Monday, June 8, 2020

लेखा जोखा-2019: राजस्थान में हिंदी लेखन


लेखकों और विशेष रूप से हिंदी लेखकों की यह शाश्वत शिकायत है कि लोगों में पढ़ने की आदत घटती जा रही है. यह शिकायत बीस-तीस बरस पहले भी की जाती थी, आज भी की जाती है. किताब खरीद कर पढ़ने के बारे में तो इस तरह की शिकायतें और भी ज़्यादा की जाती हैं. लेकिन इन शिकायतों के बरक्स यह भी एक यथार्थ है कि खूब लिखा जा रहा है, खूब लिटरेचर फेस्टिवल हो रहे हैं, लोग लेखकों को देख-सुन रहे हैं और पुस्तक मेलों में किताबें बिक भी रही हैं. सच बात यह है कि शिकायतें भी सही हैं और सकारात्मक बातें भी सही हैं. मुझे यह भी लगता है कि आज पहले से बहुत ज़्यादा किताबें छप रही हैं लेकिन उसी अनुपात में  किताबें खरीदने वालों की संख्या नहीं बढ़ रही है इसलिए हर लेखक को लगता है कि उसकी किताब कम बिक रही है. हिंदी में एक ख़ास प्रवृत्ति यह भी है कि हम चाहते हैं कि हमारी किताब बिके, लेकिन जिसकी बिकती है उसके अच्छा लेखक होने में संदेह करने में भी हम देर नहीं करते हैं. यह भी सही है कि गम्भीर किताबों पर चर्चा कम होती है, हल्की-फुल्की किताबों पर ज़्यादा चर्चाएं होती हैं. लेकिन ऐसा तो सभी क्षेत्रों में होता है. बढ़ते जा रहे लिटरेचर फेस्टिवल्स का अपना अर्थशास्त्र और अपना तौर तरीका है जहां बहुत गम्भीर लेखन के लिए जगह कम ही बन पाती है. इन तमाम बातों के बीच जब मैं राजस्थान के लेखकों की वर्ष 2019 में आई किताबों पर एक नज़र डालता हूं तो मुझे असंतुष्ट होने का कोई कारण नहीं मिलता. हर विधा में खूब लिखा गया है, बेहतरीन भी. नए लेखक भी दृश्य पटल पर खूब  आए हैं. उनमें भरपूर ऊर्जा और उत्साह है और यह उम्मीद की जानी चाहिए कि वे भी अपने लेखन को निरंतर परिष्कृत करते हुए  बहुत जल्दी साहित्य जगत में अपने लिए स्थान बनाएंगे.
कविताएं
राजस्थान के लेखकों ने  भी कविता लिखने में अधिक उत्साह दिखाया है. यहां तक कि हेतु भारद्वाज जैसे वरिष्ठ गद्यकार और आलोचक का कविता संग्रह कविता भर एक उम्र और अप्रतिम गद्यकार सत्यनारायण का कविता संग्रह साठ पार भी इस बरस प्रकाशित हुए. पीयूष दईया के दो कविता संग्रह इसी बरस आए – मार्ग मादरजात और त(लाश). आदिवासी विमर्श के सुपरिचित विशेषज्ञ हरि राम मीणा का कविता संग्रह आदिवासी जलियांवाला एवम अन्य कविताएं, आलोचक राजाराम भादू की भिन्न स्वाद वाली कविताओं का संग्रह स्वयं के विरुद्ध (पुनर्मुद्रण), वरिष्ठ कवि प्रकाश परिमल का हैण्ड्स अप हिंदुस्तान भी इसी बरस प्रकाशित हुए. इस साल प्रकाशित कविता पुस्तकों में सबसे ज़्यादा चर्चा रही कृष्ण कल्पित की हिंदनामा की. माया मृग का मुझमें मीठा है तू, ओम नागर का तुरपाई, विनोद पदरज का  देस, कैलाश मनहर का अरे भानगढ़  और हेमंत शेष का अफ़सोस दर्पण भी चर्चा में रहे. अपेक्षाकृत नए रचनाकारों में सूर्यप्रकाश जीनगर के पहले कविता संग्रह रेत से हेत ने ध्यान आकर्षित किया. इस साल प्रकाशित अन्य महत्वपूर्ण कविता पुस्तकों में जंगलों के बीच (बृजेंद्र कौशिक), फिर कविता का रूप बदलता (मेघराज श्रीमाली), जो शब्दों के अलाव पर नंगे पांव चलता है (नरेंद्र चतुर्वेदी) इश्क़ नाखुदा दिल पतवार (कविता माथुर), भोरगंध (आभा सिंह), चेहरों की तनहाइयां (ओमवीर करन), 108 मनके (कुन्ना चौधरी), ओ मेरे मन (ममता शर्मा अंचल’), मन वल्लकी (रितु सिंह वर्मा), अनकहे शब्द (रेनु शर्मा शंद मुखर’), और जुदा होना पड़ा (पण्डित आईना उदयपुरी) प्रमुख हैं.
कहानी
कविता से थोड़ी ही कम सक्रियता कहानी की दुनिया में देखने को मिली. इस बरस अत्यंत वरिष्ठ लेखिका सावित्री चौधरी का कहानी संग्रह अब क्या करूं, सुदेश बत्रा का फिर कब आओगे, नंद भारद्वाज का आवाज़ों के आस पास, नीलिमा टिक्कू का इंसानियत डॉट कॉम, नरेंद्र चतुर्वेदी का शायद कोई वह, रजनी मोरवाल के दो कहानी संग्रह – नमकसार और हवाओं से आगे,  तस्नीम ख़ान का दास्तान-ए-हज़रत, एस. भाग्यम  शर्मा का एक बेटी का पत्र, रेखा लोढ़ा स्मितका मुट्ठी भर आकाश, जितेंद्र कुमार सोनी का एडियोस: ढाई आखर की कहानियां, पद्मजा शर्मा के दो संकलन –वक़्त भी हैरान रह जाए तथा अन्य कहानियां  और मोबाइल पिक और हॉस्टल तथा अन्य कहानियां, तराना परवीन का बहुत उम्मीदें जगाता पहला कहानी संग्रह एक सौ आठ, रमेश खत्री का इक्कीस कहानियां तो आए ही, ईश मधु तलवार का लाल बजरी की सड़क, चरण सिंह पथिक का मैं बीड़ी पीकर झूंठ नी बोलता भी आए और चर्चाओं में रहे. एस. भाग्यम शर्मा ने अनुवाद के रूप में हमें श्रेष्ठ तमिल कहानियां का उपहार दिया तो नीरज दइया ने एक सौ एक राजस्थानी कहानियां हमें सौंपी. नंद भारद्वाज की राजस्थानी कहानियों का उन्हीं द्वारा अनूदित संग्रह बदलती सरगम भी इसी बरस आया. स्वयंप्रकाश की कहानियों का एक महत्वपूर्ण संकलन चौथा हादसा भी इसी बरस प्रकाशित हुआ.
उपन्यास
साल के प्रारम्भ में आए मनीषा कुलश्रेष्ठ के उपन्यास मल्लिका और साल के अंत में आए हरि राम मीणा के  डांग के बीच ईश मधु तलवार के रिनाला ख़ुर्द, श्याम जांगिड़ के उदास हथेलियां, क्षमा चतुर्वेदी के अपने हिस्से की धूप, वीना चौहान के नारी कभी ना हारी, हिमाद्री वर्मा डोइ के नया जन्म और अतुल कनक के महत्वाकांक्षी सृजन अंतिम तीर्थंकर ने आश्वस्त किया कि हमारे रचनाकार बड़े फलक के प्रति भी कम अनुराग नहीं रखते हैं. राजेंद्र मोहन शर्मा का विनायक सहस्र सिद्धै भी इसी साल प्रकाशित हुआ. एस. भाग्यम शर्मा ने तमिल लेखिका आर. चूड़ामणि के उपन्यास का दीप शिखा शीर्षक से अनुवाद हमें सौंपा. वरिष्ठ लेखक और सम्प्रेषण के सम्पादक चंद्रभानु भारद्वाज ने भटक्यो बहुत प्रकाश शीर्षक से एक अनूठी कृति हमें दी जिसमें  आत्मकथा और उपन्यास दोनों का बहुत सुंदर मेल है. उर्दू हास्य व्यंग्य के सर्वाधिक सशक्त हस्ताक्षरों में शुमार मूलत: टोंक निवासी मुश्ताक़ अहमद यूसुफी के दो बहु प्रशंसित और चर्चित उपन्यास खोया पानी और धन यात्रा, जो लम्बे समय से अनुपलब्ध थे, इसी साल राजपाल से पुन: प्रकाशित हो सुलभ हुए. 
हास्य व्यंग्य
मुझे यह बात बहुत दिलचस्प लगती है कि हमारे बहुत सारे रचनाकार अपने सुपरिचित इलाकों से बाहर निकल कर अप्रत्याशित रच रहे हैं. मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि विजय वर्मा जैसे गम्भीर अध्येता हास्य व्यंग्य भी रचेंगे. उन्होंने हमें एक नया राग दिया – राग पद्मश्री. उन्हीं की तरह एक अन्य गम्भीर रचनाकर अम्बिका दत्त ने भी हमें परम देश की अधम कथा सुना डाली. और जब ऐसे रचनाकार हास्य व्यंग्य की तरफ खिंचे चले आए तो इस विधा के सुपरिचित रचनाकार भला कैसे  पीछे रहते? डॉ यश गोयल का नामुमकिन नेता, अजय अनुरागी का एक गधे की उदासी, पूरन सरमा का श्री घोड़ीवाला का चुनाव अभियान और उन्हीं का कुर्सी मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है इस बरस हमें  गुदगुदाने और भीतर ही भीतर कसमसाने को विवश करने में कामयाब  रहे. यशवंत कोठारी के सारे व्यंग्य उपन्यासों का किंडल संस्करण समग्र उपन्यास शीर्षक से आया. उन्हीं की 101 चुनिंदा व्यंग्य रचनाओं का संकलन होना फ्रेक्चर हाथ में भी किंडल पर आया है.
कथेतर
इधर हिंदी में कथेतर में बहुत  अधिक और बेहतरीन काम हो रहा है. राजस्थान भी इसका अपवाद नहीं है. असल में कथेतर में मौलिक और सर्जनात्मक होने की अपरिमित सम्भावनाएं हैं और हमारे रचनाकार इन सम्भावनाओं का खूब उपयोग कर रहे हैं. हाल में हमसे जुदा हुए विलक्षण कथाकार स्वयंप्रकाश की धूप में  नंगे पांव  एक अद्भुत कृति है. इस किताब में स्वयंप्रकाश ने अपने जीवन के उन क्षणों और प्रसंगों को शब्दबद्ध किया है जो उनके कथा साहित्य में नहीं आ सके. यहां स्वयंप्रकाश की रचनाशीलता अपने चरम पर है. हेतु भारद्वाज ने बैठे ठाले की जुगालियां में अपने मस्त मौला और बिंदास अंदाज़ में अतीतावलोकन किया है. उषा गोयल ने भी जीवन के रंग सृजन के संग में अपनी जीवन यात्रा में हमें साझीदार बनाया है. डॉ श्रीगोपाल काबरा ने कहां आ गए हम में उस सुखद अतीत से हमें मिलवाया है जिसे हम तेज़ी से  भूलते जा रहे हैं. और इसी सिलसिले में याद आती है हेमंत शेष की कृति भूलने का विपक्ष जिसमें उन्होंने राजस्थान के कुछ महत्वपूर्ण किंतु भुला दिए गए रचनाकारों के साथ-साथ कुछ अन्य को भी बड़ी आत्मीयता  से स्मरणांजलि दी है. रामबक्ष जाट की अनूठी संस्मरण कृति मेरी चिताणी भी इसी साल हमारे हाथों में आई.  इसी बरस आई उमा की कृति क़िसागोई हमारे सुपरिचित रचनाकारों को एक नए आलोक में प्रस्तुत करने का यादगार उपक्रम है. यही काम कैलाश मनहर ने मेरे सहचर मेरे मित्र में अलग तरह से किया है. अपने समकालीनों को क़मर मेवाड़ी ने भी यादें में बहुत खूबसूरती और अपनेपन से स्मरण किया है. सब कुछ जीवन सत्यनारायण की उनकी सिग्नेचर विधा रिपोर्ताज की कृति है. इस बरस प्रकाशित पुस्तकों में सोशल एक्टिविस्ट भंवर मेघवंशी की मैं एक कार सेवक था भी अपनी ईमानदारी और प्रखरता के लिए बहु चर्चित रही है. इनके अलावा हरिशंकर शर्मा की तू हमको पुकारे हम नहीं, प्रभाशंकर उपाध्याय की यादों के दरीचे, आभा सिंह की स्वप्न दिशा की ओर भी इसी साल आईं. देशबंधु अंगिरा की किताब मानसरोवर यात्रा, कुमार अजय की डायरी मैं चाहूं तो मुस्करा सकता हूं, सत्यनारायण की डायरी दु:ख किस कांधे पर और हरिशंकर शर्मा की पण्डित राधेश्याम  कथावाचक की डायरी पर आधारित विश्लेषणात्मक कृति डायरी का व्याकरण भी इस बरस की उल्लेखनीय कृतियां हैं. प्रबोध कुमार गोविल सम्पादित हरे कक्ष में दिनभर  और हरिशंकर शर्मा की संवादहीनता के युग में में महत्वपूर्ण साक्षात्कार पढ़ने को मिले. इसी बरस संगीत पर केंद्रित श्रीलाल मोहता और ब्रजरतन जोशी सम्पादित संगीत: संस्कृति की प्रकृति  और हिंदी फिल्म संगीत पर केंद्रित नवल किशोर शर्मा की फिल्म संगीत: संस्कृति और समाज भी प्रकाशित हुईं. अनुकृति सम्पादक जयश्री शर्मा के सम्पादकीय लेखों का संग्रह सम्पादक कहिन, स्वयंप्रकाश की डाकिया डाक लाया, प्रगति गुप्ता की सुलझे अन सुलझे, राजेंद्र गर्ग की आत्महीनता और अन्य मनोविकार और मिश्री लाल माण्डोत की बोध कथाओं की किताब जिओ ऐसे ज़िंदगी को भी इसी साल प्रकाशित हुईं. मालचंद तिवाड़ी की स्त्री का मनुष्यत्व और  गोपाल शर्मा सहरकी लोहा हैं ये शब्द इस साल आई दो और महत्वपूर्ण किताबें है. कवि- आलोचक सत्यनारायण व्यास की आत्मकथा  क्या कहूँ आज  का प्रकाशन इस विधा की प्रतिष्ठा बढ़ाने वाला होगा. और ससंकोच यह भी कि इसी बरस सामयिक विषयों पर मेरे लेखन के भी दो संग्रह आए –समय की पंचायत और जो देश हम बना रहे हैं.
नाटक इस बरस बहुत कम प्रकाशित हुए. मेरी जानकारी मदन शर्मा के एक थी माधवी और प्रबोध कुमार गोविल के बता मेरा मौत नामा तक सीमित है.
आलोचना
मेरे लिए यह सुखद आश्चर्य की बात  है कि इस साल आलोचना के क्षेत्र में हमारे प्रांत ने काफी कुछ महत्वपूर्ण दिया है. साल की शुरुआत साहित्य अकादेमी की भारतीय साहित्य के निर्माता शृंखला में विश्वम्भरनाथ उपाध्याय पर हेतु भारद्वाज के मोनोग़्राफ़ से हुई तो साल बीतते बीतते इसी श्रंखला में नंद चतुर्वेदी पर पल्लव का मोनोग्राफ़ हाथ में आया. और इनके बीच आईं डॉ नवलकिशोर की लम्बे समय से अनुपलब्ध दो किताबें –मानववाद और साहित्य औरमानवीय अर्थवत्ता और हिंदी उपन्यास. इनके साथ ही लगभग चालीस साल बाद उनकी नई किताब प्रेमचंद की प्रगतिशीलता भी आई. रामदेव आचार्य की लाक्षागृह और लेखन भी इसी बरस फिर से प्रकाशित हुई. प्रचार प्रसार से दूर रहते हुए चुपचाप अपना काम करने वाले मोहनकृष्ण बोहरा की भी दो महत्वपूर्ण  कृतियां समकालीन कहानीकार: नया वितान और रचनाकार का संकट इसी बरस प्रकाशित हुईं. मोहनकृष्ण बोहरा के अवदान पर एटा उत्तर प्रदेश से प्रकाशित चौपाल पत्रिका ने एक विशेषांक भी प्रकाशित किया. रवि श्रीवास्तव की दो किताबें राष्ट्र, राष्ट्रवाद और लोकतंत्र तथा जनजीवन और साहित्य भी इसी साल प्रकाशित हुईं. युवा कवि-चित्रकार और रंगकर्मी रविकुमार पर बनास जन का अंक भी यादगार रहा. माधव नागदा की किताब समकालीन हिंदी लघु कथा और आज का यथार्थ भी 2019 में ही प्रकाशित हुई. सदाशिव श्रोत्रिय की किताब कविता का पार्श्व इस कारण भी विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि यहां एक कवि ने अपनी ही कविताओं  पर बहुत बारीकी से लिखा है. माधव हाड़ा अपने शोध और आलोचना संबंधी लेखन के लिए व्यापक पहचान बना चुके हैं, यह उनकी निष्ठा ही है कि ब्रजरतन दास संपादित ऐतिहासिक संकलन मीरां माधुरी  का नया संस्कारण उनके प्रयासों से आया.  वहीं  मानस का हंस पर कालजयी कृति शृंखला में उनकी, कुरुक्षेत्र  पर रेणु व्यास और आवारा मसीहा पर पल्लव की किताबें आलोचना में उल्लेखनीय मानी जाएंगी.

