Tuesday, August 25, 2015

ये तेरा घर, ये मेरा घर... ये घर बहुत हसीन है

दसेक बरस पहले अमरीका प्रवास के दौरान मैं इस बात से चौंका था कि आत्मीय परिवार की एक युवती उसी शहर में अपने मां-बाप से अलग घर लेकर रह रही थी. शायद मेरे लिए यह बात कल्पना से परे थी कि कोई अविवाहित लड़की उसी शहर में अपने मां-बाप का घर होते हुए भी कहीं अन्यत्र रहे. लेकिन हाल ही में जब अपने ही देश के एक शहर बैंगलोर में यह बात जानी कि यहां की बहुत सारी  अविवाहित लड़कियां इसी शहर में अनेक वजहों से अपने मां-बाप के घरों में न रहकर कहीं और रहती हैं तो मैं उस तरह चौंका तो नहीं, लेकिन सोचने को ज़रूर विवश हुआ कि हमारा परिवेश किस तेज़ी से बदल रहा है.

सामान्यत: माना जाता है कि उत्तर भारत की तुलना में दक्षिण भारत अधिक पारम्परिक है. इस बात को किसी मूल्य निर्णय के तौर पर न लिया जाए. लेकिन इसके बावज़ूद यहां बहुत सारी लड़कियां अलग-अलग कारणों से अपने मां-बाप के घर से अलग घर लेकर रहती हैं. पहला कारण जो मुझे समझ में आता है वो तो यही है कि आजकल कामकाजी लड़कियों की संख्या बहुत तेज़ी  से बढ़ती जा रही है और अगर मां-बाप के घर से कामकाज का ठिकाना बहुत दूर हो तो बैंगलोर जैसे भागते-दौड़ते शहर के अस्त व्यस्त ट्रैफिक से जूझने की मुसीबत का सबसे आसान इलाज यही हो सकता है कि कार्य स्थल के नज़दीक घर लेकर रहा जाए. चाहें तो इसे परम्परा या संस्कार पर सुविधा की जीत भी कह सकते हैं. इसी के साथ यह बात भी जोड़ी जा सकती है कि आजकल नौकरी और कामकाज के तौर तरीके भी बहुत तेज़ी से बदल रहे हैं. काम के घण्टे बढ़ते और समय अनियमित होता जा रहा है. कभी आप अल्ल सुबह काम पर जाते हैं तो कभी  बहुत देर रात गए लौटते हैं. ज़ाहिर  है कि इससे घर के और लोगों  का जीवन क्रम भी प्रतिकूल रूप से प्रभावित होता है. ऐसे में अगर संवेदनशील बेटियां यह तै करती हैं कि वे अलग घर लेकर रहें तो उनकी भावनाओं को समझा जा सकता है और सराहा भी जाना चाहिए.  

तीसरी बात जो इस सन्दर्भ में ध्यान में आती है वो है हमारे  सोच में आ रहा बदलाव. जब आप किसी परिवार में रहते हैं तो एक–दूसरे का खयाल रखते हुए बहुत सारे समझौते भी करते चलते हैं. मसलन, मुझे जो खाने की इच्छा है उसे मैं यह सोच कर दबा लेता हूं कि मेरे घर वालों को अच्छा नहीं लगेगा.  यह एक उदाहरण है. ऐसी अन्य बहुत सारी बातें भी हैं. लेकिन अब अपनी पसन्द नापसन्द को लेकर हम आसानी से कोई समझौता नहीं करना चाहते. मन चाहा खाना-पीना और मनचाहा पहनना ही नहीं चाहते, मनचाही तरह से अपनी ज़िन्दगी को जीना भी चाहते हैं.  अपनी निजी स्पेस चाहते हैं.  इस सोच के विकास में शिक्षा, आर्थिक स्वावलम्बन, परिवेश, मीडिया – सबकी अपनी-अपनी भूमिका है.

