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Tuesday, January 15, 2019

जीत की कोई उम्मीद नहीं फिर भी लड़ रही है वो!


बहुत बार ऐसा कुछ जानने को मिलता है कि मन गहरे अवसाद में डूब जाता है. इण्डोनेशिया की चालीस वर्षीया नूरिल मकनून के बारे में जानकर ऐसा ही हुआ. वे तीन बच्चों की मां है और बाली के पूर्व में अवस्थित द्वीप की रहने वाली हैं. सन 2010 में उन्हें एक स्कूल में लेखा सहायक की अस्थायी नौकरी मिली तो जीवन की गाड़ी कुछ आराम से चलने लगी. लेकिन यह आराम बहुत समय नहीं रहा. तीन बरस बाद उनके स्कूल में एक नया प्रिंसिपल आया और उसने उनका सुख चैन सब छीन लिया. प्रिंसिपल साहब जब चाहते नूरिल को अपने चैम्बर में बुला भेजते और उससे खुलकर अपने अंतरंग जीवन  की बातें करने लगते. स्कूल के समय के बाद वे उसे वक़्त बेवक़्त फोन करके भी यही सब करते. और जैसे इतना ही पर्याप्त न हो, एक तरफ तो वे नूरिल से कहते कि वो भी उनके साथ अंतरंगता कायम करे और दूसरी तरफ स्कूल के कर्मचारियों के सामने इस बात की डींग हांकते कि नूरिल से उनका अफेयर चल रहा है. बेचारी नूरिल बहुत भारी मन से उनकी ये फूहड़ और अश्लील हरकतें सहती रहने को विवश थी. इसलिए विवश थी कि उसकी नौकरी अस्थायी थी और वह जानती थी कि शिकायत करने का मतलब होगा अपनी नौकरी से हाथ धो बैठना.

लेकिन परेशानी के इसी दौर में एक दिन उसे न जाने क्या सूझा कि प्रिंसिपल ने जब उसे फोन किया और हमेशा की तरह गंदी बातें करने लगा तो उसने उन बातों को रिकॉर्ड कर लिया. यह रिकॉर्डिंग उसने अपने पति को तो सुनाई ही उसके साथ-साथ अपनी एक सहकर्मी को भी सुनाई, और उसी सहकर्मी ने यह बात स्टाफ के कुछ और लोगों को बता दी. अब हुआ यह कि नूरिल की ग़ैर मौज़ूदगी में उसके स्टाफ के कुछ लोगों ने उसके फोन से इस रिकॉर्डिंग की कॉपी बना ली अपने कुछ साथियों को भी सुना दी. उड़ते उड़ते यह बात प्रिंसिपल तक भी जा पहुंची. उसे तो आग-बबूला होना ही था. प्रिंसिपल ने नूरिल को बुला कर धमकाया और कहा कि जब तक वो उस रिकॉर्डिंग को डिलीट नहीं कर देती, उसके अनुबंध को विस्तार नहीं दिया जाएगा. नूरिल के मना कर देने पर उसे नौकरी से निकाल दिया गया.

असल दुखदायी प्रकरण इसके बाद शुरु हुआ. नूरिल को नौकरी से निकाल देने के बाद प्रिंसिपल ने पुलिस में शिकायत दर्ज़ कराई कि नूरिल ने उसके विरुद्ध मानहानि का आपराधिक काम किया है. पुलिस ने कोई दस-बारह बार नूरिल को तफ़्तीश के लिए बुलाया और अंतत: उसे गिरफ़्तार  कर लिया. अभियोग पक्ष ने उस पर अश्लील सामग्री के वितरण का, न कि मानहानि का,  आरोप लगाया. नूरिल को दो महीने ज़ेल में गुज़ारने पड़े, हालांकि इस बीच उसके स्कूल की सहकर्मियों ने अपने ये बयान भी दर्ज़ कराए कि उस रिकॉर्डिंग  का वितरण नूरिल ने नहीं किया था अपितु उन्होंने ही उसके फोन से उसे लेकर वितरित किया था. नूरिल के वकील ने भी यह तर्क दिया कि नूरिल ने यह रिकॉर्डिंग अपने बचाव के लिए की थी और इसे अपने ही पास रखा था, उसने इसका वितरण भी नहीं किया था. उधर प्रिंसिपल ने अपने बचाव में यह कहा कि फोन पर सुनाई दे रहे वार्तालाप का नूरिल से कोई सम्बंध नहीं है. इस वार्तालाप में वे तो एक अमरीकी पोर्न अभिनेत्री को सम्बोधित कर ये बातें कह रहे हैं. अंतत:  अदालत ने भी पाया कि इस मामले में नूरिल दोषी नहीं है.