तो यह था बरस 2019 में आईं राजस्थान के लेखकों की हिंदी कृतियों का संक्षिप्त लेखा-जोखा. मैंने अपनी तरफ से भरपूर कोशिश की है कि किसी महत्वपूर्ण किताब का ज़िक्र छूट न जाए, लेकिन हरेक की जानकारियों की सीमा होती है, मेरी भी है. बहुत मुमकिन है कि अनेक उल्लेखनीय कृतियों के प्रकाशन की मुझे जानकारी न मिल सकी हो. उन सभी के रचनाकारों से अग्रिम क्षमा याचना. यहीं यह ज़िक्र करना भी अप्रासंगिक नहीं लग रहा है कि बावज़ूद इतने विपुल और बेहतरीन सृजन के साहित्यिक परिदृश्य पर राजस्थान की लगभग अनुपस्थिति व्यथित करती है. राष्ट्रीय स्तर के समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में छपे वार्षिक लेखे-जोखे को देखें और तलाश करें कि उनमें राजस्थान के कितने लेखकों को जगह मिली है. आखिर क्यों हमारे लेखन पर औरों का ध्यान नहीं जाता है?  इस पर हम सबको मिलकर विचार करना चाहिए.
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मूलत: यह लेख जयपुर से प्रकाशित मासिकी 'जनतेवर' में प्रकाशित होने वाले मेरे स्तम्भ 'उजास' के लिए लिखा गया था. किन्हीं अपरिहार्य कारणों से 'जनतेवर' का प्रकाशन स्थगित है, अत: यह लेख यहां पोस्ट कर रहा हूं. 

