Tuesday, January 16, 2018

अधिक योग्यता प्राप्त कर्मचारियों से काम लेना भी आसान नहीं है!

भारत जैसे देश में जहां बेरोज़गारी की समस्या बहुत विकट है, समस्या का  एक आयाम यह भी है कि बहुत सारे ऐसे लोगों को जिनके पास खूब सारी डिग्रियां या योग्यताएं हैं, मज़बूरी के चलते ऐसी नौकरियां स्वीकार कर लेनी पड़ती हैं जिनमें उतनी योग्यता की कोई ज़रूरत नहीं होती है. इस बात के लिए सिर्फ एक ही उदाहरण पर्याप्त होगा. अभी हाल में राजस्थान विधान सभा में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के मात्र बारह पदों के लिए जिन अठारह हज़ार आशार्थियों ने आवेदन किया उनमें से सात हज़ार से अधिक स्नातक उपाधि धारी थे और लगभग साढ़े नौ सौ आशार्थी ऐसे थे जिनके पास स्नातकोत्तर या बी. टेक, एम. टेक अथवा एमबीए जैसी डिग्रियां थीं. वैसे, चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के इस पद के लिए न्यूनतम निर्धारित योग्यता थी पांचवीं पास होना. कल्पना की जा सकती है कि अगर किसी एम. टेक या एमबीए को इस पद के लिए चुन लिया जाता तो अपनी नौकरी करते हुए उसकी  मानसिक दशा क्या और कैसी होगी.

मैं इस बात पर विचार कर ही रहा था कि मुझे दुनिया के कुछ तथाकथित उन्नत और समृद्ध देशों में भी मौज़ूद ऐसी ही समस्या के बारे में पढ़ने को मिला. शायद आपके लिए भी यह बात चौंकाने वाली हो कि संयुक्त राज्य अमरीका में भी हर चार स्नातक उपधि धारी कर्मचारियों में से कम से कम एक तो ऐसा होता है जिसकी नौकरी के लिए उतनी योग्यता की ज़रूरत नहीं होती है.  उधर ब्रिटेन में हर छह स्नातक कर्मचारियों में से कम से कम एक ऐसा होता  है जो अपने काम की ज़रूरत के हिसाब से अधिक योग्यता धारी होता है. यही नहीं, वहां करीब अट्ठावन प्रतिशत स्नातक कर्मचारी ऐसे हैं जिनके काम के लिए इतनी योग्यता की कोई ज़रूरत नहीं है. बहुत सारे युवा कम योग्यता चाहने वाली ऐसी नौकरियां इस कारण भी स्वीकार कर लेते हैं कि या तो उन्हें अच्छा वेतन मिलता है या फिर किसी बड़ी कम्पनी से जुड़ने का मोह उन्हें अपनी तरफ खींच लेता है. इन देशों में ऐसा होने की एक वजह यह भी है कि यहां के रोज़गार देने वालों ने  करीब-करीब उन सारी नौकरियों के लिए न्यूनतम योग्यता स्नातक की उपाधि तै कर दी है जिन पर पहले ग़ैर-स्नातकों  को रख लिया जाता था. शायद रोज़गार देने वाले यह सोचते हैं कि जिन कामों के लिए कम योग्यता से काम चल सकता है उन कामों को करने के लिए अधिक योग्यता धारी कार्मिकों को भर्ती कर वे अपने संस्थान का भला कर रहे हैं.

लेकिन हाल में जो अध्ययन हुए हैं वे परिणामों की एक दूसरी ही छवि प्रस्तुत करते हैं. जिन कामों के लिए कम योग्यता की ज़रूरत होती है उनको करते हुए ऐसे अधिक योग्यता प्राप्त कर्मचारियों में कुण्ठा जड़ें जमाने लगती है और उन्हें लगने लगता है कि उनका काम चुनौतीपूर्ण नहीं है, बोरिंग है और वे व्यर्थ में अपनी प्रतिभा नष्ट  कर रहे हैं. आहिस्ता-आहिस्ता इस तरह के कर्मचारियों में एक नकारात्मक रवैया घर करने लगता है और उनका बर्ताव विद्रोही होने लगता है. वे देर से आने और जल्दी जाने लग जाते हैं और अपने साथी कर्मचारियों को बिना वजह परेशान करने लग जाते हैं. इस तरह की प्रवृत्तियां युवतर कर्मचारियों और उनमें ज़्यादा देखने को मिलती हैं जो किसी टीम के सदस्य के रूप में काम कर रहे होते हैं. उन्हें बार-बार यह बात सालती है कि वे औरों से अधिक काबिल हैं और उन्हें कम योग्यता वालों के साथ काम करना पड़ रहा है. 

लेकिन ऐसा भी नहीं है कि सभी अधिक योग्यता प्राप्त कर्मचारी अपने संस्थानों के लिए हानिप्रद ही साबित होते हों. ऐसे कर्मचारियों में से वे जिनमें अधिक संवेदनशीलता होती है और जो अंतर्वैयक्तिक दक्षता सम्पन्न होते हैं वे अपने सहकर्मियों के साथ न केवल उपयुक्त बर्ताव करते हैं और  उनके साथ सहजता से  घुल मिल जाते हैं, अपनी दक्षता के दम पर उन्हें बेहतर कार्य निष्पादन के लिए भी प्रेरित कर देते  हैं.  अपनी शिक्षा की वजह से उनका व्यवहार संतुलित होता है और वे दूसरों के साथ आत्मीयता कायम कर बेहतर कार्य माहौल तैयार करने में मददगार साबित होते हैं. यहीं टीम के नेतृत्व की भूमिका भी  बहुत महत्वपूर्ण साबित होती है. अगर टीम लीडर समझदार होता है तो वो इस तरह के अधिक योग्यता प्राप्त कर्मचारियों का प्रयोग टीम में अच्छा माहौल बनाये रखने और उसकी उत्पादकता बढ़ाने में कर लेता है. टीम लीडर इस तरह के कर्मचारियों को उनकी योग्यता के अनुरूप काम देकर और अनेक प्रकार से पुरस्कृत व प्रोत्साहित कर उनकी कार्यक्षमता से अपने संस्थान को लाभान्वित करवा पाने में भी कामयाब रहता है. 


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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़  टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर  के अंतर्गत मंगलवार, 16 जनवरी, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, January 9, 2018

आत्मीय रिश्तों के बीच क्या काम कोर्ट कचहरी का?

हिंदी की अनेक कहानियों  में वृद्धजन की उपेक्षा और बदहाली बयां हुई है. उषा प्रियम्वदा की वापसीमें गजाधर बाबू लम्बी नौकरी के दौरान घर से दूर रहने के बाद यह अभिलाषा लिए घर लौटते हैं कि अब उन्हें परिवार  का संग-साथ मयस्सर होगा, लेकिन वे पाते हैं कि घर और परिवार में अब उनके लिए कोई जगह नहीं है. भीष्म साहनी की कहानी चीफ़ की दावतमें मिस्टर शामनाथ और उनकी पत्नी के लिए बूढ़ी मां एक ऐसी अनावश्यक वस्तु है जिसे मेहमानों की नज़र से बचाने के लिए कमरे में बंद करना ज़रूरी होता है. लेकिन उसी मां की फुलकारी जब अतिथि चीफ़ साहब को भा जाती है तो मां के प्रति उनका बर्ताव तुरंत बदल जाता है. गौरतलब यह बात है कि इन कहानियों में वृद्धों के प्रति उपेक्षा तो है,  अमानवीयता अधिक नहीं है और हिंसा तो कतई नहीं. लेकिन तब यानि सत्तर के दशक से  अब तक आते-आते हालात बहुत बदल चुके हैं.

