Tuesday, May 23, 2017

फ्रांस में प्रथम महिला की उम्र को लेकर बवाल

फ्रांस की पिछली सरकार में मंत्री रहे इमैनुएल मैक्रॉन ने वहां  की राजनीति में भारी उथल-पुथल मचा दी है.  39 साल की उम्र में वो फ़्रांस की मुख्यधारा की वामपंथी और उदारवादी पार्टियों को हराकर राष्ट्रपति चुने गए हैं. लेकिन फ्रांस में आजकल उनकी इस आश्चर्यजनक जीत से अधिक चर्चा उनकी  पत्नी ब्रिजेट टोग्न्यूकस की हो रही है. वैसे थोड़ी बहुत चर्चा तो उनकी पहले भी होती रही है. इसलिए कि सन 2015 में जब मैक्रॉन को फ्रांस के वित्त मंत्री का दायित्व मिला तब ब्रिजेट ने अपना सफल  कैरियर  छोड़ कर उनकी मदद करना शुरु कर दिया था और फिर राष्ट्रपति  चुनाव के दौरान भी उन्होंने जमकर उनके चुनाव अभियान में हिस्सेदारी निबाही. बताया गया कि इस अभियान के दौरान ब्रिजेट ने अपने पति के हर कदम पर बारीकी से निगाह रखी.  लेकिन अब जबकि मैक्रॉन फ्रांस के राष्ट्रपति निर्वाचित हो चुके हैं, श्रीमती ब्रिजेट मैक्रॉन के बारे में चर्चाओं का स्वर कर्कश और कटु हो गया है. यहीं यह बात याद कर लेना उचित होगा कि ब्रिजेट की आयु चौंसठ वर्ष है यानि वे अपने पति से पच्चीस बरस बड़ी हैं. फ्रांस में आजकल चर्चाएं उम्र के इसी अंतराल को लेकर ज़्यादा हो रही हैं.  वैसे इस तरह की स्त्री-द्वेषी चर्चाएं उनके चुनाव अभियान के दौरान भी हुई थीं लेकिन अब तो पानी सर से ऊपर गुज़रने लगा है.

फ्रांस की जानी-मानी कार्टून पत्रिका शार्ली एब्डो ने हाल ही में अपने कवर पेज पर मैक्रॉन दम्पती का एक कैरीकेचर छापा है और उसके नीचे शीर्षक दिया है: अब वे चमत्कार दिखाने वाले हैं! वैसे तो इस शीर्षक को मैक्रॉन के चुनावी वादों से जोड़ कर अब उनके पूरा होने की सम्भावनाओं के अर्थ में पढ़ा जा सकता है लेकिन जब हम इसे कैरीकेचर के साथ देखते-पढ़ते हैं तो दोनों की आयु के अंतराल के साथ इसका एक अन्य अर्थ भी समझ में आता है जो शालीन नहीं है.  यही वजह है कि वहां के सोशल  मीडिया में सेक्सिस्ट और एजिस्ट कहकर इस कवर की खूब लानत-मलामत की जा रही है. लेकिन इसी सोशल मीडिया पर इन दोनों के लिए अनगिनत भद्दी और बेहूदा टिप्पणियां भी खूब की जा रही हैं. ऐसी ही एक टिप्पणी में ब्रिजेट को पेडोफाइलतक कह दिया गया है, जो अभद्रता की पराकाष्ठा है.

लेकिन बहुत सुखद बात यह है कि संकीर्ण और विकृत मानसिकता से उपजी इन टिप्पणियों का बहुत कड़ा और तीखा विरोध भी हो रहा है. ब्रिजेट की पिछली शादी से जन्मी बत्तीस वर्षीया बेटी भी खुलकर सामने आई हैं और उन्होंने कहा है कि उनकी मां के प्रति ऐसी कुत्सित टिप्पणियां ईर्ष्याजनित हैं. उसने इस बात पर अपनी नाराज़गी का इज़हार किया है कि इक्कीसवीं  सदी के फ्रांस में इस तरह की बेहूदा बातें की जा रही हैं. उन्होंने इन टिप्पणियों को  ब्रिजेट के स्त्री होने के साथ भी जोड़कर देखा है और पूछा है कि क्या किसी पुरुष राजनेता के बारे में भी ऐसी बेहूदा बातें की जाती हैं? स्पष्ट है कि उनका संकेत अधिक आयु वाले पुरुष और कम आयु वाली स्त्री के संग-साथ की तरफ है. और यहीं यह बात भी कि इन चर्चाओं के बाद फ्रांस का मीडिया वहां के और दुनिया भर के राजनेताओं की सूचियां खंगाल  कर स्त्री-पुरुष के उम्र के अंतराल की जानकारियां परोसने में जुट गया है. लेकिन, जैसा कि एक पत्रकार ने लिखा है, अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और उनकी पत्नी मेलानिया के बीच भी उम्र का इतना ही अंतराल है लेकिन इसे लेकर कोई चर्चा नहीं होती है. खुद मैक्रॉन ने भी कहा है कि अगर मैं अपनी पत्नी से बीस बरस बड़ा होता तो किसी ने एक पल को भी इस बात पर ध्यान नहीं दिया होता, लेकिन क्योंकि वे मुझसे बीस बरस  बड़ी हैं, हर कोई इस रिश्ते पर सवाल उठा रहा है.  

मैक्रॉन की पहली मुलाकात ब्रिजेट से जब हुई तब वे महज़ पंद्रह  बरस के थे. एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मी और सात बच्चों में सबसे छोटी ब्रिजेट तब हाई स्कूल में ड्रामा टीचर थीं, विवाहिता थीं और उनके तीन बच्चे भी थे. इस मुलाकात के दो बरस बाद मैक्रॉन ने उनके प्रति अपने प्रेम का इज़हार कर दिया. बाद में ब्रिजेट ने एक साक्षात्कार में कहा कि वे प्रेम में ऐसी बहीं और मैक्रॉन के प्रति उनका आकर्षण इतना प्रबल था कि अंतत: 2006 में उन्होंने अपने तत्कालीन पति जो एक बैंकर थे, को तलाक दे दिया. इससे  अगले बरस उन्होंने मैक्रॉन से विवाह कर लिया. स्वाभाविक ही है कि उनकी यह प्रेम कथा राष्ट्रपति चुनाव अभियान के दौरान भी चर्चा में रही लेकिन सुखद बात यह कि फ्रांस की ज़्यादातर महिला वोटर्स ने इसे कोई मुद्दा नहीं माना. उलटे कुछ ने तो पलटवार करते हुए यह तक कह दिया कि वैसे तो हम पुरुषों को उनसे कम उम्र वाली स्त्रियों के साथ देखने के आदी हैं, लेकिन उसका उलट देखना बेहद सुखद है.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत  मंगलवार, 23 मई, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.                              

