Friday, October 19, 2018

अप्रतिम साहस और अकथनीय दुख की जुगलबन्दी


कहते हैं कि किस्मत के लिखे को कोई बदल नहीं सकता, लेकिन इसी के साथ-साथ यह भी कहा जाता है कि दुनिया में नामुमकिन कुछ भी नहीं होता. ज़रूरत होती है आपके पक्के इरादे की. ये दोनों बातें एक साथ नमूदार हुईं उस प्रसंग में जो मैं आपको सुनाने जा रहा हूं. हाल में अमरीका के इण्डियाना में एक अनूठी शादी हुई. शादी हुई, शादी का सारा तामझाम मौज़ूद था, दुल्हन थी, दुल्हन के लिबास में थी, दुल्हा दुल्हन के तमाम परिवारजन और मित्रगण थे, लेकिन दूल्हा नहीं था. शादी फिर भी हुई. शादी हुई मृत दूल्हे की कब्र के साथ! यानि किस्मत के लिखे को बदल ही दिया गया! और ऐसा किया दुल्हन जेसिका पेजैट ने.

बेहतर होगा कि सारी बात सिलसिलेवार बता दी जाए. बरसों पहले जेसिका पेजैट की सगाई केण्डल जेम्स मर्फी के साथ हुई थी. एक दूसरे से महज़ सात मील की दूरी पर रहने वाले इस युवा जोड़े की पहली मुलाक़ात कॉलेज में हुई और फिर आहिस्ता-आहिस्ता वे एक दूसरे के प्रेम में डूबते गए. जेसिका ने बाद में बताया कि “केण्डल बेहतरीन इंसान थे. बहुत प्यार करने वाले और दयालु. वे किसी को भी अपने कपड़े उतारकर पहना देते थे.” उनकी सगाई के किस्से बहुत दिनों तक लोगों की ज़ुबां पर थिरकते  रहे. जैसे जैसे उनकी शादी का दिन नज़दीक आता जा रहा था, उनकी बेताबी भी बढ़ती जा रही थी. शादी की तैयारियां ज़ोर-शोर से चल रही थीं. लेकिन नियति को शायद उनकी खुशी स्वीकार्य नहीं थी. शादी से मात्र नौ महीने पहले एक भयंकर दुर्घटना हो गई. केण्डल जेम्स मर्फी जो कि एक स्वयंसेवी अग्निशामक यानि फायरफाइटर था, किसी घायल की जान बचाने जाते हुए एक अन्य ड्राइवर की गाड़ी तले कुचला गया. संयोग की बात यह थी कि वह ड्राइवर भी उसी घायल की जान बचाने जा रहा था. बताया गया कि वह ड्राइवर न केवल नशे में था, बहुत तेज़ गाड़ी चला रहा था और साथ ही मोबाइल पर बात  भी कर रहा था. केण्डल जेम्स मर्फी ने दुर्घटनास्थल पर भी दम तोड़ दिया. केण्डल की मौत के कुछ ही समय बाद जेसिका के पास बुटीक से फोन आया कि उसका शादी का जोड़ा तैयार है. भला इससे बड़ी विडम्बना भी कोई और हो सकती है?

ज़िन्दगी में आए इस भयंकर तूफान के खिलाफ़ खड़े होने की ताकत जेसिका पेजैट ने अपने भीतर कैसे संजोई होगी, सोचकर आश्चर्य होता है. सबसे बड़ा फैसला  उन्होंने यह किया कि केण्डल की मौत के बावज़ूद वो शादी रद्द नहीं करेंगी, न केवल  रद्द नहीं करेंगी, पूर्व निर्धारित तिथि  को ही करेंगी. बाद में जेसिका ने बताया, “मैं केण्डल के जाने के बावज़ूद इस दिन को उसी शिद्दत से मनाना चाहती थी, बावज़ूद इस बात के कि वो अब शारीरिक रूप से मेरे साथ  नहीं थे. मैं इस दिन की यादों को संजोकर रखना चाहती थी.” और इसलिए पूर्व निर्धारित 29 सितम्बर को जेसिका ने वही सफेद रंग का दुल्हन का लिबास धारण किया जो उन्होंने इस ख़ास दिन के लिए तैयार करवाया था. उनकी शादी की तस्वीरें खींचने के लिए वही फोटोग्राफर वहां उपस्थित थीं  जिन्हें  जेसिका और केण्डल ने मूल रूप से इस दिन फोटो खींचने का दायित्व सौंपा था. हां, इतना ज़रूर है कि वे केवल शादी करना चाहती थीं, फोटो शूट उनकी योजना में शामिल नहीं था. वह अनायास ही हो गया. जेसिका पेजैट ने अपने प्रिय केण्डल जेम्स मर्फी  की यादगार चीज़ों -उनकी आग बुझाने वाली पोशाक, हेलमेट, विशेष जूतों और उन सूरजमुखी के फूलों के साथ तस्वीरें खिंचवाई जो वे अपनी शादी के समय काम में लेने वाले थे. कुशल फोटोग्राफर ने बाद में कुछ तस्वीरों में फोटोशॉप करके केण्डल जेम्स को भी शामिल कर दिया. बाद में जब ये फोटो फ़ेसबुकर आए और फिर दुनिया भर में वायरल हुए तो लोगों ने इनमें उस युवती के अप्रतिम साहस और अकथनीय दुख दोनों को एक साथ देखा. खुद जेसिका ने बाद में कहा, “मैं अन्दर से टूटा हुआ महसूस कर रही थी. मेरी बगल में मेरा दूल्हा नहीं था. मैं वहां अकेली खड़ी थी.” लेकिन वैसे वे अकेली कहां थीं? उनका प्रिय केण्डल पास ही तो सो रहा था. और उसी चिर निद्रा में डूबे केण्डल  के साथ उन्होंने विवाह किया. इस अनूठी शादी में केण्डल के वे तमाम सहकर्मी भी शामिल हुए जो उनके जीवन के आखिरी दिन उनके साथ थे.

बाद में अपनी इस अनूठी शादी की तस्वीरों को देखकर जेसिका ने कहा, “तस्वीरें देखकर मुझे लगता है कि केण्डल मेरे पास ही हैं. मैं उन्हें हंसते हुए देख सकती हूं. वो आज भी मेरे दिल में मौज़ूद हैं. मैं उन्हें महसूस कर सकती हूं.” बहुत सारे लोगों ने इन तस्वीरों को देखकर जेसिका से सम्पर्क  किया और उन्हें बताया कि उनकी इन तस्वीरों ने उन्हें खुद उनके अपने शोक से उबरने की ताकत  दी है.
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत शुक्रवार, 19 अक्टोबर, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Wednesday, October 10, 2018

ड्राइविंग लाइसेंस के लिए मशहूर हुआ पर्यटन स्थल


बहुत सारे देशों की बहुत सारी जगहें अलग-अलग कारण से इतनी विख्यात हैं कि दुनिया भर के पर्यटक वहां खिंचे चले आते हैं. पर्यटन से होने वाली आय से न केवल स्थानीय नागरिकों का कल्याण होता है उस देश विशेष की सरकार को भी अपनी अर्थव्यवस्था सुदृढ़ करने में भारी सहायता  मिलती है. कुछ स्थान अपने प्राकृतिक सौंदर्य के लिए जाने जाते हैं तो कुछ धर्म, अध्यात्म, पर्यावरण, नैसर्गिक सौंदर्य, खरीददारी, मौज़ मस्ती वगैरह के लिए. लेकिन अगर कोई आपसे यह कहे कि हमारी इस रंग बिरंगी दुनिया में कम से कम एक जगह ऐसी भी है जहां पर्यटक घूमने फिरने से  ज़्यादा इस बात से आकर्षित होकर आते हैं कि वहां ड्राइविंग लाइसेंस बनवाना अपेक्षाकृत आसान है, तो क्या आप विश्वास कर लेंगे?

