Tuesday, April 22, 2014

क़िस्सा एक अति उत्साही शायर का

आज आपसे एक पुराना अनुभव साझा कर रहा हूं.  बात काफी पुरानी है. मैं एक कस्बाई कॉलेज में हिन्दी प्राध्यापक था और जैसा कि हिन्दी प्राध्यापकों के साथ आम तौर पर होता है, जहां भी कोई संयोजन वगैरह करना  होता, मुझे याद कर  लिया जाता था. उस कस्बे में हर बरस शिक्षक दिवस और कौमी एकता दिवस  पर जन सम्पर्क विभाग एक छोटी-मोटी कवि गोष्ठी  आयोजित करता था, जिसे सम्मानपूर्वक कवि सम्मेलन कहकर पुकारा जाता था. कस्बे के और आस-पास के तमाम नवोदित, उभरते हुए, स्थापित और वरिष्ठ कवि-शायर वगैरह इनमें शिरकत करते. वो ज़माना टेलीविज़न के आने से पहले का था और उस छोटे कस्बे  में लोगों के पास मनोरंजन के दूसरे कोई खास विकल्प भी नहीं थे इसलिए श्रोता भी काफी  जुट जाते थे. अब कह सकता हूं कि अगर तीस  कवि-शायर इनमें सहभागिता करते तो उनमें से दो-तीन ही स्तरीय होते, शेष तो बस होते थे!

उस साल भी,  पिछले कई सालों की तरह शिक्षक दिवस पर कवि गोष्ठी का संचालन करने का दायित्व मुझे ही दिया गया था. कुछ कवि-शायरों से मैंने अनुरोध किया था कि वे अपनी रचनाएं सुनाएं, और बहुतों ने मुझसे अनुरोध किया था कि वे भी अपनी रचना सुनाना चाहते हैं. इस तरह रचना पाठ करने वालों की काफी बड़ी लिस्ट हो गई थी. छोटे कस्बों की परम्परानुसार मां सरस्वती की तस्वीर के आगे दीप प्रज्ज्वलन और मुख्य अतिथि की शान में कसीदे वगैरह पढ़ने के बाद गोष्ठी शुरु हुई. उस दिन मुख्य अतिथि को फूलों की माला नहीं पहनाई जा सकी, क्योंकि बाज़ार  में उस दिन ढूंढे से भी फूल माला नहीं मिल सकी थी. उसकी बजाय उन्हें रेशम की वो चमकीली माला पहना कर काम चलाया गया, जो आम तौर पर देवताओं की तस्वीर पर लटकाने के काम  आती है. मुख्य अतिथि जी ने उस माला को देखकर नाक भौं भी सिकोड़ी थी,  जिस पर कार्यक्रम प्रभारी स्थानीय जन सम्पर्क अधिकारी  ने उनके कान में सफाई देते हुए क्षमा याचना भी कर ली थी. 

गोष्ठी ठीक ही चल रही थी. मैं एक-एक करके कवियों-शायरों को बुलाता जा रहा था. पहले मैं कवि का नाम पुकारता, उनका संक्षिप्त परिचय देता और फिर उनसे रचना पाठ का आग्रह करता. अगर श्रोताओं को उनकी रचनाएं ज़्यादा पसन्द आतीं और वे उनसे और सुनाने  की फरमाईश करते तो मैं भी उनसे एक और रचना सुनाने का अनुरोध  कर देता, जिसे वे सहर्ष स्वीकार करते अन्यथा मैं उनकी पठित रचनाओं पर एक संक्षिप्त रस्मी प्रशंसात्मक टिप्पणी करते हुए अगले कवि का नाम पुकार लेता. 

इस बार अपनी लिस्ट में से मैंने एक नए शायर को पुकारा. मैंने उन्हें पहले कभी नहीं सुना था, हालांकि वैसे मैं उन्हें जानता था क्योंकि  उस छोटे कस्बे में सभी सबको जानते थे. वे मंच पर आए और उस ज़माने के एक लोकप्रिय फिल्मी गाने ‘दिल के अरमां आंसुओं में बह गए’ की धुन पर कोई तुकबन्दी जैसी चीज़ उन्होंने पढ़ी. उनकी वो रचना  ख़त्म होती, उससे पहले अचानक सामने से एक नौजवान दौड़ता हुआ आया और उनके गले में ताज़ा गुलाब के फूलों की एक माला डाल कर लौट गया. श्रोताओं के एक समूह ने उनसे एक और रचना सुनाने का आग्रह किया और उन्होंने बिना संयोजक की तरफ देखे, फौरन अपनी दूसरी रचना जो शायद उससे भी बुरी थी, सुनाना शुरु कर दिया. इस रचना  पाठ के दौरान उसी तरह चार बार और उनको मालाएं पहनाई गईं.  मुख्य अतिथि जी कुपित निगाहों से पी आर ओ साहब को देख रहे थे और उनकी आंखें कह रही थीं कि तुम तो कह रहे थे कि फूलों की मालाएं नहीं मिलीं, फिर ये कहां से आ गईं? उधर मैं उन कूड़ा रचनाओं से तंग आ रहा था. लेकिन श्रोताओं के समने कोई तमाशा न करना मेरी विवशता थी. जैसे ही उन शायर महोदय ने अपनी दूसरी रचना ख़त्म की, मैंने ज़रा भी मोहलत दिए बग़ैर, एकदम से उनको धन्यवाद देकर वह प्रकरण ख़त्म करना चाहा, लेकिन उनके चाहने वाले पुरज़ोर अन्दाज़ में ‘वंस मोर’ ‘वंस मोर’ चिल्लाने लगे. बात को सम्हालने  की गरज़ से मैंने श्रोताओं  से कहा कि मैं उनकी गुणग्राहकता का आदर करता हूं और यह विश्वास दिलाता हूं कि गोष्ठी के अगले दौर में इन शायर महोदय से आपको और भी रचनाएं  सुनवाऊंगा, लेकिन अभी तो आप हमारी गोष्ठी के अगले कवि जी को सुनिये. और जैसे-तैसे करके वो गोष्ठी ख़त्म हुई.

मुझे बाद में पता चला कि उन शायर महोदय का अपने चाहने वालों से इस बात पर काफी झगड़ा हुआ कि उन्होंने पैसे तो दस मालाओं दिये थे लेकिन पांच ही मालाएं क्यों पहनाई गईं! उधर, चाहने वालों का कहना था कि उन्होंने कुछ मालाएं उनकी तीसरी रचना के लिए बचा कर रखी थी, लेकिन उनके प्रयोग का मौका ही नहीं आया.  

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़  टुडै में  मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 22 अप्रेल, 2014 को फूलों की माला और वंस मोर की तुकबन्दी शीर्षक से प्रकाशित मनोरंजक संस्मरण का मूल पाठ. 
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