Tuesday 26 February 2013

जोग लिखी: साहित्य के बिस्मिल्लाह काशीनाथ सिंह

जोग लिखी: साहित्य के बिस्मिल्लाह काशीनाथ सिंह: हिंदी साहित्य में कुछ विधाएं केन्द्र में रही है और कुछ हाशिये पर. केन्द्र में रहने वाली विधाओं में  मुख्य हैं कविता और कहानी, जबकि बाकी स...

साहित्य के बिस्मिल्लाह काशीनाथ सिंह


हिंदी साहित्य में कुछ विधाएं केन्द्र में रही है और कुछ हाशिये पर. केन्द्र में रहने वाली विधाओं में  मुख्य हैं कविता और कहानी, जबकि बाकी सारी विधाएं कमोबेश हाशिये पर ही रही हैं. अब इस बात पर अलग से विचार किया जा सकता है कि विधाओं की इस स्थिति के लिए इनके रचनाकार कितने ज़िम्मेदार हैं और आलोचक कितने. लेकिन ज़िम्मा चाहे जिसका हो, इस स्थिति से शायद  ही कोई असहमत हो.  असहमति इस बात से ज़रूर होती है कि कविता केन्द्रीय विधा है या कहानी. लेकिन नाटक, निबंध, ललित  निबंध, डायरी, रेखाचित्र, संस्मरण, जीवनी, आत्मकथा वगैरह ने कभी केन्द्रीय स्थान के लिए अपना दावा पेश नहीं किया. बहुत कम रचनाकार ऐसे रहे जिन्होंने केवल इन विधाओं में से किसी में काम किया और महत्व प्राप्त किया. महत्व पाने के लिए किसी केन्द्रीय या महत्व वाली विधा में रचना कर्म की बैसाखी ज़रूरी ही रही.

लेकिन अपवाद कहां नहीं होते!

असल बात तो है रचना. अगर रचना में दम होता है तो फिर और सब बातें पीछे रह जाती   हैं. महत्व विधा का नहीं, उस विधा विशेष में किए गए काम का होता है. होना भी चाहिये. अब यही देखिए ना कि मैं बात केन्द्रीय विधा की कर रहा था, और मेरे सामने है काशीनाथ सिंह का रचनाकर्म. काशीनाथ सिंह जो सुपरिचित कथाकार हैं, उपन्यासकार हैं, नाटककार हैं, लेकिन आज उन्हें अधिक जाना जाता है उनके संस्मरणात्मक लेखन के लिए.  यानि उस विधा के लेखन के लिए जो कभी भी केन्द्रीय विधा नहीं रही.

‘अपना मोर्चा’ जैसे चर्चित और बहु प्रशंसित उपन्यास तथा ‘लोग बिस्तरों पर’, ‘सुबह का डर’, ‘आदमीनामा’, ‘नई तारीख’, ‘सदी का सबसे बड़ा आदमी’, ‘कल की फटेहाल  कहानियां’   और कई अन्य संग्रहों में संग्रहित कहानियों के जाने-माने लेखक काशीनाथ सिंह का एक संस्मरण ‘गरबीली ग़रीबी वह’ पहल-88 में छपा और कुछ संस्मरण जैसे ‘नागानंद चरितम वल्द अस्सी चौराहा’, ‘जी ही जाने है आह मत पूछो’, ‘दंत कथाओं में त्रिलोचन’, 'देख तमाशा लकड़ी का’  वगैरह सन 90-91 में ‘हंस’  और ‘वर्तमान साहित्य’  में छपे तो जैसे पूरे हिन्दी साहित्य जगत में तहलका मच गया. बेशक ‘हंस’  में छपे  कुछ संस्मरणों की बेबाक भाषा ने अलग से उत्तेजना का माहौल बनाया, लेकिन गम्भीर और समझदार पाठकों का ध्यान इस बात की तरफ़ गए बगैर नहीं रह सका कि इस संस्मरण विधा को पहले तो किसी ने इस तरह से नहीं बरता था. और बात केवल ‘अभूतपूर्व’ होने की ही नहीं थी. बात यह भी थी कि इस बरताव से इस विधा में नई ऊर्जा  का संचार हो गया था. अब तक जिस विधा का इस्तेमाल प्राय: छवि निर्माण के निमित्त किया जाता था, और इसलिए आधार व्यक्तित्व से एक सम्मानजनक दूरी बनाए रखी जाती थी, काशीनाथ सिंह ने इस विधा में कुछ और ही कर डाला. उन्होंने जिन लोगों  को अपने संस्मरणों में स्मरण किया  उन्हें  कुछ इस तरह स्मरण किया कि वे अपनी समस्त अस्थि-मज्जा के साथ, अपनी तमाम कमज़ोरियों और ताकतों के साथ, अपनी सारी  खूबसूरतियों और बदसूरतियों के साथ, अपनी हर भलाई और हर बुराई के साथ आपके सामने आ खड़े हुए. वे आपके इतने निकट आ गए कि लगा उनकी  सांस आपकी गर्दन को छू रही है, लगा उनकी पीक के दाग आपके कुर्ते पर अब लगे कि अब लगे. और तब लोगों का ध्यान इस बात पर गया कि कोई विधा न कमज़ोर होती है और न ताकतवर. असली कमाल तो उसको बरतने वाले का होता है. काशीनाथ सिंह में दम था तो उन्होंने  एक नामालूम-सी विधा में भी भी कमाल कर दिखाया. याद आया – कमाल पैदा तो करे कोई!

काशीनाथ  सिंह के संस्मरण उनकी तीन किताबों में उपलब्ध हैं: याद हो कि न याद हो (1992), आछे दिन पाछे गए (2004) और घर का जोगी जोगड़ा (2006). इन किताबों में क्रमश: सात, आठ  और तीन संस्मरण है. इनके अतिरिक्त ‘घर का जोगी जोगड़ा’  में परिशिष्ठ के रूप में ‘नामवर से काशी’ शीर्षक एक छोटी-सी बातचीत भी है. इनमें से ‘गरबीली गरीबी वह’  शीर्षक संस्मरण, जो नामवर सिंह पर है, ‘याद हो कि न याद हो’ में भी है और ‘घर का जोगी जोगड़ा’ में भी. वैसे यह (घर का जोगी जोगड़ा) तो पूरी किताब ही नामवर सिंह पर है. हिंदी साहित्य की दुनिया में, काशीनाथ सिंह को नामवर सिंह का भाई होने के नाते काफी-कुछ सुनना और सहना पड़ा है (जबकि दिलजलों  का मानना-कहना यह  भी है कि काशीनाथ सिंह आज जो भी हैं वो इसी वजह से हैं) ऐसे में किसी की भी दिलचस्पी यह जानने में हो सकती है कि काशीनाथ सिंह अपने भाई के बारे में क्या सोचते हैं. यह बात न भी होती तो हिंदी के एक समर्थ आलोचक और सुपरस्टार होने के नाते नामवर सिंह सबकी रुचि के विषय थे और हैं. नामवर सिंह पर काशीनाथ जी के संस्मरणों की चर्चा थोड़ा ठहर कर.

