशिक्षण का दायित्व आम तौर पर प्रशासन वाले लोगों का होता था और हम कॉलेज शिक्षा  वालों और प्रशासन के बीच छत्तीस  का रिश्ता  जग जाहिर है. यह प्रशिक्षण कार्यक्रम हमें उन लोगों की खिंचाई का अवसर देता था.

पढ़ाने लिखाने वालों में किताबों को चाट जाने का शौक तो होता ही है. हमारे कुछ साथी भी चुनाव की मार्ग दर्शिका को लगभग घोट कर पी जाया करते थे. और उसके बाद वे प्रशिक्षण कार्यक्रम में प्रशिक्षण देने वालों से वो वो बारीक सवाल करते कि  उनसे जवाब देने नहीं बनता. एक बार हुआ यह कि जो सज्जन प्रशिक्षण दे रहे थे, उनके पास हमारी शंका का कोई तर्कपूर्ण समाधान नहीं था. लेकिन वे अपनी कमी तो भला कैसे स्वीकार करते! तो उन्होंने बड़े आत्मविश्वास के साथ हमारे प्रश्नकर्ता साथी को कहा कि अगर वैसी स्थिति आए तो आपको अपना कॉमन सेंस इस्तेमाल करना चाहिए. उनका उत्तर अपनी जगह सही था,  और हम सब करते भी यही हैं. लेकिन यहां तो बात मज़े लेने की थी ना! सवाल करने वाले हमारे साथी अपनी जगह से उठे, दो कदम आगे बढ़े, इधर-उधर देखा और बोले, “वो तो हम कर ही लेंगे, लेकिन आप तो यह बताइये कि इस बारे में ऑफिशियल प्रावधान क्या है?” और जैसे ही उन्होंने अपनी बात पूरी की, हममें से भी बहुत सारे लोग उनकी हां में हां मिलाते हुए उठ खड़े हुए. कलक्टर महोदय ने जैसे-तैसे बात को सम्भाल कर मामले का पटाक्षेप किया. 

अपनी नौकरी के उत्तर काल में जब अपनी वरिष्ठता के चलते मुझे ज़ोनल मजिस्ट्रेट के रूप में चुनाव ड्यूटी करने का मौका मिलने लगा  तो एक साथी ने एक मज़ेदार पाठ पढ़ाया. ड्यूटी के बाद हमको एक प्रतिवेदन भरना होता है जिसमें यह बताना होता है कि अपने दायित्व निर्वहन के दौरान हमें किन-किन परेशानियों से रू- ब- रू होना पड़ा और हमने उन स्थितियों में क्या किया. हम लोग आम तौर पर ‘कोई परेशानी नहीं आई’ लिखकर काम चलाते रहे. लेकिन एक मित्र ने, शायद अपने अर्जित अनुभव के आधार पर हमें सलाह दी कि हम ऐसा कभी नहीं लिखें. उन्होंने कहा कि हम ऐसा कुछ लिखें कि  वहां दो या अधिक गुटों के बीच पारस्परिक तनाव की वजह से स्थिति काफी विकट हो गई थी, लेकिन ‘अधोहस्ताक्षरकर्ता’ ने अपनी सूझ-बूझ का इस्तेमाल कर स्थिति को  सम्हाल लिया. ज़ाहिर है कि ऐसी  इबारत बिना किसी प्रमाण के लिखी जा सकती है. और इससे सम्बद्ध अधिकारी अप्रत्यक्ष रूप से बहुत दक्ष भी घोषित हो जाता है.   

एक और प्रसंग याद आता है. चुनाव करवा कर जब लौटते हैं तो स्वाभाविक है कि सारे लोग बहुत हैरान-परेशान और थके-मांदे होते हैं. चुनाव की सामग्री  और मत पेटियां वगैरह जमा करवाना शायद सबसे कठिन काम होता है. भीड़भाड़, धक्का-मुक्की और हरेक को ‘पहले मैं’ की जल्दी. प्रशासनिक अमले की अपनी दिक्कतें होती हैं. हम लोग भी रात नौ-साढ़े नौ बजे चुनाव करवा कर लौटे थे और अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे. तभी हमारे एक वरिष्ठ साथी भी मतदान सम्पन्न करवा कर लौटे. देखा कि सामान जमा करवाने में काफी देर लगने वाली है, तो सीधे उच्चाधिकारियों के पास पहुंचे  और बोले कि देखिये, मुझे रात को दिखाई नहीं देता है, इसलिए मैं तो घर जा रहा हूं. जब आपको सुविधा हो अपनी सामग्री मेरे घर से मंगवा लेना. उनका इतना कहना था कि जैसे पूरे अमले में बिजली दौड़ गई. सभी जानते हैं कि अगर एक भी मत  पेटी जमा होने से रह जाए तो कैसा हड़कम्प मचता है! अफसरों ने अतिरिक्त व्यवस्था  करके सबसे पहला उनका सामान जमा किया, और वे हम सबको हिकारत की नज़रों से देखते हुए विजयी  भाव से प्रस्थान कर गए.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक 'न्यूज़ टुडै' में आज दिनांक 26 नवम्बर, 2013 को प्रकाशित हुए मेरे साप्ताहिक कॉलम 'कुछ इधर कुछ उधर' के अंतर्गत प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, October 22, 2013