Tuesday, May 9, 2017

अत्यधिक दुबलापन नहीं हो सकता है खूबसूरती का पैमाना

पिछले कुछ बरसों से भारत सहित दुनिया के बहुत सारे देशों में दुबलापन सौंदर्य का एक महत्वपूर्ण पैमाना रहा है. भारत में हमने अनेक फैशनेबल अदाकाराओं की तारीफ़ के संदर्भ में साइज़ ज़ीरो की भी खूब चर्चाएं सुनी हैं. लेकिन इधर हाल में सारी दुनिया में फैशन, सौंदर्य  और सुरुचि के मामले में अव्वल माने जाने वाले देश फ्रांस की सरकार ने एक ऐसा बिल पारित किया है जो इस प्रतिमान के खिलाफ़ जाता है. संवाद समिति रायटर्स के अनुसार फ्रेंच संसद में लाए गए इस बिल में प्रावधान किया गया है कि ऐसे किसी भी व्यक्ति के लिए  मॉडल के रूप में काम करना प्रतिबंधित होगा जिसका शरीर द्रव्यमान सूचकांक यानि बीएमआई (बॉडी मास इण्डेक्स) स्वास्थ्य अधिकारियों द्वारा प्रस्तावित और स्वास्थ्य एवम श्रम मंत्रियों द्वारा आदेशित स्तर से कम होगा. यह भी स्पष्ट कर दिया गया है कि अगर कोई मॉडलिंग एजेंसी ऐसे किसी मॉडल की सेवाएं लेती पाई गईं जिसका बीएमआई विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों से कम है तो उसे छह माह तक का  कारावास और पिचहत्तर हज़ार यूरो का आर्थिक  दण्ड भुगतना होगा.  हर मॉडल को डॉक्टर से इस आशय का एक प्रमाण पत्र भी लेना होगा कि उसकी सेहत उसके काम के लिए उपयुक्त है, और वह दो वर्ष के लिए वैध होगा. कहा गया है कि सरकार यह बिल अत्यधिक दुबलेपन के आदर्शीकरण को रोकने और क्षुधा अभाव (एनोरेक्सिया) को नियंत्रित करने के इरादे  से लाई है. यहीं यह याद कर लेना भी उचित  होगा कि पूरी दुनिया में दुबले होने के इस उन्माद ने अनेक जानें ली हैं और फ्रांस से पहले इज़राइल, स्पेन और इटली भी इस तरह के कानूनी प्रावधान कर इस घातक प्रवृत्ति पर रोक लगाने के प्रयास कर चुके हैं.

असल में शरीर द्रव्यमान सूचकांक  यह  बताता है कि किसी के शरीर का भार उसकी लंबाई के अनुपात में ठीक है या नहीं.  भले ही असलियत में यह सूचकांक  शरीर की चर्बी को नहीं मापता है इसे  किसी व्यक्ति की ऊंचाई के आधार पर एक स्वस्थ शरीर के वज़न का आकलन करने के लिए एक उपयोगी उपकरण माना जाता है.  अगर किसी का बीएमआई सही नहीं है, तो उसे  डायबिटीज, स्‍ट्रोक, हाई ब्‍लड प्रेशर, हाई एलडीएल कोलेस्‍ट्रॉल, हार्ट डिजीज़ और ऑस्टियोआर्थराइटिस जैसे स्‍वास्‍थ्‍य जोखिम का सामना करना पड़ सकता है. लेकिन इस सूचकांक की अपनी सीमाएं भी हैं और इसे सौ फीसदी सही नहीं माना जाता है.

और शायद ये ही कारण रहे होंगे कि फ्रांस में भी बहुत सारे लोग वहां की सरकार के इस फैसले के विरोध में अपनी आवाज़ उठाने लगे हैं. उनके तर्क भी आधारहीन नहीं कहे जा सकते. उनका कहना है कि दुबलापन हमेशा ही रोगी होने का परिचायक नहीं होता है और जब आप एनोरेक्सिया की बात करते हैं तो उसका निर्धारण केवल और केवल बॉडी मास इण्डेक्स के आधार पर करना उचित नहीं है. उसके असंतुलन के पीछे अन्य कारण, जैसे मनोवैज्ञानिक और कोई अन्य शारीरिक विकार या व्याधि भी हो सकते हैं. मसलन किसी को दांतों की समस्या हो या कोई अपने बाल झड़ने से व्यथित हो तो वह भी एनोरेक्सिया का शिकार हो सकता है. इन तमाम तर्कों को अपने वक्तव्य में समेटते हुए फ्रांस की नेशनल यूनियन ऑफ मॉडलिंग एजेंसीज़ की मुखिया इज़ाबेल सेण्ट फेलिक्स ने कहा है कि “बेशक यह बात महत्वपूर्ण है कि मॉडल्स सेहमतमंद हों, लेकिन यह मान बैठना कि अगर हम बहुत दुबली मॉडल्स से निज़ात पा लेंगे तो  फिर कोई एनोरेक्सिया पीड़ित बचेगा ही नहीं, अति सरलीकरण होगा.” इज़ाबेल की बात को ही आगे बढ़ाते हुए वहां की एक जानी मानी मॉडल लिण्डसे स्कॉट ने खुद अपना उदाहरण देते हुए कहा कि जब वो कॉलेज में पढ़ती थीं तो उनका बीएमआई अठारह से कम था, लेकिन वे स्वस्थ थीं.