काशीनाथ सिंह के इस संस्मरण त्रिलोक की शुरुआत होती है उनके गुरुवर डॉ हजारी प्रसाद द्विवेदी  पर लिखे संस्मरण ‘होलकर  हाउस में हजारी प्रसाद द्विवेदी’  से. संस्मरण शुरु होता है महाकाव्य ‘पृथ्वी राज रासो’  के उस अंश के वर्णन से जिसमें पृथ्वी राज के देवगिरि आगमन का दृश्य है और काशीनाथ सिंह इसे जोड़ते हैं हजारी बाबू के बनारस आगमन के दृश्य से. सात बरस बाद हजारी बाबू का बनारस आगमन एक बड़ी और महत्वपूर्ण घटना है लेकिन उनके वहां आने से बहुतों को कोई खुशी नहीं है. इसलिए नहीं है कि वे पारंपरिक आचार्य जो नहीं हैं. कैसा होता है यह पारम्परिक आचार्य? बताते हैं काशीनाथ जी: जदि आपकी चमड़ी चीमड़ या चम्चम हो, हड्डियां गुट्ठल या गद्गद हों, चोटी से चरणों तक बदन के ढांचे के ताने-बाने पर तनी हुई नसें या तो आशीर्वाद उगल रही हों या असहमति के फव्वारे फेंक रही हों, तब तो भाई आचार्य; अन्यथा राम  भजिए!  ज़ाहिर है कि हजारी बाबू ऐसे नहीं हैं. तो विरोध  तो  अवश्यंभावी है. और विरोध भी इतना अधिक कि उसने पण्डित जी से उनकी हंसी तक छीन ली. वह हंसी, जिसका अद्भुत वर्णन किया है काशीनाथ सिंह ने. मैं चाहता हूं कि आप भी उसका आनंद लें:  हंसते थे पण्डित जी भी और ऐसी हंसी कि क्या कहने? हज़ारों किस्से हैं इस हंसी के. कभी वह कवच होती थी, कभी हथियार. कभी खुद पर होती थी, कभी और पर. लेकिन उनकी एक हंसी ऐसी भी होती थी जो साथ के मनुष्य को कपड़े-लत्ते, रोजी-रोटी, हाट-बाज़ार, घर-द्वार, शत्रु-मित्र, ऊंच-नीच, अमीर-ग़रीब – इन सबके दुनियाओं से उठाकर वहां रख देती थी जहां वह ‘जीने का अर्थ’ खुलता हुआ महसूस करता था.  सोचिये और याद कीजिए कि क्या आपने कभी हंसी का ऐसा वर्णन पढ़ा है? और आप इस वर्णन के प्रभाव से उबरें-उबरें  कि  लेखक पण्डित जी की बेचैनी के दिनों के वर्णन  से आपको चमत्कृत कर डालता है. थोड़ा बड़ा है यह अंश लेकिन मैं यहां इसे अपने पाठकों से साझा करने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूं: आप अन्दाज़ा लगा सकते हैं कि पण्डित  जी के लिए कितनी बेचैनी के दिन रहे होंगे? बेचैनी के दिन और बेचैनी की रातें...जब उनकी अपनी ही ‘सृष्टि’ की सारी संतानें बिना उनसे अनुमति लिए जबर्दस्ती उनके कमरे में घुस आती रही होंगी और कहती रही होंगी – ‘न्याय के लिए प्राण देना सीखो, सत्य के लिए प्राण देना सीखो, धर्म के लिए प्राण देना सीखो.’

एक संतान गई नहीं कि दूसरी आ खड़ी हुई – पिछले पाँच-सात महीनों से इन्हीं बच्चों को गुरुमंत्र दे रहे थे पिताश्री कि ‘किसी से न डरना  - गुरु से भी नहीं, मंत्र से भी नहीं, लोक से भी नहीं, वेद से भी  नहीं.’  और बड़ी तालियां और फूलों के गजरे बटोरते रहे,  आप किससे डर रहे हैं?  अमरचंद जोशी  से? वे तो अपनी भलाई देख रहे हैं? जोशी ने आप पर कोई कृपा नहीं की है, उसने आपको रेक्टर भी अपने ही लिए बनाया है. इस तरह  के सारे पदों, प्रलोभनों से आप बड़े हैं महाराज! यही मौका  है, आप अपने को इन बच्चों के आगे झूठा मत साबित कीजिए.

नीचे धरती, ऊपर आकाश, बीच में आप. कबीर भी आए होंगे और उनके साथ ही उपन्यासों की बची-खुची संतानें एक-एक कर आती रही होंगी और रात के सन्नाटे में जगा-जगाकर कहती रही होंगी – ‘अब कै दिन की जिंदगानी रह गई है आपकी? अब अपनी मत देखिए, हमारी चिंता कीजिए. हम क्या जवाब देंगे?’

और पण्डित जी का वह सबसे प्रिय काल देवता भी आया होगा अपने ओठों पर कुटिल मुस्कान के साथ – ‘फेर दिया न पानी अपने सारे किए-कराए पर! रेक्टर न रहते तो क्या मर गए होते? जीने के लिए किसी न किसी पद पर बने रहना ज़रूरी था क्या? तुम्हें किस चीज़ की कमी थी? प्रतिष्ठा की? दौलत की? पद की? चाहते क्या हो तुम?  निश्चय ही इस अंश का सही प्रभाव वही ग्रहण कर सकता है जिसने पण्डित जी को डूब कर पढ़ा हो. असल में इस संस्मरण में काशीनाथ सिंह ने पण्डित जी पर पूरी श्रद्धा, पूरी आत्मीयता  और पूरी निस्संगता से कलम चलाई है. यहां पण्डित जी अपनी पूरी सामर्थ्य और तमाम कमज़ोरियों के साथ हमारे सामने आते हैं.

किताब का दूसरा संस्मरण है ‘दंतकथाओं में त्रिलोचन’. यहां भी त्रिलोचन  के प्रति वैसी ही आत्मीयता और वैसी ही बेबाकी है जैसी पण्डित जी वाले संस्मरण में थी. इस संस्मरण  को पढ़ते हुए हम काशीनाथ सिंह के अपने नगर बनारस के साथ एक ख़ास तरह के पसन्द-नापसंद  भरे रिश्ते से परिचित होते  हैं.  यह उनका नगर है लेकिन यह नगर प्रतिभाओं के साथ जैसा बर्ताव करता है उसके प्रति अपनी नाराज़गी को लेखक कहीं भी छिपाता नहीं है. त्रिलोचन पर उनकी निष्कर्षात्मक टिप्पणी दृष्टव्य है: त्रिलोचन! मुझे लगता है कि तुम्हारा क़द तुम्हारी कविताओं से बड़ा है और शायद काफी बड़ा.  किताब  का तीसरा संस्मरण एक अपेक्षाकृत कम ज्ञात व्यक्तित्व नागानंद मुक्तिकण्ठ पर है. बकौल रामनारायण, नागानंद ही वे ‘सज्जन’ हैं जिन्होंने धूमिल को चौपट किया था. और बकौल काशीनाथ  सिंह, ये नागानंद ही ‘धूमिल के रामानंद थे’. नागानंद के बारे में काशीनाथ सिंह की अंतिम राय यह है: “नागानंद को देखे आज सदियां बीत गई हैं. सुना है कि वे मध्यप्रदेश में कहीं हैं. शायद किसी कॉलेज के अंग्रेज़ी विभाग में. वे खुद तो कुछ नहीं लिख सके लेकिन उस दौर में नगर में जो कुछ लिखा जा रहा था, उसके पीछे नागानंद के वज़ूद की चुनौतियां थीं. उनका हाल चौराहे की बीचोबीच खड़े उस ट्रैफिक पुलिसिए का था जो खुद तो खड़ा रहता है, लेकिन जानेवालों को रास्ता बताता जाता है.   स्वाभाविक ही है कि इसके बाद वाला संस्मरण धूमिल पर है. शीर्षक है ‘जी ही जाने है आह मत पूछो’. अपने पाठकों से धूमिल का परिचय कराते हुए काशीजी ने बहुत बेबाकी से लिखा है:  यह आग और यह समझ  काफी देर बाद पैदा हुई थी, शुरू में नहीं. शुरू में तो वह हरेक खूंटे के नज़दीक गया और आदतन हरेक की पूंछ उठाके देखता रहा.  और इसके कुछ ही देर बाद काशी जी धूमिल के साहित्यिक विवेक के विकास की एक बानगी यह लिख कर पेश करते हैं: जिन दिनों कृष्णा सोबती की कहानी ‘यारों के यार’ पर बहस हो रही थी, उसकी दो प्रतिक्रियाएं थीं – एक, विचार कहानी पर न होकर ‘चुदक्कड़’ और ‘बहनचोद’ पर क्यों हो रहा है? दूसरे, यह देखना चाहिए कि कृष्णा सोबती इन शब्दों को जीवन में भी झेलती हैं या साहित्य में ही अकथ को कहने की गुंजाइश रखती हैं. साथ  ही, क्या चरित्र के मुंह में ऐसे शब्दों को डाल देना, जो उसके मुंह में नहीं हैं, उचित है?   लेखक ने दो स्थलों पर लगभग सूत्र रूप में धूमिल को ला खड़ा  किया है: धूमिल अपने आप में अपनी कविता था – कविता के ही मुहावरों की तरह उसका व्यक्तित्व धारदार व चमकदार था और  धूमिल वह कबाड़ी है जो ऐसे हर सामान को बड़ी सावधानी और एहतियात से बटोरता रहता है, जिसे दूसरे रद्दी और फालतू समझकर छोड़ा या फेंका करते हैं.   धूमिल पर लिखे इस संस्मरण के एक-एक शब्द से काशीनाथ का  उनके प्रति अनुराग टपकता है, लेकिन महत्व की बात यह है कि यह अनुराग उसके वस्तुपरक मूल्यांकन में बाधक नहीं बना है और रचनाकार ने जिस शिद्दत से उसकी खूबियों को उभारा है उसी शिद्दत से उसकी कमज़ोरियों का भी ज़िक्र किया है.

