Tuesday, March 21, 2017

पुरुषों की तुलना में स्त्रियों को ज़्यादा होता है तनाव

हाल में हुई  एक  शोध से यह पता चला है कि जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं का बुरा असर   पुरुषों की बजाय स्त्रियों पर ज़्यादा पड़ता है. ब्रिटेन की फिज़ीयोलॉजिकल सोसाइटी के माध्यम से लगभग दो हज़ार वयस्कों पर करवाई गई इस शोध के माध्यम से यह जानने का प्रयास किया गया था कि जीवन में घटित होने वाली महत्वपूर्ण घटनाएं पुरुषों को अधिक प्रभावित करती हैं या महिलाओं को. हालांकि उक्त सोसाइटी ने यह शोध एक भिन्न उद्देश्य से कराई थी,  इसके निष्कर्षों को अनेक तरह से समझा जा सकता है. सोसाइटी ने यह शोध लोगों में इस बात की जागरूकता के प्रसार  के लिए कराई थी कि शरीर की कार्यप्रणाली पर   तनावों का बहुत गहरा असर पड़ता है इसलिए लोगों को यथासंभव तनावों से बचना चाहिए. सोसाइटी का मानना है कि तनाव के दौरान उनका सामना करने के लिए हमारी देह जो हॉर्मोन्स  रिलीज़ करती है वे रक्त प्रवाह में घुल मिल जाते हैं, और इसका कुप्रभाव हमारे हृदय, पाचन तंत्र और रोग निरोधक तंत्र पर पड़ता है. यही नहीं, बार-बार पैदा होने वाले और लम्बे समय तक बने रहने  वाले तनावों की वजह से दीर्घकालीन शारीरिक समस्याएं भी पैदा हो सकती हैं. यही वजह है कि फिज़ीयोलॉजिकल सोसाइटी ने एक पूरे साल के कार्यक्रम तनावों को समझने-समझने को समर्पित किये हैं और इस शृंखला  के  अंतर्गत सार्वजनिक व्याख्यान और सेमिनार आयोजित किये जाएंगे. 

जिस रिपोर्ट की हम यहां चर्चा कर रहे हैं उसे ज़ारी करते हुए फिज़ीयोलॉजिकल सोसाइटी की नीति और  संचार समिति की अध्यक्षा ने एक बहुत अर्थपूर्ण बात कही है. उनका कहना है आधुनिक विश्व अपने साथ जिस तरह के तनाव ला रहा है, पचास बरस पहले उनकी कल्पना तक नामुमकिन थी. अपनी बात को स्पष्ट करते हुए उन्होंने तनाव उपजाने और बढ़ाने वाली  दो चीज़ों के नाम लिये हैं: सोशल मीडिया और स्मार्ट फोन्स.

सोसाइटी की यह शोध 1967 में की गई बहुत विख्यात होम्स और राहे के  तनाव विषयक अध्ययन की ही अगली कड़ी है. जहां इस 1967 वाले अध्ययन में जीवन की कुल 43 महत्वपूर्ण घटनाओं के आधार पर तनाव का आकलन किया गया था, वर्तमान अध्ययन में घटनाओं की संख्या को घटाकर मात्र अठारह कर दिया गया है. यह माना गया है कि बहुत सारी घटनाएं या तो एक दूसरे में समायोजित हो जाती हैं या अब उतनी महत्वपूर्ण नहीं रह गई हैं. इस बार के अध्ययन में जिन अठारह घटनाओं को आधार बनाया गया है वे ये हैं: जीवन साथी का निधन, कारावास, बाढ़ या आग के कारण घर का नुकसान, गम्भीर बीमारी, काम से निकाल दिया जाना, दीर्घकालीन सम्बंध का टूट जाना, पहचान की चोरी, आर्थिक समस्या, नई नौकरी की शुरुआत, शादी की तैयारियां, पहले बच्चे का जन्म, आने जाने में नष्ट होने वाला समय, आतंकवादी ख़तरे, स्मार्टफोन का खो जाना,  छोटे से बड़े घर में जाना, ब्रेक्सिट, छुट्टियां मनाने जाना, अपने काम में कामयाबी या पदोन्नति.

इस अध्ययन में इन अठारह महत्वपूर्ण घटनाओं के संदर्भ में यह पड़ताल की गई है कि इनमें से किन के कारण पुरुषों को और किन के कारण स्त्रियों को ज़्यादा तनाव होता है,  और सबसे ज़्यादा चौंकाने वाली बात यही है कि सारी की सारी अठारह घटनाओं की वजह से पुरुषों की तुलना में स्त्रियों को अधिक तनाव होता है. तनाव का आकलन दस के पैमाने पर किया गया है, और उदाहरणार्थ यह पाया गया है कि जीवन साथी की मृत्य की वजह से पुरुषों को 9.13 और स्त्रियों को 9.7 तनाव होता है. इसके बाद पुरुषों और स्त्रियों में होने वाले तनाव का अंतर भी अंकों  में प्रदर्शित किया गया है. इस तालिका के अनुसार स्त्री पुरुष में सर्वाधिक यानि 1.25 का अंतर आतंकवादी खतरे के मामले में पाया गया है. पुरुष इससे 5.19 और स्त्रियां 6.44 तनाव महसूस करती हैं. इससे कुछ कम यानि 0.74 तनाव अंतर गम्भीर रोग के मामले में और उससे कुछ और कम यानि 0.71 अंतर आर्थिक मामलों अथवा बड़े घर में जाने के मामले में पाया गया है. मज़े की बात यह कि स्त्री और पुरुषों के तनावों में सबसे कम यानि 0.19 का अंतर पहली संतान के जन्म को लेकर है. एक रोचक बात यह भी है कि ज़्यादा से कम तनाव का क्रम स्त्री और पुरुष में एक-जैसा है लेकिन अलग-अलग घटनाओं में वह तनाव का अंतर घटता बढ़ता रहता है. इस अध्ययन में यह भी पाया गया कि जहां बीमारी के मामले में उम्र बढ़ने के साथ तनाव की तीव्रता बढ़ती है वहीं स्मार्टफोन्स न्स  के मामले में इसका उलट होता है, यानि इस वजह से युवा पीढ़ी अधिक तनावग्रस्त होती है. 

अंतर चाहे जितना हो, इस अध्ययन से यह तो पता चल ही गया है कि विभिन्न घटनाओं का असर पुरुषों की तुलना में स्त्रियों पर ज़्यादा होता है.  स्वाभाविक ही है कि यह बात उनके लिए एक चेतावनी भी है.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 21 मार्च, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, March 14, 2017

ऐसा पुरस्कार जिसे पाकर कोई खुश नहीं हो सकता!

पुरस्कार पाकर हर कोई खुश होता है. अपने प्रयास और काम की सराहना तथा स्वीकृति भला किसे नापसंद होगी?  लेकिन हाल में सुदूर जापान में घोषित किये गए एक पुरस्कार ने हमें यह कहने को मज़बूर कर दिया है कि हर पुरस्कार के बारे में यह बात कहना उचित नहीं है. कुछ पुरस्कार ऐसे भी हो सकते हैं जिन्हें पाकर पाने वाला सम्मानित नहीं लज्जित महसूस करता है. पिछले दिनों जापान की एक प्रमुख विज्ञापन एजेंसी देंत्सु इंकॉर्पोरेटेड के साथ ऐसा ही हुआ है. जापान के पत्रकारों और नागरिक अधिकारों के रक्षकों के एक समूह ने इस विज्ञापन एजेंसी को मोस्ट ईविल कॉर्पोरेशन ऑफ द ईयर अवार्ड से नवाज़ा है. अब भला कौन कम्पनी होगी जो यह खिताब पाकर खुश हो!

