Tuesday, July 22, 2014

जहां जाइयेगा, हमें पाइयेगा!

नाटककार कथाकार मोहन राकेश का एक मज़ेदार लेख कभी पढ़ा और पढ़ाया था – ‘विज्ञापन युग’. लेखक ने बहुत मज़े लेकर और तत्कालीन विज्ञापनों के अनेक उदाहरण देकर हमारे जीवन में अनचाहे घुस आए विज्ञापनों की रोचक चर्चा की थी. जाने क्यों आज वो लेख बहुत याद आ रहा है. सोचता हूं अगर आज कोई उसी तरह का लेख लिखना चाहे तो वो क्या-क्या लिखेगा? तब से अब तक गंगा में बहुत सारा पानी बह चुका है.  एक कला, एक व्यवसाय और एक विज्ञान के रूप में विज्ञापन में आमूल-चूल बदलाव आ चुके हैं. पहले विज्ञापन का प्रयोग वस्तुओं को बेचने के लिए किया जाता था, आज उसका क्षेत्र इतना विस्तृत हो गया है कि सेवा, विचार, छवि  और यहां तक कि सरकारों को बेचने के लिए भी उसका इस्तेमाल होने लग गया है.

विज्ञापनों की माया अपरम्पार है. यह विज्ञापनों की ही कृपा है कि बहुत सारे उत्पाद, जैसे समाचार पत्र,  अपनी लागत से भी कम कीमत पर हमें  मिल जाते हैं. लेकिन इसी बात का दूसरा पहलू यह भी है और यह कम दिलचस्प भी नहीं है कि जिन विज्ञापनों से हम  आम तौर पर चिढ़ते हैं उन्हीं को देखने-पढ़ने के लिए हमें  पैसा, चाहे वो कितना भी कम क्यों ना हो, खर्च करना पड़ता है. और इससे भी अधिक रोचक बात तो यह है कि तमाम  निर्माता या विक्रेता हमारी  जेब से पैसे निकलवा  कर  हमें   ही  अपनी वस्तु या सेवा के गुणों से परिचित करवाते हैं. हम सब जानते हैं कि विज्ञापनों पर होने वाला सारा खर्चा उत्पाद या सेवा की लागत में जोड़ा जाकर उपभोक्ता से ही वसूला जाता है.  सईद राही की ग़ज़ल का मिसरा याद आता है- उस शोख ने मुझी को सुनाई मेरी ग़ज़ल. कभी-कभी मैं सोचता हूं कि अगर चीज़ों का विज्ञापन न किया जाए तो वे कितने सस्ते  में हमें मिलने लगें! या उलट  कर इस बात को सोचें कि अगर हरी मिर्च, धनिया, प्याज और टमाटर  के भी विज्ञापन होने लग जाएं तो इनके भाव कहां तक जा पहुंचेंगे!

अगर आप यह सोच रहे हैं कि अमुक अगरबत्त्ती सबसे अच्छी है या कुछ दिन तो गुज़ारो हमारे राज्य में जैसी बातें ही विज्ञापन की श्रेणी में आती हैं तो आप इसके फैलाव को बहुत कम देख पा रहे हैं. असल में समय, स्थितियों और समझ के बदलाव के साथ विज्ञापन के रूपों और तौर-तरीकों में इतना ज़्यादा बदलाव आ गया है कि कई बार तो अपको पता ही नहीं चलता है और विज्ञापन आप पर अपना असर  डाल चुका होता है. यह बात तो पुरानी हो गई है कि आप जिसे ख़बर समझ कर पढ़ते हैं असल में वो विज्ञापन होती है. और यह बात भी पुरानी है कि कोई धर्मात्मा अस्पताल या धर्मशाला या मन्दिर बनवाकर अपनी दानशीलता का विज्ञापन ही करता है. मुझे यह बात बहुत रोचक लगती है कि हमारे देश में बहुत सारे मन्दिर एक बड़े उद्योगपति के नाम से जाने जाते हैं. खुद दानदाता का भगवान हो जाना तो विज्ञापन की कामयाबी का बेहतरीन उदाहरण है.  

इधर मैं यह बात देख रहा हूं कि बहुत निजी माने जाने वाले पारिवारिक आयोजन भी विज्ञापन का माध्यम बनते जा रहे हैं. और ऐसा अनायास नहीं सायास हो रहा है. किसी धनपति के घर-परिवार के किसी मांगलिक समारोह का भव्य आयोजन उसकी सामर्थ्यानुसार उसके आनंद की अभिव्यक्ति हो सकता है लेकिन उस आयोजन का बाकायदा प्रचार छवि निर्माण का प्रयास ही कहा जाएगा. और ऐसा भव्यता में ही नहीं होता है, सादगी में भी होता है. देश के एक नामी चित्रकार का जूते न पहनने का बहु प्रचारित निर्णय अंतत: उनकी विशिष्ठ छवि बनाकर उन्हें लाभान्वित करता था. बिना दहेज शादी की बहुत सारी ख़बरें इसी बात को ध्यान में रखकर प्रसारित करवाई जाती हैं कि इससे उन लोगों की एक बेहतर छवि आपकी स्मृति में स्थापित हो सके.

