Tuesday, October 14, 2014

आत्म प्रचार के समय में इण्टरव्यू न देने वाला एक लेखक

कहा जाता है कि हमारा समय आत्म प्रचार का समय है. जो दिखता है वो बिकता है से भी आगे, जो बोलता है वो बिकता है के अनगिनत उदाहरण हम अपने चारों तरफ देखते  हैं. और जब आप बोलते हैं, अनवरत बोलते हैं तो भला किसे इतनी फुर्सत है कि यह जांचे कि आपके बोले में दूध कितना है और पानी कितना! आप तो बस बोलते रहिये. जीवन के तमाम क्षेत्रों में यह हो रहा है. साहित्य और कलाओं का क्षेत्र भी इस प्रवृत्ति से अछूता नहीं है. साहित्य में तो किताबों के लोकार्पण के आयोजन इस प्रवृत्ति के बेहतरीन उदाहरण के रूप में देखे जा सकते हैं. और लोकार्पण से भी थोड़ा पीछे चलें तो आजकल तो अपने खर्चे से छपवाई गई किताबों की जैसी बाढ़ आई हुई है वह भी आत्म प्रचार की ही एक और छवि प्रस्तुत करती है. पहले आप अपनी जेब से दस-बीस हज़ार खर्च कर एक किताब छपवा लें, फिर अपनी हैसियत के अनुसार खर्चा कर भव्य या भव्यातिभव्य लोकार्पण समारोह आयोजित कर लें, जिसमें आपके दोस्त लोग आपको अपनी भाषा का न भूतो न भविष्यति लेखक साबित कर दें, और फिर जैसे-तैसे करके कुछ पत्र-पत्रिकाओं में अपनी किताब की प्रशंसा, जिसे समीक्षा कहा जाता है, प्रकाशित करवा लें. हो गए आप महान लेखक. इस पर भी मन न भरे तो प्रचार का एक और माध्यम आपके पास है – फेसबुक. हर रोज़ किसी महान लेखक के हाथ में अपनी किताब देकर फोटो पोस्ट करते रहें, लोगों को लगेगा कि सारी दुनिया सिर्फ और सिर्फ आपकी ही किताब पढ़ रही है.

पता नहीं संचार  माध्यमों को लेखक की कितनी ज़रूरत होती है, लेखकों को तो संचार माध्यमों की चिरौरी करते हमने खूब देखा है. संचार माध्यमों से जुड़े लोगों को यशाकांक्षी लेखकगण जिस तरह भाव देते हैं उससे उनकी नीयत बहुत साफ हो जाती है. और इन माध्यमों में जो लोग हैं, वे भी इस  बात को भली-भांति समझते हैं इसलिए  नाकाबिले बर्दाश्त हरकतें तक कर जाते हैं. कुछ  बरस पहले ऐसे ही एक मंज़र का प्रत्यक्षदर्शी होने का मौका मुझे अनायास मिल गया. हिन्दी के जाने-माने कथाकार राजेन्द्र यादव किसी आयोजन में भाग लेने जयपुर आए हुए थे. कार्यक्रम शुरु होने में कुछ विलम्ब था और वे पहली पंक्ति में बैठे थे. मैं उनसे कुछ गपशप कर रहा था. तभी एक सुकन्या खट-खट करती हुई आई और कॉन्वेण्टी लहज़े में अपना  परिचय देने के बाद उनसे कुछ सवाल जवाब करने की अनुमति चाही. राजेन्द्र जी ने सहर्ष अनुमति दी तो पहला सवाल उसने उनसे यह पूछा कि आपका नाम क्या है! राजेन्द्र जी ने शायद सवाल सुना नहीं, लेकिन मैंने उस कन्या से कहा कि ये राजेन्द्र  यादव हैं. मेरा खयाल था कि इस नाम को सुनकर उसे बहुत कुछ याद आ जाएगा. लेकिन मुझे उस कन्या की महानता का अन्दाज़ नहीं था. उसने दूसरा सवाल फिर राजेन्द्र जी से ही पूछा – क्या आप भी लिखते हैं? राजेन्द्र जी ने मुस्कुराते  हुए गर्दन हिलाई तो उसने तुरंत तीसरा  सवाल दागा- आप क्या लिखते हैं? मुझे लगा कि अब ज़रूर राजेन्द्र जी उखड़ जाएंगे, और शायद वे उखड़ भी गए होते, अगर उसी क्षण मंच से उन्हें बुला न लिया गया होता.

