
मेरी मां
हर सुबह
जब तारे हो जाते अस्त
ऊंची-ऊंची चिमनियों के सायरनों से निकलती आवाज़ के बीच
मिल की तरफ़ जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाते
कौन पीछे मुड़कर हमें देखती
और कहती इतने प्यार से
“लड़ना मत किसी से”
और थमा देती दो पैसे
दशहरे के एक दिन पहले
वो गई थी हम पांचों के साथ
मेले में
हम गलियों में कर रहे थे मस्ती
कितना मज़ा आया क्या कहें
लौटे तो हमारे हाथों में थे गुब्बारे
सीटियां और पीपनियां
हम बन गए थे परिंदे
एक दिन हुआ ऐसा
वे उसे गाड़ी में डालकर लाए
उसकी आंखें खुली थीं
और मुंह से बह रहा था खून
उसके साथी ने प्रणाम किया नज़दीक आया,
हमें बाहों में भरा और कहा ‘बालू’
हमने देखा सब कुछ चुपचाप
और ढूंढा अपनी छतरी को
अपनी छत को, और अपनी मां को.
उस रात हम पांचों
अपनी गुदड़ी में
चिपटे एक दूसरे से और भी ज़्यादा
जैसे गुदड़ी ही हो मां का दुलार
वैसे तो पहले से कुछ नहीं था हमारे पास
अब तो रही नहीं मां भी
हम जागते रहे सारी रात बहते रहे आंसू
अब हम हो गए थे पूरी तरह निस्संग.
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यह उस दिन की कहानी है जिस दिन नेहरु नहीं रहे
जो घर देते थे उनकी पीठों को गर्माहट, अचानक चरमराने लगे
शहर अचानक कैसे हो गया इतना क्रूर!
और फिर अंधेरे ने निगल लिया मणि को.
पत्थरों के परिधानों वाली फैक्ट्रियां
डूब गई गहन विचारों में, जलाए हुए अपने सिगार
और फिर वे लौटे
अपने-अपने दड़बों में
डाले हुए अपने-अपने कंधों पर अपनी गीली कमीज़ें.
“क्या हुआ सुंदरी?” पूछा एक वेश्या ने
”आज मत जलाना अगरबत्ती. नेहरु जी चले गए!”
दिया जवाब दूसरी ने.
“सच्ची? ठीक. चलो फिर आज रात हमारी भी छुट्टी!!”
भारी बोझ उठाने वाली दुनिया कर रही है आराम, मौन.
एक हाथ में कागज़ की लालटेन थामे दूसरे से हाथगाड़ी धकेलते
आदमी को रोककर मैं पूछता हूं, ”अब यह रोशनी क्यों, साथी?”
“किसलिए!”
आगे है घोर अंधेरा” उसने कहा.
यह उस दिन की कहानी है जिस दिन नेहरु नहीं रहे
यह उस दिन की कहानी है जिस दिन नेहरु नहीं रहे.
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अनुवाद: डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल
जयपुर से प्रकाशित डेली न्यूज़ के रविवारीय परिशिष्ट हम लोग में 22 अगस्त , 2010 को प्रकाशित.