लेकिन जैसा मैंने कहा, समय के साथ विज्ञापन अप्रत्यक्ष और घुमावदार होते जा रहे हैं. कभी एक टीवी के विज्ञापन में दैत्य की छवि को अजूबा माना गया था और नकारात्मक विज्ञापन को एक बड़ी परिघटना के रूप में जाना गया था लेकिन आज तो विज्ञापन की दुनिया में इतना कुछ नया घटित हो रहा है कि अब उस तरफ हमारा ध्यान भी नहीं  जाता है. फिर भी, तमाम बदलावों के बावज़ूद विज्ञापनों की यह खासियत अभी भी बरक़रार है कि अपनी तमाम अनिच्छाओं  के बावज़ूद आप न सिर्फ इन्हें झेलने के लिए अभिशप्त हैं, आपको  आम तौर पर इनके लिए अपनी जेब भी ढीली करनी पड़ती है. क्या पता कि वो गाना विज्ञापनों को ध्यान में रखकर ही लिखा गया हो – अजी रूठ कर कहां जाइयेगा, जहां जाइयेगा, हमें पाइयेगा!

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर में दिनांक 22 जुलाई, 2014 को ज़रा सोचिए, विज्ञापन न होते तो क्या होता शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, July 15, 2014

इट्स ऑल पार्ट ऑफ द गेम

साहित्य की दुनिया की अपनी विलक्षणताएं हैं. जो लोग इस दुनिया के तौर-तरीकों से वाक़िफ नहीं हैं उन्हें इस बात से बड़ी उलझन होती है कि कैसे दो विद्वान एक ही कृति के बारे में परस्पर विपरीत राय व्यक्त कर देते हैं! उन्हें यह समझाने में बहुत ज़ोर पड़ता है कि साहित्य में दो और दो का जोड़ सदा चार ही नहीं होता है. एक ही कृति किसी को बहुत अच्छी लग सकती है और किसी दूसरे को बहुत सामान्य! कई बार मानदण्ड भिन्न होते  हैं और कई बार देखने का कोण अलग होता है. और अगर आप भी उस रचना को पढ़ चुके हैं तो एक पाठक  के रूप में आपके पास भी अपना किया हुआ एक मूल्यांकन हो सकता है. स्वाभाविक है कि आप अपने किए मूल्यांकन से दूसरे के मूल्यांकन की तुलना करेंगे और अगर दोनों में बहुत बड़ा फर्क़ पाएंगे तो हो सकता है कि आप दूसरे मूल्यांकन कर्ता, जिसे आलोचक या समीक्षक के नाम से भी जाना जाता है, की नीयत पर शक कर लें.

नीयत वाली यह  बात एक दूसरे स्तर पर भी उभर कर सामने आती है. जब कोई समीक्षक किसी रचना या कृति पर अपनी टिप्पणी करता है और अगर वह टिप्पणी प्रशंसात्मक  होती है तो लेखक कहता है कि यह समीक्षक बहुत  समझदार और ईमानदार है. लेकिन अगर कोई समीक्षा रचनाकार के अनुकूल नहीं होती है तो अक्सर यह होता है कि या तो रचनाकार यह कहता है कि समीक्षक उसकी रचना को समझ नहीं पाया है और या फिर वो उसकी नीयत पर सन्देह करता है. तब गुटबाजी, पक्षपात, बेईमानी, वैचारिक कट्टरता आदि जैसे विशेषण भी बाहर निकल आते हैं. 

