Tuesday, August 7, 2018

भूलना दिमाग़ की सफाई का ही एक रूप


हममें से ज़्यादातर लोग याददाश्त को अक्ल या बुद्धि का पर्याय मान बैठते  हैं और जिन्हें बहुत  सारी छोटी-मोटी बातें याद होती हैं उन्हें देख कर खुद के भुलक्कड़पन पर शर्मिंदा होते हैं. टेलीविज़न  पर आने वाले बहुत सारे स्मृति आधारित प्रतियोगी कार्यक्रमों में जब कोई प्रतिभागी फटाफट जवाब देता है तो हमें लगता है कि काश! हमारी याददाश्त भी ऐसी ही होती! माहौल कुछ ऐसा बन गया है कि जिसे जितनी ज़्यादा चीज़ें याद है उसे उतना ही बेहतर माना जाता है. लेकिन इधर हाल में हुई कुछ वैज्ञानिक शोधों ने इस माहौल को चुनौती दे डाली है. टोरण्टो विश्वविद्यालय के दो शोधकर्ताओं पॉल फ्रैंकलैण्ड और ब्लैक रिचर्ड्स ने हाल में प्रकाशित अपने एक शोध पत्र में यह कहकर सबको चौंका दिया है कि हमारा दिमाग़ बातों को भुलाने के लिए भी सतत सक्रिय रहता है. उनका कहना है कि हमारी स्मृति व्यवस्था के लिए जितना महत्व चीज़ों को याद रखने का है उतना ही महत्व उन्हें भुला देने का भी है. इन शोधकर्ताओं के अनुसार,  हमारे दिमाग में एक छोटा-सा तंत्र होता है जिसे हिप्पोकैम्पस कहा जाता है. इसी में तमाम चीज़ें संग्रहित होती रहती हैं. लेकिन यह तंत्र अपने आप सफाई करते हुए ग़ैर ज़रूरी चीज़ों को मिटा कर नई चीज़ों के लिए जगह बनाता रहता है. रिचर्ड्स इस प्रक्रिया को इस कारण भी महत्वपूर्ण मानते हैं कि ग़ैर ज़रूरी चीज़ों की सफाई से हमें सही निर्णय करने में अधिक आसानी हो जाती है.

इन शोधकर्ताओं के अनुसार जैविक दृष्टिकोण से इस बात को यों समझा जा सकता है कि आदि मानव को अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए बहुत सारी चीज़ों को याद रखना होता था लेकिन जैसे-जैसे तकनीक का विकास होता गया, हमें उनमें से बहुत सारी बातों को याद रखने की कोई ज़रूरत ही नहीं रही. तकनीक ने उन चीज़ों को याद रखने का ज़िम्मा अपने ऊपर ले लिया. हाल के जीवन से एक उदाहरण से भी यह बात पुष्ट होती है. आज से पंद्रह  बीस बरस पहले हमें  अपने नज़दीकी लोगों  के फोन नम्बर मुंह ज़बानी याद रहा  करते  थे लेकिन अब हमारा यह काम स्मार्ट फोन करने लगे हैं और हालत यह हो गई है कि हमें खुद अपने फोन नम्बर भी याद नहीं होते हैं. लेकिन आज हम ऐसी बहुत सारी बातें याद रखने लगे हैं जिन्हें याद रखने की अतीत में कोई ज़रूरत नहीं होती थी. इस तरह पुरानी स्मृतियों ने विलुप्त होकर नई बातों के लिए जगह बना दी है. आज हम बजाय साढ़े तीन, सत्रह और उन्नीस का पहाड़ा याद रखने के यह याद रखने पर ज़्यादा ज़ोर देते हैं कि कैलक्युलेटर को कैसे इस्तेमाल किया जाए! बहुत सारी ग़ैर ज़रूरी सूचनाओं को अपने दिमाग़ में ठूंसे रखने की बजाय हम यह याद रखना ज़्यादा उपयोगी समझते हैं कि कोई भी जानकारी पाने के लिए गूगल का इस्तेमाल कैसे किया जाए!

इन शोधकर्ताओं पॉल फ्रैंकलैण्ड और ब्लैक रिचर्ड्स ने अपने शोध पत्र में यह भी समझाया है कि हमारी स्मृति की सार्थकता इस बात में नहीं है कि वह तमाम ज़रूरी-ग़ैर ज़रूरी सूचनाओं का भण्डारण करती जाए. उसकी सार्थकता तो इस बात में है कि कैसे वह उपलब्ध ज़रूरी सूचनाओं का इस्तेमाल कर सही निर्णय करे. यानि महत्व इस बात का है कि  हमारा दिमाग़ अप्रासंगिक ब्यौरों को भुलाता चले और केवल उन बातों पर केंद्रित रहे जो वास्तविक जीवन में हमें सही फैसले लेने में मददगार साबित हों. आप किसी से मिलें और बात करें तो यह क़तई ज़रूरी नहीं है कि उस व्यक्ति के बारे में हर बारीक से बारीक बात आपको याद हो और उस बातचीत को आप शब्दश: दुहरा सकें. महत्व इस बात का है कि इस बातचीत के ज़रूरी बिंदु आपको याद रह जाएं. सुखद बात यह है कि हमारे लिए यह सारा काम हमारा  दिमाग़ अपने आप करता चलता है.

हमें यह बात समझ में आ जानी चाहिए कि चीज़ों को याद रखना जितना महत्वपूर्ण है उससे कम उन्हें भुला देना नहीं है. अनावश्यक सूचनाओं की भीड़ को अपने दिमाग़ से हटाकर ही हम उसे बेहतर तरीके से काम करने के लिए तैयार कर  सकते हैं.  लेकिन हां, अगर कोई ज़रूरी बातों को भी भूल जाया करता है, तो हो सकता है कि वह किसी विकार अथवा रोग से ग्रस्त हो. और तब उसे ज़रूरी विशेषज्ञ सहायता लेने से नहीं चूकना चाहिए. लेकिन सामान्यत: इन तीन बातों को ज़रूर याद रखा जाना चाहिए. एक: अच्छी  स्मृति हमेशा उच्च बुद्धिमत्ता की पर्याय नहीं होती है. दो: हमारे दिमाग़ की संरचना ही ऐसी है कि वह कुछ चीज़ों को भुलाता और कुछ को याद रखता है, और तीन: भूलना भी बुद्धिमत्ता का एक ज़रूरी हिस्सा है.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 07 अगस्त, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, July 31, 2018

उस अकेले रह रहे आदमी को बचाया जाना बहुत ज़रूरी है!


पिछले दिनों ब्राज़ील की सरकारी एजेंसी फुनाई ने एक जनजाति के अधेड़ लगने वाले व्यक्ति का दुर्लभ वीडियो ज़ारी किया है जिसके बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं है. माना जाता है कि यह शख़्स अमेज़न के जंगलों में 22 बरस से रह रहा है और कदाचित यह अपनी जनजाति का आखिरी जीवित इंसान है. यह आदमी अनेक शोध रिपोर्ट्स और अमरीकी पत्रकार मोण्टे रील की किताब द लास्ट ऑफ द ट्राइब: द एपिक क्वेस्ट टू सेव अ लोन मेन इन द अमेज़नके कारण चर्चा में रह चुका है. पेड़ों की पत्तियों के बीच से लिये गए इस वीडियो में यह मांसल आदमी कुल्हाड़ी से पेड़ काट रहा है और इसमें पक्षियों की आवाज़ें भी सुनाई दे रही हैं. माना जा रहा है कि यह वीडियो सन 2011 का है, हालांकि इस व्यक्ति पर नज़र रखने वाले दल के एक सदस्य का दावा है कि आखिरी बार इसके ज़िंदा होने के प्रमाण मई, 2018 में मिले थे.