फ्रांस में एक और कानून बनाया गया है जिसके तहत अगर किसी मॉडल की छवि को तकनीकी रूप से संवार कर प्रस्तुत किया जाएगा तो उस फोटो पर यह बात स्पष्ट रूप से अंकित की जाएगी कि उसे रीटच किया गया है. ज़ाहिर है कि ये दोनों कानून दुबलेपन को अतिरिक्त महत्व देकर उसे युवा पीढ़ी के लिए अनुकरणीय आदर्श के रूप में स्थापित करने के खिलाफ़ हैं. वहां हो रहे तमाम विरोधों के बावज़ूद फ्रांस सरकार अपने फैसले पर अटल है. वहां की  स्वास्थ्य मंत्री ने भी यही कहा है कि हम तो यहां की उन युवतियों को एक संदेश देना चाहते हैं जो इन बेहद दुबली मॉडल्स को अपने लिए सौंदर्य की मिसाल मान बैठी हैं.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 09 मई, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Wednesday, May 3, 2017

जैसे हैं वैसे ही बने रहें हमारे हेतु जी...



कितनी यादें, कितनी छवियां! कितने उपकार, कितनी मीठी चुटकियां! और हों भी तो क्यों नहीं! सम्पर्क और अपनापे की उम्र भी तो बहुत छोटी नहीं है. ठीक से तो याद नहीं लेकिन शायद 1965 के आसपास की बात होगी जब अपने गुरुवर प्रो. नवलकिशोर जी से यह नाम सुना था – होतीलाल भारद्वाज! उनके मित्र. और वो ज़माना ऐसा था जब गुरु का मित्र भी गुरु से कम नहीं हुआ करता था. तभी शायद पहली मुलाक़ात भी हुई होगी, जिसकी कोई छवि मन में नहीं है. और फिर कुछ बरस बाद मैं भी उसी जमात में शामिल हो गया. गुरुओं की जमात में. और यह तो मुमकिन था ही नहीं कि आप राजस्थान की कॉलेज शिक्षा सेवा में हों और भारद्वाज जी से आपका सम्पर्क न हो! शिक्षकों के संगठन में और विश्वविद्यालय में – हर जगह तो वे सक्रिय थे. कभी कहीं के और कभी कहीं के चुनाव चलते ही रहते थे और भले ही मुझ जैसों को उनकी ज़रूरत न पड़ती हो, उनके लिए तो मुझ जैसों की भी उपयोगिता थी. मिलना-जुलना या पत्र सम्पर्क होता रहा. कई बार मैंने अपने मतलब के लिए भी उनसे सम्पर्क किया. मतलब वाली बात को भी स्पष्ट कर दूं. वे विश्वविद्यालय में परीक्षा कार्य के दाता की हैसियत रखते थे (तब परीक्षा कार्य हम प्राध्यापकों  की अतिरिक्त आय का एक महत्वपूर्ण साधन हुआ करता था और मुझ जैसे सामान्य आर्थिक पृष्ठभूमि वालों के लिए उसकी बहुत अधिक महत्ता होती थी) और हम जैसे लोग उनकी नज़रे इनायत के तलबग़ार हुआ करते थे. इस तरह रिश्ते आहिस्ता आहिस्ता पुख़्ता हो रहे थे.

तभी 1974 में एक प्रसंग ऐसा बना कि हम लोग अनायास नज़दीक हो गए. हालांकि इसमें न उनका कोई योगदान था न मेरा. हुआ यह कि तबादलों की एक ऐसी लम्बी श्रंखला बनी जिसमें हम कई मित्र एक दूसरे से जुड़ गए. होतीलाल जी तब तक हेतु भारद्वाज हो चुके थे. उनका तबादला नीम का थाना से चित्तौड़ हुआ, मेरा चित्तौड़ से सिरोही और जीवन सिंह का सिरोही से (शायद) दौसा. हम तीनों ही अपनी-अपनी तरह से राजनीति पीड़ित थे. हेतु जी चित्तौड़ आए और मुझे वहां से रिलीव होकर सिरोही जाना पड़ा. तब शायद पहली दफा हेतु जी से खुलकर एक सहकर्मी के रूप में बात हुई. इससे पहले तो वे मेरे लिए गुरु स्थानीय ही थे. उन्होंने अपने बिन्दास अन्दाज़ में मुझसे कहा कि मैं यह बात मन से निकाल दूं कि उनके कारण मेरा ट्रांसफर हुआ है. बहरहाल. हम तीनों ही विस्थापित हुए. यह बात अलग है कि हेतु जी कुछ समय बाद नीम का थाना लौट गए, मैं सिरोही का हो गया (वहां पूरे 25 बरस मैंने निकाले) और जीवन सिंह बाद में अलवर चले गए और वहीं के हो गए. 

इसके बाद दो-तीन कारणों से उनसे मिलने- जुलने के अधिक मौके आए. अपनी नौकरी में पाँव जमने के बाद मैं भी साहित्य में थोड़े हाथ पाँव चलाने लगा था इसलिए एक बड़े लेखक से मिलने-जुलने और संवाद के अधिक मौके आने लगे.  वे बरस राजस्थान साहित्य अकादमी की सर्वाधिक सक्रियता  के भी वर्ष थे, इसलिए हेतु  जी से मिलने के मौके बढ़े और सिरोही में हम लोगों की जो टीम थी उसके कारण और वहां के हमारे अग्रज (अब स्वर्गीय) सोहन लाल पटनी के कारण राजस्थान की साहित्यिक गतिविधियों का एक छोटा-मोटा केन्द्र सिरोही भी बन गया था इसलिए भी हेतु जी से मिलना-जुलना बढ़ता गया. मेरे गुरु डॉ प्रकाश आतुर राजस्थान साहित्य अकादमी के अध्यक्ष थे. वे मेरे लिए गुरु से बहुत अधिक, ‘पितु मातु सहायक स्वामी सखा’ थे, और हेतु जी उनके परम विश्वस्त और आत्मीय थे – इस कारण भी हमारी निकटता बढ़ी. तब का एक मज़ेदार प्रसंग याद आता है. डॉ आतुर अकादमी  के किसी आयोजन के निमित्त सिरोही आए हुए थे. उनका खान-पान का शौक लीजेण्डरी है. एक शाम उनके आतिथ्य का सौभाग्य मुझे मिला. और मैंने हेतु जी को भी अपने यहां आमंत्रित कर लिया. गुरु जी की प्रतिष्ठा और तलब के अनुरूप व्यवस्था मैंने कर रखी थी, और पण्डित हेतु भारद्वाज के लिए कोका कोला की एक बोतल भी ला रखी थी. जब टेबल पर बैठे तो गुरुजी ने पूछा, यह कोका कोला किसके लिए? और मैंने जैसे ही हेतु जी की तरफ संकेत किया, वे बेसाख़्ता बोल उठे  “अरे! शेर भी कभी घास खाता है!” तुरंत एक ठहाका लगा, दूरियां नज़दीकियां बन गई, और फिर यह इबारत सदा-सदा के लिए हमारे स्मृति कोष का हिस्सा बन गई. उसी दौर में जब मेरी पहली किताब छपने का मौका आया तो मैंने उनसे सम्पर्क किया और आज इस बात को बहुत कृतज्ञता से स्मरण करना ज़रूरी है कि ‘सृजन के परिप्रेक्ष्य’ हेतु जी के कारण छपी.

