Tuesday, May 26, 2015

क्या ज़रूरत है खेलों में स्त्री देह की

बहुत मुमकिन है कि आपने भी मेरा यह आलेख पढ़ने से पहले ग्रिड गर्ल्स का नाम न सुना हो! यह खबर पढ़ने से पहले कि दुनिया भर की स्पोर्ट्स कारों की श्रंखला एफआईए वर्ल्ड एण्ड्यूरेंस चैम्पियनशिप, जिसे संक्षेप में डब्ल्यूईसी नाम से जाना जाता है, ने यह घोषणा की है कि वह अपनी रेसों के दौरान ग्रिड गर्ल्स को इस्तेमाल नहीं करेगी, मैं भी इनके बारे में कुछ नहीं जानता था. लेकिन अब आपको बता सकता हूं कि रोमांचक कार रेसों की दुनिया में ग्रिड गर्ल्स वे खूबसूरत बालाएं होती हैं जो रेस शुरु होने से पहले अत्यल्प और बदन से चिपके वस्त्रों में रेसिंग कारों के साथ खड़ी नज़र आती हैं. आम तौर पर इनके हाथों में कार के स्थान के नम्बर का प्ले कार्ड भी होता है. चाहें तो मान सकते हैं कि कार रेसिंग में इनका वही स्थान है जो आईपीएल जैसी क्रिकेट श्रंखलाओं  में चीयर लीडर्स का होता है.

डब्ल्यूईसी की इस घोषणा को दुनिया भर में प्रचलित स्त्रियों को एक सेक्स ऑब्जेक्ट के रूप में देखने और प्रयोग करने की अनुचित प्रवृत्ति से मुक्ति के एक कदम के रूप में देखा जा रहा है. हम पाते हैं कि दुनिया भर में ऐसे तमाम उत्पादों को बेचने के लिए भी स्त्री देह का प्रयोग किया जाता है जिनसे स्त्री का दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं होता है. हमारा अपना देश भी इसका अपवाद नहीं है. ऐसे में अगर मोटर स्पोर्ट्स को और क्रिकेट जैसे खेल को बेचने के लिए स्त्री देह का प्रयोग किया जाता है तो इस पर कोई ताज्जुब नहीं होना चाहिए. बेचने वाले का तो पूरा ध्यान मुनाफे पर ही होता है. अगर ऐसा न होता तो दुनिया भर में बहुत सारे नुकसानदेह पदार्थों के कारोबार भी इस कदर फलते-फूलते नहीं. लेकिन हम तो अपनी मूल बात पर लौटते हैं.

डब्ल्यूईसी के इस फैसले का जिन महत्वपूर्ण लोगों ने स्वागत किया है उनमें से एक हैं 22 साल की केटी मेक जो अमरीका के फ्लोरिडा राज्य  में रहती हैं. केटी का मानना है कि बिना बात किए  आप किसी सोच में बदलाव नहीं ला सकते या फिर बुरे हालात को बदल नहीं सकते. केटी ने अपने इसी सोच के तहत डब्ल्यूईसी के इस फैसले का अपने ट्वीट्स के माध्यम से पुरज़ोर समर्थन किया है और उन्हें भी खूब समर्थन  मिला है, उनके ट्वीट्स को खूब दुहराया गया है. 2013 में केटी को जब थायरॉयड  कैंसर हुआ तो उनका इलाज जिस डॉक्टर ने किया वो खुद भी स्पोर्ट्स कार की ड्रावर रह चुकी और ग्रैण्ड एम सिरीज़ की रेस में हिस्सा ले चुकी थीं. इस डॉक्टर से केटी की मुलाकात भी एक रेसिंग प्रतियोगिता के दौरान ही हुई थी. केटी का विचार है कि रेस एक उम्दा खेल है लेकिन इसे और विकसित करने की जरूरत है. वे इसी उम्मीद से इस खेल  के दौरान लाइव ट्वीट्स करती हैं कि हो सकता है कि जो इस रेस को पसन्द नहीं करता है वो भी इसे पसन्द करने लग जाए. केटी मानती हैं कि रेसिंग भी दुनिया के अन्य खेलों जैसा ही है. बेहतरीन मशीन का ट्रैक पर भागने का रोमांच आपको अपने आप इसका दीवाना बना देता है. केटी यह बात अच्छी तरह से जानती हैं कि मोटरस्पोर्ट्स  में ज़्यादातर रेसर पुरुष हैं लेकिन वे इसे कोई समस्या नहीं मानती हैं.  समस्या दूसरी है. उनके ट्वीट्स को पढ़कर कई महिलाओं ने उनसे सम्पर्क  किया और बताया कि उन्हें ट्रैक पर सेक्सिज़्म  का शिकार बनना पड़ा. बकौल केटी, उनके वृत्तांत दिल दहला देने वाले थे.  लेकिन इसके बावज़ूद केटी सच्चे मन से चाहती हैं कि मोटरस्पोर्ट्स की दुनिया में महिलाओं को लेकर जो सोच है वह बदलना चाहिए. और उन्हें लगता है कि बदलाव आ भी रहा है. बहुत सारी महिलाएं अब इस स्पोर्ट्स को पसन्द करने लगी हैं और युवा लड़कियां भी रेसिंग के प्रति उत्साहित नज़र आने लगी हैं.