स्वयंप्रकाश : वे मेरे लिए फ्रेण्ड, फिलोसॉफर और गाइड थे


अभी कुछ ही समय पहले स्वयं प्रकाश की किताब धूप में नंगे पांव आई थी. इस किताब में उन्होंने कुछेक प्रसंगों में मेरा भी  ज़िक्र किया है. उस ज़िक्र से, जिसमें एक मित्र की सहज आत्मीयता जन्य प्रशंसा थी,  मैं एक बार फिर उन अपनास भरे दिनों में लौट गया था जब हम इतना निकट थे कि जब चाहे मिल सकते थे. वे सुमेरपुर में थे और मैं सिरोही में था. दोनों कस्बों के बीच मात्र चालीस किलोमीटर का फासला, जो हम दोनों को  अपनी जवानी की वजह से कुछ भी नहीं लगता था. जब जी चाहता वे सिरोही चले आते और जब जी चाहता हम सुमेरपुर चले जाते. उन्हीं खूबसूरत और उजले दिनों को स्वयं प्रकाश ने इस किताब में भी याद किया है. जब यह किताब पढ़ रहा था तब नहीं पता था कि इस किताब पर कुछ लिखने का पल्लव का आग्रह पूरा करूंगा उससे पहले ही स्वयं प्रकाश के लिए एक स्मृति लेख लिखने की विवशता सामने आ खड़ी होगी. शायद एक महीना भी पूरा न लगा उन्हें गम्भीर रूप से बीमार होने, इलाज़ के लिए मुम्बई जाने और फिर हम सब को रोता-बिलखता छोड़ हमसे बहुत दूर चले जाने में. स्वयं प्रकाश के न रहने के हृदय विदारक समाचार ने मुझे अनायास शंकर के बांग्ला उपन्यास चौरंगी के उस कथन  की याद दिला दी जो अंग्रेज़ी के एक कम ख्यात कवि ए.सी. माफेन की पंक्तियों पर आधारित है. उपन्यास में एक चरित्र बोस भाई कहता है:  दुनिया की इस सराय में हमने कुछ क्षणों के लिए आश्रय लिया है. हम लोगों में से कुछ लोग ब्रेकफास्ट खाकर ही चले जाएंगे. कुछ लोग लंच ख़त्म करते ही चले जाएंगे. शाम का अंधेरा पार करके जब हम रात में डिनर-टेबुल पर इकट्ठे होंगे, तो कितने ही परिचित लोगों को गायब पाएंगे. इतने लोगों में से दो-चार व्यक्ति ही वहां मिल सकेंगे. मगर परवाह मत करो, दुख मत करो. जो जितना पहले चला जाएगा, उसे उतना की कम बिल चुकाना पड़ेगा.”   लेकिन यहां आकर मैं बोस भाई उर्फ शंकर से असहमत होता हूं. स्वयं प्रकाश को इस बात की खुशी तो नहीं होगी कि उन्हें कम बिल  चुकाना पड़ेगा. अलबत्ता, जैसी उनकी फितरत थी, वे दूसरे लोक में जाकर  भी कम धमाल नहीं मचा रहे होंगे.

20 जनवरी 1947 को इंदौर में जन्मे और मैकेनिकल इंजीनियरिंग (और बाद में हिंदी में एम. ए. और पी-एच.डी.)  की शिक्षा प्राप्त  स्वयं प्रकाश  ने आजीविका के लिए बहुत सारी नौकरियां कीं, बहुत सारे शहरों और कस्बों में रहे. उनका जन्म भले ही  मध्य प्रदेश में हुआ और हाल के बरसों में वे वहीं रह भी रहे थे, उनके जीवन का बड़ा भाग राजस्थान में ही बीता. यह उचित ही है कि हम राजस्थान वासी उन्हें अपने प्रांत का लेखक मानते हैं. इन सब कामों और जगहों से उन्होंने जो अनुभव अर्जित किये वे उनके दो दर्ज़न से ज़्यादा कहानी संग्रहों की कहानियों, पांच उपन्यासों, एक नाटक, और कथेतर की कई किताबों में रचनात्मक रूप से अभिव्यक्त हुए हैं. उन्होंने कुछ महत्वपूर्ण किताबों के अनुवाद भी किये, कुछ पत्रिकाओं का सम्पादन किया – जिनमें चकमक और वसुधा विशेष रूप से स्मरणीय हैं, और बच्चों के लिए भी खूब लिखा.

हालांकि मेरा यह लेख उनके लेखन के बारे में नहीं है, फिर भी यह यह कहना ज़रूरी लग रहा है कि स्वयं प्रकाश  के लेखन की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि वे गम्भीर से गम्भीर बात कहते हुए भी सहज और सरल बने रहते हैं. उनके लेखन में से ऐसे अंश ढूंढ  पाना लगभग नामुमकिन होगा जहां वे बोझिल हुए हों. और इसी तरह उनके लेखन में शायद ही ऐसा कुछ हो जो सिर्फ मज़े के लिए हो. बात चाहे साम्प्रदायिकता की हो, स्त्री-पुरुष सम्बंधों की हो, पीढ़ियों के द्वंद्व की हो, समाज में ग़ैर बराबरी की हो, शोषण की हो, जाति प्रथा की हो, अपने खिलंदड़े लहज़े को बरक़रार रखते  हुए स्वयं प्रकाश  अपनी बात कहने की कला के उस्ताद साबित होते हैं. यह आकस्मिक नहीं है कि उनकी नीलकांत का सफर, चौथा हादसा, पार्टीशन, बड्डे, बलि, नैनसी का धूड़ा, क्या तुमने कभी कोई सरदार भिखारी  देखा जैसी कहानियां समकालीन हिंदी की सबसे ज़्यादा पढ़ी और सराही गई कहानियों में शुमार हैं. अपने उपन्यासों में भी उन्होंने बड़े फ़लक पर यही किया है.  चाहे वो जलते जहाज पर हो, ज्योतिरथ के सारथी हो, उत्तर जीवन कथा हो, बीच में विनय हो या ईंधन हो – अपने हर उपन्यास में स्वयं प्रकाश अपने अनुभवों और विचार को इस कुशलता से गूंथते हैं कि आप चाह कर भी इनके बीच कोई फांक नहीं तलाश कर पाते हैं. और जब वे कथा से कथेतर के इलाके में आते हैं तब तो कहना ही क्या! खुलकर, बेलौस अंदाज़ में वे अपनी बात कहते हैं. लेकिन पाठक से नज़दीकी उनकी यहां भी कम नहीं होती. स्वान्त: सुखाय, दूसरा पहलू, रंगशाला में एक दोपहर, कहानीकार की नोटबुक और क्या आप साम्प्रदायिक हैं जैसी किताबों में उनका वैचारिक पक्ष बहुत खुलकर सामने आता है. इस लिहाज़ से धूप में नंगे पांव का अलग से ज़िक्र इसलिए ज़रूरी है कि यहां हमें व्यक्ति स्वयं प्रकाश से मिलने का मौका मिलता है. एक तरह से यह किताब उनके लेखक को समझने की चाबी है. एक लेखक किन स्थितियों में रहता और अनुभव अर्जित करता है जब आप इस किताब को पढ़ते हुए यह जानते-समझते हैं तब महसूस करते हैं कि एक बड़ा लेखक क्यों और कैसे बनता है.

जैसा मैंने अभी कहा, गम्भीरता का लबादा स्वयं प्रकाश के पास था ही नहीं. इस मामले में वे ज़्यादातर लेखकों-बुद्धिजीवियों से भिन्न थे. वे उत्साह से लबरेज़ थे. सक्रियता, उल्लास और जीवंतता के वे चलते-फिरते बिम्ब थे. मेरा पहला परिचय उनसे जब हुआ तब तक मैं एक लेखक के रूप में उनके नाम से परिचित हो चुका था. यह बात आसानी से समझी जा सकती है कि सातवें दशक के अंत में उनकी वैसी ख्याति नहीं रही होगी, जैसी बाद के बरसों में हुई, लेकिन तब भी वे खूब लिख रहे थे, छप रहे थे और साहित्य प्रेमी उनके नाम से भली भांति परिचित  हो चुके थे. मेरे और उनके बीच पुल बने चित्तौड़ कॉलेज में अंग्रेज़ी के प्राध्यापक और मेरे घनिष्ट मित्र सदाशिव श्रोत्रिय. अब पीछे मुड़ कर देखता हूं तो याद आता है कि कैसे हम अनायास मिले. मैं चित्तौड़ में कुम्भानगर में रहता था और उसी कॉलोनी में सदाशिव श्रोत्रिय भी रहते थे. एक दिन मेरे घर की घण्टी बजी, दरवाज़ा खोला तो पाया कि एक सुदर्शन युवक, जिसका चेहरा-मोहरा धर्मेंद्र से बहुत मिलता है, बाहर खड़ा है और सदाशिव श्रोत्रिय के घर का पता पूछ रहा है. कहना अनावश्यक है यह युवक स्वयं प्रकाश था, जिसके नाम और काम से मैं बज़रिये सदाशिव जी, परिचित हो चुका था. उसी शाम सदाशिव जी ने अपने घर एक महफिल सजाई और उस महफिल में पहली दफा स्वयं प्रकाश  से ठीक से मुलाकात हुई. थोड़ी गपशप और बहुत सारे गीत गज़ल. स्वयं प्रकाश का गला बहुत सुरीला था. मेहदी हसन, ग़ुलाम अली, जगजीत सिंह, किशोर कुमार, लता मंगेशकर  न जाने किन-किन के नग़्मे उन्होंने उस शाम सुनाए. उस शाम के असर की कल्पना इसी बात से की जा सकती है कि आज भी जब मैं लता मंगेशकर के एक गाने रात भी है कुछ भीगी-भीगी, चांद भी है कुछ मद्धम मद्धमके बारे में सोचता हूं तो वह मुझे स्वयं प्रकाश की आवाज़ में ही सुनाई देता है. उस शाम गोपाल सिंह नेपाली का एक गीत भी उन्होंने सुनाया, दूर जाकर न कोई बिसारा करे, मन दुबारा-तिबारा पुकारा करे. इसी गीत का आखिरी बंद आज बेसाख़्ता याद आ रहा है: एक दिन क्या मिले मन उड़ा ले गए, मुफ़्त में उम्र भर की जलन दे गए / बात हमसे न कोई दुबारा करे, मन दुबारा-तिबारा पुकारा करे।  और वाकई, उस एक दिन की अनायास हुई मुलाक़ात ने हमें रिश्तों की जिस मज़बूत डोरी से बांध दिया, स्वयं प्रकाश उसे इस तरह एक झटके से तोड़ कर चले जाएंगे, यह तो कभी सोचा भी न था.