दक्षिण कोरिया का जेजू द्वीप पर्यटकों के बीच बहुत लोकप्रिय है. ज्वालामुखी विस्फोट से बना यह द्वीप कोरिया के दक्षिणी पश्चिमी हिस्से से मात्र सौ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. निकटवर्ती चीन से बहुत बड़ी संख्या में पर्यटक जेजू के समुद्र तट का आनंद लेने, खरीददारी करने और जुआ खेलने के लिए आते हैं, लेकिन इसी के साथ चीन से आने वाले पर्यटकों में ऐसे लोगों  की संख्या भी बहुत ज़्यादा होती है जो यहां सिर्फ ड्राइविंग लाइसेंस लेने आते हैं और अगर उस काम  से समय बच जाता है तो थोड़ा पर्यटन भी कर लेते हैं. दरअसल चीन के बड़े शहरों में ड्राइविंग स्कूल से लाइसेंस बनवाने पर जितना खर्चा होता है उससे कम खर्च में जेजू में आकर ड्राइविंग लाइसेंस बनवाया जा सकता है, और पर्यटन भी हो जाता है. चीन की बहुत सारी पर्यटन कम्पनियां दक्षिण कोरिया का हवाई कहे जाने वाले इस जेजू द्वीप में आकर लाइसेंस  बनवाने के लिए पांच दिन का हॉलीडे पैकेज तक देने लगी हैं. ये पैकेज लगभग 1300 डॉलर से शुरु होते हैं और इस में घूमना-फिरना भी शामिल होता है. इसके विपरीत चीन की राजधानी बीजिंग में एक वीआईपी ड्राइविंग कोर्स का खर्चा करीब 2200 डॉलर होता है. इतना ही नहीं, वहां ड्राइविंग लाइसेंस मिलना है भी बहुत कठिन. इसके अलावा यहां से मिलने वाले लाइसेंस का एक अतिरिक्त लाभ यह भी है कि यह विदेशों में भी मान्य है, जबकि चीन में लिया गया लाइसेंस  केवल चीन में ही काम में आ सकता है. इस बात को यों समझें. संयुक्त राष्ट्र संघ की पहल पर इण्टरनेशनल ड्राइविंग परमिट की व्यवस्था शुरु की गई  जिससे यह सुविधा हो गई कि जिनके पास ये परमिट हों वे लगभग एक सौ पचास अन्य देशों में भी कार किराये पर ले सकते और ड्राइव कर सकते हैं. चीन ने इस समझौते पर दस्तखत नहीं किए इसलिए चीनी ड्राइविंग लाइसेंस पर यह परमिट नहीं मिलता है जबकि दक्षिण कोरिया वाले पर मिल जाता है. इस वजह से वे चीनी जो दुनिया के अन्य देशों में रहते या जाते रहते हैं उन्हें अपने देश के लाइसेंस की बजाय दक्षिण कोरिया का लाइसेंस लेना अधिक लाभप्रद लगता है. दक्षिण कोरिया के इस लाइसेंस को पा लेने के बाद चीनी नागरिकों को अपने देश में एक सामान्य लोकल ड्राइविंग परमिट लेना होता है जो आसानी से मिल जाता है. वैसे  चीन में ड्राइविंग लाइसेंस पाना बहुत कठिन है. एक तो यह बात कि वहां आवेदकों की तुलना में टेस्ट सेण्टर बहुत कम हैं इसलिए प्रतीक्षा सूची बहुत लम्बी होती है, और अगर कोई परीक्षा के किसी भी चरण में नाकामयाब हो जाए तो उसके इंतज़ार की घड़ियां और अधिक लम्बी हो जाती हैं. चीन का टेस्ट इस मामले में भी मुश्क़िल है कि वहां लिखित परीक्षा में सौ सवाल पूछे जाते हैं जबकि दक्षिणी कोरिया में मात्र चालीस सवाल ही पूछे जाते हैं. यही नहीं, चीन में उत्तीर्ण होने के लिए नब्बे प्रतिशत अंक ज़रूरी होते हैं, लेकिन कोरिया में साठ प्रतिशत अंक लाने पर ही उत्तीर्ण कर दिया जाता है.

दक्षिण कोरिया में ड्राइविंग लाइसेंस लेने की प्रक्रिया न तो चीन जितनी जटिल है और न उतनी समय खपाऊ. सामान्यत: एक दिन में टेस्ट की सारी प्रक्रिया पूरी हो जाती है और आवेदन करने से लगाकर आपके हाथ में लाइसेंस आने में अधिकतम एक सप्ताह लगता है. बहुत सारे पर्यटन पैकेज सुलभ कराने वाले कोरिया की ड्राइविंग एकेडेमी से तालमेल बिठाकर तेरह घण्टों की अनिवार्य ड्राइविंग ट्रेनिंग का भी इंतज़ाम कर देते हैं और ये दावा करते हैं  कि इनकी दिलवाई  ट्रेनिंग के बाद टेस्ट में सफलता करीब-करीब सौ फीसदी सुनिश्चित होती है. चीनियों के लिए जेजू द्वीप में आकर ड्राइविंग लाइसेंस लेने में एक और सुविधा यह भी है कि यहां आने के लिए उन्हें वीज़ा भी नहीं लेना होता है.

ड्राइविंग लाइसेंस और पर्यटन के इस गठबंधन ने क्या आपको भी यह सोचने को प्रेरित किया है कि ऐसे और कौन-से गठबंधन मुमकिन हैं?

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, दिनांक 09 अक्टोबर, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, October 2, 2018

अजीबोगरीब किस्सा आग बुझाने वाले दूल्हे का


जीवन में बहुत बार ऐसा कुछ घटित हो जाता है जिसके बारे में किसी ने कभी सोचा भी नहीं होता है. लेकिन जब वो घटित हो चुका होता है तो उसकी स्मृतियां भावनाओं का पूरा इंद्रधनुष रच  देती हैं. अब देखिये ना, अमरीका के इस युगल के जीवन में यकायक जो घटित हो गया उसे भला कभी वे भूल सकेंगे?

मैं बात कर रहा हूं मिनेसोटा की बत्तीस वर्षीया क्रिस्टा बोलां और उनके दोस्त उनचालीस वर्षीय जेरेमी बुरासा की. कोई पांच बरस पहले क्रिस्टा बोलां की सगाई जेरेमी बुरासा के साथ हुई थी. और अब वे शादी कर लेना चाहते थे.  लेकिन जब भी वे इसकी योजना बनाने लगते  कोई न कोई अड़चन आ जाती. इस बार भी ऐसा ही हुआ. सब कुछ तै हो गया, लेकिन ऐन वक़्त पर बिल्ली रास्ता काट गई. जो समारोह स्थल उन्होंने अपने विवाह के लिए बुक किया था, वह अचानक अनुपलब्ध हो गया. लेकिन इस बार वे भी ठाने बैठे थे कि शादी तो पूर्व निर्धारित तारीख को ही करेंगे. जब और कोई जगह उन्हें नहीं मिल पाई तो अग्नि शमन दस्ते के कर्मचारी और दूल्हे मियां जेरेमी ने सोचा कि क्यों न अपने अग्नि शमन केंद्र को ही विवाह स्थल बना लिया जाए. इस शुभ काम के लिए अफसरों की अनुमति भी मिल गई! अब वैसे तो अग्नि शमन जैसी इमरजेंसी सेवा वालों को हमेशा ही इस बात का खतरा बना रहता है कि जाने कब बुलावा आ जाए, जेरेमी थोड़ा आश्वस्त यह सोचकर था कि एक तो उसके इलाके में बहुत ज़्यादा रिहायश नहीं है, दूसरे वहां आग लगने की घटनाएं ज़्यादा नहीं होती हैं और तीसरे उस दिन उसकी ड्यूटी भी नहीं है.

तो शादी के रस्मो-रिवाज़ शुरु हुए, हंसी-खुशी के माहौल में सब कुछ भली भांति सम्पन्न होता जा रहा था. नव विवाहित जोड़ा  फोटो खिंचवाने की तैयारी में था  कि अचानक उस अग्नि शमन केंद्र के सायरन चीख उठे. पास के एक घर में आग लग गई थी. बुरासा ने अपनी नई नवेली दुल्हन की तरफ देखा, और उसने भी तुरंत जैसे आंखों ही आंखों में जवाब दे दिया, “नहीं. तुम्हें नहीं जाना है.” शायद उसे भी लगा हो  कि भला यह भी कोई वक़्त है आग बुझाने के लिए जाने का! कुछ ही पल बीते होंगे कि घटनास्थल से एक बार फिर बुलावा आया. आग काबू में नहीं आ रही थी और वहां और अधिक लोगों की सख़्त ज़रूरत थी. बुरासा को लगा जैसे उसके साथी उसे ही पुकार रहे हैं. एक बार फिर नई नवेली पत्नी से उसकी आंखें मिलीं, और इस बार जैसे पत्नी भी मना नहीं कर सकी. इशारों ही इशारों में उसने कहा, “जाओ. तुम्हारे साथी तुम्हें पुकार रहे हैं, जाओ!”