असल में सभी जगह हो यह रहा है, चाहे वो खेल हो या कुछ और,  कि  मूल की बजाय या उसके साथ-साथ उसकी पैकेजिंग पर खासा ज़ोर दिया जा रहा है ताकि जिनकी उसमें कोई रुचि नहीं है वे भी इतर कारणों से उसकी तरफ खिंचे चले आएं. सीधे-सीधे कहूं तो यह कि आपकी इस खेल विशेष में रुचि नहीं है, तो कोई बात नहीं, आप तो हमारी ग्रिड गर्ल्स या चीयर लीडर्स को देखने के लिए ही टिकिट खरीद लीजिए. हमें आपकी रुचि में नहीं आपके पर्स में दिलचस्पी है. लेकिन, खुशी की बात यह है कि आयोजक भी अब गतिविधि विशेष के प्रति गम्भीर होने लगे हैं और उससे जोड़ी जाने वाली अवांछित हरकतों के विरोध में उठ खड़े होने लगे हैं. आशा की जानी चाहिए कि इस मुहिम का और विस्तार होगा.

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जयपुर  से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 26 मई, 2015 को क्या ज़रूरत है खेलों में स्त्री देह की नुमाइश शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.  

Tuesday, May 19, 2015

सहमति कपड़े उतारने की

समाचार है कि किसी जनजागृति समिति नामक संगठन ने मुम्बई के डॉम्बिवली (थाणे) के अंतर्गत आने वाले रामनगर पुलिस स्टेशन में एक एफआईआर दर्ज़ करवा कर यह मांग की है कि फिल्म अदाकारा सनी लियोनी को देश निकाला दिया जाए और भविष्य में उनके भारत प्रवेश पर रोक लगाई जाए. समिति का कहना है कि सनी लियोनी अपनी वेबसाइट पर वल्गरिटी का प्रदर्शन करतीं और स्त्रियों की गरिमा को आहत करती हैं. इस संगठन का यह भी कहना है कि उसने पिछले एक सप्ताह में महाराष्ट्र और गोवा के विभिन्न थानों में एक दर्ज़न से ज्यादा ऐसी ही शिकायतें और दर्ज़ करवाई हैं. हमारे पाठक यह तो जानते ही हैं कि 34 वर्षीया सनी लियोनी भारत मूल की कनाडाई नागरिक हैं और उनके पास अमरीका तथा कनाडा की दोहरी नागरिकता है. वे पूर्व पोर्न अदाकारा हैं और उनकी सबसे अधिक कुख्याति भी इसी वजह से है. सन 2012 में उन्होंने पूजा भट्ट की फिल्म ‘जिस्म 2’ से बॉलीवुड में प्रवेश  किया और उसके बाद कई और फिल्मों में भी काम किया. बॉलीवुड में उनका प्रवेश ‘बिग बॉस’ की मार्फत हुआ था. देश के एक बड़े अंग्रेज़ी अखबार ने  उन्हें साल 2014 की ‘मोस्ट डिज़ायरेबल वुमन’ भी घोषित किया था.