हाल में भीलवाड़ा से यह खबर आई कि वहां कलक्टर  के यहां होने वाली जन-सुनवाई में छह महीनों में 29 ऐसे मामले दर्ज़ हुए हैं जिनमें बुज़ुर्ग मां-बाप ने यह शिकायत  करते हुए कि उनके बेटे-बहू उनकी समुचित देखभाल नहीं करते हैं, कलक्टर से सहायता की याचना की है. बुज़ुर्गों  की पीड़ा यह है कि उनके वारिसों ने उनसे उनकी पूरी सम्पत्ति ले ली और जब वे भरण पोषण का खर्चा मांगते हैं तो वे उनके साथ मार-पीट करते हैं. वृद्ध मां-बापों  ने ये मामले वरिष्ठ नागरिकों का भरण पोषण तथा कल्याण अधिनियम 2007 के तहत दर्ज़ करवाए हैं. बात केवल भीलवाड़ा की ही नहीं है. देश के हर शहर और गांव से आए दिन इस तरह की खबरें आती ही रहती हैं. लेकिन अभी कुछ दिन पहले गुजरात के राजकोट से तो और भी बुरी खबर आई है. इस खबर के अनुसार वहां एक बेटे ने अपनी बीमार वृद्धा मां को छत से फेंककर मार ही डाला. हुआ यह कि राजकोट में रहने वाली एक सेवानिवृत्त शिक्षिका जयश्रीबेन विनोदभाई नाथवानी की मृत्यु जिस बिल्डिंग में वे रहती थीं उसकी  छत से गिरने से हो गई. तफ्तीश के बाद पुलिस ने इसे आत्महत्या मानकर केस बंद कर दिया. लेकिन घटना के दो माह बाद पुलिस को एक गुमनाम चिट्ठी मिली और तब सोसाइटी में लगे सीसीटीवी के फुटेज खंगाले गए तो मामला कुछ और ही निकला. इस फुटेज में बेटा अपनी मां को लिफ्ट से छत की तरफ ले जाता दिखाई दिया. बेटे ने पहले तो इस मृत्यु में अपनी किसी भूमिका से इंकार किया, लेकिन जब पुलिस ने सख्ती से पूछताछ की तो उसने मां को छत से नीचे फेंकने की बात कबूल कर ली. उसने कहा कि वो मां की तीमारदारी से परेशान हो गया था. 

बूढे और असहाय मां-बाप की उपेक्षा और उनके साथ दुर्व्यवहार के मामले दुनिया के और देशों में भी सामने आ रहे हैं. हाल में ताइवान से  भी ऐसा ही एक मामला  सामने आया है. लेकिन यहां किस्सा कुछ और है. वहां की शीर्ष अदालत ने मां की इस गुहार पर कि उसने अपने बेटे को डेंटिस्ट बनाने पर भारी खर्च किया, अत: अब वो तब किये गए कॉण्ट्रेक्ट के अनुसार एक बड़ी रकम की हक़दार है, उस बेटे को आदेश दिया है कि वो अपनी मां को करीब छह करोड़ दस लाख रुपये दे. इस मां का कहना है कि उसने अपने दो बेटों को  डेंटिस्ट बनाने पर बहुत भारी रकम खर्च की, लेकिन उसे पहले ही यह आशंका हो गई इसलिए उसने तभी अपने बेटों से एक अनुबंध पर हस्ताक्षर करवा लिए थे कि जब वे कमाने लगेंगे तो उन्हें अपनी कमाई का एक हिस्सा देंगे. गौरतलब है कि अपने पति से तलाकशुदा लुओ ने अकेले दम अपने बेटों को पाला-पोसा था. लुओ के बड़े बेटे ने तो कुछ धनराशि  देकर मां से समझौता कर लिया लेकिन छोटे बेटे चू ने यह कहते हुए मां की याचिका का विरोध किया कि जब उन्होंने यह कॉण्ट्रेक्ट साइन किया था तब उनकी उम्र बहुत कम थी, इस कारण अब इस कॉण्ट्रेक्ट को अवैध  मान लिया जाना चाहिए. अदालत ने बेटे की आपत्ति को अस्वीकार कर दिया है.

अब एक और मामले के बारे में जान लें. अपने ही  मुल्क के शहर इटावा का एक वीडियो इन दिनों वायरल हो रहा है जिसमें यह बताया गया है कि अपने पिता के सख़्त रवैये से परेशान हो एक बच्चा सीधे थाने पहुंच गया है और पुलिसवालों से गुज़ारिश कर रहा है कि वे उसके पिता को सबक सिखाएं. इस प्रसंग में अपने मुल्क की बात मैंने जानबूझकर की है. इसलिए कि पश्चिम में तो बच्चों द्वारा अपने मां-बाप की शिकायत बहुत आम है. लेकिन अपने यहां यह बात  नई है. विचारणीय यह है कि क्या रिश्ते अब इस मुकाम तक आ पहुंचे हैं कि उन्हें सुलझाने के लिए कोर्ट कचहरी की मदद लेनी पड़ रही है!
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 09 जनवरी, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, January 2, 2018

जीवन रक्षक भूमिका भी है सोशल मीडिया की!

सोशल मीडिया हमारी ज़िंदगी में बहुत गहरे उतर चुका है. हममें से ज़्यादातर लोग उसे बरतते हैं, और साथ ही उसकी बुराइयों का रोना भी रोते रहते हैं. बहुतों को यह समय बर्बाद करने वाला शगल लगता है और समय-समय पर कुछ लोग इससे कुछ समय का अवकाश लेने और कुछ इसे सदा के लिए अलविदा कह देने की घोषणाएं करते रहते हैं. कुछ और ऐसे भी हैं जो इसके हानिप्रद  प्रभावों से तो पूरी तरह वाक़िफ़ हैं, लेकिन फिर भी इसे छोड़ नहीं पाते हैं. लेकिन वो कहते हैं ना कि हर बुराई के पीछे कोई  न कोई अच्छाई भी ज़रूर छिपी रहती है, तो ऐसा ही एक वाकया सामने आया है सात समुद्र पार ब्रिटेन  से. लंकास्टर की 33 वर्षीया गृहिणी शॉर्लट सॉल्सबरी  ने जब फ़ेसबुक पर अपनी बिटिया फेलिसिटी की रेटिनोब्लास्टोमा नाम नेत्र व्याधि से ग्रस्त एक आंख की ऐसी तस्वीर पोस्ट  की जिसमें उसकी  आंख की पुतली में एक असामान्य सफेद धब्बा नज़र आ रहा है, तो उन्हें सपने में भी इस बात का अनुमान नहीं था कि उनके द्वारा पोस्ट की गई यह तस्वीर एक और बच्ची के लिए जीवन–रक्षक साबित हो जाएगी.

हुआ यह कि शॉर्लट द्वारा पोस्ट की गई इस तस्वीर पर एक अन्य शहर की निवासी बीस वर्षीया ताओमी की नज़र पड़ी तो यकायक उनका ध्यान इस बात पर गया कि उनकी बीस माह की बेटी लीडिया की आंखें भी कुछ-कुछ ऐसी ही दिखाई देती हैं. ताओमी उन दिनों घर से बाहर रहकर छुट्टियां मना रही थीं. करीब दो सप्ताह बाद जब वे घर लौटीं तो वे अपनी बेटी को एक डॉक्टर के पास ले गईं, और डॉक्टर ने जांच करने के बाद जो बताया उससे उनके पैरों के नीचे की ज़मीन ही खिसक गई. डॉक्टर के अनुसार उनकी इस  नन्हीं बिटिया की बांयी आंख इण्ट्राओक्युलर रेटिनोब्लास्टोमा के सबसे भीषण प्रकार, जिसे टाइप ई कहा जाता है,  से ग्रस्त थी. सरल भाषा में इसे यों समझा जा सकता है कि उसकी आंख के भीतर का ट्यूमर या तो बहुत बड़ा है और या इस तरह का है कि उसका कोई इलाज़ मुमकिन ही नहीं है और न ही उस आंख को बचाया जा सकता है. रोग और ज़्यादा न फैले, इसके लिए यह ज़रूरी है कि उस आंख को जल्दी से जल्दी निकाल दिया जाए. ताओमी के पास और कोई विकल्प था भी नहीं. डॉक्टरों ने भी  यही किया. इस बुराई में भी अच्छी बात यही थी कि रोग दूसरी आंख को अपनी गिरफ़्त में नहीं ले पाया था. अन्य कई जांचों के परिणाम अभी आने शेष हैं, लेकिन डॉक्टर आश्वस्त हैं कि उनके उपचार कारगर साबित होंग़े यह नन्हीं बच्ची सामान्य रूप से बड़ी होने लगेगी.

