Wednesday, December 30, 2015

आइये, हम भी नए साल का स्वागत दूध से करें!

पिछले कुछ बरसों से नव वर्ष की पूर्व सन्ध्या से पहले शहर में कई जगह बैनर नज़र आने लगे हैं – नए साल का स्वागत दारु से नहीं दूध से कीजिए! बहुत सारे होटल और टैक्सी वाले इस आशय के विज्ञापन जारी करते हैं कि नए साल की पार्टी से लौटते हुए खुद ड्राइव न करें और उनकी सेवाओं का लाभ उठाएं. नए साल के पहले दिन के अखबारों में और कोई ख़बर हो न  हो, यह खबर ज़रूर होती है कि पुलिस ने नशे में ड्राइव करते हुए इतने वाहन चालकों को पकड़ा. ये सारी बातें मुझे याद इस ख़बर को पढ़ते हुए आईं कि अमरीका में शराब के कारण  होने वाली मौतों में पिछले 35 बरसों में सबसे ज़्यादा इज़ाफा पाया गया है. वहां की सरकार द्वारा ज़ारी आंकड़ों के अनुसार पिछले बरस तीस हज़ार सात सौ अमरीकियों ने शराब  के कारण अपनी जान गंवाई. शराब के कारण,  यानि जहरीली शराब के कारण या शराब से होने वाली बीमारियों जैसे सिरोसिस के कारण. इसका मतलब यह कि इस संख्या में वे अभागे शामिल नहीं हैं जिनकी जानें नशे में वाहन चलाने के कारण हुई दुर्घटनाओं, अन्य दुर्घटनाओं या शराब जन्य अन्य अपराधों में गई. अगर उन सबको भी शुमार कर लें तो यह संख्या बढ़कर नब्बे हज़ार तक पहुंच  जाती है.

आंकड़े बताते हैं कि कम से कम तीस प्रतिशत अमरीकी ऐसे हैं जो शराब को हाथ तक नहीं लगाते हैं. और लगभग इतने ही अमरीकी ऐसे हैं जिन्होंने इस पदार्थ से एकदम तो तौबा नहीं कर रखी है लेकिन औसतन एक ड्रिंक प्रति सप्ताह की सीमा रेखा को वे पार नहीं करते हैं. और ऐसे लोगों के पक्ष में यह बात भी याद कर ली जानी चाहिए कि चिकित्सा विशेषज्ञों का मत है कि अगर कोई व्यक्ति हर रोज़ एक से दो तक ड्रिंक ले ले तो उसकी  मृत्यु की सम्भावना में काफी कमी आ जाती है, यानि इतनी मदिरा  तो सेहत के लिए मुफीद होती है.

लेकिन इस कम्बख़्त शराब के साथ एक बड़ी मुश्क़िल तो यह है कि इसके सेवन की मात्रा कब सुरक्षित से असुरक्षित के पाले में जाकर प्रणघातक के घेरे में आ जाएगी, नहीं कहा जा सकता. प्रति सप्ताह एक ड्रिंक से घटकर प्रति दिन एक ड्रिंक और फिर दो और फिर तीन...होते होते कब कोई उन मात्र दस प्रतिशत सबसे ज्यादा पियक्कड़ अमरीकियों की जमात में आ जाता है जो औसतन दस ड्रिंक प्रति सप्ताह तक गटक जाते हैं और आहिस्ता-आहिस्ता नहीं,  बड़ी तेज़ी से परलोक की तरफ भागने लगते हैं. अमरीका के आंकड़ों  पर विश्वास करें तो वहां प्रति व्यक्ति शराब के  सेवन में लगातार वृद्धि हुई है. न केवल प्रति व्यक्ति, बल्कि उसकी आवृत्ति में भी यही प्रवृत्ति दिखाई दी है. रोचक बात यह कि कम मात्रा में या बड़े अंतराल से पीने वालों की संख्या और उनके द्वारा पी गई मदिरा की मात्रा में जहां बहुत मामूली वृद्धि लक्षित की गई वहीं, अधिक मात्रा में या कम अंतराल पर पीने वालों में यह वृद्धि भी अधिक पाई गई.

अमरीका में इस प्रवृत्ति का अध्ययन करने वालों का ध्यान एक और बात की  तरफ गया है और वह यह कि वहां महिलाओं में भी मदिरापान की आदत बढ़ती जा रही है. सन 2002 में जहां माह में एक बार मदिरापान करने वाली महिलाओं का प्रतिशत  47.9 था वहीं 2014 में यह बढ़कर 51.5 तक जा पहुंचा था. लेकिन इस आंकड़े से भी ज़्यादा चिंताजनक आंकड़ा यह था कि इसी  काल खण्ड में ताबड़तोड़ (यानि एक दफा में पाँच या अधिक ड्रिंक्स) पीने वाली महिलाओं की संख्या 15.7 प्रतिशत से बढ़कर 17.4 प्रतिशत तक जा पहुंची है.

इस सारे प्रसंग में जो सबसे अधिक खतरनाक बात सामने आई है वो यह है कि अमरीका में शराब हेरोइन या कोकेन जैसे नशीले पदार्थों से भी अधिक घातक साबित हो रही है. और इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि शराब के मामले में लाभप्रद, सुरक्षित और घातक के बीच की सीमा  रेखा बहुत बारीक होती है और उसकी अनदेखी बहुत आसान है. और यही वजह है कि वहां के ज़िम्मेदार लोग अब बहुत ज़ोर-शोर से यह आवाज़ उठाने लगे हैं कि सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा के अधिकारियों को मारिजुआना और एल एस डी जैसी ड्रग्स की अपेक्षा शराब के खतरों पर अधिक ध्यान केन्द्रित करना चाहिए. वहां यह  आवाज़ भी उठने लगी है कि मदिरापान को नियंत्रित करने के लिए उन संघीय करों में इज़ाफा किया जाए जो ऐतिहासिक लिहाज़ से अभी निम्नतम स्तर पर हैं.

तो आइये, हम तो  नए साल का स्वागत दूध से करें!  

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, दिनांक 30 दिसम्बर, 1015 को प्रकाशित इसी शीर्षक के आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, December 22, 2015

मासूम नहीं, जन्मजात क़ातिल होती हैं ये!

पश्चिम के देशों में पालतू जानवर (पेट्स) रखने का चलन बहुत अधिक है. कोई कुत्ता पालता है, कोई बिल्ली तो कोई गिलहरी तो कोई लोमड़ी, तो कोई  कुछ और. अपने अमरीका प्रवास के दौरान जब मैंने इसकी वजह जानने की कोशिश की तो वहां के समाज से परिचित लोगों ने बताया कि वे लोग मनुष्य पर पशु को इसलिए तरजीह देते हैं कि वो कोई अपेक्षा नहीं रखता है. इस सोच पर काफी लम्बी बहस हो सकती है. फिलहाल तो मैं पालतू पशु के सन्दर्भ में न्यूज़ीलैण्ड की बात करना चाहता हूं जहां बिल्ली पालने का चलन इतना अधिक है कि एक मोटे अनुमान के अनुसार वहां की आधी आबादी ने कम से  कम एक बिल्ली तो पाल ही रखी है और न्यूज़ीलैण्ड दुनिया के सबसे ज़्यादा बिल्लियां पालने वालों का देश है.   

लेकिन अब इसी बिल्ली-प्रेमी न्यूज़ीलैण्ड में गारेथ मॉर्गन नाम एक सज्जन ने यह बीड़ा उठाया है कि वे जितना जल्दी सम्भव हुआ, अपने देश को बिल्ली-मुक्त देश बनाकर रहेंगे! ये मॉर्गन महाशय जो एक प्राणी विज्ञानी हैं, अपने देश में कैट्स टू गो नाम से एक प्रोजेक्ट चलाते हैं  और इनका कहना है कि बिल्लियां उतनी मासूम नहीं होती हैं, जितना आप उन्हें समझते हैं! अपनी वेबसाइट पर इन्होंने लिखा है कि रूई के रोंये के गोले जैसे जिस प्राणी को आप पालते हैं वो तो जन्मजात  क़ातिल है! अपनी बात को और स्पष्ट करने के लिए इन्होंने अपनी वेबसाइट पर बिल्ली की फोटोशॉप की हुई भयानक  सींगों वाली एक तस्वीर भी लगा रखी है. मॉर्गन कहते हैं, “सच्चाई तो यह है कि अगर आप अपने पर्यावरण की तनिक भी परवाह करते हैं तो आपको इन बिल्लियों को दफा कर देना चाहिए!”

और अब ज़रा बिल्लियों के इन दुर्वासा की नाराज़गी की वजह भी जान लीजिए! मॉर्गन का मानना है कि बिल्लियां अकेले दम ही उनके देश की अनेक स्थानीय पक्षी प्रजातियों को विलुप्त  करती जा रही हैं. मॉर्गन ने बाकायदा अध्ययन करके बताया है कि औसतन एक बिल्ली साल में तेरह शिकार करके घर लाती है. लेकिन असल में तो वो अपने किये हुए पाँच शिकारों में से एक को ही घर पर लाती  है, इस तरह हर बिल्ली साल में कम से कम पैंसठ शिकार करती है. और क्योंकि बिल्लियां आम तौर पर सुनसान जगहों पर रहती हैं और काफी लम्बी दूरियां तै करने की सामर्थ्य  रखती हैं वे चूहों के अलावा अनेक पक्षियों व अन्य प्राणियों का भी शिकार कर लेती हैं. हालांकि  एक अन्य वन्यजीव विशेषज्ञ जॉन इनस इसी बात के लिए बिल्लियों के प्रशंसक भी हैं कि वे चूहों को मारकर या भगाकर चिड़ियों  की रक्षा करती हैं, ज़्यादातर पर्यावरण प्रेमी बिल्लियों से नाराज़ ही लगते हैं. डेविड विण्टर नाम के एक वन्यजीव ब्लॉगर कहते हैं कि बिल्लियां न्यूज़ीलैण्ड की कम से कम छह पक्षी प्रजातियों का खात्मा कर चुकी हैं. लॉरा हेल्मुट भी उन्हीं की आवाज़ में अपनी आवाज़ मिलाते हुए कहती हैं कि बिल्लियां हर जगह घुसपैठ कर लेती हैं और वे उस द्वीप के ऐसे ईकोसिस्टम को नष्ट कर रही हैं जिसमें कुछ ऐसी  प्रजातियां भी मौज़ूद हैं जो दुनिया में अन्यत्र कहीं भी नहीं हैं. 

और ऐसा नहीं है कि यह सारी चर्चा जंगली या कि भूखी-नंगी बिल्लियों को लेकर ही हो रही है. खूब खाई-पी हुई बिल्लियां भी उतनी ही ख़तनाक  हैं. असल में बिल्लियां शिकार भूख की वजह से ही नहीं शौक की वजह से भी करती हैं. उन्हें इसमें मज़ा आता है. एक मज़ेदार  अध्ययन से इस बात की पुष्टि की गई है. छह बिल्लियों के सामने उस वक्त एक छोटा-सा चूहा लाया गया जब वे अपने  पसन्दीदा भोजन का लुत्फ ले रही थीं. आपको जानकर ताज्जुब होगा कि इन छह की छह बिल्लियों ने अपना पसन्दीदा खाना छोड़ा, उस बेचारे चूहे पर टूट पड़ीं, उसका शिकार किया, और फिर अपने मनपसन्द खाने की तरफ मुड़ गईं! असल में उन्हें भोजन की पसन्द नापसन्द से कोई फर्क़ नहीं पड़ता न खाली और भरे पेट से पड़ता है. उन्हें तो बस शिकार करने में मज़ा आता है!