अब ज़रा दूसरी खबर की तरफ मुड़ें. टीवी धारावाहिकों की महारानी और अब अनेक लोकप्रिय फिल्मों की भी निर्मात्री एकता कपूर ने इन्हीं सनी लियोनी के साथ एक ‘बोल्ड’ फिल्म बनाने की घोषणा की. शीर्षक था – ‘एक्सएक्सएक्स’. ‘डर्टी पिक्चर’, ‘लव सेक्स और धोखा’   और ‘रागिनी एमएमएस’  जैसी फिल्में बना चुकीं एकता ने जब सनी लियोनी को अपनी इस बोल्ड फिल्म के लिए साइन किया तो सहज ही कल्पना की जा सकती है कि वे क्या चाहती होंगी. लेकिन ना जाने एकता की अपेक्षाएं क्या थीं कि जिस सनी लियोनी से उपरोक्त  जनजागृति समिति आतंकित है उसने भी एकता की इस फिल्म में ऐसे कुछ सीन करने से मना कर दिया जो उसे निर्वस्त्र होकर करने थे. ज़ाहिर है कि एकता ने तो उन्हें साइन ही इस आस पर किया होगा. लेकिन एकता और सनी के बीच तनानतनी इतनी ज्यादा बढ़ी कि अंतत: एकता के पास उन्हें अपनी इस फिल्म से बाहर करना ही एकमात्र विकल्प बचा, और उसका इस्तेमाल उन्होंने किया भी. लेकिन इस अप्रिय प्रसंग से उन्होंने एक सबक भी सीखा. सबक  यह कि अब उन्होंने तै कर लिया है कि वे अपनी  फिल्म  के लिए किसी भी कलाकार को साइन करने से पहले उससे ‘न्यूडिटी क्लॉज़’  पर साइन करवाएंगी. एकता ने इसकी शुरुआत बालाजी मोशन पिक्चर्स के केन घोष के निर्देशन में बनने वाले इसी इरॉटिक थ्रिलर ‘एक्सएक्सएक्स’ से कर दी है. इससे भी आगे  यह बात और कि एक नई अभिनेत्री  कायरा दत्त ने इस अनुबन्ध पर हस्ताक्षर कर भी दिये हैं. ‘नच बलिये’  सीज़न 6 की डांसर रह चुकीं  कायरा का कहना है, “मैं अपने शरीर को लेकर कम्फर्टेबल हूं और मुझे इसे कैरी करना आता है. मैंने बोल्ड दृश्य देने पर हां किया है  क्योंकि मुझे खुद पर और अपने निर्देशक पर पूरा विश्वास है.” बहुत स्वाभाविक है कि कायरा का यह वक्तव्य पढ़ते हुए हमें दीपिका पादुकोण के उस चर्चित वीडियो की भी याद आ जाए जिसका शीर्षक था ‘माय चॉइस’.
                                                                                                        
यहीं यह बता दिया जाना भी उपयुक्त होगा कि ‘न्यूडिटी क्लॉज़’  का सीधा-सादा मतलब  यह है कि इसे स्वीकार करने वाला कलाकार जितने की उससे मांग की जाएगी उतना एक्सपोज़ करने को कानूनी रूप से सहमत है. क्लॉज़ में एक्सपोज़र को और अधिक स्पष्ट करते हुए यह भी शामिल किया जा सकता है कि देह के किन भागों को अनावृत चित्रित किया जाएगा. इस क्लॉज़ में अन्य कलाकारों के साथ अंतरंग दृश्य करने की सहमति भी शामिल की जा सकती है. हॉलीवुड में तो यह क्लॉज़ काफी पहले से चलन में है और वहां विभिन्न यूनियनों ने भी अपनी गाइडलाइंस बना रखी हैं जो कलाकार और निर्माता दोनों के अधिकारों की रक्षा करती हैं. अपने देश में फिल्मों में काफी पहले से मौज़ूद न्यूडिटी के बावज़ूद कायरा दत्त इस तरह के अनुबन्ध पर हस्ताक्षर करने वाली पहली अदाकारा बन गई हैं.