उधर फेलिसिटी भी, जो अब एक बरस की हो चुकी है धीरे-धीरे सामान्य होती जा रही है.  उसे कीमोथैरेपी दी जा रही है. जब वह मात्र नौ माह की थी तब उसके मां-बाप को पता चला कि वो रेटिनोब्लास्टोमा से ग्रस्त है. असल में यह रोग उसे जन्म से ही था, लेकिन मां-बाप इस बात से अनजान थे. एक दिन उनकी एक पारिवारिक मित्र लॉरा पॉवर  जो कि एक नर्स है, का ध्यान उसकी आंखों की असामान्यता पर गया और उसने शॉर्लट सॉल्सबरी  को किसी डॉक्टर से परामर्श लेने की सलाह दी. बाद में शॉर्लट ने बताया कि उन्हें कोई अंदाज़ ही नहीं था कि उनकी बेटी किसी रोग से पीड़ित भी हो सकती है. उनके लेखे तो वह एकदम सामान्य थी. हां, इस बात पर ज़रूर उनका ध्यान गया था  कि जब फेलिसिटी घुटनों के बल रेंगने लगी तो कई बार वह किसी चीज़ से टकरा जाया करती थी. लेकिन उन्हें यह बात असामान्य नहीं लगी. बाद में जब लॉरा की सलाह पर वे डॉक्टरों के पास गई तो अनेक जांचों के बाद उन्हें पता चला कि उनकी इस नन्हीं बिटिया की दोनों आंखों में तीन-तीन बेहद आक्रामक ट्यूमर्स हैं.

बिटिया का इलाज़ करा  चुकने के बाद शॉर्लट सॉल्सबरी ने महसूस किया कि उनका फर्ज़ बनता है कि वे अन्य मां-बापों को भी इस गम्भीर रोग के बारे में जानकारी दें. वैसे, जब शुरु-शुरु में फेलिसिटी की इस बीमारी का पता चला तो वे इसे गोपनीय रखती रहीं थी, लेकिन बाद में उन्हें लगा कि ऐसा करना उचित नहीं है. और तब उन्होंने फेसबुक पर इस रोग के बारे में पूरी जानकारी पोस्ट की. उनका खयाल था कि वहां उनके जो दोस्त हैं वे इस पोस्ट को पढ़कर सचेत होंग़े, लेकिन देखते ही देखते उनकी इस पोस्ट को दुनियाभर में पैंसठ हज़ार लोगों ने साझा कर दिया. ज़ाहिर है इस पोस्ट से जो लोग लाभान्वित हुए उनमें से ताओमी भी एक हैं. ताओमी ने शॉर्लट  के प्रति  अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहा भी कि अगर आपने यह पोस्ट नहीं लिखी होती तो मैं अपनी बिटिया के इस रोग से अनजान ही रह गई होती.
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 02 जनवरी, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित अलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, December 26, 2017

एक बिल्ली जिसका नाम है जॉय फॉर ऑल!

अमरीका की एक प्रसिद्ध खिलौना कम्पनी की बनाई हुई एक बिल्ली, जिसका नाम जॉय फॉर ऑल है, पिछले दो बरसों से बाज़ार में है. यह बिल्ली गुर्राती है, म्याऊं म्याऊं करती है, अपने पंजे  को चाटती है और कभी-कभी उलटी होकर लेट भी जाती है ताकि आप इसका पेट सहला सकें. इस बिल्ली का निर्माण वरिष्ठ जन के लिए एक साथी की ज़रूरत को ध्यान में रखकर किया गया था. यहां याद कर लेना उचित होगा कि पश्चिमी देशों में बढ़ती उम्र का अकेलापन बहुत बड़ी सामाजिक समस्या है. यह बिल्ली अकेलेपन से जूझ रहे बूढों को कम्पनी देती है और बूढों को इसका मल मूत्र भी साफ नहीं करना पड़ता है. यानि यह बग़ैर उनकी ज़िम्मेदारी बढ़ाए उन्हें साहचर्य प्रदान करती है. लेकिन अच्छी ख़बर  इसके बाद है.

अमरीका की  नेशनल साइंस फाउण्डेशन ने तीन बरस के लिए एक लाख मिलियन डॉलर का अनुदान दिया है जिसकी मदद से यह खिलौना कम्पनी और ब्राउन यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक मिलकर इस इस रोबोटिक बिल्ली को कृत्रिम बुद्धि से भी युक्त  कर देंगे. आशा की जाती है कि यह कृत्रिम बुद्धि सम्पन्न  बिल्ली वृद्धजन को उनके रोज़मर्रा के सामान्य काम निबटाने में मददगार साबित होगी. फिलहाल ब्राउन विश्वविद्यालय के ह्युमैनिटी सेण्टर्ड रोबोटिक्स इनिशिएटिव के शोधकर्ता इस बात की पड़ताल में जुटे हैं कि इस बिल्ली को ऐसे कौन कौन-से कामों के लिए तैयार करना उपयुक्त होगा जो घर में अकेले रहने वाले वृद्धजन के लिए उपयोगी हों. इस बात के लिए ये लोग शोधकर्ताओं की टीम की मदद से यह पड़ताल कर रहे हैं कि वृद्धजन की रोज़मर्रा की ज़िंदगी कैसी होती है और उनकी ज़रूरतें क्या  होती हैं. वे यह भी सुनिश्चित कर रहे हैं कि उन्नत बिल्ली नए काम किस तरह करेगी. विश्वविद्यालय के एक प्रोफ़ेसर ने मज़ाक के लहज़े में कहा कि हमारी यह बिल्ली न तो कपड़े प्रेस करेगी और न बर्तन मांजेगी. उससे कोई यह भी उम्मीद नहीं करता है कि वो गपशप करेगी, और न ही यह आस लगाता है कि वो जाकर अखबार उठा लाएगी. उनके मन में यह बात बहुत साफ़ है कि बोलने वाली बिल्ली की ज़रूरत किसी को  नहीं है. इस प्रोफ़ेसर ने यथार्थपरक लहज़े में कहा कि हम अपनी इस बिल्ली की कार्यक्षमता के बारे में बढ़ा-चढ़ाकर कोई दावा नहीं करना चाहते. हम तो बस एक ऐसी बिल्ली तैयार करना चाहते हैं जो रोज़मर्रा के बहुत सामान्य काम कर सके, जैसे कि वो अपने साथी वृद्ध को उनकी खोई चीज़ें तलाश करने में मदद कर दे या उन्हें डॉक्टर के अपाइण्टमेण्ट की याद दिला दे या ज़रूरत पड़ने पर यह सुझा दे कि वे किसे फोन करें! और हां, उनकी कोशिश यह भी है कि यह बिल्ली बहुत  महंगी न हो, हर कोई इसे खरीद सके. अभी जो बिल्ली बाज़ार में उपलब्ध है उसकी कीमत एक सौ डॉलर है और इनकी कोशिश है कि यह नई कृत्रिम बुद्धि वाली बिल्ली इससे थोड़ी ही ज़्यादा कीमती  हो. यही वजह है कि इन लोगों ने अपनी इस परियोजना को नाम दिया है: अफोर्डेबल रोबोटिक इण्टेलीजेंस फॉर एल्डरली सपोर्ट- संक्षेप में एरीज़ (ARIES).

पश्चिमी दुनिया की सामाजिक परिस्थितियों में कृत्रिम बुद्धि सम्पन्न बिल्ली का यह विचार बहुत पसंद किया जा रहा है. एक कामकाज़ी महिला ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि उनकी 93 वर्षीया मां उनके साथ रहती हैं और उम्र के साथ वे बहुत सारी बातें भूलने लगी हैं. लेकिन उन्होंने  अपनी मां को जो जॉय फॉर ऑल बिल्ली खरीद कर दी वह उनके लिए बहुत मददगार साबित हुई है और जब वे काम पर चली जाती हैं तो बिल्ली उनकी मां की बहुत उम्दा साथिन साबित होती है, उनकी मां भी उससे  असली बिल्ली जैसा  ही बर्ताव करती हैं, हालांकि वे यह जानती है कि यह बिल्ली बैट्री चालित है. वे सोचती हैं कि जब यह बिल्ली कृत्रिम बुद्धि से युक्त हो जाएगी तो उनकी मां के लिए इसकी उपादेयता कई गुना बढ़ जाएगी. अभी मां काफी कुछ भूल जाती है, बिल्ली उन्हें ज़रूरी बातें याद दिला दिया करेगी.