ऐसे ही एक प्रसंग का साक्षी रहने का सौभाग्य मुझे और मिला था. मैं दूरदर्शन केन्द्र पर अपनी एक रिकॉर्डिंग के लिए गया हुआ था. स्टूडियो खाली होने में कुछ देर थी तो प्रतीक्षा कक्ष में जा बैठा. एक अफसरनुमा सज्जन और एक सुमुखी वहां पहले से बिराजे हुए थे. शायद  उन्हें मेरी उपस्थिति नागवार गुज़री, लेकिन कहते भी क्या? मैं चोर आंखों-कानों  से उनकी बातचीत देख सुन रहा था. जो बात समझ में आई वो यह कि वे सज्जन किसी विभाग के उच्चाधिकारी थे और बतौर लेखक अपना साक्षात्कार रिकॉर्ड करवाने आए थे. उस भद्र महिला को उनका साक्षात्कार लेना था. जो बात सबसे रोचक थी वह यह कि वे सज्जन एक स्क्रिप्ट अपने साथ लाए थे और उस महिला को यह सिखा पढ़ा रहे थे कि वे क्या सवाल पूछेंगी और सज्जन क्या जवाब देंगे. यानि ‘ये रहे आपके सवाल और ये रहे मेरे जवाब’  वाला मामला था!


लेकिन इस सारे परिदृश्य के बीच यह जानना एक अलग तरह के गर्व की अनुभूति कराता  है कि हमारे ही समय में कम से कम एक लेखक तो ऐसा हुआ है जो न तो कभी किसी भी माध्यम को कोई इण्टरव्यू देता था और न अपने फैन्स से मिलना पसन्द करता था. अलबत्ता साधारण जन से मिलने और बतियाने में उन्हें कोई गुरेज़ नहीं था, बशर्ते वे भी बिना टेप रिकॉर्डर नोटबुक वगैरह पत्रकारी उपकरणों के उनके पास जाएं. जानते हैं कौन थे यह लेखक? आर के नारायण! वे ही आर के जिन्हें हम मालगुड़ी डे’ज़ और द गाइड के लेखक के रूप में जानते हैं!

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में  मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 14 अक्टोबर, 2014 को  आत्मप्रचार के समय में भी नहीं दिया इण्टरव्यू शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.             

