Tuesday, June 21, 2016

फ्रांस से शुरु हुआ नई तरह का जन-आन्दोलन

इस बरस मार्च के आखिरी दिन से फ्रांस की राजधानी पेरिस से एक नई तरह के आन्दोलन का सूत्रपात हुआ है. हिन्दी में इस आन्दोलन को कहा जा सकता है ‘जागो  सारी रात!’ और जैसा कि नाम से ही ज़ाहिर हो जाता है, हर शाम छह बजते-बजते लोग पेरिस के रिपब्लिक चौक में इकट्ठा होते हैं और विभिन्न मुद्दों पर अपनी बात कहते हैं. पृष्ठभूमि में यह बात कि   पेरिस  में फरवरी माह में कोई तीन चार सौ लोग मिले और यह विचार करने लगे कि ऐसा क्या किया जाए कि सरकार थोड़े दबाव में आए. और तब एक विचार यह भी आया कि क्यों न लोग एक जगह एकत्रित हों और घर जाएं ही नहीं. बस इसी विचार से जन्मा यह आन्दोलन.   इसकी  शुरुआत हुई फ्रांस के जटिल  श्रम कानून को शिथिल बनाने वाले वहां की वर्तमान सरकार के तथाकथित सुधारवादी कदमों का विरोध करने के लिए लोगों के इकट्ठा होने से. पहला अनुभव बहुत दिलचस्प रहा. लोग पेरिस के उस चौक में इकट्ठा होने ही लगे थे  कि मूसलाधार बारिश होने लगी. इसके बावज़ूद लोग आते रहे और डटे रहे. काफी देर बाद बारिश रुकी, लेकिन लोग फिर भी वहां से गए नहीं. और फिर हर रोज़ लोग वहां जुटने लगे. तब इस आन्दोलन का कोई सुविचारित स्वरूप निर्धारित नहीं  था. चौक में अनगिनत लोग सिर्फ इस आस में इकट्ठा हो गए थे कि सरकार उनकी मांगों की तरफ ध्यान देगी. न आन्दोलन का कोई नेता था और न कोई रूपरेखा. जिसकी जो मर्ज़ी में आए, बोलने लगता था. कुछ अराजक तत्वों के घुस आने की वजह से यदा-कदा यह जमावड़ा छोटी-मोटी हिंसा का शिकार भी हुआ, लेकिन आहिस्ता-आहिस्ता एक व्यवस्था  कायम होने लगी. लोग ही एक दूसरे की मदद करने लगे, संसाधन जुटाने लगे और एक आत्मीयतापूर्ण लेकिन प्रतिरोधक मेले का–सा माहौल बनने लगा.  वक्ताओं के लिए स्टैण्ड आ गया, छोटे-मोटे टैण्ट लगा दिये गए और साधारण काम चलाऊ जलपान की व्यवस्था भी हो गई. कुछ समितियां भी बना ली गई जो समाज और संविधान की नई रूपरेखाओं पर विचार करने लगी हैं. इतना ही नहीं, एक गायक समूह भी तैयार हो गया जो क्रांतिकारी गाने गाता है, और कुछ लोग नारे कविताएं भी रचने लगे हैं. ऐसा लगता है जैसे एक नया लघु समाज उभरने लगा है.


और अब जब इस आन्दोलन  चलते हुए तीन माह से ज़्यादा बीत चुके हैं, इसकी निरंतरता शेष  दुनिया का भी  ध्यान आकर्षित करने लगी है. इस आन्दोलन का बगैर किसी नेतृत्व के इतने समय तक चल जाना यह साबित करता है कि फ्रांस की जनता का अपने राजनीतिज्ञों से मोहभंग  हो चुका है और वहां की वाम सरकार यह साबित करने में नाकामयाब रही है कि वह शक्तिशाली वित्तीय संस्थाओं के दबाब से मुक्त है. लोग  अपने देश के शासन  से भी नाखुश हैं. उनमें से अनेक को लगता है कि वहां आपातकाल जैसे हालात हैं. नागरिकों पर नज़र रखने वाले नए कानून, न्याय व्यवस्था में किए गए बदलाव और सुरक्षा विषयक धर-  पकड़ का बढ़ते जाना लोगों को आहत कर रहा है.  अब यह आन्दोलन पेरिस और फ्रांस की सीमाओं से बाहर निकलकर बेल्जियम, जर्मनी और स्पेन के अस्सी  से ज़्यादा शहरों में फैल चुका है. जर्मनी से बाहर के देशों में इसी तरह के आन्दोलन के माध्यम से सरकारी बजट में कटौती, वैश्वीकरण, बढ़ती जा रही असमानता, निजीकरण और यूरोप महाद्वीप की कठोर प्रवासी  विरोधी नीतियों का विरोध  हो रहा है. किसी ने बहुत सही टिप्पणी की है कि इस जन-प्रतिरोध की शुरुआत पेरिस में नहीं हुई है और न यह फ्रांस तक सीमित रहने वाला है. यह आन्दोलन सीमा रहित है, देशों की परिधियों से मुक्त है और  जो भी इससे जुड़ना चाहते हैं उन सबका स्वागत करता है.

इस आन्दोलन का खुद-ब-खुद शुरु होना और इतने समय तक न सिर्फ जारी रहना बल्कि मज़बूत भी होते जाना इस बात की भी गवाही देता है कि अगर दुनिया में कहीं वास्तविक बदलाव आया तो उसके वाहक नागरिक गण ही होंगे. बहुत दिलचस्प  बात यह है कि अभी तक इस आन्दोलन का न  तो कोई नेता है और किसी संगठन का बैनर यहां दिखाई देता है. यह बात खुद फ्रांस वासियों को चकित करती है. इस स्वत: स्फूर्त आन्दोलन की एक महती कामयाबी यह भी है कि फ्रांस सरकार इसका नोटिस लेने को विवश हुई है और उसने युवा आन्दोलनकारियों के तात्कालिक तुष्टिकरण के लिए चार पाँच सौ मिलियन यूरो की विद्यार्थी सहायता की घोषणा कर दी है. एक सरकारी विज्ञप्ति के अनुसार इस राशि से रोज़गार की तलाश कर रहे युवा स्नातकों  को अनुदान और  अन्य काम सीखने वालों व विद्यार्थियों को सहायता दी जा सकेगी.      


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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 21 जून, 2016 को इसी शीर्षक  से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, June 14, 2016

बिना काम वेतन मिलने से दुःखी यह प्राणी

आम तौर पर हर नौकरी करने वाले की एक ही शिकायत होती है कि उससे बहुत ज़्यादा काम लिया जा रहा है. इसी शिकायत को हमारे ‘ये बेचारा काम के बोझ का मारा’ जैसे विज्ञापन भी अपना अप्रत्यक्ष समर्थन देते हैं. लेकिन हाल में सुदूर पेरिस में एक कामगार फ्रेडरिक डेस्नार्ड ने इससे भिन्न ही शिकायत की है. बहुत महंगे परफ्यूम्स के लिए विख्यात पेरिस की एक कम्पनी में दिसम्बर 2006 से काम कर रहे और वहां 2010 से 2014 के बीच जनरल सर्विस डाइरेक्टर रहे डेस्नार्ड का कहना है कि कम्पनी उनसे बिना कोई काम लिये चार हज़ार डॉलर प्रतिमाह का भुगतान करती रही. पैसा तो उन्हें  ठीक मिल रहा था, लेकिन केवल इतने भर से वो संतुष्ट नहीं थे. डेस्नार्ड ने अपने वकील की मार्फत कम्पनी पर आरोप लगाया है कि हालांकि वे एक वरिष्ठ प्रबन्धकीय पद पर नियुक्त थे, उनके  वरिष्ठ जन उन्हें  बॉय कहकर बुलाते और उनसे  अपने बच्चों को खेल के मैदान से लाने जैसे बहुत छोटे-मोटे निजी काम करवाते. बाद में तो उनके  पास करने को इतना कम काम रह गया कि उनके  बॉस ने उनसे यह कह दिया कि वो घर चले जाएं,  जब उन्हें ज़रूरत होगी वे वे बुला लेंगे, और फिर उन्होंने बुलाया ही नहीं. डेस्नार्ड का आरोप है कि उनसे  कम काम  लेने की यह प्रक्रिया उन्हें  नरक में धकेलने का एक छद्म थी और यह उनके  लिए दु:स्प्वन साबित हुई. इससे उन्हें कई किस्म की स्वास्थ्य समस्याएं होने लगीं जिनमें अल्सर, नींद की समस्या और गहन अवसाद शामिल हैं. इन्हीं समस्याओं के चलते वे  मिर्गी का दौरा पड़ने से एक कार दुर्घटना का शिकार हुए, काफी दिनों तक कोमा में रहे और  फिर उन्हें छह माह से भी ज़्यादा समय सिक लीव पर रहना पड़ा. सन 2014 में इस सिक लीव पर रहते हुए ही उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया.