ऐसे में वहां के पर्यावरणविदों की फिक्र अनुचित भी नहीं लगती है. लेकिन जब वे कहते हैं कि अगर आप चिड़िया को बचाना चाहते हैं तो बिल्ली को मार डालिये, तो लगता है कि वे कुछ ज़्यादा ही उग्र हो रहे हैं. तब मॉर्गन की यह सलाह काबिले-गौर लगती है कि जिन्होंने बिल्लियां पाल रखी हैं वे कम से कम उनका बन्ध्याकरण तो कर ही दें. वे कहते हैं, ज़रा आप इन घरेलू बिल्लियों की मौज़ूदगी का असर चिड़ियाओं की बिरादरी पर देखिये और फिर यह फैसला कीजिए कि अभी जो बिल्ली आपने पाल रखी है वो आखिरी हो!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में प्रकाशित मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 22 दिसम्बर, 2015 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख  का मूल पाठ.  
    

Tuesday, December 15, 2015

किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार...कि जीना इसी का नाम है!

आपने शैलेन्द्र का लिखा वो गाना तो ज़रूर सुना होगा – किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार/ किसी का दर्द मिल सके तो,  ले उधार/ किसी के वास्ते  हो तेरे दिल में प्यार/ जीना इसी का नाम है!  मुझे यह गाना याद आया अमरीका की एक स्त्री एमी के बारे में पढ़ते हुए. जब एमी गर्भवती थीं तो उन्हें और उनके पति को पता चला कि उनकी  पन्द्रह सप्ताह की गर्भस्थ  संतान एक विकट  रोग से ग्रस्त है. चिकित्सकों ने दो माह तक रोग के उपचार की हर मुमकिन कोशिश की,  लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिली.  शिशु ने गर्भ में ही प्राण त्याग दिये  और उसके दो दिन बाद उस मृत शिशु का प्रसव हुआ.  उस दम्पती के त्रास और अवसाद की सहज ही कल्पना  की जा सकती है. शिशु का जीवित रह पाना या न  रह पाना अपनी जगह और देह धर्म अपनी जगह! एमी  के  स्तनों में दूध आने लगा और चिकित्सकों ने चाहा  कि वे अपनी विधि से दूध का आना बन्द कर दें, लेकिन एमी ने इस बात को स्वीकार नहीं किया.  असल में इस बीच उसने मां  के दूध के लाभों के बारे में काफी कुछ पढ़ लिया था और उसे यह बात भी पता चली थी कि उसके गर्भस्थ शिशु की जिस रोग से मृत्यु हुई है उस रोग को रोकने में भी मां के दूध का विशेष योग रहता है, इसलिए  वो डॉक्टरों  की राय के खिलाफ जाकर भी पम्प की मदद से अपने स्तनों से दूध बाहर निकाल कर फ्रिज में संचित करती रही. यह जानकर सुखद आश्चर्य होता है आठ माह की अवधि में उसने  अपने स्तनों से लगभग एक सौ पाँच किलोग्राम दूध निकाल कर संचित किया और न केवल उसे संचित किया बल्कि अमरीका के चार राज्यों और कनाडा के एक अस्पताल के दूध बैंक को दान भी किया. उसके इस दान से करीब तीस हज़ार फीडिंग हो पाए.

एमी का कहना है कि ऐसा करते हुए उसने एक ‘विलक्षण प्रकार का अंग दान’  किया है. एमी ने यह भी कहा कि जब भी उसने अपने स्तनों से दूध निकाला, उसे लगा कि वो अपने स्वर्गस्थ शिशु ब्रायसन के और अधिक निकट हुई है. अपने शिशु की स्मृति को इस तरह सजीव रखना उसके लिए दो तरह से महत्वपूर्ण साबित हुआ. एक तो वह अपने भौतिक और मानसिक दर्द से निजात पा सकी और दूसरे  उसे लगा कि वो अपने स्वर्गीय बेटे की स्मृति में कुछ सार्थक और उपयोगी कर सकी. और इसीलिए मुझे याद आया यह गाना.

लेकिन एमी का यह  सराहनीय कृत्य भी निर्विघ्न नहीं रहा. असल में एमी कहीं नौकरी करती है. अमरीका के कानून के अनुसार स्तनपान कराने वाली माताओं को अपने काम के दौरान स्तनपान कराने के लिए समुचित अवकाश का प्रावधान है. जब एमी ने अपने नियोक्ता से इस प्रावधान के तहत  अवकाश की मांग की तो उसे इसी नियम का हवाला देते हुए स्पष्ट कह दिया गया कि क्योंकि उसके पास स्तनपान करने वला कोई शिशु नहीं है इसलिए यह प्रावधान उस पर लागू होता ही नहीं है और इसलिए उसे कोई अवकाश देय नहीं है. एमी का कहना है कि यह बहुत अजीब बात है कि स्त्रियों को सुविधा प्रदान करने वाले कानून का ही इस्तेमाल उस सुविधा को नकारने के लिए किया जा रहा है. उसका कहना है कि यह सही है कि मेरे पास स्तनपान करने वाला शिशु नहीं है, लेकिन अपने स्तनों से दूध निकालना मेरी  शारीरिक ज़रूरत है और यह मेरा वाज़िब हक़ है कि मैं अपनी इस ज़रूरत को पूरा करूं.

एमी ने अपने हक़ के लिए अपना संघर्ष ज़ारी रख और साथ ही नॉर्थईस्ट के मदर्स मिल्क  बैंक के लिए स्वयंसेविका के रूप में अपनी सेवाएं देना भी ज़ारी  रखा. इतना ही नहीं, उन्हें जैसे इसी काम में अपने जीवन की सार्थकता दिखाई देने लगी तो वे एक ब्रेस्ट फीडिंग कंसलटेण्ट बनने के लिए पढ़ाई भी करने लगीं और उम्मीद है कि जल्दी उन्हें इसके लिए सर्टिफिकेट  भी मिल जाएगा. एमी के इन सारे कामों का एक सुपरिणाम यह भी हुआ है कि वहां का एक स्टेट लेजिस्लेटर भी उनके पक्ष में आ खड़ा हुआ है.

लेकिन यह सब करते हुए भी एमी के मन में एक शिकायत ज़रूर है. वे कहती हैं कि मेरे परिवार के सदस्य और मित्रगण बराबर यह कोशिश करते हैं कि वे मेरे सामने ब्रायसन (मृत शिशु) का नाम न लें. जबकि मैं चाहती हूं कि वे उसका नाम लें और जो कुछ मैं कर रही हूं उसके प्रति अपना समर्थन व्यक्त करें. मुझे तो लगता है कि जो  कुछ मैं कर रही हूं उसकी वजह से वो हर रोज़ हमारे सामने आ खड़ा होता है – और यही बात है जो मेरे चेहरे पर मुस्कान  लाती है! 

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 15 दिसम्बर, 2015  को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 


Tuesday, December 8, 2015

चाय की प्याली में नहीं, कॉफी के कप में आया तूफ़ान!

चाय की प्याली में तूफ़ान की बात तो आपने सुनी होगी, मैं आज आपको कॉफी के कप में आए तूफ़ान से परिचित कराता हूं. कॉफी प्रेमियों के लिए स्टारबक्स का नाम अनजाना नहीं है. 1971 में सिएटल शहर से शुरु हुआ अमरीका का यह बेहद लोकप्रिय ब्राण्ड भारत सहित दुनिया के पचास देशों के पन्द्रह हज़ार स्टोर्स में उपलब्ध है और इसकी लोकप्रियता का अन्दाज़ इसी बात से लगाया जा सकता है कि कुछ समय पहले जब मुम्बई में इसका पहला आउटलेट खुला तो उसके बाहर मीलों लम्बी कतार थी. 

स्टारबक्स वाले सन  1997 से दिसम्बर के अंत वाले त्योहारों  के सीज़न में अपनी कॉफी के लिए ख़ास तरह के विण्टर थीम वाले कप जारी करते रहे हैं. कभी इन कपों पर बर्फ़ के फाहे नज़र आए हैं तो कभी स्नोमैन और कभी रेण्डियर. कभी क्रिसमस ट्री तो कभी उसे सजाने वाले चमकदार आभूषण आदि. ज़ाहिर है कि इन तमाम छवियों का सीधा नाता ईसाइयों के सबसे बड़े त्योहार क्रिसमस से है.   स्टारबक्स ने हमेशा यह प्रयत्न किया है कि जो कप वो जारी करे उसका डिज़ाइन पिछले बरस वाले कपों से एकदम अलहदा हो. तो इस परम्परा का निर्वाह करते हुए साल 2015 के त्योहारी सीज़न के लिए  स्टारबक्स ने अक्टोबर के आखिर में अपना उत्सवी कप जारी किया. इस कप को जारी करते हुए कम्पनी के वाइस प्रेसिडेण्ट जेफ्री फील्ड्स ने कहा कि “हम इस उत्सवी सीज़न में डिज़ाइन की ऐसी  निर्मलता के साथ प्रवेश करना चाहते हैं जिसमें हमारी तमाम गाथाओं का समावेश हो सके.” इस साल जारी हुए कप में पिछले बरसों से हटकर कोई आकृति नहीं है और यह एक निहायत सादा दो शेड्स वाला लाल रंग का कप है.

और बस इस कप का बाज़ार में आना था कि हंगामा बरपा हो गया! हो भी क्यों न?  सोशल मीडिया का ज़माना जो ठहरा. लगता है जैसे लोग प्रतिक्रिया करने को तैयार ही बैठे हैं! एक हैं जोशुआ फ्युर्स्टाइन जो अमरीका के एरिज़ोना राज्य में रहते हैं और खुद को मीडिया व्यक्तित्व और टेलीविजन तथा रेडियो का भूतपूर्व ईसाई प्रचारक बताते हैं. फेसबुक पर इनके अठारह लाख फॉलोअर्स  हैं. इन्होंने पाँच नवम्बर को फेसबुक पर एक वीडियो पोस्ट किया जो तुरंत वायरल हो गया. इन महाशय ने अपने इस वीडियो में फरमाया कि स्टारबक्स  वालों ने अपने कप से क्रिसमस की छवियों को इस कारण हटाया है कि वे जीसस से घृणा करते हैं! फ्युर्स्टाइन ने अपने फॉलोअर्स से भी अनुरोध कर डाला कि वे भी स्टारबक्स के इस कृत्य का सोशल मीडिया पर विरोध करें. फेसबुक के अपने पेज पर इन्होंने लिखा कि “मुझे ऐसा लगता है कि पॉलिटिकल करेक्टनेस के इस काल  में हम इतना ज़्यादा ओपन माइंडेड हो गए हैं कि हमारी खोपड़ियों से हमारे दिमाग बाहर ही निकल चुके हैं. आप इस बात को समझिये कि स्टारबक्स वाले अपने एकदम इन  कपों से ईसा और क्रिसमस को निकाल बाहर करना चाहते हैं. तभी तो अब उनके कप सादे लाल रंग के हैं.”  जब इनके इस वीडियो को करीब एक करोड़ बार देखा जा चुका तो इन्होंने सीएनएन मनी को एक ई मेल भेजा जिसमें फरमाया कि “मेरा खयाल है कि स्टारबक्स को यह संदेश पहुंच चुका है कि इस देश का ईसाई  बहुमत अब जाग चुका है और चाहता है कि उसकी आवाज़ को सुना जाए.” ताज्जुब इस बात का है कि यह मेल लिखते हुए इन महोदय को यह बात ध्यान में नहीं रही कि स्टारबक्स त्योहारी मौसम में बहुत सारे क्रिसमस उत्पाद जैसे आभूषण, कैलेण्डर्स, क्रिसमस थीम वाले गिफ्ट कार्ड्स, क्रिसमस संगीत के सीडी और क्रिसमस के वास्ते ख़ास तौर पर तैयार की गई कुकीज़ हर साल बेचता है और इस साल भी बेच रहा है.