इस वीडियो के साथ एक प्रेस नोट भी ज़ारी किया गया है जिसमें बताया गया है कि इस शख़्स की सिर्फ एक धुंधली-सी तस्वीर उपलब्ध है जो 1998 में ब्राज़ील की एक डॉक्यूमेण्ट्री  कोरुम्बियारा के निर्माता ने ली थी. इस व्यक्ति की निगरानी करने वाले दल के समन्वयक आल्टेयर अल्गायर का कहना है कि उनका फाउण्डेशन यह वीडियो ज़ारी नहीं करना चाहता था क्योंकि उस शख़्स से इसको ज़ारी करने की अनुमति नहीं ली जा सकी है. वैसे भी उनके संगठन की नीति यह है कि वह अकेले रह रहे मूल निवासियों से सम्पर्क करने से बचती है क्योंकि अतीत में उस आदमी ने सम्पर्क करने की कोशिश  करने वालों पर तीर चलाकर यह स्पष्ट संदेश दे दिया था कि वह बाहरी लोगों से नहीं  मिलना चाहता है.  लेकिन उन्होंने यह कहते हुए इसे ज़ारी करने के अपने निर्णय को उचित ठहराया कि ऐसी तस्वीरों से उन लोगों के दर्द की  तरफ दुनिया का ध्यान आकर्षित करने में मदद मिलती है जो बाहरी दुनिया से अपनी दूरी बनाए रखने के लिए निरंतर संघर्षरत हैं. यहीं यह बात भी जानने योग्य है कि फुनाई की टीम सन 1996 से ही इस आदमी की निगरानी कर रही  है. अब भी फुनाई की टीम दूर रहकर ही इसकी निगरानी करती है. उसने कम से कम 57 यात्राएं  और चालीस बार उसे बचाने के प्रयत्न  किये हैं. फुनाई की टीम हर दूसरे माह एक यात्रा कर इस बात की पुष्टि करती है कि वह व्यक्ति जीवित है. लेकिन फुनाई ने अब यह महसूस किया है कि ब्राज़ील के उत्तर पश्चिमी राज्य रोण्डोनिया के जिस इलाके में यह आदमी रहता है उसे प्रतिबंधित क्षेत्र बनाए रखने के लिए यह ज़रूरी हो गया था कि एक वीडियो ज़ारी कर पूरी दुनिया को बताया जाए कि वह आदमी अभी भी जीवित है. आदिवासियों के अधिकारों के लिए काम करने वाले एक संगठन सर्वाइवल इण्टरनेशनल की रिसर्च और एडवोकेसी निदेशक फ़ियोना वाट्सन का कहना है कि इस वीडियो को एक राजनीतिक कारण से भी ज़ारी करना पड़ा है. उन्हें लगता है कि ब्राज़ील की सरकार में कृषि व्यवसाय करने वालों का प्रभुत्व है और उनके दबाव में न केवल फुनाई का बजट कम कर दिया गया है, वहां के मूल निवासियों के अधिकारों पर भी कुठाराघात किये जा रहे हैं.  रोण्डोनिया का यह इलाका लगभग चार हज़ार हेक्टेयर में फैला हुआ है और खेतों आदि से घिरा हुआ है.

वैसे तो सारी ही दुनिया में आदिवासियों को उनकी ज़मीन से बेदखल करने का क्रूर खेल ज़ारी है लेकिन ब्राज़ील में सत्तर और अस्सी के दशक में इस रोण्डोनिया  इलाके में सड़क बनाने के सिलसिले में इस जनजाति के अधिकांश लोगों को तबाह कर दिया गया. किसान और अवैध लकड़ी काटने वालों  की बुरी नज़र आज भी उनकी ज़मीन पर है. पिछले ही बरस वहां ज़मीन के लिए हुए संघर्षों में कम से कम 71 जानें जा चुकी हैं.  लेकिन इस सबके बावज़ूद सर्वाइवल इण्टरनेशनल के अनुसार, ब्राज़ील के अमेज़न रेन फोरेस्ट में दुनिया के किसी भी दूसरे  इलाके की तुलना में ऐसे आदिवासी अधिक रहते हैं जिनसे अब तक सम्पर्क नहीं किया जा सका है. इन जनजातियों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बहुत कम होती है इसलिए भी इन्हें बाहरी दुनिया के  लोगों से बचाए रखना बहुत ज़रूरी है. इस व्यक्ति के बारे में फुनाई के प्रादेशिक संयोजक अल्टेयर अल्गायर का यह कथन बहुत महत्वपूर्ण है कि “यह व्यक्ति जिसे हम जानते तक नहीं हैं, अपने निकटस्थ  लोगों और अपनी सांस्कृतिक जीवन शैली सहित सब कुछ गंवा चुकने के बाद भी जंगल में अकेला रह कर यह साबित कर रहा है कि मुख्यधारा के समाज से जुड़े बग़ैर भी ज़िंदा रहा जा सकता है. मुझे तो लगता है कि अगर उसने बाहरी समाज से कोई सम्पर्क बनाया होता तो तब वो जैसा होता, उससे आज कहीं ज़्यादा बेहतर है.”

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ  इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 31 जुलाई, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, July 24, 2018

आभासी दुनिया से बाहर निकल कर ज़िंदगी बिताएं!


हम एक ऐसे विचित्र समय में जी रहे हैं जब सोशल मीडिया  पर तो सैंकड़ों, और किसी-किसी के तो हज़ारों दोस्त होते हैं लेकिन असल ज़िंदगी  में वे निहायत अकेले होते हैं, उनके घर के ठीक बगल में रहने वाले से भी उनकी कोई दुआ-सलाम नहीं होती है. इस बात को लेकर अनेक लतीफे भी प्रचलन में आ चुके हैं. लेकिन इधर विशेषज्ञों का ध्यान भी इस विडम्बना की तरफ गया है और उनके अध्ययनों के परिणामों को देखने पर हम पाते हैं कि अपनी असल ज़िंदगी में भी सक्रिय लोगों की स्थिति उनसे बेहतर है जो मात्र आभासी दुनिया के रिश्तों से संतुष्ट हैं. द टाइम्सकी पुरस्कृत उपभोक्ता स्वास्थ्य साइट वेलकी संस्थापक सम्पादक तारा पार्कर पोप ने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया है कि जब वे टाइम्स जर्नीज़ की ओर से प्रायोजित एक वेलनेस क्रूज़ से लौटीं तो न केवल बेहतर महसूस कर रही थीं, उनका यह इरादा भी और मज़बूत हुआ था कि अब उन्हें खुश मिजाज़ लोगों की सोहबत में और अधिक समय बिताना है. इस क्रूज़ में सत्रह से अस्सी बरस की आयु समूह के लोग शामिल थे. इसी क्रूज़ में उनकी दोस्ती एक ऐसी पचास वर्षीय महिला से हुई जो खुद फेफड़ों के कैंसर से उबरी थीं और इस महिला ने तारा पार्कर को एक ख़ास लेकिन मुश्क़िल व्यायाम करने के लिए प्रोत्साहित किया. इसी क्रूज़ में उन्हें एक और स्त्री मिली जिसने अपने अनुभव साझा करते हुए उन्हें बताया कि किस तरह उनके सकारात्मक दोस्तों ने उन्हें बहुत कम समय में एक के बाद एक – दो पतियों के बिछोह को सहने की ताकत दी. इसी स्त्री ने उन्हें यह अनमोल मंत्र भी दिया कि “नकारात्मक लोगों पर नष्ट करने के लिए यह जीवन बहुत छोटा है. मैं तो अपने इर्द गिर्द  ऐसे लोग चाहती हूं जो मेरी परवाह करे, मेरी सराहना करें और जो ज़िंदगी को आधे भरे  हुए गिलास वाले नज़रिये से देखें, न कि आधे खाली वाले नज़रिये से.”   