अब यह भी जान लिया जाए कि इस कम्पनी को यह खिताब क्यों दिया गया है? पुरस्कार देने वाले संगठन की चयन समिति के एक सदस्य, जापान के जाने-माने फिल्म निदेशक तोकाची सुचिया के कम्पनी  नाम भेजे संदेश से इस सवाल का आंशिक जवाब मिल जाता है. उन्होंने लिखा है: “डियर देंत्सु इंकॉर्पोरेटेड, आपकी एक नई कर्मचारी, 24 वर्षीया मात्सुरी ताकाहाशी ने 25 दिसम्बर, 2015 को आत्म हत्या कर ली. उसको 105 घण्टे ओवरटाइम करना पड़ा था,  जो बहुत ज़्यादा था. इसके अलावा वो अपने बॉस लोगों द्वारा सताए जाने से त्रस्त थी और मानसिक रूप से दबाव में भी थी.” ताकाहाशी की इस आत्महत्या से पहले इस संस्थान का एक और कर्मचारी, वह भी  24 वर्षीय ही था, 1991 में अपनी जान गंवा चुका था. इनके अलावा, सन 2013 में हुई एक तीस वर्षीय कर्मचारी की मृत्यु को भी उससे बहुत ज़्यादा काम करवाने का परिणाम माना जा रहा है.

दुनिया के विभिन्न देशों में जहां ज़्यादातर कामकाज निजी क्षेत्र में केंद्रित है, नियोक्ता अपने कर्मचारियों से ज़्यादा से ज़्यादा काम लेने की कोशिश करते हैं, और ऐसा करते हुए वे उनकी सेहत और क्षमता की भी प्राय: अनदेखी कर जाते हैं. कर्मचारी की यह विवशता होती है कि अपनी नौकरी बनाए रखने के लिए वो अपनी सेहत और जान पर खेल कर भी नियोक्ता के आदेश का बढ़ चढ़  कर पालन करे. संस्थानों के लिए कोई नया कर्मचारी नियुक्त करने की बजाय पहले से कार्यरत कर्मचारी को ओवरटाइम राशि का भुगतान कर काम लेना अधिक लाभप्रद होता है. शायद यही सोच रहा होगा जब उक्त देंत्सु कम्पनी ने मात्सुरी ताकाहाशी पर काम का इतना बोझ लाद दिया था कि वह हर रोज़ बमुश्क़िल दो घण्टे की नींद ले पाती  थी.

ज़्यादा पड़ताल करने पर यह बात भी सामने आई है कि यह कम्पनी अपने कर्मचारियों  से आग्रह करती रही है कि वे देंत्सु के दस नियमोंकी पालना करें. ये दस नियम किस तरह के होंगे यह जानने के लिए मात्र एक नियम को देख लेना पर्याप्त होगा. इस नियम में कर्मचारियों से कहा गया है कि “अपने काम को पूरा करने से पहले कभी भी, किसी  भी हाल में छोड़ें नहीं. यहां तक कि अगर आप मर जाएं तो भी उसे न छोड़ें.” स्वाभाविक ही है कि इस नियम पर लोगों की तीखी प्रतिक्रियाएं हुई हैं और मात्सुरी ताकाहाशीके परिवार जन और उनके वकीलों के अनुरोधों के बाद अब देंत्सु के प्रबंधन ने कहा है कि अब कर्मचारियों को जो निर्देश पुस्तिकाएं दी जाएंगी, उनमें से इन नियमों को हटा दिया जाएगा.

एक तरफ जहां अपने मुनाफ़े के लिए कर्मचारियों का शारीरिक और मानसिक शोषण करने वाली अनगिनत और बेहद ताकतवर कम्पनियां हैं वहीं ऐसे छोटे-छोटे संगठन भी हैं जो अपनी-अपनी तरह से इस तरह के अमानवीय शोषण के खिलाफ़ आवाज़ उठा रहे हैं. जापान में जिस संगठन ने यह पुरस्कारप्रदान किया है, वह भी कोई बहुत बड़ा संगठन नहीं है. लेकिन इसके बावज़ूद यह उसके अस्तित्व का पांचवां बरस है.  यह संगठन कुटिल और दुष्ट कम्पनियों  द्वारा अपने कर्मचारियों से लिये जाने वाले ज़्यादा काम, उनको सेक्सुअल एवम अन्य तरीकों से सताए जाने, उन्हें परेशान करने, कम तनख्वाह देने, और अस्थायी कर्मचारियों के साथ भेदभाव बरतने जैसे विभिन्न अन्यायों की पड़ताल करता  है. अपने काम और प्रयासों की जानकारी देते हुए इस संगठन के एक महत्वपूर्ण सदस्य, जो इसकी चयन समिति के भी सदस्य हैं, ने एक बेहद महत्वपूर्ण बात कही है. उनका कहना है कि “यह पुरस्कार किसी को बदनाम करने के लिए नहीं दिया जाता है. इसका मकसद तो यह चेतना पैदा करना है कि हमारे समाज में इस तरह की कम्पनियों के बने रहने का कोई औचित्य नहीं है.” वे अपने प्रयासों की अपर्याप्तता से भली भांति परिचित हैं, तभी तो कहते हैं कि “वक़्त  बीतने के साथ इन कम्पनियों के बारे में समाचारों को भी भुला  दिया जाएगा. लेकिन यह पुरस्कार देते हुए हम हरेक से यह उम्मीद करते हैं कि वो यह बात याद रखे कि ऐसी खराब कम्पनियां अभी भी मौज़ूद हैं.”

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 14 मार्च,  2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, March 7, 2017

बहुत कुछ सकारात्मक और शिक्षाप्रद भी है वीडियो गेम्स में

जब भी आज के बच्चों और किशोरों की चर्चा होती है, वह घूम फिर कर उन बहुत सारी चीज़ों के इलाके में प्रवेश कर जाती है जो इनकी मानसिकता को दूषित या विकृत कर रहे हैं. और इस इलाके में जो  नाम आते हैं उनमें बहुत महत्वपूर्ण होता है वीडियो गेम्स का नाम. अगर आप अपने घर-परिवार या जान-पहचान वालों के बच्चों और किशोरों से उनके प्रिय वीडियो गेम्स के नाम और उनकी विषय वस्तु के बारे में पड़ताल करें तो पाएंगे कि उनमें से ज़्यादातर को बंदूकों और मार-धाड़  वाले गेम्स बेहद पसंद हैं. स्वाभविक ही है कि दुनिया भर के सोचने-समझने वाले लोग यह मानते हैं कि इस तरह के वीडियो गेम्स बच्चों किशोरों और युवाओं की मानसिकता पर बहुत बुरा असर डाल रहे हैं. लेकिन इन खेलों का आकर्षण इतना प्रबल है कि इन चिंतकों और इनकी बात से सहमत अभिभावकों के सारे प्रयासों के बावज़ूद इनकी लोकप्रियता घट नहीं रही है.

लेकिन इधर एक नई बात सामने आई हैं जो चौंकाने के साथ-साथ प्रसन्न भी करती है. वीडियो खेलों के जानकारों ने बताया है कि सारे के सारे वीडियो गेम्स हिंसक और क्रूर नहीं हैं. उनमें से बहुत सारे खेल सदाचरण भी सिखाते हैं और सादगी एवम पवित्रता से परिपूर्ण ग्राम्य जीवन की तरफ भी ले जाते हैं. असल में खेलों की इस दुनिया में बहुत विविधता है और जिनके कारण इस दुनिया को बुरी निगाहों से देखा जाता है उन खेलों के अलावा अनगिनत खेल ऐसे भी मौज़ूद हैं जो आपको जीवन के सकारात्मक पक्षों की तरफ ले जाते हैं. और जैसे इतना ही पर्याप्त न हो, हिंसा प्रधान खेलों में भी ऐसे बहुत सारे खेल हैं जो हिंसा के बहाने उसके कारणों पर सोचने को मज़बूर कर अंतत: आपको हिंसा से दूर ले जाते हैं. इस तरह के खेलों को इनके विशेषज्ञ अध्येताओं ने गम्भीरया सहानुभूति परक खेलों का नाम दिया है. 