बिना एक भी पल गंवाए बुरासा ने अपनी चमकती कमीज़ उतार कर कामकाजी ड्रेस धारण की और उछल कर अपने आग बुझाने वाले वाहन  पर जा सवार हुआ. जब वह अपना वाहन उस भवन से बाहर निकाल रहा था, विवाह में शामिल होने आए तमाम मेहमान कतारबद्ध खड़े होकर अपनी शुभ कामनाओं के साथ उसे विदा कर रहे थे. क्रिस्टा सोच रही थी, इतनी फुर्ती तो मैंने कभी नहीं देखी बुरासा में! और जब वह वहां से चला गया, क्रिस्टा बोलां, जो अब तक क्रिस्टा बुरासा बन चुकी थी अनायास ही उन त्रासदियों को याद करने लगी जो हाल में उसके जीवन में घटित हुई थीं. एक भयानक अग्नि काण्ड में उसकी बहन का घर जल कर खाक हो गया था, और जैसे इतना ही काफ़ी न हो, उस आग ने उसके ग्यारह और नौ बरस के भतीजे भतीजियों को भी लील लिया था. यह कोई कम भयानक  हादसा न था. अपने पांच बरस के प्रणय काल में वह यह भी जान चुकी थी कि जेरेमी का काम कितनी जोखिम भरा  है. जेरेमी प्राय: उससे अपने कामकाज के बारे में बातें किया करता था. न जाने कितनी आशंकाएं उसे व्याकुल किये दे रही थीं. वह मन ही मन प्रार्थना कर रही थी कि उसका जेरेमी जल्दी से जल्दी और सुरक्षित लौट आए.

और उधर जेरेमी जब घटनास्थल पर पहुंचा तो उसने पाया कि पूरा घर आग की लपटों में घिरा हुआ है, हालांकि वहां रहने वालों को सुरक्षित बाहर निकाला जा चुका था. दो घण्टों की कड़ी मेहनत के बाद उस आग पर भी काबू पा लिया गया. और तब तुरंत ही उसके अधिकारी ने उसे कहा कि वो अपने विवाह स्थल पर लौट जाए. जैसे ही बहुत थक कर लेकिन संतुष्ट मन से वो  वापस अग्नि शमन केंद्र स्थित अपने विवाह स्थल पर पहुंचा, उसका इंतज़ार कर रहे मेहमानों ने खड़े होकर अभिवादन करते हुए उसका स्वागत किया. पहले वो समारोह का केंद्र बिंदु था, अब हीरो भी बन चुका था.

पार्टी नए जोश-ओ-खरोश के साथ फिर शुरु हो चुकी थी.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक स्तम्भ कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 02 अक्टोबर, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, September 25, 2018

लड़की, जब तक तुम पति नहीं जुटा लेती तुम्हारा जीवन व्यर्थ है!


सत्तर के दशक के उत्तरार्ध में, जब चीन तेज़ी से बढ़ती जनसंख्या की समस्या से त्रस्त था, तत्कालीन सरकार ने यह व्यवस्था लागू कर दी थी कि एक  युगल एक ही संतान को जन्म दे सकता है. व्यवस्था तो लागू हो गई, और समस्या पर काबू भी पा लिया गया,  लेकिन अब अध्येतागण यह पा रहे  हैं कि इस व्यवस्था के बाद जो संतानें पैदा हुईं वे ज्यादा निराशावादी हैं, जोखिम लेने से कतराती हैं और प्रतिस्पर्धा से बचना चाहती हैं. एक ही संतान को जन्म देने की सरकारी नीति के पालन का एक और असर यह हुआ कि बहुत सारे युगलों ने गर्भस्थ कन्या शिशु को कोख  में ही मार डाला  और अब विशेषज्ञों को आशंका है कि सन 2020 तक आते-आते कम से कम तीन करोड़ चीनी अपने लिए दुल्हन नहीं जुटा पाएंगे.

लेकिन कोढ़ में खाज यह कि संख्या में कम होने के बावज़ूद चीन में लड़कियों को शादी के लिए लड़के नहीं मिल रहे हैं.  असल में विवाह और पारिवारिक स्थितियों के मामले में चीन और भारत में अद्भुत साम्य है. वहां भी मां-बाप की पहली चिंता लड़की के हाथ पीलेकर देने की ही है और यह  काम वहां लगातार कठिन होता जा रहा है. कई बरसों से शंघाई में रह रही खासी पढ़ी लिखी और उम्दा नौकरी कर रही अट्ठाईस वर्षीया एक लड़की ड्रीम बताती है कि उसकी मां प्राय: इस बात पर दुखी होती हैं कि उसका कोई पुरुष मित्र क्यों नहीं है. अगर पुरुष मित्र होता तो मां को उसकी शादी की आस बंधती. उधर ड्रीम का कहना है कि चीनी मर्द अभी भी पत्नी के रूप में घर के काम काज में निपुणसेवा-भावी स्त्री की ही तलाश में रहते हैं. चीन में लड़की को एक ऐसी वस्तु के रूप में देखा जाता है जो चौबीस साल की होने के बाद अपना आकर्षण और महत्व खो देती है.  और इसके बाद  ड्रीम और उस जैसी लड़कियों को शेंग नुनाम से पुकारा जाता है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है बची-खुची स्त्रियां. 

लेकिन यह समय तो बाज़ार का है. वह हर जगह अपने लिए सम्भावनाएं खोज लेता है. प्रौढ़ावस्था की तरफ कदम बढ़ा रही स्त्रियों की मदद के लिए चीन में बहुत सारे व्यावसायिक प्रतिष्ठान खुल गए हैं जो उन्हें कैसे तलाश करें बॉय फ्रैण्डविषय पर ज्ञान देने का पुण्य कमाते हुए ख़ासी कमाई भी कर रहे हैं. ऐसे ही एक प्रतिष्ठान वायम क्लब के अध्यक्ष है श्री  एरिक जो पिछले दस बरसों से इस काम में लगे हैं. शुरुआत  तो उन्होंने पुरुषों की सेवा से की थी लेकिन अब ज़्यादा सम्भावनाएं स्त्रियों की सेवा में नज़र आईं तो अपना कार्य क्षेत्र बदलने में तनिक भी संकोच नहीं किया. एरिक के क्लब में पढ़ाई सस्ती नहीं है. वे एक माह की फीस कोई छह हज़ार युआन (एक युआन करीब ग्यारह रुपये के बराबर) लेते हैं. लेकिन उनके काम का तरीका बहुत व्यवस्थित है. मसलन वे अपने यहां आने वाली स्त्रियों को  यह सिखाने के लिए कि वे किस तरह योग्यपुरुष तक पहुंचें सैद्धांतिक ज्ञान देने के साथ-साथ व्यावहारिक प्रशिक्षण भी प्रदान करते हैं. इस के अंतर्गत प्रशिक्षणार्थियों को किसी लोकप्रिय शॉपिंग मॉल में जाकर खड़ा होना होता है. वहां इन्हें यह प्रदर्शित करते हुए कि जैसे उनके मोबाइल की बैटरी चुक गई है, किसी उपयुक्त प्रतीत होने वाले पुरुष के पास जाकर  यह अनुरोध करना होता है कि वह अपने मोबाइल से उनकी फोटो खींच दे. ज़ाहिर है कि फोटो खींचने के बाद  वह पुरुष उस स्त्री को फोटो भेजेगा भी. और इस तरह बिना मांगे ही उसका मोबाइल नम्बर स्त्री के पास आ जाएगा. फिर उनके बीच कुछ औपचारिक बातचीत होगी, और फिर आहिस्ता-आहिस्ता  उनके बीच की दूरियां नज़दीकियों में तब्दील होती जाएगी. 

