Tuesday, August 23, 2016

दास्तान एक अजीब लड़ाई की

अपनी इस अजूबों भरी दुनिया में बहुत सारी लड़ाइयां ऐसी भी चलती रहती हैं जिनका असर तो हम पर होता है, लेकिन जिनकी कोई ख़बर हमें नहीं होती. ऐसी ही एक रोचक लड़ाई इन दिनों दुनिया के सबसे बड़े सोशल नेटवर्क अड्डे फेसबुक और ऑनलाइन विज्ञापन ब्लॉक करने वाले एक ऐप एडब्लॉक के निर्माताओं के बीच चल रही है. फेसबुक के साम्राज्य की विशालता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि इसकी हैसियत साढ़े तीन सौ बिलियन डॉलर (भारतीय मुद्रा में लगभग पैंतीस हज़ार करोड़)  की है. जिस अड्डे पर जाकर आप-हम जैसे साधारण जन अपने हाल-चाल, पसन्द नापसन्द साझा करते हैं उसकी इतनी बड़ी आर्थिक हैसियत के मूल में हैं वे विज्ञापन जो हमें अपने और अपने दोस्तों के हाल-चाल के बीच दिखा दिये जाते हैं. इन विज्ञापनों का दिखाया जाना आकस्मिक नहीं होता है. इनका सीधा रिश्ता हमारी दिलचस्पियों, जिज्ञासाओं, टिप्पणियों आदि और हमारी वेब ब्राउज़िंग आदतों के साथ होता है और इसी कारण ये हमारे लिए प्रासंगिक भी होते हैं. ऐसा भी नहीं है कि विज्ञापन दिखाने का यह काम केवल फेसबुक ही करती है. ऑनलाइन सेवा देने वाली अधिकांश सेवाएं, जिनमें गूगल भी शामिल है, अपने उपयोगकर्ताओं को किसम-किसम के विज्ञापन दिखाती हैं. इन तमाम कम्पनियों का सोच यही है कि उपयोग कर्ता उनकी सेवाओं का बिना कोई मोल चुकाये उपयोग करता है तो उसे  उन सेवाओं का व्यय भार वहन करने वालों  के विज्ञापन देखने पर कोई आपत्ति  नहीं होनी चाहिए. ऑनलाइन के अलावा अन्य क्षेत्रों में भी ऐसा होता है. हम लगभग मुफ़्त में जो टीवी चैनल देखते हैं उनका व्यय भार विज्ञापन देने वाले ही उठाते हैं और अपनी मूल लागत से काफी कम में जो समाचार पत्र हमें मिल पाता है उसके पीछे भी विज्ञापन दाताओं का ही आर्थिक सम्बल होता है.

ऑनलाइन सामग्री में विज्ञापन प्रदर्शित करने का मामला केवल अनचाही सामग्री हम पर आरोपित करने का मामला ही न होकर हमारी निजता के हनन  का मामला ही हो जाता है और इसलिए जागरूक ऑनलाइन सामग्री उपयोगकर्ता अनेक फिल्टर्स और ऐप्स की मदद से इन विज्ञापनों से बचने के रास्ते तलाश करते रहते हैं. ऐसे मददगारों में एडब्लॉक का नाम प्रमुखता से लिया जाता है. बहुत सारे लोग अपने वेब ब्राउज़र में एक्स्टेंशन के रूप में एडब्लॉकर जोड़कर अनचाहे विज्ञापनों से मुक्ति पाने का प्रयास करते रहे हैं. लेकिन ज़ाहिर है कि यह बात फेसबुक को रास नहीं आई और उसने कुछ ऐसी तकनीकी जुगत की कि एडब्लॉक को ही ब्लॉक कर दिया. यानि एडब्लॉक इस्तेमाल करने वाले उपयोगकर्ताओं को भी विज्ञापन दिखाये जाने लगे. फेसबुक की इस कार्यवाही का जवाब उसी दिन दिया एडब्लॉक ने, यह कहते हुए कि उनका एडब्लॉक प्लस ऐप फेसबुक की कार्यवाही को नाकाम साबित कर देगा. यानि जो विज्ञापन नहीं देखना चाहते उन्हें विज्ञापन नहीं दिखाये जा सकेंगे. बहुत  रोचक बात यह कि इस कार्यवाही के तुरंत बाद फेसबुक ने फिर एक जवाबी कार्यवाही करते हुए एडब्लॉक प्लस को भी अप्रभावी कर डाला. और इस बार फेसबुक की तरफ से एक बयान भी ज़ारी किया गया जिसमें एडब्लॉक वालों पर यह आरोप लगाया गया कि वे फेसबुक उपयोगकर्ताओं को उनके मित्रों की पोस्ट्स और पेज देखने से भी वंचित कर रहे हैं. फेसबुक ने एडब्लॉक और इस तरह के टूल निर्माताओं पर यह भी इलज़ाम लगाया कि वे अपने इन प्रयासों से पैसा कमा रहे हैं. यानि यह उनकी निस्वार्थ सेवा नहीं है. फेसबुक का यह आरोप खारिज़ इसलिए नहीं किया जा सकता कि एडब्लॉक को गूगल जैसी बड़ी कम्पनियों से ‘स्वीकार्य विज्ञापनों’ को दिखाये जा सकने की अनुमति देने वाली श्वेत सूची में शामिल करने की एवज़ में धन मिलता है.

यह लड़ाई अभी ज़ारी है. दोनों ही पक्षों के अपने-अपने तर्क हैं. एडब्लॉक वालों का तर्क यह है कि वे सारे विज्ञापन बाधित न करके केवल उन लोगों को अपनी सुविधा प्रदान कर रहे हैं  जो विज्ञापनों से मुक्ति चाहते हैं, जबकि फेसबुक ने थोड़ी उदारता दिखाते हुए यह कहा है कि वे भी अपने उपयोगकर्ताओं को अधिक निर्णयाधिकार प्रदान कर रहे हैं ताकि वे उन विषयों के विज्ञापन न देखें जिनमें उनकी रुचि नहीं है. तकनीकी जानकारों का खयाल है कि बावज़ूद इस बात के कि दोनों ही पक्ष अपने अपने मोर्चों पर डटे हुए हैं, इस लड़ाई में फेसबुक का पलड़ा भारी है. पलड़ा भारी होने की वजह शुद्ध तकनीकी है. असल में फेसबुक के हाथों में अपनी साइट पर दिखाई जाने वाली सारी सामग्री के तमाम सूत्र हैं इसलिए किसी भी ब्लॉकर को उन्हीं से गुज़र कर अपनी कार्यवाही करनी होगी.  लेकिन आज की तकनीकी दुनिया में नामुमकिन कुछ भी नहीं रह गया है. इसलिए यह देखना रोचक होगा कि इस लड़ाई का परिणाम क्या होता है!           


▪▪▪

जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत सोशल मीडिया v/s विज्ञापन : दास्तान एक अजीब लड़ाई की शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.   

Tuesday, August 16, 2016

एक तस्वीर जो झकझोरती है रूढ़ मान्यताओं को

इधर रियो ओलम्पिक की एक तस्वीर बहुत चर्चा में है. रायटर की फोटोग़्राफर लूसी निकल्सन द्वारा ली गई इस तस्वीर में कोपाकबाना बीच पर जर्मनी की किरा वॉकेनहर्स्ट और मिश्र की डोआ एलघोबाशी बीच वॉलीबॉल खेल रही हैं. तस्वीर में नेट के बांयी तरफ़ हैं एलघोबाशी जिन्होंने अपनी देह को पूरी तरह ढकने वाले वस्त्र पहन रखे हैं – पूरी बांहों का शर्ट जैसा कुछ और फुल पैण्ट, तथा अपने केशों को हिजाब से ढक रखा है. नेट की दूसरी तरफ हैं वॉकेनहर्स्ट, बीच की चिर परिचित वेशभूषा यानि टू पीस बिकिनी में. कहा जा रहा है कि यह तस्वीर ओलम्पिक की खेलों को संस्कृति और शिक्षा के साथ एकाकार करने वाली  विचारधारा की नुमाइन्दगी  करती है. बीबीसी अफ्रीका ने इस तस्वीर को दुनिया की विविध संस्कृतियों और देशों को निकट लाने वाली ओलम्पिक संस्कृति की प्रतिनिधि बताते हुए इसकी सराहना करने के अतिरिक्त उत्साह में इसे ‘बिकिनी बनाम बुर्क़ा’  कहकर एक छोटी-सी ग़लतबयानी तक कर डाली. बुर्क़ा वह होता है जिससे पूरे शरीर को ढका जाता है, जबकि एलघोबाशी ने हिजाब पहना है. यहीं यह बता देना भी उचित होगा कि इस तस्वीर में दिखाई दे रही एलघोबाशी और उनकी एक साथिन नाडा मीवाड का नाम इतिहास की किताबों में मिश्र की पहली बीच ओलम्पियन्स  के रूप में दर्ज़ हो गया है. असल में 2012 के लन्दन ओलम्पिक्स के समय नियमों में बदलाव करके स्विमसूट्स के विकल्प के रूप में पूरी देह को ढकने वाले  पूरी बाहों के ऊपरी वस्त्र और फुल पैंट वाली इस वेशभूषा को बीच वॉलीबॉल की पोशाक के रूप में स्वीकृति दी गई थी.