भले ही स्टारबक्स ने यह कहकर अपना पक्ष सामने रखा कि अपने कपों के डिज़ाइन का सिलसिला बरकरार रखते हुए उसने इस बरस कपों का यह सादा डिज़ाइन इस सोच के साथ बाज़ार में उतारा है कि ग्राहक इन कपों को बतौर कैनवस इस्तेमाल करते हुए इन पर अपनी कथाएं रचें, और भले ही बहुत सारे लोगों ने जोशुआ फ्युर्स्टाइन के आरोप से असहमति भी व्यक्त की, सोशल मीडिया की जिस तरह की रिवायत है, बहुत सारे लोग स्टारबक्स की लानत-मलामत करने में जुट गए हैं. सोशल मीडिया पर लगभग पाँच लाख दफा स्टारबक्स का ज़िक्र हो चुका है. कुछ लोगों ने बाकायदा स्टारबक्स  का बहिष्कार तक करने का आह्वान कर डाला है. और जब इतना सब हो तो इससे व्यावसायिक  लाभ उठाने वालों का सक्रिय हो उठना भी अस्वाभाविक नहीं माना जा सकता. अमरीका के ही एक अन्य प्रतिस्पर्धी कॉफी ब्राण्ड डंकिंग डोनट्स ने जिस तरह का पवित्र हरी पत्तियों लाल रंग में ‘जॉय’ लिखा हुआ  कॉफी कप बाज़ार में उतारा है उसे सीधे इस ‘कप-गेट’ विवाद से जोड़कर देखा जा रहा है.
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, दिनांक 08 दिसम्बर, 2015 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.   


Tuesday, December 1, 2015

सेज पर रोबोट

हाल ही में एक ख़बर आई कि नवम्बर 2015 में मलेशिया में होने वाली एक कॉंफ्रेंस वहां की पुलिस की आपत्ति के बाद रद्द कर दी गई, तो लगा कि सारी दुनिया में हालात एक से हैं. यह कॉंफ्रेंस थी लव एण्ड सेक्स विद रोबोट्स विषय पर और इसके आयोजकों में प्रमुख थे 2007 में प्रकाशित इसी शीर्षक वाली किताब के लेखक डेविड लेवी और उनके साथी प्रोफेसर  एड्रियन चिओक. पुलिस ने ऐसा कुछ समझ कर कि इस कॉंफ्रेंस में रोबोट्स के साथ यौन सम्बन्ध कायम किया जाएगा, इसे ग़ैर कानूनी मान लिया, जबकि आयोजकों का कहना है कि इस कॉंफ्रेंस में बहुत व्यापक और दूरगामी प्रभाव वाले मुद्दों पर अकादमिक विमर्श होना था. बता दूं कि इसी विषय पर पहली कॉंफ्रेंस  2014 में पुर्तगाल में आयोजित हो चुकी है, और यह दूसरी कॉंफ्रेंस अब कदाचित 2016 में लंदन में आयोजित होगी. 

असल में जब भी हमारे जीवन में नया कुछ आता है, उससे हमारी सुविधाओं में चाहे जितना इज़ाफा हो, बहुत सारे नैतिक, वैचारिक और कानूनी मुद्दे भी स्वाभाविक रूप से उठ खड़े होते हैं. यह याद दिलाना अप्रासंगिक न होगा कि महात्मा गांधी के लिए इंजेक्शन भी हिंसा का ही एक प्रकार था और बहुत सारे लोगों के लिए अनेक अंग्रेज़ी दवाइयों  में मौज़ूद अल्कोहल उनके  अस्वीकार की वजह बनता है. लेकिन यहां हम बात रोबोट्स की कर रहे हैं. पिछले कुछ बरसों में कृत्रिम बुद्धि के विकास की वजह से  रोबोट्स की कार्य दक्षता में जो बदलाव और सुधार आए हैं उनकी वजह से अब वे तेज़ी से मनुष्य के स्थानापन्न बनते जा रहे हैं. हॉलीवुड की अनेक लोकप्रिय फिल्मों और किताबों में रोबोट्स और मनुष्यों के अंत: सम्बन्धों का जो चित्रण लगातार बढ़ता जा रहा है उसके यथार्थ रूपांतरण की आहटें अब साफ़ सुनाई देने लगी हैं. इधर हाल ही में हैलो बार्बी नामक एक खिलौना ऐसा आया है जो बच्चों से बातें करता है और उनके साथ खेलता है. इस तरह के खिलौनों का बच्चों की सामाजिकता पर क्या असर पड़ेगा? इसी तरह अगर रोबोट्स सारे मेहनत मज़दूरी वाले काम करने लगे तो क्या उससे लोगों का रोज़गार नहीं छिन जाएगा? चारों तरफ रोबोट्स से घिरा इंसान क्या असामाजिक नहीं हो जाएगा? और यह असामाजिकता वाला ही सवाल उठा है रोबोट्स के साथ प्रेम और सेक्स की सम्भावनाओं को लेकर भी. कैलिफोर्निया की एक कम्पनी की बनाई रियल डॉल तो पहले से मौज़ूद थी जो करीब-करीब इंसानों जैसी हरकत करती थी, अब उपरोक्त श्री लेवी का कहना है कि उनके खयाल से अगर ऐसे रोबोट्स बना लिये जाएं जिनके साथ सेक्स करना सम्भव हो तो यह लाखों-करोड़ों  ऐसे लोगों के लिए एक वरदान होगा जिन्हें या तो अपना मनपसन्द साथी मिल ही नहीं रहा है या जो अपने साथी के साथ अपने रिश्तों से असंतुष्ट हैं. लेवी का मानना है कि इस तरह के रोबोट्स न केवल अकेलेपन को दूर करेंगे, उनकी वजह से बाल यौन अपराधों में भी बहुत कमी आ जाएगी.

लेकिन सारे समझदार लोग लेवी की तरह से नहीं सोचते हैं. अब आप एक रोबोटिक्स एथिसिस्ट (नैतिकविज्ञानी) कैथलीन रिचर्डसन को ही लीजिए जो इस तरह की सम्भावना को एक भीषण दु:स्वप्न की तरह देखती हैं.  उनको लगता है कि ऐसे सेक्स रोबोट्स असल ज़िन्दगी में भयंकर असमानता पैदा कर देंगे. वे इन  सेक्स रोबोट्स को रोबोट वेश्या की तरह देखती हैं और शिकायत करती हैं कि इनके प्रचलन से हमारे पहले से विकृत रिश्तों में जो और विकृति आ जाएगी उसे हम जान बूझकर अनदेखा कर रहे हैं. वे कहती हैं कि भले ही वे इन सेक्स रोबोट्स पर प्रतिबंध की वकालत न करें, लोगों को इनके सम्भावित दुष्परिणामों के बारे में आगाह कर देना अपना दायित्व समझती हैं. कैथलीन यह भी कहती हैं कि अगर सेक्स के लिए रोबोट्स का इस्तेमाल बढ़ गया तो इसका प्रतिकूल असर  मानवीय संवेदनाओं पर तो पड़ेगा ही, समाज का स्त्री के प्रति जो नज़रिया है और अधिक विकृत हो जाएगा.

लेकिन डेवी का कहना है कि हमारी ज़िन्दगी में रोबोट्स की आमद तो बढ़ेगी ही. उसे रोक पाना तो नामुमकिन है. और जब उनकी आमद  बढ़ेगी तो वे न सिर्फ हमारे सेवक और सहायक के रूप में हमारी ज़िन्दगी में आएंगे, वे हमारे दोस्त, सहचर और फिर शैया संगी बनकर भी आएंगे. डेवी बड़ी ईमानदारी से कहते हैं कि बहुत मुमकिन है कि कुछ लोग अपने साथी के रूप में मनुष्य  की बजाय रोबोट को पसन्द करने लगें, लेकिन ऐसे लोग बहुत अधिक नहीं होंगे. मनुष्य का झुकाव तो मनुष्य की ही तरफ रहेगा.

देखते हैं कि डेविड लेवी का यह आशावाद कितना सही साबित होता है!
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में प्रकाशित मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 01 दिसम्बर, 2015 को सेज पर रोबोट, क्या मनुष्य की ज़रूरतें पूरी करेगा शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 


    

Monday, November 30, 2015

एण्टीबायोटिक्स के अन्धाधुन्ध इस्तेमाल से मण्डरा रहा है सर्वनाश का खतरा

चिकित्सा विज्ञान की दुनिया में एक ख़तरे की घण्टी बहुत ज़ोरों से बजने लगी है.  हाल ही में इंग्लैण्ड में जारी किए गए एक सरकारी दस्तावेज़ में यह चेतावनी दी गई है कि एक एण्टीबायोटिक प्रतिरोधी रक्त संक्रमण से लगभग दो लाख लोग प्रभावित हो सकते हैं और उनमें से कम से कम अस्सी हज़ार लोग मौत के घाट उतर सकते हैं.  इस दस्तावेज़ में यह भी चेतावनी दी गई है कि अन्य अनेक प्रकार के प्रतिरोधी संक्रमण भी फैल सकते हैं. यानि अगर ऐसा हो गया तो अधिकांश आधुनिक दवाइयां असुरक्षित हो जाएंगी. इस चेतावनी की भयावहता को समझने के लिए आपको बहुत ज़्यादा चिकित्सा विज्ञान नहीं पढ़ना होगा. इतना जान लेना  काफी है कि प्रभावी एण्टीबायोटिक्स के अभाव में बहुत सामान्य शल्य क्रियाएं भी करीब-करीब नामुमकिन हो जाएंगी. कहना गैर ज़रूरी है कि इसका कुपरिणाम होगा रोगों से लड़ने की हमारी क्षमता का करीब करीब नष्ट हो जाना और असमय होने वाली मौतों में इज़ाफा!