ऐसी ही एक अन्य कम्पनी है डायमण्ड लव जो विशेष रूप से अमीर ग्राहकों की सेवा करती है. यह कम्पनी दस हज़ार से लगाकर दस लाख युआन तक का शुल्क लेकर उपयुक्त जीवन साथी तलाश कर देती है. यह कम्पनी अपने कार्यकर्ताओं को लव हण्टर्स के नाम से  पुकारती है. ग्राहक अपने जीवन साथी के लिए जो-जो गुण बताता है उनको ध्यान में रखकर ये लव हण्टर्स सम्भावित जीवन साथी छांटते है. इस कम्पनी को हमारे यहां की जोड़ी बनाने वाली कम्पनियों जैसा माना जा सकता है. इनके अलावा शंघाई के पीपुल्स पार्क में हर सप्ताहांत पर एक मैरिज़ मार्केट भी लगता है जहां अपनी संतानों का विवाह करवाने के इच्छुक मां-बाप इकट्ठे  होकर अपने बच्चों के बारे में सूचनाओं का आदान-प्रदान करते हैं. कहना अनावश्यक है कि यहां अपेक्षाकृत कम समृद्ध लोग आते हैं.

आर्थिक और औद्योगिक  क्षेत्र में चीन ने भले ही कितनी ही प्रगति कर ली हो, जहां तक स्त्रियों का सवाल है, खूब पढ़ाई लिखाई करके और अच्छी नौकरी पाकर भी वे सुखी कहलाने की अवस्था में नहीं आ सकी हैं.
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, दिनांक 25 सितम्बर, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Wednesday, September 19, 2018

इस जापानी इंजीनियर को अपने स्त्री होने पर गर्व है


अगर आप भी यह मानते हैं कि भारत उन देशों में प्रमुख है जहां अंध विश्वास का बोलबाला है और स्त्रियों के प्रति गहरा भेदभाव होता है तो आपको जापान की पचपन वर्षीया सिविल इंजीनियर रीको एबे के बारे में ज़रूर जानना चाहिए. रीको एबे ने हाल में अपनी संघर्ष गाथा उजागर की है. अस्सी के दशक में, जब वे इंजीनियरी की पढ़ाई कर रही थी, जापान में भी महिलाओं  के लिए बहुत अधिक विकल्प मौज़ूद नहीं थे. जब वे यामागुची यूनिवर्सिटी से इंजीनियरिंग में स्नातक होने के कगार पर थीं तब वहां की व्यवस्थानुसार उन्हें किसी प्रोफ़ेसर को अपना मेंटर चुनना था जो उन्हें नौकरी तलाश करने में भी सहायक होता. और तब रीको एबे को पहली दफ़ा अपने देश में विद्यमान स्त्री विषयक प्रतिगामी सोच का सामना करना पड़ा. अधिकांश प्रोफ़ेसरों ने उनका मेंटर बनने से ही मना कर दिया, क्योंकि वे जानते थे कि एक स्त्री को इंजीनियरी के क्षेत्र में नौकरी मिलना मुश्क़िल है. हां, अगर वो सिविल सर्वेण्ट बनना चाहती तो नौकरी मिल सकती थी. लेकिन रीको निर्माण के क्षेत्र में जाना चाहती थीं क्योंकि उनकी आकांक्षा  कुछ नया निर्माण करने की थी. आखिर एक प्रोफ़ेसर उनका मेंटर बनने को तैयार हुए. वे एक टनल विशेषज्ञ थे और इस तरह अनायास ही रीको भी टनल इंजीनियरी  के क्षेत्र में धकेल दी गई. अब पीछे मुड़कर देखती हुई रीको कहती हैं कि मेरे पास यह चुनने का मौका था ही नहीं कि मुझे पुल बनाने हैं या बांध. और जब वे नौकरी की तलाश में निकलीं तो एक-एक करके सारी कम्पनियों ने उन्हें बाहर का दरवाज़ा ही दिखाया. अब उनके पास आगे पढ़ाई करने के सिवा कोई विकल्प नहीं था. उन्होंने टनल इंजीनियरिंग में मास्टर्स की डिग्री हासिल कर ली. लेकिन यह करके भी उनके लिए नौकरी पाने का मार्ग सुगम नहीं हुआ. ज़्यादातर कम्पनियों ने उन्हें इण्टरव्यू के लिए बुलाने काबिल भी नहीं समझा.

लेकिन वे एकदम हताश हो जातीं इससे पहले एक कम्पनी ने उन्हें इण्टरव्यू के लिए बुला भेजा. इस बुलावे के मूल में यह तथ्य था कि रीको के प्रोफेसर ने अपने एक पूर्व छात्र से उनकी सिफारिश की थी, और संयोगवश वो पूर्व छात्र इस कम्पनी का अध्यक्ष था. यहां उन्हें नौकरी तो मिल गई, लेकिन नब्बे के दशक में जापान में टनल इंजीनियरी के क्षेत्र में  स्त्रियों की राह बहुत आसान नहीं थी. जापान में एक अंध विश्वास प्रचलित था और है जिसके अनुसार  स्त्रियों को निर्माण  स्थल से दूर ही रहना चाहिए. इस अंध विश्वास के मूल में यह बात है कि पहाड़ों की देवी एक ईर्ष्यालु औरत है और उसे यह बात पसंद नहीं है कि कोई अन्य औरत किसी टनल के निर्माणाधीन इलाके में प्रवेश करे. जापान में यह मान्यता थी और है कि अगर कोई औरत किसी  निर्माणाधीन टनल के भीतर प्रवेश करेगी तो अवश्य ही कोई दुर्घटना घटित हो जाएगी. उन दिनों को याद करती हुई रीको एबे कहती हैं कि मैंने भी इस मान्यता के बारे में सुना था, लेकिन यह नहीं सोचा था कि इसका सीधा असर मेरे ही कैरियर  पर पड़ जाएगा. जब वे नौकरी करने लगीं तो उन्हें टनल्स के भीतर नहीं जाने दिया जाता था. उनके सहकर्मी भी उनके वहां जाने का विरोध करते. और इस तरह वे एक ऐसी टनल इंजीनियर बन कर रह गईं जिन्हें खुद टनल्स के भीतर जाने की इजाज़त नहीं थी.

नौकरी तो ख़ैर वे करती रहीं लेकिन उनके मन में गहरा असंतोष भी पनपता रहा. वे कुछ अलग और सार्थक करना चाहती थीं लेकिन कर नहीं पा रही थीं. इसी छटपटाहट  के बीच उन्हें नॉर्वे में उच्च अध्ययन के लिए एक स्कॉलरशिप मिल गई. रीको एबे को लगा कि इस अध्ययन के बाद उनके लिए अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में काम के मौके बढ़ जाएंगे और वहां शायद उन्हें स्त्री-पुरुष के बीच भेदभाव का  शिकार भी नहीं होना पड़ेगा. और यही हुआ भी. नॉर्वे में की गई पढ़ाई के बाद वे जापान से बाहर निकल कर यूक्रेन, ताइवान, और इण्डोनेशिया में टनल प्रोजेक्ट्स में उत्साहपूर्वक  काम कर सकीं.

और अब ये रीको एबे हमारे अपने देश यानि भारत में एक जापानी कंसलटेंसी कम्पनी की मुखिया के रूप में कार्यरत हैं. रीको का सपना है कि वे भारत में बुलेट ट्रेन की परियोजना को क्रियान्वित करें. अपने तीन  दशकों के कार्यानुभव को वे अब नई पीढ़ी को उपहार में देना चाहती हैं. नई पीढ़ी को उनका एक ही संदेश है: अगर तुम दिल में ठान लो तो  कुछ भी नामुमकिन नहीं है. अपने अतीत पर एक नज़र डालते हुए वे कहती हैं कि मेरे जीवन में बहुत सारी रुकावटें आईं, लेकिन उन्हें पार कर ही मैं यहां तक पहुंच सकी हूं. मुझे इस बात का भी गर्व है कि मेरा जन्म एक स्त्री के रूप में हुआ. अगर ऐसा न हुआ होता तो मैं यहां तक पहुंच भी न सकी होती.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 18 सितम्बर, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, September 4, 2018

फ़िनलैण्ड में हैं दुनिया के सबसे ज़्यादा खुशहाल लोग!