तारा पार्कर जिन नतीज़ों पर पहुंची उन्हीं को नेशनल ज्योग्राफिक के फैलो और लेखक डैन बट्टनर ने अपने अध्ययन से भी पुष्ट किया है. डैन ने सारी दुनिया के उन तथाकथित  ब्लू जोन्स में रहने वाले लोगों की स्वास्थ्य आदतों का अध्ययन किया है जिनके बारे में यह मान्यता प्रचलित है कि वहां रहने वालों की औसत उम्र अन्यों से कहीं अधिक होती है. डैन ने यह पाया कि इन जोन्स में रहने वालों में एक बात साझी है और वह यह कि ये सब सकारात्मक मैत्री में विश्वास करते हैं. डैन ने बताया कि उन्होंने जापान की एक जगह ओकिनावा का अध्ययन करते हुए यह पाया कि वहां की औरतों की औसत उम्र नब्बे के आसपास है और यह दुनिया में सर्वाधिक है. जब उन्होंने इसकी वजह की पड़ताल की तो उन्हें पता लगा कि वहां के लोग एक सामाजिक तंत्र बना लेते हैं जिसमें पांच नज़दीकी दोस्त होते हैं. ये दोस्त आजीवन एक दूसरे को सामाजिक, व्यवस्थागत, भावनात्मक और अगर ज़रूरत हो तो आर्थिक भी, सम्बल प्रदान करते हैं. इस तंत्र को मोआई कहा जाता है. डैन ने बताया कि वहां जैसे ही किसी शिशु का जन्म होता है, उसके मां-बाप उसे किसी मोआई का सदस्य बना देते हैं और फिर आजीवन इस सम्बंध का निर्वाह किया जाता है. जैसे-जैसे उस सदस्य का  परिवार बनता जाता है पूरा का पूरा परिवार उस मोआई से जुड़ता चला जाता है.

अपने इस अध्ययन से डैन बट्टनर इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने इसे अपने देश अर्थात अमरीका में भी चलन में लाने का इरादा किया और अब वे अमरीका के पूर्व सर्जन जनरल विवेक मूर्ति के साथ मिलकर वहां के लगभग दो दर्जन शहरों में मोआई स्थापित करने में जुटे हुए हैं. हाल में उन्होंने टैक्सास  के एक शहर में वहां के कई नागरिकों को लेकर एक चलते फिरते मोआई की स्थापना भी की है जिसमें लोग नियमित रूप से मिलकर साथ में चहल कदमी करते हैं. डैन का कहना है कि किसी कामयाब मोआई की शुरुआत के लिए यह ज़रूरी है कि उसके लिए ऐसे लोगों का चयन किया जाए जिनकी रुचियां और मूल्य बोध एक जैसे हों. डैन ज़ोर देकर यह बात कहते हैं कि अगर आप अपनी आयु के कुछ साल बढ़ाना चाहते हैं तो पहला और सबसे ज़रूरी काम यही करें कि अपने इर्द गिर्द एक सामाजिक तंत्र निर्मित करें. वे सलाह देते हैं कि दूर की आभासी दुनिया में सैंकड़ों दोस्त बनाने से कहीं बेहतर है अपनी असल ज़िंदगी में महज़ पांच ही दोस्त बना लेना. ये दोस्त ऐसे हों जिनसे आप सार्थक संवाद कर सकें. ज़रूरत के समय जिन्हें इस भरोसे के साथ पुकार सकें कि वे दौड़े चले आएंगे और आपकी मदद करेंगे. डैन कहते हैं कि आपके इस तरह के दोस्त किसी भी औषधि या बुढ़ापा रोकने वाली दवा से कहीं ज़्यादा कारगर साबित होंगे.
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 24 जुलाई, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, July 17, 2018

ताकि बन सके मौत का आना भी एक उत्सव!


जीवन और मृत्यु शाश्वत हैं, यह बात हर कोई जानता है लेकिन इसके बावज़ूद इनमें से एक, यानि मृत्यु का खयाल ही हर किसी को विचलित कर देता है. मिर्ज़ा ग़ालिब ने क्या खूब कहा है कि मौत का एक दिन मुअय्यन (निश्चित) है/ नींद क्यों रात भर नहीं आती.  गोपालदास नीरज ने इसी बात को इस तरह कहा है: न जन्म कुछ न मृत्यु कुछ बस इतनी सी ही बात है/  किसी की आंख खुल गई किसी को नींद आ गई. लेकिन शायर और कवि चाहे जो कहें,  मृत्यु का नाम ही इतना डरावना होता है कि उसे सुनते ही हर कोई हिल जाता है. हम अपने चारों तरफ़ देखते हैं कि चलाचली की वेला में हर सम्भव प्रयास किए जाते हैं कि मृत्यु को स्थगित किया जा सके. अपनी सामर्थ्य के अनुसार  पानी की तरह पैसा बहाया जाता है, डॉक्टरों वैद्यों की चिरौरी की जाती है और अगर उस तरह की आस्था हो तो तमाम देवी देवताओं के यहां गुहार लगाई जाती है. लेकिन ग़ालिब मिथ्या  फिर भी साबित नहीं हो पाते हैं!

सारी दुनिया में स्वास्थ्य की स्थितियां सुधरती जा रही हैं, चिकित्सा सुविधाएं बेहतर होती जा रही हैं और इनके फलस्वरूप अधिक उम्र वाले लोगों की तादाद भी बढ़ती जा रही है. लेकिन जब उन्हें यमराज का बुलावा आता है तो उनके परिजन, जो स्वभावत: उनकी तुलना में युवा होते हैं, उन्हें अस्पताल ले जाते हैं और विभिन्न किस्म के जीवन रक्षक उपकरणों की सहायता से उनके जीवन के विराम  चिह्न को आगे धकेलने का हर सम्भव प्रयास करते हैं. ऐसे में बहुत बार परिवार के वृद्धजन को अपने जीवन के आखिरी दिनों का बहुत सारा हिस्सा अस्पताल के बिस्तर पर कई तरह के जीवन रक्षक उपकरणों के तारों और नलियों से घिरे हुए व्यतीत करना पड़ता है और बहुत बार वहीं से वे जीवन को अलविदा भी कह देते हैं. मृत्यु को लेकर करीब-करीब सारी दुनिया में एक ऐसी संवाद हीनता व्याप्त है कि कभी कोई अस्पताल के बेड  पर लेटे उस वृद्ध या वृद्धा से तो पूछता ही नहीं है कि आखिर वो ख़ुद क्या चाहता है!

ऐसे में ऑस्ट्रेलिया के क्वींसलैण्ड मेडिकल असोसिएशन का एक प्रस्ताव नई रोशनी लेकर आया है. असोसिएशन ने एक डेथ लैसन यानि मृत्यु के पाठ का प्रस्ताव किया है. यह पाठ किसी अतिरिक्त अथवा नए विषय के रूप में नहीं पढ़ाया जाएगा, अपितु इसकी विषय वस्तु को वर्तमान विषयों जैसे जीव विज्ञान, औषध विज्ञान और नीति शास्त्र जैसे विषयों  में ही  शामिल कर लिया जाएगा. इस विषय की ज़रूरत के बारे में बताते हुए असोसिएशन  से सम्बद्ध डॉ रिचर्ड रिड ने बताया है कि उनका उद्देश्य यह है कि युवा अपने मां-बाप और दादा-दादी से उनके जीवन के अंत को  लेकर सहजता से बात कर सकें और यह जान सकें कि वे अपना अंतिम समय किस तरह बिताना चाहते हैं. अब तक सारी दुनिया में लोग मौत के विषय पर बात करने से कतराते हैं. अगर युवाओं को इसके लिए मानसिक तौर पर तैयार कर दिया जाए तो वे इस बारे में बेहतर निर्णय कर सकेंगे कि उनके निकटस्थ परिजनों का आखिरी समय किस तरह व्यतीत हो. असल में, डॉ रिड कहते हैं कि युवा यह जानते ही नहीं है कि वे अपने निकटस्थ लोगों का आखिरी समय और ज़्यादा सुखद बना सकते हैं. अभी स्थिति यह है कि ऑस्ट्रेलिया में मात्र पंद्रह प्रतिशत लोग ही अपने घर में अपने परिवार जन के बीच रहकर आखिरी सांस  ले पाते हैं, शेष  पिच्चासी  प्रतिशत को यह छोटी-सी खुशी भी नसीब नहीं होती है और वे अस्पताल के बेगाने माहौल में ही दम तोड़ने को मज़बूर होते हैं. बहुत छोटी-सी तैयारी से उन्हें यह सुख प्रदान किया जा सकता है. डेथ लैसन इसी दिशा में उठाया गया एक क़दम है.