जो तस्वीर चर्चा में है उस मैच के तुरंत बाद एक बयान में डोआ एलघोबाशी ने कहा कि मैं पिछले दस बरसों से हिजाब पहन रही हूं और अब जबकि खेलों के अंतर्राष्ट्रीय संघ ने हमें अपनी वेशभूषा के साथ खेलने की इजाज़त दे दी है, मैं बेहद खुश हूं. उन्होंने यह भी कहा कि हिजाब मुझे वे सारे काम करने से रोकता नहीं है जिन्हें करना मुझे बेहद पसन्द है और  जिनमें बीच वॉलीबॉल भी एक है. डोआ एलघोबाशी ही की तरह अमरीका की फेन्सर (तलवारबाज) इतिहाज मुहम्मद का नाम भी इतिहास की  किताबों में इसी वजह से अंकित हुआ है. उन्होंने भी हिजाब पहन कर इस स्पर्धा  में हिस्सा लिया, और बाद में कहा कि बहुत सारे लोग सोचते हैं कि मुस्लिम महिलाओं की अपनी कोई आवाज़ नहीं है और हम खेलों में शिरकत नहीं करती हैं. लेकिन मेरी यह शिरकत बाहरी दुनिया की इस ग़लत धारणा को चुनौती  है.

असल में पश्चिम वाले इसी तरह की छवियों का हवाला देकर खुद को आज़ाद और मुस्लिम स्त्रियों को पराधीन रूप में चित्रित करने के आदी रहे हैं. इन दो छवियों के बीच सामान्यत: न तो कोई संवाद है न एक दूसरे को समझने की कोशिश और इसी वजह से कई दफ़ा दोनों के रिश्ते हिंसक भी हो  जाते हैं. इसी बात से फिक्रमंद होकर न्यूयॉर्क टाइम्स के स्तम्भकार रोजर कोहेन ने इस तस्वीर के सन्दर्भ में दो स्त्रियों के वृत्तांत प्रस्तुत किये हैं. इनमें से एक हैं नीदरलैण्ड्स में पली-बढ़ी मिश्री मां और डच पिता की बेटी चडीड्जा बुइज्स जो अपनी  आध्यात्मिक ज़रूरतों से प्रेरित होकर इबादत करती हैं, व्यसनों से दूरी बरतती हैं और हिजाब पहनती हैं. अपनी वेशभूषा की वजह से  वे कई दफा मुश्क़िलों में भी पड़ चुकी हैं और इसलिए उनकी यह शिकायत वाज़िब लगती है कि सेक्युलर पश्चिमी देशों में धार्मिक साक्षरता की बहुत कमी है. हालांकि वे यह भी कहती-मानती हैं कि खुद इस्लाम के भीतर भी इस वजह से बड़े संकट मौज़ूद हैं कि इराक़ और सीरिया में इस्लाम जैसा दीखता है उस पर पूरी तरह आईएसआईएस का नियंत्रण है. दूसरी स्त्री हैं नोरमा मूर जो खुद को बेहद धार्मिक मानती हैं और काफी समय तक इस्लामी पारम्परिक वेशभूषा में रहने के बाद अरब देशों की बेपनाह गरमी में अपने हिजाब को उतार फेंकने को मज़बूर हुईं. अब वे कहती हैं कि मेरे केश, मेरी देह के उभार सब कुछ खुदा की ही तो देन हैं. अपने केशों को ढक कर और बेढंगे कपड़े पहन कर जैसे मैं अपने स्त्रीत्व को ही नकारती हूं. 

इन दोनों स्त्रियों के वृत्तांत देने के बाद रोजर कोहेन बहुत महत्व की बात कहते हैं. वे कहते हैं कि पाश्चात्य संवेदनाओं के लिए पारम्परिक कपड़ों में ढकी मुस्लिम स्त्रियां ऐसी पराधीनता की प्रतीक है जिन्हें  मुक्ति मिलनी चाहिए. लेकिन यथार्थ के अनेक रंग होते हैं. यह कह सकना बहुत मुश्क़िल है कि कौन स्त्री अधिक रूढिवादी है, कौन ज़्यादा फेमिनिस्ट है और कौन ज़्यादा आज़ाद  है. हम तो बस यह जानते हैं कि ओलम्पिक जैसे अवसर और ज़्यादा आएं ताकि हम ये सवाल पूछने को और अपनी जड़, रूढ़  मान्यताओं से मुक्ति पाने को प्रेरित हों.

रोजर कोहेन की बात है तो विचारणीय!  

▪▪▪  

जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 16 अगस्त, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Wednesday, August 10, 2016

अगर बुद्धिमान बनना है तो आलसी हो जाओ!

शायद आपने भी कभी यह बात पढ़ी-सुनी हो कि सुबह जल्दी उठने वालों ने दुनिया में कोई तरक्की नहीं की है. तरक्की तो उन आलसियों ने की है जो कुछ करने के आसान तरीके तलाश करने में जुटे रहे हैं. अगर यह बात कभी आपने न भी सुनी हो तो यह ज़रूर सुनी होगी कि बिल गेट्स अपने  प्रोजेक्ट्स हमेशा उन्हीं इंजीनियरों को सौंपा करते थे जो सबसे ज़्यादा आलसी माने जाते थे. ऐसा वह जानबूझ कर करते थे, क्योंकि उनका मानना था कि वे आलसी लोग ही अपने काम को सबसे ज़्यादा तेज़ गति और बेहतर तरीके से पूरा कर सकने की काबिलियत रखते हैं.  शायद यही वजह हो कि यह कथन प्रचलित हो गया है कि दक्षता बुद्धिमत्तापूर्ण आलसीपन का ही दूसरा नाम है!

और अब तो एक ताज़ा शोध ने इस बात पर प्रमाणिकता की एक और मुहर भी लगा दी है. यह शोध हुई है अमरीका की  फ्लोरिडा गल्फ़ कोस्ट यूनिवर्सिटी में. इसका बड़ा निष्कर्ष यह है कि ज़्यादा सोचने वाले लोग कम सोचने वालों की तुलना में अधिक आलसी होते हैं. इसे यों भी कहा जा सकता है कि बुद्धिमान लोग शारीरिक रूप से सक्रिय  लोगों की तुलना में आलसी होते हैं. इस शोध ने प्रकारांतर से इस बात  को ही पुष्ट किया है कि जिन लोगों का आईक्यू (बौद्धिक स्तर)  ज़्यादा होता है वे बहुत जल्दी बोर हो जाते हैं और इस वजह से वे अपना अधिक समय चिंतन में व्यतीत करते हैं. और इसके विपरीत वे लोग जो अधिक सक्रिय होते हैं, वे अपने दिमागों को उद्दीप्त करने के लिए बाह्य गतिविधियों में अधिक लिप्त होते हैं. ऐसा वे कदाचित अपने विचारों से पलायन के लिए भी करते हैं और या फिर इसलिए करते हैं कि वे बहुत जल्दी बोर हो जाते हैं.