किताब का अगला संस्मरण है ‘किस्सा साढ़े चार यार’ और यह आधारित है रवीन्द्र कालिया, विजयमोहन, दूधनाथ सिंह और ज्ञानरंजन पर. ये सभी काशीनाथ सिंह के अंतरंग हैं इसलिए ज़ाहिर है इन पर खूब खुल कर लिखा गया है और जम कर मज़ेदार चुटकियां भी ली गई हैं.  किसी की भी खिंचाई करने में लेखक ने कोई कसर नहीं छोड़ी है, और दोस्ती में यह स्वाभाविक भी है.  लेकिन शायद यह भी दोस्ती का ही तकाज़ा है कि दोस्तों की कमज़ोरियों को भी कुछ इस तरह पेश किया जाए कि वह उनकी कमज़ोरी न लगे. अब देखिये ना, काशीनाथ सिंह अपने दोस्त दूधनाथ सिंह के झूठ बोलने के बहुत सारे प्रसंग सुनाने के बाद कहते हैं:  दूधनाथ का झूठ दूधनाथ पर नहीं, इलाहाबाद की साहित्यिक संस्कृति पर करारी टिप्पणी है. अब, क्या आपको नहीं लगता कि यह बात किसी के लिए भी इतनी ही सहजता से कही जा सकती है?  लेकिन मित्रों, दोस्ती में इतना हक़ तो मिलना ही चाहिए. किताब का अगला संस्मरण सम्भवत: काशीजी के सर्वाधिक चर्चित संस्मरणों में से एक है: ‘देख तमाशा लकड़ी  का’.   इस संस्मरण  के शुरू में जो वैधानिक चेतावनी नुमा टिप्पणी है वो आपको आगे लगने वाले झटकों के लिए तैयार कर देती है: मित्रों, यह संस्मरण वयस्कों के लिए है, बच्चों और बूढ़ों के लिए नहीं; और उनके लिए भी नहीं जो यह नहीं जानते  कि अस्सी और भाषा के बीच ननद-भौजाई और साली-बहनोई का रिश्ता है! जो भाष अमें गंदगी, गाली, अश्लीलता और जाने क्या-क्या देखते हैं और जिन्हें हमारे मुहल्ले के भाषाविद ‘परम’ (चूतिया का र्याय) कहते हैं, वे भी कृपया इसे पढ़कर अपना दिल न दुखाएं – काशी के अपने मुहल्ले अस्सी पर आधारित यह सस्मरण सुभाषितों से भरा पड़ा है, और सुभाषित वेज भी हैं नॉन वेज भी. एक जगह पत्रकारों की खबर इस तरह ली गई है : तीसरी नस्ल और भी ज़ालिम है – पत्रकारों की! ‘तलवार मुक़ाबिल हो तो अख़बार निकालो’ वालों की. ये मालिकों को गरियाते हैं लेकिन छापते वही हैं जो वह चाहता है! ये धर्मनिरपेक्ष हैं लेकिन खबरें धर्मोन्माद की छापते हैं! दंगा, हत्या, लूट-पाट, चोरी-डकैती, बलात्कार के शानदार अवसरों पर इनके चेहरे की चमक देखते बनती है!  किताब का आखिरी संस्मरण ‘गरबीली ग़रीबी वह’ नामवर जी पर है. इस पर बात मैं ‘घर का जोगी जोगड़ा’ किताब पर (उसमें भी यह शामिल है) बात करते हुए करूंगा.


त्रयी की दूसरी किताब ‘आछे दिन पाछे गए’ को स्मरण-कथाओं की किताब कहते हुए ‘समीक्षक मित्र कमला प्रसाद’ (अब दिवंगत) को समर्पित किया गया है. इसमें जो रचनाएं संग्रहीत हैं वे 1976 से 2003 के बीच विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई थीं. सर्वाधिक, आठ में से पाँच रचनाएं ‘हंस’ में प्रकाशित हुईं और शेष ‘कहन’, ‘रविवार’  और ‘हिरावल’  में प्रकाशित हुईं. किताब की पहली रचना है ‘रहना नहीं देस बिराना है’. इस स्मरण कथा में खूब सारा बनारस है और लगभग उतना ही आत्म तर्पण है. बनारस को लेखक ने बहुत दिलचस्प अन्दाज़ में याद किया है. देखें: जब भी मैं याद करता हूं इस नगर को, यह ‘मुग़ले आज़म’ फिल्म के अकबर की तरह मेरी आंखों के आगे खड़ा, तमतमाया हुआ, हांफता-हूंफता नज़र आता है. वही गुस्से में आग उगलती आंखें, थरथराता बदन, घंघनाती आवाज़, सुनाई पड़ता है –‘अनारकली, सलीम तुम्हें मरने नहीं देगा और हम तुम्हें जीने नहीं देंगे!’

यह अकबर कोई और नहीं, हिंदी विभाग था और सलीम मेरा अस्सी, अस्सी मुहल्ले के लोग, यहां के मेरे पढ़-अपढ़ यार-दोस्त और वे लड़के जिनके साथ मैं पढ़ता-पढ़ाता था और जिन्हें हाल-हाल तक नहीं पता था कि अकसर हमारे बीच उठता-बैठता यह चमरकिट-सा आदमी मास्टर के सिवा भी कुछ है.   ज़ाहिर है कि यह आदमी मास्टर के सिवा एक लेखक है, और अपने लेखन  को लेकर उसका विचार यह है: कभी-कभी मुझे लगता है कि मैंने सारा जीवन वह लिखा जिसे नहीं लिखता, तब भी चल जाता मगर वह नहीं लिखा जो लिखना चाहिए था!