डॉ रिड  का सोच यह है कि स्कूली पाठ्यक्रम में बच्चों को ज़रूरी कानूनों और उनके नैतिक कर्तव्यों के बारे में तो पढ़ाया ही जाए, इच्छा मृत्यु के बारे में भी बताया जाए ताकि वे अपने परिजनों से संवाद कर यह जान सकें कि वे किस तरह का और किस हद तक इलाज़ चाहते हैं और अपने अंतिम समय के बारे में उनकी परिकल्पना क्या है. यह सब जानने के बाद परिवार के लोग जाने को तैयार बैठे अपने साथी के बारे में अधिक विवेकपूर्ण और मानवीय निर्णय कर सकेंगे, ऐसा निर्णय जो न केवल प्रियजन की इच्छा के अनुकूल हो, कानून सम्मत भी हो. डॉ रिड का खयाल है कि अगर उनका प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता है तो इससे एक बेहतर शुरुआत होगी और मेक्सिको तथा आयरलैण्ड की भांति ऑस्ट्रेलिया में भी मृत्यु अवसाद की बजाय उत्सव का विषय बन सकेगी. उल्लेखनीय है कि इन देशों में बाकायदा मृत्यु का उत्सव मनाया जाता है.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 17 जुलाई, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, July 3, 2018

वहां के हालात देखते हैं तो ख़ुद पर बहुत गर्व होता है!


भले ही हाल में ज़ारी हुई थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन के एक सर्वे के अनुसार  भारत को महिलाओं के लिए सबसे असुक्षित देशों की सूची में पहले स्थान पर रखा गया है, इस बात को तो स्वीकार करना ही होगा कि भारत में स्वाधीनता प्राप्ति के साथ ही स्त्रियों को वे तमाम अधिकार प्रदान कर दिये गए थे जो किसी भी सभ्य समाज में एक मनुष्य को मिलने चाहिएं. लेकिन हम इन अधिकारों के महत्व को तब तक नहीं समझ सकते जब तक कि हम दुनिया के और देशों में स्त्रियों पर ज़ारी प्रतिबंधों के बारे में न जान लें. इसीलिए  हाल  में जब यह ख़बर आई कि कई दशकों के प्रतिबंध के बाद सऊदी अरब की स्त्रियों को भी ड्राइव करने का हक़ मिल गया है तो अपने देश के हालात पर गर्व हुआ. यह गर्व तब और कई गुना बढ़ गया जब यह जाना कि बावज़ूद इस नव अर्जित आज़ादी के, अभी भी सऊदी अरब की स्त्रियां ऐसे अनेक प्रतिबंधों की जंज़ीरों में कैद हैं, जो हमारे लिए कल्पनातीत हैं. सऊदी अरब में स्त्रियों की आज़ादी की यह बयार वहां के शक्तिशाली क्राउन प्रिंस बत्तीस वर्षीय मोहम्मद बिन सलमान के उदारवादी नज़रिये और देश को आधुनिक बनाने की मुहिम की वजह से बहने लगी है, हालांकि वहां की रूढ़िवादी धार्मिक ताकतें अभी भी इन बदलावों को सहजता से नहीं ले पा रही हैं.

यह जानकर आश्चर्य होता है कि इक्कीसवीं सदी में भी सऊदी अरब की स्त्रियों को किसी पुरुष, जिसे वली कहा जाता है, की छत्र-छाया में ही रहना होता है. भले ही उस देश के लिखित कानून में इस बात का उल्लेख नहीं है, व्यवहार में सर्वत्र यह लागू है और इस कारण वहां की स्त्री बग़ैर अपने पुरुष गार्जियन की अनुमति के जीवन का कोई भी महत्वपूर्ण निर्णय नहीं कर सकती है. न वह यात्रा कर सकती है, न पासपोर्ट ले सकती है, न बैंक खाता खोल सकती है, न शादी कर सकती है न तलाक ले सकती है और न किसी अनुबंध पर हस्ताक्षर कर सकती हैं. वहाबी पंथ के इस अलिखित प्रावधान के चलते वहां की स्त्रियां घरेलू हिंसा के खिलाफ भी कोई प्रभावी कदम नहीं उठा सकती हैं. राहत की बात बस इतनी है कि मई 2017 में मोहम्मद बिन  सलमान ने थोड़ी-सी राहत देते हुए स्त्रियों को यह हक़ दिया है कि वे बग़ैर गार्जियन की  अनुमति के किसी विश्वविद्यालय में प्रवेश  ले सकती हैं, नौकरी कर सकती हैं और शल्य चिकित्सा करवा सकती हैं.

सऊदी अरब की स्त्रियों को अपनी वेशभूषा के चयन में अभी भी इस्लामी कानून-कायदों का ही पालन करना होता है. अधिकांश स्त्रियों को चोगे जैसा एक ढीले-ढाले किंतु पूरे शरीर को ढक लेने वाले वस्त्र जिसे अबाया कहा जाता है, को पहनना  होता है और अपना सर ढकना होता है. हां, अब उनके लिए मुंह को ढकना ज़रूरी नहीं रह गया है, लेकिन वहां की धार्मिक पुलिस प्राय: अंग प्रदर्शन या ज़्यादा बनाव शृंगार किये होने का आरोप लगाकर औरतों को तंग करती रहती है. पिछले बरस तो वहां के एक प्रमुख धार्मिक नेता ने यह आदेश भी ज़ारी कर दिया था कि स्त्रियां जो अबाया पहनें वह किसी भी तरह से सज्जित न हो. वैसे, वहां ड्रेस कोड को लेकर  ग़ैर  सऊदी अरब महिलाओं के कानून कुछ लचीला है.  

सऊदी अरब में इस बात का  भी ध्यान रखा जाता है कि स्त्रियां ऐसे पुरुषों के साथ जिनसे उनका कोई रिश्ता न हो, कितना समय बिता सकती हैं. वहां की ज़्यादातर सार्वजनिक इमारतों, जैसे कार्यालयों, बैंकों, शिक्षण संस्थाओं वगैरह में स्त्रियों और पुरुषों के लिए अलग-अलग प्रवेश द्वार होते हैं और सार्वजनिक यातायात के साधनों, पार्कों, समुद्र तटों वगैरह पर प्राय:  स्त्रियों और पुरुषों के अलग-अलग स्थान सुनिश्चित होते हैं, अगर कोई स्त्री-पुरुष इन प्रावधानों का उल्लंघन  करते हैं तो उसे आपराधिक कृत्य  मान  कानूनी कार्यवाही की जाती है और विशेष रूप से स्त्रियों को अधिक प्रताड़ित होना पड़ता है. सऊदी अरब में  एक अजीब प्रतिबंध  यह भी है कि स्त्रियां न तो किसी कब्रस्तान में जा सकती हैं और न वे कोई ऐसी फैशन पत्रिका पढ़ सकती हैं जिसे सेंसर न किया गया हो. लेकिन यहीं यह बात भी कह देना ज़रूरी है कि जैसा भारत में और दुनिया में अन्यत्र भी कई जगह होता है, सऊदी अरब में भी प्रतिबंधो की कठोरता इस बात पर निर्भर करती है कि आप कौन हैं और आपके ताल्लुकात किन-किन से हैं!

सऊदी अरब के ये हालात निश्चय ही हमें अपने देश की स्त्रियों को मिले अधिकारों पर गर्व करने का मौका देते हैं. क्या ही अच्छा हो कि हमारा समाज व्यवहार में भी स्त्रियों के प्रति अधिक संवेदनशील बने और उन्हें गरिमापूर्वक जीने का मौका दे. अगर ऐसा हो जाए तो निश्चय ही हम सारी दुनिया के सामने अपना सर उठा कर जी सकेंगे.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, दिनांक 03 जुलाई, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, June 26, 2018

तय करना बहुत कठिन है कि क्या सही है और क्या ग़लत!