यहीं एक विषयांतर कर लूं. हाल ही में मुंबई की एक ई हेल्थकेयर कम्पनी द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण के जो आंकड़े सामने आए हैं वे भी प्रकारांतर से मेरी इसी बात की पुष्टि करते हैं. भारत के आठ महानगरों और बारह  शहरों के पन्द्रह हज़ार किशोरों  (13-19) पर किए गए इस सर्वेक्षण के अनुसार लगभग तीस प्रतिशत लड़के और अठारह प्रतिशत लड़कियां बीस साल की उम्र  तक पहुंचने से पहले ही शारीरिक सम्पर्क बना चुके होते हैं. और इसी सर्वेक्षण के अनुसार  लड़के औसतन साढे  पन्द्रह बरस की और लड़कियां साढे सोलह बरस की उम्र तक आने से पहले पहला शारीरिक सम्पर्क कर चुकते हैं. यहीं इस बात की तरफ भी ध्यान दिलाता चलूं कि कुछ समय पहले हुए इसी तरह के सर्वेक्षणों में यह उम्र इतनी कम नहीं हुआ करती थी. यानि अपनी देह को लेकर भी आज़ाद खयाली बढ़ती जा रही है. इस बात को भी ऊपर वाली बातों के साथ जोड़ कर देखा जाना ज़रूरी है.

मैं ध्यान इस बात की तरफ आकृष्ट करना चाहता हूं कि आज के किशोर और युवा अपनी तरह से अपनी जिन्दगी जीने के लिए अधिक से अधिक बेताब  होते जा रहे हैं. भले ही अपरिपक्व अवस्था में मनचाही करने के अपने ख़तरे कम न हों, उनमें यह सोच जड़ें जमाने लगा है कि हम प्रयोग करेंगे, और अगर गलत हुए तो उसका मोल भी चुकाएंगे. इस बात पर बहुत लम्बी बहस हो सकती है कि यह कितना उचित और कितना अनुचित है, लेकिन एक यथार्थ यह भी है कि आप चाहें न चाहें, ऐसा हो रहा है और आने वाले समय में और अधिक होगा. अब देखने की बात यह है कि अपने परिवेश में आ रहे इन बदलावों को हम किस तरह लेते हैं और अगर इनमें कोई खतरे हैं तो उनका मुकाबला किस सूझ बूझ के साथ करते  हैं.

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जयपुर  से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 25 अगस्त, 2015 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Wednesday, August 19, 2015

मरने का इरादा और जीने की तमन्ना

आम तौर पर चिकित्सकों को, चाहे वे किसी भी उपचार पद्धति का अनुसरण करते हों, जीवन रक्षक माना जाता है और इसी नाते समाज उनका औरों से अधिक सम्मान भी करता है, लेकिन इस दुनिया की बहुत सारी विचित्रताओं में से एक यह भी है कि चिकित्सकों की इसी बिरादरी के एक सदस्य की पहचान डॉ डेथ के रूप में है. कौन है यह व्यक्ति और क्यों इसकी इतनी चर्चा है आजकल? ऑस्ट्रेलिया के डॉ फिलिप निश्के को लम्बे अर्से से उन लोगों में से एक के रूप में जाना जाता है जो इच्छा मृत्यु के अधिकार के पक्षधर हैं. इन्हीं डॉ निश्के ने एक नई मशीन की इजाद की है और विडम्बना की बात यह कि उसका नाम रखा है – डेस्टिनी, यानि नियति. यह मशीन आत्महत्या करने में सहायता करती है. तो डॉ निश्के हाल में एडिनबरा में आयोजित हुए फ्रिंज फेस्टिवल में एक विशेष शो के अंत में अपनी इस  मशीन का एक प्रदर्शन भी करने वाले थे, लेकिन पहले तो स्कॉटिश अधिकारियों ने यह कहा कि वे शो से पहले इस मशीन का निरीक्षण करेंगे, फिर डॉ निश्के के इस प्रदर्शन में कुछ तरमीम के निर्देश दिए और आखिरकार इसके प्रदर्शन पर पूरी ही रोक लगा दी.