महाभोज जारी आहे....

महाभोज जारी आहे...

चुनाव का बिगुल बज गया है. योद्धा अपने-अपने हथियार लेकर और जिरह बख्तर धारण कर युद्ध के लिए तैयार हो गए हैं. अभी वार्मिंग अप चल रहा है. असल युद्ध तो थोड़ा दूर है. पहले युद्ध होगा, फिर महायुद्ध. युद्ध बोले तो विधान सभा के चुनाव, और महायुद्ध बोले तो लोक सभा के चुनाव. वैसे आजकल यह युद्ध शब्द इतना लोकप्रिय हो चला है कि सब जगह युद्ध ही होता है. सुरों का युद्ध, शब्दों का युद्ध और यहां तक कि पकवान बनाने का भी युद्ध! ऐसे में चुनाव जो कि लड़ा जाता है, वो तो युद्ध है ही.  जब युद्ध होगा तो शोर-शराबा (यलगार हो!) भी होगा, खून-खराबा भी होगा और मार-काट भी होगी. तैयारियां जारी है. शोर-शराबा शुरु हो ही चुका है. शब्दों के तीर-तलवार-गोले-बम सब चल रहे हैं. आक्रमण  और प्रति आक्रमण जारी हैं. एक पक्ष दूसरे पर वार करता है तो दूसरा पक्ष पहले पर पलट वार करता है. एक पक्ष गरजता है, जवाब में दूसरा पक्ष बरसता है. रोज़ यह हो रहा है. रण भूमि हैं अख़बार और टेलीविज़न का पर्दा. एक पक्ष अपने शब्द बाण छोड़ता है तो हमें पता चल जाता है कि दूसरा पक्ष कितना पतित है, लेकिन दूसरे ही दिन जब दूसरा पक्ष अपने तरकश के तीर चलाकर  इस पक्ष के कपड़े तार-तार करता है तो हमें पता लगता है  कि कम तो यह पक्ष भी नहीं है. नागनाथ – सांपनाथ वाला मामला है.  और इन्हीं अधमों-पतितों-निकम्मों-नाकारों-बेगैरतों वगैरह में से किसी को हमें अपना बहुमूल्य वोट देना है. मुझे लगता है कि मतदान का दिन आते-आते तो हम अपने तमाम उम्मीदवारों के बारे में, उनके प्रतिपक्षियों की कृपा से,  इतना ज़्यादा जान जाएंगे कि बजाय किसी को वोट देने के नोटा (उपर्युक्त में से कोई नहीं) के विकल्प का प्रयोग  करना ही ज़्यादा सही लगेगा.

लेकिन क्या यह नोटा का विकल्प स्थिति में कोई बदलाव लाएगा? क्या आपके-मेरे और अपन जैसे बहुत सारों के ‘इनमें से कोई नहीं’ विकल्प को चुन लेने से इनमें से किसी एक का चुना जाना रुक जाएगा? कोई न कोई चुना तो फिर भी जाएगा! बस इतना-सा फर्क़ पड़ेगा कि चुनाव के बाद आने वाली खबरों में एक इबारत और जुड़ जाएगी, कि इतने प्रतिशत मतदाताओं ने इनमें से किसी को भी योग्य नहीं पाया! यानि किसी को न चुनने से तो किसी ऐसे  उम्मीदवार को जो हमारे मानदण्डों पर सबसे ज़्यादा खरा साबित हो रहा हो, चुनना ही बेहतर होगा.