अगर आप याददाश्त पर थोड़ा ज़ोर डालें और किसी उम्दा वाद विवाद प्रतियोगिता के अपने अनुभवों को फिर से याद करें तो पाएंगे कि जब आप पक्ष के वक्ता को सुन रहे थे तो आपको लग रहा था कि वह एकदम सही कह रहा है, लेकिन  जब विपक्षी वक्ता बोलने को खड़ा हुआ और उसने अपने तर्कों से पिछले वक्ता के तर्कों का खण्डन किया तो आपको लगा कि अरे, सही बात तो अब यह कह रहा है! यानि दोनों के तर्क इतने वज़नदार कि उनमें से प्रत्येक को सुनते हुए  आपको लगे कि सच बात तो केवल यही कह रहा है. मेरे साथ हाल में ऐसा ही हुआ. हुआ यह कि रूस के एक स्कूल ने अपनी छब्बीस वर्षीया अध्यापिका को नौकरी से निकाल दिया. उन पर आरोप लगाया गया कि उनके एक कृत्य की वजह से स्कूल और खुद उनके पेशे को बदनामी का शिकार होना पड़ा है. कृत्य यह था कि उक्त अध्यापिका ने मॉडलिंग वाली तैराकी की पोशाक पहन कर एक फोटो खिंचवाई और उस फोटो को इंस्टाग्राम पर पोस्ट कर दिया. यह बात अलग है कि जैसे ही उस पर विवाद हुआ, उन्होंने वह फोटो वहां से हटा ली.

लेकिन जैसे ही विक्टोरिया पोपोवा नामक उस अध्यापिका को उनके स्कूल ने नौकरी से निकाला, रूस में, और दुनिया के अन्य देशों में भी उनके समर्थन में और स्कूल के इस निर्णय के विरोध में आवाज़ें उठने लगीं. अब तक कोई तीन हज़ार लोग तैराकी की पोशाक पहन कर “अध्यापक भी इंसान होते हैं” हैशटैग के साथ अपनी तस्वीरें पोस्ट कर चुके हैं. विक्टोरिया के समर्थन में टिप्पणियां थमने का नाम नहीं ले रही हैं. एक भद्र महिला  ने उन्हें नौकरी से निकालने के इस फैसले को “पाखण्ड, मूर्खता और पागलपन का  उग्र नमूना”  कहा है. उन्होंने यह भी  लिखा है कि “माना कि हम लोग अध्यापक हैं, लेकिन हम भी इंसान हैं और इसलिए हमें भी यह अधिकार है कि हम विद्यालय परिसर के बाहर और सोशल मीडिया पर अपनी तरह से जिएं.” एक और व्यक्ति ने अपनी प्रतिक्रिया में स्कूल प्रशासन के इस फैसले को “पूरी तरह मूर्खताभरा” कहा तो एक बुज़ुर्ग ने अतीत को याद करते हुए और स्कूल प्रशासन के फैसले की लानत-मलामत करते हुए लिखा कि  “एक समय ऐसा भी था जब हमें इस तरह के बेहूदा तर्कों से अपना बचाव करने की ज़रूरत नहीं पड़ा करती थी.”  एक अन्य महिला ने इंस्टाग्राम पर यह कहते हुए विक्टोरिया के साथ अपनी एकजुटता ज़ाहिर की कि “मैं अपनी अध्यापिका साथी का समर्थन करती हूं और चाहती हूं कि हमारे देश को इस तरह की बेहूदगी से निजात मिले.” इसी तरह अन्य बहुतों ने स्कूल प्रशासन के फैसले की कड़ी निंदा की और विक्टोरिया के कृत्य को एक इंसान  के तौर पर उनका स्वाभाविक अधिकार मानते हुए उचित ठहराया.

जहां आम तौर पर अधिकतर लोगों ने विक्टोरिया के समर्थन में अपनी आवाज़ बुलंद की, वहीं समाज का एक छोटा-सा हिस्सा ऐसा भी रहा जिसने विक्टोरिया के इस कृत्य को उचित नहीं समझा. विक्टोरिया के समर्थन में तैराकी की पोशाक में अपनी तस्वीरें पोस्ट करने वालों-वालियों की खबर लेते हुए एक ने लिखा है कि “इन्हें तो असल में तैराकी की पोशाक पहन  कर खुद को दिखाने के लिए किसी बहाने की तलाश थी.” एक और महिला ने इसी  तर्क को आगे बढ़ाते हुए समर्थन के रूप में तैराकी की पोशाक पहन कर अपनी तस्वीरें प्रकाशित करवाने वाली महिलाओं की आलोचना करते हुए कहा कि “खुद अपने कपड़े उतारने से बेहतर यह होता कि ये महिलाएं सीधे उन लोगों से बात करतीं जिन्होंने विक्टोरिया को नौकरी से निकाला है.” एक अध्यापिका ने लिखा कि “यह बात सामान्य नहीं है. माना कि शिक्षक भी इंसान होते हैं, लेकिन उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि वे समाज को राह दिखाते हैं.” उन्होंने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि “हां, मैं मानती हूं कि हममें से हरेक का निजी जीवन भी होता है. लेकिन वह वास्तव में निजी और व्यक्तिगत ही होता है. आपको कैसा लगेगा अगर निजी जीवन के नाम पर कोई अध्यापक स्कूल के पिछवाड़े जाकर शराब पीने लगे या नशा करने लगे या फिर औरों के साथ मार-पीट करने लगे! उन्हें यह भी करने दीजिए! आखिर वे भी तो इंसान हैं!” ज़ाहिर है कि वे विक्टोरिया के समर्थकों द्वारा दिये गए तर्कों की खिल्ली उड़ा रही थीं.  

क्या आपको नहीं लगता है कि दोनों पक्षों के तर्क अपनी-अपनी जगह सही है!

आप सोचें, लेकिन यह भी जान लें कि इसी बीच सरकार ने एक बयान ज़ारी कर कहा है कि सुश्री विक्टोरिया उसी या किसी अन्य विद्यालय में पढ़ाना ज़ारी रख सकती हैं. लेकिन विक्टोरिया के लिए अब अन्य विकल्प भी खुल गए हैं. एक मॉडलिंग एजेंसी ने भी उन्हें आमंत्रित कर लिया है.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 26 जून, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, June 12, 2018

बहुत तेज़ी से नकदी रहित होता जा रहा है स्वीडन


भारतीय अर्थव्यवस्था को नकदी विहीन बनाने के सरकारी प्रयासों पर ज़ारी बहस-मुबाहिसे के बीच यह जानना दिलचस्प होगा कि स्वीडन बहुत तेज़ी से नकदी रहित  अर्थव्यवस्था की तरफ बढ़ रहा है और अनुमान लगाया गया है कि सन 2030 तक यह देश पूरी तरह नकदी मुक्त हो जाएगा. स्वीडन में नकदी विहीन होने की शुरुआत सन 2005 में हुई थी जब वहां की सरकार ने कुछ बैंकों को नकदी और भुगतान की व्यवस्थाओं के बारे में निर्णय करने का दायित्व सौंपा था. इसी क्रम में सन 2012 में वहां के केंद्रीय बैंक, रिक्सबैंक ने बैंकनोट्स का एक नया डिज़ाइन लागू किया लेकिन वह बहुत सारे स्वीडन वासियों को पसंद नहीं आया और उन्होंने अपने पुराने तथा चलन से बाहर हो चुके नोट तो बैंक में जमा करा दिये लेकिन उनके बदले में ये नए नोट नहीं लिये. उसी बरस दिसम्बर में वहां के छह बड़े बैंकों ने स्विश नाम से एक भुगतान व्यवस्था लागू की जिसका उपयोग कर लोग तुरंत धन का आदान प्रदान कर सकते थे. उसके बाद से वहां नकदी विहीन लेन देन में बहुत तेज़ी आई और अब  हालत यह है कि पिछले बरस स्वीडन में कुल भुगतान के मात्र एक प्रतिशत में ही नकदी का प्रयोग हुआ. वहां की बसों में कई बरस पहले से सिक्कों और नोटों का प्रयोग होना बंद हो चुका है और अब तो ऐसे बैंकों की संख्या भी लगातार बढ़ती जा रही है जिनके बाहर स्थानीय भाषा में यह अंकित होता है कि यहां नकदी उपलब्ध नहीं है. छोटी-छोटी कॉफी शॉप्स तक में यह लिखा मिलने लगा है कि हमारी दुकान नकदी मुक्त है, या यहां केवल क्रेडिट कार्ड स्वीकार किये जाते हैं. देश के लोकप्रिय पर्यटन स्थलों पर भी प्रवेश शुल्क केवल कार्ड्स से ही स्वीकार किया जाने लगा है. एक व्यक्ति  ने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया है कि उसने देखा कि गुब्बारे बेचने वाला भी कार्ड से भुगतान प्राप्त कर रहा था. स्वीडन के धार्मिक स्थल भी तेज़ी से नकदी विहीन होते जा रहे हैं.