संयुक्त राष्ट्र संघ का सस्टेनेबल डेवलपमेण्ट सोल्यूशंस नेटवर्क पिछले कुछ बरसों से हर साल विश्व खुशहाली रिपोर्ट ज़ारी करता है. इस बरस की रिपोर्ट में कई चमत्कारी उठाव-गिराव हुए हैं, मसलन अमरीका अपनी फिसलन बरक़रार रखते हुए पांच सीढ़ियां और नीचे उतरकर अठारहवें स्थान पर जा टिका है और फ़िनलैण्ड पांच सीढ़ियां  छलांग कर पहली पायदान पर जा पहुंचा है. बहुत स्वाभाविक है कि हम यह जानना चाहें कि हम और हमारे पड़ोसी देश इस सूची में कहां हैं. तो जान लीजिए कि 156 देशों की सूची में भारत 133 वें स्थान पर है. हमारे पड़ोसी देश श्रीलंका 116, बांग्ला देश 115, भूटान 97 और पाकिस्तान 75 वें स्थान पर हैं.

कनाडा की ब्रिटिश कोलम्बिया यूनिवर्सिटी  के प्रोफ़ेसर और इस विश्व खुशहाली रिपोर्ट के सह-सम्पादक जॉन हैलीवेल का कहना है कि खुशहाली की इस रिपोर्ट के माध्यम से पूरी दुनिया में रहन-सहन के स्तर को नापा जाता है. उनका कहना है कि जीवन स्तर को बेहतर बनाने में किसी देश की जीडीपी और प्रति व्यक्ति आय के साथ-साथ वहां के निवासियों की सेहत और लम्बी उम्र का भी महत्व होता है. लेकिन इनके साथ-साथ लोगों का एक दूसरे से जुड़ाव, आपसी सहायता करने और सहारा देने का भाव और अपने फ़ैसले खुद करने की आज़ादी का होना भी बहुत अहमियत रखता है. कहना अनावश्यक है कि फ़िनलैण्ड के लोगों में ये बातें सबसे ज़्यादा पाई गईं. यहीं एक मज़ेदार बात भी याद कर लें कि रीडर्स डाइजेस्ट वालों ने एक टेस्ट किया और पाया कि सबसे ज़्यादा बटुए हेलसिंकी में ही उनके मालिकों को लौटाए गए. वैसे पूरे ही फ़िनलैण्ड के बारे में यह बात सर्व विदित है कि वहां अगर कोई पैसों से भरा बटुआ कहीं भूल जाए तो उसे कोई हाथ भी नहीं लगाता है और एक-दो दिन बाद भी वो बटुआ वहीं पड़ा मिल जाता है. इसी प्रसंग से यह बात भी याद आती है कि मिन्ना तरवामाकी नामक एक बैले नर्तकी किसी पार्क में गई, कुछ समय वहां रुकी और फिर उठ कर चली गई. रास्ते में उसे याद आया कि वो अपना पर्स तो पार्क की बेंच पर ही भूल आई है. लेकिन इस बात से वो तनिक भी विचलित या परेशान नहीं हुई, क्योंकि उसे इस बात  का पक्का भरोसा था कि बटुआ वहीं पड़ा रहेगा, कोई उसे छुएगा भी नहीं.  यहीं आपको यह बात भी बताता चलूं कि सकारात्मक बातों को बढ़ावा देने वाली एक कम्पनी पॉज़िटिवॉरिट ओए ने पिछले बरस इसी बैले नर्तकी मिन्ना तरवामाकी को फ़िनलैण्ड की सबसे खुशहाल हस्ती के रूप में नामांकित किया था.

लेकिन बहुत मज़े की बात यह है कि जिस फ़िनलैण्ड को इस विश्व खुशहाली रिपोर्ट में पहले स्थान पर देखकर हमें रश्क़  हो रहा है, खुद उसी देश के नागरिक इस रिपोर्ट से सहमत नहीं हैं! और इन असहमतों में यह मिन्ना तरवामाकी भी शामिल है. इन असहमतों का कहना है कि यह रिपोर्ट  फ़िनलैण्ड के लोगों की असली खुशी को अभिव्यक्त नहीं कर पा रही है. हैप्पीनेस रिसर्च इंस्टीट्यूट के सीईओ माइक वाइकिंग का कहना है कि फ़िनलैण्ड के लोगों को इस सर्वे रिपोर्ट पर हैरानी शायद इसलिए भी हुई क्योंकि वे समझ नहीं पाए कि सर्वे के माध्यम से किस चीज़ को नापा जा रहा है. इनका यह भी कहना है कि फ़िनलैण्ड के लोग  भावनात्मक रूप से अंतर्मुखी होते हैं. वे कभी भी खुलकर अपनी खुशी या नाराज़गी प्रकट नहीं करते हैं. फ़िनलैण्ड के लोग अपनी भावनाओं को दबाए रखना अच्छी तरह से जानते हैं. इसे वे सिसू कहते हैं, जिसका अर्थ होता है ताकत, वैराग्य और लचीलापन. ये लोग भावनाओं को दबाए रखने में ही अपनी ताकत की कामयाबी मानते हैं.

एक और बात जो ध्यान देने योग्य है वह यह है कि फ़िनलैण्ड की सरकार बहुत संवेदनशील और अपने नागरिकों के प्रति स्नेहिल है. यहां मानवाधिकारों का बहुत ध्यान रखा जाता है और लैंगिक समानता, रोज़गार  और पर्यावरण सम्बंधी फैसले करते वक़्त बहुत छोटी-छोटी बातों पर भी ध्यान दिया जाता है. बहुत स्वाभाविक है कि जनता के प्रति सरकार की यह सजग संवेदनशीलता खुशियों में वृद्धि करती है. फ़िनलैण्ड की गिनती दुनिया के सबसे कम भ्रष्ट और सामाजिक रूप से सर्वाधिक प्रगतिशील देशों में होती है. यहां की पुलिस को बेहद विश्वसनीय और बैंकों को सबसे ज़्यादा भरोसेमंद माना जाता है. एक अचरज भरी बात यह है कि इन नॉर्डिक देशों में नागरिक सारी दुनिया में सबसे ज़्यादा कर चुकाते हैं लेकिन उन्हें इसकी कोई शिकायत नहीं है. वे मानते हैं कि उच्च गुणवत्ता वाले जीवन के लिए यह ज़रूरी है. उन्हें निशुल्क स्वास्थ्य सेवाएं और विश्वविद्यालय स्तर की शिक्षा सुलभ है. इन्हीं सब वजहों से यह स्थिति बनी है कि  जितने खुशहाल फ़िनलैण्ड के मूल निवासी हैं उतने ही खुशहाल वे लोग भी हैं जो बाहर से आकर यहां बसे हैं!
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक स्तम्भ कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, दिनांक 04 सितम्बर, 2018  को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, August 28, 2018

वे समय की ग़ुलामी से पूरी तरह आज़ाद हैं !


एक बार फिर बड़ी शिद्दत से इस बात का एहसास हुआ कि दुनिया के बारे में अपनी जानकारी कितनी कम है! मैं अब तक इस बात पर गर्व करता था कि हम भारतीय ही हैं जो घड़ी की सुइयों के ग़ुलाम नहीं हैं और समय पर पहुंच जाने जैसी ग़ंदी आदत से कोसों दूर हैं. लेकिन जब यह जाना कि दुनिया में कम से कम एक देश तो ऐसा है जो इस मामले में हमें चुनौती दे सकता है,  तो इस बात का अफ़सोस ज़रूर हुआ कि हाय! यह सम्मान  भी हमारे हाथों से फिसल गया. दक्षिण ब्राज़ील की टेक्नोलॉजिकल फ़ेडरल यूनिवर्सिटी  की एक शिक्षिका डॉ. ज़ैक्लीन बोन डोनाडा का कहना है कि किसी भी पार्टी में समय पर पहुंच जाना पूरे ब्राज़ील में बुरा माना जाता है. बकौल ज़ैक्लीन, ब्राज़ील की राजधानी रियो डे जेनेरियो में तो ख़ास तौर पर इसे सामाजिक परम्परा के विरुद्ध माना जाता है. वहां जल्दी या समय पर पहुंचना ठीक वैसी ही बात है जैसे आप किसी पार्टी में बग़ैर बुलाये पहुंच गए हों!