टॉड मैकएलरॉय के निर्देशन में की गई इस शोध में शोधार्थियों को ‘संज्ञान की ज़रूरत’ शीर्षक वाली एक प्रश्नावली दी गई और चाहा गया कि वे “मुझे वाकई ऐसे काम करने में आनंद मिलता है जिनमें समस्याओं के नए समाधान तलाशे जाते हैं” और “मैं बस उतना सोचता हूं जितना सोचना मेरे लिए ज़रूरी होता है” जैसे कथनों पर यह अंकित करें कि वे उनसे किस हद तक सहमत या असहमत हैं. प्रश्नावली पर प्राप्त उत्तरों के आधार पर शोध निदेशक महोदय ने तीस ‘चिंतक’ और तीस ही ‘ग़ैर चिंतक’ शोधार्थियों को चुना. इसके बाद की शोध इन्हीं साठ शोधार्थियों पर की गई. इन साठों शोधार्थियों की कलाई पर घड़ी जैसा एक उपकरण पहना दिया गया जो उनकी सारी हलचलों को अंकित करते हुए ये सूचनाएं संकलित करता रहता था कि वे शारीरिक  रूप से कितने सक्रिय हैं. एक सप्ताह के अंकन ने यह प्रदर्शित किया कि ‘चिंतक’ समूह वाले ‘ग़ैर चिंतक’  समूह वालों की तुलना में कम सक्रिय थे.

इस अध्ययन के निष्कर्ष जर्नल ऑफ हेल्थ साइकोलॉजी में प्रकाशित हुए हैं और आंकड़ों के लिहाज़ से इन्हें अत्यधिक महत्वपूर्ण और तगड़ा माना जा रहा है. ब्रिटिश साइकोलॉजिकल सोसाइटी ने भी इस शोध को महत्वपूर्ण मानते हुए इसे इस टिप्पणी के साथ उद्धृत किया है: “अंतत: एक ऐसी महत्वपूर्ण जानकारी  सामने आई है जो अधिक चिंतनशील व्यक्तियों को उनकी बहुत कम औसत सक्रियता पर नियंत्रण करने में मददगार साबित होगी.” इसी टिप्पणी में आगे यह भी कहा गया है कि जब इन समझदार लोगों को अपनी कम सक्रियता की जानकारी होगी और उन्हें यह पता चलेगा कि इस कम सक्रियता का कितना ज़्यादा मोल उन्हें चुकाना पड़ सकता है, तो वे अधिक सक्रिय होने की कोशिश करेंगे. खुद शोध निदेशक टॉड मैकएलरॉय ने भी चेतावनी भरे शब्दों में कहा है कि जो लोग कम सक्रिय हैं, भले ही वे कितने भी बुद्धिमान क्यों न हों, उन्हें अपनी सेहत को मद्देनज़र रखकर अपनी शारीरिक सक्रियता में वृद्धि करनी चाहिए.  

लेकिन इन बातों से यह न समझ लिया जाए कि यह शोध अंतिम और निर्णायक है. खुद इसी शोध के दौरान यह बात भी सामने आई कि हालांकि पूरे सप्ताह तो इन दोनों समूहों की गतिविधियों में भारी अंतर पाया गया लेकिन सप्ताहांत के दौरान दोनों समूहों की गतिविधियां एक जैसी पाई गईं. जिन्होंने यह शोध की है वे इस फ़र्क के बारे में कोई स्पष्टीकरण नहीं दे पाये हैं. दूसरी बात यह कि क्या महज़ साठ लोगों पर की गई शोध को पूरी मनुष्य जाति पर लागू कर लेना बुद्धिमत्तापूर्ण होगा? क्या जिन पर यह शोध की गई उनकी संख्या अत्यल्प नहीं है? हमारा तो यही कहना है कि इस तरह की शोधों को सिर्फ इस नज़र से देखना चाहिए कि शोध की दुनिया में भी क्या-क्या अजूबे होते हैं!

▪▪▪  
जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 09 अगस्त, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, August 2, 2016

ईरानी महिलाओं ने हिजाब को बदला परचम में

हमारा समय बड़ा दिलचस्प है. बहुत सारे आन्दोलन सोशल मीडिया के मंचों पर ही चला लिए जाते हैं. इन दिनों एक रोचक मुहिम चल रही है जिसे चुनौती स्वीकार का नाम दिया गया है. चुनौती यह है कि फ़ेसबुक पर अपना डिस्प्ले पिक्चर (डीपी) श्वेत श्याम लगाएं! जहां सारी दुनिया रंगों की तरफ़ बढ़ रही हो और अपने देश में भी रंगों की ऐसी हवा चल रही हो कि पुरानी  क्लासिक श्वेत श्याम फिल्मों को रंगीन बनाया जा रहा हो वहां धार के विपरीत बहने की इस कोशिश को चैलेंज  कहा गया है.  कुछ समय पहले एक और मुहिम सोशल मीडिया के मैदान  में चलाई गई थी. उस मुहिम के तहत बहुत सारे लोगों ने अपनी डिस्प्ले पिक्चर्स को सतरंगी बना दिया था. लेकिन यहीं यह याद दिला देना भी उचित होगा कि उस मुहिम का एक ज़ाहिर मक़सद था. मक़सद था एलजीबीटी समुदाय के प्रति अपनी एकजुटता का प्रदर्शन करना. यह बात अलहदा है कि अपनी तस्वीर को सतरंगी बनाने  वालों में से बहुतों को इस समुदाय के बारे में कोई  जानकारी नहीं थी, इसको समर्थन  देना तो बहुत दूर की बात है.

लेकिन ऐसा नहीं है कि सामाजिक मीडिया के मंचों पर होने वाली सारी मुहिमें तस्वीरों से रंग चुरा लेने जैसी ही होती हैं. इधर ईरान में सामाजिक मीडिया के मंचों पर बहुत ज़ोर-शोर से एक  मुहिम चल रही है.  वह इस तरह की बहुत सारी मुहिमों से अलहदा है. वहां चल रही इस मुहिम के तहत पुरुष अपना सर ढककर ली गई तस्वीरों को सामाजिक मीडिया पर साझा कर रहे हैं. इसी मुहिम के विस्तार के रूप में वहां की स्त्रियां बिना हिजाब के यानि सर ढके बिना ली गई तस्वीरें सामाजिक मीडिया पर साझा  कर रही हैं. कुछ महिलाएं मुण्डवाए हुए सरों की छवियां भी पोस्ट कर रही हैं.  असल में यह ईरान के स्त्री विरोधी कानूनों के खिलाफ़ चलाया जा रहा एक प्रतिरोधी अभियान है. 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से ईरान में एक कानून के तहत महिलाओं को अपना पूरा सर ढकना होता है. अगर उनके केश भी दिखाई दे जाएं तो इसे अवांछित हरक़त माना जाता है. सरकार के खर्चे से लगाए गए बड़े-बड़े होर्डिंग्स में यह कहा जाता है कि जो महिलाएं अपना सर नहीं ढकती हैं या जिनके केश दिखाई देते हैं वे बिगड़ैल और ग़ैर इज़्ज़तदार हैं.  वहां इस क़ानून का सख़्ती से पालन कराने के लिए ‘गश्ते इरशाद’ नामक संगठन के हज़ारों पुलिसवाले नियमित रूप से  सड़कों पर गश्त करते हैं. इस क़ानून का उल्लंघन करने पर जुर्माने  के साथ जेल भी हो सकती है. मई में ईरान की पुलिस ने बिना हिजाब पहने इंस्टाग्राम और अन्य सोशल मीडिया वेबसाइटों पर तस्वीर पोस्ट करने पर आठ महिलाओं को हिरासत में ले लिया था. वहां की सरकार इस कानून  को लेकर इतनी गम्भीर है कि उसकी मंशा को समझ कर एयर फ़्रांस ने हाल ही में अपनी महिलाकर्मियों से कहा था कि ईरान की राजधानी तेहरान जानी वाली फ़्लाइटों के दौरान वे हिजाब पहनें. लेकिन एयर फ्रांस की इस सलाह ने ही इस प्रतिरोधी अभियान  को भी प्रेरित कर डाला.