लेकिन किस्सा यहां ख़त्म नहीं हुआ. प्रिंसिपल  के वकील इसके बाद इस मामले को इण्डोनेशिया के कानूनी प्रावधानों के तहत सुप्रीम कोर्ट ले गए और वहां बग़ैर नूरिल को अपनी बात कहने का कोई मौका दिये, निचली अदालत के फैसले को उलटते हुए नूरिल को अश्लील सामग्री के वितरण का दोषी करार दे दिया गया.  उसे छह माह के कारावास और पैंतीस हज़ार डॉलर के जुर्माने की सज़ा सुना दी गई.  अगर वो यह राशि जमा न  करा सके तो उसे तीन माह का अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा. इस सारे मामले का एक दुखद पहलू यह और है कि प्रिंसिपल को वहां के स्थानीय प्रशासन में और बड़े तथा महत्वपूर्ण पद पर भेज दिया गया.

असल में इण्डोनेशिया के कानून अभी भी बहुत हद तक स्त्री विरोधी हैं. किसी स्त्री के विरुद्ध अश्लील बातें करना अपराध नहीं माना जाता है. औरतों से अपेक्षा की जाती है कि वे न केवल पुरुषों की इस तरह की अभद्रताओं  को सहती रहेंगी,  अपनी नौकरी की खातिर उच्चाधिकारियों को ‘खुश’ भी करेंगी.  स्त्रियों के विरुद्ध होने वाले अपराधों की पड़ताल के लिए वहां महिला पुलिस की भारी कमी है, और इसके मूल में वहां प्रचलित वर्जिनिटी टेस्ट की शर्मनाक व्यवस्था भी है. इस सबके बावज़ूद नूरिल अपनी लड़ाई ज़ारी रखे है. वह वहां प्रतिरोध की एक प्रतीक बन कर उभरी है, हालांकि इस लड़ाई में उसकी जीत की उम्मीद शायद ही किसी को हो.
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 15 जनवरी, 2019 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, May 24, 2016

क्या पुलिस को भी संरक्षण मिलना चाहिए?

अपने देश में आए दिन कभी यहां से तो कभी वहां से पुलिस कर्मियों के साथ दुर्व्यवहार,  मारपीट और  यहां तक कि कभी-कभी उनकी हत्याओं तक की खबरें आती रहती हैं. पुलिस के साथ बदसुलूकी तो आम बात है और अच्छी खासी समझ रखने वाले भी उनके प्रति अपशब्दों और अपमानजनक अभिव्यक्तियों का प्रयोग करते रहते हैं. ऐसे में मुझे सुदूर अमरीका से आया एक समाचार विशेष रूप से ध्यानाकर्षक लगा. उस समाचार की चर्चा और विश्लेषण से पहले उसकी पृष्ठभूमि बता दूं.    