किताब  का दूसरा लेख ‘कलकत्ता में बांकेलाल’ शीर्षक से लेखक के अभिन्न मित्र रामधार  उर्फ़ बांकेलाल उर्फ़ प्रख्यात कोश विज्ञानी डॉ आर ए (राम अधार) सिंह पर है. लेख की सबसे बड़ी विशेषता है इसमें शामिल किए गए रामधार के पत्र/पत्रांश! तीसरा लेख ‘मुसाफ़िरखाना  में चार दिन’ दो युवा रचनाकारों महेश्वर और रमेश पर केन्द्रित है. अब तक के तमाम लेखों से हटकर है इस किताब का अगला लेख ‘कहानी की वर्णमाला और मैं’. यह एक ऐसा लेख है जिसे, मेरी राय में, हर कहानीकार को और हर उस व्यक्ति को जो कहानीकार बनना चाहता है, अवश्य पढ़ना चाहिए. यहां काशीनाथ  सिंह ने जैसे अपने पूरे लेखकीय  जीवन का निचोड़  सामने रख दिया है. एक जगह उन्होंने लिखा है:  कहानी विचारों से नहीं बनती है, वह बनती है ज़िन्दगी से, वह ज़िन्दगी जो समाज में कई स्तरों पर फैली है और किसी रूप में अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है.   एक और महत्व की बात यह है: एक लेखक में चीज़ों को देखने की एक साफ़ दृष्टि होनी चाहिए.  इस लेख में अगर लेखन पर उनके विचार हैं तो किताब के छठे लेख ‘परिवेश’ स्मृतियों में’ में  अपने किए का लेखा-जोखा है. किताब का पांचवां लेख ‘इक्कीसवीं सदी के देश का सफर’ में काशीनाथ सिंह जी की जापान यात्रा का वृत्तांत है.  इस किताब का सबसे शानदार लेख इसका अन्तिम लेख ‘या तरुवर महं एक पखेरू’ है जिसमें लेखक ने अपने गुरुजन, दीक्षित जी, विजयशंकर मल्ल, और बच्चन सिंह को अपने ख़ास अन्दाज़ में स्मरण किया है. इन तीनों गुरुजन पर लेखक की टिप्पणी देखिए: हमारे तीन गुरु और तीनों में जैसे खराब पढ़ाने की होड़, जनमत यह था कि अगर गौर से न सुना जाए तो ‘और’ के विशेष उच्चारण-कौशल के कारण बच्चन जी इन सब पर भारी हैं!  
बच्चन सिंह के प्रति काशीनाथ जी  का अतिरिक्त अनुराग कई जगह व्यक्त हुआ है, लेकिन यह अनुराग भी उन्हें यह लिखने से नहीं रोक सका है: ‘आलोचना’ का सम्पादन करते समय उन्हें ‘समीक्षक’ सिद्ध करने में नामवर ने कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन जो चीज़ नहीं थी और आज भी  नहीं है, उसके लिए नामवर या कोई भी क्या करता?
वह चीज़ है ‘रीढ़’.
इसे ही आलोचक लोग ‘प्रतिभा’ बोलते हैं.

किताब का आखिरी लेख ‘तीसरे भाई की खोज में प्रानपियारे’ आलोचक और अप्रतिम संगठनकर्ता कमला प्रसाद पर केन्द्रित है. लेखक ने ‘सहृदय’ और ‘साहित्य’  को जुड़वां भाई बताते हुए कमला बाबू को उनका तीसरा भाई कहा है. इस लेख के एक-एक शब्द से कमला बाबू के प्रति काशीनाथ जी का अनुराग व्यक्त होता है. यहां अगर उनकी खिंचाई भी है तो बेहद लाड़ के साथ!


संस्मरण त्रयी की तीसरी किताब है वर्ष 2006 में प्रकाशित ‘घर का जोगी जोगड़ा’. ‘भैया के अस्सीवें  बसंत पर’ यह किताब ज़ाहिर है कि नामवर जी पर केन्द्रित है. ‘स्मरण’  शीर्षक अपनी भूमिका में काशीनाथ जी ने लिखा है, शायद ही मेरी कोई ऐसी कहानी हो जो भैया को पसन्द हो लेकिन ऐसा संस्मरण और कथा-रिपोर्ताज भी शायद ही हो जो उन्हें नापसन्द हो.

अब बात करें  इस किताब की. जैसा मैंने पहले कहा, इसमें तीन संस्मरण और एक परिशिष्ट-साक्षात्कार है. पहले संस्मरण ‘जीयनपुर’ में बनारस ज़िले के उस अनाम-से गांव का जहां नामवर जी का जन्म हुआ, और उनकी वंश परम्परा का परिचय है. दूसरा संस्मरण ‘गरबीली ग़रीबी वह’ नामवर जी के व्यक्तित्व से उनकी बनावट और बुनावट से और उनके सोच से हमारा गहन साक्षात्कार कराता है. असल में इस किताब के लेखों में व्यक्ति नामवर जी और आलोचक नामवर जी, दोनों को गहराई से जानने का मौका मिलता है. थोड़ी चर्चा नामवर जी के अध्यापक पक्ष की भी है. इस तरह इस किताब से हमें नामवर जी को लगभग समग्रता में जानने-समझने का मौका मिलता है. यहां काशीनाथ जी ने अपने भाई पर एक बहुत मार्के की बात  कही है:  लोग कहते थे और उन्हें दर्द था कि ‘नामवर ने इनके बारे में लिखा’, ‘उनके बारे में लिखा’, ‘मेरे बारे में नहीं लिखा’ या ‘मेरे बारे में ऐसा लिखा.’ मुझे हमेशा लगता था कि नामवर ने किसी के बारे में नहीं, सिर्फ अपने बारे में लिखा है और ‘अपने बारे में’ का मतलब है जिसमें उसने ‘अपने आप’ को सबसे अधिक पाया है. वे हमेशा महसूस करते थे कि साहित्य समूची मनुष्य-जाति का होता है और उस जाति में मुक्तिबोध और नागार्जुन ही नहीं, रघुवीर सहाय और निर्मल वर्मा भी आते हैं.  यह लेख जितनी गहराई से नामवर की पड़ताल करता है वह अतुलनीय है. एक जगह काशी ने अपने भाई को यह कहते हुए उद्धृत किया है : ऐसा  कुछ भी न करना कि मेरा सिर झुके. बाद में जब एक दफ़ा काशीनाथ सिंह अपने भाई से यह चाहते हैं कि हिंदी विभाग में वे लेक्चरर की दो खाली जगहों में से एक के लिए अध्यक्ष शर्मा जी से उनकी सिफारिश कर दें तो नामवर गम्भीर हो जाते हैं, और लम्बी सांस लेकर कहते हैं: जो मैं नहीं कर सकता, उसके लिए क्यों कहते हो? होगा तो होगा, नहीं होगा तो नहीं होगा. तुम देख सको तो खुद देखो. मैं किसी से नहीं कहूंगा. ‘घर का जोगी जोगड़ा’ शीर्षक वाले संस्मरण, जिसकी शुरुआत भौजी के न रहने की ख़बर से होती है, में बात भौजी से शुरू होकर परिवार की स्थितियों पर आ जाती है. भौजी के लिए काशी जी ने लिखा है: उनकी ज़िन्दगी ही ‘चुपचाप’ की थी!  कभी किसी को पता ही नहीं चला कि वे ‘थीं’  भी! ....शादी के दस पन्द्रह साल तक उन्होंने जाना ही नहीं कि मुंह में ज़बान भी है. ... वे भारत की उन नारियों में से रही हैं, जो कभी नहीं जान पातीं कि पैदा होने और मरने के बीच जीवन भी होता है. वे आज़ादी से पहले के अपने मुल्क की उन बेटियों में से एक थीं जो जानती थीं कि जिस घर में पैदा हुई हैं, वह उनका घर नहीं है. उनका अपना घर कहां है, किधर है, कब होगा – इसे न उनकी मां जानती थी, न बाप.   यहां जिस तटस्थता और बेबाकी के साथ लेखक ने तत्कालीन परिवेश का और उस परिवेश में स्त्री की कुदशा का चित्रण किया है, उसकी सराहना के लिए हर अभिव्यक्ति अपूर्ण ही होगी. नामवर के पिता बिना अपने बेटे की सहमति के मचखियां निवासी नवाब सिंह को ज़बान दे देते हैं कि अपने बेटे की शादी उनकी बेटी से कर देंगे, नामवर पत्नी  को अपने साथ नहीं रखते, बनारस में भी काशी महसूस करते हैं कि भौजी भैया की कार्यसूची में फिलहाल थीं ही नहीं. कुल मिलाकर यह कि पत्नी से उनकी जो अपेक्षाएं थीं, वे पूरी  नहीं हो सकती थीं, और दोनों के बीच की खाई चौड़ी होती गई. लेकिन जैसे इतना  ही काफ़ी न हो, बेटे  विजय और बेटी गीता से भी उन्हें वो नहीं मिला जो वे चाहते थे. यह सारा वर्णन काशीनाथ जी ने अद्भुत तटस्थता के साथ किया है. निश्चय  ही  उनकी सहानुभूति अपने भाई के साथ है लेकिन इसके बावज़ूद वे कहीं भी औरों को छोटा करने नज़र नहीं आते. मेरे लेखे यह बहुत बड़ी बात है.