इन खेलों की तरफ पूरी दुनिया का ध्यान इस वजह से भी गया है कि हाल में संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी इनका नोटिस लिया है. यूनेस्को की एक इकाई महात्मा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ एज्यूकेशन फॉर पीस (UNESCO-MGIEP) ने हाल में टोरण्टो के एक शोधार्थी को यह दायित्व सौंपा है कि वो इस तरह के खेलों का गम्भीर और विशद अध्ययन कर एक रिपोर्ट तैयार करे. टोरण्टो के रॉयल सेण्ट जॉर्ज  कॉलेज के इस शिक्षक पॉल दरवासी का स्पष्ट मत है कि अगर ठीक से इनका प्रयोग किया जाए तो वीडियो गेम्स सम्वेदनाओं के प्रेरक बनने के मामले में फिल्म और किताबों जैसे पारम्परिक माध्यमों की तुलना में अधिक प्रभावशाली साबित हो सकते हैं. अपनी बात को और स्पष्ट करते हुए वे कहते हैं कि इन वीडियो खेलों की ख़ास बात यह है कि जब आप इन्हें खेलते हैं तो आप खुद निर्णय भी करते और उन निर्णयों के परिणामों से भी दो-चार होते हैं. और इस सबके कारण  आप स्थितियों के यथार्थ के और अधिक निकट जा पहुंचते हैं. पॉल दरवासी का मत है कि इन खेलों में भिन्न-भिन्न  नज़रिये और जीवनानुभव वाले लोगों के बीच अधिक गहरी समझ विकसित करने की अपार सम्भावनाएं छिपी हुई हैं. उन  के मत की पुष्टि ऊपर उल्लिखित इंस्टीट्यूट के डाइरेक्टर अनंता दुरैप्पा ने भी यह कहते हुए की है कि वीडियो खेल पारम्परिक कक्षा अध्यापन से अधिक प्रभावी हैं. 

इन गंभीर अथवा सहानुभूतिपरक खेलों में से बहुत सारे ऐसे हैं जो हाल की त्रासदियों या चर्चित घटनाओं जैसे ईरानी  क्रांति, बोस्नियाई युद्ध के दौरान साराजेवो के घेराव, 1994 के रवाण्डा के नरसंहार आदि पर आधारित हैं. लेकिन  इन सारे खेलों की ख़ासियत यह है कि जब आप इन्हें खेलते हैं तो आप शक्तिशाली न होकर अरक्षितता की अवस्था में होते हैं. आप जो भी कदम उठाते हैं वह खुद बंदूक उठाने जितना ही रोमांचक होता है, लेकिन इन खेलों का नियोजन कुछ इस तरह से किया गया है कि इन्हें खेलते हुए आप खबरों को नई निगाह से देखने, दूसरों के साथ बर्ताव के नए तौर–तरीकों और अपने मत का अधिक विवेक सम्मत प्रयोग करने के लिए प्रशिक्षित होते हैं.

इन सब बातों के कारण सामाजिक न्याय की शिक्षा के क्षेत्र में इस तरह के खेलों की उपादेयता से यूनेस्को इतना प्रभावित हुआ है कि खुद उसने भी अपने स्तर पर दो खेल लॉंच करने का निर्णय कर लिया है. ऐसा एक खेल  है वर्ल्ड रेस्क्यू जो बस रिलीज़ होने ही वाला है और इसमें खिलाड़ियों से चाहा गया है कि वे रोग, वनोन्मूलन और सूखे जैसी वैश्विक समस्याओं के समाधान तलाश करें. दूसरा खेल जो अब तक अनाम है, उसमें खिलाड़ियों के सामने यह चुनौती रखी जाएगी कि वे अल्प कालीन सम्पदा सृजन और दीर्घ कालीन संवहनीयता के बीच संतुलन कैसे साधें.

उम्मीद करनी चाहिए कि वीडियो गेम्स के इस सकारात्मक पहलू से हमारी दुनिया को बेहतर बनाने में कुछ मदद मिलेगी.


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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 07 मार्च, 2017 को 'बहुत कुछ शिक्षाप्रद भी है वीडियो गेम्स में' शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, February 28, 2017

जिसे आप देखते हैं वो भी आपको देख सकता है!



भारत में टेलीविज़न कार्यक्रमों के संदर्भ में प्राय: टीआरपी की चर्चा होती है. कार्यक्रम प्रसारित करने वाले चैनल और उन कार्यक्रमों के बीच अपने उत्पादों के विज्ञापन दिखाने वालों के लिए इस टीआरपी की अहमियत से हम सब भली भांति परिचित हैं. लेकिन अमरीका में बात इससे काफी आगे निकल चुकी है, और ज़ाहिर है कि आज जो वहां हो रहा है वो देर-सबेर अपने यहां भी हो ही जाएगा. वहां ऐसी बहुत सारी कम्पनियां सक्रिय हैं जो आपके टीवी देखने के तौर तरीकों का बहुत ज़्यादा बारीकी से अध्ययन करती हैं.

ऐसी ही एक कम्पनी टीविज़न है जिसने बोस्टन, शिकागो और डलास क्षेत्र में दो हज़ार घरों के करीब साढ़े सात हज़ार टीवी दर्शकों की टीवी  देखने की आदतों का सूक्ष्म अध्ययन करने के लिए इन घरों में टीवी सेट्स के ऊपर एक छोटा-सा  उपकरण रख दिया है और इस उपकरण के माध्यम से वे लोग यहां तक लक्ष्य करते हैं कि घर का कौन-सा  सदस्य किस प्रोग्राम को देखते हुए कितनी बार आपनी आंखें उस प्रोग्राम से हटाता है, कितनी बार वो अपने फोन को देखता है और कितनी बार मुस्कुराता या नाक भौं सिकोड़ता है. यह उपकरण टीवी देखने वालों की आंखों का सूक्ष्म अध्ययन  करता है. इन सारी जानकारियों के विश्लेषण से यह पता लगाया जाता है कि कौन-सा प्रोग्राम या कौन-सा कमर्शियल अधिक गहन दर्शक जुटा पा रहा है.  यानि यह जानने का प्रयास किया जाता है कि जो लोग किसी ख़ास समय में एक चैनल को ट्यून करके एक ख़ास  प्रोग्राम चला रहे हैं, वे उस प्रोग्राम  को कितनी तल्लीनता से देख रहे हैं.  कम्पनी इस प्रोग्राम में सहभागिता के लिए सहमत होने वालों को कुछ धनराशि भी प्रदान करती है. और साथ ही वह यह आश्वासन भी देती है कि भाग लेने वालों की पहचान सार्वजनिक नहीं की जाएगी. रिकॉर्ड मात्र यह होता है कि अमुक समय में टीवी देखते हुए घर क्रमांक पंद्रह के दर्शक क्रमांक एक सौ बीस  का बर्ताव यह था.

अमरीका जैसे देश में इस तरह के अध्ययनों की महत्त इसलिए और बढ़ जाती है कि एक मोटे अनुमान के अनुसार वहां कम्पनियां टीवी पर विज्ञापनों पर  हर बरस सत्तर बिलियन डॉलर की बहुत बड़ी राशि  खर्च करती है और उनके लिए यह जानना बेहद ज़रूरी होता है कि लोग उनके कमर्शियल वाकई देख भी रहे हैं या नहीं. यहीं यह भी बताता चलूं कि इस नई व्यवस्था से पहले अमरीका में यह काम करने में नील्सन कम्पनी अग्रणी मानी जाती थी जो सिर्फ़ यह पता करती थी कि किसी प्रोग्राम को कितने लोग देख रहे हैं. यह कम्पनी अपने 42,500 परिवारों से प्राप्त जो आंकड़े जुटाती थी उनके आधार पर अमरीकी कम्पनियां यह तै करती रही हैं कि वे अपने विज्ञापन का बजट कहां-कहां खर्च करें. लेकिन अब क्योंकि दुनिया बहुत जटिल होती जा रही है दर्शकों की रुचियों के अध्ययन  के तौर तरीके भी बदल रहे हैं. एक तो यही बात कि आज का दर्शक एक ही समय में अनेक काम (मल्टीटास्किंग) करता रहता है.  

टीविज़न की ही तरह एक और कम्पनी है सिम्फ़नी एडवांस्ड मीडिया जिसने अमरीका के साढे- सत्रह हज़ार लोगों के एण्ड्रॉयड मोबाइल  फोनों पर एक एप स्थापित किया है, जो यह रिकॉर्ड  करेगा कि वे अपने फोन पर क्या-क्या देखते हैं. इतना ही नहीं, इस एप में यह भी अंकित किया जाएगा कि सम्बद्ध व्यक्ति जो देख रहा है वह कहां पर, मसलन घर पर, बस में या किसी बार में, देख रहा है. कम्पनी इसके लिए हर माह पांच से बारह डॉलर तक उस व्यक्ति को देगी. इसी तरह एक और कम्पनी है रियलिटी माइन जिसने पांच हज़ार लोगों लगभग नब्बे डॉलर प्रति वर्ष देकर उनके इण्टरनेट कनेक्शन की जासूसी करने की अनुमति हासिल की है.