स्वयं प्रकाश के न रहने की ख़बर ने, हालांकि उनकी गम्भीर बीमारी के मिलते समाचारों ने हमें इस अनहोनी के लिए मानसिक रूप से तैयार कर दिया था, मुझे इतना  अधिक  विचलित कर दिया है कि सिलसिले वार कुछ भी लिख पाना सम्भव नहीं हो रहा है. और यह स्वाभाविक भी है. लगभग साढे‌ चार दशकों की दोस्ती कोई मामूली दोस्ती तो होती नहीं. और फिर यह कोई रस्मी और दिखावे की दोस्ती तो थी नहीं. दिखावे की भी नहीं और आदान-प्रदान के धागों से बंधी भी नहीं. यह एक लेखक और उसके पाठक के बीच की दोस्ती भी नहीं थी. आलोचक तो मैं तब तक बना ही नहीं था, इसलिए वह रिश्ता तो था ही नहीं. मैं खुद बरसों यह सोचता रहा कि स्वयं प्रकाश और मेरे बीच इतनी सघन दोस्ती क्यों हुई? और जवाब मिला धूप में नंगे पांव में ही. स्वयं प्रकाश ने मेरे लिए लिखा है, “इस सब में जो प्रमुख चीज़ थी वह थी सुरुचि जो दुर्लभ नहीं तो बहुत ज़्यादा सुलभ भी नहीं होती.” यही बात मैं उनके लिए भी कहना चाहता हूं. असल में उनकी सुरुचि ने ही मुझे उनका मुरीद बनाया. बात चाहे खाने-पहनने की हो, रहन-सहन की हो,  चिट्ठी लिखने की हो, आपसी रिश्तों के निर्वहन की हो, स्वयं प्रकाश सुरुचि का पर्याय थे. कम में भी कैसे ज़िंदगी के रस को छक कर पिया जा सकता है, यह मैंने न केवल उनमें देखा, उनसे सीखा भी. सीखा तो और भी बहुत कुछ. चित्तौड़ की उस मुलाकात के बाद वास्तव में हम नज़दीक आए कोई पांचेक बरस के बाद. चित्तौड़ से मेरा तबादला सिरोही हो गया और संयोग ऐसा बना कि स्वयं प्रकाश भी स्थानांतरण पर सुमेरपुर टेलीफोन एक्सचेंज में आर एस ए होकर आ गए. बस, उसके बाद हमारे मिलने-जुलने का, संवाद का चिट्ठी-पत्री का और एक दूसरे के सुख दुख में साझीदार होने का जो सिलसिला शुरु हुआ वह अनवरत चलता रहा. सुमेरपुर-सिरोही के उन दिनों को स्वयंप्रकाश ने धूप में नंगे पांव में बहुत खूबसूरती से अंकित किया है. उनका सिर्फ़ एक वाक्य हमारी घनिष्टता को व्यक्त करने के लिए पर्याप्त है: धीरे-धीरे सिरोही मेरे लिए दूसरे घर जैसा बन गया और मैं लगभग हर साप्ताहिक अवकाश में किसी भी बस या ट्रक में चढ़कर वहां पहुंचने लगा. यहां सिरोही को दुर्गाप्रसाद का पर्याय समझा जा सकता है. कहना अनावश्यक है कि मेरे लिए सुमेरपुर स्वयं प्रकाश का पर्याय था. अब इस बात को निस्संकोच कह सकता हूं कि दोस्ती के उस दौर में स्वयं प्रकाश का शोषण भी मैंने खूब किया. मैंने भी और हमने भी. इस बात की गिनती करना कठिन होगा कि कितनी बार मैंने उन्हें अपने कॉलेज में बुलाया. कभी अपने विद्यार्थियों से बात करने, व्याख्यान देने, कभी कविताएं सुनाने, कभी पुरस्कार वितरण करने. और इसका मानदेय देना तो दूर, यात्रा व्यय भी शायद ही कभी दिया हो. इस बात की आज तो कल्पना भी नहीं की जा सकती कि कोई बड़ा लेखक इस तरह आपके एक आवाज़ देने से चला आएगा. लेकिन स्वयं प्रकाश आते रहे. मेरे विद्यार्थी कहते कि सर, स्वयं प्रकाश जी को आए बहुत दिन हो गए और मैं वहीं कॉलेज से उन्हें फोन करता और वे चले आते. कभी बस से, और कभी ट्रक पर लिफ्ट लेकर. जैसे मैंने उनका भरपूर दुरुपयोग किया, वैसे ही मेरी पत्नी ने भी किया. वे आते और हम अपने दोस्तों पड़ोसियों को जुटा कर महफिल जमा लेते. कभी मेरे घर के छोटे से कमरे में तो कभी हमारे घर की छत पर. कोई ताम झाम नहीं, बस, वे होते और हम सब होते. और फिर तीन-चार घण्टे कैसे बीत जाते पता ही नहीं चलता. खूब कविताएं, खूब गाने, ग़ज़लें, लतीफ़े और भी बहुत कुछ. उन अनौपचारिक महफ़िलों में जाने कितनी बार हमने नीलकांत का सफ़र सुनी.

उसी दौर में स्वयं प्रकाश ने मेरे कॉलेज से स्वयं पाठी विद्यार्थी के रूप में हिंदी में एम ए किया और फिर मोहन लाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय से पी-एच. डी. इस बहाने उनसे और ज़्यादा मिलना-जुलना हुआ. इस सबका बहुत रोचक वर्णन उन्होंने अपनी इस किताब में किया है. इस वर्णन को पढ़ते हुए मैं उनकी याददाश्त का भी मुरीद होता रहा. जिन घटनाओं का मैं भी एक किरदार था और जिन्हें मैं भूल चुका था, वे उन्हें बरसों बाद ऐसे याद थीं जैसे अभी ही घट रही हों. इस वर्णन को पढ़ते हुए मेरा ध्यान  इस बात पर भी गए बग़ैर नहीं रहा कि जो घटनाएं हमारे लिए बहुत सामान्य होती हैं, एक रचनाकार का हल्का-सा स्पर्श पाते ही वे कितनी महत्वपूर्ण और रोचक बन जाती हैं. स्वयं प्रकाश का यह रचनात्मक स्पर्श उनके पत्रों में भी खूब होता था. उनका मेरा खूब पत्राचार हुआ. उन्हें पत्र लिखने का जैसे जुनून था और मैं भी एक हद तक उन जैसा ही था. यह बात अलग है कि मुझे उतने विस्तृत पत्र लिखने की आदत नहीं थी और वैसी रचनात्मकता तो ख़ैर शायद ही उनमें होती. मेरी संक्षेप में पत्र लिखने की आदत पर तो एक बार उन्होंने यह कहते हुए चुटकी भी ली थी कि दुर्गा बाबू, यह आपकी शैली है या कुटेव? वे अपने पत्रों में दुनिया-जहान की बातें लिखते. जहां होते वहां के हाल-चाल, साहित्य की नई से नई हलचलों पर चर्चा, नई पढ़ी किताबों पर उनकी राय, हाल में सुने गए संगीत का विवरण और न जाने  क्या-क्या! बहुत बार बड़े मौलिक लतीफ़े भी उनके पत्रों में होते. मुझे अपने जीवन में जिन चीज़ों का सबसे ज़्यादा अफ़सोस है उनमें से एक इस बात का भी है कि मैं उन पत्रों को सहेज कर नहीं रख सका. बार-बार के तबादलों में मेरी वो दौलत खुर्द बुर्द हो गई.