हमारे लिए यह विशेष रूप से ग़ौर तलब है कि स्वीडन के इतनी तेज़ी से नकदी विहीन होते जाने के मूल में कई बातें हैं. पहली तो यह कि उस देश का आकार बहुत छोटा और जनसंख्या बहुत कम है. इस कारण वहां कोई भी नई व्यवस्था आसानी से चलन में लाई जा सकती है. वहां का क्षेत्रफल मात्र  447,435 वर्ग किलोमीटर  और जनसंख्या लगभग 99 लाख है. देश में भ्रष्टाचार बहुत ही कम है और वहां के नागरिकों को अपनी बैंकिंग और प्रशासनिक व्यवस्था पर पूरा भरोसा है. ज़्यादातर लोगों को इस बात की भी कोई आशंका नहीं है कि उनकी सरकार उनके लेन-देन के मामले में अनावश्यक रुचि लेगी. लोगों का शैक्षिक स्तर भी अच्छा है इसलिए नई व्यवस्था उनके लिए असुविधाजनक नहीं साबित  होती है. स्वीडन तकनीकी रूप से भी काफी उन्नत है और वहां इण्टरनेट की सुलभता, पहुंच और गति बहुत उम्दा है.

लेकिन जहां स्वीडन के अधिकांश नागरिकों को इस नकदी विहीनता से कोई आपत्ति नहीं है, वहां की आबादी का एक छोटा-सा हिस्सा  विभिन्न कारणों से इस नकदी विहीनता के विरोध में आवाज़ उठाने लगा है. आश्चर्य की बात यह कि विरोध के ये स्वर लगातार तेज़ होते जा रहे हैं. स्वीडिश नेशनल पेंसनर्स असोसिएशन ऐसा ही एक समूह है जो अपने साढ़े तीन लाख सदस्यों की तरफ से इसके खिलाफ आवाज़ उठा रहा है. इस संगठन के प्रवक्ता का कहना है कि हम नकदी विहीन समाज के खिलाफ़ नहीं हैं, लेकिन जिस तेज़ गति से यह सब किया जा रहा है उस पर नियंत्रण चाहते हैं. इनका कहना है कि अगर देश में नकदी का उपयोग प्रतिबंधित नहीं किया गया है तो लोगों को उसका उपयोग करने की सुविधा भी मिलनी चाहिए. स्वीडिश समाज के बहुत सारे लोग, विशेषकर 75 वर्ष या  उससे अधिक वाले बुज़ुर्ग विभिन्न कारणों से नई भुगतान व्यवस्था को नहीं अपना पा रहे हैं. कुछ को इण्टरनेट सुलभ नहीं है, कुछ कार्ड का इस्तेमाल करने में सहज अनुभव नहीं करते हैं और कुछ ऐसे भी हैं जिन्हें नकदी का  प्रयोग करने में ही सुख  मिलता है. बहुतों की आपत्ति यह भी है इस नई भुगतान व्यवस्था के कारण उन्हें अनावश्यक व्यय भार वहन करना पड़ता है. जो लोग अधिक सजग हैं उनकी आपत्ति यह भी है कि सत्ता तंत्र इस नकदी विहीन व्यवस्था का दुरुपयोग भी कर सकता है और अगर वह चाहे तो किसी को भी इसके उपयोग से वंचित कर उसे पूरी तरह असहाय बना सकता है. इस व्यवस्था के कारण व्यक्ति की निजता में सेंध की बात भी बहुतों को नागवार गुज़रती है. उनका कहना है कि इस व्यवस्था से वो अनाम रहकर तो कुछ खरीद ही नहीं सकते हैं.

स्वीडन में नकदी विहीनता के खिलाफ़ जो आवाज़ें उठ रही हैं वे सितम्बर 2018 में होने वाले देश के आम चुनावों को भी प्रभावित करेंगी, ऐसा माना जा रहा है.

ये तमाम बातें हमारे लिए भी विचारणीय तो हैं ही.
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक स्तम्भ कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 12 जून, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 


Tuesday, June 5, 2018

इस तरह दिया तमिलनाडु ने अपने साहित्य को संरक्षण


मार्च 1949 में दक्षिणी भारत के राज्य तमिलनाडु में एक विलक्षण काम हुआ. इस काम का सम्बंध साहित्य को राजकीय संरक्षण प्रदान करने से है. राज्य की तत्कालीन सरकार ने विख्यात दिवंगत कवि सुब्रह्मण्यम भारती के परिजनों (उनकी पत्नी, बेटियों और सौतेले भाई) में से प्रत्येक को पांच-पांच  हज़ार रुपये देकर इस महान रचनाकार की सभी रचनाओं का कॉपीराइट प्राप्त कर लिया. कदाचित पूरी दुनिया में यह पहला मौका था जब किसी राज्य सरकार ने किसी रचनाकार के सृजन का कॉपीराइट खरीद कर उसकी रचनाओं को सार्वजनिक रूप से सुलभ कराया हो. भारत में जो कॉपीराइट नियम चलन में हैं उनके अनुसार किसी लेखक की मृत्यु के साठ बरस बाद उसकी रचनाएं कॉपीराइट मुक्त हो जाती हैं. मात्र 39 वर्ष की अल्पायु में सुब्रह्मण्यम भारती का निधन 1921 में हुआ था और इस तरह उनका सृजन जनवरी 1972 में कॉपीराइट मुक्त होता. लेकिन सरकार ने इससे बहुत  पहले ही उनकी रचनाओं को आम जन को सुलभ करा दिया. सरकार के इस प्रयास का सुपरिणाम यह है कि तमिलनाडु  में आज भी इस महाकवि की कविताओं का  लगभग पांच सौ पन्नों का संग्रह  सौ रुपये से भी कम में मिल जाता  है. तमिलनाडु में और अन्यत्र भी उनकी किताबों की लाखों प्रतियां बिक चुकी हैं और तमिल फिल्मों में उनके गीत खूब प्रयुक्त हुए हैं.