डॉ प्रकाश आतुर हेतु जी पर बहुत ज़्यादा विश्वास करते थे. शायद यह बात हेतु जी के गुण सूत्रों का ही हिस्सा है कि जो भी उनके सम्पर्क  में आता है उन पर विश्वास करने लगता है. आज जब बहुत तटस्थ और निरपेक्ष होकर उनके इस गुण का विश्लेषण करना चाहता हूं तो थोड़ा चकित भी होता हूं. चकित इसलिए कि वे मुंह देखी कभी नहीं कहते हैं. बल्कि सीमा से अधिक ही मुंहफट हैं. वे कभी भी, कहीं भी,  किसी की लू उतार सकते हैं. बल्कि उतारते ही रहते हैं. लेकिन इसके बावज़ूद जो भी उनके सम्पर्क में आता है उनका मुरीद हो जाता है. कभी-कभी अपने बहुत सारे निहायत शालीन और मृदु भाषी मित्रों से उनके इस बर्ताव की तुलना करता हूं तो यह आश्चर्य और बढ़ जाता है. ज़्यादा  सोचता हूं तो पाता हूं कि उनका यह बेलौस अन्दाज़ उनके मन की पारदर्शिता का परिचायक भी तो है.  क्षण भर को भले ही लगे कि उन्होंने आपके मन के प्रतिकूल कुछ कह दिया है लेकिन फिर आप पाते हैं कि उन्होंने उसे मन में छिपा कर भी तो नहीं रखा. उनका एक और गुण है लोगों के काम आना. बहुत बड़ा तो परिचय वृत्त और वे सदा सहायता को सुलभ. जब भी बात करें, पता चलेगा आज इस दफ़्तर  गए थे, कल  उस दफ़्तर. यह रोज़ का सिलसिला है. जब कोई पुकारे वे बिना किसी झिझक के साथ हो लेते हैं. कोई ना नुकर नहीं, कोई नाज़ नखरा नहीं. मैं खुद कई दफा उनकी इस सदाशयता का लाभ उठा चुका हूं. इससे भी ज़्यादा मज़े की बात तो यह है कि जिस दफ़्तर में मैं कार्यालयाध्यक्ष रहा वहां भी एक काम के लिए एकाधिक दफ़ा उन्हें अपने साथ ले गया. यह है उनका रुतबा. इसी के साथ यह बात कहना भी बहुत ज़रूरी लग रहा है कि जहां वे आपके काम आने में तनिक भी कृपणता नहीं बरतते हैं वहीं अगर आपने कभी उनके लिए कुछ कर दिया तो उसके प्रति  कृतज्ञता ज्ञापन में वे ज़रूरत से ज़्यादा उदार और मुखर रहते हैं. यह बात भी मैं स्वानुभव से कह रहा हूं. मेरे एक बार के छोटे-से सहयोग का वे इतनी बार ज़िक्र कर चुके हैं कि अब तो मुझे भय लगने लगा है.

हेतु जी बहुत कामयाब शिक्षक रहे हैं, और एक अर्थ में अब भी हैं. मेरा ऐसा मानना है कि एक कामयाब शिक्षक के लिए जितना ज़रूरी यह है कि उसे अपने विषय का पूरा ज्ञान हो, उतना ही उसकी अभिव्यक्ति का सशक्त होना भी ज़रूरी है. हेतु  जी के मामले में तो इसमें और कई चीज़ें जुड़ जाती हैं. मसलन यह कि बावज़ूद इस बात के कि वे हिन्दी के अध्यापक रहे हैं  (और आम तौर पर हिन्दी के अध्यापक को ‘ऐंवे’ ही माना जाता है) अपने चारों तरफ की नवीनतम  चीज़ों और प्रवृत्तियों की जितनी जानकारी और समझ उन्हें है उसकी बड़ी भूमिका उनकी कामयाबी में है. संगीत और फिल्मों के तो वे जैसे विश्वकोश ही हैं. अपने संगीत अनुराग का एक प्रसंग तो वे खुद बहुत मज़े लेकर कई बार सुना चुके हैं. जयपुर में जब प्लेनेट एम संगीत के शौकीनों का सबसे प्रिय ठिकाना हुआ करता था, एक दफा  हेतु जी कुछ खरीदने जा पहुंचे. वे शायद गज़लों के रैक के पास खड़े थे, तभी वहां की सेल्स गर्ल आई, उनकी वेशभूषा (धोती कुर्ता) पर ऊपर से नीचे तक एक नज़र डाली, और उनसे बोली, “अंकल,  भजन उस तरफ़ हैं!” अब बेचारी वो बालिका क्या जाने कि ‘अंकल’ भजन सुनने वाली उम्र से अभी काफी दूर हैं! ऐसा ही एक प्रसंग वे किसी मल्टीप्लेक्स का भी सुनाते हैं जब वे कोई एडल्ट फिल्म देखने जा पहुंचे थे और फिर वहां  मौज़ूद कुछ युवा मनचलों से उनका दिलचस्प संवाद हुआ था. उस संवाद को मैं अपने सपाट लहजे में बयान करके उसकी खूबसूरती को आहत नहीं करना चाहता. अगर कभी मौका मिले तो खुद हेतु जी से ही उसे सुनें. फिल्मों का उनका शौक़  तो अद्भुत है. ‘संस्कृति, शिक्षा और सिनेमा’ किताब के एक खण्ड में फिल्मों के बारे में उनके लेख उनकी सूक्ष्म समझ और बारीक पकड़ का श्रेष्ठ नमूना हैं. फिल्में देखने के उनके  शौक़ का आलम यह है कि शुक्रवार को रिलीज़ हुई फिल्म अगर वे रविवार तक न देख लें, और फिर फोन करके उसके बारे में न बता दें तो मैं समझ जाता हूं कि वे शहर से बाहर हैं.