अध्यापक नामवर का परिचय कराते हुए काशी जी  ने लिखा है:  वे क्लास में कहानी कभी नहीं बांचते थे, वे उसे किताब  के पन्नों से निकालकर बाहर रख देते थे – रोज़मर्रे के जीवन के बीच; लिहाज़ा हर विद्यार्थी किसी समय की लिखी कहानी को  अपने अनुभव के आसपास देखने लगता था.  नामवर जी के अध्यापक रूप की चर्चा करते हुए लेखक ने उनके समय के अन्य कई अध्यपकों की अध्यापन शैली का भी रोचक किंतु गहन विश्लेषण कर दिया  है. हर कोई जानता और मानता है कि नामवर जी एक अप्रतिम वक़्ता है. इसी बात की चर्चा करते हुए काशी नाथ जी ने लिखा है: और भाषा पर ऐस अनिर्बाध नियंत्रण कि क्या कहिए? क्या मज़ाल जो कोई शब्द या वाक्य या मुहावरा उनकी इच्छा के बिना अपनी मर्ज़ी से कहीं ताक-तूककर चुपके से या ज़बरदस्ती घुस आने की ज़ुर्रत करे. सुनने में अटपटा लग सकता है लेकिन सच्चाई यह है कि बोलने की यह कला जितनी ईश्वरप्रदत्त नहीं है, उससे अधिक अर्जित है – अपनी मेहनत, लगन और धुन की कमाई. 

नामवर सिंह  वाले संस्मरण का सबसे बेहतरीन हिस्सा उसका अंतिम अंश है जहां काशीनाथ सिंह ने नामवर जी के आलोचक रूप का मूल्यांकन किया है. वैसे तो इस पूरे आलेख में टुकड़ों-टुकड़ों में एक आलोचक के रूप में नामवर सिंह के विकास को उभारा गया है लेकिन उस सबका अर्क यहां मौज़ूद है. देखें: वे हिंदी के  पहले मिशनरी आलोचक हुए जो साहित्य की चिंताओं के साथ हिंदी और अहिन्दी प्रदेश के शहरों में ही नहीं, कस्बों और गांवों तक में गए; ज्ञानियों, विज्ञानियों और अज्ञानियों के बीच गए, पढ़े-लिखों और  बेपढ़ों को सुना-सुनाया, हिलाया-डुलाया, झकझोरा – उनके बीच बोलकर जो साहित्य से बाहर के थे, ग़ैर पेशे के थे और हिंदी और साहित्य के प्रति उपहास का भाव रखते थे. उन्होंने उनके भीतर एक बेचैनी पैदा की – जीवन के लिए, समाज के लिए; और अहसास कराया कि साहित्य वही नहीं है जो किताबों में है, और जो किताबों में है वह भी तुम्हारे जीवन और साहित्य के सिवा दूसरा नहीं है. किताबों से बाहर जो तुम्हारे खाने-पीने और जीने-मरने में है वह भी साहित्य है.  मैं बहुत चाहकर भी खुद को रोक नहीं पा रहा हूं एक और अंश उद्धृत करने से: लोगों, अपनी सारी ज़िन्दगी मैंने ऐसा वक्ता नहीं देखा  जिसने अपनी ज़बान से क़लम का काम लिय अहो, जो अपनी वाणी से सुनने वालों के दिल-दिमाग पर लिखता रहा हो. एक ही विषय पर कई-कई व्याख्यान और हर व्याख्यान में हर बार नए नुक्ते, नई बात, नई जानकारियां – जहां सभा कानों से ही नहीं आंखों से भी सुन रही हो.   जिन्होंने कभी भी नामवर जी को बोलते सुना होगा वे पुष्टि करेंगे कि इस कथन में कितनी सच्चाई है.
काशीनाथ  सिंह की इन तीनों संस्मरण पुस्तकों से गुज़रने के बाद जो बात सबसे पहले  याद रहती है वह है ज़िन्दगी के प्रति उनका गहन अनुराग. जिसमें जीवन के प्रति लबालब प्यार न भरा हो वो ज़िन्दगी की हर छोटी-बड़ी डिटेल को इस तरह याद रख ही नहीं सकता. आप किसी पेड़ के पास से गुज़रते हैं, लेकिन अगर आपसे उसका वर्णन करने को कहा जाए तो आपको कुछ भी नहीं सूझेगा. सूझेगा तो उसी को जो पेड़ से सच्चा प्यार करता होगा. जो भी उनके जीवन में आया, काशीनाथ सिंह ने खुलकर उसे अपनाया और यही वजह है कि इन संस्मरणों में हाड़-मांस के, जीते-जागते इंसान हैं. देवता यहीं नहीं हैं. और यही काशीनाथ सिंह के लेखन की पहली खासियत है कि वे इंसान को इंसान ही रहने देते हैं. दूसरी बात जो मुझे बहुत महत्व की लगती है वो है उनकी ज़िन्दादिली. इन तीनों किताबों के हर पन्ने से उनकी ज़िन्दादिली झांकती है. ज़िन्दादिली और काशी (नगरी)  की विख्यात मस्ती. काशीनाथ  सिंह का गद्य दूसरे लेखकों के गद्य से बहुत अलहदा किस्म का है. इस गद्य के पीछे  शायद उनके भाई नामवर सिंह की भी थोड़ी प्रेरणा रही होगी. नामवर जी ने इन्हें एक पत्र में लिखा था: गद्य कैसा हो? ख़ुश्क़! यानि गीला न हो, भीगा न हो – कपड़े की तरह उसे निचोड़ कर, पानी निथार कर सुखा लो और जब हल्का, कड़कड़ हो जाए, उसमें चमक आ जाए तब इस्तेमाल करो! राग-विराग मुक्त गद्य!  बेशक,  हल्का, कड़कड़ करने वाला और चमकदार गद्य है यह, ऐसा जो शायद ही किसी और लेखक के पास हो.

काशीनाथ  सिंह की ये तीनों किताबें संस्मरण विधा के अंतर्गत आती हैं. हालांकि इन किताबों में जो है उसे सिर्फ़ संस्मरण नहीं कहा जाना चाहिए. अस्ल में इधर हिंदी में विभिन्न विधाओं में जो आवाजाही बढ़ी है और जिस तरह उनके बीच की दीवारें ढही हैं, उनका उत्कृष्ट उदाहरण हैं ये रचनाएं. यहां कहानी भी है, व्यंग्य भी, रेखाचित्र भी, नाटक भी, समीक्षा भी और न जाने और क्या-क्या भी!  और इन सबके बेहतरीन मेल से जो कुछ निर्मित हुआ है, उसे, क्योंकि हमारे पास दूसरा कोई उपयुक्त नाम नहीं है, हम संस्मरण ही कह कर काम चला रहे हैं. वही संस्मरण, जिसकी  हिंदी में कोई बड़ी हैसियत नहीं रही है. बकौल काशीनाथ  जी, संस्मरण की जगह साहित्य के समाज में उस दलित जैसी थी जिसके लिए ‘पंगत’ में कोई पत्तल नहीं. और यह काशीनाथ सिंह की कलम का ही कमाल है कि उन्होंने  इस उपेक्षित विधा को हिंदी की एक अनुपेक्षणीय विधा बना डाला, ठीक अपने ही शहर के उस बड़े कलाकार उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की तरह, जिन्होंने एक नामालूम से वाद्य, शहनाई को भारतीय शास्त्रीय संगीत का एक ज़रूरी वाद्य बना डाला था.