डेस्नार्ड ने इस मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य क्षति के लिए तथा उन्हें न मिल सकी पदोन्नति की वजह से  हुई क्षति की एवज में कम्पनी से चार लाख डॉलर का हर्ज़ाना मांगा है. डेस्नार्ड ने अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए यह भी कहा है कि हालांकि अपनी नौकरी के काल में उन्हें बहुत कम काम देकर नैतिक और विशेष रूप से शारीरिक रूप से भी नष्ट किया जा रहा था फिर भी वे बिना किसी शिकायत के वहां बने रहे क्योंकि उन्हें पता था कि नौकरियों के लिहाज़ से बाज़ार बहुत बुरे दौर से गुज़र रहा था. डेस्नार्ड ने अपनी अवस्था के लिए एक नूतन अभिव्यक्ति ‘बोर आउट’ का प्रयोग किया है. असल में एक प्रचलित अभिव्यक्ति है ‘बर्न आउट’ जिसका आशय है किसी को बहुत ज़्यादा काम के बोझ के नीचे कुचल डालना. डेस्नार्ड की यह अभिव्यक्ति इसी का विलोम है, जिसका अभिप्राय यह  है कि किसी को बहुत कम काम देकर नष्ट कर डालना. डेस्नार्ड के वकील का कहना है कि ‘बोर आउट’ को काम की कमी की वजह से होने वाले नैतिक शून्यीकरण के रूप में समझा जा सकता है जिसके मूल में यह विचार होता है कि मुझे कुछ नहीं करने के एवज़ में इतना पैसा दिया जा रहा है.


डेस्नार्ड के वकील ने आरोप लगाया है कि कम्पनी की  तो नीयत ही यही थी कि डेस्नार्ड को इतना बोर कर डाला जाए कि वह खुद नौकरी छोड़ दे ताकि कम्पनी उसे काम से निकालने पर देने वाले बेरोज़गारी भत्ते  या और किसी भी तरह के मुआवज़े के भुगतान से बच जाए. इस वकील ने कहा कि शुरु-शुरु में तो डेस्नार्ड को ऐसा आदर्श कर्मचारी माना जाता था जो अपने काम के प्रति पूर्णतया समर्पित है. लेकिन 2009 से उसको दिए जाने वाले काम में कटौती की जाने लगी और फिर 2012 में जब कम्पनी के हाथ से एक बड़ा अनुबंध फिसल गया और कम्पनी अपने बहुत सारे कर्मचारियों को काम से निकालने पर मज़बूर होने लगी तब से उसके पास करने को कुछ रह ही नहीं गया. डेस्नार्ड की इस शिकायत पर स्वाभाविक ही उनकी नियोजक कम्पनी ने अपना बचाव किया और कम्पनी के वकील ने कहा कि अगर ऐसा था तो डेस्नार्ड अपने उच्चाधिकारियों से या किसी कर्मचारी संगठन से इस बारे में कोई शिकायत क्यों नहीं की.

कहा जा रहा है कि डेस्नार्ड का यह केस फ्रांस में अपनी तरह का पहला केस है, हालांकि वहां की अर्थव्य्वस्था बहुत बुरे दौर से गुज़र रही है. एक शोधकर्ता ने बताया है कि लगभग तीस प्रतिशत फ्रेंच कर्मचारी इसी तरह के बोर आउट अवसाद के शिकार हैं. यह भी एक तथ्य है कि अभी तक फ्रेंच कानून में इस अभिव्यक्ति बोर आउट को कोई स्वीकृति नहीं है.

देखना है कि फैसला किसके हक़ में आता है – डेस्नार्ड के या कम्पनी के!
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम  कुछ इधर कुछ उधर के अन्तर्गत मंगलवार, 14 जून, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.  


Tuesday, June 7, 2016

बेटियों के पक्ष में राष्ट्रगान में बदलाव की मांग

कनाडाई संसद में वहां के एक लिबरल सांसद मॉरिल  बेलांगर ने राष्ट्रगान में संशोधन का एक बिल पेश कर रखा  है.  वे चाहते हैं कि कनाडा के  वर्तमान राष्ट्रगान में आने वाले शब्दों ‘तुम अपने सभी बेटों में देशभक्ति जगाते हो’ को बदल कर ‘तुम हम सबमें देशभक्ति जगाते हो’ कर दिया जाए, यानि वे इसे बेटों तक सीमित नहीं रहने देना चाहते हैं. मॉरिल का कहना है कि इस संशोधन के माध्यम से वे उन स्त्रियों को भी मान देना चाहते हैं  जिन्होंने आज के कनाडा को आकार देने में अपना योग दिया है. मॉरिल ने संसद के पिछले अधिवेशन में भी यह संशोधन प्रस्तुत किया था लेकिन तब यह संशोधन इसका विरोध करने वाले 144 मतों के विरुद्ध केवल 127 मत ही पा सका था. लेकिन अब मॉरिल के इस बिल को न केवल काफी समर्थन मिल रहा है, इसे जल्दी  से जल्दी पारित करने के लिए भी प्रयास किए जा रहे हैं. इसकी वजह यह है कि मॉरिल एक असाध्य रोग से गम्भीर रूप से पीड़ित हैं,  और उनका स्वास्थ्य निरंतर गिरता जा रहा है. वे बिल्कुल भी नहीं बोल पाते हैं. यहां तक कि कनाडाई संसद में जनवरी में यह बिल भी उन्होंने अपने आइ पैड पर स्थापित एक टेक्स्ट टू स्पीच प्रोग्राम की मदद से ही प्रस्तुत किया था. चाहा जा रहा है कि यह संशोधन उनके जीवन काल में ही पारित हो जाए. जिन सांसदों ने पिछली दफा इस संशोधन का विरोध  किया था उनमें से भी अनेक इस बार इसका समर्थन कर रहे हैं.

लेकिन ऐसा भी नहीं है कि हर कोई इस संशोधन का समर्थन  ही कर रहा है. कनाडा के कंज़र्वेटिव तथा उसके सहयोगी दलों के सदस्य आम तौर पर इसके विरोध में हैं. उनका कहना है कि “राष्ट्रीय प्रतीकों में बदलाव का मार्ग बहुत फिसलन भरा है. हो सकता है कि कल को कोई वनस्पति विज्ञानी उठ खड़ा हो और कहने लगे कि हमारे राष्ट्रीय ध्वज में मेपल की पत्ती का आकार सही नहीं है इसलिए उसे बदल दिया जाए. कल को कोई और भी किसी राष्ट्रीय प्रतीक के लिए इसी तरह की मांग कर सकता है.” एक कंज़र्वेटिव सांसद एरिन ओ’टूल का कहना है कि हालांकि उन्हें मॉरिल की अवस्था  से गहरी सहानुभूति है, वे इसे उचित नहीं मानते कि कनाडा की विरासत के महत्वपूर्ण हिस्सों के साथ कोई छेड़छाड़ की जाए.