और शहर से बाहर जाना उनका चलता ही रहता है. जयपुर से नीम का थाना तो वे ऐसे आते-जाते हैं जैसे कोई एक मुहल्ले से दूसरे मुहल्ले में चला जाए. सुबह यहां तो शाम वहां, और शाम वहां तो रात यहां. लेकिन इस मुल्ला की दौड़ सिर्फ मस्जिद तक ही नहीं है. या यों कहिये कि इसने तो हर जगह मस्जिद बना रखी है. तुमने पुकारा और हम चले आए की तर्ज़ पर बस किसी ने आवाज़ दी और हेतु जी निकल पड़ते हैं. पूरब पश्चिम उत्तर दक्षिण सब जगह तो वे जा पहुंचते हैं. जाते हैं और अपने झण्डे गाड़ आते हैं. उन्हें सुनने वालों को तो मज़ा आता ही है, मुझ जैसे आत्मीय जन खुद उनकी जबानी उनकी यात्राओं व्याख्यानों और अन्य प्रसंगों का वृत्तांत सुनकर जो आनंद प्राप्त करते हैं वह अनिर्वचनीय है. असल में घूमना-फिरना, मिलना-जुलना और सामाजिक होना हेतु जी की फितरत का अभिन्न अंग है. वे जहां भी जाते हैं, अपने मुरीदों की फौज खड़ी कर लेते हैं और वे मुरीद उन्हें बार-बार पुकारते रहते हैं. इस तरह उनकी यात्राओं की ज़रूरतें बढ़ती रहती हैं और वे आनंदपूर्वक प्रवास करते रहते हैं. सुखद बात यह है कि इन यात्राओं में उनकी उम्र कहीं आड़े नहीं आती है. बढ़ी उम्र के साथ स्वाभाविक रूप से चली आने वाली अनेक सीमाओं और विवशताओं को वे बड़े सहज भाव से नज़र अन्दाज़ करते रहते हैं. उम्र के साथ उत्पन्न असुविधाओं का सामना वे किस मज़े से करते हैं इसका बहुत रोचक वर्णन एक बार उन्होंने किया. इस वर्णन का ताल्लुक स्लीपर बस में ऊपर वाली बर्थ पर लम्बी यात्रा से है. आवश्यकता आविष्कार की जननी है का इससे बेहतर उदाहरण शायद ही कोई मिले. मेरी विवशता है कि इस प्रसंग को मैं बहुत खोलकर नहीं लिख पा रहा हूं. लेकिन उम्मीद करता हूं कि सुधि मित्र इसी से समझ जाएंगे. यह सब कह चुकने के बाद एक बात आहिस्ता से कह दूं? हेतु जी जो खुद को इतना ज़्यादा इस्तेमाल करते हैं, वो मुझे अब अच्छा नहीं लगता है. लगता है कि उन्हें उम्र की आवाज़ को बहुत ज़्यादा अनसुना नहीं करना चाहिए, और अपनी यात्राओं को थोड़ा सीमित करना चाहिए. 

कुछ चीज़ों के प्रति उनका मोह और अनुराग हद्द से ज़्यादा है. इनमें से दो का ज़िक्र करना चाहूंगा है. एक है सम्पादन कर्म. जब वे राजस्थान साहित्य अकादमी के उपाध्यक्ष (और बाद में कार्यकारी अध्यक्ष)  रहे तो उन्होंने ‘मधुमती’ का सम्पादन कर अपने सम्पादन कौशल का लोहा मनवाया. उन अंकों को लोग आज भी बड़े आदर के साथ याद करते हैं. फिर उन्होंने ‘समय माजरा’  का सम्पादन किया और उसे प्रांत ही नहीं देश की शीर्षस्थ पत्रिकाओं में स्थान मिला. लेकिन पत्रिका का प्रकाशन करने वाले संस्थान और उससे सम्बद्ध मित्रों की कुचेष्टाओं की वजह से उस गौरवशाली प्रकाशन का दुखद अवसान हुआ. इससे हेतु जी बहुत आहत भी हुए. पत्रिका के इस अकाल-अवसान में जिन मित्रों की जो-जो भूमिकाएं रहीं उनसे हम निकटस्थ लोग भली भांति परिचित भी हैं, लेकिन आज मैं इस बात को बड़े विस्मय के साथ स्मरण करता हूं कि उन मित्रों के प्रति भी हेतु जी के मन में कोई कटुता नहीं है, बल्कि उन्हें वे उतने ही अनुराग के साथ अपने से जोड़े हुए हैं और उनके सुख दुःख में सहभागी बनते हैं.  ‘समय माजरा’ के अवसान के बाद उन्होंने अपनी सारी ऊर्जा को पुंजीभूत कर ‘अक्सर’ निकलना शुरु किया और अब तक प्रकाशित इसके चौंतीस अंक हेतु जी के सम्पादन कौशल के शिलालेख हैं. पत्रिका में उनके साथ एक सम्पादकीय टीम है, और टीम के सदस्य-मित्र अपनी तरह से सहयोग भी करते हैं, लेकिन इसका ज़्यादा भार तो हेतु जी ही वहन करते हैं – यह बात जग जाहिर है. इस त्रैमासिक पत्रिका के साथ-साथ उन्होंने काफी समय तक ‘पंचशील शोध समीक्षा’  का भी सम्पादन किया है और जिन्होंने यह प्रकाशन देखा है वे जानते हैं कि जहां और लोग इस तरह के प्रकाशन  को शुद्ध  व्यावसायिक उपक्रम के रूप में देखते हैं, हेतु जी ने यहां भी अकादमिक शुचिता का पूर्णत:  निर्वहन किया और पत्रिका की सामग्री की गुणवत्ता के साथ कोई समझौता नहीं किया.