असल में ब्राज़ील में समय के साथ लोगों का रिश्ता बहुत दोस्ताना और सहज है. अगर आप वहां अपने इर्द-गिर्द नज़र दौड़ाएं तो पाएंगे लोग आहिस्ता आहिस्ता चल रहे हैं, चलने का पूरा आनंद उठा रहे हैं और उन्हें कहीं भी पहुंच जाने की जल्दी नहीं है. सामाजिक आयोजनों के मामले में तो समय को लेकर उनकी उदारता विलक्षण है. वहां समय के बंटवारे को लेकर सवा (पन्द्रह मिनिट का टुकड़ा) की तो कोई परिकल्पना ही नहीं है. किसी के घर बताए गए समय के आधा घण्टा बाद पहुंचना बहुत सामान्य बात है और इसका ज़रा भी बुरा नहीं माना जाता है. वहां लोगों को सलाह भी यही दी जाती है कि आधे घण्टे की देरी या आधे घण्टे का इंतज़ार कई तरह से लाभप्रद है. इस दौरान आप ज़्यादा पानी पी सकते हैं, एक कप कॉफी का आनंद ले सकते हैं, रेस्टरूम जा सकते हैं, कोई किताब पढ़ सकते हैं, ध्यान लगा सकते हैं, या फिर यूं ही वक्त बिता सकते हैं. सलाह यही दी जाती है कि इतनी देरी को दिल पर न लिया जाए. इसी के साथ यह भी सलाह दी जाती है कि एक के बाद फौरन दूसरी मीटिंग न रखी जाए. यानि दो कार्यक्रमों के बीच पर्याप्त दूरी रखी जाए.

ब्रिटेन की मूल निवासिनी लेकिन अब ब्राज़ील में रह रहीं  फ़ियोना रॉय ने ब्राज़ील का अपना एक संस्मरण साझा करते हुए बताया कि एक बार उन्हें कुछ दोस्तों ने एक पार्टी में बुलाया. तब तक उन्हें ब्राज़ील में रहते हुए तीन माह बीत चुके थे. अपनी ब्रिटिश आदत के मुताबिक वे ठीक समय पर मेज़बान के घर जा पहुंची. उसने हड़बड़ाते हुए दरवाज़ा खोला तो फ़ियोना ने पाया कि वो बाथरोब में ही थी, यानि नहा रही थी. मेज़बान ने उसे कमरे में बिठाया, पहले खुद आराम से तैयार हुई और फिर पार्टी की तैयारी की. इस सबमें करीब दो घण्टे बीत गए. अपने इस अनुभव से फ़ियोना ने ब्राज़ील की ज़िंदगी का एक अनलिखा नियम कण्ठस्थ कर लिया. नियम यह कि आपका मेज़बान पार्टी के घोषित समय का इंतज़ार करेगा, और जब वो समय बीत जाएगा तो  नहाने जाएगा. बाद में तो फ़ियोना ने भी ब्राज़ील के इस तौर तरीके को अपना लिया और वे खुद अपनी दी हुई पार्टियों में भी देर से पहुंचने लगीं. तब उनके दोस्त कहने लगे कि यह तो विरूओ ब्रासीलिएरायानि पक्की ब्राज़ीलियन बन गई है!

ब्राज़ील लैटिन अमरीका का इकलौता ऐसा देश है जहां पुर्तगाली भाषा बोली जाती है, और यह जानना खासा दिलचस्प  होगा कि इस भाषा में देरी होने की तो अनेक अभिव्यक्तियां हैं लेकिन ठीक समय के लिए कोई अभिव्यक्ति नहीं है. ब्राज़ील में अगर कोई कहीं समय पर पहुंच  जाए तो उसे होरा इंगलिसियायानि अंग्रेज़ों की तरह वक़्त का पाबंद कहा जाता है. यह कुछ कुछ वैसा ही जैसे भारत में ठीक समय के लिए इंगलिश टाइम कहा जाता है. जो लोग ब्राज़ील की जीवन पद्धति से अनजान हैं उन्हें यह समझाया जाता है कि अगर कोई आपसे फ़ोन पर भी यह कहे कि मैं जल्दी ही पहुंच रहा हूं तो आप उसकी बातों में न आएं. हो सकता है उस वक़्त वो अपने घर में बैठा नहाने का इरादा कर रहा हो. ऊपर हमने जिन डॉ ज़ैक्लीन का ज़िक्र किया उन्होंने लिखा है कि उनका बॉस कई बार यह कहता था कि वो ट्रैफ़िक में फंस गया है और जल्दी ही पहुंच रहा है, लेकिन तब पीछे से आ रही आवाज़ें उसके घर में होने की चुगली कर रही होती थीं. और इसीलिए जाने-माने लेखक पीटर फ्लेमिंग ने 1933 में ही अपनी किताब में लिख दिया था कि अगर कोई जल्दबाज़ है तो ब्राज़ील में दुखी हो जाएगा. बकौल पीटर, “ब्राज़ील में देर होना एक वातावरण है. आप उसी में रहते हैं, उससे पीछा नहीं छुड़ा सकते.”

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 28 अगस्त, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 


Tuesday, August 7, 2018

भूलना दिमाग़ की सफाई का ही एक रूप


हममें से ज़्यादातर लोग याददाश्त को अक्ल या बुद्धि का पर्याय मान बैठते  हैं और जिन्हें बहुत  सारी छोटी-मोटी बातें याद होती हैं उन्हें देख कर खुद के भुलक्कड़पन पर शर्मिंदा होते हैं. टेलीविज़न  पर आने वाले बहुत सारे स्मृति आधारित प्रतियोगी कार्यक्रमों में जब कोई प्रतिभागी फटाफट जवाब देता है तो हमें लगता है कि काश! हमारी याददाश्त भी ऐसी ही होती! माहौल कुछ ऐसा बन गया है कि जिसे जितनी ज़्यादा चीज़ें याद है उसे उतना ही बेहतर माना जाता है. लेकिन इधर हाल में हुई कुछ वैज्ञानिक शोधों ने इस माहौल को चुनौती दे डाली है. टोरण्टो विश्वविद्यालय के दो शोधकर्ताओं पॉल फ्रैंकलैण्ड और ब्लैक रिचर्ड्स ने हाल में प्रकाशित अपने एक शोध पत्र में यह कहकर सबको चौंका दिया है कि हमारा दिमाग़ बातों को भुलाने के लिए भी सतत सक्रिय रहता है. उनका कहना है कि हमारी स्मृति व्यवस्था के लिए जितना महत्व चीज़ों को याद रखने का है उतना ही महत्व उन्हें भुला देने का भी है. इन शोधकर्ताओं के अनुसार,  हमारे दिमाग में एक छोटा-सा तंत्र होता है जिसे हिप्पोकैम्पस कहा जाता है. इसी में तमाम चीज़ें संग्रहित होती रहती हैं. लेकिन यह तंत्र अपने आप सफाई करते हुए ग़ैर ज़रूरी चीज़ों को मिटा कर नई चीज़ों के लिए जगह बनाता रहता है. रिचर्ड्स इस प्रक्रिया को इस कारण भी महत्वपूर्ण मानते हैं कि ग़ैर ज़रूरी चीज़ों की सफाई से हमें सही निर्णय करने में अधिक आसानी हो जाती है.