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सम्बोधन त्रैमासिक के काशीनाथ सिंह विशेषांक में प्रकाशित


Sunday 20 January 2013

विश्वविद्यालयों में शोध: कोई उम्मीद नहीं


आपने तो मेरी दुखती रग पर हाथ रख दिया है. एक फोड़ा जो पका हुआ था और काफी कष्ट दे रहा था आपने उसे छेड़ कर मेरा दर्द और बढ़ा दिया है. करीब चार दशक बिताए हैं उच्च शिक्षा के काम में और अब सेवा निवृत्त हो जाने के बाद भी इस क्षेत्र से रिश्ता पूरी तरह टूटा नहीं है. बहुत कुछ देखा है, बहुत कुछ का हिस्सा रहा हूं. अब मैदान में नहीं हूं लेकिन उससे पूरी तरह जुदा भी नहीं हो गया हूं. ऐसे में जब आपने शोध की वर्तमान स्थितियों के बारे में सवाल  उठाया काफी ऊहा पोह के बाद लगा कि सच कह ही दूं. इस छोटे-से आलेख में जो कह रहा हूं वह सामान्यीकृत  कथन है. अपवाद सर्वत्र होते हैं, यहां उच्च शिक्षा में भी हैं. लेकिन वे अपवाद इतने कम हैं कि उनके आधार पर कोई बात नहीं की जा सकती. इसलिए मैंने बार-बार अपवाद का ज़िक्र छेड़ने से खुद को रोका है.

जैसे जैसे विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ी है, उनमें नौकरी के अवसर भी बढ़े हैं. और बहुत स्वाभाविक है कि नौकरी चाहने वालों की संख्या में भी बहुत तेज़ी से वृद्धि हुई है. विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों में अध्यापन की नौकरी पाने के लिए शोध उपाधि अपरिहार्य है इसलिए नौकरी पाने के लिए शोध करने वालों की संख्या में जो वृद्धि हुई है उसे असामान्य नहीं माना जा सकता. जब तक शोध का सीधा सम्बन्ध नौकरी से नहीं था, बहुत सारे लोग ऐसे थे जो विशुद्ध अकादमिक कारणों से शोध कार्य में रत होते थे. हम सबने अपने अध्ययन काल में ऐसे अनेक शोध कार्यों से अपने ज्ञान में वृद्धि की है. लेकिन अब स्थितियां बदलने से उस तरह के लोग लगभग अदृश्य हो गए हैं और बच रहे हैं सिर्फ वे जिन्हें शोध इसलिए करना है कि उसे दिखा कर एक अदद नौकरी पाई जा सके. यानि शोध के पीछे जो भाव होता था या होना चाहिए वह तो लुप्त हो गया है, रह गई है महज़ खाना पूर्ति.

अब इस स्थिति की परिणति वही हो सकती है जिसकी तरफ आपने इशारा किया है. जिसे नौकरी पानी है वो चाहता है कि जल्दी से जल्दी, जैसे-तैसे करके ‘डॉक्टर’ हो जाए, और उस उपाधि को दिखाकर नौकरी पा ले. जल्दी से जल्दी की बात समझ में आती है, जैसे-तैसे वाली बात को थोड़ा और स्पष्ट करना होगा. पिछले कुछ  बरसों में हमारे यहां उच्च शिक्षा का ज़बर्दस्त विस्तार हुआ है. इस बात की तारीफ की जा सकती थी, बशर्ते इस विस्तार में गुणवत्ता की बलि न दे दी गई होती. हुआ यह कि सरकारों (यानि केन्द्र और राज्य सरकारों) ने लोकप्रियता पाने के लिए अनाप-शनाप कॉलेज और विश्वविद्यालय खोल दिए. इनमें से अधिकांश में न पढ़ने वाले थे और न पढ़ाने वाले,  और न पढ़ने-पढ़ाने का कोई माहौल. पुस्तकालय नहीं, प्रयोगशाला नहीं, कमरे नहीं. फिर भी कॉलेज और विश्वविद्यालय खड़े कर दिए गए. मुझे ऐसे बहुत सारे कॉलेजों की व्यक्तिगत जानकारी है जहां प्राध्यापक अपनी जेब से फीस भरकर विद्यार्थियों का नामांकन करते रहे हैं ताकि क्लास बनी रहे, वर्कलोड बना रहे और उनका अस्तित्व बना रहे. सरकारी कॉलेजों में तबादले की तलवार बड़ी मारक होती है. जो न करवा ले वही ठीक. अगर एम ए में दस या  बीस विद्यार्थी न्यूनतम न हुए तो क्लास टूट जाएगी, वर्क लोड घट जाएगा, तबादला हो जाएगा इसलिए जो भी मिले उसे जैसे तैसे भर्ती कर लो. और जिसे जैसे तैसे भर्ती कर लिया उसे जैसे तैसे पास भी कर दो, करवा दो. एम ए के पेपर बनाने और कॉपियां जांचने में भी प्राय: यही मानसिकता काम करती है कि अगर ज़्यादा विद्यार्थी फेल हो गए तो हमारे विषय का धन्धा मन्दा पड़ जाएगा, इसलिए पास तो करना ही है. मैं तो कई बार कहता हूं कि अगर हम ईमानदारी से अपनी कॉपियां जांचें तो परिणाम शायद दस प्रतिशत भी न रहे. लेकिन अगर ऐसा हो गया तो जो हड़कम्प  मचेगा, जो बावेला मचेगा उसकी सहज ही  कल्पना की जा सकती है. आज ही देश के एक अग्रणी माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष का बयान छपा है जिसमें उन्होंने कहा है कि वे अपने यहां चल रही केन्द्रीय बोर्ड की पाठ्यपुस्तकें इसलिए हटवाना और नई किताबें इसलिए लिखवा कर लागू करवाना चाहते हैं कि उनके प्रांत के अधिकांश  विद्यार्थी ग्रामीण क्षेत्रों से आते हैं और उन्हें केन्द्रीय बोर्ड की पुस्तकें पढ़ने समझने में दिक्कत होती है. यानि आप नहीं चाहते कि आपके प्रांत के ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले विद्यार्थी देश के अन्य प्रांतों के विद्यार्थियों के बराबर वाले स्तर पर आएं. आप उनकी सुविधा के लिए अपने स्तर को नीचा करने को तैयार हैं. यह एक प्रांत का उदाहरण है लेकिन स्थिति कमोबेश हर जगह यही है. तो ये ही लोग बी ए (या बी एस-सी या बी कॉम) करते हैं और ये ही एम ए वगैरह पास हो जाते हैं और ये ही शोध करते हैं.

जिन्हें एम ए की उत्तर पुस्तिकाएं जांचने का मौका मिला है वे जानते हैं कि अधिकांश विद्यार्थियों का स्तर कैसा होता है. मेरा विषय हिंदी है लेकिन जब मैं अन्य विषयों के अपने साथियों से बात करता हूं तो पाता हूं कि स्थिति हर जगह करीब-करीब एक-सी है. अब जिस विद्यार्थी ने एम ए करते हुए कभी मूल ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ या ‘गोदान’  के दर्शन नहीं किए, जिसे यह पता नहीं कि कवि और लेखक में कोई अंतर भी होता है या नहीं,  उससे आप यह उम्मीद कैसे कर सकते हैं कि जब वह शोध करेगा तो कोई चमत्कार कर देगा!  अभी कल ही एक विश्वविद्यालय के मेरे प्रोफेसर मित्र बता रहे थे कि उनके विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी में किताबों की क्या स्थिति है. मज़ाल है कि कोई किताब वहां मिल जाए. मतलब स्तरीय किताब. अधिकांश विश्वविद्यालयों और कॉलेजों की लाइब्रेरियां  जिस स्थिति में  है उसमें कोई विद्यार्थी अगर चाहे तो भी कुछ अच्छा नहीं कर सकता. ज़्यादातर जगहों पर तो पाठ्य पुस्तकें तक उपलब्ध नहीं होती हैं. मेरे प्रांत राजस्थान के सौ से ज़्यादा सरकारी कॉलेजों में लाइब्रेरियन ही नहीं हैं. नए खुले कॉलेजों या विश्वविद्यालयों में पुस्तकालयों की जो स्थिति है उसके बारे में कुछ न कहा जाना ही सबसे अच्छी बात  होगी. और यही बात प्रयोगशालाओं के बारे में सच है. कमरा है तो उपकरण नहीं, उपकरण है तो सामग्री नहीं, और सामग्री है तो स्टाफ  नहीं. सबसे अच्छा यही है कि एक कमरा लो, उसपर बोर्द लगाओ ‘लाइब्रेरी’ या ‘लैबोरेट्री’. और फिर ठोक तो उस पर एक भारी ताला. यानि है भी और नहीं भी है.  