संयुक्त राज्य अमरीका के बहुत सारे राज्यों में उन लोगों को अतिरिक्त दण्ड देने के प्रावधान हैं जो नस्ल या धर्म के आधार पर किसी के विरुद्ध किसी भी तरह का अपराध करते हैं. यानि वहां अगर कोई किसी खास समूह से संलग्नता  के आधार पर किसी से  घृणा  करते हुए कोई अपराध करता है तो उस अपराध की गम्भीरता को बढ़ा कर देखा जाता है. सामान्यत: इस घृणा  में जातीयता, लैंगिकता या शारीरिक अक्षमता को शामिल किया जाता रहा है. लेकिन अब वहीं के एक राज्य लुइज़ियाना में बहुत जल्दी एक नया विधेयक पारित होकर लागू होने वाला है जिससे इस घृणा-अपराध कानून के तहत जन-सुरक्षा कार्मिकों (पुलिस और अग्नि रक्षक) को भी एक संरक्षक प्रजाति माना जाने लगेगा. इस विधेयक के लागू हो जाने के बाद इन सुरक्षा कार्मिकों के विरुद्ध किसी भी तरह का गम्भीर अपराध करने वालों पर पाँच हज़ार डॉलर तक का आर्थिक दण्ड या उन्हें पाँच साल के कारावास की सज़ा दी जा सकेगी. उल्लेखनीय है कि लुइज़ियाना ऐसा करने वाला अमरीका का पहला राज्य होगा. लुइज़ियाना में इस विधेयक को ‘ब्ल्यू लाइव्ज़  मैटर’  (नीली वर्दी वालों की भी जान कीमती होती है) के नाम से जाना जा रहा है. इस नामकरण का इतिहास यह है कि फर्ग्युसन  में  सन 2014 में माइकल ब्राउन नामक एक निहत्था अश्वेत किशोर पुलिस की गोलीबारी में मारा गया था और तब पुलिस की इस तथाकथित  ज़्यादती के खिलाव एक बड़ा अभियान  शुरु हुआ था जिसे ‘ब्लैक  लाइव्ज़ मैटर’ कहा गया था. अब इस ब्ल्यू लाइव्ज़  वाले नए अभियान के समर्थकों का कहना है कि ज़्यादा हमले तो पुलिस पर ही होते हैं, जबकि असल   में तो वह  कानून व्यवस्था स्थापित करने के अपने दायित्व का ही निर्वहन कर रही होती है.
इस बात की पुष्टि  नेशनल लॉ एन्फोर्समेण्ट मेमोरियल फंड के इस दावे से भी होती है कि सन 2015 में कम से कम 124  पुलिस अधिकारी अपना कर्तव्य निर्वहन करते हुए मारे गए थे. एफबीआई ने भी पिछले सप्ताह जो आंकड़े ज़ारी किए हैं उनके अनुसार सन 2015 में 41 कानून और व्यवस्था अधिकारी अपना कर्तव्य पालन करते हुए दुर्भावनापूर्वक मार डाले गए थे.

स्वाभाविक ही है कि इस तरह के हमलों ने प्रभावितों को और सरकार को विचलित किया है. लेकिन लुइज़ियाना राज्य जो कदम करीब-करीब उठा चुका है उससे सभी सहमत हों, ऐसा फिर भी नहीं है. न्यू ऑर्लियंस स्थित ब्लैक यूथ प्रोजेक्ट 100 ऐसा ही एक एक्टिविस्ट समूह है जो इस कदम से तीव्र असहमति रखता है. अपने तीव्र प्रतिवाद में उसने  कहा है कि घृणा-अपराध विधेयक में पुलिस को भी एक संरक्षित वर्ग के रूप में शामिल कर लेने से एक ऐसी संस्था को और अधिक संरक्षण मिलने लगेगा जो पहले से ही अपने कर्म, नीति और प्रभाव में आंकड़ों द्वारा नस्लीय साबित हो चुकी है. इस संगठन का यह भी कहना है कि हम तो इसे पुलिस की नृशंसता के विरुद्ध लोगों द्वारा चलाये जा रहे अभियान के खिलाफ एक विधायी आक्रमण और राजनीतिक प्रतिकार के रूप में देखते हैं.  इसी तरह एण्टी डिफेमेशन लीग के क्षेत्रीय निदेशक ने भी इस कदम को अविवेकपूर्ण बताया है. इस विधेयक के आलोचकों को आशंका यह है कि अगर यह लागू हो गया तो इसका दुरुपयोग पुलिस के खिलाफ होने वाले प्रतिरोध को कुचलने में किया जाने लगेगा. बोस्टन स्थित नॉर्थ ईस्टर्न यूनिवर्सिटी के  अपराध शास्त्री  जैक लेविन ने तो और भी मार्के की बात कही है. उन्होंने आशंका व्यक्त की है कि हो सकता है संरक्षित समूहों की इस सूची में बाद में और कुछ समूह जोड़ दिये जाएं. लेकिन पुलिस को इस सूची में शामिल करने की सबसे बड़ी बुराई यह है कि वह उन बहुत सारे संगठनों में से एक है जो पहले ही काफी खतरनाक हैं. लेविन ने एक और गौर तलब बात यह कही है कि जिन खतरों की बात कहते हुए पुलिस को यह संरक्षण प्रदान किया जाने वाला है वे तो उसके कर्तव्य का हिस्सा हैं.