इस बात को स्वीकार करने में मुझे तनिक भी संकोच नहीं है कि मेरी साहित्यिक रुचि के निर्माण में स्वयं प्रकाश की बहुत बड़ी भूमिका है. उनसे मुलाकात के पहले मैं हिंदी का एक औसत दर्ज़े का प्राध्यापक था. अपने पाठ्यक्रम को ठीक से पढ़ा लेता था और जो मिलता वह पढ़ लेता था. यों भी जब हम मिले तक तक मेरी नौकरी की उम्र छह साथ बरस की थी. स्वयं प्रकाश ने मुझे विचारधारा की समझ दी. मेरी बहुत सारी शंकाओं का समाधान किया, करते रहे. साहित्यिक विवेक मैंने उनसे पाया. और यह केवल उन संग साथ के दिनों की ही बात नहीं है. यह सिलसिला अनवरत चलता रहा. बाद में हमारा पत्राचार कम हुआ तो उसकी जगह दूरभाष संवाद ने ली. लेकिन तब भी हम लम्बी बातें करते और अपनी समझ को और धार देते. स्वयं प्रकाश के साथ बहुत सारे साहित्यिक आयोजनों में भी सहभागिता करने का अवसर मिला. वो समय राजस्थान में साहित्यिक सक्रियता के लिहाज़ से सबसे उम्दा समय था. खूब सारे आयोजन होते और हम लोग उनमें जाते. इस बहाने साथ रहने का और विचार विमर्श का भी ज़्यादा समय मिलता. स्वयं प्रकाश के साथ ही हम सिरोही से जयपुर प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय अधिवेशन में शिरकत करने आए और एक सामान्य-सी धर्मशाला –शायद इमिटेशन वालों की धर्मशाला- में भीष्म  साहनी जैसे दिग्गजों के साथ रुके. मेरे लिए साहित्य की दुनिया के चमकते सितारों को नज़दीक से देखने का वह पहला मौका था. उस आयोजन  में अमृत राय, कैफी आज़मी, गुलाम रब्बानी ताबां, अली सरदार ज़ाफरी, त्रिलोचन, नागार्जुन जैसी शख़्सियतों ने सहभागिता की थी.

स्वयं प्रकाश अपने लेखन और विचारधारा को लेकर जितने संज़ीदा और ईमानदार थे उतने ही संज़ीदा और ईमानदार अपने घर परिवार के प्रति भी थे. इतने बरसों की नज़दीकी में मैं यह बात ख़ास तौर पर देख सका कि वे परिवार और साहित्य दोनों के प्रति समान रूप से ईमानदार थे. इस मामले में वे उन साहित्यकारों से अलग ठहरते थे जो साहित्य  को ही ओढ़ते-बिछाते हैं और परिवार को अपने हाल पर छोड़ देते हैं. सच बात तो यह है कि वे रिश्तों में और चीज़ों में घालमेल से बचने के पक्षधर थे. यह बात मैंने एक और ख़ास संदर्भ में देखी, और सीखी भी. वे नौकरी और लेखन को अलग रखते थे. मुझे जावर माइंस में यह देखकर आश्चर्य हुआ कि उनके ही तंत्र के और पास-पड़ोस के लोग इस बात से नावाक़िफ़ थे कि वे एक लेखक भी हैं. हालांकि तब तक वे अखिल भारतीय प्रतिष्ठा अर्जित कर चुके थे. वैसे यह इस बात पर भी एक टिप्पणी है कि हमारा समाज अपने ही लेखकों से कितना ज़्यादा कटा हुआ है. अगर उनके दफ्तर के लोग भी थोड़ा  बहुत पढ़ने वाले रहे होते तो वे इस बात से अपरिचित नहीं हो सकते थे कि एक बड़ा लेखक उनके तंत्र में कार्यरत है. अपने कार्यालय समय में वे केवल एक दक्ष अधिकारी थे और बाद के समय में अफसर न होकर सिर्फ लेखक थे. इसी तरह जब वे परिवार के साथ होते तो एक पल को भी यह बात सामने नहीं आने देते कि वे एक लेखक हैं. मेरे बच्चों के साथ वे बच्चे बन जाते और उन्हीं के स्तर पर आकर उनसे बतियाते. आज उनकी जितनी कमी मैं महसूस कर रहा हूं उससे कम मेरी पत्नी और बच्चे नहीं कर रहे हैं. अगर वे चौबीसों घण्टे वाले लेखक होते तो ऐसा नहीं होता.

स्वयं प्रकाश को बहुत नज़दीक से देखकर मैं यह जान और अनुभव कर पाया कि जिन मूल्यों और आदर्शों को वे अपने लेखन में अभिव्यक्त करते थे उन्हें शब्दश: जीते भी थे. इस मामले में वे उन लोगों से एकदम अलग थे जो लिखते कुछ और हैं, जीते कुछ और. समानता, स्वतंत्रता, कर्म काण्ड और पाखण्ड का विरोध, असासाम्प्रदायिक होना, स्त्री का सम्मान, बेटे बेटी के बीच कोई भेद न रखना, सामाजिक स्तर पर बराबरी का भाव, श्रम के प्रति निष्ठा, शोषण का हर स्तर पर विरोध जैसी बातें जो उनके लेखन में बार-बार आती हैं उनके निजी जीवन में भी हर स्तर पर देखने को मिलीं. इन बातों के अनेक उदाहरण मुझे याद आ रहे हैं, लेकिन स्थानाभाव के कारण उन्हें अंकित नहीं कर रहा हूं.

स्वयं प्रकाश में स्वाभिमान का भाव कूट-कूट कर भरा था. लेकिन इस स्वाभिमान को अहंकार से अलग करके देखा जाना ज़रूरी है. वे बेहद शालीन, बहुत विनम्र थे, लेकिन अपनी अस्मिता को लेकर, अपने रचनाकार को लेकर वे कोई समझौता करने को या किसी के भी आगे झुकने  को कभी तैयार नहीं पाए गए. उनके स्वाभिमान की ही एक अभिव्यक्ति इस रूप में भी होती थी कि बाद के बरसों में जब उनका स्वास्थ्य नरम रहने लगा था, हम जब भी फोन पर बतियाते और मैं उनसे उनकी सेहत के बारे में पूछता, वे बात को किसी और तरफ मोड़ देते. फिर मुझे समझ में आ गया कि वे अपने कमज़ोर स्वास्थ्य के बारे में बात नहीं करना चाहते हैं. 

यहां मैंने लेखक स्वयं प्रकाश की, उनके साहित्यिक अवदान की चर्चा नहीं की है. उस पर खूब चर्चा हुई है और आगे भी होगी. बेशक वे हमारे समय के सबसे अधिक पढ़े जाने वाले लेखकों में अग्रणी हैं. बावज़ूद इस बात के कि वे निरर्थक और दिल बहलाऊ लेखन के कभी हामी नहीं रहे. लेखन उनके लिए एक ज़िम्मेदारी भरा और मिशनरी काम था. बेशक वे मेरे भी प्रिय लेखकों की सूची में बहुत ऊपर हैं. लेकिन इससे भी अधिक वे मेरे फ्रेण्ड, फिलोसॉफर और गाइड थे. उनसे किसी भी विषय पर बात की जा सकती थी, किसी भी मुद्दे पर सलाह ली जा सकती थी और आंख मूंद कर उन पर भरोसा किया जा सकता था. जीवन में हर पल वे साथ रहे. बस! अब वे धोखा दे गए!
आप तो ऐसे न थे, प्रकाश भाई!
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राजस्थान साहित्य अकादमी की मासिक पत्रिका मधुमतीके जनवरी, 2020 अंक में प्रकाशित स्मृति लेख.

Thursday, April 23, 2020

मेरा स्कूटर पुराण


समय और स्थितियों में इतनी तेज़ी से बदलाव आया है कि जब मैं अपने कॉलेज के दिनों और उसके तुरंत बाद नौकरी शुरु करने के समय की बातें किसी को बताता हूं तो उन बातों को संशय के साथ सुना जाता है. 1967 में जब मैंने कॉलेज प्राध्यापक के रूप में अपनी नौकरी की शुरुआत की तो मेरे कॉलेज के सारे प्राध्यापक,  बल्कि प्रिंसिपल भी,  साइकिल पर ही  कॉलेज आते थे. सड़कों पर भी स्कूटर, मोटर साइकिल बहुत कम नज़र आते थे, कारें तो और भी कम. कोई आठ बरस नौकरी करने के बाद मैंने अपने जीवन का पहला स्कूटर खरीदा, और वो भी सरकार से कर्ज़ा लेकर. तब तनख़्वाहें भी ज़्यादा कहां होती थीं? उस समय मैं जिस सिरोही कॉलेज में कार्यरत था वहां मुझसे पहले मेरे दो साथियों के पास स्कूटर थे. एक के पास लैम्ब्रेटा और दूसरे के पास राजदूत. एक के लिए स्कूटर मज़बूरी था और दूसरे ज़रूरत से ज़्यादा शाही तबीयत के धनी थे. अन्यथा किसी को स्कूटर रखने की ज़रूरत ही महसूस नहीं होती थी. जब मैंने भी स्कूटर खरीदा तो मेरे कई शुभ चिंतकों ने मेरी इस फिज़ूल खर्ची पर सवाल उठाये. उन्होंने बाकायदा गणना करके मुझे समझाया भी कि मैं अनावश्यक रूप से हर माह पैट्रोल पर इतना खर्चा करने की मूर्खता कर रहा हूं.