अब देखने की बात यह है कि एक तरफ भारतीय सेंसर बोर्ड हमारी फिल्मों में सेक्स, हिंसा और अभद्र भाषा के प्रति कड़ा रुख अपनाने की बात कर रहा है और दूसरी तरफ फिल्म निर्माता अपने कलाकारों से अधिक मुक्त होने की अनुबन्ध शुदा  अपेक्षा कर रहे हैं. इस सन्दर्भ में श्याम बेनेगल का यह कथन भी विचारणीय है कि “आजकल जिस तरह की कहानियां बन रही हैं, इस तरह के दृश्य कहानी की मांग हैं.” लेकिन इस मामले में कलाकार की मर्जी वाली बात की अनदेखी नहीं की जा सकती. सिद्धांतत: तो लगता है कि ऐसे किसी क्लॉज़ पर दस्तखत करना न करना कलाकार की मर्जी की बात है, लेकिन क्या व्यवहार में भी ऐसा  ही होगा?

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, दिनांक 19 मई, 2015 को न्यूडिटी क्लॉज़ से फिल्मी परदे  पर कपड़े उतारने की सहमति शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, May 12, 2015

परिवर्तन लाने वाली औरतों को सलाम

‘मिल्क एण्ड हनी’ पुस्तक के बारे में भले ही आप कुछ न जानते हों, इसकी लेखिका का नाम आपने ज़रूर सुन रखा होगा. रूपी कौर. वही रूपी कौर  जिनकी पोस्ट की हुई तस्वीर को इंस्टाग्राम ने अपनी कम्युनिटी गाइडलान का उल्लंघन करने वाली मान कर एक नहीं दो बार  हटा दिया था लेकिन जब रूपी कौर ने इस निर्णय को चुनौती दी तो इंस्टाग्राम ने यह स्वीकार करते हुए कि उनकी तस्वीर से किसी गाइडलाइन का उल्लंघन नहीं होता है, उनसे माफी मांगी. तस्वीर आपने भी देखी होगी. जीन्स और टी शर्ट पहने एक लड़की आपकी तरफ पीठ किये सो रही है. जीन्स और बिस्तर पर लाल रंग के धब्बे हैं जो ‘उन’ दिनों के सूचक हैं.

और जिन दिनों रूपी कौर की पोस्ट की  हुई इस तस्वीर पर उत्तेजक चर्चाएं हुईं लगभग उन्हीं दिनों दीपिका पादुकोण का ‘माय चॉइस’  नामक वीडियो भी खासा चर्चित हुआ. असल में ये दोनों प्रसंग एक ही  बात कहते हैं और वह यह कि स्त्रियां पुरज़ोर तरीके से अपनी देह पर अपना हक ज़ाहिर करने लगी हैं और उसे लेकर किसी भी तरह की लज्जा या संकोच का भाव वे मन में नहीं रखना चाहती हैं. अगर व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह उस भेदभाव की स्वाभाविक प्रतिक्रिया है जो स्त्री को लगातार सहन करना पड़ता है. तमाम कला माध्यमों में, जिनमें फिल्मों जैसा लोकप्रिय माध्यम भी शामिल है, पुरुष देह के वस्त्रहीन प्रदर्शन को निस्संकोच भाव से न केवल स्वीकार किया जाता है, माचो जैसे शब्दों से सराहा भी जाता है. हमारे अपने देश में कई अभिनेताओं के लिए तो उनकी करीब-करीब हर फिल्म में कमीज़ उतारना ज़रूरी ही मान लिया गया है. उसे कभी कोई अश्लील नहीं कहता है. लेकिन इससे मिलता-जुलता कृत्य अगर कोई अभिनेत्री करती है, और वह भी किसी फिल्म में, तो उसे बदनाम होते देर नहीं लगती. सवाल वही कि स्त्री और पुरुष की देह को लेकर यह भिन्न नज़रिया क्यों?