इन सारी कोशिशों का मकसद यह जानना है कि आज का उपभोक्ता अपने मीडिया को किस तरह बरत रहा है. कहना अनावश्यक है कि इस तरह प्राप्त की गई जानकारी का प्रयोग कार्यक्रमों को बेहतर बनाने और विज्ञापनों की पहुंच तथा प्रभाव को को और प्रभावशाली बनाने के लिए किया जाना है. लेकिन इस पूरे किस्से का एक और पहलू है जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता और वह है उपभोक्ता की निजता के हनन का. कहा जा सकता है कि जो किया जा रहा है वह उपभोक्ता की अनुमति और  सहमति से किया जा रहा है, लेकिन ज़िंदगी के और क्षेत्रों की तरह ही यहां भी काफी  कुछ ऐसा हो रहा है जो अनुचित है. हाल में यह बात भी सामने आई है कि अमरीका की ही इंटरनेट से जुड़े टीवी प्रसारण वाली सबसे बड़ी कम्पनी ने इस आरोप से मुक्ति  पाने के लिए कि वो  लाखों स्मार्ट टीवी उपभोक्ता के टीवी देखने के  आंकड़े बग़ैर उनकी इजाज़त और जानकारी के इकट्ठा करती और बेचती रही है सवा दो मिलियन डॉलर देने की पेशकश की है.
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 28 फरवरी, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. ,

Tuesday, February 21, 2017

उसने जान लिया है कि जीवन में धन ही सब कुछ नहीं है

सामान्यत: हम सोचते हैं कि अगर हमें खूब सारा  धन मिल जाए तो हमारे  सारे कष्ट दूर और सारे सपने साकार हो जाएंगे. निश्चय ही ब्रिटेन  की सुश्री जेन पार्क ने भी सन 2013 में अपनी ज़िंदगी का पहला लॉटरी टिकिट खरीदते वक़्त ऐसा ही सोचा होगा. लेकिन देश  की सबसे कम उम्र यूरोमिलियन्स विजेता बनने के बाद महज़ तीन-चार बरसों में उनकी सोच इतनी बदल चुकी है कि अब तो वे उस लॉटरी कम्पनी पर कानूनी  कार्यवाही तक करने के बारे में सोच रही हैं जिसने उन्हें रातों रात इतना अमीर बना दिया. जेन पार्क को इस लॉटरी में एक लाख मिलियन पाउण्ड यानि भारतीय मुद्रा में  क़रीब साढ़े आठ करोड़ रुपये मिले थे. स्वभावत: इन पैसों से उन्होंने प्रॉपर्टी खरीदी, अपनी खूबसूरती बढ़ाने पर खासा खर्चा किया, एक महंगी गाड़ी खरीदी और जमकर सैर सपाटा किया. कल तक जो चैरिटी वर्कर थी, वह अपने आप को डेवलपर कहने लगीं. उनके जीवन में भौतिक साधनों की इफ़रात हो गई. लोग उन्हें देखते तो ठण्डी आहें भरते और कहते कि काश! हमारे पास भी उतना पैसा हो जितना इस लड़की के पास है. लेकिन खुद जेन पार्क बहुत जल्दी इस वैभव से इतनी त्रस्त हो गईं कि उन्हें लगने लगा कि भले ही  उनके पास भौतिक साधनों की भरमार हो, उनका जीवन तो एकदम रिक्त है. इस वैभव से दुखी होकर वे तो यहां तक कह बैठीं कि “मेरा खयाल था कि यह राशि मिल जाने से मेरी ज़िंदगी दस गुना बेहतर हो जाएगी, लेकिन हक़ीक़त यह है कि यह दस गुना बदतर हो गई है. कितना अच्छा होता कि मैंने यह लॉटरी जीती ही ना होती और मेरी जेब एकदम खाली होती!”

जेन ने जब यह लॉटरी जीती तब उनकी उम्र सत्रह बरस थी. अब इक्कीस बरस की हो चुकने और ऐसी अमीरी से उपजे खूब सारे तनाव झेल चुकने के बाद उन्हें लगता है कि ब्रिटेन में लॉटरी का टिकिट खरीदने के लिए न्यूनतम उम्र सोलह बरस है और यह बहुत कम है. इसे कम से कम अठारह बरस तो होना ही चाहिए. लेकिन यह  निर्णय तो वहां की संसद करती है. जेन पार्क ने सन 2015 में अपने बॉय फ्रैण्ड मार्क स्केल्स को स्नेककहते हुए त्याग दिया. वजह यह रही कि उनके दोस्तों ने उन्हें बताया कि उसकी एकमात्र दिलचस्पी उनकी सम्पत्ति में थी. इसके बाद वे अपने एक और बॉय फ्रैण्ड कॉनोर जॉर्ज से भी अलग हो गईं. यह किस्सा खासा मनोरंजक किंतु त्रासद भी है. जब जॉर्ज इबिज़ा में किशोरों के एक हॉलिडे पर जाने लगा तो जेन ने उसे हिदायतों  की एक सूची थमाई जिसके अनुसार उसे हॉलिडे में किसी भी लड़की से बात नहीं करनी थी और उस द्वीप पर छुट्टियां मनाते हुए हर वक़्त जेन का डिज़ाइन किया हुआ वो टी शर्ट पहने रहना था जिस पर इस कन्या की तस्वीर बनी हुई थी. समझा जा सकता है कि ये बातें जेन के असुरक्षा  बोध की परिचायक थीं. अलगाव तो होना ही था.  उसके बाद से वे ऐसे बॉय फ्रैण्ड की तलाश में  ही हैं जिसकी दिलचस्पी उनके वैभव में न हो. डिज़ाइनर वस्तुओं को खरीदते-खरीदते वे ऊब चुकी हैं और अमरीका और  मालदीव जैसी चमक-दमक भरी जगहों और बेहद महंगे रिसोर्ट्स  में छुट्टियां बिताने से अब वे इतनी तंग आ चुकी हैं कि साधारण और सस्ती जगहों पर छुट्टियां मनाने के लिए तरसने लगी  हैं.

इस सारे किस्से का एक किरदार वो लॉटरी कम्पनी भी है जिसने जेन पार्क के जीवन में इतनी उथल-पुथल पैदा की है. इस प्रसंग में केमलोट समूह नामक इस लॉटरी कम्पनी के एक प्रतिनिधि का बयान भी ध्यान  देने योग्य है. अपनी सफाई पेश करते हुए उन्होंने कहा है कि सुश्री जेन पार्क के इनाम जीतने के फौरन बाद कम्पनी ने एक स्वतंत्र वित्तीय और विधिक पैनल का गठन किया और जेन का सम्पर्क उन्हीं के आयु वर्ग के अन्य इनाम विजेताओं से करवाने और पारस्परिक अनुभवों के आदान-प्रदान का प्रबंध किया. कम्पनी की तरफ़ से यह भी बताया गया कि जेन के विजेता बनने के बाद से कम्पनी लगातार उनसे सम्पर्क बनाए हुए है और उन्हें अपना संबल प्रदान करने के लिए तत्पर है. लेकिन इस बात का फैसला तो अंतत: विजेता को ही करना होता है कि उन्हें कोई सहयोग लेना है या नहीं लेना है. बावज़ूद इस बात के कम्पनी उन्हें सहयोग देने को सदैव प्रस्तुत रहेगी. लॉटरी के औचित्य अनौचित्य पर तमाम  बातों से हटकर कम्पनी के इस सोच की तो प्रशंसा की ही जानी चाहिए.