जिस ज़माने की मैं बात कर रहा हूं उसमें स्कूटरों का राजा हुआ करता था वेस्पा. भले ही इसे स्टार्ट करने के लिए एक तरफ झुकाना होता था, जिनके पास यह होता था उनकी शान और ऐंठ अलग ही होती थी. लेकिन वेस्पा आसानी से मिलता कहां था? बुकिंग करवानी होती थी और लम्बी प्रतीक्षा सूची का धैर्य रखना होता था. जब लगभग उन्हीं दिनों उदयपुर में वेस्पा की बुकिंग शुरु हुई तो ऐसी भगदड़ मची कि घुड़सवार पुलिस को उसे काबू करने में खासी मशक्कत करनी पड़ी और उस भगदड़ में कई लोगों ने अपनी जानें तक गंवाई.  और यह हालत वेस्पा की ही नहीं थी. लैम्ब्रेटा भी बुक करवाने के बाद इंतज़ार के बाद ही मिलता था. सरकारी कर्मचारियों के लिए एक अलग प्रतीक्षा सूची भी होती थी जिसके आधार पर उन्हें यह स्कूटर देने में प्राथमिकता दी जाती थी. ख़ुद मैंने भी इस सरकारी प्राथमिकता के लिए आवेदन किया था. यह बात अलग है कि मेरा नम्बर कभी आया नहीं. उन्हीं दिनों एक सरकारी उपक्रम स्कूटर्स इण्डिया का नया स्कूटर विजय डीलक्स बाज़ार में उतरा तो स्कूटर स्वामी बनने की मेरी आकांक्षा ने भी ज़ोर मारा, और मैंने भी उदयपुर  में  अपने लिए एक विजय डीलक्स स्कूटर बुक करवा लिया.  स्कूटर की कीमत थी चार हज़ार सात सौ सैंतालीस रुपये. लयात्मक राशि (चार सात चार सात)  होने के कारण यह मुझे अब तक स्मरण है. लेकिन इतना पैसा एक मुश्त चुकाने की अपनी क्षमता थी नहीं सो सरकारी ऋण के लिए आवेदन किया और वो मिल भी गया, जिसकी कटौती कई बरस होती रही. जब उदयपुर के डीलर से सूचना मिली कि हम डिलीवरी लेने आ सकते हैं तो सिरोही से हम दो साथी अपने दो मित्रों के साथ उदयपुर गए. तब तक मुझे स्कूटर चलाना आता ही नहीं था. स्कूटर खरीदने वाले दूसरे साथी  का भी यही हाल था. लौटते हुए रास्ते में थोड़ी देर हिम्मत कर मैंने स्कूटर चलाया तो नदी की एक रपट पर फिसला भी सही. लेकिन उस समय स्कूटर स्वामी बन कर जो खुशी हासिल हुई वो खुशी बाद में चौपहिया वाहन खरीद कर भी हासिल नहीं हुई,  दूसरा स्कूटर खरीदने के मौके की तो बात ही क्या की जाए. मेरे यह स्कूटर खरीदने के बाद मेरे कॉलेज के कई अन्य मित्रों ने भी उदयपुर  से  ही यह स्कूटर खरीदा और अनुभवी होने के नाते उनमें से अनेक के साथ इस बड़ी खरीददारी के लिए उदयपुर जाने का सौभाग्य मुझे मिला.

आज भले ही यह बात अविश्वसनीय बल्कि हास्यास्पद लगे, उस ज़माने में विजय स्कूटर का स्वामी होना भी बड़े गर्व की बात थी और हम दोनों ने अपने दोनों बच्चों के साथ इसी स्कूटर पर कई बार सिरोही से उदयपुर की यात्राएं कीं. शिवगंज सुमेरपुर तो इतनी बार गए कि उसकी गिनती ही मुमकिन नहीं. यह गर्व बोध काफी समय तक बरकरार रहा. 1998 से 2000 के बीच जब मैं आबू रोड कॉलेज में प्राचार्य रहा तब भी न जाने कितनी बार हम दोनों अपने स्कूटर पर आबू रोड से अम्बाजी और माउण्ट आबू गए. तब तक स्कूटर को एक  सम्मानजनक वाहन माना जाता था. उसका अवमूल्यन तो आगे जाकर हुआ.

सिरोही में मेरे दो दशक से भी अधिक के कार्यकाल में आरजेडब्ल्यू 1615 नम्बर प्लेट वाला वह नीला विजय डीलक्स स्कूटर मेरे व्यक्तित्व के साथ इस तरह एकाकार हो गया था कि कहीं उस स्कूटर के खड़े होने का मतलब ही वहां डीपी अग्रवाल के होने का होता था. बाद में जब मेरा बेटा भी मेरे इस स्कूटर का इस्तेमाल करने लगा तो मेरे दोस्त बड़े सहज भाव से मुझसे अपना यह ज्ञान  साझा कर लिया करते थे कि कल आप अमुक जगह गए थे, जबकि असल में वहां मेरा बेटा गया होता था. इसी  पहचान की वजह से एक मज़ेदार प्रसंग भी उत्पन्न हो गया, जिसकी चर्चा आगे चलकर करूंगा.

1996 में उपाचार्य पद  पर मेरी पदोन्नति हुई और मुझे सिरोही छोड़ कर कोटपूतली जाना पड़ा. तब तक मेरा यह स्कूटर भी वृद्धावस्था को प्राप्त होने लगा था. लेकिन मुझे इससे लगाव भी था, और यह मेरी ज़रूरत भी था सो इसे साथ ले गया. जब दो-एक बार वहां इसकी रिपेयर की ज़रूरत पड़ी तो जिस भी मैकेनिक के पास  मैं इसे लेकर  गया, उसने इसे आगे-पीछे, ऊपर नीचे देखकर पहला सवाल यही किया कि यह है क्या चीज़?  ज़ाहिर है कि उन लोगों ने इससे पहले विजय स्कूटर नाम की कोई चीज़ नहीं देखी थी. वो लोग इसकी रिपेयर करने के प्रति भी उदासीन ही रहते, क्योंकि यह उनके लिए अपेक्षाकृत नई चीज़ था. ख़ैर! जैसे–तैसे मेरा काम तो इस स्कूटर से वहां चल  ही गया.
मात्र दस माह में मेरा स्थानांतरण वहां से सिरोही हो गया. और क्योंकि यह स्थानांतरण मेरे इच्छित स्थान सिरोही हुआ था, मैं बिना एक भी दिन का विलम्ब किये वहां से सिरोही के लिए रवाना हो गया. गृहस्थी का सामान तो ज़्यादा था नहीं, सो वह तो साथ ही ले आया. असल संकट तो इस स्कूटर का था. कोटपूतली में रेल्वे स्टेशन है नहीं सो स्कूटर ट्रांसपोर्ट से ही सिरोही भेजा जा सकता था, और यह काम करने का मेरे पास समय था नहीं.  इसलिए अपना यह स्कूटर मैं वहीं अपने कॉलेज के एक  प्रयोगशाला सहायक राजेश सैनी के पास इस अनुरोध के साथ छोड़ आया कि वह यथासुविधा इसे ट्रांसपोर्ट से बुक करवा के सिरोही भेज दे. कुछ दिनों के बाद उसने मेरा स्कूटर ट्रांसपोर्ट से बुक करवा के सिरोही भेज दिया. ट्रांसपोर्ट वाले ने इसके लिए एक हज़ार रुपये चार्ज किये. अब आगे की बात बड़ी दिलचस्प है. ट्रांसपोर्ट में थोड़ी बहुत टूट फूट तो होती ही है. मेरे वयोवृद्ध स्कूटर के भी बांये हाथ में कुछ चोट आ गई जिसे बड़ी मुश्क़िल से सिरोही में मेरे स्थायी स्कूटर मैकेनिक डाया लाल ने ठीक किया. इस पर करीब पांच सौ रुपये का खर्चा और आ गया. लेकिन तब तक मुझे लगने लगा था कि अब इस स्कूटर के साथ मेरा रिश्ता और नहीं निभ सकेगा, इसलिए मैंने एक नया स्कूटर ले  लिया. अब सवाल उठा कि इस पुराने, बूढ़े स्कूटर का क्या किया जाए?  इधर उधर बात की, लोगों से कहा कि मुझे मेरा पुराना स्कूटर बेचना है तो एक ग्राहक घर में ही मिल गया. मेरे पुराने कॉलेज का एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी उसे खरीदने को तैयार हो गया. और उसे मैंने अपना यह लाड़ला स्कूटर बड़े भारी मन से बेच दिया. पूछना चाहेंगे कि कितने में बेचा? पूरे एक हज़ार रुपये में! बेचने के बाद ख़ुद मुझे लगा कि मैं कितना बड़े वाला वोहूं! अगर मैं इस स्कूटर को सिरोही न लाया होता और इसे कोटपूतली की सड़क पर लावारिस भी छोड़ आया होता तो मुझे शुद्ध पांच सौ रुपये की बचत होती. लेकिन जो हुआ सो हुआ!

लेकिन किस्सा यहीं ख़त्म नहीं हो गया. इस कथा का एक और लेकिन अभी बाकी है.  केक पर आइसिंग का मज़ा तो अब आएगा. भले ही मैंने एक नया, मिलिट्री ग्रीन रंग का स्कूटर खरीद लिया था, सिरोही में आरजेडब्ल्यू 1615 नम्बर प्लेट वाला नीला विजय डीलक्स स्कूटर मेरे व्यक्तित्व के साथ स्थायी रूप से जुड़ चुका था. लोग स्कूटर देखते तो कल्पना कर लेते कि डीपी अग्रवाल भी आसपास यहीं कहीं होंगे. जब मैंने यह स्कूटर अपने उस पुराने कर्मचारी को बेच दिया तो उसके कुछ ही दिनों बाद दबे स्वरों में सिरोही में यह चर्चा सर उठाने लगी कि आजकल अग्रवाल साहब के रंग-ढंग कुछ ठीक नहीं हैं. इस कुचर्चा के मूल में था मेरा वह 1615 नम्बर का स्कूटर जिसे लोग पिछले कुछ दिनों से हर शाम स्वरूप क्लब के पास वाले देशी दारु के ठेके के पास खड़ा देख रहे थे. यह मान लिया गया कि जब उनका स्कूटर यहां है तो अग्रवाल  साहब भी यहीं होंगे! और देशी दारु के ठेके पर होंगे तो ज़ाहिर है कि उसका सेवन भी कर ही रहे होंगे! असल बात यह थी कि मेरे कॉलेज का वह कर्मचारी देशी मदिरा का नियमित सेवन करता था, और अब जब उसने स्कूटर खरीद लिया था तो बड़ी शान से हर शाम उस स्कूटर पर आसीन होकर अपना शौक पूरा करने जाने लगा था. जैसे ही यह कुचर्चा मुझ तक पहुंची, मैंने उस शौकीन मिजाज़ कर्मचारी को बुलाया और उसे पाबंद किया कि वो अपना शौक भले ही ज़ारी रखे, मेरा स्कूटर लेकर वहां न जाया करे! मैं तो उससे अपना स्कूटर वापस भी खरीद लेने को तैयार था, लेकिन उसने  इसके बिना ही मेरी बात मान ली.