इस परियोजना पर काम कर रहे विशेषज्ञों को उम्मीद है कि निकट भविष्य में विकसित की जाने वाली यह कृत्रिम बुद्धि युक्त बिल्ली मनुष्यों के साथ एक ऐसा पारस्परिक रिश्ता  कायम कर सकेगी जिसकी उन्हें बहुत ज़्यादा ज़रूरत है. वे यह भी उम्मीद कर रहे हैं कि उनके द्वारा विकसित की जाने वाली यह बिल्ली वृद्धजन को एकाकीपन, चिंता और अवसाद से काफी हद तक निज़ात दिला सकने में कामयाब होगी. कामना  करनी चाहिए कि वर्तमान सुख-सुविधाओं और अमीरी की तरफ बुरी तरह  भागते-दौड़ते और व्यक्ति केंद्रित समाज ने जो समस्याएं पैदा कर दी हैं उनसे एक हद तक मुक्ति दिलाने में और कोई नहीं तो यह यांत्रिक प्राणी तो सफल हो ही जाएगा.

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 जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 26 दिसम्बर, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.            

Tuesday, December 19, 2017

आभासी दुनिया में भी मनुष्य तो मनुष्य ही होता है!

आम चर्चाओं में अक्सर आभासी दुनिया की गतिविधियों  को यह कहकर नकारा जाता है कि इनका ज़मीनी हक़ीक़त से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं होता है लेकिन हाल में अमरीका के पूर्वी हार्लेम के 22 वर्षीय रैप गायक सह प्रोड्यूसर स्पेंसर स्लेयॉन और फ्लोरिडा की रिटायरमेण्ट कम्युनिटी में रहने वाली 81 वर्षीया रोज़ालिन गुटमैन की दोस्ती का किस्सा सामने आया तो इस नकार पर पुनर्विचार की ज़रूरत महसूस होने लगी. हुआ यह कि स्पेंसर को अपने मोबाइल पर वर्ड्स विथ फ्रैण्ड्स नामक एक खेल खेलने का चस्का लगा. स्क्रैबल से मिलते-जुलते इस खेल को किसी अजनबी लेकिन वास्तविक साथी के साथ खेलना होता है. अजनबी साथी का चयन खेल स्वत: कर देता है. खेल  के आनंद और रोमांच को और बढ़ाने के लिए दोनों खिलाड़ी परस्पर चैट भी कर सकते हैं. तो स्पेंसर को इस खेल के लिए साथी मिलीं रोज़ालिन और उन दोनों ने  सैंकड़ों गेम खेल डाले. लेकिन रहे वे खेल तक ही सीमित. कभी उन्होंने चैट नहीं की. खेल का चस्का दोनों को ऐसा लगा कि वे हर रोज़ खेलने लगे, और इसी क्रम में आहिस्ता-आहिस्ता चैट भी करने लगे. चैट की शुरुआत तो खेल विषयक मुद्दों से ही हुई लेकिन फिर वे अपने निजी जीवन को लेकर भी गपशप करने लगे, और इसी इलसिले में एक दिन स्पेंसर ने रोज़ालिन को यह भी बता दिया कि वो संगीत की दुनिया में अपनी जगह बनाने के लिए न्यूयॉर्क चला जाना चाहता है. बात आगे बढ़ती इससे पहले कुछ ऐसी व्यस्तताएं आड़े आईं कि स्पेंसर ने खेल खेलना बंद कर दिया और अपने मोबाइल से इस खेल के एप को भी डिलीट करने का इरादा कर लिया. लेकिन तब तक उसकी दोस्ती रोज़ालिन से इतनी गहरी हो चुकी थी कि उसे यह ज़रूरी लगा कि यह करने से पहले वो उन्हें अलविदा कह दे.  चैट करते हुए उसने उनसे पूछा कि वे उसे क्या सलाह देना चाहेंगी? और रोज़ालिन का जवाब था, ‘तुम अपनी ज़िंदगी से जो भी चाहते हो, हाथ बढ़ाओ और उसे अपनी मुट्ठी में कर  लो!और वो न्यूयॉर्क चला गया.

वहां जाकर और अपने सपने को पूरा करने के लिए जद्दोज़हद करते हुए यकायक एक दिन उसे फिर इस खेल की याद आई और उसने इसे अपने मोबाइल में फिर से इंस्टॉल कर डाला. रोज़ालिन से भी उसका फिर सम्पर्क कायम हो गया. इसी बीच एक दिन जब वह किसी से गपशप कर रहा था तो उसने अपनी इस ऑनलाइन मित्र की सराहना भरी चर्चा की. संयोग से इस चर्चा को उसके एक स्थानीय मित्र की मां एमी बटलर ने सुन लिया. एमी वहां के एक चर्च में धर्मोपदेशक थीं और उन्हें लगा कि दो दोस्तों की यह कथा तो उन्हें अपने किसी प्रवचन में भी सुनानी चाहिए. लेकिन  कहानी में हक़ीक़त के और रंग भरने के लिए उन्हें रोज़ालिन से मिलना ज़रूरी लगा. उन्होंने फोन पर बात की तो यह महसूस किया कि अगर वे रोज़ालिन से प्रत्यक्ष मुलाकात करें तो और भी अच्छा रहेगा. और एमी बटलर स्पेंसर स्लेयॉन को साथ लेकर पहुंच गईं रोज़ालिन के पास उनके शहर फ्लोरिडा में. स्पेंसर और रोज़ालिन की पहली प्रत्यक्ष मुलाक़ात का अपना अनुभव साझा करते हुए एमी ने बाद में बताया कि उनका यह मिलन मेरी कल्पना से कहीं ज़्यादा खूबसूरत था. उनके हाव-भाव में तनिक भी असहजता नहीं थी और दोनों में एक दूसरे के प्रति चुम्बकीय आकर्षण था.

ज़्यादा वक़्त तीनों में से किसी के भी पास नहीं था. लेकिन एमी ने इस मुलाक़ात की जो तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा कीं उनमें कुछ ऐसा जादू था कि उन्होंने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी तरफ खींचा. बाद में स्पेंसर ने कहा कि उनके देश में जिस तरह का नस्लीय माहौल है उसके संदर्भ में एक अश्वेत पुरुष और श्वेत स्त्री की इस मैत्री का ऐसा स्वागत समय की एक बड़ी ज़रूरत को पूरा करने  वाली बात है. रोज़ालिन ने हालांकि पत्रकारों से कोई बात नहीं की, एमी से अपनी बातचीत में ज़रूर उन्होंने ताज़्ज़ुब किया कि इस मुलाकात में ऐसा विलक्षण क्या है? क्या तमाम लोगों को आपस में ऐसा ही व्यवहार नहीं करना चाहिए! रोज़ालिन का यह कथन अनायास ही हमें अपने समय के बड़े कथाकार स्वयंप्रकाश की कहानी  उस तरफ की याद दिला देता है जिसमें एक पत्रकार जैसलमेर के एक गांव में लगी भीषण आग में से बारह बच्चों को जीवित बचा ले आने वाले एक बेहद मामूली  आदमी नखतसिंह से इण्टरव्यू  करने जाता है और नखतसिंह उसी से सवाल करने लगता है कि जो कुछ उसने किया उसमें असाधारण क्या थ! स्पेंसर और रोज़ालिन की मैत्री कथा ने एक बार फिर से यह साबित कर दिया है कि मनुष्य तो मनुष्य ही होता है, चाहे वह यथार्थ दुनिया में हो या आभासी दुनिया में!