वैसे यहीं यह जान लेना भी कम रोचक नहीं होगा कि मॉरिल जो संशोधन चाह रहे हैं अगर वो कर दिया गया तो कनाडाई राष्ट्रगान का नया रूप करीब-करीब वैसा ही हो जाएगा जैसा यह 1914 से पहले था. असल में 1914 में ही ‘तुम हममें सच्ची देशभक्ति  जगाते हो’ को बदल कर ‘तुम अपने सभी बेटों में देशभक्ति जगाते हो’ किया गया था. और इसके मूल में यह तमन्ना थी कि प्रथम विश्व युद्ध के दौर में देश के लिए समुद्र पार जाने वाले युवकों में देश भक्ति  का जोश जगाया  जा सके. वैसे कनाडा के इस राष्ट्रगान  ने बदलावों के कई दौर देखे और झेले  हैं.  इस गीत की रचना मूल रूप  से फ्रेंच भाषा में 1880 में हुई थी. एक समय तो ऐसा भी रहा जब कनाडा की फ्रेंच भाषी जनता तो यह गान  गाती थी और वहां की अंग्रेज़ी भाषी जनता इसकी बजाय अंग्रेज़ी राष्ट्रगान ‘गॉड  सेव द किंग’ ही गाती थी. फिर 1906 में इस फ्रेंच राष्ट्रगान का रॉबर्ट स्टेनली वियर नामक कनाडाई कवि और जज रचित यह अंग्रेज़ी संस्करण चलन में आया. इसके बाद इसमें दो बार संशोधन हुए. इसका वर्तमान प्रचलित रूप 1980 से चलन में है.

यही यह भी बता दूं कि  अगर यह बदलाव हो गया तो अपने राष्ट्रगान में बदलाव करने वाला कनाडा पहला देश नहीं होगा. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जर्मनी ने अपने राष्ट्रगान में बदलाव किया था, तो सद्दाम हुसैन के पराभव के बाद इराक़ ने भी ऐसा ही  किया. रंगभेद खत्म कर देने के बाद दक्षिण अफ्रीका ने अपने राष्ट्रगान में बदलाव किया तो सोवियत संघ के पतन के बाद रूस के राष्ट्रगान में बदलाव किया गया. बाद में सन 2000 में व्लादीमिर पुतिन ने फिर से पुराने राष्ट्रगान  को अपना लिया लेकिन मूल के एक पद को छोड़ दिया. हाल में सन 2012 में ऑस्ट्रिया ने भी अपने राष्ट्रगान के पहले छन्द में थोड़ा बदलाव करते हुए बेटों के साथ बेटियों को भी जोड़ लिया. स्विटज़रलैण्ड में इस आलोचना के बाद कि वहां का राष्ट्रगान कुछ अधिक ही धार्मिक है, एक सार्वजनिक प्रतियोगिता के द्वारा ज़्यादा आधुनिक शब्दावली वाला गीत तलाश किया गया. एक विजेता घोषित भी कर दिया गया लेकिन स्विस सरकार ने अभी तक इस बदलाव पर मतदान नहीं कराया है.

अब देखना है कि कनाडा में यह बदलाव हो पाता है या नहीं. फिलहाल तो वहां बहसों का बाज़ार गर्म है.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 07 जून, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, May 31, 2016

तुम्हारा शॉर्ट बहुत ज़्यादा शॉर्ट है मैगी!

भारत में यह आम धारणा है कि पश्चिम और विशेष रूप से अमरीका पहनने-ओढ़ने  और आचार-विचार जैसी निजी बातों के मामले  में तमाम वर्जनाओं से मुक्त है. मान लिया गया है कि यह समाज बहुत उदार है और जैसा आपको मनचीता  करने की भरपूर और निर्बाध आज़ादी देता है. यानि कोई इस बात की परवाह नहीं करता कि आपने कैसे कपड़े पहन रखे रखे हैं,  और आप क्या खा-पी रहे हैं! आम धारणा अपनी जगह और यथार्थ अपनी जगह. यथार्थ यह कि खान-पान की पूरी आज़ादी के बावज़ूद ऐसा नहीं है कि आप कहीं भी धूम्रपान या मदिरापान  कर लें. मर्यादाओं के भीतर रहकर ही आप यह सब कर सकते हैं. 

और जहां तक कपड़ों की बात है, भले ही पश्चिम को हमने अल्प वस्त्रों और देह-प्रदर्शन का पर्याय मान लिया है, हाल की एक घटना इस मिथ को भी ध्वस्त करती है.  इस घटना का ताल्लुक है सिएटल की एक मज़ाकिया परफॉर्मर मैगी मैक मफिन से. मैगी हवाई यात्रा कर न्यूयॉर्क से बोस्टन पहुंची थी और फिर बोस्टन से सिएटल जाने के लिए फ्लाइट का इंतज़ार कर रही थी. कतार में खड़े हुए उसे कोई पौन घटा बीत चुका था कि एयरलाइंस  की एक कर्मचारी उसके पास आई और विनम्रता से उससे बोली कि फ्लाइट क्रू ने खूब सोच विचार कर उसको यह बताने को कहा है कि जो वस्त्र उसने पहन रखे हैं वे उपयुक्त नहीं हैं और पायलट  ने यह कहलवाया है कि वह इन वस्त्रों के ऊपर कुछ और पहन ले, अन्यथा उसे  यात्रा करने की इजाज़त नहीं दी जाएगी.  उसने एक लम्बी बांह वाला स्वेटर, घुटनों से ऊपर यानि जंघाओं तक के मोजे और एक बहुत छोटा शॉर्ट पहन रखा था. असल में हवाई कम्पनी को, बल्कि क्रू को उसके इसी बेहद छोटे शॉर्ट पर आपत्ति थी.

बहुत छोटे शॉर्ट पर आपत्ति की यह  बात एकबारगी तो  अविश्वसनीय लगती है, लेकिन ऐसा हुआ. मैगी ने कहा कि उसके पास और कोई वस्त्र नहीं हैं अन्यथा वो उस शॉर्ट को बदल कर कुछ और पहन लेती. उसने एयरलाइंस को यह विकल्प भी सुझाया कि वो अपने स्वेटर को खोल कर कमर पर लपेट लेगी. लेकिन पायलट  इस पर सहमत नहीं हुआ. मैगी ने यह भी सुझाया कि उसे एक कम्बल दे दिया जाए जिससे वो खुद को ढक लेगी, लेकिन उसका यह प्रस्ताव भी नामज़ूर कर दिया गया. क्योंकि आपत्ति पायलट  की तरफ से थी, एयरलाइंस ने उसके सामने यह प्रस्ताव भी रखा कि अगर वो चाहे तो उसकी बुकिंग किसी अन्य फ्लाइट में कर दी जाए.  लेकिन यह प्रस्ताव उसे स्वीकार्य नहीं था. आखिर हुआ यह कि मैगी ने हवाई अड्डे की किसी दुकान पर जाकर बाईस डॉलर में एक स्लीप ट्रंक खरीद कर उसे पहना. तब कहीं वह अपनी इच्छित फ्लाइट में बोर्ड कर सकी.