मेरा क्षेत्र क्योंकि आलोचना रहा है मुझे इस तरह के अनेक अनुभव हुए हैं और अब तो निस्संकोच यह बात कह सकता हूं कि अपनी आलोचना के लिहाज़ से हिन्दी के अधिकांश रचनाकारों की पाचन शक्ति बहुत कमज़ोर है. यह लिखते हुए मुझे बरसों पहले का एक प्रसंग याद आ रहा है. हुआ यह कि जोधपुर के हमारे एक कथाकार मित्र ने अपनी कथा कृतियों पर एक गोष्ठी का आयोजन किया और उन्होंने मुझसे भी अनुरोध किया कि मैं उस गोष्ठी में पहुंचकर उनके रचनाकर्म पर कुछ कहूं. मैं तब जोधपुर से 200 किलोमीटर दूर सिरोही में कार्यरत था. कुछ युवकोचित उत्साह और कुछ उन रचनाकार मित्र के प्रति आत्मीयता – मैं जोधपुर चला गया. शाम को गोष्ठी थी. उस गोष्ठी में उनके दो और मित्र, नामी रचनाकार – एक दिल्ली से और एक मुम्बई से भी बुलाए गए थे. वैसे तो हम तीनों परस्पर परिचित थे, लेकिन गोष्ठी से पहले न तो हमारी कोई बातचीत हुई और न पत्र व्यवहार. फिर भी संयोग यह रहा कि हम तीनों ने उन रचनाकार मित्र के कृतित्व की विशेषताओं के साथ-साथ कमियों की भी करीब-करीब एक जैसी चर्चा की. वैसे भी वो चर्चा गोष्ठी थी, अत: यह बात अनुचित नहीं थी. गोष्ठी ख़त्म होते-होते मुझे लग गया कि वे रचनाकार मित्र बहुत क्षुब्ध हैं. शायद इसी क्षोभ की वजह से उन्होंने सिरोही से जोधपुर आने के लिए मेरे प्रति आभार व्यक्त करने का सामान्य सौजन्य भी नहीं बरता. आवास की मेरी अपनी परिवारिक व्यवस्था थी. मैं वहां चला आया और अगली सुबह सिरोही लौट आया. बाद में टुकड़ों-टुकड़ों में वहां के अन्य साहित्यकार मित्रों से जो बातें पता चली उन्हें जोड़ने पर तस्वीर यह बनी कि उन दोनों मित्रों को एक होटल में ठहराया गया  था और गोष्ठी के बाद उनके आतिथ्य सत्कार का ‘समुचित’ प्रबन्ध भी था. समुचित का अभिप्राय आप अपने आप समझ लें. उस सत्कार-समागम के दौरान हमारे उन रचनाकार  मित्र ने उन अतिथियों की जमकर ख़बर ली और इस बात पर न केवल शाब्दिक बल्कि शारीरिक नाराज़गी भी व्यक्त की कि इतना पैसा खर्च करके तुम्हें इसलिए थोड़े ही बुलाया था कि तुम यह सब कहो! मेरा तो यह सौभाग्य रहा कि मैंने अपने पर उनका एक पैसा भी खर्चा नहीं कराया और न उनका आतिथ्य ग्रहण किया, उलटे यात्रा व्यय भी अपना ही किया.  लेकिन इसके बावज़ूद उनकी नाराज़गी इस रूप में ज़रूर प्रकट हुई कि उस गोष्ठी से पहले हमारे बीच जो आत्मीयता का सूत्र था, वह टूट गया और ऐसा टूटा कि फिर जुड़ ही नहीं सका. और ऐसा  तो मेरे साथ बहुत बार हुआ है कि किसी रचनाकार की किसी रचना की प्रशंसा की तब उन्होंने कहा कि मुझ जैसा आलोचक कोई और है ही नहीं, लेकिन जब उनकी किसी रचना की किसी कमी पर उंगली  रखी तो पता चला कि उन्हें मेरी साहित्यिक समझ पर गहरा संशय है.

लेकिन वो अंग्रेज़ी  में कहते हैं ना कि इट्स ऑल पार्ट ऑफ द गेम!

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार दिनांक 15 जुलाई, 2014 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.  

Tuesday, July 8, 2014

काश! उसने मुझे न पहचाना होता

बेचारी मारिया शारापोवा! क्या हुआ जो वे टेनिस स्टार हैं और रूसी हैं! वे भगवान को चाहे जानें या न जानें,  लेकिन इस बात को कि वे क्रिकेट के भगवान को नहीं जानती हैं,  हम भारतीय क्रिकेट प्रेमी भला कैसे माफ़ कर सकते हैं? एक से एक विकट और अप्रिय टिप्पणियों के पत्थर उनकी तरफ फेंके जा रहे हैं! हमारी भक्ति एक तरफ़, उनका अज्ञान दूसरी तरफ़ और बीच में दौड़ रहा है मेरा दिमाग़. जगजीत की गाई गुलज़ार साहब की एक ग़ज़ल का शे’र याद आ रहा है: “आईना देखकर तसल्ली हुई/ हमको इस घर में जानता है कोई!” और मन कर रहा है कि क्रिकेट के भगवान के इन भक्तों से कहूं कि यारों अजनबीपन और बेगानेपन के इस विकट समय में बेचारी शारापोवा पर इतना गुस्सा मत करो. और यह अजनबीपन कौन  आज की बात  है?  सन साठ के दशक में हिन्दी में नई कहानी आन्दोलन के तीन तिलंगे और उनके बहुत सारे अनुयायी इसी अजनबीपन को अपनी बहुत सारी कहानियों का विषय बनाकर तारीफ़ पा चुके हैं.  लेकिन यह अजनबीपन और न पहचानने की पीड़ा एक तरफ, कई बार इसका उलट भी तो होता है. किसी का आपको पहचान लेना आपको असहज कर जाता है. मेरे साथ एक बार ऐसा ही हो चुका है.    