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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 19 दिसम्बर, 2017 को प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Wednesday, December 13, 2017

चुप्पी तोड़ने वाले बने टाइम के पर्सन ऑफ द ईयर

साल के आखिरी माह  में सारी दुनिया बड़ी बेसब्री से इंतज़ार करती है कि लोकप्रिय पत्रिका टाइम किसे अपना पर्सन ऑफ द ईयर घोषित करती है. इस पत्रिका ने 1927 से इस सिलसिले को शुरु किया था. विचार यह था कि हर बरस किसी ऐसे व्यक्ति नामांकित किया जाए जिसने बीते बरस में सकारात्मक या नकारात्मक किसी भी तरह से ख़बरों को प्रभावित किया हो. शुरुआती बरसों में ये लोग मैन ऑफ द ईयर घोषित करते थे लेकिन 1999 से इस सम्मान का नाम बदल कर पर्सन ऑफ द ईयर कर दिया गया. ज़ाहिर है कि यह बदलाव सारी दुनिया में लैंगिक समानता की बढ़ती जा रही स्वीकृति की परिणति था. इस बरस एक लम्बी प्रक्रिया के बाद किसी व्यक्ति को नहीं अपितु एक समूह को यह सम्मान प्रदान किया गया है. यहीं यह भी स्मरण कर लेना उपयुक्त होगा  कि इस  पत्रिका ने अतीत में भी व्यक्ति की बजाय समूह का चयन किया है. लेकिन इसकी विस्तृत चर्चा थोड़ी देर बाद. अभी तो यह कि टाइम पत्रिका ने यौन उत्पीड़न और दुर्व्यवहार के विरुद्ध आवाज़ उठाने वाली महिलाओं और पुरुषों को साल 2017 के लिए पर्सन ऑफ द ईयर चुना है. टाइम पत्रिका ने इन्हें एक नया नाम दिया है: द साइलेंस ब्रेकर्स यानि चुप्पी तोड़ने वाले. पर्सन ऑफ द ईयर की इस दौड़ में अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प दूसरे नम्बर पर रहे हैं.

अक्टोबर माह में न्यूयॉर्क टाइम्स और द न्यूयॉर्कर में एक खोजपरक  रिपोर्ट छपी थी जिसमें कई मशहूर अभिनेत्रियों  ने हॉलीवुड के प्रख्यात निर्माता निर्देशक हार्वी वाइन्सटाइन पर यौन उत्पीड़न के गम्भीर आरोप लगाए थे. इस रिपोर्ट  के बाद तो जैसे अपनी व्यथा-कथा सुनाने वालों की बाढ़ ही आ गई. सारी दुनिया से स्त्रियों ने (और कुछ पुरुषों ने भी) अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न  की घटनाएं उजागर  कीं. टाइम पत्रिका के प्रधान सम्पादक एडवर्ड फेलसेनथाल ने ठीक कहा है कि “यह बहुत तेज़ी से होता हुआ सामाजिक बदलाव है जिसे हमने दशकों में देखा है. इसकी शुरुआत सैंकड़ों महिलाओं और कुछ पुरुषों के व्यक्तिगत साहस से हुई जिन्होंने आगे बढ़कर अपनी कहानियां बयां कीं.”  इस सामाजिक बदलाव को लाने में सोशल मीडिया ने बहुत बड़ी भूमिका अदा की. वहां प्रयुक्त हैशटैग #मी टू दुनिया के 85 देशों में अनगिनत बार इस्तेमाल किया जा चुका है. कुछ लोगों के वैयक्तिक साहस से शुरु हुआ यह अभियान अब जागरण का एक बहुत बड़ा आंदोलन बन चुका है और यह खिताब इस आदोलन की बड़ी स्वीकृति का परिचायक है. लेकिन टाइम की तरफ से यह  भी सही कहा गया है कि अभी यह कहना बहुत कठिन है कि इस आंदोलन का कुल जमा हासिल क्या है. इसका कितना असर  हुआ है और कितना और होगा? यह तो आने वाला समय ही बताएगा कि कुछ लोगों के अपना सच अनावृत करने से शुरु हुए इस आंदोलन ने लोगों के जीवन यथार्थ को बदलने में कितनी सफलता पाई है. लेकिन आम तौर पर इस चयन का बहुत गर्मजोशी से स्वागत हुआ है. एक सामान कामकाजी अमरीकी महिला डाना लुइस ने कहा कि “मैं अपनी ग्यारह वर्षीया बेटी को दिखाना चाहती हूं कि खुद के लिए भी खड़ा होना चाहिए, भले ही तुम्हें लगे कि पूरी दुनिया तुम्हारे खिलाफ़ है. अगर तुम लड़ती  रहोगी तो एक दिन तुम्हें कामयाबी भी ज़रूर हासिल होगी.”  

इस चयन की घोषणा के बाद यही बात बरसों पहले मी टू अभिव्यक्ति  का सृजन करने वाली तराना बर्क और हाल में इसे प्रोत्साहित करने वाली अभिनेत्री एलिसा मिलानो ने भी अपने अपने साक्षात्कारों में कही है.  तराना बर्क ने कहा कि “मैं तो शुरु से ही यह कह रही हूं कि यह महज़ एक क्षण नहीं, एक आंदोलन है. मेरा खयाल है कि हमारा काम तो अब शुरु हो रहा है. यह हैशटैग एक घोषणा है. लेकिन अब हमें वाकई  उठ खड़ा होना और काम करने लगना है.”  मिलानो ने उनकी हे एबात को जैसे आगे बढ़ाते हुए अपनी रूप्रेखा सामने रखी और कहा, “मैं चाहती हूं कि कम्पनियां अब एक आचार संहिता अपनाएं, कम्पनियां और ज़्यादा औरतों को नौकरियां दें. मैं चाहती हूं कि हम अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा दें. हमें इन सब कामों को गति देना है और बतौर स्त्री हम हम सबको एक दूसरी का समर्थन करना है और कहना है कि बहुत हुआ यह सब, अब और नहीं सहेंगी हम.”

अब यह भी जान लें कि टाइम पत्रिका ने सन 1950 में  पहली दफा किसी व्यक्ति की बजाय समूह को यह सम्मान प्रदान किया था. तब यह सम्मान द अमरीकन फाइटिंग मैन  को दिया गया था. इसके बाद 1966 में अमरीकन्स अण्डर 25को, 1975 में अमरीकन वुमननाम से चुनिंदा बारह अमरीकी महिलाओं को,  2002 में द व्हिसलब्लोअर्सको और  2006 में यूयानि हम सबको सामूहिक रूप से यह सम्मान दिया जा चुका है. 

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 12 दिसम्बर, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, December 5, 2017

क्या तकनीक दुनिया की ग़ैर बराबरी को और बढ़ा रही है?

इस बात से शायद ही किसी को असहमति  हो कि आज का समय तकनीक का समय है. जीवन के हर क्षेत्र में तकनीक का न सिर्फ दख़ल है, वो निरंतर बढ़ता भी जा रहा है. इस बात को भी आम तौर पर स्वीकार किया जाता है कि तकनीक ने हमारे जीवन को बेहतर बनाया है. हमारे शारीरिक श्रम में बहुत कमी आई है, हमारी सेहत बेहतर और उम्र लम्बी हुई है और जीवन के लिए सुख सुविधाओं में कल्पनातीत वृद्धि हुई है. हमारे मनोरंजन के साधन बढ़े हैं और ऐसी परिस्थितियां भी उत्पन्न हुई और बढ़ी हैं कि हम इन साधनों का अधिक लाभ उठा पा रहे हैं. लेकिन यह ज़रूरी नहीं है कि सभी लोग ऐसा ही मानते हों. जहां आम लोग तकनीक के फायदों को स्वीकार करते हैं कुछ लोग ऐसे भी हैं जो भविष्य में ज़रा ज़्यादा दूर तक देख पा रहे हैं और हमें आगाह कर रहे हैं कि तकनीक पर हमारी बढ़ती जा रही निर्भरता मानवता के लिए घातक भी साबित हो सकती है.