प्रतिरोध स्वरूप न्यूयॉर्क में रह रहीं ईरान की जानी-मानी पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता मसीह अलीनेजाद ने अपने लोकप्रिय फ़ेसबुक पृष्ठ ‘माई स्टेल्थी फ़्रीडम’ (मेरी गुप्त आज़ादी) के माध्यम से यह अभियान शुरु किया. मसीह अलीनेजाद के इस पृष्ठ  से दस लाख से भी  ज़्यादा लोग जुड़े हुए हैं. इस पृष्ठ एक पोस्ट किए गए एक वीडियो पर आई फ़ातेनाह अंसारी की एक टिप्पणी में इस मुहिम की महत्ता को इस तरह प्रकट किया गया है:  “महिलाओं को हिजाब लगाने के लिए मज़बूर किए जाने के छत्तीस बरस बाद आखिरकार पुरुष भी महिलाओं के समर्थन में आने लगे हैं.” एक अन्य व्यक्ति ने इस मुहिम को इन शब्दों में और अधिक स्पष्ट किया है: “मैं चाहता हूं कि मेरी पत्नी एक ऐसे ईरान में रह सके जहां सिर्फ़ वो तै करे कि उसे क्या पहनना है. ईरान में पड़ने वाली भीषण गर्मी के बावज़ूद महिलाओं के लिए ऐसे कपड़े पहन पाना बहुत मुश्क़िल है.”  ख़ुद मसीह अलीनेजा ने बड़े तल्ख़ शब्दों में कहा है कि “हमारे समाज में किसी स्त्री के अस्तित्व और उसकी पहचान की कसौटी  पुरुष का नज़रिया  है और बहुत सारे मामलों में किसी धार्मिक सत्ता या सरकारी अफसर के उपदेश ही पुरुष के स्त्री पर स्वामित्व के भ्रामक  सोच को निर्धारित कर डालते  हैं. इसलिए मैंने सोचा  कि क्यों न स्त्री अधिकारों का समर्थन करने के लिए पुरुषों को आमंत्रित किया जाए.”
यह माना जाता है कि इस्लाम स्त्री और पुरुषों की समानता का पक्षधर है, लेकिन ईरानी कट्टरपंथियों द्वारा सिर्फ आधी आबादी की स्वाधीनता पर लगाए प्रतिबंध के विरुद्ध यह अभियान हमें मजाज़ की इन पंक्तियों की याद दिलाता है: तेरे माथे पे ये आंचल बहुत ही खूब है लेकिन/ तू इस आँचल से एक परचम बना लेती तो अच्छा था।           


•••
जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अन्तर्गत मंगलवार, 02 अगस्त, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, July 26, 2016

कितना उचित है हमारी निजी ज़िन्दगी में तुम्हारा झांकना!

लोकप्रिय अमरीकी अभिनेत्री जेनिफ़र एनिस्टन  ने एक बार फिर से ठहरे पानी में कंकड़ फेंकने का दुस्साहस किया है. फैशन, ग्लैमर और चकाचौंध की दुनिया के सितारों की निजी ज़िन्दगी में आम जन की स्वाभाविक दिलचस्पी को देखते हुए पत्रकारों की एक नई प्रजाति पिछले कुछ समय से अस्तित्व में है जिसे पापाराज़ी  नाम से जाना जाता है. इस प्रजाति का गुण धर्म है इन सितारों का हर जगह पीछा करना और इनके बारे में वो सारी जानकारियां अपने पाठकों को सुलभ करना, जिनमें से बहुत सारी को ये खुद सार्वजनिक न करना चाहते हों. इस तरह पापराज़ी नामक यह प्रजाति व्यक्ति की निजता का अतिक्रमण करते हुए अपना काम करने का प्रयास करती है. वैसे तो यहीं यह बात भी कह दी जानी चाहिए कि बहुत सारे मामलों में चकाचौंध की दुनिया के ये सितारे खुद पत्रकारों को बुलाकर उनके कान में अपनी या अपने सहगामियों अथवा प्रतिपक्षियों की ज़िन्दगी की न कही जा सकने वाली बातें उण्डेलते हैं, लेकिन बहुत बार यह भी होता है कि सितारे जो बातें नहीं ज़ाहिर करना चाहते हैं उन्हें भी ये सार्वजनिक कर डालते हैं. कभी-कभार ऐसा भी होता है कि महज़ अनुमान के आधार पर ये लोग ऐसा कुछ लिख और प्रकाशित कर देते हैं जो मिथ्या होता है, और यदा-कदा यह भी होता है कि ये लोग जो लिखते हैं वो होता तो सही है लेकिन सितारे अपने हितों की रक्षा करते हुए उसका खण्डन कर डालते हैं. जब तक सही बात सामने आती है, जिसका जो फायदा नुकसान होना होता है, हो चुका होता है. 

पिछले कुछ समय से इस आशय की ख़बरें और अफ़वाहें चलन में थीं कि यह 47 वर्षीया अभिनेत्री, निर्माता और निर्देशक गर्भवती हैं. वैसे तो छोटे और बड़े पर्दे की तारिकाओं को लेकर इस तरह की झूठी-सच्ची खबरों का फैलना कोई नई और चौंकाने वाली बात नहीं है. हमारे अपने देश में आए दिन किसी न किसी तारिका  को लेकर  इस तरह की ‘खबरें’ आम होती ही रहती हैं. एक दिन ख़बर आती है, दूसरे दिन उसका खण्डन आ जाता है और फिर कभी-कभार  यह भी होता है कि कुछ दिनों बाद हमें जानने को मिलता है कि जिस खबर का खण्डन किया गया था, असल में वह सच थी. जेनिफ़र एनिस्टन के गर्भवती होने वाली  इस  ख़बर का महत्व इस बात में नहीं है कि यह सच है या झूठ. यहां महत्व की बात  यह है कि जेनिफ़र एनिस्टन ने अपने एक सुलिखित और विचारोत्तेजक लेख में पापाराज़ी के इस काम और सार्वजनिक  जीवन में काम  करने  वाली स्त्रियों के अस्तित्व को लेकर  कुछ गम्भीर सवाल  उठाये हैं. हफ़िंगटन पोस्ट में ‘फॉर द रिकॉर्ड’ शीर्षक से प्रकाशित इस लेख में जेनिफ़र ने कहा है कि आम  तौर पर वे अफवाहों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं करती हैं. लेकिन अब वे पत्रकारिता के नाम पर आए दिन की जा रही स्त्री देह की इस क्रूर पड़ताल से आजिज़ आकर यह प्रतिक्रिया दे रही हैं. उन्होंने कहा कि अब तक तो मैं मानती रही थी कि ये टैब्लॉइड कॉमिक बुक्स की तरह होते हैं, जिन्हें गम्भीरता से नहीं लिया जाना चाहिए, लेकिन अब मैं खुद को नहीं रोक पा रही हूं. इसलिए नहीं रोक पा रही हूं कि पत्रकारिता  के नाम दशकों से चल रहे स्त्री को एक वस्तु के रूप में सीमित कर डालने के इस क्रूर खेल का खुद मैंने अनुभव  किया है  और यह बहुत तेज़ सड़ांध मार रहा है. इससे यह भी  पता चलता है कि औरत के महत्व को हम कितना छोटा करके आंकते हैं.

अपने इस लेख में जेनिफ़र ने एक  बहुत महत्वपूर्ण बात यह कही है कि मेरी प्रजनन क्षमता में मीडिया की दिलचस्पी उस बड़ी यंत्रणा की तरफ इंगित करती है जो समाज में संतान रहित स्त्रियों को झेलनी पड़ती है. अपनी बात  को और साफ़ करते हुए उन्होंने लिखा है कि मीडिया अपनी जितनी ताकत यह बात उजागर करने पर खर्च कर रहा है कि मैं प्रैग्नेंट हूं या नहीं वह इस सोच की परिणति है कि कोई भी स्त्री, अगर वह विवाहिता है लेकिन उसके बच्चे  नहीं हैं तो फिर वह नाकामयाब, नाखुश और अधूरी है. एनिस्टन ने बलपूर्वक कहा है कि अपनी पूर्णता के लिए हमारा शादी शुदा या मां होना क़तई ज़रूरी नहीं है. यह तै करने का अधिकार पूरी तरह हमारा है कि हम किसमें और किस तरह खुश हैं.