लेकिन यात्रा पूरी करने के बाद उसने कुछ वैध सवाल उठाए. उसने जानना चाहा कि उसकी जो ड्रेस न्यूयॉर्क से बोस्टन की फ्लाइट में आपत्तिजनक नहीं मानी गई वही बोस्टन से सिएटल तक की फ्लाइट में आपत्तिजनक कैसे हो गई? आखिर न्यूयॉर्क में भी तो ट्रांस्पोर्टेशन सिक्यूरिटी एडमिनिस्ट्रेशन ने उसकी  जांच कर बोर्ड करने की अनुमति दी थी. मैगी कहती है कि मुझे कहा गया कि पायलट का फैसला  अन्तिम  होता है और उस पर कोई सवाल नहीं उठाया सकता. जब एक स्थानीय समाचार चैनल ने मैगी की इस आपत्ति के हवाले से सम्बद्ध एयरलाइंस का पक्ष जानना चाहा, तो एयरलाइंस  के प्रवक्ता ने उनके हाथ में यह वक्तव्य थमा दिया: “गेट और ऑन बोर्ड  क्रू ने ग्राहक की वेशभूषा के बारे में विचार किया और वे इस फैसले पर पहुंचे कि उनके शॉर्ट्स  फ्लाइट पर मौज़ूद अन्य परिवार जन को आहत कर सकते हैं. ग्राहक को फ्लाइट के लिए मना नहीं किया गया, बल्कि उनसे नम्रतापूर्वक यह अनुरोध किया गया कि वे कपड़े  बदल लें. ग्राहक इस पर सहमत हो गईं और उनकी  यात्रा निर्बाध सम्पन्न हुई.” इसी बयान में एयरलाइंस ने यह भी कहा कि वह  “यह कठोर निर्णय करने के अपने क्रू के विवेक का समर्थन करती है. लेकिन इसी के  साथ वह  ग्राहक को नए शॉर्ट्स की लागत का पुनर्भरण करने और अपनी सद्भावना के रूप में अगली फ्लाइट में दो सौ डॉलर की  छूट देने की भी घोषणा करती है.”  लेकिन मैगी इससे संतुष्ट नहीं हैं. उनकी मांग है कि पायलट  उनसे माफी मांगे और साथ ही एयरलाइंस भी अपने यात्रियों के लिए एक सुस्पष्ट ड्रेस कोड की घोषणा करे. उन्होंने बहुत गौर तलब बात यह कही है कि मुझे लगता है कि यह बात हमारे पितृ सत्तात्मक समाज की एक ख़ास प्रवृत्ति की द्योतक है कि औरतों को छोटे कपड़े बेचे तो जाते हैं लेकिन जब वे उन्हें पहनती हैं तो उन्हें इसके लिए दण्डित किया जाता है.

बात है तो विचारणीय!   
                  
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जयपुर से प्रकशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ 

उधर के अंतर्गत मंगलवार, 31 मई, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.     

Tuesday, May 24, 2016

क्या पुलिस को भी संरक्षण मिलना चाहिए?

अपने देश में आए दिन कभी यहां से तो कभी वहां से पुलिस कर्मियों के साथ दुर्व्यवहार,  मारपीट और  यहां तक कि कभी-कभी उनकी हत्याओं तक की खबरें आती रहती हैं. पुलिस के साथ बदसुलूकी तो आम बात है और अच्छी खासी समझ रखने वाले भी उनके प्रति अपशब्दों और अपमानजनक अभिव्यक्तियों का प्रयोग करते रहते हैं. ऐसे में मुझे सुदूर अमरीका से आया एक समाचार विशेष रूप से ध्यानाकर्षक लगा. उस समाचार की चर्चा और विश्लेषण से पहले उसकी पृष्ठभूमि बता दूं.    

संयुक्त राज्य अमरीका के बहुत सारे राज्यों में उन लोगों को अतिरिक्त दण्ड देने के प्रावधान हैं जो नस्ल या धर्म के आधार पर किसी के विरुद्ध किसी भी तरह का अपराध करते हैं. यानि वहां अगर कोई किसी खास समूह से संलग्नता  के आधार पर किसी से  घृणा  करते हुए कोई अपराध करता है तो उस अपराध की गम्भीरता को बढ़ा कर देखा जाता है. सामान्यत: इस घृणा  में जातीयता, लैंगिकता या शारीरिक अक्षमता को शामिल किया जाता रहा है. लेकिन अब वहीं के एक राज्य लुइज़ियाना में बहुत जल्दी एक नया विधेयक पारित होकर लागू होने वाला है जिससे इस घृणा-अपराध कानून के तहत जन-सुरक्षा कार्मिकों (पुलिस और अग्नि रक्षक) को भी एक संरक्षक प्रजाति माना जाने लगेगा. इस विधेयक के लागू हो जाने के बाद इन सुरक्षा कार्मिकों के विरुद्ध किसी भी तरह का गम्भीर अपराध करने वालों पर पाँच हज़ार डॉलर तक का आर्थिक दण्ड या उन्हें पाँच साल के कारावास की सज़ा दी जा सकेगी. उल्लेखनीय है कि लुइज़ियाना ऐसा करने वाला अमरीका का पहला राज्य होगा. लुइज़ियाना में इस विधेयक को ‘ब्ल्यू लाइव्ज़  मैटर’  (नीली वर्दी वालों की भी जान कीमती होती है) के नाम से जाना जा रहा है. इस नामकरण का इतिहास यह है कि फर्ग्युसन  में  सन 2014 में माइकल ब्राउन नामक एक निहत्था अश्वेत किशोर पुलिस की गोलीबारी में मारा गया था और तब पुलिस की इस तथाकथित  ज़्यादती के खिलाव एक बड़ा अभियान  शुरु हुआ था जिसे ‘ब्लैक  लाइव्ज़ मैटर’ कहा गया था. अब इस ब्ल्यू लाइव्ज़  वाले नए अभियान के समर्थकों का कहना है कि ज़्यादा हमले तो पुलिस पर ही होते हैं, जबकि असल   में तो वह  कानून व्यवस्था स्थापित करने के अपने दायित्व का ही निर्वहन कर रही होती है.
इस बात की पुष्टि  नेशनल लॉ एन्फोर्समेण्ट मेमोरियल फंड के इस दावे से भी होती है कि सन 2015 में कम से कम 124  पुलिस अधिकारी अपना कर्तव्य निर्वहन करते हुए मारे गए थे. एफबीआई ने भी पिछले सप्ताह जो आंकड़े ज़ारी किए हैं उनके अनुसार सन 2015 में 41 कानून और व्यवस्था अधिकारी अपना कर्तव्य पालन करते हुए दुर्भावनापूर्वक मार डाले गए थे.

स्वाभाविक ही है कि इस तरह के हमलों ने प्रभावितों को और सरकार को विचलित किया है. लेकिन लुइज़ियाना राज्य जो कदम करीब-करीब उठा चुका है उससे सभी सहमत हों, ऐसा फिर भी नहीं है. न्यू ऑर्लियंस स्थित ब्लैक यूथ प्रोजेक्ट 100 ऐसा ही एक एक्टिविस्ट समूह है जो इस कदम से तीव्र असहमति रखता है. अपने तीव्र प्रतिवाद में उसने  कहा है कि घृणा-अपराध विधेयक में पुलिस को भी एक संरक्षित वर्ग के रूप में शामिल कर लेने से एक ऐसी संस्था को और अधिक संरक्षण मिलने लगेगा जो पहले से ही अपने कर्म, नीति और प्रभाव में आंकड़ों द्वारा नस्लीय साबित हो चुकी है. इस संगठन का यह भी कहना है कि हम तो इसे पुलिस की नृशंसता के विरुद्ध लोगों द्वारा चलाये जा रहे अभियान के खिलाफ एक विधायी आक्रमण और राजनीतिक प्रतिकार के रूप में देखते हैं.  इसी तरह एण्टी डिफेमेशन लीग के क्षेत्रीय निदेशक ने भी इस कदम को अविवेकपूर्ण बताया है. इस विधेयक के आलोचकों को आशंका यह है कि अगर यह लागू हो गया तो इसका दुरुपयोग पुलिस के खिलाफ होने वाले प्रतिरोध को कुचलने में किया जाने लगेगा. बोस्टन स्थित नॉर्थ ईस्टर्न यूनिवर्सिटी के  अपराध शास्त्री  जैक लेविन ने तो और भी मार्के की बात कही है. उन्होंने आशंका व्यक्त की है कि हो सकता है संरक्षित समूहों की इस सूची में बाद में और कुछ समूह जोड़ दिये जाएं. लेकिन पुलिस को इस सूची में शामिल करने की सबसे बड़ी बुराई यह है कि वह उन बहुत सारे संगठनों में से एक है जो पहले ही काफी खतरनाक हैं. लेविन ने एक और गौर तलब बात यह कही है कि जिन खतरों की बात कहते हुए पुलिस को यह संरक्षण प्रदान किया जाने वाला है वे तो उसके कर्तव्य का हिस्सा हैं.