और शायद इसी सवाल ने प्रेरित किया उस सिलसिले को भी जो दिल्ली के जामिया मिलिया विश्वविद्यालय से शुरु हुआ और कोलकाता के जादवपुर विश्वविद्यालय तक जा पहुंचा. यह सिलसिला अधिक तीक्ष्ण और स्वभावत: अधिक चौंकाने वाला है, हालांकि इसका मकसद चौंकाना नहीं, अपना प्रतिवाद दर्ज़ करना है. मैं यहां जिस सिलसिले का ज़िक्र कर रहा हूं – सेनेटरी पैड्स पर लिखकर  विरोध करने के सिलसिले का, उसके पीछे एक परम्परा  है. असल में पिछले साल चार्ली नाम की एक लड़की ने एक ट्वीट किया था जिसमें उसने लिखा था – “पुरुष जिस तरह लड़कियों के ऋतुस्राव  से घृणा करते हैं, अगर उसी तरह वे बलात्कार से भी घृणा करते तो!” चार्ली के इस ट्वीट ने एलोने कास्त्रतिया नामक एक जर्मन कलाकार को इतना अधिक प्रेरित किया कि उसने इस इबारत को चालीस सेनेटरी पैड्स पर लिखकर शहर की दीवारों पर चस्पां कर डाला. इस कृत्य के लिए एलोने की खूब तारीफ हुई हालांकि  उसकी आलोचना भी कम नहीं हुई. लेकिन इस तरह एलोने लोगों की चेतना को झकझोरने में कामयाब रही. वैसे सेनेटरी नैपकिन्स को  शिल्प का सम्मान देने के एलोना के इस कृत्य से पहले भी अनेक महिलाएं इस तरह के उद्देश्यपूर्ण प्रयोग कर चुकी थीं. मसलन, ट्रेसी एमिन ने प्रेग्नैंसी किट के साथ एक जार में पुराना इस्तेमाल किया हुआ टेम्पून रखकर उसे ‘पेण्टिंग का इतिहास-1’ नाम दिया तो चिली की एक कलाकार ने पांच साल से जमा  किए  हुए मासिक धर्म के रक्त की एक प्रदर्शनी की जिस पर किसी ने एक बहुत अर्थपूर्ण टिप्पणी की थी कि “पुरुष के खून को वीरता कहा जाता है और हम लड़कियों के रक्त को हमेशा से शर्म की चीज़ कहकर चिह्नित किया जाता है.”

असल में ये सारे कृत्य जिन्हें देखकर या जिनके बारे में पढ़ सुनकर हम विचलित होते हैं, क्षुब्ध होते हैं और जिन्हें हम सुरुचिपूर्ण नहीं मानते हैं, चीख-चीखकर यही पूछते  हैं कि अगर यौन शोषण, बलात्कार, घरेलू हिंसा वगैरह सुरुचिपूर्ण नहीं हैं तो इनके  विरोध में किए गए आंदोलन भला कैसे सुरुचिपूर्ण हो सकते हैं? इस पूरे परिदृश्य पर तसलीमा नसरीन की टिप्पणी मुझे बहुत सार्थक लगती है. वे कहती हैं, “अगर औरतें पुरुषों की सिखाई भाषा में न लिखें, कितना कहना है, कहां तक कहना है, कहां त्तक सीमा खींचनी है – ये रूल्स न मानें, तो पुरुषतांत्रिक लोगों को बड़ा गुस्सा आता है. इस समाज में जो महिलाएं नारी विरोधी लोगों को नाराज़ नहीं कर पातीं, उन महिलाओं को नारी विरोधियों से खराब, स्लट, वेश्या इत्यादि का तमगा नहीं मिलता है – ऐसी औरतों को लेकर ज़्यादा कुछ उम्मीद भी नहीं की जा सकती है. जो नारी विरोधी समाज के साथ समझौता नहीं करतीं, जो ज़िद्दी हैं, नियम तोड़ती हैं, वे ही समाज बदलती हैं. वे ही परिवर्तन  लाती हैं. मैं उन्हें सैल्यूट करती हूं.”  
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 12 मई, 2015 को दुनिया में परिवर्तन लाने वाली औरतों को सलाम शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.