एडिनबरा के फ्रिंज फेस्टिवल में डॉ निश्के जो  शो प्रस्तुत करने वाले थे, ‘डाइसिंग विद डॉ डेथ’ वह  फेस्टिवल के आयोजकों के अनुसार मृत्यु के अधिकार पर चल रही बहस का मजाकिया पहलू सिखाने के लिए था. यह शो स्टैण्ड अप और नरेटिव का मिला-जुला  रूप था और इसमें हंसी मजाक के अलावा आत्महत्या के बारे में काफी गम्भीर चर्चाएं भी प्रस्तावित थीं.  इन चर्चाओं के बाद क्लाइमेक्स के रूप में  डॉ निश्के अपनी मशीन  डेस्टिनी को भी दिखाने वाले थे. इस डेस्टिनी मशीन के एक छोर पर एक गैस कनस्तर जुड़ा हुआ है जिसमें नाइट्रोजन और कार्बन डाइ ऑक्साइड का प्राणघातक मिश्रण होता है. लेकिन अधिकारियों ने निर्देश दिया कि डॉ निश्के अपने प्रदर्शन के दौरान केवल नाइट्रोजन का प्रयोग  करें जो घातक नहीं होती है. बाद में इस आदेश को  बदला गया और उन्हें निर्देश दिया गया कि वे नाइट्रोजन का भी नहीं मात्र हवा का इस्तेमाल करें, और फिर इस आदेश को भी बदलते हुए कहा गया कि वे मशीन को निष्क्रिय ही करके रखें.  और इस सबके आखिर में पूरे शो को ही निरस्त  कर दिया गया.

स्वाभाविक है कि डॉ निश्के को यह बात नागवार गुज़री और उन्होंने अपनी तरह से इसकी आलोचना भी की. यहां इस बात को याद करना भी रोचक होगा कि इस शो को किसी और बिना पर नहीं, कम्प्रेस्ड गैस नियमों के तहत प्रतिबन्धित किया गया. हो सकता है अधिकारियों के ध्यान में भी यह बात रही हो कि किसी कानून का उल्लंघन न हो इस बात की पूरी परवाह करते हुए डॉ निश्के  ने अपने दर्शकों से इस आशय के एक डिस्क्लेमर पर पहले से हस्ताक्षर करवा लिए थे कि इस शो में दी गई जानकारी का इस्तेमाल वे किसी को आत्महत्या के लिए मदद देने के लिए नहीं करेंगे.

डॉ निश्के के बार में एक और जानकारी देना बहुत ज़रूरी  है. इन पर पिछले बरस पर्थ के एक व्यक्ति निजेल ब्रेली को आत्महत्या में मदद देने का आरोप  लगा था और इसके परिणामस्वरूप ऑस्ट्रेलिया के मेडिकल बोर्ड ने उनके प्रैक्टिस करने के अधिकार पर रोक लगा दी थी. लेकिन असल और रोचक बात तो इसके बाद की है.  डॉ निश्के एक फ्लाइट में लॉस एंजिलस से सिडनी जा रहे थे. सुबह के चार बजे एयरलाइंस के कर्मचारियों ने इन्हें नींद से जगाया और यह अनुरोध किया कि उसी फ्लाइट में अपनी पत्नी और दो साल के शिशु के साथ यात्रा रहे एक 37 वर्षीय गम्भीर रोगी की जान बचाने में वे मदद करें. डॉ निश्के ने एयरलाइंस के अधिकारियों  को यह बता दिया कि उनका प्रैक्टिस अधिकार निलम्बित है, लेकिन वायु सेवा के अधिकारियों ने इसके बावज़ूद उनसे सहायता की प्रार्थना की. डॉ निश्के ने भी अपने चिकित्सकीय धर्म का निर्वहन करते हुए न केवल दो घण्टे की शेष बची हवाई यात्रा में उस रोगी को पर्याप्त  सार सम्हाल प्रदान की, फ्लाइट के सिडनी पहुंचने के बाद भी वे  वहां के रॉयल नॉर्थ शोर अस्पताल तक उसके साथ गए.