अभी के तमाम शोर-शराबे में मुझे बार-बार मन्नू भण्डारी का लोकप्रिय उपन्यास ‘महाभोज’  याद आ रहा है. सरोहा नामक एक गांव में एक दलित युवक बिसेसर की हत्या हो जाती है. इस मामूली आदमी की हत्या अचानक महत्वपूर्ण इसलिए हो जाती है कि डेढ महीने बाद ही वहां विधानसभा की एक खाली सीट के लिए उपचुनाव होना है. मैदान में एक तरफ दा साहब और उनके समर्थक हैं तो दूसरी तरफ सुकुल बाबू और उनके समर्थक. ये लोग किस निर्ममता से उस बेचारे बिसेसर की मौत को अपने लिए एक महाभोज में तब्दील  कर देते हैं यही इस उपन्यास का कथ्य है. आज जब अपने नेताओं की ज़बानी मैं यह सुनता हूं कि इस पक्ष ने यह नहीं किया और उस पक्ष ने वो नहीं किया, इसने ग़रीबी नहीं हटाई और उसने महंगाई कम नहीं की, इसने मस्जिद नहीं बचाई और उसने मन्दिर नहीं बनाया, तो मुझे यही एहसास होता है कि मैं, इस देश का आम नागरिक,  खेत में पड़ी एक लाश हूं और ऊपर आकाश में बहुत सारे गिद्ध मुझे अपना जीमण बनाने को मेरे सर के ऊपर मण्डरा रहे हैं! 


बस एक चुप-सी लगी है....

इन दिनों निर्वस्त्र करने का अभियान ज़ोरों पर है. पहले एक बाबा जी का नम्बर लगा, फिर उनके सपूत का. वो वो बातें सामने आईं कि दिल दहल गया. लेकिन जिस समय में हम रह रहे हैं उसमें सच और झूठ के बीच अंतर करना बहुत मुश्क़िल हो गया है. अगर बाबा जी पर आरोप लगाने वाले तमाम संचार माध्यमों पर अपनी बात कह रहे हैं  तो ऐसे भी लोगों की कमी नहीं है जो इन तमाम आरोपों के मूल में किसी मां-बेटे का ‘हाथ’  देख रहे हैं. वैसे अपने देश में यह आम परम्परा है. जब भी किसी पर कोई आरोप लगता है,  मैं इंतज़ार करने लगता हूं कि अब कोई न कोई वीर पुरुष (या वीरांगना) आकर यह कहेगा/कहेगी कि यह सब अमुक का रचा हुआ षड़यंत्र है. और मुझे निराश नहीं होना पड़ता है. नेताओं और बाबाओं के बाद इस बार बहुत दिन बाद साहित्य के एक बाबा का भी नम्बर लगा. इन दिनों पत्र-पत्रिकाओं से ज़्यादा चहल-पहल फेसबुक और ट्विट्टर पर रहती है. तो पिछले दिनों इसी  सोशल मीडिया पर हिन्दी के एक जाने-माने कथाकार और स्त्री विमर्श के पुरोधा के बर्ताव को लेकर खूब हो-हल्ला हुआ. असल में हुआ यह कि एक युवा कथाकार ने एक लम्बा वक्तव्य जारी कर अपने साथ हुए दुर्व्यवहार के सन्दर्भ में इस वरिष्ठ कथाकार की स्त्री-विषयक संवेदनहीनता को रेखांकित किया. फिर तो कढ़ी में उबाल आना ही था. एक अन्य चर्चित यात्रा वृत्तांतकार ने इस पूरे वृत्तांत को दूसरे एंगल से देखा-दिखाया और उसके बाद बहुत सारे शब्द वीर मैदान में कूद पड़े. साहित्य पीछे रह गया, चर्चा के केन्द्र में साहित्यकार, उनके शब्द और कर्म के बीच का अंतर, उनकी नैतिकता, उनका सामाजिक चिंतन  जैसे मुद्दे आ गए. वो-वो बारीक बातें की गईं कि अपने अनपढ़ होने का एहसास शिद्दत से होने लगा. इस सारे विमर्श की ख़ास बात यह रही कि युवा कथाकार ने तो विस्तार से अपनी बात कही, लेकिन वरिष्ठ कथाकार अब तक मौन व्रत धारण किए हैं. जब तक उनका पक्ष सामने नहीं आ जाता, तस्वीर धुंधली ही रहेगी. जिज्ञासु हंसों को नीर-क्षीर विवेक के लिए वरिष्ठ कथाकार की पत्रिका के अगले अंक का बेसब्री से इंतज़ार है.   


जयपुर से प्रकाशित अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत 22 अक्टोबर, 2013 को किंचित सम्पादित रूप में प्रकाशित टिप्पणियों का मूल रूप.