जो लोग इस तरह की चेतावनियां दे रहे हैं उनके संदेश भी निराधार नहीं हैं. ऐसे ही लोगों में से एक हैं येरूशलम की हीब्रू यूनिवर्सिटी के इतिहास विभाग के प्रोफेसर युवल हरारी. युवल हरारी की दो किताबें, ‘सैपियंस: अ ब्रीफ़ हिस्ट्री ऑफ ह्यूमनकाइण्ड और होमो डिअस: अ ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टुमारो इधर  बेहद चर्चित हैं. युवल हरारी इतिहास के माध्यम से भविष्य को समझने आंकने का प्रयास करते हैं. अपने ऐतिहासिक अध्ययन का सहारा लेकर वे इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि तकनीकी विकास न सिर्फ दुनिया को, पूरी मानव जाति को बदल देगा, लेकिन इसी के साथ वे यह चेतावनी देना भी नहीं भूलते हैं कि इसी तकनीकी विकास की वजह से  मनुष्य मनुष्य के बीच असमानता  की खाई भी चौड़ी होगी. कुछ लोग तकनीक की मदद से बहुत आगे निकल जाएंगे तो कुछ बहुत पीछे  छूट जाएंगे. और यहीं अपनी चेतावनी को वे ऐतिहासिक आधार देते हैं. वे कहते हैं कि मानवता का इतिहास ही असमानता का इतिहास है. हज़ारों बरस पहले भी असमानता थी, आज भी है और आगे भी रहेगी. इतिहास की बात करते हुए वे एक दौर यानि औद्योगिक क्रांति को ज़रूर अपेक्षाकृत समानता के दौर के रूप में याद करते हैं लेकिन भविष्य को लेकर वे बहुत आशंकित हैं.

युवल हरारी जब उदाहरण देकर यह बात बताते हैं कि आज मशीनों पर हमारी निर्भरता बढ़ती जा रही है और हमारे बहुत सारे काम मशीनों ने हथिया लिये हैं तो उसी स्वर में वे हमारा ध्यान इस बात की तरफ भी खींचते हैं कि जब बहुत सारे कामों के लिए मनुष्यों की ज़रूरत ही नहीं रह जाएगी तो सरकारों की निगाह में भी तो वे अनुपयोगी हो जाएंगे. सरकारें  भला उनकी परवाह क्यों करेंगी? कहीं ऐसा तो नहीं होगा कि इंसानों की एक ऐसी जमात खड़ी हो जाए जिसकी ज़रूरत न समाज को हो और न देश को हो. अगर ऐसा हुआ तो इस जमात की आवाज़ भी कोई क्यों सुनेगा? इसकी पढ़ाई-लिखाई की, इसकी सेहत की, इसके लिए जीवनोपयोगी सुविधाएं जुटाने की फिक्र भला कोई भी सरकार क्यों करेगी? और यह बात तो हम आज भी देखते हैं कि बहुत सारी जगहों पर सरकार उन पॉकेट्स में ज़्यादा सक्रिय रहती है जहां उसके वोटर्स होते हैं. वे बहुत सारे पॉकेट्स जहां मतदान  के प्रति उदासीन लोग रहते हैं, सरकार की अनदेखी झेलते हैं.

इतिहास का सहारा लेकर हरारी एक और बात कहते हैं जो बहुत भयावह है. वो कहते हैं कि पहले बीमारी और मौत की निगाह में सब लोग बराबर होते थे. लेकिन अब जिसकी जेब में पैसा  है वो तो बीमारी से लड़ कर उसे हरा भी देता है, जिसके पास पैसा नहीं है वो बीमारी के आगे हथियार डालने को मज़बूर है. हरारी एक सर्वे का ज़िक्र करते हैं जिसके मुताबिक अमरीका की बहुत रईस एक फीसदी आबादी की औसत उम्र बाकी अमरीकियों की तुलना में पंद्रह  बरस अधिक है. इसी बात का विस्तार करते हुए वे कहते हैं कि भविष्य में यह भी तो सम्भव है कि पैसों के दम पर कुछ लोग अपनी उम्र और बहुत लम्बी कर लें. सेहमतमंद बने रहना आपकी जेब पर ही निर्भर होता जाएगा. और बात यहीं खत्म नहीं होती है. हरारी चेताते हैं कि यह भी तो सम्भव है कि जिनके पास पैसे हों वे सुपरमैन, सुपरह्यूमन या परामानव बन जाएं. पैसों ने आज शरीर को ताकतवर बनाया है, कल वो मन को भी ताकतवर बना सकता है. सवाल यह है कि अगर यही सिलसिला चला तो क्या सारी  दुनिया दो गैर बराबर  हिस्सों में नहीं बंट जाएगी? ऐसा होना मानवता के लिए ख़तरनाक नहीं होगा? हरारी की बातें चौंकाने वाली लग सकती हैं लेकिन उन पर ग़ौर किया जाना हमारे ही हित में होगा.
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न  दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 05 दिसम्बर, 2017 को प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Wednesday, November 29, 2017

सेहत के लिए हानिकारक तो है, लेकिन.......

हो सकता है यह बात आपको अविश्वसनीय लगे, लेकिन है प्रामाणिक कि सिगरेट पीने से हर रोज़ कम से कम 1200 अमरीकी यह दुनिया छोड़ जाते हैं. यह संख्या हत्याओं, एड्स, आत्म हत्याओं, ड्रग्स, कार दुर्घटनाओं और शराब की वजह से होने वाली मौतों के योग से ज़्यादा है. लेकिन इसके बावज़ूद वहां सिगरेटों के विज्ञापन और उनकी बिक्री पर प्रभावशाली नियंत्रण नहीं हो पा रहा है. और इसके मूल में है अमरीकी सिगरेट लॉबी की सामर्थ्य. यह लॉबी बहुत महंगे और प्रभावशाली वकीलों की मदद से निरंतर कानूनी व्यवस्थाओं को ठेंगा दिखाने में कामयाब हो जाती है. पिछले बीस बरसों से यह लॉबी एक ही रणनीति पर काम करती है और वह है तीन मोर्चों पर अपना बचाव. ये तीन मोर्चे हैं कानूनी लड़ाई, राजनीति और जन भावनाएं. इस लॉबी के एक गोपनीय दस्तावेज़ से यह बात उजागर हुई है कि इनकी रणनीति यह है कि सिगरेट पर स्वास्थ्य विषयक जो दोषारोपण हों, उन्हें वास्तव में नकारने की बजाय उनके बारे में संदेह पैदा कर दिया जाए. और इस रणनीति में यह लॉबी अब तक कामयाब रही है.

अब से ग्यारह बरस पहले वॉशिंगटन की एक संघीय अदालत नौ माह तक सुनवाई करने के बाद इस नतीज़े पर पहुंची कि “अमरीका के सिगरेट निर्माता जनता को धूम्रपान के खतरों की जानकारी  देने के मामले में छल और धोखाधड़ी करते रहे हैं. वे लोग अपने आर्थिक  लाभ के लिए मानवीय त्रासदी की अनदेखी करते हुए अपने खतरनाक उत्पादों को पूरे जोशो-खरोश के साथ बेचते रहे हैं.” और इसलिए इस अदालत ने अमरीका के चार प्रमुख सिगरेट निर्माताओं को यह आदेश दिया कि वे एक  सुधारात्मक वक्तव्य ज़ारी कर इस बात को  सार्वजनिक रूप से स्वीकार करें कि वे अपने उत्पादों से होने वाली हानि के मामले में जनता को अब तक बेवक़ूफ बनाते रहे हैं और यह जानते हुए भी कि कम टार वाली या लाइट सिगरेटें भी उतनी ही नुकसानदायक हैं, जनता में उनके काल्पनिक लाभों का प्रचार करते रहे हैं. अदालत के आदेशानुसार एक निश्चित तिथि से प्रमुख अखबारों  और टेलीविज़न नेटवर्क्स पर  इस आशय का सुधारात्मक वक्तव्य प्रकाशित-प्रसारित किया जाना शुरु होना था.   यह वक्तव्य एक पूरे साल सप्ताह में पांच बार शाम सात से दस बजे के बीच प्रमुख नेटवर्क्स पर प्रसारित किया जाना था.  यही वक्तव्य पचास अग्रणी अखबारों में भी पूरे पन्ने के विज्ञापन के रूप में लगातार पांच रविवार प्रकाशित किया जाना था. अदालत ने यह भी आदेश दिया कि यह  सुधारात्मक वक्तव्य इस सूचना के साथ प्रकाशित प्रसारित किया जाए कि सिगरेट कम्पनियों ने जानबूझकर अमरीकी जनता को धूम्रपान के ख़तरों से अनभिज्ञ रखा. इस पूरे वक्तव्य के पहले अनिवार्यत: यह भी लिखा जाना था कि यह है सच्चाई!’.