और ऐसा होने की आशंका के मूल में है एण्टीबायोटिक्स का अविवेकपूर्ण और अन्धाधुन्ध इस्तेमाल. डॉक्टरों  पर  तो यह इल्ज़ाम लगाया ही जाता है कि वे बिना ज़रूरत के ही अपने मरीज़ों को एण्टाबायोटिक्स दे देते हैं, खुद  मरीज़ भी बिना जाने-समझे-बूझे  एण्टीबायोटिक्स निगल लेने के दोषी हैं. एक मोटे अनुमान के अनुसार हर साल लिखी जाने वाली एण्टीबायोटिक्स की सवा चार करोड़ पर्चियों में से कम से कम एक करोड़ पर्चियां गैर ज़रूरी होती हैं. इस बात को यों भी समझा जा सकता है कि बहुत सारे रोग ऐसे होते हैं जो समय के साथ स्वत: ठीक हो जाते हैं, जैसे वायरल संक्रमण या जुखाम या गला खराब हो जाना वगैरह. जुखाम के बारे में तो यह कथन बहुत लोकप्रिय है ही कि अगर आप दवा लेंगे तो वो सात  दिन में ठीक होगा और दवा न लेंगे तो भी एक सप्ताह में ठीक हो जाएगा.  लेकिन विभिन्न कारणों  से डॉक्टर या तो खुद या फिर अपने मरीज़ के आग्रह पर इनके उपचार के लिए भी एण्टीबयोटिक्स लिख देते हैं. इस तरह एण्टीबायोटिक्स के अन्धाधुन्ध इस्तेमाल से उन बैक्टीरिया में इनके विरुद्ध तीव्र प्रतिरोध विकसित होता जा रहा है, जिनसे लड़ने के लिए इनका इस्तेमाल शुरु हुआ था. यही है असली ख़तरा. वैसे तो इस खतरे की तरफ इशारा पेनिसिलिन के आविष्कारक सर अलेक्ज़ेण्डर फ्लेमिंग ने 1945 में ही कर दिया था. लेकिन विवेक की बात सुनता कौन है? तब उन्होंने कहा था कि एक समय ऐसा भी आ सकता है जब पेनिसिलिन खुले आम दवा की दुकानों पर बिकने लगे. और आज हम वास्तव में देखते हैं कि भारत सहित बहुत सारे देशों में आप दवा की दुकान पर बिना डॉक्टर की पर्ची के कोई भी दवा खरीद सकते हैं. सर फ्लेमिंग ने तब कहा था कि इस बात का बड़ा खतरा है कि कोई अज्ञानी दवा की कम मात्रा  खाकर अपने भीतर के जीवाणुओं को दवा प्रतिरोधी बना डाले. नोबल पुरस्कार स्वीकार करते हुए उन्होंने जो भाषण दिया था उसमें उन्होंने कहा था कि प्रयोगशाला में माइक्रोब्स को उन्हें मार डालने योग्य से कम मात्रा में पेनिसिलिन देकर उन्हें पेनिसिलिन के प्रति रेसिस्टेण्ट बनाया जा सकता है, और ऐसा ही हमारे शरीरों में भी होता है. 

और आज दुनिया उसी खतरनाक अवस्था के कगार पर है. चिकित्सा वैज्ञानिकों ने इस अवस्था को एण्टीबायोटिक एपोकेलिप्स यानि एण्टीबायोटिक सर्वनाश की संज्ञा  दी है. इस सर्वनाश का असर यह होगा कि मानवता फिर से एण्टीबायोटिक्स से पहले वाले युग में पहुंच जाएगी. इस खतरे को हाल में चीन में महसूस किया गया है जहां मरीज़ों और पशुओं की जांच के बाद वैज्ञानिकों ने पाया कि एक ख़ास बैक्टीरिया पर तो एण्टीबायोटिक कोलिस्टिन भी बेअसर है. कोलिस्टिन एक ऐसा एण्टीबायोटिक है जिसका इस्तेमाल अनेक रोगों में अंतिम इलाज़ के रूप में किया जाता है. वहां वैज्ञानिकों ने यह पता लगाया कि पशुओं में इस दवा के ज़रूरत से ज़्यादा इस्तेमाल की वजह से उनमें प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो गई  है. चीनी वैज्ञानिकों ने एक नए तरह का बदलाव भी लक्षित किया है. उन्होंने इसे एमसीआर-1 जीन का नाम दिया है. यह एण्टीबायोटिक कोलिस्टिन के जरिये बैक्टीरिया को मारने से रोकता है. वहां हुए परीक्षणों में हर पांचवें पशु, 15 प्रतिशत कच्चे मांस के नमूनों और 16 रोगियों में यह पाया  गया है.

राहत की बात यह है कि पूरी दुनिया इस खतरे के प्रति तेज़ी से सजग होती जा रही है. अमरीका में एक नई विधि से ‘भूमिगत होटल्स’  में 25 नए सम्भावित एण्टीबायोटिक्स विकसित किए गए हैं और उनमें से एक को बहुत आशाजनक बताया जा रहा है. ऐसे ही प्रयोग अन्यत्र भी हो रहे हैं. उम्मीद की जानी चाहिए कि एण्टीबायोटिक एपोकेलिप्स का खतरा टल जाएगा!
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 24 नवम्बर, 2015 को एण्टीबायोटिक एपोकेलिप्स: दुनिया में खतरे की घण्टी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 


Tuesday, November 17, 2015

इस एप के आगे सब हैं बेबस और लाचार

कोई इस बात को पसन्द करे या न करे, इंसान जिसके भी सम्पर्क में आता है उसका मूल्यांकन करता ही  है. और यह बात व्यक्ति के लिए ही नहीं, संस्थाओं और प्रतिष्ठानों, बल्कि वस्तुओं के लिए भी इतनी ही सही है. आप किसी से मिलते हैं और उसके पीठ फेरते ही कह उठते हैं, यह आदमी तो कुछ जंचा नहीं! आप किसी दुकान से सामान खरीदते हैं और दुकान से बाहर निकलते-निकलते तो दुकान और सामान दोनों के बारे में अपनी राय बना और ज़ाहिर भी कर चुके होते हैं.

हमारे जीवन में तकनीक की गम्भीर घुसपैठ हुई तो राय निर्माण के इस काम को तकनीक का सहारा भी मिल गया. पहले हम अखबारों और अन्य संचार माध्यमों का इस्तेमाल करते थे, हालांकि वो इस्तेमाल निर्बाध नहीं था और उस के इस्तेमाल की अनेक सीमाएं थीं, लेकिन जब से सोशल मीडिया आया हम सबको एक उन्मुक्त आकाश मिल गया. हम  जिसके बारे में जैसी चाहें राय व्यक्त करने में सक्षम हो गए!  इधर सोशल मीडिया से एक कदम और आगे है एप्स यानि मोबाइल एप्लीकेशंस की दुनिया. हर काम के लिए अनगिनत एप्स मौज़ूद हैं. एक बेहद लोकप्रिय एप का तो नाम ही है व्हाट्सएप!

तो ये एप्स राय की अभिव्यक्ति और धारणा निर्माण के क्षेत्र में भी अपना योग दे रहे हैं. जलपान गृहों के बारे में अपनी राय देने वाले  ज़ोमेटो नामक एप से तो हममें से बहुत सारे लोग वाक़िफ होंगे ही, ऐसा ही एक और एप है येल्प! ऐसे और भी अनगिनत एप होंगे. लेकिन इधर समझदारों और प्रयोगकर्ताओं की दुनिया में एक नए आनेवाले एप को लेकर खासी हलचल मची हुई है. इस एप का नाम है पीपल (Peeple) और यह अपने ज़ारी होने से पहले ही खासा विवादास्पद हो गया है. इसे जारी करने वाली कम्पनी ने इसे ‘येल्प फॉर पीपुल’ यानि लोगों के लिए येल्प कहकर प्रचारित किया था. कम्पनी का तो दावा था कि यह इस बात में क्रांतिकारी बदलाव ला देगा कि हमारे रिश्तों की मार्फत हमें कैसे देखा जाता है!

इस एप में यह सुविधा देने का वादा किया गया था कि आप जिसे भी जानते हैं उसके बारे में नकारात्मक या सकारात्मक कैसी भी राय दे सकते हैं और उसकी स्टार रेटिंग भी कर  सकते हैं, यानि उसे शून्य से पाँच तक जितना चाहें उतने स्टार दे सकते हैं. आप जिनके बारे में यह सब कर सकते हैं उनकी तीन श्रेणियां रखी गई थीं – पर्सनल, प्रोफेशनल और डेटिंग. यानि आपको यह तै करना था कि आप जिन्हें जानते हैं वो इनमें से किस श्रेणी में आता या आती है. इस एप की ख़ास बात यह थी कि अगर आपने किसी के बारे में कोई प्रतिकूल राय भी ज़ाहिर कर दी तो सम्बद्ध व्यक्ति उसके बारे में कुछ नहीं कर सकता था, और आपकी वह प्रतिकूल राय भी कम से कम 48 घण्टों तक तो सजीव रहती ही. दूसरे पक्ष को बस यह हक़ था कि वह आपकी प्रतिकूल राय का प्रतिवाद करने का प्रयत्न करे. इस एप की सबसे ख़तरनाक बात यह थी कि कोई किसी के भी बारे में किसी भी तरह की राय व्यक्त कर सकता था. यानि अगर यह एप प्रचलन में आ गया होता तो हम सब अरक्षित अनुभव करने को विवश हो जाते. इसके दुरुपयोग की आशंकाओं भी निराधार और निर्मूल नहीं कहा जा सकता है.

लेकिन इस एप के ज़ारी होने से पहले ही इसका इतना अधिक विरोध हुआ कि इसकी  डेवलपर  कैलगरी की जूलिया कॉर्ड्र्रे को बचाव की मुद्रा में आकर यह आश्वासन देने को मज़बूर होना पड़ा कि बिना आपकी स्पष्ट अनुमति के आप हमारे प्लेटफॉर्म पर नहीं होंगे. इसी के साथ उन्हें यह भी आश्वासन देना पड़ा कि नकारात्मक टिप्पणियों को हटाने के लिए 48 घण्टों के इंतज़ार की बाधा को भी हटा दिया जाएगा. लेकिन उनके इन  स्पष्टीकरणों  के बाद लोगों को लगा कि अगर नकारात्मक टिप्पणियां करने के अधिकार बहुत ज़्यादा सीमित कर दिये जाएंगे तो फिर यह एप क्लाउट या लिंक्डइन  जैसा पूर्णत: सकारात्मक टिप्पणियों वाला शाकाहारी एप बनकर रह जाएगा!  

लेकिन इस एप को लेकर ज़्यादा आशंकाएं यही सामने आई कि यह लोगों के लिए येल्प की तरह मददगार साबित होने की बजाय उनकी परेशानियों का सबब बन सकता है. कुछ लोगों को एक और आशंका हुई और वह अधिक गम्भीर किंतु बारीक आशंका है. उन्हें लगा कि यह एप विज्ञापन की कमाई का साधन बन सकता है या फिर यह लोगों को अपने मोबाइल नम्बर और अन्य निजी जानकारियां सुलभ कराने के लिए बाध्य कर सकता है – जो अपने आप में एक बहुत बड़ा व्यवसाय है.

