Tuesday, July 16, 2019

सोलोथर्न शहर में कभी बारह नहीं बजते!


स्विटज़रलैण्ड के उत्तर पश्चिम में आरे के किनारे और वेइसेंस्टीन ज़ुरा पहाड़ियों के तल में स्थित सोलोथर्न शहर की गिनती इस देश के सबसे खूबसूरत शहरों में होती है. इतालवी भव्यता, फ्रांसिसी सौंदर्य और जर्मन व्यावहारिकता की त्रिवेणी से सज्जित यह शहर बर्न से मात्र तीस किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. सोलहवीं से अठारहवीं शताब्दी के बीच यह शहर फ्रांसिसी राजा के राजदूत का निवास स्थान भी रहा और इसलिए आज इसे राजदूत का नगरनाम से भी जाना जाता है. ये तमाम बातें अपनी जगह, और इस शहर की एक ख़ासियत अपनी जगह. और वह ख़ासियत है इस शहर का अंक ग्यारह से ख़ास लगाव. यह लगाव इतना गहरा है कि शहर  की अधिकांश निर्मितियों  और उनके डिज़ाइन में इस अंक की उपस्थिति को देखा जा सकता है. यहां चर्चों और चैपलों की संख्या ग्यारह-ग्यारह है. इस शहर में ग्यारह ऐतिहासिक फव्वारे, ग्यारह संग्रहालय और कुल ग्यारह  ही टॉवर हैं.

करीब दो हज़ार साल पहले रोमनों द्वारा बसाए गए इस शहर का सबसे बड़ा आकर्षण है यहां का सेंट उर्सूस गिरजाघर. अगर आपको इस शहर में ग्यारह की उपस्थिति का जादू देखना हो तो इस गिरजाघर से बेहतरीन जगह और कोई नहीं हो सकती. एक इतालवी वास्तुविद गेटानो मेटियो पिसोनी द्वारा इस गिरजे का निर्माण ग्यारह वर्षों में किया गया. इसमें सीढ़ियों की ग्यारह कतारें हैं. सीढ़ियों के दोनों तरफ दो भव्य फव्वारे हैं जिनमें से हरेक में ग्यारह-ग्यारह खूबसूरत नलों से पानी की धार निकलती है. गिरजे के कुल ग्यारह द्वार हैं और इसकी ऊंचाई ग्यारह-ग्यारह मीटर के तीन हिस्सों से निर्मित है. शीर्ष पर जो गुम्बद है उसमें ग्यारह घण्टे हैं जिनकी सुमधुर ध्वनि दूर से सुनाई देती है. ऐसा माना जाता है कि वास्तुविद पिसोनी को तत्कालीन सरकार ने यह आदेश दिया था कि वह इस गिरजे के निर्माण में ग्यारह का विशेष ध्यान रखे, और उसने ऐसा ही किया. इस हद तक ऐसा किया कि इस गिरजे की एक वेदी में ग्यारह प्रकार के संगमरमर प्रयुक्त किये. गिरजे में कुल ग्यारह वेदियां हैं. वहां आराधकों के बैठने के लिए जो बेंचें लगी हुई हैं वे भी ग्यारह-ग्यारह की कतार में हैं.

जब आप यह जानने का प्रयास करते हैं कि आखिर क्यों इस शहर को ग्यारह की संख्या से इतना ज़्यादा लगाव है, तो बहुत सारी व्याख्याएं सुनने को मिलती हैं. दंतकथा प्रेमी बताते हैं कि प्राचीन काल में इस शहर के निवासी बहुत कड़ी मेहनत करते थे लेकिन उन्हें उसका पुरस्कार नहीं मिलता था. तब वेइसेंस्टीन की पहाड़ियों से कुछ चमत्कारी बौने अवतरित हुए और उन्होंने इस नगर के वासियों को उनका प्राप्य दिलवाया. नगरवासियों ने उन बौनों के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए ग्यारह की संख्या को अपनाया. यह तो हुई दंतकथा. एक अन्य व्याख्या का सम्बंध यहां के लोगों की धार्मिक आस्थाओं से है. वे यह मानते थे कि ग्यारह की संख्या धार्मिक रूप से पवित्र है. अंक शास्त्र भी यह मानता है कि तमाम अंकों में से ग्यारह का अंक सर्वाधिक अंत: प्रज्ञाजन्य है और इसका सीधा रिश्ता  आस्था और  आध्यात्मिकता के साथ है. एक मत यह भी है कि धर्मशास्त्र के अनुसार देवदूतों की कुल संख्या बारह थी लेकिन उससे एक कम यानि  ग्यारह का सम्बंध और अधिक पाने की आकांक्षा से जुड़ता है. और शायद आज भी इस शहर के नागरिक यही मानते हैं कि ग्यारह को अपने जीवन में इतना महत्व देकर वे यह साबित कर रहे हैं कि वे जो है उससे बेहतर के आकांक्षी हैं. ग्यारह के प्रति इस लगाव की कुछ अन्य व्याख्याएं भी प्रचलित हैं. जिन्हें इतिहास में रुचि  है वे यह बताते हैं कि सन 1481 में सोलोथर्न शहर स्विस संघ का ग्यारहवां केण्टन (प्रांत) बना था और सोलहवीं शताब्दी  तक आते-आते यह केण्टन ग्यारह प्रोटेक्टोरेट्स (एक तरह से छोटे प्रांतों) में विभाजित हो गया था. और अधिक पड़ताल करने पर  यह भी पता चलता है कि शहर के इतिहास में ग्यारह की संख्या का पहला उल्लेख सन 1252 में मिलता है जब इस शहर के लिए जो पहली नगर परिषद बनी उसमें ग्यारह सदस्य चुने गए थे.

