सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों का उपयोग करने वाले इन माध्यमों की आज़ादी और त्वरिततता के कायल हैं और वे अपनी बात कहने या दूसरों की बात पर अपनी प्रतिक्रिया -चाहे वह अनुकूल हो या प्रतिकूल– देने के लिए खुल कर इन माध्यमों यथा फेसबुक, ट्विट्टर, यू ट्यूब वगैरह का निर्बाध उपयोग कर रहे हैं और करते रहना चाहते हैं. यह बहुत स्वाभाविक है कि इन माध्यमों पर सरकार की और उसके कामों की खुलकर आलोचना होती है. इतनी खुलकर कि मुद्रण माध्यमों में तो उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती. लेकिन इससे यह न समझ लिया जाए कि आलोचना केवल पक्ष की ही होती है. बख्शा प्रतिपक्ष को भी नहीं जाता है. इसका बहुत अच्छा उदाहरण हैं नरेन्द्र मोदी. इन माध्यमों पर बात केवल राजनीति पर ही नहीं होती है. जीवन के तमाम पक्षों पर खुली और बेबाक बातचीत यहां होती है. कभी-कभी तो यह बातचीत ज़्यादा ही खुली हो जाती है, लेकिन इस अनियंत्रित बेबाकी की आलोचना भी इन्हीं माध्यमों पर होती है.
कपिल सिब्बल ने कहा है कि इन मंचों पर धार्मिक भावनाओं को भड़काने वाली सामग्री से वे चिंतित हैं. एक मंत्री के नाते उनका यह दायित्व समझ में आता है कि उन्हें अगर कहीं ऐसा कुछ नज़र आए जो देश की कानून व्यवस्था को आहत करने वाला हो तो वे उसके बारे में फिक्रमंद हों. लेकिन क्या बात वाकई यही है? या यह भी है कि पिछले कुछ समय से इन माध्यमों पर सरकार की लोकप्रियता का ग्राफ लगातार गिरता नज़र आ रहा है और वे इससे चिंतित हैं. ऊपर मैंने न्यूयॉर्क टाइम्स की जिस रिपोर्ट का हवाला दिया है उसमें तो यह भी कहा गया है कि सिब्बल ने फेसबुक के अधिकारियों को एक ऐसा पृष्ठ दिखाया था जिसमें श्रीमती सोनिया गांधी के बारे में कुछ अप्रिय था. कॉग्रेस की जो कल्चर है उसमें यह बात तुरंत स्वीकार्य लगती है. सत्तारूढ़ दल भला देश के इस अति विशिष्ट परिवार के बारे में कुछ भी अप्रिय कैसे सहन कर सकता है? और अगर उस अप्रिय के बहाने इस दल के किन्हीं सदस्यों को परिवार के प्रति अपनी वफादारी प्रदर्शित करने का मौका मिलता है तो भला वे इस मौके को हाथ से कैसे जाने दे सकते हैं?
लेकिन आम जनता को तो इन सबसे कोई लेना-देना नहीं है. हमें तो अपनी आज़ादी प्यारी है. हम तो खुलकर अपनी बात कहना चाहते हैं! हम क्यों किसी को इस आज़ादी को छीनने की छूट दें? कपिल सिब्बल और सरकार के इरादों के तीव्र विरोध के पीछे यही बात है.
अगर इस विरोध की बात को थोड़ी देर के लिए अलग रखें तो सरकार के इस इरादे की हास्यास्पदता भी सामने आए बगैर नहीं रहती है. आप मुद्रित शब्द को तो जैसे-तैसे सेंसर कर सकते हैं, हालांकि वो भी इतना आसान नहीं होगा, इन नए माध्यमों को आप कैसे सेंसर करेंगे? यू ट्यूब पर हर रोज़ करीब 25 करोड़ तस्वीरें अपलोड होती हैं. माना जाता है कि भारत में 8 करोड़ लोग फेसबुक और ट्विट्टर का इस्तेमाल करते हैं. क्या कर लेंगे आप इन सबका? ज़्यादा से ज्यादा यही करेंगे ना कि अगर आपके ध्यान में ऐसा कुछ आया जो आपको पसंद नहीं है तो इन कम्पनियों से उसे हटाने का अनुरोध करेंगे. वैसे में, एक तो यह ज़रूरी नहीं कि आपका अनुरोध मान ही लिया जाए, और दूसरे यह कि उस तरह की सामग्री को आप एक जगह से हटवा भी देंगे तो वो चार और जगहों पर चस्पां हो जाएगी. यानि कुल मिलाकर आप अपनी खिसियाहट ज़ाहिर करने से ज़्यादा कुछ खास नहीं कर सकेंगे. मैं तो चाहूंगा कि हमारी सरकार अपना यह बचकाना इरादा छोड़ दे और जनता को अपनी अभिव्यक्ति की आज़ादी का खुलकर इस्तेमाल करने दे. एक स्वस्थ और विकासशील प्रजातंत्र में यही अपेक्षित है. अगर वाकई कहीं कुछ अवांछनीय आता भी है तो इन माध्यमों पर नियंत्रण करके अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य को बाधित करने की कोशिश करने की बजाय उसे नज़रन्दाज़ करना बेहतर होगा. और, अगर सरकार को कुछ कहना है तो वो भी इन मंचों का इस्तेमाल करे. इससे शायद उसकी विश्वसनीयता में भी कुछ वृद्धि होगी.
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जयपुर से प्रकाशित डेली न्यूज़ में दिनांक 10 दिसम्बर 2011 को प्रकाशित टिप्पणी.
