Wednesday, April 16, 2014

आंखों देखी बनाम कानों सुनी


अभी कल ही हैदराबाद से एक बहुत पुराने मित्र का बड़ा आत्मीयता भरा पत्र आया. उन्होंने एक अखबार की कतरन संलग्न करते हुए लिखा कि वे शीर्षक देख कर इस ‘आंखों देखी’ नामक फिल्म को देखने गए, लेकिन निराश हुए. निराश होने की वजह यह थी कि शीर्षक से उन्हें लगा था कि यह फिल्म मेरी इसी से मिलते-जुलते शीर्षक (आंखन देखी) वाली किताब पर आधारित होगी, जबकि वास्तव में ऐसा नहीं था. वैसे यह फिल्म ‘आंखों देखी’ इधर की सबसे ज़्यादा चर्चित और प्रशंसित फिल्मों में से एक है. फिल्म की प्रशंसा देश में ही नहीं विदेश में भी हुई है. इसे साउथ एशियन इण्टरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में बेस्ट फीचर फिल्म का ऑडिएंस अवार्ड भी मिला है और अब इसे 12 वें एनुअल इंडियन फिल्म फेस्टिवल ऑफ लॉस एंजेलिस (आईएफएफएलए) के अंतर्गत लॉस एंजेलिस में भी दिखाया जाएगा.

फिल्म की कहानी बड़ी रोचक है. पुरानी दिल्ली की एक संकड़ी गली के दो कमरों और एक दालान वाले छोटे-से मकान में पचास पार के बाऊजी अपने भरे-पूरे परिवार के साथ रहते हैं. जगह कम है लेकिन परिवार खुश है. हालात कुछ ऐसे बनते हैं कि बाऊजी एक दिन अचानक यह तै कर लेते हैं कि वो सिर्फ उसी बात पर यकीन करेंगे जो उन्होंने अपनी आंखों से देखी होगी. और इसके बाद उनकी ज़िंदगी दुश्वार होने लगती है. वे यह मानने को तैयार नहीं हैं कि भारत का प्रधान मंत्री कौन है, वे यह मानने को तैयार नहीं है कि आज कौन-सा वार है, वे यह मानने को तैयार नहीं हैं कि पृथ्वी गोल है, क्योंकि उन्हें लगता है कि अगर वे किसी गोले पर चलें तो गिर पड़ेंगे. वे यह भी मानने को तैयार नहीं हैं कि शेर दहाड़ता है, क्योंकि उन्होंने उसे कभी दहाड़ते हुए नहीं सुना है. वे अपनी ट्रेवल एजेण्ट की नौकरी छोड़ देते हैं क्योंकि वे किसी को एम्सटर्डम यात्रा का प्लान इसलिए नहीं बेच पाते हैं कि वे खुद कभी वहां नहीं गए हैं. उनका परिवार उनसे तंग आने लगता है. उधर उनका छोटा भाई ऋषि जिसे वे बेहद चाहते हैं, सपरिवार उनका घर छोड़ कर दूसरी जगह रहने चल जाता है. इस बात से बाऊजी बहुत आहत होते हैं और बीमार पड़ जाते हैं. जब उनकी पत्नी यह कहती है कि उनकी असली बीमारी तो यह है कि वे बोलते बहुत ज़्यादा हैं, तो वे बोलना भी बंद कर देते हैं. लेकिन इससे उन्हें लगता है कि वे चीज़ों पर ज़्यादा अच्छी तरह ध्यान केंद्रित कर पा रहे हैं.

और इसी के साथ, कुछ लोगों को यह भी लगता है कि उनकी बात में दम है, और वे एक पहुंचे हुए इंसान हैं. वे उनके अनुयायी बन जाते हैं. फिल्म में काफी कुछ घटित होता है. उस सबकी चर्चा यहां अनावश्यक है.
मैं तो यह सोच रहा हूं कि अगर हम सब भी अपनी ज़िंदगी का मूल मंत्र इस बात को बना लें कि जो अपनी आंखों से देखेंगे उसी पर विश्वास करेंगे तो क्या होगा? क्या ऐसी कोई ज़िद करने से ज़िंदगी सहज स्वाभाविक रूप से चल सकती है? कल्पना कीजिए कि कोई आपसे पूछे कि आपके पिता कौन थे, तो आप क्या जवाब देंगे? अगर आपकी यह ज़िद आपके स्कूली जीवन में ही शुरु हो जाए तो आपकी पढ़ाई का क्या होगा? इतिहास में तो आप कभी पास हो ही नहीं सकेंगे. आपने न अकबर को देखा है न अशोक को! कमोबेश भूगोल का भी यही हाल होगा. जब इस फिल्म के बाऊजी ही पृथ्वी को गोल नहीं मानते हैं तो आप भला क्यों मानने लगे?

मज़ेदार हालात तो चुनाव के दौरान पैदा होंगे. कल्पना कीजिए कि तमाम लोग इस बात का निर्वाह कर रहे हैं जो उन्होंने अपनी आंखों से देखा है वही कहेंगे और उसी पर भरोसा करेंगे, तो हमारे चुनावों के सबसे बड़े मुद्दों में से एक, भ्रष्टाचार तो जड़-मूल से ही ख़त्म हो जाएगा. आखिर किसने किसका भ्रष्टाचार देखा है? मैं तो सोच-सोचकर हैरान और हलकान हूं कि अगर ऐसा हो जाए तो चुनाव लड़ा किन बातों पर जाएगा? इस बात पर कि दो उम्मीदवारों में से कौन ज़्यादा गोरा या कौन ज़्यादा फिट है? हो सकता है तब दो या दो से ज़्यादा उम्मीदवारों के बीच खाने-पीने की या कुश्ती की प्रतियोगिता रखी जाए और इन्हीं आधारों पर उनकी जीत-हार घोषित की जाए! वैसे, अगर ऐसा हो जाए तो बुरा भी क्या है? आज चुनावों में जो कटुता, कर्कशता, भोण्डापन, भद्दापन, बदमज़गी बढ़ते जा रहे हैं, उनसे तो निज़ात मिलेगी!

आपका क्या ख़याल है?
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, दिनांक 15 अप्रेल, 2014 को जब ज़िद ने कर दिया जीना दुश्वार शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.
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