तो, यह था मेरा संक्षिप्त स्कूटर पुराण!
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Tuesday, April 21, 2020

कथा एक ऑटोग्राफ़ की!



कोरोना वायरस से अपनी सुरक्षा के लिए अपने-अपने घरों में कैद हम सब बड़ी फुरसत में हैं और अलग-अलग तरह से अपना अपना मन बहलाने का प्रयास कर रहे हैं. कुछ यह कल्पना करने में लगे हैं कि यह संकट टल जाने के बाद की दुनिया कैसी होगी, तो कुछ उस दुनिया को याद कर रहे हैं जिसे वे पीछे छोड़ आए हैं. ऐसा ही काफी कुछ करते हुए मैं भी वॉटसएप पर एक नए समूह के सम्पर्क में आया, जिसका नाम है ऑटोग्राफ़ बिगिनर्स ग्रुप. एक ज़माना था जब किसम किसम की हॉबीज़ का चलन था. कोई डाक टिकिट इकट्ठे करता था, कोई सिक्के, तो कोई माचिसों के लेबल, तो कोई बड़े लोगों के हस्ताक्षर. तब तक सेलिब्रिटी शब्द चलन में नहीं आया था. एक शौक चिट्ठियां लिखने और बड़े लोगों के जवाब पाने का भी था. खुद मेरे पास कोई हज़ारेक चिट्ठियां तो होंगी ही जो मैंने इस शौक़ के तहत बड़े लोगों को लिख कर जवाब में उनसे प्राप्त की थीं. किसी का जन्म दिन होता, उन्हें पत्र लिखते और लौटती डाक से उनका हस्ताक्षर किया हुआ जवाब आ जाता. उन बड़े लोगों में जवाहर लाल नेहरु, राजेंद्र प्रसाद, डॉ एस. राधाकृष्णन आदि से लगाकर जॉन एफ कैनेडी तक थे. फिल्मी सितारों में तब मेरी ज़्यादा रुचि नहीं थी, लेकिन जब उनका दीवान शाया हुआ तो मैंने मीनाकुमारी को एक चिट्ठी ज़रूर लिखी थी. तत्कालीन परम्परानुसार उनका हस्ताक्षरित एक श्वेत श्याम चित्र भी मेरे पास आया था, जो ज़ाहिर है उनके सेक्रेटरी ने भेजा होगा. वो चिट्ठियों का ज़माना था, जिसे बाद में ई मेल आदि ने विस्थापित कर दिया.

उस ज़माने में क्योंकि सुरक्षा के बड़े तामझाम नहीं होते थे, किसी भी बड़े आदमी (या औरत) के पास आपका पहुंचना बहुत कठिन नहीं होता था. गाइड की शूटिंग के दौरान देव आनंद, वहीदा रहमान, नोबल पुरस्कार विजेता लेखिका पर्ल एस बक, किशोर साहू आदि को मैंने इतनी बार और इतने नज़दीक से देखा कि चाहता तो उनके ऑटोग्राफ़ भी ले ही सकता था. पर्ल एस बक तो उदयपुर में मेरे घर के पास वाले जगदीश मंदिर की सीढ़ियों पर बैठी अक्सर दिखाई दे जाती थीं. बेशक देव आनंद या वहीदा रहमान के आस पास थोड़ी भीड होती थी लेकिन क्योंकि वे लोग गाइड की शूटिंग के लिए लम्बे समय उदयपुर में रहे, भीड़ भी आहिस्ता-आहिस्ता कम होती गई थी.

मेरा बचपन क्योंकि उदयपुर में बीता है, मैं उदयपुर की ही बत करूंगा. उस ज़माने में, सत्तर के दशक के मध्य में, उदयपुर में नेताओं का आना खूब होता था. उनकी आम सभाएं वगैरह भी होती थीं और लोग बड़ी सहजता से उनसे हाथ भी मिला लिया करते थे. तब न कैमरे ज़्यादा चलन में थे और न सोशल मीडिया का जन्म हुआ था, इसलिए उस समय का दस्तावेज़ीकरण उपलब्ध नहीं है. अभी मैं जिस प्रसंग का ज़िक्र करना चाहता हूं उससे यह बात स्पष्ट  हो जाएगी कि उस ज़माने के नेता कितने सहज और मानवीय होते थे. उदयपुर के भारतीय लोक कला मण्डल के मुक्ताकाश मंच पर कोई सरकारी कार्यक्रम था. उस कार्यक्रम में बहुत सारे अन्य लोगों के साथ केंद्रीय काबीना मंत्री एस. के. डे भी आए हुए थे. एस. के. डे देश के पहले सहकारिता और पंचायती राज मंत्री थे. भारत में सामुदायिक विकास में उनका योगदान अप्रतिम है. तो अपन भी घूमते फिरते उस आयोजन  में पहुंच  गए. तब मैं बी.ए. का विद्यार्थी था. जब कार्यक्रम समाप्त हुआ तो मैं भी मंच पर चढ़ गया और अपनी ऑटोग्राफ़ बुक एस. के. डे के सामने कर दी. वे शायद जल्दी में थे. उन्होंने मुझसे मेरी वह ऑटोग्राफ बुक ली और कहा कि आप मेरे सेक्रेटरी को अपना पता लिखवा दें, मैं इसे आपके घर भिजवा दूंगा. मैंने कहा कि मेरा पता तो इस ऑटोग्राफ बुक पर ही लिखा हुआ है. डे साहब ने कहा, अच्छा! और चल दिये. मैं बड़ा हताश. सोचा, अब तक जो बीसेक ऑटोग्राफ इकट्ठे किये हैं वे सब भी गए. भला किस मंत्री को इतनी फुरसत हो सकती है कि एक साधारण से लड़के की ऑटोग्राफ बुक लौटाना याद भी रखे.

लेकिन अगले दिन सुबह आठ बजे ही मेरे घर के सामने एक  लाल पट्टी वाली सफेद एम्बेसेडर कार आकर रुकी, उसमें से उतरे एक रौबदार आदमी ने किसी से मेरा नाम पूछा, और जब उसने मेरी तरफ इशारा  किया तो उस आदमी ने मेरी ऑटोग्राफ बुक मेरी तरफ बढ़ाते हुए कहा, मंत्री जी ने भिजवाई है. यह बात है 24 जनवरी 1964 की.

उस ज़माने में जो एक वरिष्ठ और अति सम्मानित काबीना मंत्री ने किया, वैसा करने की उम्मीद आज एक विधायक से भी कर सकते हैं?
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Tuesday, September 3, 2019

लोगों का घर बसे, चीन सरकार ने चलाई 'लव स्पेशल ट्रेन'


हाल में चीन में सरकार ने एक विशेष रेलगाड़ी चलाई है, जिसका नाम है लव स्पेशल ट्रेन. यह रेलगाड़ी चोंगकिंग नॉर्थ स्टेशन से कियानजियांग स्टेशन तक चलती है और इसमें एकल अर्थात सिंगल स्त्री या पुरुष ही यात्रा कर सकते हैं. दो दिन और एक रात के सफर वाली दस डिब्बों की यह विशेष रेलगाड़ी इसलिए चलाई गई है ताकि यात्रीगण अपने लिए उपयुक्त जीवन साथी तलाश कर सकें. अब तक इस रेलगाड़ी में तीन हज़ार सिंगल्स यात्रा कर चुके हैं और उनमें से दस जोड़े बनने का शुभ समाचार मिल चुका है. इस रेलगाड़ी को चलाने की ज़रूरत क्यों पड़ी, इसे जानने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा.

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद चेयरमेन माओ के प्रोत्साहन की वजह से चीन में जनसंख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई थी. 1978 तक आते-आते यह वृद्धि वहां की तत्कालीन सरकार के लिए इतनी बड़ी मुसीबत बन गई कि उसे मज़बूर होकर एक संतान की नीति की घोषणा करनी पड़ी. पति पत्नी को केवल एक ही संतान पैदा करने की अनुमति थी और अगर दूसरी संतान हो जाती तो सरकार चाहती कि जैसे भी हो वे लोग उससे छुटकारा पाएं. इस कठोर और निर्मम नीति को लागू कर चीन ने अपनी बढ़ती जनसंख्या पर तो नियंत्रण पा लिया, लेकिन इसी नीति की वजह से आज वहां के समाज को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है. असल में चीनी समाज में भी लड़कों को अतिरिक्त महत्व दिया जाता है और लड़कियों को कमतर माना जाता है. इस वजह से जब एक संतान वाली  नीति वहां प्रभाव में आई तो लोगों ने येन केन प्रकारेण अकेली संतान के रूप में लड़कों को ही इस दुनिया में लाने के प्रयास ज़ारी रखे. भले ही पिछले बरस चीन ने अपनी इस एकल संतान नीति में थोड़ी छूट देते हुए उन मां बाप को दूसरी संतान पैदा करने की अनुमति दे दी जिनमें से कोई एक अपने मां बाप की एकल संतान था या थी, इतने बरस चली इस नीति के कुपरिणामों का सामना तो करना ही था. एक मोटे अनुमान के अनुसार इन दशकों में करीब पौने चार करोड़ चीनी कन्याओं को अनचाहा या अतिरिक्त मान कर गर्भपात, भ्रूण हत्या, इधर उधर फेंक देने या अवैध क्रय विक्रय का शिकार बनाया गया. इसके अलावा, यह तो आधिकारिक आंकड़ा है कि इस नीति के चलन में आने के बाद वहां चालीस करोड़ गर्भपात किये गए. बहुत सारे मां-बाप ऐसे भी थे जो अपनी दूसरी संतान से किसी भी तरह छुटकारा नहीं पा सके लेकिन क्योंकि इसकी अनुमति नहीं थी, उन्होंने अपनी इस संतान को छिपा कर रखा और उसका कहीं भी आधिकारिक पंजीकरण नहीं कराया. परिणाम यह हुआ कि यूनीसेफ़ के आंकड़ों के अनुसार आज चीन में पांच बरस से कम उम्र के दो करोड़ नब्बे लाख बच्चे ऐसे हैं जिनके पास जन्म प्रमाण पत्र नहीं है, और इस वजह से चीनी सरकार के लिए उनका कोई अस्तित्व नहीं है. न वे पढ़ सकते हैं, न इलाज़ करवा सकते हैं, न कहीं जा आ सकते हैं.