यानि सरकार का सोच एक तरफ और बहुत सारे संगठनों का सोच उसके विपरीत. और दोनों के अपने-अपने सशक्त तर्क. सोचें कि अगर हमारे देश में भी ऐसा ही कुछ हो तो हमारी प्रतिक्रिया  क्या होगी!   

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 24 मई, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकशित आलेख का मूल पाठ. 
  

Tuesday, March 15, 2016

मेक्सिको पुलिस का एक अनूठा प्रयोग

जब भी पुलिस शब्द कानों में पड़ता है एक ख़ास किस्म की दृढ़ता भरी, रौब-दाब वाली छवि जेह्न में उभर आती है. पुलिस का काम ही कुछ ऐसा है कि उसकी छवि इससे इतर हो ही नहीं सकती. उसे कानून  व्यवस्था  कायम करनी होती है, अपराध पर नियंत्रण पाना होता है, नागरिकों को सुरक्षा प्रदान करनी होती है, वगैरह. और यह सब दृढ़ता के बिना मुमकिन नहीं हो सकता. लेकिन अगर कुछ समय पहले आप मेक्सिको गए होते तो आप मेरी बात से ज़रूर असहमत  होते. असल में वहां सन 2013 में एक रिटायर्ड जनरल रोनाल्डो यूजीनियो हिडाल्गो एडी ने एक ख़ास किस्म की ब्रिगेड का गठन किया था. और  जब  मेक्सिको के 57 वें राष्ट्रपति एनरिक पेना निएटो ने इस ब्रिगेड के सदस्यों के साथ खिंचाई हुई अपनी एक फोटो प्रकाशित करवाई तब से यह ब्रिगेड  चर्चाओं में आई.

असल में मेक्सिको के अकापुल्को इलाके के पुलिस चीफ ने वहां की नगरपालिका पुलिस के विस्तार के रूप में एक टूरिस्ट असिस्टेंस ब्रिगेड का गठन किया था जिसमें 18 से 28 वर्ष की वय वाली कुल 42 युवतियां शामिल थीं. इस ब्रिगेड का मुख्य दायित्व था वहां के पर्यटकों की संतुष्टि सुनिश्चित  करना. इसके लिए उन्हें वहां के समुद्र तटों की निगरानी करनी होती थी, पैदल चलने वालों की सुविधा के लिए ट्रैफिक को  नियंत्रित करना होता था और जब तक पुलिस उन्हें गिरफ्तार न कर ले तब तक अपराधियों को हथकड़ी लगाकर रखना होता और इसी तरह के अन्य दायित्वों का निर्वहन करना होता था. ये सारे काम करने  के लिए इस ब्रिगेड की सदस्याओं को आत्म रक्षा, जीवन रक्षा और भीड़ को नियंत्रित करने के लिए   मेक्सिकन फेडेरल सेना की तरफ से तीन महीने का  प्रशिक्षण दिया जाता था. इन्हें हर माह करीब साढ़े चार सौ डॉलर का वेतन दिया जाता था.