इन शोधकर्ताओं के अनुसार जैविक दृष्टिकोण से इस बात को यों समझा जा सकता है कि आदि मानव को अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए बहुत सारी चीज़ों को याद रखना होता था लेकिन जैसे-जैसे तकनीक का विकास होता गया, हमें उनमें से बहुत सारी बातों को याद रखने की कोई ज़रूरत ही नहीं रही. तकनीक ने उन चीज़ों को याद रखने का ज़िम्मा अपने ऊपर ले लिया. हाल के जीवन से एक उदाहरण से भी यह बात पुष्ट होती है. आज से पंद्रह  बीस बरस पहले हमें  अपने नज़दीकी लोगों  के फोन नम्बर मुंह ज़बानी याद रहा  करते  थे लेकिन अब हमारा यह काम स्मार्ट फोन करने लगे हैं और हालत यह हो गई है कि हमें खुद अपने फोन नम्बर भी याद नहीं होते हैं. लेकिन आज हम ऐसी बहुत सारी बातें याद रखने लगे हैं जिन्हें याद रखने की अतीत में कोई ज़रूरत नहीं होती थी. इस तरह पुरानी स्मृतियों ने विलुप्त होकर नई बातों के लिए जगह बना दी है. आज हम बजाय साढ़े तीन, सत्रह और उन्नीस का पहाड़ा याद रखने के यह याद रखने पर ज़्यादा ज़ोर देते हैं कि कैलक्युलेटर को कैसे इस्तेमाल किया जाए! बहुत सारी ग़ैर ज़रूरी सूचनाओं को अपने दिमाग़ में ठूंसे रखने की बजाय हम यह याद रखना ज़्यादा उपयोगी समझते हैं कि कोई भी जानकारी पाने के लिए गूगल का इस्तेमाल कैसे किया जाए!

इन शोधकर्ताओं पॉल फ्रैंकलैण्ड और ब्लैक रिचर्ड्स ने अपने शोध पत्र में यह भी समझाया है कि हमारी स्मृति की सार्थकता इस बात में नहीं है कि वह तमाम ज़रूरी-ग़ैर ज़रूरी सूचनाओं का भण्डारण करती जाए. उसकी सार्थकता तो इस बात में है कि कैसे वह उपलब्ध ज़रूरी सूचनाओं का इस्तेमाल कर सही निर्णय करे. यानि महत्व इस बात का है कि  हमारा दिमाग़ अप्रासंगिक ब्यौरों को भुलाता चले और केवल उन बातों पर केंद्रित रहे जो वास्तविक जीवन में हमें सही फैसले लेने में मददगार साबित हों. आप किसी से मिलें और बात करें तो यह क़तई ज़रूरी नहीं है कि उस व्यक्ति के बारे में हर बारीक से बारीक बात आपको याद हो और उस बातचीत को आप शब्दश: दुहरा सकें. महत्व इस बात का है कि इस बातचीत के ज़रूरी बिंदु आपको याद रह जाएं. सुखद बात यह है कि हमारे लिए यह सारा काम हमारा  दिमाग़ अपने आप करता चलता है.

हमें यह बात समझ में आ जानी चाहिए कि चीज़ों को याद रखना जितना महत्वपूर्ण है उससे कम उन्हें भुला देना नहीं है. अनावश्यक सूचनाओं की भीड़ को अपने दिमाग़ से हटाकर ही हम उसे बेहतर तरीके से काम करने के लिए तैयार कर  सकते हैं.  लेकिन हां, अगर कोई ज़रूरी बातों को भी भूल जाया करता है, तो हो सकता है कि वह किसी विकार अथवा रोग से ग्रस्त हो. और तब उसे ज़रूरी विशेषज्ञ सहायता लेने से नहीं चूकना चाहिए. लेकिन सामान्यत: इन तीन बातों को ज़रूर याद रखा जाना चाहिए. एक: अच्छी  स्मृति हमेशा उच्च बुद्धिमत्ता की पर्याय नहीं होती है. दो: हमारे दिमाग़ की संरचना ही ऐसी है कि वह कुछ चीज़ों को भुलाता और कुछ को याद रखता है, और तीन: भूलना भी बुद्धिमत्ता का एक ज़रूरी हिस्सा है.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 07 अगस्त, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, July 31, 2018

उस अकेले रह रहे आदमी को बचाया जाना बहुत ज़रूरी है!


पिछले दिनों ब्राज़ील की सरकारी एजेंसी फुनाई ने एक जनजाति के अधेड़ लगने वाले व्यक्ति का दुर्लभ वीडियो ज़ारी किया है जिसके बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं है. माना जाता है कि यह शख़्स अमेज़न के जंगलों में 22 बरस से रह रहा है और कदाचित यह अपनी जनजाति का आखिरी जीवित इंसान है. यह आदमी अनेक शोध रिपोर्ट्स और अमरीकी पत्रकार मोण्टे रील की किताब द लास्ट ऑफ द ट्राइब: द एपिक क्वेस्ट टू सेव अ लोन मेन इन द अमेज़नके कारण चर्चा में रह चुका है. पेड़ों की पत्तियों के बीच से लिये गए इस वीडियो में यह मांसल आदमी कुल्हाड़ी से पेड़ काट रहा है और इसमें पक्षियों की आवाज़ें भी सुनाई दे रही हैं. माना जा रहा है कि यह वीडियो सन 2011 का है, हालांकि इस व्यक्ति पर नज़र रखने वाले दल के एक सदस्य का दावा है कि आखिरी बार इसके ज़िंदा होने के प्रमाण मई, 2018 में मिले थे.

इस वीडियो के साथ एक प्रेस नोट भी ज़ारी किया गया है जिसमें बताया गया है कि इस शख़्स की सिर्फ एक धुंधली-सी तस्वीर उपलब्ध है जो 1998 में ब्राज़ील की एक डॉक्यूमेण्ट्री  कोरुम्बियारा के निर्माता ने ली थी. इस व्यक्ति की निगरानी करने वाले दल के समन्वयक आल्टेयर अल्गायर का कहना है कि उनका फाउण्डेशन यह वीडियो ज़ारी नहीं करना चाहता था क्योंकि उस शख़्स से इसको ज़ारी करने की अनुमति नहीं ली जा सकी है. वैसे भी उनके संगठन की नीति यह है कि वह अकेले रह रहे मूल निवासियों से सम्पर्क करने से बचती है क्योंकि अतीत में उस आदमी ने सम्पर्क करने की कोशिश  करने वालों पर तीर चलाकर यह स्पष्ट संदेश दे दिया था कि वह बाहरी लोगों से नहीं  मिलना चाहता है.  लेकिन उन्होंने यह कहते हुए इसे ज़ारी करने के अपने निर्णय को उचित ठहराया कि ऐसी तस्वीरों से उन लोगों के दर्द की  तरफ दुनिया का ध्यान आकर्षित करने में मदद मिलती है जो बाहरी दुनिया से अपनी दूरी बनाए रखने के लिए निरंतर संघर्षरत हैं. यहीं यह बात भी जानने योग्य है कि फुनाई की टीम सन 1996 से ही इस आदमी की निगरानी कर रही  है. अब भी फुनाई की टीम दूर रहकर ही इसकी निगरानी करती है. उसने कम से कम 57 यात्राएं  और चालीस बार उसे बचाने के प्रयत्न  किये हैं. फुनाई की टीम हर दूसरे माह एक यात्रा कर इस बात की पुष्टि करती है कि वह व्यक्ति जीवित है. लेकिन फुनाई ने अब यह महसूस किया है कि ब्राज़ील के उत्तर पश्चिमी राज्य रोण्डोनिया के जिस इलाके में यह आदमी रहता है उसे प्रतिबंधित क्षेत्र बनाए रखने के लिए यह ज़रूरी हो गया था कि एक वीडियो ज़ारी कर पूरी दुनिया को बताया जाए कि वह आदमी अभी भी जीवित है. आदिवासियों के अधिकारों के लिए काम करने वाले एक संगठन सर्वाइवल इण्टरनेशनल की रिसर्च और एडवोकेसी निदेशक फ़ियोना वाट्सन का कहना है कि इस वीडियो को एक राजनीतिक कारण से भी ज़ारी करना पड़ा है. उन्हें लगता है कि ब्राज़ील की सरकार में कृषि व्यवसाय करने वालों का प्रभुत्व है और उनके दबाव में न केवल फुनाई का बजट कम कर दिया गया है, वहां के मूल निवासियों के अधिकारों पर भी कुठाराघात किये जा रहे हैं.  रोण्डोनिया का यह इलाका लगभग चार हज़ार हेक्टेयर में फैला हुआ है और खेतों आदि से घिरा हुआ है.