हेतु जी का दूसरा गहरा अनुराग है प्रगतिशील लेखक संघ के प्रति. इस संगठन ने अनेक उतार चढ़ाव देखे हैं और जैसा कि अधिकांश संगठनों के साथ होता है, छल छद्म, दुरभिसंधियां, रणनीतियां – सब कुछ चलते रहते हैं. बीच में एक  समय ऐसा भी आया अब हेतु जी अपने मित्रों के बर्ताव से बहुत आहत हुए. मैंने तो उन्हें दो-टूक सलाह दी कि अपनी उम्र और सेहत को देखते हुए उन्हें संगठन को अलविदा कह देना चहिए. मेरा मानना है कि हम लोगों के लिए उन जैसे मित्र का कुशल क्षेम और उसकी  उपस्थित किसी भी और बात से ज़्यादा ज़्यादा ज़रूरी है. लेकिन मुझ जैसों की सलाह को सहानुभूतिपूर्वक सुनने के बाद भी बाबाजी कम्बल को नहीं छोड़ पाए. अब जबकि यह प्रसंग थोड़ा पुराना हो चुका है, इस पर विचार करते हुए मैं पाता हूं कि हेतु  जी के लिए कोई रिश्ता अस्थायी नहीं होता है. एक बार जुड़ गया तो फिर वो जुड़ा ही रहता है. यह बात जितनी दोस्तों के बारे में सच है उतनी ही संस्थाओं के बारे में भी सच है. अब मैं समझ गया हूं कि प्रगतिशील लेखक संघ जैसे उनके व्यक्तित्व का, उनके वज़ूद का एक हिस्सा है और चाहे जो हो जाए, वे इससे जुदा हो ही नहीं सकते हैं.

और जब बात संस्था की चल ही निकली है तो थोड़ा-सा ज़िक्र राजस्थान साहित्य अकादमी का भी कर दूं! आज तो खैर यह संस्था जिस हाल में है उसका ज़िक्र न ही किया जाए तो बेहतर है, लेकिन मुझ जैसे लोग जानते हैं कि इस संस्था ने अच्छे दिन भी देखे हैं. बल्कि यह कहूं कि इस संस्था की वजह से हम साहित्यिक बिरादरी के लोगों ने साहित्य के अच्छे    दिन देखे हैं. ऊपर मैंने एक इतर प्रसंग में राजस्थान साहित्य अकादमी के यशस्वी अध्यक्ष डॉ प्रकाश आतुर से हेतु जी की निकटता का उल्लेख किया है. आतुर साहब दिसम्बर 1981 में अकादमी के अध्यक्ष बनाए गए और तब प्रांत की साहित्यिक बिरादरी के बीच भी आम सोच यही था कि तत्कालीन सत्ता से निकटता के पुरस्कार स्वरूप उन्हें यह पद प्रदान किया गया है. लेकिन प्रकाश जी ने बहुत अल्प समय में ही यह सिद्ध कर दिया कि महत्व पद का नहीं उसे धारण करने वाले का होता है और वे हर तरह से इस पद के काबिल हैं. उनके तीन कार्यकालों में अकादमी में जितनी सार्थक और नवाचारी गतिविधियां हुईं, जिस तरह प्रांत के हर रचनाकार को लगने लगा कि अकादमी उसकी है, और जिस तरह प्रांत के दूरस्थ अंचलों में अकादमी के कार्यक्रम होने लगे वह सब हमारी स्मृतियों का हिस्सा है. इसे मैं अपना सौभाग्य ही कहूंगा कि मैं भी उस काल खण्ड में अकादमी से सीधे जुड़ा हुआ था, इसकी संचालिका का सदस्य भी था – इसलिए न केवल इन गतिविधियों का बल्कि पर्दे के पीछे की बहुत सारी हलचलों का भी साक्षी था. और इसीलिए ऊपर मैंने कहा कि हेतु जी डॉ आतुर के बहुत निकट और विश्वस्त थे. सितम्बर 1989 में जब अचानक प्रकाश आतुर का निधन हुआ तब भी वे अकादमी अध्यक्ष थे, और हेतु जी उनके उपाध्यक्ष थे. अकादमी के विधानानुसार दिवंगत प्रकाश जी की जगह हेतु जी पर अकादमी संचालन का दायित्व आन पड़ा. इस बात को आसानी से समझा जा सकता है कि एक बेहद कामयाब अध्यक्ष के बाद उस पद के दायित्व का निर्वहन कितना कठिन होता है. लेकिन आज इस बात को मैं बहुत सुखद आश्चर्य  के साथ याद करता हूं कि हेतु जी  ने उस दायित्व का निर्वहन इतने कौशल के साथ किया कि प्रांत की लेखक बिरादरी को एक क्षण के लिए भी ऐसा नहीं लगा कि अध्यक्ष पद पर जो व्यक्ति आसीन है वो हाल ही में दिवंगत हुए अध्यक्ष से किसी भी माने में कम है. उस काल खण्ड की बहुत सारी बातें याद की जा सकती हैं, लेकिन अगर वैसा करूंगा तो मैं अपने मूल विषय से दूर चला जाऊंगा, इसलिए फिर से हेतु जी पर लौटता हूं. मैं उस काल की सिर्फ कुछ  बातें याद करना चाहता हूं. एक तो यह कि हेतु जी ने बाकायदा यह घोषित कर दिया था कि अकादमी के (कार्यवाहक)  अध्यक्ष होने के नाते उन्हें वाहन, कर्मचारी, भत्ते आदि की जो भी सुविधाएं देय हैं, वे उनका प्रयोग नहीं करेंगे. मेरे लिए इस घोषणा का  अधिक महत्व इस कारण है कि अकादमी की बैठकों में मैंने अपने ही मित्रों को इन्हीं चीज़ों के लिए कभी झगड़ते और कभी रिरियाते देखा था. दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि हालांकि हम सब जानते हैं कि अकादमी जैसी संस्थाएं सरकार से वित्त पोषण प्राप्त करती हैं इसलिए उन में घोषित-अघोषित सरकारी हस्तक्षेप भी होता ही है. अकादमी के पुरस्कार वितरण और सम्मान  समारोहों में सत्ता प्रतिष्ठान के प्रतिनिधियों की उपस्थिति को हमने निरपेक्ष भाव से स्वीकार कर लिया है. लेकिन हेतु जी के कार्यकाल में कदाचित पहली और आखिरी बार ऐसा हुआ कि किसी मंत्री के नहीं वरन एक बड़े लेखक रघुवीर सहाय के हाथों अकादमी पुरस्कार प्रदान करवाये गए. मैं अपने अभिन्न मित्र डॉ माधव हाड़ा के घर जब भी रघुवीर सहाय से पुरस्कार लेते हुए उनकी तस्वीर देखता हूं, मुझे हेतु जी का वो कार्यकाल याद आए  बग़ैर नहीं रहता है.  इसे मामूली बात नहीं माना जाना  चाहिए. बाबा नागार्जुन भी उनके कार्यकाल में अकादमी में आए. उस दौर में हेतु जी के सम्पादन में मधुमती के जो अंक निकले हैं उनकी चर्चा मैं कर ही चुका हूं. अपने नातिदीर्घ अध्यक्षीय कार्यकाल में हेतु जी ने एक बहुत महत्वपूर्ण काम किया ‘काव्यास्वादन संगोष्ठी’ का आयोजन करके. उन्होंने समकालीन कविता के चार सर्वाधिक महत्वपूर्ण हस्ताक्षरों – नंद चतुर्वेदी, नन्द किशोर आचार्य, ऋतुराज और विजेन्द्र को एक साथ बिठाकर उनसे कविता के विभिन्न पहलुओं पर व्यापक बातचीत की. इस बातचीत को टेप किया गया और बाद में इसे किंचित संपादित रूप में ‘कविता का व्यापक परिप्रेक्ष्य: एक उपनिषद’ शीर्षक से प्रकाशित किया गया. इस चर्चा के महत्व को आप तभी समझ सकेंगे जब इस किताब को पढ़ना शुरु करेंगे. ऐसे बहुत सारे काम हेतु जी ने किए.  बातें और बहुत सारी हैं, लेकिन कहीं तो विराम लगाना ही होगा.           