लेकिन असल खेल इसके बाद शुरु हुआ. सिगरेट कम्पनियों ने  इस आदेश के खिलाफ़ अपील की और वे यह अनुमति पाने में कामयाब रहीं कि बजाय उक्त सूचना के वे यह लिखेंगी कि एक संघीय अदालत ने कम्पनियों को यह आदेश दिया है कि वे धूम्रपान के स्वास्थ्य विषयक प्रभावों के बारे में यह वक्तव्य ज़ारी करें. दोनों इबारतों को ध्यान से  पढ़ने पर उनसे मिलने वाले संदेश के अंतर को आसानी से समझा जा सकता है. खतरे को प्रभावमें बदल देने से सारी भयावह गम्भीरता धुंए में उड़ गई है. यही नहीं, अब इस इबारत में सिगरेट उद्योग के उस दीर्घकालीन छलपूर्ण अभियान का कोई ज़िक्र ही नहीं है जिसे माननीय अदालत ने सुधारना चाहा था. यानि अपने वकीलों की काबिलियत के बल पर अति समृद्ध अमरीकी सिगरेट उद्योग अमरीकी जनता की सेहत के साथ बरसों किए गए खिलवाड़ के बारे में न सिर्फ आत्म स्वीकृति करने से बच गया, उसने एक ऐसा नख दंत विहीन वक्तव्य देने की इजाज़त भी प्राप्त कर ली, जो जनता को धूम्रपान के ख़तरों के प्रति तनिक भी आगाह नहीं करता है. यानि कुल मिलाकर हुआ यह कि अदालत ने जो सही काम किया था, उसे यह लॉबी अपने धन बल के दम पर प्रभावहीन कर सकने में सफल हो गई.

वैसे सारी दुनिया के स्वास्थ्य कर्मी और स्वास्थ्य विशेषज्ञ अब करीब-करीब एकमत हैं कि धूम्रपान सेहत के लिए नुकसानदायक है. कहा तो यह जाता है कि खुद सिगरेट उद्योग भी न सिर्फ इस यथार्थ से परिचित है, अपनी गोपनीय बैठकों में वह इसे स्वीकार  भी करता है, लेकिन उनके व्यावसायिक हित इतने प्रबल हैं कि वह  तमाम तरह के भाषाई छल  छद्म का सहारा लेकर यथार्थ को कुछ इस अंदाज़ में प्रस्तुत करने की अनुमति हासिल कर लेता है कि वह यथार्थ यथार्थ न रहकर निरर्थक शब्दों का खूबसूरत लगने वाला कागज़ी गुलदस्ता मात्र रह जाता है. उनका एकमात्र सरोकार यह है कि धंधा चलता रहे और तिजोरियां भरती रहें.  

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत बुधवार, 29 नवम्बर, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, November 21, 2017

पश्चिम ने डिजिटल से किनारा करना शुरु किया

भारतीय टेलीविज़न के बहुत लोकप्रिय कार्यक्रमों में से एक कौन बनेगा करोड़पति के अंत में अमिताभ बच्चन कहते थे, यह डिजिटल का ज़माना है, और फिर वे अपने हाथ में लिये हुए टेबलेट के माध्यम से विजेता को आनन-फानन में उसकी जीती हुई धन राशि ट्रांसफर कर देते थे. भारत सरकार ने भी डिजिटलीकरण पर काफी ध्यान दिया है. और इतना ही  क्यों, हम सबकी ज़िंदगी में काफी कुछ डिजिटल हो गया है. पश्चिम से आई इस नई तकनीक ने शुरु-शुरु में अपने नएपन से हमें आकर्षित किया, हालांकि अनेक आशंकाएं भी इसने जगाईं, और फिर आहिस्ता-आहिस्ता इसकी सुगमता, तेज़ी और कम खर्च बालानशींपन ने हम सबको अपना मुरीद बना लिया. आज हालत यह है कि हमारी ज़िंदगी का शायद ही कोई पक्ष ऐसा बचा हो जिसमें डिजिटल का प्रवेश न हो चुका हो.

लेकिन बहुतों को शायद यह बात अविश्वसनीय भी लगे, लेकिन है सच, कि जिस पश्चिम से यह डिजिटल आंधी हमारी ज़िंदगी में आई है उसी पश्चिम ने अब डिजिटल से दूरी बनाना शुरु कर दिया है.  अमरीका में हाल में ऐसी अनेक किताबें बाज़ार में आई हैं जिनमें डिजिटल तकनीक के हानिप्रद प्रभावों पर सप्रमाण और विस्तार से चर्चा की गई है. इन किताबों में यह चर्चा भी है कि कैसे स्मार्टफोन्स हमारे बच्चों की मानसिकता को विकृत कर रहे हैं और सोशल मीडिया किस तरह हमारी प्रजातांत्रिक संस्थाओं को क्षति पहुंचा रहा है. वहां इस बात की भी चर्चाएं हैं कि डिजिटल तकनीक एकाधिकारवादी प्रवृत्तियों को पुष्ट करती हैं. हाल में अमरीका में हुए एक सर्वेक्षण में यह बात भी सामने आई है कि लगभग सत्तर प्रतिशत अमरीकी डिजिटलीकरण के कारण हुए कामकाज के यंत्रीकरण से रोज़गार के अवसरों पर पड़ने वाले प्रतिकूल असर से चिंतित हैं. मात्र इक्कीस प्रतिशत  अमरीकी फेसबुक को दी जाने वाली  अपनी व्यक्तिगत जानकारियों की गोपनीयता के प्रति आश्वस्त पाए गए और लगभग आधे उत्तरदाता यह मानते  पाए गए कि सोशल मीडिया हमारी मानसिक और शारीरिक सेहत पर बुरा असर डालता है. इस बात की पुष्टि अमरीकी साइकीऐट्रिक एसोसिएशन ने भी कर दी.

और बातें केवल फिक्र करने तक ही सीमित नहीं हैं.  अपने देश में जहां हम हर सम्भव प्रयास कर रहे हैं कि ई बुक्स का चलन बढ़े, अमरीकी प्रकाशकों के संघ के अनुसार यह लगातार तीसरा बरस है जब अमरीका में पारम्परिक मुद्रित किताबों की बिक्री में वृद्धि नोट की गई है. यही नहीं वहां किताबों की दुकानें भी पिछले कई सालों से बढ़ती जा रही हैं. और बात सिर्फ किताबों तक ही सीमित नहीं है. भारत में चलन से करीब-करीब बाहर हो चुकीं विनाइल वाली एलपी रिकॉर्ड्स का चलन वहां बढ़ता जा रहा है और बताया जाता है कि अकेले अमरीका में हर सप्ताह कोई दो लाख विनाइल रिकॉर्ड्स बिक रही हैं. फिल्म वाले कैमरे, कागज़ की बनी नोटबुक्स, बोर्ड गेम्स आदि भी पहले से ज़्यादा खरीदे जाने लगे हैं.