अभी स्थिति यह है कि चीन में लड़के  लड़की का अनुपात 118:100 है. कहीं कहीं तो यह अनुपात 130:100 तक भी है. स्मरणीय है कि दुनिया में औसतन यह अनुपात 103:100 से 107:100 के बीच है. कहने का आशय यह कि वर्तमान चीनी समाज में लिंगानुपात में भारी  असंतुलन है. चीन के राष्ट्रीय स्वास्थ्य एवम परिवार नियोजन आयोग ने भी इस बात को स्वीकार किया है कि वहां बहुत विकट लैंगिक असंतुलन है और यह बात वहां की जनसंख्या के बहुत बड़े भाग को प्रभावित कर रही है. इस लैंगिक असंतुलन का ही परिणाम है कि वहां लाखों पुरुष ऐसे हैं जिनको दूर-दूर तक विवाह की कोई उम्मीद नज़र नहीं आती है. शहरों की तुलना में गांवों में स्थिति और भी अधिक विकट है. कहा जा रहा है कि हर चार में से एक चीनी पुरुष अविवाहित ही रह जाएगा. इस असंतुलन का एक दुष्परिणाम यह भी हो रहा है कि चीनी समाज में समलैंगिकता बढ़ रही है.

ऐसे में स्थिति को सुधारने के लिए चीन की सरकार जो अनेक प्रयास कर रही है उन्हीं में से एक प्रयास यह लव स्पेशल ट्रेन चलाने का भी है. लेकिन इस प्रयास की सफलता इसलिए संदिग्ध है कि असल समस्या तो यह नहीं है कि लड़के लड़की विवाह नहीं करना चाहते हैं, बल्कि  समस्या यह है कि है कि वहां लड़कियों की कमी है. देखना दिलचस्प होगा कि चीन अपनी इस  समस्या से कैसे उबरता है. इस समस्या में हमारी दिलचस्पी इसलिए भी होनी चाहिए कि भले ही सरकार ने हमारे यहां एकल संतान जैसी कोई नीति लागू न की हो, लड़कियों को लेकर पारम्परिक भारतीय समाज का सोच तो चीन जैसा ही है और इसी कारण हमारे यहां भी लिंगानुपात गड़बड़ा रहा है.
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक राजस्थान पत्रिका पावर्ड बाय न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, दिनांक 03 सितम्बर 2019 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Friday, August 23, 2019

रोबोट दे रहा बौद्ध धर्म की शिक्षा


क्योटो (जापान) से ख़बर आई है कि वहां के कोडाइजी नामक लगभग चार सौ साल पुराने नामी बौद्ध उपासना गृह में एक नया पुजारी प्रकट हुआ है. यह पुजारी एक रोबोट है जो कृत्रिम बुद्धि से चालित है. इस साल के प्रारम्भ में प्रकट हुआ यह यंत्र पुजारी अपने धड़, भुजाओं और हाथों को हिला‌ डुला सकता है. इसके हाथों, चेहरे और  कंधों पर त्वचा का आभास देने वाली सिलिकॉन की परत चढ़ाई गई है. अपने हाथों को उपासना की मुद्रा में जोडे हुए यह रोबोट बड़े शांत  स्वर में करुणा की महत्ता समझाता है और लालसा, क्रोध और अहं के ख़तरों के प्रति चेतना जगाता है.  यह जापानी भाषा में हृदय सूत्र के उपदेशों के माध्यम से बौद्ध  दर्शन समझाता है. विदेशी पर्यटकों की सुविधा के लिए इन उपदेशों के अंग्रेज़ी और चीनी अनुवाद स्क्रीन पर प्रदर्शित किये जाते हैं.  इस रोबोट का विकास ज़ेन टेम्पल और ओसाका विश्वविद्यालय के रोबोटिक्स विभाग के सुविख्यात प्रोफ़ेसर हिरोशी इशिगुरो की एक संयुक्त परियोजना के तहत लगभग दस लाख डॉलर के व्यय से किया गया है.

उपासना गृह के प्रमुख तेन्शो गोटो का कहना है कि यह नया पुजारी न केवल कभी मरेगा नहीं, यह अपने ज्ञान और बुद्धि को भी निरंतर विकसित करता रहेगा. यह असीमित ज्ञान  को सदा सर्वदा के लिए सहेज कर रख सकता है. इसकी कृत्रिम बुद्धि के कारण हम  यह भी उम्मीद कर सकते हैं कि इसकी बुद्धि निरंतर विकसित होती रहेगी और इस कारण यह लोगों को उनके कठिनतम समय में मार्गदर्शन  प्रदान कर  सकेगा. इस तरह  यह रोबोट बौद्ध  दर्शन को नया आकार दे रहा है. यहीं यह बात  भी स्मरणीय है कि आज के जापान में लोगों के दैनिक जीवन पर से धार्मिक प्रभाव कम होता जा रहा है. युवा पीढ़ी यह मानने लगी है कि उपासना गृह या तो अंतिम संस्कार के लिए हैं या फिर विवाह के लिए.  ऐसे में तेन्शो गोटो का यह उम्मीद करना उचित ही प्रतीत होता है कि इस रोबोट का नयापन युवा पीढ़ी को फिर से धार्मिक सोच की तरफ आकर्षित कर  सकेगा. वे यही चाहते हैं कि लोग रोबोट के माध्यम से ही सही, बौद्ध दर्शन के सार तत्व को समझें तो सही. तेन्शो गोटो बलपूर्वक इस आरोप को नकारते हैं कि यह रोबोट पर्यटकों से होने वाली आय को ध्यान में रखकर लाया गया है. 

इस रोबोट पुजारी को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं. हाल में ओसाका विश्वविद्यालय द्वारा किये गए एक सर्वे के जवाब में बहुतों ने इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया है कि यह रोबोट कितना ज़्यादा मनुष्य जैसा लगता है. एक ने तो यहां तक कह दिया उसे इस रोबोट से जैसी गर्मजोशी का अनुभव हुआ वैसी गर्मजोशी तो आम तौर पर इंसानों से भी हासिल नहीं होती है. एक अन्य भक्त का कहना था कि पहली नज़र में तो मुझे यह अस्वाभाविक लगा लेकिन जल्दी ही मैं इसके प्रति सहज हो गया हो और फिर तो इसके द्वारा दिये गए उपदेश मेरे भीतर उतरने लगे. लेकिन सारे ही लोग इस रोबोट के प्रति इतने सकारात्मक भी नहीं हैं. कुछ ने मात्र इतना कहा कि उन्हें यह नकली लगता है, तो कुछ ने अपनी बात  को स्पष्ट करते हुए कहा कि इसके मुंह से झरते हुए उपदेश उन्हें असहज करते हैं और इसके हाव-भाव बहुत मशीनी लगते हैं.

सबसे ज़्यादा दिलचस्प बात तो यह है कि इस रोबोट की ज़्यादा आलोचना विदेशी कर रहे हैं. उन्हें लगता है कि यह रोबोट बनाकर धर्म की पवित्रता के साथ छेड़छाड़ की गई है. खुद तेन्शो गोटो ने भी यह बात स्वीकार की है कि विदेशी इस रोबोट को न केवल स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं, वे इसे एक अंग्रेज़ लेखक मैरी शैली की विख्यात रचना द मॉडर्न प्रोमिथियस के एक किरदार फ्रैंकनस्टाइन की तरह का दैत्य  तक कह डालते हैं. हालांकि तेन्शो गोटो इस बात को नकारते हैं लेकिन बहुत लोग यह कह रहे हैं कि फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों तक ने इस रोबोट को पवित्र वस्तुओं का अनादर करने वाला बताया है. विदेशियों की प्रतिक्रियाओं से जापानियों की प्रतिक्रियाएं अलग हैं. उन्हें रोबोट पुजारी से कोई दिक्कत नहीं है. शायद ऐसा इसलिए है कि जापान में बहुत सारे लोग  जिन कॉमिक्स  को  पढ़कर बड़े हुए हैं उनमें रोबोट्स को मनुष्य का दोस्त ही बताया जाता रहा है. तेन्शो इस बात को स्वीकार करते हुए कि रोबोट जैसे यंत्र के भीतर कोई हृदय नहीं होता है, कहते हैं कि “बौद्ध धर्म भी यह नहीं कहता  है कि आप भगवान में विश्वास करें. वह तो आपको बुद्ध के बताये मार्ग पर चलने की सीख देता है. इसलिए इस बात से क्या फर्क़ पड़ता है कि यह सीख कोई मनुष्य दे रहा है या यंत्र, या लोहे का टुकड़ा, या फिर कोई पेड़.”

उनकी बात में दम तो लगता है!  
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत शुक्रवार, 23 अगस्त, 2019 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.