Tuesday, October 7, 2014

बेहतर कलाकार से पहले बेहतर इंसान

बॉलीवुड की चकाचौंध और ‘कुछ हटके  के नाम पर वही का वही करने वालों से भरी दुनिया में जो थोड़े-से नाम अपनी मौलिकता के लिए जाने जाते हैं विशाल भारद्वाज उनमें से एक है. विशाल ने अपनी दो फिल्मों ‘मक़बूल’ और ‘ओमकारा’ में अपने अनूठे अन्दाज़ में शेक्सपियर के अमर नाटकों क्रमश: मैकबेथ और ऑथेलो को भारतीय परिवेश के पैराहन में पेश कर खासी नामवरी हासिल की, और अब उन्हीं विशाल भारद्वाज ने शेक्सपियर के एक और,  और  कदाचित सर्वाधिक लोकप्रिय  नाटक हैमलेट पर एक फिल्म बनाई है – ‘हैदर’. होने और न होने के, टू बी ओर नॉट टू बी के  द्वन्द्व से जूझते नायक की इस  कालजयी महागाथा को विशाल भारद्वाज डेनमार्क से कश्मीर ले आए हैं और उसके  द्वन्द्व को आतंकवाद के साये में जी रहे 1995 के कश्मीर में कुछ इस तरह से चित्रित किया है कि सिने कला के कद्रदां उसकी तारीफ किए बग़ैर नहीं रह सके हैं.  विशाल भारद्वाज ने यह करने के लिए एक जाने-माने पत्रकार बशारत पीर की भी मदद ली है.  लेकिन  जब भी किसी जानी-मानी साहित्यिक कृति पर कोई फिल्म बनती है तो स्वाभाविक तौर पर कृति और फिल्म की तुलना होने लगती है और बहुतों को लगता है कि साहित्य के साथ न्याय नहीं हो सका है. ऐसा ‘हैदर’ के सन्दर्भ में भी है. लेकिन जो लोग किसी फिल्म को एक स्वतंत्र कृति के रूप में देखने के पक्षधर हैं वे इसे एक क्लासिक फिल्म घोषित कर रहे हैं. बहरहाल, हर कलाकृति की तरह किसी संज़ीदा फिल्म को अगर कुछ लोग पसन्द करते हैं तो कुछ नापसन्द भी करते हैं और सबके अपने-अपने तर्क भी होते हैं.

लेकिन मैं आज इस फिल्म की चर्चा नहीं करना चाह रहा हूं. विशाल भारद्वाज ने अपने कलाकारों से कितना उम्दा काम कराया है, इस बात की भी चर्चा नहीं कर रहा हूं.  मैं बात करना चाह रहा हूं विशाल भारद्वाज और उनकी गायिका पत्नी रेखा भारद्वाज की. और इनकी भी नहीं, इनकी संवेदनशीलता की. और यह बात करने के लिए मुझे विशाल और रेखा के अलावा एक और शख्स का ज़िक्र करना होगा. गुलज़ार के काम में रुचि रखने वालों के लिए पवन झा का नाम क़तई अनजाना नहीं है. पवन जयपुर में रहते हैं और सूचना प्रौद्योगिकी के माहिरों के बीच उनका नाम विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है. इस क्षेत्र में उनके नाम के साथ जो अनेक बड़ी कामयाबियां जुड़ी हुई हैं उनका ज़िक्र करने की कोई ज़रूरत अभी नहीं है. इन्हीं पवन झा ने गुलज़ार के लिए एक वेबसाइट तब बनाई थी जब कम्प्यूटर हममें से ज़्यादातर लोगों के लिए बहुत दूर की चीज़ था. और ये ही पवन हिन्दी फिल्म संगीत में इतना गहरा दखल रखते हैं कि इस विधा के ज्ञानी  इन्हें एन्साइक्लोपीडिया ऑफ हिन्दी फिल्म म्यूज़िक कहने में भी संकोच नहीं करते हैं. पवन बहुत लम्बे समय तक बीबीसी पर हिन्दी फिल्म संगीत की समीक्षा भी करते रहे हैं, यदा-कदा अब भी करते हैं. और ये ही पवन, आजकल रक्त कैंसर की चपेट में आकर अपनी गतिविधियों को सीमित  रखने को मज़बूर हैं.

तो इन्हीं पवन झा ने भी ‘हैदर’  की चर्चा पढ़ी-सुनी और हिन्दी फिल्म संगीत के एक अन्य रसिक कौस्तुभ पिंगले की फेसबुक वॉल पर किसी चर्चा के बीच यह लिख दिया कि वे भी बहुत चाहते हैं कि ‘हैदर’ देखें, लेकिन उनके चिकित्सक ने कीमोथैरेपी के बाद के दुष्प्रभावों से उन्हें बचाये रखने के लिहाज़ से सिनेमा हॉल जैसी  किसी भी सार्वजनिक जगह पर जाने की मनाही कर रखी है. वैसे स्वाभाविक रूप से पवन झा अपनी बीमारी की चर्चा से बचते हैं, लेकिन चर्चा का सिलसिला कुछ ऐसा बना कि अनायास वे यह लिख गए. इसमें कोई ख़ास बात भी नहीं थी. ऐसी चर्चाएं चलती रहती हैं.   