सुश्री जेन पार्क का यह वृत्तांत  उन लोगों के लिए आंखें खोल देने वाला हो सकता है जो मान बैठे हैं कि जीवन की सारी समस्याओं का एकमात्र हल पैसा है.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर  अंतर्गत मंगलवार, 21 फरवरी, 2017 को  प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, February 14, 2017

बहुत सारे विकल्प मौज़ूद हैं वैलेण्टाइन डे के

मनुष्य का स्वभाव भी क्या शै है! अपनी नापसंदगी का इज़हार करने के लिए भी यह कैसे-कैसे तरीके इज़ाद कर लेता है! अब देखिये ना, अगर एक पड़ोसी देश अपनी हरकतों की वजह से हमें नापसंद है तो हम किसी पर अपना गुस्सा निकालने के लिए कह देते हैं कि तुम वहां चले जाओ, या हम तुम्हें वहां भेज देंगे. इस अभिव्यक्ति में अज़ीब बात यह है कि सामान्यत: विदेश जाकर लोग खुश होते हैं, और अगर कोई और उन्हें भेज रहा हो तो कहना ही क्या! लेकिन विदेश यात्रा का यह प्रस्ताव एक अलग ही धुन सुनाता है. यह बात मुझे इससे मिलते-जुलते एक संदर्भ में अनायास याद आ  गई. आज वैलेण्टाइन डे है. यानि प्रेम का दिन. हमारे उत्सवों की सूची में हाल में जुड़ा एक नाम. भले ही देश के अधिसंख्य युवाओं का यह सर्वाधिक लाड़ला उत्सव हो, बहुत हैं जो इस दिन का नाम आते ही व्यथित, कुपित, आक्रोशित वगैरह हो जाते हैं. उन्हें लगता है कि यह उत्सव नहीं, पश्चिम से आया एक ख़तरनाक वायरस है. बहुतों को यह बाज़ार की नागवार हरकत लगता है. बहुतों को लगता है कि इस विदेशी बीमारी ने हमारी युवा पीढ़ी को पथभ्रष्ट कर दिया है. आदि-आदि. अगर आप भी इन बहुतों में से एक हैं, तो आगे की बातें विशेष रूप से आपको ही सम्बोधित हैं. और अगर आप इन बहुतों में से एक नहीं हैं, तो भी कोई बात नहीं. अपना सामान्य ज्ञान बढ़ा लेने में भी कोई हर्ज़  नहीं है.

यह जो 14 फरवरी का दिन है, इसे दुनिया के बहुत सारे देशों में अलग-अलग नामों से मनाया जाता है. अंकल सैम के देश यानि अमरीका में यह  दिन सिंगल्स अवेयरनेस डे के रूप में मनाया जाता है. इस दिन के आद्याक्षरों को जोड़ने से बनता है अंग्रेज़ी शब्द सैड, और अगर आप भी वैलेण्टाइन डे को नापसंद करने वालों में से हैं तो स्वाभाविक ही है कि आपको इस दिन का सैड होना बहुत अच्छा लगेगा. अमरीका में इस दिन अकेले लोग अपने अकेलेपन का उत्सव मनाते हैं और सोशल  मीडिया पर अपने जैसों को शुभ कामनाएं देते हैं या उनका हौंसला बढ़ाते हैं. अगर अमरीकियों की यह सात्विक नापसंदगी आपको अपर्याप्त लगे तो ज़रा कोरिया के बारे में जान लीजिए. वहां यह दिन ब्लैक डे यानि स्याह दिवस के रूप में मनाया जाता है. वजह वही है, यानि अकेलापन. इस दिन वहां के साथी विहीन लोग रेस्तराओं में एकत्रित होते हैं और अपना तमाम रंज-ओ-ग़म एक ख़ास किस्म की सस्ती लेकिन स्वादिष्ट  चीनी-कोरियाई डिश में डुबो देते हैं. इस डिश में  ब्लैक बीन की सॉस में नूडल्स परोसे जाते हैं, जिन पर पोर्क और सब्ज़ियां सजी होती हैं. काले रंग की सॉस वाले नूडल्स के चटकारे लेकर ग़म ग़लत करने का यह उत्सव कोरिया में पिछले दस बरसों में काफी लोकप्रिय हुआ है. अमरीका और कोरिया की ही तरह चीन में भी एक दिन सिंगल्स डे के रूप में मनाया जाता है. हालांकि वहां यह सिंगल्स डे ग्यारह नवम्बर को मनाया जाता है, मैं यहां इसका ज़िक्र इसलिए करना उचित समझ रहा हूं कि वहां नब्बे के दशक में यह दिन वैलेण्टाइन डे के प्रति विरोध स्वरूप मनाया जाने लगा था. मज़ेदार बात यह कि चीन में इस दिन एकल जन अपने लिए खरीददारी करते हैं. इस दिन उनकी सक्रियता का आलम यह है कि सन 2013 में चीन की सबसे बड़ी ऑनलाइन शॉपिंग कम्पनी ने अकेले इस दिन पौने छह बिलियन अमरीकी डॉलर बटोरे. इस राशि की विशालता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि यह सारे अमरीकी खुदरा व्यापारियों की एक दिन की कमाई की  ढाई गुना है.

लेकिन ऐसा भी नहीं है कि सारी दुनिया तैयब अली (यानि प्यार की दुश्मन) है! फिनलैण्ड ने इस दिन को फ्रैण्डशिप डे का नाम देकर  एक सात्विक रंगत प्रदान कर दी है, हालांकि वहां भी इसे दोस्तों और प्रेमियों के दिन के रूप में ही मनाया जाता है. लेकिन इन सबसे अलहदा और दिलचस्प है चार महाद्वीपों के  करीब चालीस देशों में सन 2003 से मनाया जा रहा क्वर्कीअलोन डे. इस दिन को मनाने के विचार का मूल है साशा कागन की किताब क्वर्कीअलोन: मेनिफेस्टो फॉर अनकम्प्रोमाइज़िंग रोमाण्टिक्स.  इस दिन को मनाने वालों का यह स्पष्ट दावा है कि उनकी अवधारणा वैलेण्टाइन डे के विरोध में नहीं है. वे तो बस रोमांस, दोस्ती और स्वतंत्र भाव का उत्सव मनाना चाहते हैं. वे हर तरह के प्रेम का समर्थन करते हैं, चाहे वह रोमाण्टिक हो, प्लैटोनिक हो, पारिवारिक हो, या अपने आप से हो. उनकी असहमति वैलेण्टाइन डे के बाज़ारीकरण से है और वे चाहते हैं  कि लोग खुलकर खुशियां मनायें, भले ही वे अकेले  हों. अब, यह तो एक ऐसा विचार है जिससे शायद ही किसी को कोई असहमति हो!
तो आप भी सोच लीजिए, कि आज आपको कौन-सा डे मनाना है?

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में पेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 14 फरवरी,  2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, February 7, 2017

सबसे अच्छा लेख लिखकर बनें एक खूबसूरत घर के मालिक !

न्यूयॉर्क से कोई दो घण्टे की दूरी पर स्थित एक छोटे-से कस्बे बेथेल में साढ़े पाँच एकड़ ज़मीन पर बने हुए अपने दो बेडरूम के घर  को बेचने के लिए बयालीस वर्षीय एण्ड्र्यू बेयर्स और उनकी सत्तावन वर्षीया पत्नी केली ने इस बार एक नया और चौंकाने वाला तरीका आज़माना चाहा है. इस बार की बात यों कि पिछले चार बरसों में वे दो दफ़ा इसे बेचने का असफल प्रयास कर चुके  हैं. उन्होंने एक निबंध प्रतियोगिता का आयोजन किया है जिसमें कोई भी अमरीकी हिस्सा ले सकता है. प्रतियोगी को सिर्फ़ दो सौ शब्दों का एक लेख लिखकर इस सवाल का जवाब देना होगा कि इस घर का स्वामी बनने से उसका जीवन किस तरह बदल जाएगा! और यह तो मैं बताना भूल ही गया कि अपनी प्रविष्टि के साथ उसे एक छोटी-सी फीस भी जमा करानी होगी. मात्र एक सौ उनचास अमरीकी डॉलर की. आप यह भी जान लें कि श्री बेयर्स ने सन 2007 में, जबकि केली से उनकी मुलाकात भी नहीं हुई थी,  यह ज़मीन साढे सात लाख डॉलर में खरीदी थी. और फिर इस ज़मीन पर यह घर बनवाने में उन्होंने साढे तीन लाख डॉलर और खर्च किए थे. अब इतनी कीमती प्रॉपर्टी के लिए भला कौन मात्र एक सौ उनचास डॉलर खर्च कर अपनी कलम का जौहर आजमाना नहीं चाहेगा?