लेकिन इस सबके बावज़ूद विद्यार्थीगण हायर सैकण्ड्री करते हैं, बी ए करते हैं,  एम ए करते हैं और फिर बेहतर नौकरी पाने के लिए या जब तक और कुछ न हो जाए, मसलन शादी वगैरह, तब तक का वक़्त सम्मानजनक रूप से काटने के लिए शोध करने का काम करते हैं. इनमें से अधिकांश  जब अपने भावी शोध निदेशक से मुखातिब होते हैं तो उनके मन में शायद ही यह स्पष्ट होता हो कि वे किस विषय पर शोध करना चाहते हैं और क्यों करना चाहते हैं. बहुत सारे तो बहुत बेबाक रूप से कह भी देते हैं कि जो विषय सबसे आसान हो उसी पर उन्हें शोध करवा दिया जाए. इस बीच अनेक विश्वविद्यालयों ने चाहे एम फिल और पूर्व शोध परीक्षाओं की व्यवस्था करके गुणवत्ता सुनिश्चित करने के अनेक प्रयास किए हों, स्थिति में बहुत बदलाव इसलिए नहीं आ सका है कि नींव बहुत ही कमज़ोर है. जहां ये प्रयास हुए हैं वहां ‘समझदार’ लोगों ने इनकी भी काट निकाल ली है.

अब इस तरह की  कमज़ोर नींव वाले युवा जब शोध कार्य करते हैं तो उस कार्य का स्तर कैसा होगा, यह बताने की ज़रूरत नहीं. और यह स्थिति केवल हिंदी विषय में नहीं है, सारे ही विषयों में है. प्रसंगवश यहां एक निजी प्रसंग लाने से खुद को रोक नहीं पा रहा हूं. कई बरस पहले, मेरे एक पूर्व विद्यार्थी ने, जो तब तक विधि विषय के प्राध्यापक बन कर मेरे ही सहकर्मी बन चुके थे, अपने शोध प्रबंध का प्रारूप मुझे इस अनुरोध के साथ दिया कि मैं उसको भाषिक दृष्टि से देख लूं. उस शोध प्रबंध की स्थिति यह थी कि उसमें कहीं भी कोई वाक्य जहां से शुरू होता वहां खत्म नहीं हो रहा था. लगता था कि किसी ने अंग्रेज़ी से अनुवाद करने की बचकानी कोशिश की है और वह कोशिश भी असफल रही है. मैंने घुमा-फिराकर यह बात जब उन्हें कही तो वे बोले कि हमारे विषय में तो ऐसा ही होता है. कहना अनावश्यक है कि कुछ समय के बाद उनके नाम के आगे डॉक्टर लगने लगा था. मुझे लगता है कि हिंदी में शोध की स्तरहीनता की ज़्यादा चर्चा की एक वजह यह भी है कि हम लोगों का ताल्ल्लुक लिखने पढ़ने से है और हम लोग इस मुद्दे पर भी काफी लिख-पढ़ लेते हैं, जबकि अन्य अधिकांश विषयों वाले सार्वजनिक मंचों पर प्राय: ऐसी  कोई चर्चा नहीं करते हैं, इसलिए उनकी अकादमिक दुनिया की भीतरी जानकारी दूसरों को  नहीं मिल पाती है.

अब इस तरह जो शोध होता है उसके परीक्षण-मूल्यांकन  में बहुत बड़ी भूमिका आपसी रिश्तों की होती है. जन्नत की हक़ीक़त सबको पता है इसलिए ‘तुम मेरे विद्यार्थी को पास कर दो, मैं तुम्हारे विद्यार्थी को पास कर दूंगा’ का खुला खेल निर्बाध रूप से चलता है. और इसी खेल  के पहले वो सब भी जहां-तहां चलता है जिसका ज़िक्र आपने किया है. मेरा इशारा पेशेवर शोध लेखकों से शोध प्रबंध लिखवाने, अन्य शोध प्रबंधों की नकल करने, रुपये पैसों के लेन-देन और यौन शोषण आदि की तरफ है. असल में ये सारी बातें उसी स्थिति का विस्तार है जिसका ज़िक्र हम शुरू से कर रहे हैं.

जो स्थिति है उसे लेकर कोई असहमति नहीं है. बहुत बुरी स्थिति है. लेकिन सवाल यह है कि क्या इस स्थिति में बदलाव की, सकारात्मक बदलाव की भी कोई उम्मीद है? मेरा स्वर आपको बहुत निराशाजनक लग सकता है, लेकिन मेरी तो स्पष्ट राय है कि फिलहाल कोई उम्मीद नहीं है. आदर्श की बातें बहुत की जा सकती हैं, कि ऐसा होना चाहिए, वैसा होना चाहिए. लेकिन उनका अर्थ क्या है? हम जिस तरह के समाज में रह रहे हैं उस समाज में अगर यह नहीं होगा तो क्या होगा? ऐसा कैसे मुमकिन है कि सारा समाज तो सड़ांध मारता रहे, और शोध का क्षेत्र पवित्रता की खुशबू बिखेरे? नीचे से ऊपर तक सब कुछ तो गड़बड़ है. कौन-सी चीज़ है जो ठीक चल रही है? क्या चुनाव ठीक हो रहे हैं? ठीक लोग चुने जा रहे हैं? अस्पतालों में इलाज़ ठीक  हो रहा है? पुलिस अपना काम कर रही है? मां-बाप ठीक से अपनी संतान को पाल-पोस रहे हैं? वे जहां और जो भी काम करते हैं, वो काम ठीक  से कर रहे हैं? अख़बार ठीक से निकल  रहे हैं? मीडिया अपनी भूमिका का सही निर्वहन कर रहा है? प्रधानमंत्री जी वो सब कर रहे हैं जो करने के लिए हमने उन्हें चुना था? एक सफाई कर्मी  ठीक से सफाई कर रहा है? प्राइमरी  स्कूल का मास्टर ठीक से पढ़ा रहा है? कॉलेज का विद्यार्थी अपनी 75 प्रतिशत कक्षाएं अटैण्ड कर रहा है? आप बताइये तो सही कि क्या ठीक चल रहा है? कॉलेजों विश्वविद्यालयों में पर्याप्त मात्रा में शिक्षक नहीं हैं, बरसों से भर्ती  नहीं हुई है जबकि लोग लगातार  रिटायर होते जा रहे हैं.  पढ़लिखकर भी लोगों  को जो नौकरी मिलेगी उसमें उन्हें उचित वेतन भी नहीं मिलने वाला है. हमारे ज़्यादातर शिक्षण संस्थानों में ठेके पर अध्याप्क रखे जा रहे हैं. मेरे प्रांत में बहुत सारे निजी कॉलेजों में पाँच पाँच हज़ार रुपये में  लोग पढ़ा रहे हैं. तो जिनके सामने कोई उज्ज्वल भविष्य भी नहीं है उनसे आप कैसे यह उम्मीद कर सकते हैं कि वे बहुत निष्ठा से अपना काम करके शोध कार्य करेंगे?   तो इन सब बातों को अनदेखा करते हुए कोई भला कैसे शोध के स्तर को ऊँचा उठाने की बात कर सकता है? कम से कम मैं तो नहीं कर सकता. इसलिए नहीं कर सकता कि इस दुनिया को भीतर से मैंने देखा है और इसकी रग-रग से वाक़िफ हूं.