यह सारी चर्चा इतना तो साबित करती है कि आज की दुनिया बहुत जटिल होती जा रही है. साधारण और लाभदायक नज़र आने वाली चीज़ें भी बहुत ग़ैर मामूली और नुकसान देह साबित हो सकती हैं!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 17 नवंबर, 2015 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, November 3, 2015

जीना यहां, मरना वहां

राजस्थान के हर  क्षेत्र में इस आशय का कथन प्रचलित है कि चाहे कमतर महत्व का अन्न ही क्यों न खाना पड़े, अपना इलाका छोड़कर कहीं नहीं जाएंगे. जैसे गेहूं छोड़कर मक्की खाना, लेकिन मेवाड़ छोड़कर कहीं नहीं जाना. आप मेवाड़ की जगह मारवाड़ कर दें, यह कथन मारवाड़ का हो जाएगा. और अपनी धरती से प्रेम केवल राजस्थान वासियों को ही नहीं रहा है. बहादुर शाह ज़फर के एक दरबारी शायर शेख इब्राहीम ‘जौक’ ने भी तो कहा था,  “कौन जाए पर जौक दिल्ली की गलियां छोड़कर!” लेकिन इसी के साथ यह भी याद रखने की बात है कि हमारे ही देश में जीवन के अंतिम समय काशी चले जाने और वहीं प्राण त्याग करने का सपना भी देखा जाता रहा है.

लेकिन इधर हाल में आई एक रपट ने, लगता है कि काशी से उसका यह गौरव भी छीन लेना चाहा है. सिंगापुर का एक परोपकारी संगठन लियन फाउण्डेशन पिछले कई बरसों से द क्वालिटी ऑफ डेथ इण्डेक्स नामक एक सर्वेक्षण करवाता है. इस  सर्वेक्षण में दुनिया भर के कोई सवा सौ रोग लक्षण नियंत्रण विशेषज्ञ चिकित्सकों के साथ साक्षात्कार करके यह जानने का प्रयास किया जाता है कि किस देश में मृत्य पूर्व देखभाल की सुविधाएं कैसी हैं! तो इस बार अस्सी देशों से जुटाई गई जानकारी के अनुसार यह पाया गया है कि पूरी दुनिया में मरने के लिए सबसे उम्दा देश ब्रिटेन है. यानि, आप चाहे जहां रहें, मरने के लिए ब्रिटेन चले जाएं! अगर ब्रिटेन जाना मुमकिन न हो तो ऑस्ट्रेलिया जाएं, वहां भी न जा सकें आयरलैण्ड चले जाएं और अगर वह भी सम्भव न हो तो बेल्जियम का रुख कर लें.

यानि अगर आप सुख पूर्व मरना चाहते हैं तो आपको किसी न किसी अमीर  देश का ही रुख करना चाहिए. यह बात स्वाभाविक भी है. समृद्ध देश ही तो अपने नागरिकों की समुचित देखभाल का  खर्चा उठा  सकते हैं. वैसे यह जानना कम रोचक नहीं होगा कि इस अध्ययन के अनुसार ब्रिटेन में जीवन के अंत समय में देखभाल करने वाली इन सेवाओं का 80 से 100 प्रतिशत भार स्वयं रोगी द्वारा नहीं वरन अधिकांशत: सेवाभावी संगठनों द्वारा वहन किया जाता है.

द इकोनॉमिस्ट इण्टेलिजेंस यूनिट द्वारा किए गए इस अध्ययन में व्यापक राष्ट्रीय नीतियों, राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवाओं में रोग के लक्षण नियंत्रित करने वाली सेवाओं के व्यापक समावेशन, सुदृढ़ होसपाइस आन्दोलन, और इस मुद्दे पर गहन सामुदायिक संलग्नता को आधार बनाया गया. ज़ाहिर है कि इन सबके मूल में है किसी भी देश के नागरिकों का आर्थिक स्तर. और यही कारण है कि आर्थिक संसाधनों की कमी और आधारभूत ढांचे के अभाव में विकासशील और तीसरी  दुनिया के बहुत सारे देश अपने नागरिकों को सामान्य कष्ट निवारक सुविधाएं भी सुलभ नहीं करवा पाते हैं. लेकिन इसके बावज़ूद यह जानना भी कम सुखद नहीं है कि अपनी आर्थिक सीमाओं के बावज़ूद पनामा जैसा छोटा देश अपनी प्राथमिक चिकित्सा सेवाओं में रोग के लक्षणों के नियंत्रण के तंत्र का समावेश कर इकत्तीसवें स्थान पर पहुंच सका है. ऐसा ही सुखद परिणाम मंगोलिया ने भी प्राप्त किया है जिसने होसपाइस सुविधाओं और शिक्षा का विस्तार कर अठाइसवां स्थान पा लिया है. एक और ख़ास बात यह भी कि मंगोलिया ने यह चमत्कार एक अकेले  डॉक्टर  के दम पर कर दिखाया है.  और तो और युगाण्डा जैसा देश भी दर्दनाशक दवाओं की उपलब्धता बढ़ाकर पैंतीसवें स्थान तक पहुंच सका है.

इतना सब बताते हुए भी मैं अपने देश भारत का ज़िक्र करने से बचता रहा हूं. वजह आप समझ सकते हैं. अस्सी देशों की सूची में हम सड़सठवें स्थान पर हैं. अगर खुश होना चाहें तो यह जान लें कि चीन हमसे भी पीछे है. वह इकहत्तरवें स्थान पर है. लेकिन जब आप यह जानेंगे कि हमारे ही महाद्वीप का एक देश ताइवान छठी पायदान पर है, तो आपकी यह खुशी भी उदासी में तबदील हो जाएगी. बात सिर्फ अमीरी की भी नहीं है. बात है सरकार की नीतियों की, उसकी प्राथमिकताओं की और समाज की बेहतरी में जन भागीदारी की.

एक तरफ जहां इस अध्ययन में पहले नम्बर पर आने वाले देश ब्रिटेन में भी यह शिकायत की  जा रही है कि वहां हर नागरिक को समुचित सुविधाएं मयस्सर नहीं हो रही हैं, वहीं तीसरी दुनिया के बहुत सारे देशों में, जिनमें हमारा अपना देश भी शामिल है, राष्ट्रीय बजट का बहुत ही छोटा हिस्सा स्वास्थ्य और देखभाल सेवाओं पर केन्द्रित रखा जाता है और उसमें भी यदा-कदा कटौती कर दी जाती है. ऐसे में अपने देश की वित्तीय प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार तो ज़रूरी हो ही जाता है. भला कौन नहीं चाहेगा कि जिस  मिट्टी में वह पला बढ़ा है उसी मिट्टी की गोद में वह चिर  निद्रा में भी लीन हो जाए!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 03 नवम्बर, 2015 को जीना यहां, मरना वहां, ताकि आसानी से कट जाए बुढ़ापा शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.    

Tuesday, October 27, 2015

हनीमून फोटोग्राफी: दो के साथ तीसरा क्यूं?

पिछले पचास-साठ बरसों में भारतीय वैवाहिक व्यवस्थाओं में जो बड़े बदलाव आए हैं उनमें वैवाहिक फोटोग्राफ़ी में आए बदलाव खास तौर पर ग़ौर तलब हैं. अगर आप आज पिछली या उससे पिछली पीढ़ी के प्रोपोज़ल फोटोग्राफ़ और शादी के एलबम देखें तो शायद  हंसे बग़ैर न रहें. किसी स्टूडियो में एक कृत्रिम गमले के पास खड़ी सकुचाई सिमटी युवती या थ्री पीस सूट में अकड़े और असहज खड़े युवा की तस्वीर हो या वो भारी भरकम एलबम हो जिसमें श्वेत श्याम तस्वीरें पहले कॉर्नर्स के सहारे अटकाई जाती थी और बाद में रंगीन तस्वीरें सीधे ही शीट पर प्रिण्ट की जाने लगीं, इन सबमें लोग जिन मुद्राओं में दिखाई देते हैं वे आज के दर्शक के मुंह पर एक वक्र मुस्कान लाने के लिए पर्याप्त हैं.   स्टिल तस्वीरों के बाद आया वीडियो का ज़माना जब हममें से ज़्यादा वीडियो के लिए भी वैसे ही पोज़ दिया करते थे जैसे स्टिल फोटो के लिए देते थे. पहले वीडियो फोटोग्राफी होती और फिर हमारा स्टूडियो उसमें स्पेशल इफेक्ट डाल कर और उसे चालू  फिल्मी संगीत  से सज़ा कर वीडियो कैसेट बना कर हमें देता जिसे थोड़े समय बाद हम वीसीडी में भी कन्वर्ट  करवाने लगे. अब शादियों में ड्रोन से फोटोग्राफी का चलन लोकप्रिय होता जा रहा  है.

बात सिर्फ तकनीक की ही नहीं है. अगर आप इन तस्वीरों और वीडियोज़ में दुल्हा दुल्हन और उनके परिजनों की मुद्राओं को देखें तो बदलाव को बहुत आसानी से लक्ष्य कर सकते हैं. पहले की तस्वीरों में दुल्हा-दुल्हन के बीच एक सम्मानजनक दूरी साफ देखी जा सकती है जो लगातार कम होती गई है. पहले की तस्वीरों में जैसे वे प्रयत्न करते हैं कि कहीं एक दूसरे को छू न लें, और यह प्रयत्न लुप्त होते-होते हालत यह हो गई कि दुल्हा दुल्हन एक दूसरे का हाथ थामे, आलिंगन बद्ध हो या चुम्बन करते हुए फोटो खिंचवाना भी ज़रूरी समझने लगे. इस बदलाव के मूल में समाज और जीवन शैली में आए बदलाव का भी कम योगदान नहीं है. हम सिल्वर स्क्रीन पर भी तो यह बदलाव देख रहे हैं. कह सकते हैं कि जो सिल्वर स्क्रीन पर कुछ समय पहले घटित हुआ वह हमारे शादी के एलबमों में अब घटित हो रहा है.