खास बात तो इसके बाद हुई. वह ख़ास बात जिसने मुझे भी यह लिखने के लिए मज़बूर कर दिया. संयोग से  पवन झा की यह पोस्ट विशाल भारद्वाज की निगाहों से भी गुज़री और उन्होंने और रेखा भारद्वाज ने, फौरन ही पवन के लिए जयपुर में ‘हैदर’ का एक एक्सक्लूसिव शो रखवा दिया. आज जब हम अपने चारों तरफ बड़े लोगों के छोटेपन के अनेक वृत्तांत देखते-पढ़ते-सुनते हैं, विशाल और रेखा का यह बड़प्पन मेरे दिल को छू गया. मेरे मन में तुरंत यह बात आई कि एक अच्छा इंसान ही एक अच्छा सर्जक भी हो सकता है. मैंने ‘हैदर’  फिल्म अभी  नहीं देखी है. देखने पर यह ज़रूरी नहीं है कि वह मुझे भी पसन्द आए. बहुतों को नहीं आई है. लेकिन विशाल और रेखा ने यह जो किया है उसकी वजह से मेरी निगाह में उनका क़द बहुत बड़ा  हो गया है!
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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर में मंगलवार दिनांक 07 अक्टोबर, 2014 को एफबी पोस्ट से हुई हैदर की स्पेशल स्क्रीनिंग शीर्षक से प्रकाशित लेख का मूल पाठ. 


Tuesday, September 30, 2014

तबादलों की दुनिया का अंतरंग

राजस्थान में पिछले चौदह महीनों से तबादलों पर लगी रोक को हटा लिया गया है और अपने वर्तमान पदस्थापन से असंतुष्ट सरकारी कर्मचारियों को एक बार फिर आस बंध गई है. राज्य के ज़्यादातर सरकारी विभागों में औपचारिक रूप से कोई तबादला नीति नहीं है और बावज़ूद इस बात के कि राज्य कर्मचारियों को राजनीतिक संलग्नता की अनुमति नहीं है,  करीब-करीब सारे ही तबादले राजनीतिक आकाओं की मनमर्जी और कृपा से ही होते हैं.

अपनी लम्बी सरकारी नौकरी के आखिरी तीन सालों में मुझे सरकार के तबादला तंत्र को न केवल भीतर से देखने, उसका एक हिस्सा बनने का भी मौका मिला, और अब क्योंकि उस बात को समय बीत चुका है, कुछ अनुभव साझा करना अनुपयुक्त नहीं होगा. अपने इस कार्यकाल में मुझे दो मंत्रियों के साथ काम करने का मौका मिला, जो समान सरनेम के बावज़ूद अपने आचरण में एक दूसरे से एकदम अलहदा थे. जिन पहले वरिष्ठ मंत्री के साथ मैंने काम किया वे तबादलों में बहुत कम रुचि रखते थे और सारा दायित्व हम प्रशासनिक अधिकारियों पर छोड़ कर आश्वस्त रहते थे. अलबत्ता वे किसी भी तबादला या पदस्थापन प्रस्ताव के औचित्य के बारे में पूछ कर हमारी सदाशयता की जांच ज़रूर कर लेते थे. कम से कम तबादले हों इस बात की उनकी इच्छा का एक ही उदाहरण देना चाहूंगा. मेरे पास मुख्य मंत्री कार्यालय से कुछ तबादलों के लिए बार-बार सन्देश आ रहे थे. मैंने जब अपने मंत्री जी को इस बाबत बताया तो उन्होंने बेलौस अन्दाज़ में कहा कि अबके जब वहां से कोई सन्देश आए तो आप साफ कह दें कि मंत्री जी ने मना कर रखा है.