यानि सरकार का सोच एक तरफ और बहुत सारे संगठनों का सोच उसके विपरीत. और दोनों के अपने-अपने सशक्त तर्क. सोचें कि अगर हमारे देश में भी ऐसा ही कुछ हो तो हमारी प्रतिक्रिया  क्या होगी!   

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 24 मई, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकशित आलेख का मूल पाठ. 
  

Wednesday, May 18, 2016

चैन से सोना है तो जाग जाओ

कबीरदास की उलटी बाणी।
बरसै कंबल भीगै पानी  ।।

ये पंक्तियां हम सबने कभी न कभी पढ़ी या सुनी होगी. अटपटी या विरोधाभासी बात सुनते ही हम चौंक पड़ते हैं और सोचने लगते हैं कि अरे, ऐसा कैसे सम्भव है.  और बस इसी से कहने वाले का मक़सद पूरा हो जाता है. वो यही तो चाहता है कि हम उसकी तरफ ध्यान दें. आपको टीवी का वो विज्ञापन भी ज़रूर याद होगा जिसमें एक डरावना-सा शख़्स आकर आपसे कहता है: ‘चैन से  सोना है तो जाग जाओ!’ मन तो बहुत करता है कि अगर वो बन्दा कहीं मिल जाए तो पूछूं कि भाई मेरे, जागने से भला सोने का क्या नाता है? लेकिन कम्बख़्त मिलता ही नहीं है. और अभी तो हद्द ही हो गई है. इसी बन्दे का एक नज़दीकी रिश्तेदार सात समुद्र  पार अमरीका में और प्रकट हो गया है. इसका नाम है सेम्युअल पेरी. इसने एक गम्भीर शोध करने के बाद जो निष्कर्ष हम सब पर उछाला है उसे पढ़कर आप भी चौंक जाएंगे. पेरी ने कहा है कि जो लोग सप्ताह में एक बार से ज़्यादा पोर्न देखते हैं वे उन लोगों की तुलना में जो इससे कम या बिल्कुल भी पोर्न नहीं देखते हैं, अधिक धार्मिक होते हैं. मतलब बिल्कुल स्पष्ट है. अगर आपको धार्मिक होना है तो नियमपूर्वक पोर्न देखना शुरु कर दीजिए! है ना चैन से सोना है तो जाग जाओ वाली बात!   

और सेम्युअल पेरी ने यह बात बग़ैर किसी आधार के कह दी हो, ऐसा भी नहीं है. यूनिवर्सिटी  ऑफ ओक्लाहोमा में समाजशास्त्र और धार्मिक  अध्ययन विषय के सहायक प्रोफेसर पेरी ने सन 2006 से 2012 तक यानि पूरे छह  साल तक गहन अध्ययन करने के बाद  ऐसा कहा है. यह अध्ययन उसने पोर्ट्रेट्स ऑफ अमेरिकन लाइफ स्टडी (पाल्स) नामक एक प्रतिनिधि राष्ट्रीय सर्वेक्षण के साथ मिलकर किया. इस अध्ययन में भाग  लेने वाले कुल  1314 वयस्कों ने, जो अमरीकी समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं, नियमित रूप से अपने पोर्न उपभोग के बारे में सूचनाएं दीं और अपने धार्मिक व्यवहार के बारे में अनेक सवालों के जवाब दिए. अब इस अध्ययन के परिणाम जर्नल ऑफ सेक्स रिसर्च में प्रकाशित होकर  चर्चित हो रहे हैं.  पेरी ने पाया है कि जो लोग महीने में दो-तीन दफा ही पोर्न देखते हैं उनकी रुचि धर्म में बहुत ही कम होती है, जबकि इससे अधिक आवृत्ति से ऐसा करने वालों की धार्मिक रुचि में थोड़ी-सी वृद्धि लक्ष्य की गई. पेरी ने इस बात को समझाते हुए कहा है कि असल में होता यह है कि जब कोई धर्मपरायण व्यक्ति कभी-कभार  पोर्न देखता है तो उसे अपराध-बोध होता है और वो अपनी आस्था से थोड़ा डिग जाता है. लेकिन जब कोई व्यक्ति नियमित रूप से ऐसा करता है तो शायद वह अपने इस व्यवहार को संतुलित करने के लिए और खुद को यह दिलासा देने के लिए कि वह पथभ्रष्ट नहीं हो रहा है, धर्म में अधिक रुचि लेने लगता है. यानि जो लोग नियमित रूप से पोर्न देखते हैं वे अपने अपराध बोध को कम करने के लिए ईश्वर की शरण में ज़्यादा जाने लगते हैं. उनकी धार्मिक जिज्ञासाएं भी बढ़ जाती हैं.  पेरी ने अपने अध्ययन में यह भी पाया कि नियमित रूप से पोर्न देखने वाले धर्म स्थलों में अधिक जाते  और धार्मिक क्रियाकलापों में ज़्यादा सक्रिय रूप से भाग लेते हैं. पेरी ने यह भी बताया कि यह प्रवृत्ति स्त्रियों और पुरुषों  में एक समान  पाई गई. लेकिन ऊपर जिस सर्वेक्षण का ज़िक्र किया गया है उसमें यह बात  भी स्वीकार की गई है कि सामान्य रूप से पुरुषों की तुलना में स्त्रियां अधिक धार्मिक होती हैं, हालांकि धार्मिक संशयों  के मामले में पुरुष उनसे आगे पाए गए हैं. 

निश्चय ही पेरी का यह सर्वेक्षण इस विषय पर अंतिम सत्य की तरह स्वीकार नहीं किया जा सकता. मज़ाक की बात अलग है, यह निष्कर्ष निकाल लेना क़तई  युक्तिसंगत नहीं हो सकता कि अगर लोगों की धार्मिक रुचि  में वृद्धि करनी हो तो उन्हें पोर्न देखने को प्रेरित किया जाए. असल में धर्म या सद आचरण और व्यक्ति के निजी आचरण का रिश्ता इतना सीधा-सपाट नहीं होता है कि तुरंत किसी निष्कर्ष पर पहुंच जाया जाए. यह भी सही है कि पोर्नोग्राफी की न सराहना की जा सकती है और न उसका समर्थन किया जा सकता है. प्रथमत: और अंतत: भी, यह एक विकृति ही है. पेरी का सर्वेक्षण चाहे जो कहे, इस विकृति से दूरी बनाए रखने में ही मनुष्यता का हित निहित है, लेकिन इसी के साथ यह भी कहा जाना ज़रूरी है कि यह सर्वेक्षण पारम्परिक रूप से चले आ रहे सोच को ध्वस्त कर चीज़ों को नए नज़रिये से देखने की प्रेरणा देता है. 
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 17 मई, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.         

Wednesday, May 11, 2016

जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी...

जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी... कहा था हमारे तुलसी बाबा ने, लेकिन खुद उन्हें कहां मालूम रहा होगा कि ठेठ इक्कीसवीं सदी में और वो भी भारत से बहुत दूर इण्डोनेशिया में उनकी यह बात  सही साबित हो जाएगी. हुआ यह कि अभी कुछ ही समय पहले इण्डोनेशिया के सुलावेसी प्रांत के बांगई द्वीप पर एक इक्कीस वर्षीय मछुआरे को एक आदमकद स्त्री (जैसी) ‘देह’  समुद्र में तैरती हुई मिली. तीन दिन पहले सूर्यग्रहण होकर चुका था, और क्योंकि इण्डोनेशिया के वे भले लोग अलौकिक शक्तियों में बहुत गहरी आस्था रखते हैं, पार्दिन नामक उस भोले-भाले ग्रामीण को लगा कि हो न हो यह कोई देवी है और किसी अलौकिक चमत्कार की वजह से यहां आन पहुंची है. या हो सकता है कि वह  सूर्य ग्रहण के परिणामस्वरूप ही धरती पर आ गिरी हो.  पार्दिन उस ‘देह’  को बहुत एहतियाद से कालुपापी गांव स्थित अपने घर ले गया, और वहां उसकी बूढ़ी मां ने बड़े जतन से उस ‘देह’  को सहेजा, उसे नए कपड़े पहनाए और अपनी धार्मिक आस्थाओं के अनुरूप उसे एक हिजाब भी धारण करा दिया. इतना ही नहीं, वे लोग रोज़ उसको नई पोशाक धारण  करवाने लगे और बहुत आदर पूर्वक उसे एक कुर्सी पर बिराजमान करा दिया.