जी हां. अब शादी से पहले दुल्हा दुल्हन बाकायदा रोमांस करते हुए फिल्म बनवाते हैं और वह फिल्म शादी के वक़्त सबको दिखाई जाती है. निश्चय ही शादी से पहले का यह रोमांस काफी सात्विक होता है और अगर फिल्म बनवाने वालों का आर्थिक और मानसिक स्तर उच्च होता है तो यह फिल्म काफी आकर्षक और सुरुचिपूर्ण भी होती है. लेकिन इसके बाद जो नए बदलाव आ रहे हैं वे काफी कुछ सोचने को विवश करते हैं. इधर एक नया चलन यह हुआ है कि आर्थिक रूप से समर्थ नव विवाहित युगल अपने हनीमून के लिए भी वीडियोग्राफर की सेवाएं लेने लगे हैं और वे सब कुछ को कैमरे में कैद करवा लेना चाहते हैं. इस सब कुछ को आप ख़ास तौर पर ग़ौर से पढ़ें. असल में यह सब कुछ को कैमरे में कैद करवाने का चलन हनीमून के वक़्त निर्वसन तस्वीरें खिंचवाने के चलन की अगली कड़ी के रूप में देखा जा सकता है. कुछ हाई फाई लोगों में दुल्हन की अनौपचारिक अन्तरंग  तस्वीरें खिंचवाने का चलन तो कुछ समय से था ही, जब फोटोग्राफर्स से यह आग्रह किया जाने लगा कि वे हनीमून के दौरान दुल्हन की निर्वसन छवियां भी कैमरे में कैद करें तो फोटोग्राफी की दुनिया में भी थोड़ी हलचल हुई. बहुत सारे जाने-माने  वैवाहिक छायाकारों ने ऑन रिकॉर्ड यह बात कही है कि उन्हें इस तरह के अनुरोध प्राप्त हुए हैं और इन अनुरोधों को पाकर वे असहज हुए या हुई हैं. एक फोटोग्राफर ने कहा है कि उन्हें ऐसा अनुरोध वर की तरफ से प्राप्त हुआ, जिस पर उसने पलटकर यह पूछा कि क्या इस बात के लिए वधू की इच्छा भी जान ली गई है, और जब इस सवाल का जवाब नकारात्मक मिला तो उसने यह प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया. एक और फोटोग्राफर ने बताया कि किसी बहुत बड़े क्लाएंट के यहां से यह प्रस्ताव आया था और उसे सीधे इंकार करने में संकोच हुआ इसलिए उसने यह सोच कर भारी राशि की मांग कर ली कि प्रस्ताव करने वाला खुद ही पीछे हट जाएगा, लेकिन जब उसका यह दांव भी कारगर साबित नहीं हुआ तो उसे सीधे ही मना करना पड़ा.

लेकिन हनीमून के अंतरंग क्रियाकलाप को व्यावसायिक फोटोग्राफर की मदद से कैमरे में कैद करवाने की नई तमन्ना हमें बहुत कुछ सोचने को विवश करती है. क्या यह मात्र अपने अन्तरंग पलों की सुखद स्मृतियों को भविष्य के लिए संजो कर रखने की भावुकतापूर्ण तमन्ना है या इसे किसी मानसिक विकृति की कोटि में शुमार किया जाना चाहिए! आप क्या सोचते हैं?

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत इसी शीर्षक से आज प्रकाशित  आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, October 20, 2015

तुमने एयरब्रश के कमाल से मेरी पत्नी को गायब कर दिया

हाल में अमरीका में एक ऐसी घटना घटी जो ऊपर से देखने में सामान्य लगती है लेकिन जिसके निहितार्थ गम्भीर हैं. वैसे इस घटना का सुदूर अमरीका में घटित होना मात्र एक संयोगात्मक तथ्य है, अन्यथा ऐसा कहीं भी हो सकता है. अपने देश में भी.

हुआ यह  कि वहां की एक महिला को लगा कि विवाह के दो दशक बीत जाने और इस बीच उसकी देह में आए उम्र जनित और अन्य बहुत सारे स्वाभाविक बदलावों के कारण वो अपने पति की निगाहों में पहले जितनी दिलकश नहीं रह गई है. उसने सोचा कि क्यों न पतिदेव को विवाह की वर्षगांठ पर एक अनोखा उपहार दिया जाए! जब पति के पास उस  उपहार का बक्सा पहुंचा तो उसने बड़ी उत्सुकता से साथ उस बक्से को खोला, और पत्नी के भेजे प्रेमिल उपहार को अपने हाथों में लिया. जैसे ही उसने एक नज़र उस उपहार पर डाली, उसका दिल बैठ गया.

उपहार के रूप में उसके हाथों में थी खूबसूरत तस्वीरों  की एक एलबम. ज़ाहिर है कि ये  तस्वीरें  उसकी पत्नी की थी थी. लेकिन वो कोई साधारण तस्वीरें  नहीं थीं. वो उसकी पत्नी की फोटोशॉप की हुई, बेहतर बनाई हुई तस्वीरें थीं. उम्र के उन दो दशकों ने उसकी पत्नी के चेहरे-मोहरे  को जो कुछ भी दिया था, उसे एयरब्रश की सहायता से हटा दिया गया था, और इसी बात ने पति देव को उदास कर दिया था.

उन्होंने उस फोटोग्राफर विक्टोरिया हाल्टन को एक ख़त लिखा.  विक्टोरिया ने हाल ही में उस ख़त को अपने फेसबुक पेज पर साझा किया है. यह पत्र पढ़ने और ग़ौर करने काबिल है. पति ने लिखा है: “नमस्ते विक्टोरिया. मैं  (नाम) का पति हूं. मैं आपको यह ख़त इसलिए लिख रहा हूं कि हाल ही में मुझे एक एलबम मिला है जिसमें मेरी पत्नी की वे तस्वीरें हैं जो आपने ली हैं. मैं यह क़तई  नहीं चाहता हूं कि आपको ऐसा लगे कि  मैं उन तस्वीरों से अपसेट हूं.... लेकिन हां, मेरे पास सोचने के लिए कुछ मुद्दे हैं जिन्हें मैं आप तक पहुंचाना चाहता हूं. मैं अपनी पत्नी के साथ तब से हूं जब वे अठारह बरस की थीं और हमारे दो खूबसूरत बच्चे हैं. इन बरसों में हमारी ज़िन्दगी में कई उतार-चढ़ाव आए हैं, और मेरा खयाल है कि खुद मेरी पत्नी ने ही आपसे इस तरह की परिष्कृत तस्वीरें तैयार करने को कहा है. असल में वे कभी-कभी यह शिकायत करती भी हैं कि अब मेरी निगाहों में वे उतनी आकर्षक नहीं रही हैं और अगर मेरी ज़िन्दगी में कोई और आई जो उनसे युवा हों तो क्या पता मैं उसकी तरफ खिंच जाऊं. तो मैंने जब इस एलबम को खोला तो मेरा दिल बैठ गया. ये  तस्वीरें बहुत खूबसूरत हैं और आपने अपना काम बखूबी किया है. आप बहुत टेलेण्टेड फोटोग्राफर हैं...लेकिन इन तस्वीरों में मेरी पत्नी नहीं है. आपने तो उसके हर नुक्स को गायब कर दिया है. शायद उसी ने आपको ऐसा करने को कहा था.  लेकिन आपके ऐसा करने से वो हर चीज़ गायब हो गई है जिसने  हमारी ज़िन्दगी का निर्माण किया था. जब आपने उसके स्ट्रेच मार्क्स हटाए तो आपने हमारे बच्चों के जन्म का इतिहास भी मिटा डाला, जब आपने उसकी झुर्रियां हटाईं  तो आपने हमारे संग-साथ के इन बरसों की तमाम मुस्कानें और हमारी चिन्ताएं भी मिटा दीं. जब आपने उसकी चर्बी हटाई तो आपने उसकी पाक कला निपुणता और उन सारी स्वादिष्ट चीज़ों की यादें भी मिटा डालीं जो इन बरसों में हमने साथ-साथ खाई थीं. मैं जानता हूं कि आपने अपना काम किया है. लेकिन मैं आपको सिर्फ यह बताने के लिए यह पत्र लिख रहा हूं कि इन तस्वीरों को देखकर मुझे यह बात महसूस हुई है कि शायद मैं अपनी पत्नी को ठीक से यह बात नहीं कह सका हूं कि मैं उससे कितना ज़्यादा  प्यार करता हूं और जैसी भी वो है उसी रूप में उसे कितना अधिक चाहता हूं. इस तरह की बातें उसे कभी-कभार ही सुनने को मिलती हैं इसलिए उसने शायद यही सोचा होगा कि मैं उसे इन फोटोशॉप की हुई तस्वीरों जैसी देखना चाहता हूं. मुझे और बेहतर करना होगा और अपनी ज़िन्दगी के शेष बचे दिनों में मैं उसकी अपूर्णता के साथ ही उल्लसित रहूंगा. मुझे यह याद  दिलाने के लिए आपका आभार.”

आज हो यह रहा है कि विज्ञापनों आदि के द्वारा हमारे  सामने बहुत सारी आकर्षक और काम्य छवियां लहरा कर हमें लुभाया जा रहा है और उस सबके बीच हम अपने असल को विस्मृत करते जा रहे हैं. यह प्रसंग हमें एक बार फिर उसी असल की तरफ लौटा ले जाता है. मुझे अनायास ही याद आ रहा है 1984 की फिल्म ‘सारांश’ के आख़िर में अनुपम खेर अपनी वृद्धा पत्नी से कहते हैं, “तुम्हारे चेहरे की झुर्रियों में मेरे जीवन का सारांश है.”

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 20 अक्टोबर, 2015 को इसी शीर्षक से प्रकाशित  आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, October 13, 2015

तुम्हारी ज़मीन पर हमारा झण्डा

एनिमेशन फिल्मों की दुनिया में डिज़्नी एक बड़ा नाम है और इस लेबल से जब भी कोई फिल्म आती है उसे खूब देखा और सराहा जाता है. लेकिन इस बार मामला  थोड़ा अलग है. हाल में जब यह खबर आई कि डिज़्नी वाले द प्रिंसेस ऑफ नॉर्थ सूडान नाम से एक एनिमेशन फिल्म बनाने जा रहे हैं जो कि एक सत्य वृतांत पर आधारित होगी,  तो माहौल ख़ासा गरमा गया.  इसकी वजह जानने  से पहले उस वृत्तांत को जान लिया जाए जिस  पर यह फिल्म आधारित होगी.

अमरीका के वर्जीनिया इलाके के एक प्रेमिल पिता जेरेमिया हीटन से एक रात उनकी छह साला लाड़ली बेटी ने एक मासूमियत भरा सवाल किया कि क्या वो भी कभी वास्तविक प्रिंसेस बन पाएगी? और बस, इस सवाल ने पिता के मन में गहरी हलचल पैदा कर दी. वे अपनी बेटी का नाज़ुक दिल नहीं तोड़ना चाहते थे, इसलिए उन्होंने खुद एक झण्डा डिज़ाइन किया और निकल पड़े दुनिया में कोई ऐसी जगह तलाश करने जहां की प्रिंसेस वे अपनी प्यारी बेटी को बना सकें. काफी खोज बीन और पूरे चौदह घण्टों की तलाश के बाद उन्हें सूडान और मिश्र के बीच आठ सौ वर्गमील की बिर तविल नामक एक ऐसी लगभग जन शून्य और बंजर ज़मीन मिली जिसे वे अपना साम्राज्य कह सकते थे. जेरेमिया हीटन को यह बात भी याद आती है कि इसी तरह तो दुनिया के बहुत सारे देशों, जिनमें संयुक्त राज्य अमरीका भी शामिल है, की खोज हुई थी. जून 2014 में अपनी बेटी के सातवें जन्म दिन पर ये जेरेमिया हीटन वहां जाते हैं और उस ज़मीन पर एक नया झण्डा गाड़ कर उसे उत्तरी सूडान नामक देश घोषित करते हैं, जिसकी प्रिंसेस उनकी बेटी होगी. 

डिज़्नी की इस प्रस्तावित फिल्म में ये हीटन महोदय अपनी लाड़ली बिटिया के नव स्थापित राष्ट्र को जलवायु परिवर्तन के नकारात्मक प्रभावों से अचाने के लिए उन्नत और नवीनतम वैज्ञानिक तकनीकों  कोई प्रयोगभूमि भी बनाना चाहते हैं. अपनी वेबसाइट पर उन्होंने इस ‘क्रांतिकारी बदलाव’ के लिए ‘सर्वश्रेष्ठ  वैज्ञानिक शोध’ को मुमकिन बनाने के लिए आर्थिक सहयोग की मांग भी  की है.             