एनिस्टन के इस लेख का जहां अधिकांश  सितारों ने समर्थन  किया है, पापाराज़ी की दुनिया के कुछ सक्रिय सदस्यों ने इससे अपनी असहमति भी व्यक्त की है. लेकिन इससे शायद ही कोई असहमत हो कि अपने इस लेख के माध्यम से एनिस्टन ने हमारे समय के कुछ बेहद ज़रूरी सवाल उठाए हैं. 

•••

जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 26 जुलाई, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, July 19, 2016

फ्रांस के राष्ट्रपति का महंगा केश-प्रेम

शायद पूरी दुनिया में ऐसा ही होता है. चुने जाने से पहले नेता सादगी की बातें करते हैं, अगर प्रतिपक्ष में होते हैं तो जो सत्ता में हैं उनकी फिज़ूलखर्ची की जी खोल कर आलोचना करते हैं, लेकिन जब वे खुद सत्तासीन हो जाते हैं तो जैसे कोई जादू की छड़ी घूमती है और पिछली बातें उन्हें याद ही नहीं रहतीं हैं. भारत में तो हम इस प्रवृत्ति के इतने अभ्यस्त हो चुके हैं कि अब ऐसा होना हमें न तो चौंकाता है और न व्यथित करता है. हममें से बहुत सारे  लोग यह भी मानते हैं कि कथनी और करनी का यह भेद औरों की तुलना में हम भारतीयों में अधिक है. लेकिन अब  सुदूर फ्रांस से जो ख़बर आई है उसने हमारे इस सोच को डगमगा दिया है. फ्रांस में सन 2012 में हुए राष्ट्रपति के चुनाव में फ्रांस्वां ओलांद विजयी रहे थे. उनसे पहले 2007 से 2012 तक वहां के राष्ट्रपति थे निकोलस सार्कोजी, जो अपनी खासी महंगी और विलासितापूर्ण जीवन शैली के लिए लगातार चर्चाओं में रहे थे. इनके खिलाफ़ अपने चुनाव अभियान में फ्रांस्वां ओलांद ने अपने सादे  जीवन का भरपूर यशोगान  किया था और खुद को मिस्टर नॉर्मल के रूप में जनता के सामने पेश किया था. जीत जाने के बाद उन्हें समाजवादी राष्ट्रपति ही कहा  भी गया. लेकिन अब उन्हीं के अंत:पुर से जो ख़बरें बाहर आई हैं उनसे उनकी कौशल पूर्वक निर्मित यह सादगीपूर्ण छवि पूरी तरह नष्ट हो गई है. 

फ्रांस के एक व्यंग्यात्मक साप्ताहिक अख़बार ले-कानार-एंशेने में यह बात उजागर हुई है कि राष्ट्रपति महोदय ने अपने थोड़े-से बचे बालों की साज-संवार  के लिए अनुबंध पर एक हेयर ड्रेसर रखा है. इस हेयर ड्रेसर का नाम ओलिवर बी. बताया गया है. इस हेयर ड्रेसर को प्रतिमाह दस हज़ार यूरो (भारतीय मुद्रा में करीब 7.15 लाख रुपये) के अनुबंध  पर पूरे पांच साल के लिए रखा गया है. यानि इसे  पांच बरस में छह लाख यूरो का  भुगतान होगा. इन ओलिवर  महाशय को इस नियमित वेतन के अलावा मकान, वितीय सहायताएं  और अन्य परिवार विषयक सुख सुविधाएं भी देय हैं. दस हज़ार यूरो प्रतिमाह की यह राशि कितनी बड़ी है इसे समझने के लिए यह जान लेना काफी होगा कि इन राष्ट्रपति महोदय के काबिना सदस्यों को 9,940 यूरो का वेतन देय होता है और खुद राष्ट्रपति महोदय को 14,910 यूरो प्रतिमाह वेतन के रूप में मिलते हैं. अनुबंध के अनुसार ओलिवर को चौबीसों घण्टे राष्ट्रपति महोदय की सेवा में हाज़िर रहना होता है.  वे राष्ट्रपति जी की विदेश यात्राओं में भी उनके साथ जाते हैं. हर सुबह, हर भाषण से पहले और जब भी राष्ट्रपति जी चाहें ओलिवर को उनकी सेवा में उपस्थित होना होता है. अनुबंध में यह भी उल्लिखित है कि वे अपने काम आदि के बारे में और उस दौरान प्राप्त सूचनाओं को लेकर  पूरी गोपनीयता बरतेंगे. ओलिवर की सेवा शर्तें  इतनी कड़ी है कि उन्हें अपनी संतान के जन्म के अवसर पर भी छुट्टी नहीं मिल सकी.

कोई व्यक्ति, भले ही वह किसी देश का  राष्ट्रपति ही क्यों न हो, अपनी साज सज्जा कैसे करे, यह उसका निजी मामला है और इस पर कोई बहस होनी नहीं चाहिए. लेकिन फ्रांस्वां ओलांद का अपने बालों से यह मोह चर्चा का विषय इसलिए बन गया कि ओलिवर बी. की यह  नियुक्ति सरकारी खर्चे पर की गई है. और जब खुद सरकार ने इस बात का पुष्टि कर दी है तो इस बात को सनसनीखेज पत्रकारिता या विरोधियों की दुर्भावना का नाम भी नहीं दिया जा सकता.

इधर फ्रांस्वां ओलांद के नेतृत्व वाली सरकार अर्थव्यवस्था में तथाकथित सुधार के लिए उठाए गए बहुत सारे कदमों के लिए न केवल निन्दा वरन हिंसक प्रदर्शनों तक का सामना कर रही है, और  इनकी  वजह से उनकी लोकप्रियता का ग्राफ इतना नीचे गिर चुका है कि उन्हें फ्रांस का अब  तक का सबसे अलोकप्रिय राष्ट्रपति कहा जाने लगा है. अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकने के लिए वे कम्पनियों के लिए अपने कर्मचारियों को दी जाने वाली  सुविधाओं में कटौती और उन्हें नौकरी से निकालने की राह सुगम करते जा रहे हैं. ऐसे में स्वाभाविक ही है कि अपने  धन  का ऐसा दुरुपयोग  जनता को अप्रिय लगा है. सोशल मीडिया पर चटखारे लेकर इसकी चर्चाएं हो रही हैं.  लोग यह भी नहीं भूल सके हैं कि पूर्व  राष्ट्रपति निकोलस सार्कोजी ने अपनी सेवा में एक मेकअप आर्टिस्ट तैनात कर रखा था जिसे हर माह आठ हज़ार यूरो का भुगतान  किया जाता था. जनता पूछ रही है कि दोनों में क्या अंतर है?

इस तरह की ख़बरों से लगता है कि जनता की  गाढ़ी कमाई के पैसों को पानी की तरह बहाने के काम में किसी भी देश के नेता पीछे नहीं रहना चाहते हैं.
•••

जयपुर  से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 19 जुलाई, 2016 को चर्चा में फ्रांस के राष्ट्रपति का महंगा केश-प्रेम शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 


Tuesday, July 12, 2016

सिटी ऑफ कल्चर का जश्न एक अनूठे अन्दाज़ में

हाल में इंग्लैण्ड के पूर्वी यॉर्कशायर के किंग्स्टन शहर  में एक अनूठा आयोजन हुआ. अमरीका के एक जाने-माने छायाकार स्पेंसर ट्यूनिक ने इस किंग्स्टन शहर की  फेरेन्स आर्ट गैलेरी के बुलावे पर करीब बत्तीस सौ लोगों का एक इंस्टॉलेशन निर्मित करवाया. फेरेन्स गैलेरी वालों ने यह आयोजन अगले बरस हल शहर को यूके सिटी ऑफ कल्चर के रूप में  नामित किये जाने के उत्सव के एक अंग के रूप में किया था. न्यूयॉर्क के मिडलटाउन के एक यहूदी परिवार में जन्मे फोटोग्राफर स्पेंसर ट्यूनिक की ख्याति ऐसे ही विशालकाय इंस्टॉलेशन को शूट करने के लिए है. वे पिछले बीस बरसों में सिडनी के ऑपेरा हाउस, मॉण्ट्रियल के प्लेस डेस आर्ट्स, मेक्सिको सिटी, विएना के एरनेस्ट हैप्पल स्टेडियम और जर्मनी के म्यूनिख शहर जैसे अनेक बड़े सांस्कृतिक केन्द्रों पर ऐसे नब्बे से ज़्यादा आर्ट इंस्टॉलेशन बनवा और उन्हें शूट कर  चुके हैं.