धीरे-धीरे पूरे गांव में यह बात फैलने लगी कि पार्दिन के घर एक बिदादरी (एक तरह की अप्सरा) अवतरित हुई है. और जैसा इस तरह के मामलों में सर्वत्र होता है वहां भी हुआ कि उस बिदादरी के अवतरण को लेकर अनेक किंवदंतियां प्रचलित होने लगी. कहा जाने लगा कि जब वो पार्दिन को मिली तो बहुत व्यथित थी, समुद्र किनारे औंधे मुंह लेटी हुई थीं, रो रही थी, और ऐसी अनेक बातें बहुत तेज़ी से फैलने लगीं. कुछ लोग यह तक कहने लगे कि वह तो स्वर्ग से धरती पर आ गिरी अप्सरा है और इसी कारण वह रोती हुई पाई गई थी. यानि जितने मुंह उतनी बातें. 

इण्डोनेशियाई समाचार पोर्टल देतिक ने तो उस बिदादरी की हिजाब युक्त तस्वीरें भी  पोस्ट कर दीं और इस तरह बिदादरी (क्या पता इस शब्द और हमारे ‘विद्याधरी’  में कोई रिश्ता हो!) के अवतरित होने की चर्चा जंगल की आग की तरह फैलने लगी. जब चर्चाएं कुछ ज़्यादा ही फैलने लगीं तो स्थानीय पुलिस के भी कान खड़े हुए. उसकी चिंता यह थी कि कहीं इस बिदादरी के अवतरण की वजह से कानून  व्यवस्था न गड़बड़ा जाए. पुलिस तेज़ी से हरकत में आई. और जब पुलिस ने पूरी पड़ताल की तो वो सच्चाई सामने आई जिसने मुझे बाबा तुलसीदास को याद करने को प्रेरित किया.

स्थानीय  पुलिस चीफ़ हेरु प्रमुकार्णो ने बताया कि असल में वह कोई बिदादरी नहीं थी, बल्कि जिसे वे भोले-भाले ग्रामीण कोई देवी समझ रहे थे वो तो एक सेक्स टॉय (प्लास्टिक की बनी एक स्त्री देह थी, जिसे हवा भर कर फुला लिया जाता है और यौन आनंद के लिए इस्तेमाल किया जाता है) था/थी. लेकिन वे बेचारे भोले-भाले ग्रामीण, जो शहरी आबादी और माहौल से बहुत दूर रहते हैं और जिनकी पहुंच इण्टरनेट जैसी नई सूचना तकनीक तक क़तई नहीं है, वे भला आधुनिक समाज के इन चोंचलों को कैसे जान सकते थे? तो उचित ही उन्होंने उस खिलौना गुड़िया को अपनी बिदादरी समझ लिया. बाद में एक स्थानीय नागरिक इकबाल ने पत्रकारों को बताया भी कि हो सकता है कि  किसी नाव  से यह डॉल नीचे गिर पड़ी होगी या गिरा  दी गई होगी. 

वैसे इसी क्रम में यह जानना भी कम दिलचस्प नहीं होगा कि हालांकि अपने देश में तो सेक्स टॉयज़ का इस्तेमाल वैध  नहीं है इसलिए अपने यहां ऐसी घटनाएं सुनने को नहीं मिलती हैं, दुनिया के अन्य बहुत सारे देशों में इन्हें लेकर मनोरंजक प्रसंग उत्पन्न होते ही रहते हैं. सन 2012 में चीन के एक रेडियो स्टेशन से यह खबर प्रसारित हुई थी कि वहां  के एक किसान को एक कुंए में बेशकीमती मशरूम का विशाल टुकड़ा मिला है जिसमें  जादुई औषधीय गुण हैं. लेकिन बाद की पड़ताल से पता चला कि असल में वो सिलिकोन से बना एक सेक्स टॉय था. उसी बरस तुर्की  में किसी ने एक स्त्री देह को पानी में डूबते-उतराते देख पुलिस को खबर कर दी और फौरन ही गोताखोरों की एक टीम उस ‘स्त्री’ के बचाव के लिए पानी  में कूद पड़ी. लेकिन बचाव अभियान पूरा होने पर  पता चला कि वो हवा भरी हुई एक सेक्स डॉल थी. और उसी साल पूर्वी चीन के शेण्डोंग प्रांत में भी ऐसी ही एक घटना हुई जब 18 पुलिस अधिकारियों को एक ऐसी ही ‘स्त्री’  को बचाने के लिए खासी मशक्कत करनी पड़ी. सोचिये, यथार्थ का  पता चलने पर उन बेचारों पर क्या गुज़री होगी. वहां इस बचाव अभियान को देखने के लिए नदी तट पर हज़ारेक लोग इकट्ठा भी  हो गए थे.     


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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, दिनांक 10 मई 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.  

Tuesday, May 3, 2016

‘बुनियादी’ उर्फ़ आओ लौट चलें आदिम युग की ओर

अगले महीने से सेण्ट्रल लंदन में किसी  अज्ञात स्थान  पर एक नया रेस्तरां खुलने जा रहा है. रेस्तरां बहुत बड़ा नहीं है. मात्र बयालीस लोग उसमें बैठ सकेंगे. लेकिन उत्सुकता का आलम  यह है कि ये पंक्तियां लिखे जाने तक तीस हज़ार लोग उसकी प्रतीक्षा सूची में अपने नाम लिखवा चुके हैं. और यह तब है जबकि यह पहले से बता दिया गया है कि वह रेस्तरां मात्र तीन महीनों के लिए खोला जा रहा है यानि कुल मिलाकर चार हज़ार से भी कम लोग उसमें भोजन करने का अवसर पा सकेंगे.

इस रेस्तरां को संचालित करने वाली  कम्पनी लॉलीपॉप के संस्थापक सेब लायल का कहना है कि वे चाहते हैं कि लोगों को बग़ैर किसी मिलावट के एक शाम का लुत्फ़ लेने का मौका दिया जाना चाहिए. एक ऐसी शाम जहां वर्तमान औद्योगिक सभ्यता का  कोई ताम-झाम मौज़ूद न हों. यानि खाने में न कोई रसायन हों, न कृत्रिम रंग, और न उसे गैस वगैरह  पर पकाया जाए;  न  बिजली की चौंधियाने वाली रोशनी हो, न आपकी निजता में घुसपैठ करती मोबाइल की घण्टियां, और ..... और सबसे ख़ास बात, अगर आप  चाहें तो वस्त्र भी न हों! इस ‘वस्त्र एच्छिक’ (क्लोद्स  ऑप्शनल)  रेस्तरां के दो खण्ड होंगे, एक वस्त्रों वाला और दूसरा ‘प्योर’. इस प्योर सेक्शन में जाकर भोजन करने के लिए आपको पूरी तरह निर्वस्त्र होना होगा. रेस्तरां में कपड़े उतारने के लिए निर्धारित स्थान होगा,  गाउन उपलब्ध कराए जाएंगे और आपके कपड़ों को सुरक्षित रखने के लिए लॉकर्स की सुविधा भी होगी.  यह तो कहना अनावश्यक ही है कि इस रेस्तरां में फोटोग्राफी पूरी तरह वर्जित होगी. सेब लायल के अनुसार इस रेस्तरां को खोलने  के पीछे असल विचार यह है लोग सच्ची आज़ादी का अनुभव कर सकें.