और अब ख़ास बात. इस ब्रिगेड में युवतियों को उनके शारीरिक आकर्षण के आधार पर भर्ती किया जाता था और उन्हें टाइट फिटिंग वाली यूनीफॉर्म पहननी होती  थी, जिसमें भूरे रंग के बरमूडा शॉर्ट्स, हल्के नीले रंग के पोलो शर्ट्स, गुलाबी लिपस्टिक और सनग्लासेस शामिल थे. इन्हें  4.7 इंच की हील पहननी होती थी. इस ब्रिगेड की शिफ्ट सुबह सात बजे से शुरु होती थी और सबसे पहले तीस मिनिट तक इन्हें मेक अप करना होता था, जिसके बाद म्युनिसिपल फोर्स के वरिष्ठ अधिकारी इनका  मुआयना करते.  उसके  बाद ही ये अपनी ड्यूटी पर जा सकती थीं. इस ब्रिगेड को दुनिया की सबसे ज़्यादा सेक्सी पुलिस टुकड़ी कहा और  माना जाता था. यह सुनकर भी अगर आप चौंक नहीं रहे हैं तो फिर यह और जान लीजिए कि अधिकारी गण को इस बात से कोई आपत्ति नहीं थी कि यह पुलिस टुकड़ी पर्यटकों के साथ फ्लर्ट करे, क्योंकि वे चाहते थे कि पर्यटक वहां की सुहानी यादें अपने साथ लेकर जाएं.

अब ज़रा इस सबकी पृष्ठभूमि भी जान लीजिए. दर असल मेक्सिको के इस हिस्से की अर्थव्यवस्था का अस्सी प्रतिशत पर्यटन पर आधारित है लेकिन जब से वहां ड्रग माफिया के आपसी टकरावों ने गैंग वार्स की शक्ल अख्तियार की, वहां का पर्यटन बहुत बुरी तरह से प्रभावित हुआ. तब वहां के प्रशासन को लगा कि पर्यटकों का भरोसा और उनका दिल जीतना ज़रूरी है. उन्हें यह भी लगा कि ऐसी नवाचारी पुलिस उनमें ज़िम्मेदारी और विश्वास का भाव जगा सकेगी, और महिलाओं की यह टुकड़ी शायद भ्रष्ट तौर तरीकों से भी दूरी बरतेगी. और न केवल पर्यटकों ने बल्कि खुद इन पुलिस कर्मियों ने भी इस प्रयोग की सराहना की. एक पुलिस कर्मी ने अपना अनुभव  साझा करते हुए कहा कि आप अनुमान भी नहीं लगा सकते कि कोई बेहद खतरनाक ड्राइवर भी उस वक्त कितना शालीन बन जाता है जब कोई सेक्सी लड़की उसके खिलाफ़ कार्यवाही करती है.

लेकिन मेक्सिको के उस राज्य में पुलिस की कमान जैसे ही एक नए  चीफ ने सम्हाली, यह प्रयोग बीते ज़माने की बात बना दिया गया. इस नए चीफ एडुआर्डो बाहेना ने इस  टुकड़ी की 13 कार्मिकों की तो छुट्टी ही कर दी और शेष को हुक्म दिया कि वो पुलिस की आम वर्दी पहनना शुरु कर दें. कुछ कार्मिकों ने इस बदलाव का भी स्वागत किया है. मसलन उनमें से एक, रोसा का कहना है कि जब वे उस सेक्सी यूनीफॉर्म में होती थीं तो लोग ताज्जुब करते हुए उनके पास आते थे, क्योंकि मैं  असल पुलिस वाली लगती ही नहीं थीं. अब जब मैं पुलिस की वर्दी और पुलिस के जूते पहनती हूं तो मुझे गर्व महसूस होता है. गर्व तो मुझे पहले भी था लेकिन अब वह बढ़ गया है.

होली दूर नहीं है. इसलिए अब ज़रा यह कल्पना करने का कष्ट कीजिए कि अगर कभी हमारे देश में भी ऐसा प्रयोग किया गया तो हमें  कैसी छवियां देखने को मिलेंगी?

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 15 मार्च, 2016 को मैक्सिको में सुन्दरता से अपराध पर काबू पाने का हुआ प्रयास शीर्षक से प्रकाशित  आलेख का मूल पाठ.  