स्पेंसर ट्यूनिक के इस इंस्टॉलेशन  के लिए काफी पहले से तैयारियां शुरु कर दी गई थीं और नागरिकों से अनुरोध किया गया था कि वे इसके लिए पंजीकरण करा लें. इस इंस्टॉलेशन के लिए स्पेंसर को ढाई से तीन हज़ार के बीच लोगों  की ज़रूरत थी लेकिन नागरिकों का  उत्साह इतना सघन था कि बत्तीस सौ नागरिक निर्धारित स्थल पर पहुंच गए. हल के सिटी सेण्टर को जाने वाले सारे रास्ते आधी रात से अगली सुबह दस बजे तक के लिए बन्द कर दिये गए थे. नागरिक गण बताए गए स्थान पर सुबह तीन बजे से एकत्रित होने लगे थे. उनमें युवा भी थे और वृद्ध भी. सशक्त भी और अशक्त भी. तेज़-तेज़ चल कर आने वाले भी तो बैसाखियों के सहारे बमुश्क़िल आने वाले या व्हील चेयर्स पर बिठा कर लाये जाने वाले भी. और अब इस इंस्टॉलेशन की खास बात बता दूं. इस इंस्टॉलेशन में सारे नागरिकों को निर्वस्त्र होकर हिस्सा लेना था. उनकी सहायता के लिए बहुत सारे अवैतनिक स्वयंसेवक भी मौज़ूद थे जिन्होंने उन्हें निर्वस्त्र होने में और फिर उनकी देहों को रंगने में मदद की. इन स्वयंसेवकों को ‘न्यूड रेंगलर्स’  अर्थात निर्वस्त्र लड़ाकों का नाम दिया गया था. करीब तीन घण्टे चले इस फोटो शूट के लिए इन तीन हज़ार दो सौ लोगों को अपने तमाम वस्त्रादि उतार कर अपनी देह को चार अलग-अलग शेड्स वाले नीले रंग से रँगना था. इन चार शेड्स का चयन फेरेन्स की आर्ट गैलेरी के संग्रहालय की  कृतियों के आधार पर किया गया था.

जहां तक भाग लेने वालों की देह को रंगने का सवाल है, आयोजकों ने इसके पीछे दो मक़सद बताए. एक तो यह कि नीला रंग समुद्र का प्रतीक है और यह आयोजन वहां के समुद्रीय इतिहास की स्मृति में है और  इसीलिए ये  इंस्टॉलेशन किंग्स्टन शहर के समुद्रीय  इतिहास के लिहाज़ से महत्वपूर्ण एकाधिक स्थलों पर किए गए थे,  और दूसरी बात यह कि भाग लेने वालों को यह एहसास होगा कि उनके शरीर पर कोई आवरण तो है, भले ही वह रंग का ही क्यों न हो. यानि इस तरह उन्हें अपने संकोच से निज़ात मिल सकेगी. लेकिन जिन लोगों ने इस इंस्टॉलेशन में भाग लिया, उनमें से अधिकांश की प्रतिक्रियाओं से लगा कि उनके मन में संकोच जैसा कोई भाव आया ही नहीं. उदाहरण के लिए इस समूह में शामिल अस्सी वर्षीय कला संग्राहक स्टीफेन जानसेन को लीजिए जो चौंसठ बरस की उम्र से इस तरह के आयोजनों का हिस्सा बन रहे हैं और अब तक बीस बार उनमें शिरकत कर चुके हैं. उन्हें नग्नता की अपेक्षा शीत का भय था, लेकिन फिर उन्हें यह भी  याद आया कि 2008 में डब्लिन में तो मौसम बहुत ज़्यादा सर्द था.   

इतने बड़े जन समूह को देख स्पेंसर स्वाभाविक रूप से आह्लादित थे. उन्हें लगा जैसे एक विशालकाय किंतु नाज़ुक-लचीली  नीली देह और कंक्रीट की दुनिया आमने-सामने है और इसमें वे एक दिलचस्प गति देख रहे थे. इस मंज़र की एक और व्याख्या उन्होंने इस तरह की कि नीले जन समूह में उन्हें मौसम के बदलाव के कारण आया समुद्री ज्वार समुद्र दिखाई दिया. उन्हें लगा जैसे इन देहों के माध्यम से पूरी मानवता ही शहर की गलियों में प्रवाहित हो रही है.  
    
इन इस्टॉलेशंस पर आधारित स्पेंसर ट्यूनिक के छायाचित्रों की प्रदर्शनी सन 2017 में उस वक़्त आयोजित की जाएगी जब इस हल शहर को यूके सिटी ऑफ कल्चर घोषित करने के उत्सव आयोजित होंगे. यूके में हर चौथे साल किसी शहर को सिटी ऑफ कल्चर घोषित किया जाता है. आयोजकों का खयाल है कि इस इंस्टॉलेशन  के माध्यम से वे अपने शहर के हज़ारों लोगों को कलाकृति का हिस्सा बनने का भी अवसर दे रहे हैं. इंस्टॉलेशन में भाग लेने वले नागरिकों को हालांकि कोई पारिश्रमिक देय नहीं है, उनमें से जिनकी वय 18 से अधिक है उन्हें इस कृति का एक सीमित संस्करण वाला छायाचित्र प्रदान किया जाएगा.

इस इंस्टॉलेशन की जो छवियां अभी सामने आई हैं वे निस्संदेह स्पेंसर के काम के प्रति गहरी उत्कंठा जगाती हैं.
▪▪▪  
जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 12 जुलाई, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.     

Tuesday, July 5, 2016

साथ बैठने वाला प्रभावित करता है आपकी ड्राइविंग

शायद इस बात से थोड़ा सुकून मिले कि युवाओं द्वारा बेहद तेज़ गति से वाहन चलाकर दुर्घटनाएं  करने की समस्या से अकेले हम भारतवासी ही त्रस्त नहीं हैं. अगर अमरीका के एक अन्वेषण  केन्द्र की रपट पर भरोसा करें तो वहां युवा  लोगों की  मृत्यु का सबसे बड़ा कारण ट्रैफिक दुर्घटनाएं ही हैं, और अकेले एक बरस (2014) में वहां इन दुर्घटनाओं ने 2600 किशोरों को मौत के घाट उतार दिया. जहां इस बात पर संतोष किया जा सकता है कि सतत प्रयासों से 2005 से 2014 तक आते-आते इन प्राणघातक दुर्घटनाओं की संख्या में पचास प्रतिशत की कमी लाई जा सकी है, वहीं इस बात पर चिंता  होना भी स्वाभाविक है कि 2014 से 2015 तक आते-आते इनमें दस प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है.

लेकिन जैसी अमरीका की रिवायत है वहां इंसान  की जान को वाकई कीमती समझा जाता है और उसे बचाने के हर मुमकिन प्रयास किये जाते हैं. अमरीका में, बावज़ूद इस बात के कि हर राज्य के अपने नियम-कानून हैं, सामान्यत: ड्राइविंग लाइसेंस मिलना बहुत आसान नहीं माना जाता है. लेकिन अब इन नियमों को और कठोर बनाने के लिए सोचा जाने लगा है. इसी के साथ वहां के विश्वविद्यालय और शोध संस्थान लगातार शोध करते हुए दुर्घटनाओं के कारणों और उनसे बचाव के तौर-तरीकों पर गहन और प्रामाणिक शोध करते रहते हैं और इस तरह की शोधों के परिणामों को नई नीतियों के निर्माण के वक़्त समुचित अहमियत भी दी जाती है. अब इसी बात को लीजिए कि वहां की एक काउण्टी में 2004 में हुई एक सड़क दुर्घटना में एक हाईस्कूल की फुटबॉल टीम के तीन खिलाड़ियों की मृत्यु के बाद से शुरु हुआ शोध का सिलसिला अब तक ज़ारी है. तब नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ ने लेज़र उपकरणों  और वीडियो कैमरों से लैस शोधकर्ताओं की कई टीमों  को भेजकर यह पड़ताल शुरु की थी कि किसी युवा के साथ अगर गाड़ी में कोई अन्य व्यक्ति भी हो तो उसकी ड्राइविंग पर उसकी उपस्थित का क्या प्रभाव होता है. तब शोधकर्ताओं ने पाया कि अगर गाड़ी में युवा लोग सवार हों तो दुर्घटना की आशंकाएं अधिक होती हैं.

