Tuesday, March 24, 2015

हमारे परिवेश की देन है नकल

बिहार में मैट्रिक की परीक्षा में अपने परिजनों को नकल करवाने के लिए दीवार पर चढ़े अभिभावकों और शुभ चिंतकों की तस्वीर इण्टरनेट पर और अन्य समाचार माध्यमों में आने के बाद एक बार फिर से परीक्षाओं में नकल को लेकर गम्भीर चर्चाएं शुरु हो गई हैं. बात किसी एक राज्य की या अन्य राज्यों की तुलना में उसके बदतर होने या न होने की नहीं है. शिक्षा से जुड़े लोग इस बात  से भली भांति अवगत हैं कि आम तौर पर जो शिक्षा एवम परीक्षा प्रणाली हमारे यहां प्रचलन में है  उसमें नकल को रोक पाना लगभग असम्भव है. हर परीक्षार्थी नकल नहीं करता है और हर जगह नकल करने वालों की संख्या भी समान नहीं होती है, लेकिन अगर कोई यह कहता है कि सिर्फ अमुक जगह ही नकल होती है तो स्पष्ट ही वह उस जगह विशेष के साथ अन्याय कर रहा है.
अपने लगभग साढ़े तीन दशकों लम्बे अध्यापन काल में मैंने नकल के अनेक रूप देखे हैं. कुछ विद्यार्थी नकल के लिए अपने कौशल का, छल का इस्तेमाल करते हैं तो कुछ बाहु बल का. और ऐसा भी नहीं है कि सारा दोष विद्यार्थियों का ही है. बहुत बार शिक्षक या संस्था प्रमुख, और विशेष रूप से निजी संस्थाओं वाले अपने विद्यार्थियों को नकल करने की सुविधा उपलब्ध करते हैं या नकल करने में उनकी सहायता करते हैं. हम सब अंतत: एक ही समाज और एक ही परिवेश की उपज हैं इसलिए इसे बहुत अस्वाभाविक भी नहीं माना जाना चाहिए. जब कोई रिश्वत लेकर या देकर काम करवा सकता है तो भला उसे नकल से क्यों गुरेज़ होगा?

यह लिखते हुए मुझे एक प्रसंग याद आ रहा है. मैं एक कॉलेज का प्राचार्य था और इसलिए स्वभावत:  अपने कॉलेज के परीक्षा केन्द्र का अधीक्षक भी था. सरकार ने नकल रोकने के लिए जो बहुत सारे कदम उठाये थे उनमें से एक यह भी था कि जो भी परीक्षार्थी नकल करते हुए पकड़ा जाए उसके खिलाफ पुलिस में एफ आई आर भी अनिवार्यत: दर्ज़ करवाई जाए. इस वजह से स्थानीय पुलिस प्रशासन से कई कई दफा सम्पर्क भी होता रहता था. एक दिन स्थानीय पुलिस के एक अधिकारी जी का फोन आया और उनके स्वर में जो अतिरिक्त मिठास थी, उसने मुझे अनायास ही चौकन्ना कर दिया. पहले तो वे इधर उधर की बातें करते रहे, फिर बड़े सहज भाव से बोले कि उनका साला भी मेरे केन्द्र से परीक्षा दे रहा है और उसकी परीक्षा अभी शुरु होने ही वाली है. मैंने अपनी मासूमियत को बरक़रार रखते हुए साले साहब  के लिए उन्हें बेस्ट ऑफ लक कहा, और बात को दूसरी तरफ मोड़ना  चाहा, लेकिन वे वहीं रुके रहे, और फिर बोले कि मैं उसका ध्यान रखूं. अब मैं समझ गया था कि वे क्या चाहते थे! लेकिन उस वक़्त  नासमझ बना रहना ही सुविधाजनक था, इसलिए मैंने उनसे कहा कि वे आश्वस्त रहें, हमारे यहां उसे कोई असुविधा नहीं होगी. सारे कमरों में पंखे हैं, और पानी भी ठण्डा ही पिलाया जाता है. अब उन्हें भी सीधे ही अपनी बात कहना ज़रूरी लगा, सो बोले: “नहीं सर, वो ऐसा है कि इस साल वो ठीक से पढ़ाई नहीं कर सका है, इसलिए आप उसका ज़रा ध्यान रख लें तो.....”  बात बिल्कुल साफ थी. अब मैं भी कुछ मज़े लेने के मूड में आ चुका था. तुरंत बोला, “अरे हां, मुझे भी एक काम याद आ गया है.”  पुलिस अधिकारी जी तो ऑब्लाइज़ करने के लिये जैसे तैयार ही बैठे थे. “‘सर हुक्म कीजिए”. “वो ऐसा है कि मेरा  भी एक साला है. ज़्यादा पढ़ लिख नहीं सका, और घर की आर्थिक स्थिति भी ठीक नहीं है. अगर आप आज रात उसे कहीं सेंध लगा लेने दें तो...”  और मैं अपना  वाक्य पूरा करता उससे पहले ही उन्होंने फोन काट दिया. मेरा मकसद तो पूरा हो ही गया था.

और नकल की बात करते हुए मुझे अपने स्कूली जीवन के एक सहपाठी  की और याद आ रही है. बहुत ही कुशल नकलची था वो. तेज़ से तेज़ वीक्षक की आंखों में धूल झोंककर नकल कर लेने में माहिर. लेकिन फिर भी नकल का कोई लाभ उसके परिणाम में देखने को नहीं मिलता. आखिर हमने अपने एक शिक्षक से इस बात का राज़ पूछ ही लिया. उन्होंने बताया कि वह बन्दा अपने आगे-पीछे वाले किसी अन्य परीक्षार्थी से पूछता कि किताब में कहां से कहां तक टीपना है और फिर यथावत कॉपी में उतार डालता. परिणाम यह कि ‘बच्चों, तुम पिछले अध्याय में पढ़ चुके हो’ और ‘देखो चित्र संख्या  7’ जैसे वाक्य भी उसकी उत्तर पुस्तिका में पाए जाते. अब ऐसे अतुलनीय विद्यार्थी को तो कोई असाधारण परीक्षक ही पुरस्कृत कर सकता था.

तो अनंत है यह नकल पुराण. मुझे तो इसका समाधान परीक्षा प्रणाली में बदलाव में ही नज़र आता है, और उसकी फिलहाल कोई सम्भावना नज़र नहीं आती.


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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत  मंगलवार, 24 मार्च, 2015 को 'नकल करवानी है तो लगवाने दो सेंध' शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.      
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