Tuesday, March 24, 2015

हमारे परिवेश की देन है नकल

बिहार में मैट्रिक की परीक्षा में अपने परिजनों को नकल करवाने के लिए दीवार पर चढ़े अभिभावकों और शुभ चिंतकों की तस्वीर इण्टरनेट पर और अन्य समाचार माध्यमों में आने के बाद एक बार फिर से परीक्षाओं में नकल को लेकर गम्भीर चर्चाएं शुरु हो गई हैं. बात किसी एक राज्य की या अन्य राज्यों की तुलना में उसके बदतर होने या न होने की नहीं है. शिक्षा से जुड़े लोग इस बात  से भली भांति अवगत हैं कि आम तौर पर जो शिक्षा एवम परीक्षा प्रणाली हमारे यहां प्रचलन में है  उसमें नकल को रोक पाना लगभग असम्भव है. हर परीक्षार्थी नकल नहीं करता है और हर जगह नकल करने वालों की संख्या भी समान नहीं होती है, लेकिन अगर कोई यह कहता है कि सिर्फ अमुक जगह ही नकल होती है तो स्पष्ट ही वह उस जगह विशेष के साथ अन्याय कर रहा है.
अपने लगभग साढ़े तीन दशकों लम्बे अध्यापन काल में मैंने नकल के अनेक रूप देखे हैं. कुछ विद्यार्थी नकल के लिए अपने कौशल का, छल का इस्तेमाल करते हैं तो कुछ बाहु बल का. और ऐसा भी नहीं है कि सारा दोष विद्यार्थियों का ही है. बहुत बार शिक्षक या संस्था प्रमुख, और विशेष रूप से निजी संस्थाओं वाले अपने विद्यार्थियों को नकल करने की सुविधा उपलब्ध करते हैं या नकल करने में उनकी सहायता करते हैं. हम सब अंतत: एक ही समाज और एक ही परिवेश की उपज हैं इसलिए इसे बहुत अस्वाभाविक भी नहीं माना जाना चाहिए. जब कोई रिश्वत लेकर या देकर काम करवा सकता है तो भला उसे नकल से क्यों गुरेज़ होगा?

यह लिखते हुए मुझे एक प्रसंग याद आ रहा है. मैं एक कॉलेज का प्राचार्य था और इसलिए स्वभावत:  अपने कॉलेज के परीक्षा केन्द्र का अधीक्षक भी था. सरकार ने नकल रोकने के लिए जो बहुत सारे कदम उठाये थे उनमें से एक यह भी था कि जो भी परीक्षार्थी नकल करते हुए पकड़ा जाए उसके खिलाफ पुलिस में एफ आई आर भी अनिवार्यत: दर्ज़ करवाई जाए. इस वजह से स्थानीय पुलिस प्रशासन से कई कई दफा सम्पर्क भी होता रहता था. एक दिन स्थानीय पुलिस के एक अधिकारी जी का फोन आया और उनके स्वर में जो अतिरिक्त मिठास थी, उसने मुझे अनायास ही चौकन्ना कर दिया. पहले तो वे इधर उधर की बातें करते रहे, फिर बड़े सहज भाव से बोले कि उनका साला भी मेरे केन्द्र से परीक्षा दे रहा है और उसकी परीक्षा अभी शुरु होने ही वाली है. मैंने अपनी मासूमियत को बरक़रार रखते हुए साले साहब  के लिए उन्हें बेस्ट ऑफ लक कहा, और बात को दूसरी तरफ मोड़ना  चाहा, लेकिन वे वहीं रुके रहे, और फिर बोले कि मैं उसका ध्यान रखूं. अब मैं समझ गया था कि वे क्या चाहते थे! लेकिन उस वक़्त  नासमझ बना रहना ही सुविधाजनक था, इसलिए मैंने उनसे कहा कि वे आश्वस्त रहें, हमारे यहां उसे कोई असुविधा नहीं होगी. सारे कमरों में पंखे हैं, और पानी भी ठण्डा ही पिलाया जाता है. अब उन्हें भी सीधे ही अपनी बात कहना ज़रूरी लगा, सो बोले: “नहीं सर, वो ऐसा है कि इस साल वो ठीक से पढ़ाई नहीं कर सका है, इसलिए आप उसका ज़रा ध्यान रख लें तो.....”  बात बिल्कुल साफ थी. अब मैं भी कुछ मज़े लेने के मूड में आ चुका था. तुरंत बोला, “अरे हां, मुझे भी एक काम याद आ गया है.”  पुलिस अधिकारी जी तो ऑब्लाइज़ करने के लिये जैसे तैयार ही बैठे थे. “‘सर हुक्म कीजिए”. “वो ऐसा है कि मेरा  भी एक साला है. ज़्यादा पढ़ लिख नहीं सका, और घर की आर्थिक स्थिति भी ठीक नहीं है. अगर आप आज रात उसे कहीं सेंध लगा लेने दें तो...”  और मैं अपना  वाक्य पूरा करता उससे पहले ही उन्होंने फोन काट दिया. मेरा मकसद तो पूरा हो ही गया था.