वैसे तो सारी ही दुनिया में आदिवासियों को उनकी ज़मीन से बेदखल करने का क्रूर खेल ज़ारी है लेकिन ब्राज़ील में सत्तर और अस्सी के दशक में इस रोण्डोनिया  इलाके में सड़क बनाने के सिलसिले में इस जनजाति के अधिकांश लोगों को तबाह कर दिया गया. किसान और अवैध लकड़ी काटने वालों  की बुरी नज़र आज भी उनकी ज़मीन पर है. पिछले ही बरस वहां ज़मीन के लिए हुए संघर्षों में कम से कम 71 जानें जा चुकी हैं.  लेकिन इस सबके बावज़ूद सर्वाइवल इण्टरनेशनल के अनुसार, ब्राज़ील के अमेज़न रेन फोरेस्ट में दुनिया के किसी भी दूसरे  इलाके की तुलना में ऐसे आदिवासी अधिक रहते हैं जिनसे अब तक सम्पर्क नहीं किया जा सका है. इन जनजातियों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बहुत कम होती है इसलिए भी इन्हें बाहरी दुनिया के  लोगों से बचाए रखना बहुत ज़रूरी है. इस व्यक्ति के बारे में फुनाई के प्रादेशिक संयोजक अल्टेयर अल्गायर का यह कथन बहुत महत्वपूर्ण है कि “यह व्यक्ति जिसे हम जानते तक नहीं हैं, अपने निकटस्थ  लोगों और अपनी सांस्कृतिक जीवन शैली सहित सब कुछ गंवा चुकने के बाद भी जंगल में अकेला रह कर यह साबित कर रहा है कि मुख्यधारा के समाज से जुड़े बग़ैर भी ज़िंदा रहा जा सकता है. मुझे तो लगता है कि अगर उसने बाहरी समाज से कोई सम्पर्क बनाया होता तो तब वो जैसा होता, उससे आज कहीं ज़्यादा बेहतर है.”

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ  इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 31 जुलाई, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, July 24, 2018

आभासी दुनिया से बाहर निकल कर ज़िंदगी बिताएं!


हम एक ऐसे विचित्र समय में जी रहे हैं जब सोशल मीडिया  पर तो सैंकड़ों, और किसी-किसी के तो हज़ारों दोस्त होते हैं लेकिन असल ज़िंदगी  में वे निहायत अकेले होते हैं, उनके घर के ठीक बगल में रहने वाले से भी उनकी कोई दुआ-सलाम नहीं होती है. इस बात को लेकर अनेक लतीफे भी प्रचलन में आ चुके हैं. लेकिन इधर विशेषज्ञों का ध्यान भी इस विडम्बना की तरफ गया है और उनके अध्ययनों के परिणामों को देखने पर हम पाते हैं कि अपनी असल ज़िंदगी में भी सक्रिय लोगों की स्थिति उनसे बेहतर है जो मात्र आभासी दुनिया के रिश्तों से संतुष्ट हैं. द टाइम्सकी पुरस्कृत उपभोक्ता स्वास्थ्य साइट वेलकी संस्थापक सम्पादक तारा पार्कर पोप ने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया है कि जब वे टाइम्स जर्नीज़ की ओर से प्रायोजित एक वेलनेस क्रूज़ से लौटीं तो न केवल बेहतर महसूस कर रही थीं, उनका यह इरादा भी और मज़बूत हुआ था कि अब उन्हें खुश मिजाज़ लोगों की सोहबत में और अधिक समय बिताना है. इस क्रूज़ में सत्रह से अस्सी बरस की आयु समूह के लोग शामिल थे. इसी क्रूज़ में उनकी दोस्ती एक ऐसी पचास वर्षीय महिला से हुई जो खुद फेफड़ों के कैंसर से उबरी थीं और इस महिला ने तारा पार्कर को एक ख़ास लेकिन मुश्क़िल व्यायाम करने के लिए प्रोत्साहित किया. इसी क्रूज़ में उन्हें एक और स्त्री मिली जिसने अपने अनुभव साझा करते हुए उन्हें बताया कि किस तरह उनके सकारात्मक दोस्तों ने उन्हें बहुत कम समय में एक के बाद एक – दो पतियों के बिछोह को सहने की ताकत दी. इसी स्त्री ने उन्हें यह अनमोल मंत्र भी दिया कि “नकारात्मक लोगों पर नष्ट करने के लिए यह जीवन बहुत छोटा है. मैं तो अपने इर्द गिर्द  ऐसे लोग चाहती हूं जो मेरी परवाह करे, मेरी सराहना करें और जो ज़िंदगी को आधे भरे  हुए गिलास वाले नज़रिये से देखें, न कि आधे खाली वाले नज़रिये से.”   

तारा पार्कर जिन नतीज़ों पर पहुंची उन्हीं को नेशनल ज्योग्राफिक के फैलो और लेखक डैन बट्टनर ने अपने अध्ययन से भी पुष्ट किया है. डैन ने सारी दुनिया के उन तथाकथित  ब्लू जोन्स में रहने वाले लोगों की स्वास्थ्य आदतों का अध्ययन किया है जिनके बारे में यह मान्यता प्रचलित है कि वहां रहने वालों की औसत उम्र अन्यों से कहीं अधिक होती है. डैन ने यह पाया कि इन जोन्स में रहने वालों में एक बात साझी है और वह यह कि ये सब सकारात्मक मैत्री में विश्वास करते हैं. डैन ने बताया कि उन्होंने जापान की एक जगह ओकिनावा का अध्ययन करते हुए यह पाया कि वहां की औरतों की औसत उम्र नब्बे के आसपास है और यह दुनिया में सर्वाधिक है. जब उन्होंने इसकी वजह की पड़ताल की तो उन्हें पता लगा कि वहां के लोग एक सामाजिक तंत्र बना लेते हैं जिसमें पांच नज़दीकी दोस्त होते हैं. ये दोस्त आजीवन एक दूसरे को सामाजिक, व्यवस्थागत, भावनात्मक और अगर ज़रूरत हो तो आर्थिक भी, सम्बल प्रदान करते हैं. इस तंत्र को मोआई कहा जाता है. डैन ने बताया कि वहां जैसे ही किसी शिशु का जन्म होता है, उसके मां-बाप उसे किसी मोआई का सदस्य बना देते हैं और फिर आजीवन इस सम्बंध का निर्वाह किया जाता है. जैसे-जैसे उस सदस्य का  परिवार बनता जाता है पूरा का पूरा परिवार उस मोआई से जुड़ता चला जाता है.

अपने इस अध्ययन से डैन बट्टनर इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने इसे अपने देश अर्थात अमरीका में भी चलन में लाने का इरादा किया और अब वे अमरीका के पूर्व सर्जन जनरल विवेक मूर्ति के साथ मिलकर वहां के लगभग दो दर्जन शहरों में मोआई स्थापित करने में जुटे हुए हैं. हाल में उन्होंने टैक्सास  के एक शहर में वहां के कई नागरिकों को लेकर एक चलते फिरते मोआई की स्थापना भी की है जिसमें लोग नियमित रूप से मिलकर साथ में चहल कदमी करते हैं. डैन का कहना है कि किसी कामयाब मोआई की शुरुआत के लिए यह ज़रूरी है कि उसके लिए ऐसे लोगों का चयन किया जाए जिनकी रुचियां और मूल्य बोध एक जैसे हों. डैन ज़ोर देकर यह बात कहते हैं कि अगर आप अपनी आयु के कुछ साल बढ़ाना चाहते हैं तो पहला और सबसे ज़रूरी काम यही करें कि अपने इर्द गिर्द एक सामाजिक तंत्र निर्मित करें. वे सलाह देते हैं कि दूर की आभासी दुनिया में सैंकड़ों दोस्त बनाने से कहीं बेहतर है अपनी असल ज़िंदगी में महज़ पांच ही दोस्त बना लेना. ये दोस्त ऐसे हों जिनसे आप सार्थक संवाद कर सकें. ज़रूरत के समय जिन्हें इस भरोसे के साथ पुकार सकें कि वे दौड़े चले आएंगे और आपकी मदद करेंगे. डैन कहते हैं कि आपके इस तरह के दोस्त किसी भी औषधि या बुढ़ापा रोकने वाली दवा से कहीं ज़्यादा कारगर साबित होंगे.
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 24 जुलाई, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.