डॉ निश्के के इस कृत्य पर ऑस्ट्रेलिया में एक नई बहस शुरु हो गई है कि क्या एक ऐसे डॉक्टर को, जिसका प्रैक्टिस करने का अधिकार निलंबित है, किसी रोगी का उपचार करना चाहिए था? डॉ निश्के ने तो चुटकी लेते हुए कहा है कि वे ऐसे मानवीय कानून का समर्थन करेंगे जो किसी डी रजिस्टर्ड डॉक्टर को भी किसी की जान बचाने दे, सबसे ख़ास बात यह कि ऑस्ट्रेलिया के मेडिकल बोर्ड ने भी कहा है कि डॉ निश्के के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी. यही तो है मृत्यु पर जीवन की विजय!  

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 18 अगस्त, 2015 को इसी शीर्षक (जो फिल्म गाइड के लोकप्रिय गीत- 'आज फिर जीने की तमन्ना है, आज फिर मरने का इरादा है' से प्रेरित  है) से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, August 11, 2015

चार जने मिली खाट उठाइन रोवत लै चले डगर-डगरियाँJaipur

नई कहानी के दौर में कमलेश्वर की एक कहानी बहुत चर्चित रही थी – ‘दिल्ली में एक मौत’. महानगर के लोगों के लिए मौत भी किस तरह एक भावहीन रूटीन हो जाती है, इस बात को उभारने वाली इस कहानी ने लोगों को चौंकाया  कम व्यथित ज्यादा किया था. मौत का नाम आते ही एक औसत भारतीय अतिरिक्त संवेदनशील हो उठता है. कबीर के बहुत सारे पद याद आने लगते हैं. जैसे यह:
                                हम का ओढ़ावै चदरिया चलती बिरियाँ।
                                प्रान राम जब निकसन लागे उलट गई दोउ नैन पुतरियाँ।।
                                भीतर से जब बाहर लाये छूट गई सब महल अटरियाँ।।
                                चार जने मिली खाट उठाइन रोवत लै चले डगर-डगरियाँ।।
                                कहत कबीर सुनो भाई साधो संग चलीं वह सूखी लकरियाँ।। 

लेकिन बदलते समय का क्या कीजिए जिसमें यह भावुकता भी बहुत तेज़ी से विस्थापित होती जा रही है! इधर सुनने में आया है कि बहुत सारी ऑनलाइन कम्पनियां खुल गई हैं जो अंतिम  संस्कार का सारा प्रबन्ध  अपने बलिष्ठ कन्धों पर लेने को बेताब  हैं. आप बस एक बार इन्हें सेवा का मौका तो दीजिए. इनके नाम देखिये ना: पण्डितजीऑनलाइन डॉट कॉम, गयापहुंचाओ  डॉट  कॉम, काशीमोक्ष डॉट कॉम, मातृगया डॉट कॉम आदि. ये ऑनलाइन कम्पनियां पण्डित, कर्मकाण्ड आदि का सारा प्रबन्ध करने का वादा करती हैं. मुझे बहुत रोचक बात तो यह लगी कि इससे भी आगे बढ़कर कुछ कम्पनियां हनीमून पैकेज की  तर्ज पर  अंतिम संस्कार टुअर पैकेज भी पेश करने लगी हैं जिनमें आपको अस्थि विसर्जन के लिए सुपरिचित धार्मिक नगरों में ले जाने, वहां पण्डों आदि की विश्वसनीय व्यवस्था करने और समग्र कर्मकाण्ड विधि विधान पूर्वक पूरा कराने के वादे किए जाते हैं. बहुत सारी कम्पनियां हैं जो आपकी गैर हाजिरी में आपकी तरफ से भी ये सारे धार्मिक कृत्य करने को तत्पर हैं. आप उन्हें कूरियर से अस्थियां भेज दें, बाकी काम उनका. अगर आप चाहेंगे तो वे अस्थि विसर्जन की वीडियो क्लिप बनाकर आपको भेज देंगे जिसे आप वॉट्सएप पर अपने परिजनों के साथ साझा भी भी कर सकेंगे. कई कम्पनियां इससे पहले वाले यानि दाह संस्कार के दायित्व निबाहने  को भी तैयार हैं.

