Tuesday, December 15, 2015

किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार...कि जीना इसी का नाम है!

आपने शैलेन्द्र का लिखा वो गाना तो ज़रूर सुना होगा – किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार/ किसी का दर्द मिल सके तो,  ले उधार/ किसी के वास्ते  हो तेरे दिल में प्यार/ जीना इसी का नाम है!  मुझे यह गाना याद आया अमरीका की एक स्त्री एमी के बारे में पढ़ते हुए. जब एमी गर्भवती थीं तो उन्हें और उनके पति को पता चला कि उनकी  पन्द्रह सप्ताह की गर्भस्थ  संतान एक विकट  रोग से ग्रस्त है. चिकित्सकों ने दो माह तक रोग के उपचार की हर मुमकिन कोशिश की,  लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिली.  शिशु ने गर्भ में ही प्राण त्याग दिये  और उसके दो दिन बाद उस मृत शिशु का प्रसव हुआ.  उस दम्पती के त्रास और अवसाद की सहज ही कल्पना  की जा सकती है. शिशु का जीवित रह पाना या न  रह पाना अपनी जगह और देह धर्म अपनी जगह! एमी  के  स्तनों में दूध आने लगा और चिकित्सकों ने चाहा  कि वे अपनी विधि से दूध का आना बन्द कर दें, लेकिन एमी ने इस बात को स्वीकार नहीं किया.  असल में इस बीच उसने मां  के दूध के लाभों के बारे में काफी कुछ पढ़ लिया था और उसे यह बात भी पता चली थी कि उसके गर्भस्थ शिशु की जिस रोग से मृत्यु हुई है उस रोग को रोकने में भी मां के दूध का विशेष योग रहता है, इसलिए  वो डॉक्टरों  की राय के खिलाफ जाकर भी पम्प की मदद से अपने स्तनों से दूध बाहर निकाल कर फ्रिज में संचित करती रही. यह जानकर सुखद आश्चर्य होता है आठ माह की अवधि में उसने  अपने स्तनों से लगभग एक सौ पाँच किलोग्राम दूध निकाल कर संचित किया और न केवल उसे संचित किया बल्कि अमरीका के चार राज्यों और कनाडा के एक अस्पताल के दूध बैंक को दान भी किया. उसके इस दान से करीब तीस हज़ार फीडिंग हो पाए.

एमी का कहना है कि ऐसा करते हुए उसने एक ‘विलक्षण प्रकार का अंग दान’  किया है. एमी ने यह भी कहा कि जब भी उसने अपने स्तनों से दूध निकाला, उसे लगा कि वो अपने स्वर्गस्थ शिशु ब्रायसन के और अधिक निकट हुई है. अपने शिशु की स्मृति को इस तरह सजीव रखना उसके लिए दो तरह से महत्वपूर्ण साबित हुआ. एक तो वह अपने भौतिक और मानसिक दर्द से निजात पा सकी और दूसरे  उसे लगा कि वो अपने स्वर्गीय बेटे की स्मृति में कुछ सार्थक और उपयोगी कर सकी. और इसीलिए मुझे याद आया यह गाना.

लेकिन एमी का यह  सराहनीय कृत्य भी निर्विघ्न नहीं रहा. असल में एमी कहीं नौकरी करती है. अमरीका के कानून के अनुसार स्तनपान कराने वाली माताओं को अपने काम के दौरान स्तनपान कराने के लिए समुचित अवकाश का प्रावधान है. जब एमी ने अपने नियोक्ता से इस प्रावधान के तहत  अवकाश की मांग की तो उसे इसी नियम का हवाला देते हुए स्पष्ट कह दिया गया कि क्योंकि उसके पास स्तनपान करने वला कोई शिशु नहीं है इसलिए यह प्रावधान उस पर लागू होता ही नहीं है और इसलिए उसे कोई अवकाश देय नहीं है. एमी का कहना है कि यह बहुत अजीब बात है कि स्त्रियों को सुविधा प्रदान करने वाले कानून का ही इस्तेमाल उस सुविधा को नकारने के लिए किया जा रहा है. उसका कहना है कि यह सही है कि मेरे पास स्तनपान करने वाला शिशु नहीं है, लेकिन अपने स्तनों से दूध निकालना मेरी  शारीरिक ज़रूरत है और यह मेरा वाज़िब हक़ है कि मैं अपनी इस ज़रूरत को पूरा करूं.

एमी ने अपने हक़ के लिए अपना संघर्ष ज़ारी रख और साथ ही नॉर्थईस्ट के मदर्स मिल्क  बैंक के लिए स्वयंसेविका के रूप में अपनी सेवाएं देना भी ज़ारी  रखा. इतना ही नहीं, उन्हें जैसे इसी काम में अपने जीवन की सार्थकता दिखाई देने लगी तो वे एक ब्रेस्ट फीडिंग कंसलटेण्ट बनने के लिए पढ़ाई भी करने लगीं और उम्मीद है कि जल्दी उन्हें इसके लिए सर्टिफिकेट  भी मिल जाएगा. एमी के इन सारे कामों का एक सुपरिणाम यह भी हुआ है कि वहां का एक स्टेट लेजिस्लेटर भी उनके पक्ष में आ खड़ा हुआ है.

लेकिन यह सब करते हुए भी एमी के मन में एक शिकायत ज़रूर है. वे कहती हैं कि मेरे परिवार के सदस्य और मित्रगण बराबर यह कोशिश करते हैं कि वे मेरे सामने ब्रायसन (मृत शिशु) का नाम न लें. जबकि मैं चाहती हूं कि वे उसका नाम लें और जो कुछ मैं कर रही हूं उसके प्रति अपना समर्थन व्यक्त करें. मुझे तो लगता है कि जो  कुछ मैं कर रही हूं उसकी वजह से वो हर रोज़ हमारे सामने आ खड़ा होता है – और यही बात है जो मेरे चेहरे पर मुस्कान  लाती है! 

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 15 दिसम्बर, 2015  को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 


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