योजना यह है कि जैसे ही आप रेस्तरां में पहुंचेंगे, आपको एक चेंजिंग रूम तक ले जाया जाएगा और फिर एक गाउन देकर कहा जाएगा कि आप अपने पहने हुए वस्त्रादि एवम अन्य सामान लॉकर में सुरक्षित रख दें. इसके बाद आपको यह विकल्प होगा कि जो न्यूनतम वस्त्र आपने अपने शरीर पर बचा रखे हैं,  खाने की टेबल पर जाने से पहले  उनका भी परित्याग कर दें. हर अतिथि की टेबल और दूसरे अतिथि की टेबल के बीच बांस और खपच्चियों  का बना झीना-सा  पर्दा होगा जिससे आपकी निजता बनी रहे. मोमत्तियों का उजाला केवल इतना होगा कि आपको अन्य लोगों की छाया-आकृति ही  नज़र आ सकेगी. अपने वस्त्रों का आपने भले ही परित्याग कर दिया हो, काफी बड़े आकार के नैपकिन्स  आपको सुलभ कराए जाएंगे ताकि गरमागरम खाने से आपका बचाव हो सके. और इसी तरह, संक्रमण से बचाव को ध्यान में रखते हुए यह इंतज़ाम  भी रहेगा  कि भोजन करने वालों की देह और कुर्सियों का सीधा सम्पर्क न हो.

और हां, वहां वेटर्स वगैरह भी न्यूनतम वस्त्रों में ही होंगे. अलबत्ता स्वच्छता का लिहाज़ करते हुए खाना बनाने वालों को कपड़े पहने रहने की अनुमति होगी.  इस रेस्तरां का नाम, हम हिन्दी भाषी  लोग  लोग चाहें  तो इस बात पर अतिरिक्त खुशी हासिल कर सकते हैं, ‘बुनियादी’  होगा. बुनियादी यानि आधारभूत यानि प्राकृतिक. और इसलिए यहां जो भोजन परोसा जाएगा वो भी इसी तरह का होगा. वेगन खाद्य के अलावा यहां ग्रिल्ड मीट होगा जिसे लकड़ी की आंच पर (न कि बिजली या गैस पर) पकाया जाएगा और परोसा भी उसे हाथ से बने मिट्टी के बर्तनों में ही जाएगा. खाना-खाने के लिए आपको जो चम्मच-छुरी-कांटे वगैरह  दिये जाएंगे वो खाद्य सामग्री के ही बने हुए होंगे यानि आप उन्हें भी खा सकेंगे.  रसोईघर में प्लास्टिक  और धातु  के पदार्थ पूरी तरह वर्जित रहेंगे. रेस्तरां का फर्नीचर केवल लकड़ी से बना  होगा और निहायत  प्राकृतिक नज़र आएगा. सेब लायल का कहना है कि उनका विचार यह नहीं है कि आप निर्वस्त्र होकर भोजन करें, बल्कि असल विचार तो यह है कि यह पूरा अनुभव आपको आधारभूत अनुभव की प्रतीति कराए, यानि आपको लगे कि आप उस आदिम काल खण्ड में लौट गए हैं जहां केवल निहायत ज़रूरी साजो-सामान हुआ करता था. 

और जहां तक निर्वस्त्र होकर भोजन करने की बात है, सेब लायल मानते हैं कि दरअसल उनका यह रेस्तरां-प्रयोग नग्नता के बारे में समाज के वर्तमान  सोच को चुनौती देने के लिए है. वर्तमान समाज कपड़े उतारने को विद्रोह का पर्याय मान बैठा है, जबकि मनुष्य अकसर निर्वस्त्र होता ही रहता है. जब आप बिस्तर पर जाते हैं तब भी निर्वस्त्र होते हैं और जब किसी समुद्र तट  पर जाते हैं या सोना बाथ लेते हैं तब भी अपने कपड़े उतारते हैं.  यानि यह कोई अस्वाभाविक और चौंकाने वाली बात है ही नहीं.  

अब देखना है कि साठ ब्रिटिश पाउण्ड मूल्य वाले  इस अनूठे फाइव कोर्स भोजन का लोग कितना आनंद लेते हैं!   

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 03 मई, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, April 26, 2016

जो हमें समझ न आए उस कर्म की भी कोई सार्थकता हो सकती है

उसका नाम है क्रिस सेवियर. संयुक्त राज्य अमरीका के टेनेसी इलाके के इस  निवासी ने ह्यूस्टन की संघीय अदालत में एक अजीबोगरीब वाद प्रस्तुत किया है. उसकी शिकायत है कि वो अपनी 2011 मॉडल की मैकबुक (लैपटॉप) से शादी करना चाहता है लेकिन हैरिस काउण्टी (यानि ज़िला) ने उसे विवाह का लाइसेंस  प्रदान करने से मना कर दिया है. इस तरह उसे उसके विवाह करने के अधिकार से वंचित किया गया है. क्रिस ने यह वाद अपनी काउण्टी के डिस्ट्रिक्ट क्लर्क, गवर्नर और अटॉर्नी जनरल के खिलाफ प्रस्तुत किया है. क्रिस  ने इसी तरह के वाद दो और संघीय अदालतों में प्रस्तुत किये हैं और उनकी योजना बारह और अदालतों में ऐसे ही वाद प्रस्तुत करने की है. ऐसा वे इस उम्मीद में कर रहे हैं कि कम से कम दो अदालतें तो उनके पक्ष में फैसला देंगी.  उनका कहना है कि ये वाद वे इसलिए प्रस्तुत कर रहे हैं ताकि सही हक़ीक़त सामने आ सके. असल में इन वादों के माध्यम से वे अमरीकी सर्वोच्च न्यायालय के जून माह के उस ऐतिहासिक फैसले का विरोध   करना चाह रहे हैं जिसने समान-सेक्स विवाहों को वैध करार दिया था. इसे यों भी समझा जा सकता है कि अपने इन वादों के माध्यम से क्रिस अपने देश के न्यायालयों को यह धमकी देना चाह रहे हैं कि वे यह स्वीकार कर लें कि उन्होंने समान सेक्स के बीच विवाह की अनुमति देने का जो फैसला  दिया है वह  नैतिक रूप से दोषपूर्ण है, और अगर वे यह मानने को तैयार नहीं हैं और अपने निर्णय पर अडिग हैं तो फिर  उन्हें भी एक महंगी मशीन के साथ विवाह बन्धन में बंधने की अनुमति प्रदान कर दें.

खुद को क्रिश्चियन बताने वाले और इलेक्ट्रॉनिक संगीत के प्रस्तुतकर्ता क्रिस का कहना है कि उनका यह वाद न तो बेहूदा है और न ही व्यंग्यात्मक, लेकिन वे यह अवश्य मानते हैं कि  अमरीकी सर्वोच्च  न्यायालय के इस फैसले ने संविधान का ही अपहरण कर डाला है, और इसलिए इस वाद के माध्यम से वे यह कहते हुए कि समान सेक्स वाले दो व्यक्तियों के बीच विवाह ठीक वैसी ही बात है जैसी मनुष्य और मशीन के बीच विवाह, एक कर्कश तर्क प्रस्तुत कर रहे हैं. “सवाल यह है कि क्या हमारी नीतियां ऐसी होनी चाहिएं जो इस तरह की जीवन शैली  को प्रोत्साहित करें? सरकार लोगों को इस तरह की जीवन शैली अपनाने के लिए प्रोत्साहित करके किसी का भी भला नहीं कर रही है. ज़रूरत इस बात की है कि हम विवाह को ठीक से  परिभाषित करें.” यह कहना है क्रिस का. 

स्वाभाविक है कि क्रिस के ये तर्क बहुतों के गले नहीं उतरे हैं और उन्होंने अपनी-अपनी तरह से इनका विरोध किया है. टेक्सस राज्य के रिपब्लिकन स्टेट अटॉर्नी जनरल पेक्सटन ने संघीय जज महोदय से अनुरोध किया है कि वे इस वाद को अस्वीकृत कर दें. उनका तर्क है कि समान-सेक्स विवाह की अनुमति देने वाला अमरीकी सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय मानव और मानवेतरों यानि मनुष्य और मशीनों पर लागू नहीं होता है. टेक्सस के ही एक गे  मैट वुल्फ जो इसी वर्ष अपने साथी से विवाह करने वाले हैं, का भी कहना है कि वो हर तर्क जो दो सामान्य प्रेम करने वाले मानवों के बीच समानता और सहमति के आधार पर होने वाले विवाह की तुलना किसी और से करके उसका विरोध करना चाहता है, ग़लत है. उनका मानना है कि इस तरह के विरोधी तर्क व्यक्ति विशेष के भय और सोचे समझे अज्ञान पर आधारित हैं. 