और नकल की बात करते हुए मुझे अपने स्कूली जीवन के एक सहपाठी  की और याद आ रही है. बहुत ही कुशल नकलची था वो. तेज़ से तेज़ वीक्षक की आंखों में धूल झोंककर नकल कर लेने में माहिर. लेकिन फिर भी नकल का कोई लाभ उसके परिणाम में देखने को नहीं मिलता. आखिर हमने अपने एक शिक्षक से इस बात का राज़ पूछ ही लिया. उन्होंने बताया कि वह बन्दा अपने आगे-पीछे वाले किसी अन्य परीक्षार्थी से पूछता कि किताब में कहां से कहां तक टीपना है और फिर यथावत कॉपी में उतार डालता. परिणाम यह कि ‘बच्चों, तुम पिछले अध्याय में पढ़ चुके हो’ और ‘देखो चित्र संख्या  7’ जैसे वाक्य भी उसकी उत्तर पुस्तिका में पाए जाते. अब ऐसे अतुलनीय विद्यार्थी को तो कोई असाधारण परीक्षक ही पुरस्कृत कर सकता था.

तो अनंत है यह नकल पुराण. मुझे तो इसका समाधान परीक्षा प्रणाली में बदलाव में ही नज़र आता है, और उसकी फिलहाल कोई सम्भावना नज़र नहीं आती.


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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत  मंगलवार, 24 मार्च, 2015 को 'नकल करवानी है तो लगवाने दो सेंध' शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.      

Tuesday, March 11, 2014

अच्छे काम की तारीफ़ भी की जानी चाहिए!

कुछ विभागों के बारे में इतना ज़्यादा  नकारात्मक पढ़ने सुनने को मिल चुका होता है कि हम यह मानने को तैयार ही नहीं होते हैं कि ये विभाग कोई सही और  अच्छा काम भी करते हैं! ऐसे विभागों की अगर कोई सूची बनाई जाए तो पुलिस विभाग का नाम उसमें काफी ऊपर आएगा. लेकिन अगर कोई कहे कि पुलिस के बारे में जो बातें बार-बार कही-सुनी जाती हैं, वे पूरी तरह सच नहीं है, और पुलिस ईमानदारी से काम करती है, तो भला कौन विश्वास करेगा? मैं भी नहीं करता, अगर मुझे एक ख़ास अनुभव नहीं हुआ होता. और उस अनुभव ने पुलिस के बारे में मेरी धारणा को एकदम बदल दिया.

बात ज़्यादा पुरानी नहीं हुई है. हम लोग जयपुर में अपना घर बंद करके छह महीनों के लिए अमरीका गए थे. पड़ोसी बहुत अच्छे हैं, इसलिए किसी को घर पर सुलाया नहीं, उन्हीं को कह कर चले गए कि वे घर का ध्यान रखें! साढ़े चार महीने सकुशल निकल गए. अचानक एक दिन जयपुर से अमरीका फोन आया कि हमारे घर  में चोरी हो गई है और घर का कुण्डा ताला टूटा पड़ा है.  घबराहट स्वाभाविक थी. पहले तो अपने  एक  स्थानीय रिश्तेदार से कहा कि वो जाकर घर सम्हाले, टूटा कुण्डा ताला वगैरह  बदलवा दे, और फिर सूरत में रह रहे बेटे से कहा कि वो एक दफा जयपुर आ जाए और घर को सम्हाल कर पुलिस में रपट वगैरह  लिखवा दे. और ये सारे काम हो गए.