इनके बाद जिन दूसरे मंत्री जी के साथ काम करने का मौका मुझे मिला, उनकी रुचि सिर्फ तबादलों में थी. मंत्री जी के यहां ही सारी सूचियां बनती, बाकायदा फाइल पर हमें आदेश मिलता और यथानियम अनुपालना कर दी जाती. हमें कुछ भी सोचने की ज़रूरत नहीं थी. यथाप्रस्तावित – सरकारी शब्दावली का यह शब्द हमारे लिए पर्याप्त था. ज़ाहिर है कि इतने सारे तबादले अपने साथ बहुत सारा अपयश भी लाते हैं. लेकिन उन दिनों अपने सुलझे हुए उच्चाधिकारी के मार्गदर्शन और निर्देशानुसार हम लोग इन तबादलों से एकदम निस्पृह थे. हमारे पास अगर कोई अनुरोध या परिवेदना लेकर आता भी तो हम स्पष्ट कह देते कि हमारे हाथ में कुछ नहीं है, जो भी करना है मंत्री जी ही करेंगे. इस तटस्थता का लाभ यह रहा कि हम अपयश से बचे रहे.   

लेकिन इन ताबड़तोड़ होने वालों तबादलों का एक मज़ेदार पहलू यह रहा कि मेरे हस्ताक्षर से किनके तबादले हो रहे हैं, कई बार यह भी देखना सम्भव नहीं हुआ. इस बात का एहसास मुझे तब हुआ जब मेरे एक बेहद करीबी मित्र ने फोन किया कि उसका तबादला हो गया है.  निश्चय ही यह बात बेहद कष्टप्रद थी. मैंने अपने उच्चाधिकारी से इस बारे में बात की और उनसे अनुमति चाही कि मैं मंत्री जी से कहकर इस तबादले को निरस्त करा दूं. उन्होंने बहुत साफ शब्दों में अपनी यह इच्छा दुहरा दी कि हमें तबादलों के इस जंजाल से दूर रहना चाहिए. जब मैंने ज़्यादा इसरार किया तो वे बोले कि जो मैं उचित समझूं  कर लूं, उनसे न पूछूं! मुझे उनकी बात समझ में तो आ रही थी लेकिन जीवन में कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जो आपको तर्क के खिलाफ जाने को विवश कर देते हैं. मैंने मंत्री जी को पूरी स्थिति बताई और उन्होंने बिना एक पल की भी देर किए जो करणीय था वो कर दिया. यह इकलौता उदाहरण है जब उस दौर में मैंने किसी तबादले में व्यक्तिगत रुचि ली.  

लेकिन तबादलों की इस सारी गाथा को याद करते हुए मैं एक प्रसंग को कभी नहीं भूल सकूंगा. एक दिन एक युवती एक बहुत अजीब अनुरोध लेकर मेरे पास आई. वो चाहती थी कि उसका तबादला जहां वो वर्तमान में पद स्थापित है उस जगह से जितना दूर सम्भव हो, किसी भी जगह कर दिया जाए. जब मैंने इस अजीब अनुरोध के बारे में जानना चाहा तो उसने बताया कि उसके ससुराल वालों ने उसके दाम्पत्य जीवन को नरक बना रखा है और वो चाहती है कि उनसे दूर जाकर अपने पारिवारिक जीवन के बिखरे सूत्रों को सम्हाले. व्यावहारिक रूप से मुझे इस अनुरोध को मानने में कोई दिक्कत नहीं लगी,  दिक्कत तो तब होती है जब कोई यह चाहे कि मेरा तबादला इसी जगह हो जाए और वहां पद रिक्त न हो. लेकिन अगर हर व्यावहारिक काम आसानी से हो जाए तो फिर सरकार ही क्या! इतना ही कहूं कि अपनी तमाम कोशिशों के बावज़ूद उस युवती को कोई राहत न दिला पाने का मलाल अब भी मेरे मन में है. 

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 30 सितम्बर, 2014 को तबादला महापुराण: मांगे मिलै न 'पोस्टिंग' शीर्षक से किंचित परिवर्तित रूप में प्रकाशित मेरे आलेख का मूल पाठ.