और अब उसी शोध को आगे बढ़ाते हुए इसमें ड्राइविंग सिम्यलेशंस और ब्रेन स्कैन्स  को भी  शामिल कर लिया गया है. इस शोध में एक प्रयोग यह किया गया कि सोलह से अठारह बरस के आयु समूह के ऐसे कुछ युवाओं से जिन्हें हाल ही में डाइविंग लाइसेंस मिला था, कहा गया कि उनमें से हरेक के साथ एक और युवा को बिठाकर ड्राइविंग सिम्यलेशन किया जाएगा. और यहीं एक छल किया गया. उनके साथ जिस युवा को बिठाया गया वो खास तौर पर इस काम के लिए प्रशिक्षित था और एक स्क्रिप्ट के तहत बर्ताव कर रहा था. ऐसे दो तरह के युवाओं को इन नए ड्राइवर युवाओं के साथ बिठाया गया. एक वर्ग का युवा कुछ देर से पहुंचता है और आते ही कहता है कि मुझे देर हो जाने की वजह यह है कि मैं धीमे ड्राइव करता हूं, और फिर रास्ते में हर पीली बत्ती पर भी गति धीमी करता रहा. दूसरे वर्ग का  युवा भी इसी तरह देर से आया, लेकिन आते ही बोला कि देरी के लिए माफी चाहता हूं. आम तौर पर तो मैं काफी तेज़ ड्राइव करता हूं लेकिन आज मुझे बहुत सारी लाल बत्तियों पर रुकना पड़ा. इसके बाद ये लोग अपने-अपने साथियों के साथ सिम्युलेटर्स  पर बैठते हैं. नया आया युवा ड्राइव करता है और जो पहले वाला और वास्तविक युवा ड्राइवर  है वह उसके साथी के रूप बैठ जाता है. बाद में आए दोनों युवा अपनी-अपनी भूमिकाओं के अनुरूप यानि एक संयत तरह से और दूसरा आक्रामक तरह से ड्राइव करते हैं. और इसके बाद असल युवा ड्राइवरों  को ड्राइव करने को कहा जाता है.


जो परिणाम सामने आते हैं वे बहुत अहम हैं. आक्रामक युवा के साथ जो युवक बैठा था, जब वो वाहन चलाता है तो खुद भी आक्रामक और ग़ैर ज़िम्मेदार हो जाता है. इसके विपरीत, संयत युवा के साथ जो युवक बैठा था जब उसे खुद गाड़ी चलानी होती है तो उसका बर्ताव संयत ही रहता है. इससे यह निष्कर्ष निकाला गया कि ड्राइव करने वाले के साथ जो व्यक्ति बैठता  है उसका असर ड्राइव करने वाले पर ज़रूर पड़ता है. और इससे संग़ति को लेकर हमारे यहां प्रचलित बहुत सारे कथनों को भी बल मिलता है. अमरीका में इस तरह के अनेक प्रयोग किये गए हैं और उन सभी के नतीजे करीब-करीब एक जैसे हैं. इन नतीज़ों के आधार पर अब वहां ड्राइविंग को और अधिक सुरक्षित और ज़िम्मेदारीपूर्ण बनाने के लिए विभिन्न कार्ययोजनाएं तैयार की जा रही हैं.

आशा की जानी चाहिए कि हमारे यहां भी वक्तव्यों और घोषणाओं के पार जाकर कुछ ठोस और सकारात्मक किया जाएगा.

▪▪▪
जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 05 जुलाई, 2016 को इसी शीर्षक से प्र्काशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, June 28, 2016

मॉडर्न आर्ट यानि आधुनिक कला को लेकर इतने सारे लतीफे प्रचलन में हैं कि हममें से शायद ही कोई हो जिसे तुरंत इस तरह के कुछ रोचक प्रसंग याद न आ जाएं! कहना  अनावश्यक है कि ये सब शरारती दिमागों की उपज हैं और यथार्थ से इनका शायद ही कोई सम्बन्ध हो. लेकिन हाल में अमरीका के सैन फ्रांसिस्को शहर में अवस्थित विख्यात आधुनिक कला संग्रहालय (म्यूज़ियम ऑफ मॉडर्न आर्ट) में जो घटित हुआ उसने यह सोचने को मज़बूर कर दिया है कि क्या पता इन लतीफों में यथार्थ का भी कुछ पुट हो. हुआ यह कि टी जे खयातैन  नामक एक सत्रह वर्षीय किशोर अपने कुछ साथियों के साथ इस संग्रहालय को देखने गया. 1935 में स्थापित इस  संग्रहालय  के एक लाख सत्तर हज़ार वर्गफीट क्षेत्र में पेण्टिंग, स्थापत्य, फोटोग्राफी, मूर्तिकला, डिज़ाइन और मीडिया आर्ट की तैतीस हज़ार कृतियां प्रदर्शित हैं और  और यह न सिर्फ अमरीका के सबसे बड़े संग्रहालयों में से एक है, आधुनिक और समकालीन कला के लिहाज़ से इसे दुनिया के बेहतरीन संग्रहालयों में शुमार किया जाता है. 

तो इस टी जे खयातैन को संग्रहालय की बहुत सारी कलाकृतियों ने बेहद प्रभावित किया, लेकिन  कुछ कलाकृतियां उसे बेहद सामान्य भी लगीं. जैसे जब उसने एक भूरे-से कम्बल पर एक स्टफ्ड पशु जैसी कलाकृति को देखा तो उसके जेह्न में यह सवाल उठा कि आखिर इसमें कलात्मक क्या है? उसने अपने आस-पास के अन्य कलाप्रेमियों से भी जानना चाहा कि क्या वो कृति उन्हें भी उतनी ही सामान्य लग रही है? लेकिन यह पूछते हुए उसके मन में यह बात भी आई कि जब कलाप्रेमी किसी संग्रहालय में जाते हैं तो वे जो कुछ भी उस संग्रहालय के परिवेश के बीच देखते हैं उसी में उन्हें कला के दर्शन होने लगते हैं और वे उसकी कलात्मक व्याख्या भी करने लगते हैं.

टी जे खयातैन के शरारती दिमाग में विचार आया कि क्यों न इस बात को आजमा कर ही देख लिया जाए! पता चल जाएगा कि आधुनिक कला की हक़ीक़त क्या है. इस संग्रहालय में प्रदर्शित हर कृति महान है या यहां कुछ भी प्रदर्शित कर दो तो उसे महान मान लिया जाता है.  तो उसने किया यह कि संग्रहालय के चमकीले फर्श पर अपना ऐनक रख दिया और फिर थोड़ा दूर खड़ा होकर वहां आने-जाने वालों की प्रतिक्रियाएं देखने लगा. उसके साथ उसके दोस्त भी थे. उन लोगों ने पाया कि कुछ ही क्षणों  में ‘कलाप्रेमी’ उस ‘कलाकृति’ के इर्द गिर्द जुटने लगे. वे बहुत तल्लीनता और बारीकी से उसका अवलोकन कर रहे थे, उसकी गम्भीर व्याख्याएं कर रहे थे, और कुछ तो अलग-अलग कोणों से उसकी छवियां भी अपने कैमरों में कैद कर रहे थे. कुछ दर्शकों ने तो उस मामूली ऐनक को उत्तर आधुनिक कला का मास्टरपीस तक घोषित कर दिया. टी जे खयातैन ने बाद में कहा कि मुझे लगा जैसे वे दर्शक गण उस ऐनक को वर्तमान संस्कृति के मूक होते जाने की अभिव्यक्ति की तरह देख रहे थे या यह मान रहे थे कि इस कृति के माध्यम  से कलाकार ने ज़िन्दगी को चश्मे के शीशों  के माध्यम से देखना चाहा है. खयातैन को लगा जैसे दर्शक मायोपिया (निकट दृष्टि दोष) या रियल आईज़ (असल नेत्र) जैसे शीर्षक वाली किसी कृति का अवलोकन कर रहे हैं.