बहुत चाहा कि अपनी यह टिप्पणी इस निराशाजनक  स्वर पर ख़त्म न करूं लेकिन जब अपनी देखी दुनिया को याद किया तो बस, यह हुआ कि बकौल साहिर, कभी खुद पे कभी हालात पे रोना आया.
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'समकालीन सरोकार' के जनवरी, 2013 अंक में प्रकाशित. 

Friday 30 November 2012

कैसे समझाएं इन्हें

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काफी दिनों से बढ़ते जा रहे मोतियाबिंद से परेशान था. ऑपरेशन कराना टालता जा रहा था.  बात यह है कि ऑपरेशन चाहे कितना भी छोटा क्यों न हो, उससे डर तो लगता ही है. लेकिन वो कहा जाता है ना कि बकरे की अम्मा कब तक ख़ैर मनाएगी. कई दोस्तों से पूछा, और सबकी राय का आकलन करने के बाद जा पहुंचा शहर के सबसे नामी, सर्वाधिक आधुनिक सुविधाओं वाले (और  इसीलिए स्वाभाविक रूप से खासे महंगे भी)  नेत्र चिकित्सालय में. रिसेप्शन काउण्टर पर लगी एक पट्टिका पर नज़र पड़ी तो दिल खुश हो गया. लिखा था: “अस्पताल में मरीज़ कृपया अपने मोबाइल बन्द रखें.” यह हुई ना बात. लोगों को मोबाइल इस्तेमाल करने का शऊर ही कहां है? जहां देखो वहीं शुरू हो जाते हैं, बिना आस-पास वालों की असुविधा का ज़रा भी खयाल किए. रिसेप्शन काउण्टर पर रजिस्ट्रेशन करवाया, दो जगह जूनियर डॉक्टरों से अपनी आंखें जंचवाई और फिर मुझे पहुंचा दिया गया अस्पताल के मुख्य डॉक्टर के कक्ष में. उन्हीं के नाम पर यह अस्पताल है. वे एक मरीज़ को देख रहे थे, मुझे पास पड़े सोफे पर बिठा दिया गया. वे मरीज़ को देख रहे थे, पास खड़े एक दोस्त से बात कर रहे थे और कान में लगे ईयर फोन पर किसी की बात सुनते हुए यदा-कदा उन्हें भी जवाब देते जा रहे थे. इसी बीच वो मरीज़ निपट गया. अब  मुझे डॉक्टर के सामने वाली स्टूल पर बिठा दिया गया. मेरा कार्ड डॉक्टर के सामने था. उनका द्वि-चैनली संवाद पूर्ववत जारी रहा. और उसी के साथ मेरी आंखों की जांच भी हो गई. मुझसे कुछ पूछने की ज़रूरत उन्हें महसूस नहीं हुई. पास खड़े उनके सहायक ने जब मुझे उठने का संकेत किया तो मैंने ढीढ बनकर डॉक्टर से कहा कि आपने मुझसे कुछ भी तो नहीं पूछा. और तब बेमन से उन्होंने एक दो सवाल किए और मुझे बाहर भेज दिया. उनकी जल्दी में शायद इतना ही सम्भव था.

बाहर मुझे बताया गया कि मुझे अपनी दोनों आंखों का ऑपरेशन करवाना होगा. बहरहाल, किस्सा कोताह यह कि निर्धारित तिथि को निर्धारित समय पर मैं अपनी आँख का ऑपरेशन करवाने अस्पताल पहुंच गया और कुछ प्रारम्भिक चिकित्सकीय कामों के बाद लेजाकर मुझे ऑपरेशन टेबल पर लिटा दिया गया. कक्ष में कुल तीन लोग थे. एक स्वयं वे डॉक्टर, एक उनकी सहायिका और एक परिचारक. सहायिका जी ने बहुत कोमलता से मेरी आँख के नीचे निश्चेतन करने वाला इंजेक्शन लगाया, मेरी दोनों आंखों को ढक दिया गया और जिस आँख का ऑपरेशन होना था, उस पर पड़े आवरण में एक खिड़की बना दी गई. अब जो करना था मुख्य डॉक्टर को करना था. मुझे आभास तो हो रहा था कि मेरी आँख के साथ क्या हो रहा है, लेकिन महसूस कुछ नहीं हो रहा था. डॉक्टर अपने दक्ष हाथों से मेरी आँख में कुछ कर रहे थे और साथ-साथ अपनी सहायिका जी से गपशप भी करते जा रहे थे. मुझे वो गपशप क़तई अच्छी नहीं लग रही थी, लेकिन इतनी हिम्मत भी नहीं हो रही थी कि उन्हें मना करूं. थोड़ी देर बाद मुझे आवाज़ से पता लगा कि डॉक्टर साहब मोबाइल पर किसी से बात भी कर रहे हैं. हाथ उनके बदस्तूर चल रहे थे. बात सामान्य किस्म की थी, लेकिन लम्बी चली. मैं कुढ़ता रहा. कोई पन्द्रह मिनिट लगे होंगे इस सब में, और मेरी ऑपरेशन की गई आँख पर पट्टी चिपका कर मुझे ऑपरेशन थिएटर से बाहर छोड़ दिया गया.

पन्द्रह दिन बाद मेरी दूसरी आँख का ऑपरेशन हुआ और उस दौरान भी यही सब हुआ. यानि डॉक्टर साहब का फोन पर बतियाना, अपनी सहकर्मी से  गपशप करना वगैरह. ख़ैर! ऑपरेशन हो गया, और मैं घर आ गया. लेकिन घर आकर तमाम दूसरी व्यस्तताओं के बीच भी यह बात मन में घुमड़ती रही कि मरीज़ को देखते वक़्त और उसके बाद ऑपरेशन के वक़्त डॉक्टर का अपने सहकर्मी से और मोबाइल पर गपशप करते रहना कितना वाज़िब था. यह सब करते हुए उनके हाथ ज़रा भी इधर-उधर हो  जाएं तो? क्या आँख के ऑपरेशन जैसे नाज़ुक काम में एकाग्रता की ज़रूरत नहीं होती है? क्या किसी डॉक्टर का अपने मरीज़ के साथ इस तरह का गैर-ज़िम्मेदाराना व्यवहार उचित है? वगैरह. काफी सोच-विचार के बाद,  अपनी तमाम नाराज़गी पर काबू पाते हुए, यथासम्भव संयत लहज़े में मैंने एक पत्र इन डॉक्टर महोदय को लिखा और ई मेल कर दिया.

बहुत जल्दी ही मुझे डॉक्टर महोदय का उत्तर भी मिला. मुझे खुशी इस बात की हुई कि अपने उत्तर में उन्होंने मेरी प्रतिक्रिया पर, जो शालीन होने के बावज़ूद मधुर तो नहीं ही थी, कोई नाराज़गी ज़ाहिर नहीं की, लेकिन  उनका जवाब यह था कि वे खुद भी चाहते हैं कि ऐसा न करें, लेकिन मरीज़ों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए उन्हें ऐसा करना पड़ता है. यानि, बहुत कुशलता से उन्होंने अपने व्यवहार का दायित्व मरीज़ों की सुविधा के नाम कर दिया. या फिर उन्होंने समझकर भी मेरी बात को नहीं समझा.  अब उनके इस उत्तर पर क्या कहा जा सकता है सिवा चचा ग़ालिब को याद करने के :
                            या रब न वो  समझे  हैं न  समझेंगे मेरी बात
                            दे और दिल उनको जो न दें मुझको ज़ुबाँ और!
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दिनांक 30 नवम्बर 2012 को जनसत्ता में 'दुनिया मेरे आगे' स्तम्भ में 'सुविधा के ख़तरे' शीर्षक से प्रकाशित.