सवाल यह है कि इस बदले परिदृश्य को कैसे देखा जाए? क्या यह कहकर अपनी पीड़ा ज़ाहिर की जाए कि देखो कैसा आ ज़माना गया है! लोग कितने संवेदनशून्य हो गए हैं! या इस आ रहे बदलाव को समझने की कोशिश की जाए?  जब मैं अपने चारों तरफ के माहौल पर नज़र डालता हूं तो पाता हूं कि हालात बहुत बदल गए हैं. पहले जहां लोग बल्कि कई पीढ़ियां एक ही गांव, कस्बे या शहर में अपना जीवन बिता लेते थे, आज लोग दो-चार पांच बरस भी अगर एक शहर में टिक जाएं तो उन्हें अपनी गतिशीलता पर सन्देह होने लगता है. लोग शहर बदलते हैं, नौकरियां बदलते हैं और यह सब करते हुए उनका परिवेश खुद ब खुद बदल जाता है. ऐसे में अब न वे पण्डित रह गए हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी आपके सुख दुख में काम आते थे और न वे दोस्त पड़ोसी और सहकर्मी हैं जिनसे आपका कोई खास नाता हो. सब कुछ गतिशील और परिवर्तनशील. कबीर ने जिन चार लोगों के द्वारा खाट उठाने का ज़िक्र किया वे चार लोग भी कहां से लाएं? आप किसी नए शहर में पहुंचते हैं जहां आपकी कोई जड़ें नहीं होती हैं. तब पारम्परिक रूप से तो रस्मों और कर्मों का निर्वहन नहीं हो सकता ना! कोई न कोई विकल्प तो चाहिये!

और इसी विकल्पहीनता को लपक लेता है बाज़ार! अगर पण्डित नहीं है, कोई जानकार नहीं है, कोई परिजन नहीं है तो वो यानि सेवा प्रदाता तो  है ना! हम देखते हैं कि विवाह जैसे मांगलिक अवसर पर भी ईवेण्ट मैनेजमेण्ट के रूप में बाज़ार परिजनों की कमी महसूस नहीं होने देने का हर मुमकिन जतन करता है, तो शोक में क्यों न वह अपना दायित्व वहन करे? मुझे लगता है कि यह पारस्परिक  जरूरत का मामला है. बाज़ार को आपका पैसा चाहिए और आपको अपनी रस्मों और दायित्वों के निर्वहन की तमाम सुविधाएं, जिन्हें अन्यथा जुटा पाना अब आपके लिए सम्भव नहीं रह गया है. ऐसे में, भले ही अंतिम संस्कार पैकेज की बात आपको चौंकाए या आहत करती प्रतीत हो, इसकी ज़रूरत और एक हद तक इसके औचित्य से इंकार कर पाना भी सम्भव नहीं लगता. अब देखिये ना, अगर पारस्परिक संवाद की जगह दूरभाष ने ले ली है, चिट्ठी की जगह ई मेल ने ले ली है, कष्ट और श्रम साध्य तीर्थयात्रा की जगह सुविधापूर्ण और द्रुत यात्राओं ने ले ली है तो और और मामलों में बदलाव क्यों नहीं आएंगे? और कड़वा ही सही यथार्थ  यह है कि आप भले ही न चाहें बदलाव तो आते ही हैं, और आप भी रो-झींक कर उन्हें स्वीकार करते हैं.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 11 अगस्त, 2015 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.