साहित्य, शिक्षा, समाज, राजनीति, कला आदि-आदि अनेक अनुशासनों पर गम्भीर विमर्श करने वाले और अपना मौलिक सोच रखने वाले हेतु  जी  की बड़ी ख़ासियत मुझे यह लगती है कि वे आम विद्वानों की तरह मनहूस नहीं हैं. बात कितनी ही गम्भीर हो, उसे सहज स्वाभाविक रूप में कहना उन्हें आता है और बखूबी आता है. उनकी सोहबत में – चाहे वो रचनाकार हेतु जी की हो या व्यक्ति हेतु जी की, आप बोर तो हो ही नहीं सकते. और अगर वो सोहबत अंतरंग हो तो फिर कहना ही क्या! मैं खुद को इस मामले में बहुत खुशनसीब मानता हूं कि उम्र के अंतराल के बावज़ूद मुझे हेतु जी के साथ इस तरह का बहुत सारा समय बिताने का मौका मिला है और मिलता रहता है. उस वक़्त उनकी ज़िन्दादिली का क्या कहना! पण्डित चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’  ने अपनी अमर कहानी ‘उसने कहा था’ में एक वाक्य लिखा है - कौन जानता था कि दाढ़ियावाले, घरबारी सिख ऐसा लुच्चों का गीत गाएँगे  बस, बारहा वो याद आता रहता है! ग्राम्य जीवन के जाने कितने बिन्दास प्रसंग उनसे सुने हैं! और उन्हें सुनाने का उनका अन्दाज़! मुझे तो बेसाख़्ता महाकवि ग़ालिब याद आते रहते हैं: ज़िक्र उस परीवश का और फिर बयां... हेतु  जी में यह प्रतिभा भरपूर है कि वे किसी भी प्रसंग को ऐसा रोचक बना देते हैं कि मनहूस से मनहूस भी ठहाका मारने को मज़बूर हो जाए! और अगर प्रसंग भी जीवंत हो तो फिर कहना ही क्या!

कभी मैंने जयपुर के अपने एक रचनाकार मित्र से कहा था कि अपना बुढ़ापा कैसे बिताया जाए इस मामले में हेतु जी मेरे आदर्श हैं! पता नहीं वे मित्र मेरी बात को कितना समझे और कितना नहीं समझे! लेकिन करीब एक दशक पहले कही अपनी बात को आज याद करके खुद अपनी पीठ थपथपाने का मन कर रहा है – कि मेरा आकलन कितना सही था. जीवन में बहुत कुछ ऐसा होता है जो हमारे मनोनुकूल नहीं होता है. और जहां तक उसे बदलने की बात है, हम उसे तो क्या बदलेंगे, जब खुद को ही नहीं बदल पाते हैं. ऐसे में, जो है उस  को आनंद भाव के साथ स्वीकार करने से बेहतर तरीका जीवन जीने का हो नहीं सकता. और यह बात मैंने हेतु जी को देखकर सीखी है. रोज़ सीखता हूं. उनकी दोस्ती, उनके स्नेह और उनसे मिली सीखों के लिए आभार तो क्या व्यक्त करूं? बस यही कि वे जैसे हैं वैसे ही बने रहें!

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मानव मुक्ति को समर्पित त्रैमासिकी 'एक और अंतरीप' के डॉ हेतु भारद्वाज पर एकाग्र विशेषांक 'आदमी जैसा आदमी' (अप्रेल-जून 2017) में सम्मिलित मेरा लेख. 