सुब्रह्मण्यम भारती के काव्य पर रोमाण्टिक कवियों का गहरा असर था और शायद यही वजह है कि उन्होंने अपना उपनाम विख्यात अंग्रेज़ी कवि शैली के नाम पर शैली दासन रखा था. भारती ने सभी तरह के शिल्प में काव्य सृजन किया – छंदबद्ध भी और छंद मुक्त भी. कविताओं के अलावा कहानियां भी उन्होंने लिखीं और पत्रकारी लेखन भी खूब किया. लेकिन इतना सब करने और उत्कृष्ट करने के बावज़ूद उन्हें गरीबी में ही जीवन बिताना पड़ा. उनके निधन के बाद उनकी निरक्षर पत्नी और दो बेटियों को भी अभावों से जूझना पड़ा, और इसी दौरान उनकी पत्नी ने मज़बूर होकर बहुत कम मूल्य पर महाकवि की रचनाएं उनके सौतेले भाई को बेच दी. वह समय ग्रामोफोन रिकॉर्ड्स और फिल्मों के उत्थान का भी था. महाकवि के कुछ गीत खूब लोकप्रिय हो गए थे और यही देख एक बड़े फिल्म निर्माता ने उस भाई से कवि के कृतित्व का कॉपीराइट खरीद लिया. अब हुआ यह कि उसी दौरान एक अन्य फिल्म निर्माता ने भारती का एक गीत अपनी फिल्म में इस्तेमाल कर लिया और इस पर उक्त खरीददार निर्माता ने उस पर कानूनी कार्यवाही कर दी. और यहीं से घटनाक्रम में एक ज़ोरदार  मोड़ आ गया. राज्य में इस मांग के लिए एक बड़ा आंदोलन शुरु हो गया कि राज्य सरकार इस महाकवि की रचनाओं का कॉपीराइट प्राप्त करे. शायद साहित्य के इतिहास की यह अपने तरह की इकलौती घटना है. तमिल लेखक भी इस मांग के समर्थन में मुखर हुए कि भारती के सृजन को निजी स्वामित्व की कैद  से आज़ादी दिलाई जाए. लगभग पांच बरस की जद्दोजहद के बाद अंतत: 1949 में राज्य सरकार ने इस तमिल महाकवि की रचनाओं का कॉपीराइट खरीद कर उसे सार्वजनिक रूप से सुलभ कराने का अभूतपूर्व कदम उठाया. और इसके बाद तो तमिलनाडु में ऐसा होना आम ही हो गया. सुब्रह्मण्यम भारती की मृत्यु के चालीस बरस बाद उनके शिष्य-कवि भारती दासन के कृतित्व का कॉपीराइट भी तमिलनाडु सरकार ने खरीद लिया. इसी सरकार ने 1992 में तमिलनाडु के भूतपूर्व मुख्यमंत्री सी एन अन्नादुराई के कृतित्व का कॉपीराइट सत्तर लाख से भी ज़्यादा रुपयों में खरीदा. और उसके बाद से अब तक यह सरकार करीब सौ लेखकों के कृतित्व का कॉपीराइट खरीद कर उस सृजन को सार्वजनिक रूप से सुलभ करा चुकी है.

मूलत: इस काम के पीछे लेखकों को आर्थिक मदद पहुंचाने का पवित्र भाव था. लेकिन जैसा सर्वत्र होता है, अब इसमें और बहुत सारी बातें शुमार हो गई हैं और इस कारण  खुद तमिल लेखक कहने लगे हैं कि इस तरह का संरक्षण साहित्य के हित में नहीं है. यहीं यह बात भी याद कर लेना प्रासंगिक होगा कि खुद महाकवि सुब्रह्मण्यम भारती साहित्य को राजकीय संरक्षण देने के खिलाफ थे. उन्होंने 1916 में अपने एक लेख में लिखा था कि “अब कलाओं को आम जन से ही समर्थन और सहायता प्राप्त होगी. यह कलाकारों का दायित्व  है कि वे आम जन में सुरुचि जगाएं. इसके अच्छे परिणाम सामने आएंगे.” तमिल साहित्यकार जो भी कहें और वहां का यथार्थ चाहे जो भी हो,  इतना तो स्वीकार करना ही होगा कि किसी महाकवि का पांच  सौ पृष्ठों का कविता संग्रह मात्र सौ रुपये में मिलना हम हिंदी वालों के लिए अकल्पनीय बात है. कॉपीराइट मुक्त हो जाने के बाद भी हम तो प्रेमचंद और रवींद्र नाथ टैगोर की किताबों के महंगे संस्करण ही खरीदने को विवश हैं.
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक स्तम्भ कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 05 जून, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Friday, June 1, 2018

भारतवंशी सुषमा ने दिया पूरी मानवता को एक संदेश


यह घटना सुदूर अमरीका में घटी, लेकिन जब इसके बारे में पढ़ा तो बरबस आंखें नम हो आईं और माथा सराहना में झुक गया. क्या ही अच्छा हो कि सारी दुनिया ऐसे ही अच्छे और संवेदनशील लोगों से भर जाए! घटना न्यूयॉर्क के एक जनाना अस्पताल की है जहां भारतीय मूल की कनाडा वासिनी और फिलहाल सपरिवार अमरीका में रह रहीं सुषमा द्विवेदी जिंदल भर्ती थीं. वे गर्भवती थीं और डॉक्टर की सलाह पर उनकी रीढ़ की हड्डी के सबसे निचले वाले जोड़ के पास प्रसव पीड़ा को कम करने वाला इंजेक्शन लगाया गया था. चिकित्सकीय भाषा में इसे एपीड्यूरल एनेस्थीसिया कहा जाता है. इंजेक्शन का असर शुरु होने लगता उससे पहले ही सुषमा को पता चला कि उसी अस्पताल में प्रसव के लिए भर्ती एक स्त्री और उसके साथी  को सहायता की ज़रूरत है. असल में ब्रायना डॉयेल और उनके साथी केसी वॉको इस बात के लिए बहुत आकुल व्याकुल थे कि ब्रायना शिशु को जन्म दे उससे पहले उनका धार्मिक विधि विधान पूर्वक बाकायदा विवाह हो जाए. वैसे वे लोग एक दिन पहले अदालत में जाकर कानूनी औपचारिकताएं पूरी कर चुके थे और विवाह का कानूनी प्रमाण  पत्र भी हासिल कर चुके थे. वे धार्मिक रीति से विवाह की रस्में भी पूरी कर लेते लेकिन गर्भस्थ शिशु को शायद इस दुनिया में आने की बहुत ज़्यादा जल्दी थी, सो उन्हें बजाय चर्च जाने के भागकर अस्पताल आना पड़ गया. वैसे डॉक्टरों ने बच्चे की जन्म की जो सम्भावित तिथि बताई थी वो अभी काफी दूर थी, और अगर सब कुछ योजनानुसार चलता तो तब तक वे धार्मिक रीति से भी पति पत्नी बन चुके होते, लेकिन सब कुछ योजनानुसार हो जाता तो यह प्रसंग ही क्यों बनता? ब्रायना और वॉको की व्याकुलता को समझ संवेदनशील अस्पताल कर्मियों (वो कोई भारत का सरकारी अस्पताल थोड़े ही था!) ने अस्पताल के पादरी की तलाश की, लेकिन वे उपलब्ध नहीं हुए तो उन्होंने भी अपने हाथ खड़े कर दिए.

जब इस पूरे मामले की भनक सुषमा को लगी तो उन्होंने अस्पताल वालों से कहा कि यह पवित्र कार्य तो वे भी सम्पन्न कर सकती हैं. उन्होंने अस्पताल वालों को बताया कि कुछ वर्ष पूर्व उन्होंने इस कार्य का बाकायदा ऑनलाइन  प्रशिक्षण प्राप्त किया है और वे तब से पर्पल प्रोजेक्ट नामक एक सेवा का संचालन कर रही हैं जो एलजीबीटीक्यू (LGBTQ) समुदाय के लोगों और उन हिंदू धर्मावलम्बियों के विवाह सम्पन्न करवाती हैं जिन्हें उपयुक्त पण्डित नहीं मिल पाते हैं. अस्पताल प्रशासन तेज़ी से हरकत  में आया और उसने इस अजीबोगरीब विवाह के लिए तुरत फुरत सारी सुविधाएं जुटा दीं. लेकिन तब तक सुषमा पर उस इंजेक्शन का असर होना शुरु हो गया था और उन्हें लगा कि वे चलना तो दूर शायद खड़ी भी न रह सकें. वो कहते हैं ना कि जहां चाह वहां राह. तो इस समस्या का भी हल निकाल लिया गया. बजाय इसके कि सुषमा उस युगल के पास जाकर विवाह सम्पन्न करातीं, ब्रायना और वॉको को ही उनके अस्पताली पलंग के पास ले आया गया. अस्पताल की नर्सों ने ब्रायना के केश संवार कर उसे दुल्हन बनाया तो अन्य चिकित्सा कर्मियों ने अस्पताल में उपलब्ध सामग्री का इस्तेमाल करते हुए दुल्हे मियां की समुचित साज सज्जा कर दी. कोई भाग कर फूल भी ले आया और एक बंदे ने तो अवसरानुकूल कविता भी रच डाली. और फिर नर्सों के मंगल गान के बीच यह युगल अस्पताल के गलियारों से होता हुआ बिस्तर पर लेटी पण्डितानी यानि सुषमा के सामने जा पहुंचा. सुषमा ने विवाह की रस्में पूरी कीं और बुधवार की उस आधी रात को वो अस्पताल जैसे प्रेम के जीते जागते मंदिर में तब्दील हो गया.