डिज़्नी वालों ने इस फिल्म की पटकथा लिखने का दायित्व ब्लैक लिस्ट के लिए सुविख्यात स्टेफ़नी फॉल्सॉम को सौंप दिया.

लेकिन जैसे ही इस फिल्म के निर्माण  की योजना की चर्चाएं सामने आईं संवेदनशील और डिज़्नी के अतीत से परिचित लोगों में गुस्से की एक लहर सी दौड़ गई. लोगों को लगा कि यह मात्र एक बेटी के प्यार में उसकी मासूम इच्छा पूरी करने को प्रयत्नशील पिता की कथा नहीं है. इस कथा का एक अन्य और अधिक ख़तरनाक  पाठ भी है. इन संवेदनशील लोगों को लगा कि इस मासूम कहानी के पीछे असल में अश्वेत दुनिया पर गोरों के वर्चस्व और साम्राज़्यवाद तथा उपनिवेशवाद की क्रूर गाथा छिपी है.  और यह भी क्या बात हुई कि एक गोरा बाप अपनी प्यारी बेटी की एक बालसुलभ आकांक्षा  को पूरा करने के लिए फौरन एक अभियान पर निकल पड़े और एक ऐसे देश और ऐसी धरती पर जाकर अपने स्वामित्व का झण्डा गाड़ दे जिसपर उसका कोई प्राकृतिक और स्वाभाविक अधिकार नहीं है. क्या इस मासूम-सी लगने वाली कथा में उपनिवेशवाद की और गोरे लोगों के बेशर्म स्वार्थ और वीभत्स लालच की चावियां नहीं कौंधती हैं?    

सवाल यह भी उठाया गया कि आखिर क्यों हर राजकुमारी गोरी ही होती है? क्या अफ्रीकी देश की कोई बच्ची राजकुमारी होने का सपना देखती हुई नहीं दिखाई जा सकती थी?  और इस सवाल के पीछे थी डिज़्नी फिल्मों के अतीत की अप्रिय स्मृतियां. जिन्होंने उनकी जंगल बुक या अलादीन जैसी फिल्में देखी हैं उन्हें याद होगा कि डिज़्नी का रवैया सदा ही गोरी चमड़ी के महिमामण्डन का रहता है. अपनी बहुत कम फिल्मों में उन्होंने अश्वेतों को उजली छवि के साथ चित्रित किया है. लोगों ने इस बात को भी याद करना ज़रूरी समझा कि खुद डिज़्नी नाज़ियों के प्रति सहानुभूति  रखते थे. और इसीलिए आलोचकों को यह बात आपत्तिजनक लगी कि डिज़्नी वाले अपनी पहली अफ्रीकी प्रिंसेस भी एक गोरी लड़की को ही बनाने जा रहे हैं.  उनका सवाल था कि क्या इस तरह वे लोग एक बार फिर श्वेत श्रेष्ठता और अमरीकी साम्राज्यवाद  का झण्डा बुलन्द नहीं करने जा रहे हैं?

हालांकि फिल्म की पटकथा लेखिका ने अपने बयानों आदि में आलोचकों को जवाब देने का और उनकी आशंकाओं को निर्मूल साबित करने का प्रयास किया है, और इस बात से पूरी दुनिया के समझदार लोगों को खुशी भी होगी अगर वे अपने कहे को पूरा कर सकीं, लेकिन अपने तमाम आशावाद के बावज़ूद डिज़्नी का वो अतीत जिसका ज़िक्र हमने ऊपर किया है, हमें इस बात पर विश्वास नहीं करने दे रहा है. ऐसे में फिल्म का इंतज़ार तो करना ही होगा.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 13 अक्टोबर, 2015 को द प्रिंसेस ऑफ नॉर्थ सूडान: तुम्हारी ज़मीन हमारा झण्डा शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, October 6, 2015

इधर ब्रिटेन में एक सर्वेक्षण किया गया है जिसे इस विषय पर किया गया सबसे ज्यादा विस्तृत वैज्ञानिक सर्वेक्षण बताया जा रहा है. यूनिवर्सिटी कॉलेज, लन्दन की एक टीम द्वारा किये गए इस सर्वेक्षण में लगभग  पाँच सौ प्रश्नकर्ताओं ने पूरे ब्रिटेन में 16 से 74 बरस की उम्र के  लगभग पन्द्रह हज़ार स्त्री-पुरुषों से  बहुत विस्तार  से बात करते हुए उनके निजी जीवन के बारे में निहायत ही व्यक्तिगत सवाल पूछे.

इस सर्वेक्षण में क्या-क्या पूछा गया इससे अधिक महत्वपूर्ण यह बात है कि  जहां अधिकतर उत्तरदाता निहायत व्यक्तिगत सवालों पर भी बात करने को तुरंत तैयार हो गए, वहीं सिर्फ तीन प्रतिशत से भी कम ने ऐसा करने से इंकार किया. अब ज़रा इसके  सामने यह तथ्य भी देखें कि इन्हीं उत्तरदाताओं में से बीस प्रतिशत अपने वेतन या अपने घर परिवार की सकल आय के बारे में बताने को तैयार नहीं थे. क्या पता, उनमें से कुछ  बेचारों को खुद ही इसकी जानकारी  न हो!

निस्संदेह आप यह जानने को उत्सुक होंगे कि इस सर्वेक्षण में क्या-क्या बातें पता लगीं? इस सर्वेक्षण का उद्देश्य था सेक्स शिक्षा और सेक्सुअल स्वास्थ्य सेवाओं के लिए जानकारी जुटाना. स्वभावत: इस सर्वेक्षण के सवाल भी इसी किस्म के थे. एक सवाल के जवाब में पता चला कि आज एक औसत ब्रितानी स्त्री के चार प्रेमी होते हैं (हाय राम!). लेकिन चौंकिये मत! वहां पुरुष अभी भी कम से कम इस मामले में स्त्री से आगे है. उसकी प्रेमिकाओं की औसत संख्या छह है. लेकिन अब एक विरोधाभास भी देख लीजिए. एक तरफ जहां औसत ब्रितानी स्त्री-पुरुष ने अपने प्रेमी-प्रेमिकाओं की संख्या में वृद्धि की है, वहीं दैहिक सम्पर्क के मामले में वे पीछे लौटे हैं. 1990 में जब इसी किस्म का एक सर्वेक्षण किया गया था तो पाया गया था कि वे महीने में पाँच दफा अंतरंग होते हैं, जबकि इस बार के सर्वेक्षण में यह संख्या घटकर तीन ही रह गई है.

लेकिन हम बात उनके निजी जीवन की नहीं करके यह कर रहे हैं कि किस बेबाकी से वे अपनी बेहद निजी जानकारियां भी सार्वजनिक कर डालते हैं.  एक सर्वेक्षणकर्ता ने भी कहा कि ज्यादातर लोग इण्टरव्यू शुरु होने के बाद इतने उन्मुक्त हो जाते हैं कि वे हमें सब कुछ बताने को तैयार हो जाते हैं. और जैसे इतना ही काफी न हो, उस सर्वेक्षणकर्ता  ने तो यहां तक कह डाला कि इन अंग्रेज़ों को अजनबियों से अपने सेक्स जीवन के बारे में बात करना अच्छा लगता है और वे अपने अफेयर्स के बारे में, अपने पार्टनर्स के बारे में सब कुछ कह डालना चाहते हैं. उनकी ज़ुबान पर लगाम बस एक ही जगह आकर लगती है. जैसे ही आप उनसे उनकी आमदनी के बारे में पूछते हैं, वे चुप हो जाते हैं. सर्वेक्षणकर्ताओं ने बाद में बताया कि उन्होंने पाया कि उनके देश वासी अपने वेतन के बारे में बात करने की तुलना में अपने शयन कक्ष के भीतर की अंतरंग गतिविधियों, अपने अफेयर्स और यहां तक कि अपने यौन रोगों के बारे में भी बात करने को सात गुना अधिक तैयार पाए गए.

ऐसा क्यों है कि जो बात सार्वजनिक नहीं करने की है उसे तो खुलकर बता दिया जाता है, और जिस बात में छिपाने जैसा कुछ भी नहीं है, उसे बताने से परहेज़ किया जाता है? इस बात का विश्लेषण किया डॉ पाम स्पर नामक एक रिलेशनशिप एक्सपर्ट  ने. उनका खयाल है कि ब्रिटेन में पैसों के बारे में बात करना सुरुचिपूर्ण नहीं माना जाता है. लेकिन अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए, और उसे भाषाजाल में लपेटते हुए उन्होंने यह भी कहा कि एक तरफ जहां लोग  अपने प्रेम जीवन के बारे में बात करने के लिए ज़रूरत से ज्यादा उत्सुक हैं, वहीं दूसरी तरफ वे  सच्चाई को लेकर बहुत ज्यादा कृपण  हैं. अगर इससे भी उनकी बात स्पष्ट न होती हो तो बस उनका यह कथन और सुन लीजिए: “कुछ लोग इस बात को बढ़ा-चढ़ाकर बताते हैं कि उनका सेक्स जीवन कितना भरापूरा है.” 

इसी बात का एक अन्य कोण से वहीं के एक शिष्टाचार विशेषज्ञ विलियम हानसन ने भी विश्लेषण किया है.  उनका कहना है  कि “हम ब्रिटिश लोग पैसों के बारे में बात करने से घृणा करते हैं. यह विषय इतना गन्दा है कि हमने तै कर लिया है कि हम कभी इस पर बात नहीं करेंगे.” हानसन ने  इसी सिलसिले में एक बात और कही है और कम से कम वह बात तो हम अपने देश और समाज में भी पाते हैं. उन्होंने कहा कि जो “कदीमी अमीर है वे अपनी सम्पदा के बारे में बात करते हुए संकोच बरतते हैं जबकि जो हाल ही में अमीर हुए हैं वे आम तौर पर ज्यादा बेशर्म होते हैं.”  

चलिये, कम से एक एक मामले में तो हम और वे एक जैसे हैं!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अन्तर्गत मंगलवार, 06 अक्टोबर, 2015 को छिपाना भी नहीं आता, बताना भी नहीं आता शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.       

Tuesday, September 29, 2015

एक पंथ दो काज

कहा जाता है कि थोड़ा पैसा व्यापारी को खा जाता है. लेकिन इसे अर्ध सत्य माना जाना चाहिए. व्यापार सिर्फ पैसों का ही खेल नहीं है, इसमें दिमाग और अक्ल की भूमिका भी कम नहीं है. अगर आपके पास अक्ल है और आप उसका सही इस्तेमाल  कर पाते हैं तो कम पूंजी के बावज़ूद आप कामयाब हो सकते हैं. व्यापार की दुनिया से देश से और विदेशों की ऐसी अनेक सफलता गाथाएं याद की जा सकती हैं जहां किसी व्यापारी ने अपनी बुद्धि के बल पर बड़े-बड़े पूंजीपतियों को पीछे छोड़ दिया.