अब तक तो मेरे पाठक जान ही चुके हैं कि मेरी ज़िन्दगी का बड़ा हिस्सा छोटी जगहों पर गुज़रा है. राजस्थान के एक अपेक्षाकृत छोटे ज़िले के मुख्यालय पर लगभग पच्चीस साल नौकरी की. ऐसे छोटे कस्बों की ज़िन्दगी कैसी होती है, इसे आप वहां रहे बग़ैर नहीं जान सकते. वैसे, खट्टे और मीठे दोनों तरह के ज़ायके मिलते हैं वहां. सभी सबको जानते हैं, यानि हर व्यक्ति एक सेलेब्रिटी होता है. किसी का कोई काम रुकता नहीं. सब कुछ बहुत आसानी से हो जाता है. जीवन संघर्ष अपेक्षाकृत कम होते हैं. मसलन अपने काम के लिए या सामाजिक सम्बन्धों के निर्वाह के लिए ज़्यादा दूर नहीं जाना पड़ता. बहुत सारी चीज़ें जिन्हें हम ज़रूरी मानते हैं, वे सुलभ नहीं होती हैं. मेरे उस कस्बे में बहुत लम्बे समय तक ब्रेड नहीं मिलती थी, कोई ठीक-ठाक सा रेस्टोरेण्ट नहीं था, और आज भी वहां एक भी सिनेमाघर नहीं है. ज़ाहिर है कि इन वजहों से खर्चे कम होते हैं. बहरहाल. बात जब मैंने रेस्टोरेण्ट न होने की की तो बता दूं कि रेस्टोरेण्ट न सही, सड़क छाप ढाबे दो-तीन हुआ करते थे, और कुछ भोजनालय भी थे. हम लोग उन्हीं ढाबों को रेस्टोरेण्ट का मान देते हुए यदा-कदा अपने नीरस जीवन को सरस कर लिया करते थे. फिर धीरे-धीरे उन ढाबों में से कुछ ने अपना स्तर सुधार लिया और उनकी कीर्ति गाथा दूर-दूर तक फैल गई. 
  
उस कस्बे से निकल कर प्रांत की  राजधानी में आ जाने और अपने विभाग में एक उच्च प्रशासनिक पद पर आसीन हो जाने के बाद एक बार सरकारी दौरे पर उसी कस्बे में जाने का मौका मिला. कस्बे के अधिकारी महोदय ने आग्रह किया कि दोपहर का भोजन मैं उनके साथ करूं, जिसे मैंने सहजता से स्वीकार कर लिया. उन्होंने संकोच के साथ कहा कि चूंकि कस्बे में कोई ठीक-ठाक रेस्टोरेण्ट नहीं है, इसलिए जहां वे मुझे ले जा रहे हैं वहां ले जाना उनकी मज़बूरी है और मैं इसका बुरा न मानूं. वे उस पद पर नए नए आए थे और शायद इस बात से अपरिचित थे कि उस कस्बे को मैं और मुझे वो कस्बा कुछ ज़्यादा ही अच्छी तरह जानता है. हम पांच छह लोग वहां पहुंचे. जगह मेरी तो जानी पहचानी  थी लेकिन  वे अधिकारी महोदय ज़रूर संकोच अनुभव कर रहे थे. थोड़ी देर में उस ढाबे का एक पुराना कर्मचारी आया, उसने शायद मुझे तो देखा नहीं और सीधे उन अधिकारी महोदय से मुखातिब हो बोला, “आपने तो कहा था कि आपके बहुत बड़े साहब आएंगे. क्या वे आये नहीं?”  अधिकारी जी ने मेरी  तरफ इंगित करते हुए कहा – “ये रहे हमारे बड़े साहब! खयाल रखना कि ये यहां से खुश होकर जाएं!”   ढाबे का वो कर्मचारी मुड़ा, उसने एक नज़र मुझे देखा, और बेसाख़्ता बोला  “ये? ये  काहे के बड़े साहब! ये तो अपने अग्रवाल साहब हैं! इनकी पसन्द नापसन्द सब मुझे मालूम है!”  अब आप कल्पना कर सकते हैं कि मेरी क्या हालत हुई होगी! उन अफसर महोदय ने हवा भर-भरकर मेरे अहं के जिस गुब्बारे को खूब फुला दिया था, उसमें इस पुराने कर्मचारी ने अपनी आत्मीयता के कथन की एक महीन सुई चुभा कर सब मटियामेट कर डाला.  अजीब हालत थी मेरी.  मैं सोच रहा था, काश! इसने मुझे न पहचाना होता!

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत 08 जुलाई 2014 को काश! ढाबे वाले ने मुझे उस दिन न पहचाना होता शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.