बेयर्स आश्वस्त हैं. उन्हें लगता है कि उनका यह प्रयोग कामयाब रहेगा और उनके मकान के लिए कोई सही ग्राहक मिल ही जाएगा. अगर ऐसा हुआ तो वे इस प्रयोग को बाकायदा एक व्यवसाय में तबदील करना चाहेंगे. इस प्रयोग के लिए जुटाए गए अपने अनुभव और अपनी विशेषज्ञता का प्रयोग करते हुए वे इसी तरह अन्य लोगों के मकान बेचने का धंधा ही शुरु कर देंगे. और करें भी क्यों नहीं? इस प्रयोग के लिए उन्होंने कम पापड़ थोड़े ही बेले हैं. करीब चालीस हज़ार डॉलर तो वे अपनी जेब से खर्च कर ही चुके हैं. अपनी इस  प्रतियोगिता के नियम वगैरह बनाने के लिए उन्होंने वकीलों के सेवाएं ली हैं, आने वाली प्रविष्टियों का मूल्यांकन करने के लिए निर्णायक नियुक्त किये हैं और अपने इस प्रयास का प्रचार करने के लिए बाकायदा प्रचारकों की सेवाएं ली हैं. इसके अलावा उन्होंने अपनी इस सम्पदा का एक खूबसूरत वीडियो भी बनवाया है ताकि भावी ग्राहक इसकी तरफ आकर्षित हों. लेकिन इतना सब कर चुकने के बाद भी बेयर्स की राह आसान नहीं है. लोग सवाल उठा रहे हैं कि जिस सम्पदा को वे सन 2015 में सवा आठ लाख डॉलर्स में भी नहीं बेच सके थे उसके लिए भला साढे पाँच हज़ार लोग अब क्यों लालायित हो जाएंगे?

अरे हां, यह साढ़े ‌ पाँच हज़ार लोगों वाली बात तो मैं आपको बताना भूल ही गया. दरअसल श्री बेयर्स ने यह बात स्पष्ट कर दी है कि निबंध प्रतियोगिता का विजेता तभी घोषित होगा जब  उन्हें इस प्रतियोगिता के लिए साढ़े पाँच हज़ार प्रविष्टियां मिल जाएंगी. अब सारा खेल आप भी समझ गए होंगे. बेयर्स दम्पती प्रवेश शुल्क के रूप में प्रतियोगियों से कुल 819,500 डॉलर जुटा लेंगे.  विजेता तो उनमें से एक ही होगा. वैसे उन्होंने यह प्रावधान भी रखा है कि अगर इतने प्रतियोगी न जुटे तो वे सारे प्रतियोगियों को उनका प्रवेश शुल्क लौटा देंगे - प्रति प्रविष्टि उनचास डॉलर प्रशासकीय शुल्क काट कर.

इस प्रतियोगिता का  एक और मज़ेदार पहलू है. इसे अदृश्य फाइन प्रिण्ट भी कह सकते हैं. भले ही बेयर्स लोग विजेता को मात्र एक सौ उनचास डॉलर में यह सम्पदा देने का वादा कर रहे हैं, विजेता को कुल मिलाकर जो वित्तीय भार वहन करना होगा वह खासा बड़ा होगा. सबसे पहले तो उसे मकान की वर्तमान की कीमत के अनुरूप आयकर देना होगा, क्योंकि इनाम को आय ही माना जाता है. फिर इस सम्पदा पर उसे प्रॉपर्टी टैक्स भी अदा करना होगा जो करीब ग्यारह हज़ार डॉलर सालाना होता है. यानि एक सौ उनचास डॉलर का मकान वास्तव में जितने में पड़ने वाला है वह अगर सबको मालूम हो जाए तो बहुत सम्भव है कि लोग किस्मत आजमाने का अपना इरादा ही बदल लें. यही वजह है कि जहां अमरीकी प्रॉपर्टी बाज़ार में इस प्रयास की काफी चर्चा है वहीं गम्भीर प्रॉपर्टी व्यवसायी इसे वास्तविक प्रतियोगिता मान ही नहीं रहे हैं. वे तो इसे एक शोशेबाजी ही कह रहे हैं. आशंका  यह भी है कि बेयर्स दम्पती का यह प्रयास कानूनी उलझनों में भी फंस सकता है क्योंकि अमरीका में इस तरह की प्रतियोगिताओं के लिए अलग-अलग राज्यों में कानूनों में काफी भिन्नताएं हैं.

लेकिन जो हो, बेयर्स लोगों के इस प्रयास ने न सिर्फ भारी दिलचस्पी  पैदा की है, अगर यह कामयाब रहा तो इससे व्यापार का एक नया मॉडल भी चलन में आ सकता है.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 07 फरवरी, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.   

Tuesday, January 31, 2017

विचलित कर देने वाले समय में भी जल रही है साहित्य की मशाल

कथा सम्राट प्रेमचंद ने 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ के उद्घाटन के अवसर पर अपने व्याख्यान में कहा था कि साहित्य “देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सचाई भी नहीं, बल्कि उनके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सचाई है.” प्रेमचंद के इस कथन की बहुत ज़्यादा याद मुझे यह समाचार पढ़ते हुए आई कि हाल में सम्पन्न हुए अमरीकी राष्ट्रपति के चुनाव अभियान में डोनाल्ड ट्रम्प के कुछ भाषणों के स्वर ने अमरीकी जन मानस को इतना चिंतित कर दिया कि उनकी दिलचस्पी अचानक डिस्टोपियन (मनहूसियत भरे) उपन्यासों में बहुत ज़्यादा बढ़ गई. अमरीकी जनता शायद काफी पहले लिखे गए भविष्य का चित्रण करने वाले इस तरह के उपन्यासों को पढ़कर वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य को बेहतर तरीके से समझने की कोशिश कर रही है. ऐसे में एक डिस्टोपियन उपन्यास सुपर सैड ट्रु लव स्टोरीके रचनाकार गैरी श्टाइन्गार्ट  का यह कथन तर्क संगत प्रतीत होता है कि “एक औसत अमरीकी के वास्ते इनमें से बहुत सारी किताबें इसलिए महत्वपूर्ण हो गई है कि वह यह जानना चाहता है कि अब आगे क्या होगा.” स्टैनफर्ड यूनिवर्सिटी  के एक प्रोफ़ेसर अलेक्स वॉलॉच ने कहा कि अमरीकी प्रशासन के कुछ कृत्यों से लोगों के जेह्न  में खतरे की घण्टियां बजने लगी हैं और वे इस नए यथार्थ को समझने के लिए इन कृतियों का रुख कर रहे हैं.

जानी-मानी उपन्यासकार मार्गरेट एटवुड के कोई तीन दशक पहले आए उपन्यास द हैण्डमेडस टेलजिसके अब तक 52 संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं,  की बिक्री 2016 में तीस प्रतिशत बढ़ गई और पिछले तीन महीनों में तो इसके प्रकाशक को इसकी एक लाख अतिरिक्त प्रतियां छपवानी पड़ीं, क्योंकि लोगों को नए  रिपब्लिकन निज़ाम की सम्भावित रीति नीतियों और इस उपन्यास में वर्णित दमनात्मक समाज में बहुत सारे साम्य दिखाई दिये थे. इधर हाल के दिनों में राष्ट्रपति ट्रम्प, उनके प्रेस सेक्रेटरी सीन स्पाइसर और उनकी  सलाहकार कॉनवे ने जब राष्ट्रपति  के पदग्रहण समारोह में उपस्थित लोगों की संख्या को लेकर समाचार माध्यमों के आकलन पर प्रतिकूल  टिप्पणियां कीं तो इस पर काफी बावेला मचा और तब कॉनवे को यह सफाई देने पर मज़बूर होना पड़ा कि वे तो महज़ वैकल्पिक तथ्यप्रस्तुत कर रही थीं. लेकिन उनकी इस टिप्पणी ने बहुतों को जॉर्ज ऑरवेल के प्रख्यात उपन्यास ‘1984’ के उस सर्वसत्तावादी समाज की याद दिला दी जिसमें भाषा एक राजनीतिक अस्त्र बन जाती है और यथार्थ को सत्ताधारियों के नज़रिये से व्याख्यायित किया जाने लगता है. आसानी से पुष्टि किये जा सकने काबिल तथ्यों को भी संदेह के घेरे में लाने की यह प्रवृत्ति अमरीकी समाज के लिए नई और चौंकाने वाली थी. शायद यह भी एक  कारण रहा होगा कि अकेले इस एक सप्ताह में ट्विटर पर लगभग तीन लाख बार इस उपन्यास का ज़िक्र किया गया. यह उपन्यास अमेज़ॉन की बेस्ट सेलर सूची में तेज़ी से ऊपर चढ़ता जा रहा है. हमें यह बात चकित करने वाली लग सकती है कि राष्ट्रपति ट्रम्प के शपथ  लेने के बाद इस उपन्यास की बिक्री में 9500 गुना इज़ाफा हुआ है और अनेक बेस्ट  सेलर सूचियों में यह निरंतर ऊपर चढ़ता जा रहा है. वैसे यह उपन्यास सदा से ही बेस्ट सेलर रहा है. 1949 में अपने प्रकाशन के बाद से अमरीका में हर बरस इसकी चार लाख प्रतियां बिकती रही हैं, लेकिन हाल में इसकी मांग इतनी ज़्यादा बढ़ गई कि प्रकाशक को  न सिर्फ इसकी दो लाख अतिरिक्त प्रतियां छपवानी पड़ीं, जॉर्ज ऑरवेल के ही एक अन्य उपन्यास एनिमल फार्मकी भी एक लाख अतिरिक्त प्रतियां छपवानी पड़ीं.