कोई पंद्रह बीस दिन बाद हमारे पड़ोसियों ने बेटे को फोन करके कहा कि वो पुलिस से सम्पर्क करे, और जब उसने पुलिस से सम्पर्क किया तो उसे बताया गया कि हमारे घर में चोरी करने वाले को पकड़ लिया गया है और उससे काफी सामान बरामद हुआ है. आगे जो हुआ उसे संक्षेप में कहूं तो मात्र इतना कि हमारा चोरी गया सामान करीब-करीब पूरा मिल गया, और वो भी यथा कार्यक्रम अपना अमरीका प्रवास पूरा करके हमारे भारत  लौटने  के बाद. तब तक वो सामान पुलिस के पास सुरक्षित पड़ा रहा, कोई अमानत में खयानत नहीं हुई. हां, अदालती औपचारिकताएं हमें पूरी करनी पड़ीं, और उनमें कुछ अलग तरह के अनुभव भी हुए,  लेकिन  उनकी चर्चा यहां अप्रासंगिक होगी. 

दिलचस्प और प्रशंसनीय बात यह है कि पुलिस ने हमारे यहां चोरी करने वाले उस चोर को पकड़ा कैसे? हुआ यह कि पुलिस की नियमित गतिविधि के तहत एक चोर पकड़ा गया और उसके पास से काफी सारा माल बरामद हुआ. पुलिस उस चोर से यह नहीं जान सकी कि उसने कहां-कहां चोरी की थी. पुलिस चाहती तो आसानी से उस माल को हजम कर सकती थी, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया. उसने उस माल के मालिक का पता लगाने की भरपूर  कोशिश की. जो माल पुलिस को उससे बरामद हुआ, उसमें एक टू-इन-वन यानि रेडियो कम कैसेट रिकॉर्डर भी था, जिस पर किसी रेडियो रिपेयरिंग शॉप का लेबल लगा था. पुलिस उस टू-इन-वन को लेकर उस शॉप पर पहुंची और वहां से पता लगा कि यह टू इन वन अमुक जगह रहने वाले किसी व्यक्ति का था. जब पुलिस उस व्यक्ति को  तलाश करती वहां पहुंची तो बताया गया कि वह व्यक्ति तो वहां से अमुक कॉलोनी में रहने चला गया है. उसी बरामद हुए सामान में एक कीमती कैमरा भी था जिसमें एक आधी काम में ली हुई फोटो फिल्म भी थी. पुलिस ने उस फिल्म को धुलवाया तो उसमें किसी बच्चे की बर्थ डे पार्टी की कुछ तस्वीरें मिलीं. पुलिस उन तस्वीरों को लेकर हमारे घर वाली कॉलोनी में आई और वो तस्वीरें जब हमारे पड़ोसियों को दिखाई गईं तो उन्होंने तुरंत बता दिया कि वे हमारे पोते के जन्म दिन की तस्वीरें हैं. तो इस तरह उस रेडियो रिपेयरिंग शॉप और कैमरे की फिल्म के माध्यम से पुलिस ने यह पता लगाया कि बरामद हुआ यह सामान हमारा   है.

यह पूरा वृत्तांत लिखने का मेरा मकसद यही बताना है कि जिस पुलिस को कोसने का कोई मौका हम नहीं छोड़ते हैं, वो भी काम करती है लेकिन उसके काम की कोई तारीफ़  नहीं करता. मुझे यह कहना भी ज़रूरी लग रहा है कि मेरे घर हुई इस चोरी के मामले में पुलिस ने जो भी किया वो अपनी पहल पर किया, न कि मेरे किसी दबाव या प्रभाव के कारण. एक नागरिक के रूप में मुझे लगता है कि जो लोग हमारी सेवा के लिए नियोजित हैं, उनके मूल्यांकन में बेवजह अनुदार और नकारात्मक होकर हम उन्हें हतोत्साहित ही करते हैं. अगर उनके प्रति हम अपना रुख सकारात्मक बनाएं तो निश्चय ही वे और अधिक उत्साह  के साथ हमारी सेवा करेंगे.

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत 11 मार्च 2014 को कभी-कभी पुलिस भी होती है तारीफ की हक़दार शीर्षक से प्रकाशित कड़ी का मूल पाठ.