संशयालु लोग कह सकते हैं कि यह सब पुराने के प्रति मोह यानि नोस्टाल्जिया की वजह से हो रहा है. लेकिन यही सच नहीं है. सच यह भी है कि बावज़ूद इस बात के कि डिजिटल सामग्री बहुत सस्ती होती है, लोग किताबों की तरफ इसलिए लौट रहे हैं कि उन्हें लगने लगा है कि किताब हाथ  में लेकर उसके स्पर्श, उसकी गंध, उसकी ध्वनि आदि का जो मिला-जुला अनुभव  आप पाते हैं वह डिजिटल में मुमकिन ही नहीं है. किसी किताब  को आप खरीद, बेच और भेंट में दे सकते हैं, उसके बहाने दोस्ती कर सकते हैं, और अगर पुरानी हिंदी फिल्मों को याद करें तो किताबों में ख़तों का आदान-प्रदान कर मुहब्बत तक कर सकते हैं. यह सुख डिजिटल में कहां?  इतना ही नहीं, गूगल जैसी अग्रणी और भविष्यवादी कम्पनी में भी  पिछले कई बरसो से यह रिवायत है कि वेब डिज़ाइनर्स को अपने किसी भी नए प्रोजेक्ट की पहली योजना कागज़ पर कलम से ही बनानी होती है. कम्पनी का सोच यह है कि स्क्रीन पर काम करने की तुलना में इस तरह से अधिक और बेहतर नए विचार उपजते हैं.

पश्चिम में डिजिटल से पीछे हटने के पक्ष में कुछ और बातों पर भी ध्यान दिया जाने लगा है, जैसे यह कि इससे संचालित सोशल मीडिया में बुरी भाषा का जितना प्रयोग होने लगा है वैसा प्रयोग पारम्परिक माध्यमों में नहीं होता है. इस बात को तो अब पूरी तरह स्वीकार कर ही लिया गया है कि डिजिटल माध्यम मानवीय सम्पर्क के खिलाफ़ जाते हैं, जबकि हमारी बेहतरी के लिए मानवीय सम्पर्कों का होना बेहद ज़रूरी हैं. लेकिन इन तमाम बातों के बावजूद  यह बात सभी स्वीकार करते हैं कि डिजिटल का पूरी तरह त्याग मुमकिन नहीं है. इसलिए अब एक ही विकल्प बचा है और वह यह कि इसका इस्तेमाल विवेकपूर्वक किया जाय और इसके अतिप्रयोग  से बचा जाए. पश्चिमी देश इसी दिशा में  प्रयासरत हैं.


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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्ग्त मंगलवार, 21 नवम्बर, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, November 14, 2017

लाओ, तुम्हारा कचरा हम खरीद लेते हैं!

अगर मैं बग़ैर किसी भूमिका के आपसे यह कहूं कि दुनिया में कम से कम एक देश ऐसा है जिसका संकट हमारी कल्पना से भी परे है, तो निश्चय ही आप चौंक जाएंगे. मैं बात कर रहा हूं एक करोड़ से कम आबादी वाले स्कैण्डिनेवियाई देश स्वीडन की. यह देश आजकल एक बड़े संकट के दौर से गुज़र रहा है, और संकट यह है कि इसके पास कूड़े की इतनी भीषण कमी हो गई है कि इसे अपने पड़ोसी देशों की ओर याचना भरी निगाहों से देखना पड़ रहा है. लेकिन इस बात में एक पेच और है. स्वीडन के पास कूड़े की कमी है, लेकिन यह देश पड़ोसी देशों से कूड़ा खरीद नहीं रहा है. उल्टे वे देश अपना कूड़ा लेने के उपकार के बदले स्वीडन को भुगतान कर रहे हैं. है ना ताज्जुब की बात!

दरअसल स्वीडन ने अपने कूड़े को बरबाद न कर उसको जलाकर अपने रीसाइक्लिंग संयंत्रों को  धधकाए रखने का एक बेहद कामयाब और प्रभावशाली तंत्र विकसित कर लिया है और इस तंत्र के कारण देश की आधी ऊर्जा ज़रूरतें पूरी हो जाती हैं. यहीं यह भी जान लें कि स्वीडन के कचरे का महज़ एक प्रतिशत ही है जो अनुपयोगी रहकर अपशिष्ट भराव क्षेत्रों में डाला जाता है. पिछले कुछ बरसों में स्वीडन ने अपनी राष्ट्रीय रीसाइक्लिंग नीति को इतना मुकम्मल बना लिया है कि बहुत सारी निज़ी कम्पनियां अपशिष्ट पदार्थों का संग्रहण कर उसे जलाकर जो ऊर्जा उत्पन्न करती है वह एक केंद्रीय हीटिंग नेटवर्क के माध्यम से ठिठुरते हुए मुल्क को सुखद ऊष्मा प्रदान करती है. स्वीडन ने 1991 से ही  से जीवाश्म ईंधन पर भारी कर लगाकर उसके प्रयोग को हतोत्साहित करने की नीति लागू कर रखी है. वहां की सरकार ने लोगों को इस बात के लिए भी पूरी तरह शिक्षित और प्रशिक्षित कर दिया है कि वे किसी भी किस्म का कचरा बाहर फेंकने की बजाय उसे रीसाइक्लिंग के लिए दे दिया करें. न सिर्फ इतना, स्वीडन की नगरपालिकाओं ने कचरा संग्रहण का काम भी इतना व्यवस्थित और सुगम कर दिया है कि उसके लिए  कम से कम श्रम और  प्रयत्न करना होता है. वहां की  रिहायशी  इमारतों में स्वचालित वैक्यूम सिस्टम लगा दिये गए हैं जिसके कारण कचरे के संग्रहण और उसे एक से दूसरी जगह ले जाने पर होने वाले खर्च में भी भारी कमी आ गई है. अब हालत यह हो गई है कि स्वीडन का सारा कचरा ऊर्जा पैदा करने में प्रयुक्त हो जाता है लेकिन स्वीडन ने कचरा जलाने के जो संयंत्र अपने देश में लगाए हैं उनकी क्षमता  इतनी ज़्यादा है कि उन्हें चलाए रखने के लिए स्वीडन का अपना कचरा कम पड़ रहा है. 

ऐसे में कुछ पड़ोसी देशों, विशेषकर नॉर्वे और इंगलैण्ड  से  कचरा आयात करके इन संयंत्रों को कार्यरत रखना पड़  रहा है. विदेशों से स्वीडन जो कचरा आयात करता है उसकी मात्रा में लगातार वृद्धि होती जा रही है. सन 2005 से अब तक यह  वृद्धि चार गुना हो  चुकी है. माना जाता है कि अभी लगभग 900 ट्रक कूड़ा प्रतिदिन आयात किया जा रहा है.   लेकिन इसमें भी मज़ेदार बात यह है कि क्योंकि स्वीडन के आस-पास के यूरोपीय यूनियन के अधिकांश देशों में लोगों को अपने कचरे को घर से बाहर डालने पर भारी जुर्माना अदा करना होता है, अत: ये देश उससे कम राशि स्वीडन को चुका कर अपने कचरे से निजात पा रहे हैं. इस तरह उन देशों को तो अपने कचरे से मुक्ति मिल ही रही है, स्वीडन भी जलाने योग्य कचरे की कमी के अपने संकट से मुक्ति पाने के साथ-साथ  कमाई भी कर  रहा है. स्वीडन की यह रीसाइक्लिंग नीति उसके पड़ोसी देशों के लिए भी अनुकरणीय साबित हो रही है लेकिन वे अभी तक कामयाबी के उस मुकाम तक नहीं पहुंच पाये हैं जो स्वीडन हासिल कर चुका है. मसलन, ब्रिटेन ने एक रीसाइक्लिंग नीति तो बना ली है लेकिन वह इतनी जटिल है कि वहां के नागरिक हमेशा भ्रमित ही रहते हैं.

लेकिन इससे यह न समझ लिया जाए कि स्वीडन अपनी व्यवस्थाओं से पूरी तरह संतुष्ट है. अब वहां इस बात पर विमर्श चल  रहा है कि संग्रहीत कचरे को जलाने की बजाय उसकी ठीक से छंटाई  कर उसे समुचित तरह से  रीसाइकल किया जाए ताकि कार्बन डाई ऑक्साईड के उत्सर्जन में कमी लाई जा सके. उल्लेखनीय है कि अभी 85 से 90 प्रतिशत कचरे को ऊर्जा उत्पादन के लिए जलाया जाता है और इस प्रक्रिया में काफी सीओ2 उत्सर्जन होता है.  


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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, दिनांक 14 नवम्बर, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.