अमरीका में इस तरह के उपन्यासों में तेज़ी से बढ़ी दिलचस्पी का आकलन दो-तीन तरह से किया जा रहा है. कनेक्टिकट यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर माइकल मेयेर का कहना है कि वैसे तो ये किताबें पहले भी पढ़ी जाती थीं, लेकिन अब इनमें बढ़ी हुई दिलचस्पी की वजह यह है कि लोग इनमें  वर्तमान से काफी पीड़ादायक समानता  पा रहे हैं. यह भी कहा जा रहा है कि इन उपन्यासों में पाठकों को न सिर्फ अपने समय का प्रतिबिम्ब देखने को मिल रहा है इनसे उन्हें वो नैतिक स्पष्टता भी प्राप्त हो रही है जो ख़बरों और सूचनाओं के घटाटोप में खो-सी गई है. कथाकार गैरी श्टाइन्गार्ट का यह कथन उपयुक्त प्रतीत होता है कि कदाचित नॉन फिक्शन हमारी उम्मीदों पर खरा नहीं उतर रहा है और पत्रकारिता समय के साथ तालमेल बनाये रख पाने में असफल हो रही है. इस पूरे परिदृश्य पर सबसे मार्मिक टिप्पणी तो यह है कि लोग इन डिस्टोपियन उपन्यासों को इसलिए पढ़ रहे हैं कि यह एहसास उन्हें सुखद लगता है कि जो हो रहा है, उससे भी बुरा हो सकता था.


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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अन्तर्गत मंगलवार, 31 जंवरी, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, January 24, 2017

काम करने के लिए जिएं या जीने के लिए काम करें?

हाल में स्वीडन  के गोथनबर्ग शहर में स्थित नगरपालिका रिटायरमेण्ट होम के कर्मचारियों पर एक अभिनव प्रयोग किया गया. अब तक आठ घण्टे प्रतिदिन काम करने वाले इन कर्मचारियों के काम के घण्टों में कटौती कर इनसे पूरे दो बरस तक प्रतिदिन छह घण्टे काम लिया गयाऔर काम के घण्टों की इस कटौती का कोई प्रभाव इनके वेतन पर नहीं पड़ा. सिर्फ इतना ही नहीं, इन कर्मचारियों द्वारा किये जाने वाले काम में कटौती की क्षति पूर्ति के लिए सत्रह नए कर्मचारी नियुक्त किये गए जिन पर सालाना सात लाख यूरो का खर्चा आया. एक देश के लिहाज़ से यह प्रयोग भले ही आकार में बहुत बड़ा नहीं था, लेकिन इसने एक व्यापक बहस के सिलसिले की शुरुआत कर दी है, जिसका  असर काम की भावी नीतियों पर पड़ना अवश्यम्भावी है. इस प्रयोग के बाद इस बात पर बहुत गम्भीरता से विचार किया जाने लगा है कि कर्मचारियों को उनके काम और उनके जीवन के बीच बेहतर संतुलन सुलभ कराने की कितनी अहमियत है, और कर्मचारियों को निचोड़ लेने की बनिस्पत उनसे बेहतर सुलूक करते हुए उनसे काम लेने की नीति कम्पनियों और अर्थ व्यवस्था के लिए कितनी लाभप्रद साबित हो सकती है. इस प्रयोग के बाद गोथनबर्ग सिटी काउंसिल में वाम दल के नेता डेनियल बर्नमार ने कहा कि कि इस परीक्षण से यह बात साबित हो गई है कि कर्मचारियों के काम के घण्टे कम होने के बहुत सारे फायदे  हैं. इनमें स्टाफ का स्वास्थ्य, बेहतर काम का माहौल और अपेक्षाकृत कम बेरोज़गारी शामिल हैं. यहीं यह भी बता  देना ज़रूरी है कि वाम दल ने ही इस प्रयोग के लिए सर्वाधिक आग्रह किया था. लेकिन जैसा सर्वत्र होता है, स्वीडन की सरकार ने कुछ तो इसकी व्यवहारिकता को लेकर राजनीतिक संदेहों की वजह से और कुछ इस तरह के प्रयासों पर होने वाले खर्च को मद्दे नज़र रखते  हुए इस प्रयोग को और बड़े स्तर पर आज़माने में कोई उत्साह नहीं दिखाया है. यही कारण है कि डेनियल बर्नमार को कहना पड़ा है कि सरकार तो इस मुद्दे पर बात ही नहीं करना चाह रही है. वह  व्यापक परिप्रेक्ष्य में इस पर नज़र डालने में कोई रुचि नहीं दिखा रही है.

यहीं यह भी याद दिलाया जा सकता है कि बहुत सारे देश और कम्पनियां अपने कर्मचारियों की खुशियों में वृद्धि करने के लिहाज़ से उनके काम के घण्टों में कटौती करने पर विचार तो करती रही  हैं लेकिन इस विचार को व्यापक स्वीकृति कहीं नहीं मिल पाई. फ्रांस में वहां की समाजवादी सरकार की पहल पर पिछले पंद्रह बरसों से चले आ रहे पैंतीस घण्टों  के कार्य सप्ताह को अभी भी खासा विवादास्पद ही माना जाता है. अपने कर्मचारियों  से बहुत ज़्यादा काम लेने के लिए कुख्यात अमेज़ॉन तक ने पिछले बरस यह घोषणा की थी कि वह बतौर परीक्षण अपने कर्मचारियों के एक छोटे समूह से सप्ताह में मात्र तीस घण्ट काम करवाएगी और उनके अन्य सारे लाभ बरक़रार रखते हुए उन्हें वर्तमान वेतन का तीन चौथाई देगी. गूगल और डेलॉयट ने भी इसी तरह यह प्रयोग किया कि चालीस घण्टों का काम  चार दिनों में करवा कर कर्मचारियों को तीन दिन का अवकाश दे दिया जाए. यानि इस तरह के प्रयोग जगह-जगह किये जा रहे हैं. हालांकि यह भी सच है कि ये प्रयोग बहुत छोटे पैमाने पर हो रहे हैं और इक्का दुक्का कस्बों तक सीमित हैं. 

गोथनबर्ग वाले इस प्रयोग में हालांकि लागत में बाईस प्रतिशत की वृद्धि हुई, लेकिन उसमें से दस प्रतिशत को कम माना जा सकता है. इसलिए कि ऐसे कुछ लोग जिन्हें बेरोज़गारी भत्ता दिया जा रहा था, वे काम पा गये और उन्हें दिया जाने वाला भत्ता बच गया. इसके अलावा कर्मचारियों के स्वास्थ्य में महत्वपूर्ण सुधार पाया गया, उनके रक्तचाप में कमी देखी गई, और उनकी कार्यक्षमता भी बढ़ी हुई पाई गई. लेकिन इसके बावज़ूद गोथनबर्ग में वहां की कंज़र्वेटिव विपक्षी पार्टियों ने  इस प्रयोग को कल्पना की उड़ान करार देते हुए इसे खत्म कर देने का पुरज़ोर आग्रह किया. उनका कहना था कि एक तो इससे बेवजह करदाताओं का करभार बढ़ेगा, और दूसरे यह कि सरकार को कार्यस्थलों में बिना वजह अपनी नाक नहीं घुसेड़नी चाहिए. वहां की सरकार भी  इस प्रयोग की मुखालफत कर रही है.