इसके चार घण्टे बाद इस खूबसूरत दुनिया में एक शिशु अवतरित  हुआ जिसे अब नयन जिंदल नाम से जाना जाएगा और नयन महाशय के इस दुनिया में पदार्पण के चंद घण्टों बाद ब्रायना ने जन्म दिया रिले को. और इस तरह न्यूयॉर्क के उस अस्पताल में लिखी गई  दो शिशुओं के जन्म की वो विलक्षण कथा जिसे कम से कम इन दो परिवारों में तो बार-बार सुनाया ही जाएगा. मेरे दिल को तो उस बात ने छुआ जो सुषमा ने बाद में पत्रकारों से कही. अश्विन और उनसे दो बरस छोटे नयन की मां सुषमा ने कहा कि “हमें खुशी है कि हम अपने बच्चों को यह पाठ पढ़ा पा रहे हैं. हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे सदा इस बात को याद रखें कि अगर आपको अपनी ज़िंदगी में कभी भी दयालुता दिखाने और किसी और के लिए कुछ भी अच्छा करने का मौका  मिले तो उसे हाथ से न जाने  दें. जान लें कि ऐसा करना तनिक भी मुश्क़िल नहीं है.” मुझे लगता है कि यह संदेश अश्विन और नयन के लिए ही नहीं, हम सबके लिए भी है.
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत (इस बार मंगलवार की बजाय) शुक्रवार, 01 जून, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, May 22, 2018

यह गिरावट भी स्वागत योग्य है!


कैसी अजब दुनिया है यह! इधर हम अपने देश में बढ़ती जा रही जनसंख्या से त्रस्त हैं, और उधर अमरीका में सन 2008 की कुख्यात महा मंदी के बाद उर्वरता दर (फर्टिलिटी रेट) घटने का जो सिलसिला शुरु हुआ वह अब तक नहीं रुका  है. इस बार तो लगातार दूसरे बरस इस दर में रिकॉर्ड गिरावट दर्ज़ की गई है. वैसे निकट अतीत में 1958 से 1968 के बीच भी अमरीका में ऐसा ही हो चुका है. उर्वरता दर को किसी भी देश के जनसंख्या संतुलन को मापने का प्रामाणिक पैमाना माना जाता है. अगर दर बढ़ जाती है तो देश के ज़रूरी संसाधनों मसलन शिक्षा, मकान वगैरह की आपूर्ति प्रतिकूलत: प्रभावित होती  है, और घट जाती है तो काम करने वाली जन शक्ति घटने और काम न कर सकने वाली वृद्ध जनशक्ति बढ़ने लगती है. रूस और जापान में ऐसा ही हो रहा है. यहीं यह भी जान लीजिए कि उर्वरता दर की गणना इस आधार पर की  जाती है कि 15 से 44 वर्ष के बीच आयु वाली एक हज़ार स्त्रियां  कितने बच्चों को जन्म देती हैं. लेकिन बावज़ूद उर्वरता दर में हो रही सतत कमी के, फिलहाल अमरीका के सामने ऐसी कोई चुनौती नहीं है और इसके मूल में है सारी दुनिया के युवाओं का अमरीका  की तरफ आकर्षित होना. आप्रवासन की वजह से अमरीका उर्वरता दर की कमी के दुष्प्रभावों से बचा हुआ है.

सामान्यत: ऐसा माना जाता है कि जब कोई देश आर्थिक संकटों में घिर जाता है तो वहां उर्वरता दर इस वजह से कम होने लगती है कि लोग अच्छे दिनों के लौटने  तक संतानोत्पत्ति को स्थगित किये रहते हैं. जब आर्थिक संकट दूर हो जाता है तो उर्वरता दर भी पूर्ववत हो जाती है. लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि अमरीका के मामले में यह सिद्धांत भी ग़लत साबित हुआ है. आर्थिक हालात सुधरने के बावज़ूद, एक 2014 के अपवाद को छोड़कर वहां उर्वरता दर घटती ही जा रही है. सम्बद्ध विशेषज्ञ इसे हमारे समय के  बहुत बड़े जनसंख्या  रहस्यों में से एक मानते हैं. यह रहस्य इस तरह और गहरा जाता है कि सन 2007 की तुलना में 2017 में वहां पांच लाख बच्चे कम पैदा हुए, बावज़ूद इस यथार्थ के कि इन दस बरसों में गर्भधारण करने के लिए  सर्वाधिक उपयुक्त उम्र वाली स्त्रियों की संख्या में सात प्रतिशत की वृद्धि हुई.

बावज़ूद इस बात के कि इसे एक रहस्य कहा गया है, इसे समझने के प्रयास भी कम नहीं हुए हैं. कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसा इसलिए हो रहा है कि सामाजिक संरचना तेज़ी से बदल रही है. स्त्रियां ज़्यादा पढ़ लिख रही हैं, शादी करना स्थगित कर रही हैं और परिवार का आर्थिक दायित्व वहन करने की प्रमुख भूमिका निबाहने के लिए तत्पर होने लगी हैं. इस बात को आंकड़ों से भी प्रमाणित किया गया है. जहां पिछले दस बरस में कम उम्र की युवतियों के मां बनने में बहुत कमी आई है वहीं उम्र के चौथे दशक के मध्य तक जा पहुंची स्त्रियों के मां बनने की संख्या में तेज़ी से वृद्धि हुई है. अब हालत यह है हर पांच में से एक संतान पैंतीस बरस या इससे अधिक वय की स्त्री के यहां जन्म ले रही है. ज़ाहिर है कि ऐसा इस कारण हो रहा है कि आज की स्त्री यह मानने-समझने लगी है कि उससे पहले वाली पीढ़ी की  स्त्री जिस उम्र में मां बना करती थी वही उम्र उसके कैरियर के विकास के लिए सबसे ज़्यादा अहम है. आज उसका सारा ध्यान अपने कैरियर पर केंद्रित है और इस कारण वह मातृत्व  को अगले कुछ बरसों के लिए स्थगित करने लगी है.

उर्वरता दर में गिरावट के इस मामले में कुछ बातें ख़ास तौर पर ग़ौर  तलब हैं. एक तो यह कि यह गिरावट अल्पसंख्यक स्त्रियों के मामले में अन्यों की तुलना में बहुत ज़्यादा है. मसलन लातिन अमरीकी स्त्रियों में यह गिरावट सत्ताइस प्रतिशत तक दर्ज़ की गई है. इसी तरह अश्वेतों में जहां यह गिरावट ग्यारह प्रतिशत  दर्ज़ की गई वहीं श्वेतों में मात्र चार प्रतिशत की गिरावट लक्ष्य की गई. दूसरी बात यह कि उर्वरता दर में सर्वाधिक कमी सामान्यत: युवा स्त्रियों में देखी गई लेकिन पिछले बरस यह कमी तीस पार की स्त्रियों में भी देखी गई. इस पूरे प्रसंग का सर्वाधिक उजला पहलू यह है कि किशोरियों के मां बनने की दर में लगातार और तेज़ी से कमी हो रही है. यह जानकर सुखद आश्चर्य होता है कि सन 2007 से अब तक इसमें पचपन प्रतिशत की कमी आ चुकी है. इतनी ही नहीं, 1991 में जब किशोरियों के मां बनने की दर सर्वाधिक  थी तब से अब तक अगर इस गिरावट को आंकें तो यह आंकड़ा सत्तर फीसदी तक जा पहुंचता है. तमाम दूसरी बातें, अपनी जगह, इस गिरावट का तो हम सबको खुले मन से स्वागत करना ही चाहिए.
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 22 मई, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.