इस वाद और विवाद पर अमरीकी अदालतें क्या फैसला देती हैं यह तो आने वाला समय ही बताएगा, लेकिन इस बीच यह जान लेना भी रोचक होगा कि क्रिस नामक यह व्यक्ति पहले भी अजीबोगरीब हरकतें करता रहा है. तीन बरस पहले उसने अमरीका की उसी विख्यात कम्प्यूटर निर्माता कम्पनी पर एक दावा ठोका था जो मैकबुक बनाती है. अपनी पचास पन्नों की शिकायत में क्रिस ने कहा था कि इस कम्पनी के उत्पादों में वे तमाम सुरक्षा इंतज़ामात नहीं हैं जो अवांछित अश्लील सामग्री के हमलों से उनके उपयोगकर्ताओं को बचा  सकें. क्रिस का कहना था कि इस तरह की अश्लील सामग्री खुद उसके जीवन को विषाक्त कर चुकी है. उन्होंने अदालत से अनुरोध किया था कि वे कम्पनी को पाबन्द करे कि  वो अपने उत्पाद इस तरह के सुरक्षा प्रावधानों के बाद ही बेचेगी.

पहली नज़र में भले ही क्रिस जैसे लोगों के ये कृत्य ऊल जुलूल लगें, यह नहीं भूला जाना चाहिए कि दुनिया में बहुत सारे सकारात्मक बदलावों का सूत्रपात  ऐसे ही कृत्यों से हुआ है.   
  
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अन्तर्गत मंगलवार, दिनांक 26 अप्रेल, 2016 को  जो हमें समझ न आए उस कर्म की भी हो सकती है कोई सार्थकता शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 


Tuesday, April 19, 2016

शेक्सपीयर कुछ भी कहें, नाम की अहमियत कम नहीं है

महान अंग्रेज़ी लेखक विलियम शेक्सपीयर का यह कथन आपने ज़रूर सुना होगा-  व्हाट्स इन अ नेम, यानि नाम में क्या रखा है? उनके अमर नाटक रोमियो एण्ड जूलियट में यह बात जूलियट से कहलाई गई  है. शेक्सपियर ने भले ही अपने एक किरदार  से यह कहला दिया हो, दुनिया में नाम  की अहमियत जस की तस है. और मज़े की बात तो यह कि बाकी दुनिया की बात तो छोड़िये, खुद शेक्सपीयर के देश यानि ब्रिटेन में हाल की एक घटना ने एक बार फिर उनके इस बहु उद्धृत कथन पर  सवालिया निशान लगा दिया है.

वहां के वेल्स की पॉविस काउण्टी की एक महिला ने जब अपनी हाल में जन्मी  बेटी का नाम सायनाइड  (एक घातक ज़हर) और उसके भाई का नाम प्रीचर (धर्मोपदेशक) रखना चाहा  तो वहां की एक अदालत के जज  ने उन्हें इस बात की अनुमति नहीं दी. आप पूछेंगे  कि कोई अपनी संतान का नामकरण क्या करना चाहता है इसमें अदालत कहां बीच में आती है? तो,  मैं बता ही देता हूं. हुआ यह कि इस पॉविस काउण्टी काउंसिल के कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं को जब यह बात पता चली कि उनके इलाके की एक महिला अपने हाल में जन्मे दो जुड़वां बच्चों का अजीबोगरीब नामकरण करना चाह रही है तो उन्हें बीच में कूद पड़ना ज़रूरी लगा. इस पर एक जज ने उस महिला द्वारा अपने नवजात बच्चों के ये असामान्य नाम रखने पर निषेधाज्ञा जारी कर दी.

लेकिन उस महिला ने भी इस  निषेधाज्ञा को सहज रूप से स्वीकार करने की बजाय इसके खिलाफ अपने वकीलों के माध्यम से अपील करना उचित समझा. उसके वकीलों का तर्क था कि वो अपने बच्चों का क्या नामकरण करे यह उसका सहज स्वाभाविक मानवीय अधिकार है और इस पर लगाई गई कोई भी रोक उसके अपने पारिवारिक जीवन के प्रति सम्मान के उसके अधिकार का उल्लंघन होगी.  तीन जजों ने उनकी इस अपील को सहानुभूतिपूर्वक सुना और फिर यह निर्णय सुनाया कि किसी बच्ची  का  नामकरण एक घातक ज़हर के नाम पर करना क़तई स्वीकार्य नहीं है. इन जजों  ने अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा कि रुचियों और  फैशन में आने वाले बदलावों और तेज़ी से विकसित होती हुई निजता की अवधारणाओं को स्वीकार करने के बावज़ूद वे मानते हैं कि किसी बच्ची के लिए सायनाइड नाम बहुत अजीब है. इससे पहले उस बच्ची की मां ने अपने पक्ष में दलीलें देते हुए कहा था कि उनका मानना है कि सायनाइड एक प्यारा और खूबसूरत नाम है, इसका सम्बन्ध तो फूलों और पौधों से है  और यह सकारात्मक संकेत भी देता है. अपनी बात को उन्होंने इस तर्क के साथ स्पष्ट  किया कि हिटलर और गोयबल्स जैसों की जान लेना तो उनके खयाल से एक उम्दा  काम था और  इसलिए वे मानती हैं कि यह नाम एक सकारात्मक संदेश देता है.  उस महिला ने प्रीचर नाम का  भी यह कहते  हुए समर्थन किया  कि यह नाम बहुत कूल है और इससे एक सशक्त आध्यात्मिक संदेश मिलता है. उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि इस नाम से मिलने वाला सन्देश भविष्य में भी उनके बेटे को सम्बल प्रदान करेगा. लेकिन जज उनके वकीलों और उनकी दलीलों से संतुष्ट नहीं हुए और उन्होंने कहा कि यह मामला उन दुर्लभतम मामलों में से एक है जिनमें अदालत को किसी बच्ची को उसके सायनाइड नाम की वजह से  भविष्य में निश्चित रूप से होने वाली मानसिक क्षति से बचाने के लिए हस्तक्षेप करने को मज़बूर होना पड़ रहा है. उनका कहना था कि इस तरह का नाम भविष्य में उस बच्ची के लिए उस बर्ताव की आशंका पैदा करता है जिसे तंग करने की सामान्य सीमाओं से काफी आगे  का माना जा सकता है. इन जजों ने स्वीकार किया कि प्रीचर नाम अजीब होते हुए भी उतना बुरा नहीं है. लेकिन कुल मिलाकर उनका फैसला यह रहा कि इन जुड़वां शिशुओं के हक़ में यही बात उपयुक्त रहेगी कि उनके नाम उनके सौतेले भाई बहनों द्वारा चुन लिये जाएं.     


जजों के इस फैसले के पीछे नाम की व्याख्या और उससे निकलने वाली ध्वनियां तो थी हीं, उस महिला का त्रासद अतीत भी था. उन जजों के संज्ञान में यह बात भी थी कि उस महिला की ये जुड़वां संतानें किसी बलात्कार का परिणाम  थीं. यही नहीं, वह मानसिक रुग्णता से भी ग्रस्त रह चुकी थी, ड्रग्स और मदिरापान की लत की शिकार थी और  ग़लत बर्ताव करने वाले पुरुषों की संगत में रह चुकी थी. शायद इन्हीं सब वजहों  से उसकी पहले की तीन संतानें भी उसकी छत्र छाया से दूर अन्य पोषणकर्ता अभिभावकों के पास पल रही थीं.
 

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 19 अप्रैल, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित  आलेख का मूल पाठ.