यह बात याद आई है मुझे हाल ही की एक ख़बर पढ़ते  हुए.  खबर सात समुद्र पार यानि लंदन की है. वहां के एक व्यापारी डेव ने एक नया धन्धा शुरु किया है जो खूब फल फूल रहा है. उसने एक कम्पनी शुरु की है, जिसका नाम ‘वी बाय एनी  पोर्न’  -हम हर तरह की अश्लील सामग्री खरीदते है– है! डेव की  यह कम्पनी  उन लोगों के लिए वरदान साबित हो रही है जिन्होंने हाल में अपने किसी बुज़ुर्ग परिजन को खोया है और उनका सामान खंगालते हुए पाया है कि उनके पास प्लेबॉय, पेण्टहाउस जैसी अश्लील पत्रिकाओं और इसी तरह की अन्य सामग्री का खज़ाना था. हमारे पाठकों को यह बात स्मरण ही होगी कि इण्टरनेट के आगमन से पहले, अस्सी और नब्बे के दशक में इस तरह की पत्रिकाओं और अन्य मुद्रित  सामग्री का काफी क्रेज़ था और लोग न केवल रुचि पूर्वक इनका पारायण करते थे, इन्हें (अलबत्ता छिपाकर) सहेजकर भी रखते थे. भारत जैसे परम्परावादी देश में तो इस तरह की सामग्री प्रतिबंधित थी लेकिन दुनिया के बहुत सारे देशों में यह आसानी से सुलभ थी. हमारे यहां प्रतिबंध के बावज़ूद लोग येन केन प्रकारेण अपनी तलब पूरी कर ही लेते थे. इस तरह की सामग्री के औचित्य अनौचित्य पर बहुत कुछ कहा जाता रहा है और कहा जा सकता है, लेकिन फिलहाल हम बात कर रहे हैं इनसे सम्बद्ध व्यवसाय की.

तो हुआ यह कि इन डेव महाशय को लगा कि अब वो समय आ गया है जब अस्सी-नब्बे के दशक में इस सामग्री में रुचि रखने और इसका संग्रहण करने वाली पीढ़ी भगवान के घर का रुख कर रही है, तो क्यों न वे तो इस पीढ़ी के बच्चों के लिए अपने बुज़ुर्गों की इस विरासत से निजात पाने में मददगार बन जाएं!  परोपकार का परोपकार और धन्धे का धन्धा! इसी को तो कहते हैं एक पन्थ दो काज! आप कहेंगे कि भाई, इसमें परोपकार कहां से आ गया? मैं बताता हूं. हुआ यह कि डेव महाशय को पता चला कि एक बुज़ुर्ग के देहांत के बाद जब उनकी बेटी ने घर की सफाई की तो उसे अपने पिता के संग्रह में ऐसी काफी सारी सामग्री मिली. सामग्री कोई बहुत बुरी नहीं थी, सामान्य लोकप्रिय  पत्रिकाओं के संग्रह थे, लेकिन बेचारी बिटिया को लगा कि अगर उसकी मां को अपने स्वर्गीय पतिदेव के इस संग्रह के बारे में पता चलेगा तो वे बहुत शर्मिन्दा होंगी. उस बिटिया का संकोच डेव महाशय तक पहुंचा और उनके मन में इस तरह के परोपकार  का भाव जागा. उनका यह भाव तब और प्रबल हुआ जब किसी गांव के धर्म स्थल के एक प्रबन्धक ने उन्हें फोन कर बताया कि बहुत सारे लोग अपनी भौतिक सम्पदा उस धर्म स्थल के नाम कर इस जहाने फानी से कूच करते हैं. जब उस धार्मिक संगठन के लोगों ने इस तरह छोड़ी सम्पदा का अवलोकन किया तो अनेक घरों में इस तरह की पत्रिकाओं का ज़खीरा  भी उन्हें मिला.

इसी तरह के कुछ अन्य प्रसंगों और अनुभवों  ने डेव महोदय को अपना यह व्यापार शुरु करने की प्रेरणा दी. ये महाशय लगभग गुमनाम रहकर अपना व्यापार करते हैं ताकि उनके सम्पर्क में आने वालों को लज्जित  न होना पड़े. तरीका यह है कि अगर किसी को अपने यहां पड़ी इस तरह की सामग्री से निजात पाना  है तो वह इन्हें फोन करता है, ये पहुंच कर उस सामग्री का अवलोकन कर उसका मोल आंकते हैं, और अगर बात बन जाती है तो मूल्य चुकाकर वो सामग्री ले आते हैं. लाते भी ऐसे ट्रक में भरकर हैं जिस पर कोई पहचान अंकित नहीं होती है. लाने के बाद जो सामग्री इन्हें अनुपयुक्त लगती है उसे तो वे नष्ट कर देते हैं, शेष सामग्री को उत्तरी लंदन स्थित अपनी एक अन्य दुकान के हवाले कर देते हैं जिसकी ख्याति विचित्र और कामोत्तेजक साहित्य के संग्राहक के रूप में  है.   

डेव महाशय के व्यवसाय को अभी मात्र एक बरस हुआ है लेकिन इसी अल्प अवधि में इन्होंने संतुष्ट और कृतज्ञ ग्राहकों की एक बड़ी जमात जुटा ली है. है न बिना हर्र फिटकरी के चोखा रंग ले आने वाला मामला!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अन्तर्गत मंगलवार, 29 सितम्बर, 2015 को  'परोपकार' का अजब-गज़ब व्यवसाय' शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.               

Tuesday, September 22, 2015

देर आयद दुरुस्त आयद

साहित्य को लेकर जो दो बातें सबसे ज्यादा दुहराई जाती हैं वे हैं – 1. साहित्य समाज का दर्पण है, और 2. साहित्य समाज को राह दिखाने वाली मशाल है.  वैसे समझदार और विद्वान लोग इन दोनों ही बातों से काफी असहमति भी रखते हैं. लेकिन इसके बावज़ूद हम पाते हैं कि जब भी हमारे समाज में ऐसा कुछ घटित होता है, जिससे मिलता जुलता कुछ भी अतीत में किसी ने लिख दिया था, तो हम मशाल वाली इस बात को ज़रूर याद कर लेते हैं. अगर आज कोई हत्याकाण्ड हो जाए और हमें अनायास याद आ जाए कि ऐसी ही कहानी किसी कहानीकार ने तीस-चालीस साल पहले लिखी थी तो बस! हमारे चेहरे चमक उठते हैं! यह सारी बात करने की ज़रूरत मुझे भी ऐसे ही एक सन्दर्भ की वजह से पड़ी है.

कुछ बरस पहले हिन्दी में विमर्शों का दौर चला था और जो विमर्श बेहद चर्चित हुए उनमें से एक था स्त्री विमर्श. हालांकि यह खासा गम्भीर और सोद्देश्य मुद्दा था, कुछेक नासमझों ने इसे उच्छ्रंखलता की सीमा को छूने वाले वाली स्त्री की यौनिक स्वतंत्रता तक भी सीमित करके देखा था. इधर हाल में जब अमरीका में स्त्रियों की वियाग्रा कही जाने वाले फ्लिबरांसर नामक एक गोली को एफडीए की अनुमति हासिल हो जाने की खबर को स्त्री मुक्ति का पर्याय बताने की बातें पढ़ी तो मुझे अपने स्त्री विमर्श का वह दौर भी बेसाख़्ता याद आ गया और सच कहूं तो इस बात की किंचित खुशी भी हुई एक बार फिर साहित्य समय से आगे साबित हो गया.

हम चाहे इस बात को स्वीकार करें या न करें, यह एक तल्ख सच्चाई है कि मानव जाति के यौनिक व्यवहार पर पुरुष वर्चस्व हावी है. सब कुछ पुरुष के कोण से ही देखा, जाना और किया जाता है. स्त्री की भूमिका तो बस चीज़ों को जस का तस स्वीकार कर लेने भर की है. न उसकी हां की कोई अहमियत होती है और न उसे ना कहने का कोई हक होता है. उसे तो बस प्रजनन का एक उपकरण या पुरुष के आनंद का एक साधन भर होना है. पश्चिम के नारी मुक्ति आन्दोलन को इस बात का श्रेय तो दिया ही जाना चाहिए कि उसने इस असमानतापूर्ण और अन्याय भरे व्यवहार की तरफ ध्यान खींचा और कदाचित उस आन्दोलन के बाद से ही स्त्रियां इस मामले पर अपनी आवाज़  बुलन्द करने लगी. सिमोन द बुवा ने बहुत सही कहा कि मानवीय दैहिक संसर्ग के मामले में पुरुष स्वामी की भूमिका में होता है और उसे अपने दास की अनुमति की कोई ज़रूरत महसूस नहीं  होती है.

लेकिन यह स्थिति धीरे-धीरे बदल रही है. स्त्रियां अपनी ज़रूरत और अपनी महत्ता को समझने और उसके लिए आग्रह करने लगी हैं और पुरुष भी इस बात को स्वीकार करने लगे हैं. इसी सोच के आगे बढ़ने की परिणति यह भी हो रही है कि जिस बात  की तरफ अब तक किसी का ध्यान नहीं गया, अब उसे भी सोचा और समझा जाने लगा है.  अब दुनिया भर में यह बात समझी जाने लगी है कि जिस तरह  यौनिक संसर्ग के मामले में यदा-कदा पुरुष अक्षम होता है उसी तरह स्त्रियां भी होती या हो सकती हैं. और दोनों  ही  के मामले में उपचार के बारे में सोचा जाना चाहिए. पुरुषों के मामले में वियाग्रा इसी उपचार की एक कड़ी है. और अब स्त्रियों के लिए भी इसी तरह के उपचार के बारे में सोचा जाने लगा है.

और यहीं से बात कई इतर मोड़ भी लेने लगती है. एक तो यह कि अकूत मुनाफे की सम्भावनाओं को देख बाज़ार इसमें कूद पड़ा है. नई नई शोध हो रही हैं और चीज़ों  को नित नए तरीकों से विज्ञापित किया जा रहा है. दूसरा यह कि इस मेडिकल फिनोमिना को स्त्री-पुरुष के असमान वर्चस्व वाले कोण दे देखा परखा जा रहा है और यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि क्या वजह है कि पुरुष वियाग्रा के आविष्कारकों को तो नोबल पुरस्कार से नवाज़ा गया था जबकि स्त्री वियाग्रा की चर्चा उपहास का विषय बनती  है!  इतना ही नहीं इस बात की तरफ भी ध्यान दिलाया जाता है कि पुरुष यौनिकता पर शोध में जितनी राशि खर्च की गई है उसका बहुत छोटा हिस्सा भी स्त्री यौनिकता पर शोध में खर्च नहीं किया गया है.  

शिकायतें अपनी जगह, हम तो इस बात से ही प्रसन्न हो लेते हैं कि चलो देर से ही सही, एक सही और अब तक अलक्षित रहे मुद्दे की तरफ दुनिया का ध्यान जा रहा है!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में  मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 22 सितम्बर, 2015 को  उनकी इच्छा की बात, साहित्य फिर दर्पण साबित  शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.