इस किशोर ने संग्रहालय के फर्श पर रखे इस ऐनक और उसे सराहते दर्शकों की छवि को अपने कैमरे में कैद कर जब ट्विटर पर पोस्ट किया तो वो छवि फौरन ही वायरल हो गई और सिर्फ एक दिन में उसे चालीस हज़ार  लोगों ने साझा कर डाला. और जैसे इतना ही पर्याप्त न हो, उसे ट्विटर मोमेण्ट में भी शुमार कर लिया गया. लेकिन इस सबके बावज़ूद, यह किशोर टी जे खयातैन आधुनिक कला का प्रशंसक है. उसका कहना है कि हो सकता है कभी-कभी आधुनिक कला को लेकर कोई चुहल हो जाए, लेकिन अंतत: तो यह हमारी सर्जनात्मकता को अभिव्यक्ति देने का एक सशक्त माध्यम है. हो सकता है कुछ को इसमें मज़ाक नज़र आए, लेकिन बहुतों को इसमें आध्यात्मिकता के भी तो दर्शन होते हैं. मॉडर्न आर्ट के बारे में उसके इस निष्कर्ष से शायद ही कोई असहमत हो कि यह खुले और कल्पनाशील मन वालों के लिए आनंदप्रद है.

और यहां तक इस शरारत का सवाल है, यह याद कर लेना भी प्रासंगिक होगा कि ऐसी शरारतें होती ही रहती हैं. सन 2014 में किसी ने ऐसी ही शरारत रेस्तरां समीक्षकों को मैक्डॉनल्ड के उत्पाद  परोस कर भी की थी.  इन्हें बहुत गम्भीरता से लेने की बजाय इनका लुत्फ लेकर भुला दिया जाना चाहिए.


▪▪▪  
जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 28 जून, 2016 को जनाब, यह है मॉडर्न आर्ट का मास्टरपीस शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.  

Tuesday, June 21, 2016

फ्रांस से शुरु हुआ नई तरह का जन-आन्दोलन

इस बरस मार्च के आखिरी दिन से फ्रांस की राजधानी पेरिस से एक नई तरह के आन्दोलन का सूत्रपात हुआ है. हिन्दी में इस आन्दोलन को कहा जा सकता है ‘जागो  सारी रात!’ और जैसा कि नाम से ही ज़ाहिर हो जाता है, हर शाम छह बजते-बजते लोग पेरिस के रिपब्लिक चौक में इकट्ठा होते हैं और विभिन्न मुद्दों पर अपनी बात कहते हैं. पृष्ठभूमि में यह बात कि   पेरिस  में फरवरी माह में कोई तीन चार सौ लोग मिले और यह विचार करने लगे कि ऐसा क्या किया जाए कि सरकार थोड़े दबाव में आए. और तब एक विचार यह भी आया कि क्यों न लोग एक जगह एकत्रित हों और घर जाएं ही नहीं. बस इसी विचार से जन्मा यह आन्दोलन.   इसकी  शुरुआत हुई फ्रांस के जटिल  श्रम कानून को शिथिल बनाने वाले वहां की वर्तमान सरकार के तथाकथित सुधारवादी कदमों का विरोध करने के लिए लोगों के इकट्ठा होने से. पहला अनुभव बहुत दिलचस्प रहा. लोग पेरिस के उस चौक में इकट्ठा होने ही लगे थे  कि मूसलाधार बारिश होने लगी. इसके बावज़ूद लोग आते रहे और डटे रहे. काफी देर बाद बारिश रुकी, लेकिन लोग फिर भी वहां से गए नहीं. और फिर हर रोज़ लोग वहां जुटने लगे. तब इस आन्दोलन का कोई सुविचारित स्वरूप निर्धारित नहीं  था. चौक में अनगिनत लोग सिर्फ इस आस में इकट्ठा हो गए थे कि सरकार उनकी मांगों की तरफ ध्यान देगी. न आन्दोलन का कोई नेता था और न कोई रूपरेखा. जिसकी जो मर्ज़ी में आए, बोलने लगता था. कुछ अराजक तत्वों के घुस आने की वजह से यदा-कदा यह जमावड़ा छोटी-मोटी हिंसा का शिकार भी हुआ, लेकिन आहिस्ता-आहिस्ता एक व्यवस्था  कायम होने लगी. लोग ही एक दूसरे की मदद करने लगे, संसाधन जुटाने लगे और एक आत्मीयतापूर्ण लेकिन प्रतिरोधक मेले का–सा माहौल बनने लगा.  वक्ताओं के लिए स्टैण्ड आ गया, छोटे-मोटे टैण्ट लगा दिये गए और साधारण काम चलाऊ जलपान की व्यवस्था भी हो गई. कुछ समितियां भी बना ली गई जो समाज और संविधान की नई रूपरेखाओं पर विचार करने लगी हैं. इतना ही नहीं, एक गायक समूह भी तैयार हो गया जो क्रांतिकारी गाने गाता है, और कुछ लोग नारे कविताएं भी रचने लगे हैं. ऐसा लगता है जैसे एक नया लघु समाज उभरने लगा है.


और अब जब इस आन्दोलन  चलते हुए तीन माह से ज़्यादा बीत चुके हैं, इसकी निरंतरता शेष  दुनिया का भी  ध्यान आकर्षित करने लगी है. इस आन्दोलन का बगैर किसी नेतृत्व के इतने समय तक चल जाना यह साबित करता है कि फ्रांस की जनता का अपने राजनीतिज्ञों से मोहभंग  हो चुका है और वहां की वाम सरकार यह साबित करने में नाकामयाब रही है कि वह शक्तिशाली वित्तीय संस्थाओं के दबाब से मुक्त है. लोग  अपने देश के शासन  से भी नाखुश हैं. उनमें से अनेक को लगता है कि वहां आपातकाल जैसे हालात हैं. नागरिकों पर नज़र रखने वाले नए कानून, न्याय व्यवस्था में किए गए बदलाव और सुरक्षा विषयक धर-  पकड़ का बढ़ते जाना लोगों को आहत कर रहा है.  अब यह आन्दोलन पेरिस और फ्रांस की सीमाओं से बाहर निकलकर बेल्जियम, जर्मनी और स्पेन के अस्सी  से ज़्यादा शहरों में फैल चुका है. जर्मनी से बाहर के देशों में इसी तरह के आन्दोलन के माध्यम से सरकारी बजट में कटौती, वैश्वीकरण, बढ़ती जा रही असमानता, निजीकरण और यूरोप महाद्वीप की कठोर प्रवासी  विरोधी नीतियों का विरोध  हो रहा है. किसी ने बहुत सही टिप्पणी की है कि इस जन-प्रतिरोध की शुरुआत पेरिस में नहीं हुई है और न यह फ्रांस तक सीमित रहने वाला है. यह आन्दोलन सीमा रहित है, देशों की परिधियों से मुक्त है और  जो भी इससे जुड़ना चाहते हैं उन सबका स्वागत करता है.

इस आन्दोलन का खुद-ब-खुद शुरु होना और इतने समय तक न सिर्फ जारी रहना बल्कि मज़बूत भी होते जाना इस बात की भी गवाही देता है कि अगर दुनिया में कहीं वास्तविक बदलाव आया तो उसके वाहक नागरिक गण ही होंगे. बहुत दिलचस्प  बात यह है कि अभी तक इस आन्दोलन का न  तो कोई नेता है और किसी संगठन का बैनर यहां दिखाई देता है. यह बात खुद फ्रांस वासियों को चकित करती है. इस स्वत: स्फूर्त आन्दोलन की एक महती कामयाबी यह भी है कि फ्रांस सरकार इसका नोटिस लेने को विवश हुई है और उसने युवा आन्दोलनकारियों के तात्कालिक तुष्टिकरण के लिए चार पाँच सौ मिलियन यूरो की विद्यार्थी सहायता की घोषणा कर दी है. एक सरकारी विज्ञप्ति के अनुसार इस राशि से रोज़गार की तलाश कर रहे युवा स्नातकों  को अनुदान और  अन्य काम सीखने वालों व विद्यार्थियों को सहायता दी जा सकेगी.      


▪▪▪  
जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 21 जून, 2016 को इसी शीर्षक  से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.