लेकिन इस प्रयोग ने अंतत: सारी दुनिया को यह सोचने को विवश किया है कि अब समय आ गया है कि कर्मचारियों की उत्पादकता और उनकी सेहत और उनकी प्रसन्नता के बीच के अंत:सम्बंधों  की गहराई से पड़ताल की जाए. यानि यह कि लोग काम करने के लिए ज़िंदा रहें या ज़िंदा रहने के लिए काम करें! दुनिया के कुछ देशों जैसे इटली, जापान और क़तर में ऐसा होने भी लगा है.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम  कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 24 जनवरी, 2017  को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, January 17, 2017

उनके भीतर छिपी हुई थी दुर्वासा और परशुराम की टू-इन-वन आत्मा

हाल में राजस्थान की राजधानी में आयोजित हुए रुक्टा (राजस्थान यूनिवर्सिटी एण्ड कॉलेज टीचर्स असोसिएशन) राष्ट्रीय के अधिवेशन में प्रांत की मुख्य मंत्री जी ने कॉलेज शिक्षकों को भी विश्वविद्यालय शिक्षकों के समान पदनाम देने की घोषणा कर लम्बे समय से की जा रही मांग को पूरा कर दिया. विश्वविद्यालय में जहां असिस्टेण्ट प्रोफ़ेसर, असोसिएट प्रोफ़ेसर और प्रोफ़ेसर पदनाम होते हैं वहीं कॉलेज शिक्षकों के लिए मात्र एक पदनाम हुआ करता था – लेक्चरर यानि व्याख्याता. जब मैंने अपनी नौकरी की शुरुआत की तब राज्य में कॉलेज शिक्षकों के लिए विश्वविद्यालय शिक्षकों से भिन्न और उनसे न्यून वेतनमान हुआ करते थे. फिर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की  अनुशंसानुसार हमें भी उनके समान वेतनमान तो मिलने लग गए लेकिन पदनाम उनसे भिन्न बना रहा, और यह बात सबको चुभती भी रही. सरकार के दरवाज़े पर बार-बार गुहार लगाई जाती  रही, और सरकार भी सैद्धांतिक रूप से सहमत होती  रही. लेकिन बात उससे आगे नहीं बढ़ सकी. कोई चार दशकों की लम्बी प्रतीक्षा के बाद मुख्य मंत्री जी की घोषणा से यह आस बंधी है कि कॉलेज और विश्वविद्यालय शिक्षकों के बीच का यह पदनाम गत भेद-भाव अब ख़त्म हो जाएगा.

यह तो हुई औपचारिक और आधिकारिक बात! लेकिन इसी के साथ एक मज़ेदार हक़ीक़त यह भी है कि हममें से बहुत सारे कॉलेज शिक्षक अपनी नौकरी के पहले दिन से ही स्वयं को प्रोफ़ेसर कहते और कहलाते रहे हैं. इतना ही नहीं, राज्य और केंद्र के अब भूतपूर्व हो चुके एक मंत्री जी और राज्य के एक वर्तमान मंत्री जी को सरकारी लिखत-पढ़त में भी  प्रोफ़ेसर ही सम्बोधित किया जाता है, भले ही उन्होंने किसी विश्वविद्यालय में कभी नहीं पढ़ाया. एक समय था जब शिक्षक संगठन  ने भी अपने सदस्यों को सलाह दी थी कि सरकार की घोषणा का इंतज़ार किये बिना वे खुद को विश्वविद्यालय वाले पदनामों से विभूषित कर लें. इन तमाम बातों का ज़िक्र करते हुए मुझे अनायास अपनी नौकरी के पहले कुछ  महीनों में मिले एक ऐसे अनूठे व्यक्तित्व की याद आ गई है जिन्हें विस्मृत कर पाना नामुमकिन है. वे संस्कृत के व्याख्याता थे और हम लोगों की तुलना में ख़ासे वरिष्ठ थे. कोढ़ में खाज यह कि वे पी-एच.डी भी थे. वे हम सबको प्रो. साहब कहकर सम्बोधित करते थे और अपनी वरिष्ठता के रुतबे का पूरा प्रयोग करते हुए यह अपेक्षा करते थे कि हम सब भी एक दूसरे को प्रो. साहब कहकर ही सम्बोधित करें. अगर हममें से कोई किसी को नाम लेकर सम्बोधित कर देता या अपना परिचय व्याख्याता (जो हमारा वैध पदनाम था) के रूप में दे देता तो उनके कोप का भाजन बने बगैर नहीं रहता. उनके कोप की बात एक और चर्चा के बिना अधूरी रहेगी. वे पी-एच.डी. थे और हमेशा चाहते थे कि हम उनको न तो उनके जाति सूचक नाम से सम्बोधित करें, प्रथम नाम से सम्बोधन का तो कोई सवाल ही नहीं उठता था, न प्रोफ़ेसर साहब कह कर सम्बोधित करें. उन्हें केवल और केवल डॉ साहब सम्बोधन स्वीकार्य था. कई बार असावधानीवश इससे इतर सम्बोधन कर उनके कोप भाजन  बन चुके हम लोगों को धीरे-धीरे इसमें एक दुष्टतापूर्ण आनंद मिलने लगा था और आए दिन हममें से कोई न कोई उन्हें उनके जाति सूचक उपनाम से सम्बोधित कर देता. इधर हममें से किसी के भी मुंह से यह सम्बोधन निकलता और उधर उनके भीतर बिराजमान दुर्वासा और परशुराम की  टू-इन-वन आत्मा हुंकार भर कर उठ खड़ी होती. अब यह बात तो याद नहीं कि अपने विषय में उनकी पैठ कितनी गहरी थी, लेकिन यह बात अच्छी तरह याद है कि हिंदी और अंग्रेज़ी इन दोनों भाषाओं में उनकी लेखन क्षमता अद्भुत थी. उनके भीतर अवस्थित दुर्वासा और परशुराम उनकी कलम की नोक से कागज़ों पर उतरते और पापियों-अपराधियों को क्षत-विक्षत करने में  जुट जाते. उनके सारे प्रहार लिखित रूप में होते. अपना सारा गुस्सा वे पत्रों में व्यक्त करते. जिस किसी ने भी उन्हें डॉ साहब से भिन्न सम्बोधन से अपमानित किया होता उसके  नाम वे पोस्टकार्ड लिखते और जितनी अप्रिय बातें वे लिख सकते उसमें लिख डालते. ज़ाहिर है कि अगले दिन वो पोस्टकार्ड कॉलेज के स्टाफ रूम में रखे डाक के डिब्बे में प्रकट  होता और  जिसके नाम वह प्रेषित किया गया होता उससे पहले अन्य सारे लोग उसे पढ़ चुके होते. यही तो वे डॉ साहब चाहते भी थे. लेकिन ख़ास बात यह कि जितनी जल्दी वे नाराज़ होते उतनी ही जल्दी प्रसन्न भी हो जाते. नाराज़ करने वाला विनम्रतापूर्वक उनसे क्षमा मांगता, उनकी विद्वत्ता की प्रशंसा करता और तीन मिनिट की वार्ता में पाँच दफ़ा उन्हें डॉ साहब कहकर सम्बोधित करता तो वे पिघलने में भी  देर नहीं करते. लेकिन क्योंकि हम लोगों के लिए तो यह एक कौतुक मात्र था, कुछ ही देर बाद हममें से कोई और उन्हें डॉ साहब से इतर कोई और सम्बोधन देकर फिर उनके दुर्वासा-सह-परशुराम को काम पर लगा देता. पता नहीं अब वे डॉ साहब कहां हैं!  

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, दिनांक 17 जनवरी, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.