Tuesday, May 2, 2017

बिना अपराध किए ही भुगती 23 साल की सज़ा

अमरीका के क्लीवलैण्ड की अदालत ने एविन किंग नामक एक उनसठ वर्षीय व्यक्ति को बाइज़्ज़त बरी कर दिया है. एविन अपनी गर्ल फ्रैण्ड क्रिस्टल हडसन की हत्या के इलज़ाम में तेईस बरसों से  जेल में था.  क्रिस्टल का शव जून 1994 में उनके अपार्टमेण्ट की एक अलमारी में पाया गया था. अदालत  के दस्तावेज़ों के अनुसार जब क्रिस्टल का शव वहां पाया गया तब एविन किंग भी वहीं मौज़ूद थे और उनका एक जैकेट उसी अलमारी में शव के पास मिला था. क्रिस्टल की मृत्यु पीटने और गला दबाने से हुई थी. उनके साथ दुराचार किये जाने  के प्रमाण भी मिले थे. क्रिस्टल हडसन के शव पर वीर्य और उनकी उंगलियों के नाखूनों में किसी अन्य व्यक्ति की त्वचा की कोशिकाएं पाई गई थीं. उस समय  अदालत ने  वैज्ञानिक सबूतों, अपार्टमेण्ट में एविन किंग की मौज़ूदगी और उनके बयानों की असंगतता इन सबको  अपने फैसले का आधार बनाया. कुल मिलाकर यह कहानी बनाई गई कि क्रिस्टल ने किसी अन्य व्यक्ति से दैहिक सम्बंध बनाए थे और एविन किंग ने उनकी हत्या की थी. इस कथा का आधार यह बात थी कि पाए  गए  वीर्य का मिलान एविन से नहीं हुआ और त्वचा की कोशिकाओं की जांच की कोई तकनीक तब उपलब्ध नहीं थी. एविन किंग को आजन्म कारावास की सज़ा सुना दी गई.

इसके बावज़ूद एविन किंग बार-बार कहता रहा कि वह बेगुनाह है. उसकी गुहार अदालत ने तो नहीं सुनी, लेकिन लेकिन सन 2003 में शुरु हुए ओहियो इन्नोसेंस प्रोजेक्ट के लोग उसकी मदद के लिए आगे आए. प्रोजेक्ट के लोगों का  मानना है कि फोरेंसिक साइंस का असंगत  इस्तेमाल ग़लत फैसलों का दूसरा सबसे बड़ा कारण है. उनकी दलील थी कि डीएनए टेस्टिंग के क्षेत्र में हुई प्रगति की वजह से इस फैसले पर पुनर्विचार करना आवश्यक हो गया है. इन्हीं आधारों पर इन्नोसेंस प्रोजेक्ट वाले पूरे देश में कोई साढ़े तीन सौ मामलों में पुनर्विचार की गुहार लगा रहे हैं. प्रोजेक्ट के लोगों के सतत प्रयासों की वजह से 2009 में प्रमाणों की फिर से डीएनए टेस्टिंग की गई और उसमें यह पाया गया कि वीर्य और त्वचा कोशिकाएं एक ही व्यक्ति की थीं और वह व्यक्ति एविन किंग नहीं था. लेकिन जांच के इस परिणाम को भी आसानी से स्वीकार नहीं किया गया. अभियोग पक्ष एविन किंग की सज़ा को ज़ारी रखने की ज़िद करता रहा और एक काउण्टी जज महोदय ने नई सुनवाई की अनुमति देने तक से इंकार कर दिया. लेकिन, जैसा प्राय: कहा जाता है, आखिरकार सच की जीत हुई. ओहियो इन्नोसेंस प्रोजेक्ट अब तक पच्चीस लोगों को इस तरह का न्याय दिला पाने में कामयाब रहा है.

लेकिन सवाल यह है कि क्या एविन किंग को वास्तव में न्याय मिला है? उसने पूरे तेईस बरस जेल की सलाखों के पीछे काटे हैं. उसने कहा भी है कि जब आप सलाखों के पीछे होते हैं तो मरे जैसे ही होते हैं. इन तेईस बरसों में एविन की मां अपने बेटे की रिहाई का ख़्वाब आंखों में पाले ही इस दुनिया  को अलविदा कह गई. जिस दिन उसे जेल भेजा गया तब उसकी बेटी  तेरह बरस की और बेटा ग्यारह बरस का था. इन 23 मनहूस बरसों में उसने अपने बच्चों को बढ़ता हुआ नहीं देखा. खुद वह खासा बूढ़ा होकर जेल से बाहर आएगा. ओहियो प्रोजेक्ट ने जो कुछ किया वह बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन जो त्रास बेगुनाह एविन किंग ने भुगता है और जो इस बीच उसने खोया है वह सब उसे कोई नहीं लौटा सकता है.

एविन किंग की यह व्यथा कथा पढ़ते हुए मुझे बेसाख़्ता प्रख्यात हिंदी कथाकार मन्नू भण्डारी की एक कहानी  याद आ रही है. कहानी  का शीर्षक है सज़ा’. इस कहानी में किसी और की बेईमानी की सज़ा एक निर्दोष व्यक्ति को दे दी जाती है. मुकदमा चलता है और खूब लम्बा खिंचता है. अंत में उसकी निर्दोषिता प्रमाणित होती है और वह रिहा कर दिया जाता है, लेकिन इस बीच उसका पूरा परिवार उसकी सज़ा का दंश झेलता है. यहां कहानीकार जैसे कहती हैं कि जो व्यक्ति अपराधी था ही नहीं, उसके इस तथाकथित अपराध की सज़ा तो पूरे परिवार ने भुगत ली.  ज़ाहिर है कि सवाल यही है कि क्या वाकई कोई न्याय हुआ है? यही सवाल एविन किंग की इस कथा को पढ़ते हुए हम सबके मन में उठना चाहिए. आखिर ऐसा क्या हो कि अदालतें ग़लत फैसले न करें, और यदि कभी कर भी दें तो उनमें जल्दी से जल्दी संशोधन कैसे हो, ताकि जो दोषी नहीं है उसे बेवजह  सज़ा न भुगतनी पड़े. इस तरह के प्रसंग हमारी चिंतन प्रक्रिया को धार देते हैं, इन्हें जानने-पढ़ने की यही सबसे बड़ी सार्थकता है.


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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक स्तम्भ कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत  मंगलवार, 02 मई, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पठ.