ग्यारह के प्रति लगाव के मूल में चाहे जो भी कारण हों, आज स्थिति यह है कि इस शहर की रोज़मर्रा की ज़िंदगी में भी ग्यारह की बहुत अधिक महत्ता है. बच्चे अपना ग्यारहवां जन्म दिन विशेष उल्लास के साथ मनाते हैं. उस दिन खास  समारोह आयोजित किया जाता है. और जब हर जगह ग्यारह का महत्व है, तो भला बाज़ार उससे कैसे अछूता रह सकता है? बीयर, चॉकलेट जैसे अनेक उत्पादों के ब्राण्ड नामों में ग्यारह की उपस्थिति देखी जा सकती है. ग्यारह वर्ष पुरानी मदिरा बहुत लोकप्रिय है. सबसे मज़ेदार बात तो यह है कि यहां के टाउन स्क्वायर पर एक विशाल घड़ी लगी हुई है. उस घड़ी के डायल पर एक से ग्यारह तक की संख्याएं ही अंकित हैं. यानि यहां कभी बारह बजते ही नहीं हैं!
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अन्तर्गत मंगलवार, दिनांक 16 जुलाई, 2019 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.  

Tuesday, July 9, 2019

यंत्रणा से गुज़रने पर कानूनी लड़ाई, ताकि कोई और न झेले


पिछले बरस न्यूयॉर्क के उत्तरी इलाके ब्रॉन्क्स की एक जेल में बंद कैदी को जब प्रसव वेदना शुरु हुई तो उसे एक नज़दीकी अस्पताल ले जाया गया. यह सामान्य बात थी, लेकिन इसमें असामान्यता यह थी कि उस महिला को बाकायदा हथकड़ी और बेड़ियों में अस्पताल ले जाया गया. वैसे, न्यूयॉर्क राज्य के कानून के अनुसार  गर्भवती कैदी को प्रसव वेदना और प्रसव के समय जंजीरों में बांध  कर नहीं रखा जा सकता, लेकिन जो पुलिस कर्मी उन्हें अस्पताल  लेकर गए उन्होंने इस निषेध की परवाह नहीं की. बाद में अपने बचाव में उन्होंने कहा कि वे तो गश्त के लिए निर्धारित निर्देशों का पालन करने को विवश थे जिसके अनुसार कैदी की सुरक्षा  सर्वोपरि होती है. और इसीलिए उस महिला को प्रसव वेदना और फिर प्रसव के दौरान भी जंजीर से बांध कर रखा गया और उसके एक हाथ की हथकड़ी को पलंग से बांधे  रखा गया.  इसी अवस्था में उस महिला ने एक बेटी को जन्म दिया.

इस महिला का प्रकरण सामने आने के बाद यह खोजबीन शुरु  हुई कि पूरे अमरीका में कुल कितनी गर्भवती स्त्रियां जेलों में हैं. और तब पता चला कि इस तरह के कोई प्रामाणिक आंकड़े उपलब्ध ही नहीं हैं. लेकिन स्थिति का थोड़ा अनुमान जॉन्स हॉपकिंस मेडिसिन द्वारा किए गए एक सर्वे के आंकड़ों से लगाया जा सकता है जिनके अनुसार सन 2016 व 2017 में संघीय व बाईस राज्य की जेलों में कम से कम चौदह सौ गर्भवती  स्त्रियां कैद थीं.  न्यूयॉर्क राज्य ने इस सर्वे के लिए भी जानकारियां उपलब्ध कराने से यह कहते हुए मना कर दिया था कि उसके पास इसके लिए समुचित स्टाफ नहीं है. वैसे, अमरीका के ज़्यादातर  राज्यों में गर्भवती महिलाओं को जंजीर से बांधे रखना वैध है. हां, इतना ज़रूर है कि डॉक्टरों और शोधकर्ताओं की इस चेतावनी के बाद कि गर्भावस्था में इस तरह का बर्ताव स्त्री और गर्भस्थ  शिशु के लिए प्राणघातक साबित हो सकता है, बहुत सारे राज्य अपने सम्बद्ध कानूनों में सुधार की दिशा में अग्रसर हो रहे हैं. पिछले बरस अमरीकी कॉंग्रेस ने संघीय जेलों और संयुक्त राज्य मार्शल सेवाओं की हिरासत में बेड़ियों के इस्तेमाल को प्रतिबंधित कर दिया था. इस बरस कई अन्य राज्यों ने गर्भवती महिलाओं को जंजीरों से जकड़ने पर रोक लगा दी है. कुछ राज्य (जैसे कैरोलिना) अभी भी इस रोक को लागू करने पर विचार  कर रहे हैं और कम से कम एक राज्य (टेनेसी) ऐसा भी है जिसने इस तरह की रोक लगाने का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया है.

जंजीर की मुखालिफत करने वाले कुछ कानूनों में  गर्भवती स्त्रियों को केवल उनकी प्रसव वेदना अथवा  प्रसव के समय जंजीर से मुक्ति देने का प्रावधान है तो  कुछ राज्यों जैसे न्यूयॉर्क में यह व्यवस्था है कि गर्भवती होने के किसी भी समय में तथा प्रसव के बाद कुछ समय तक अगर उस कैदी महिला को एक से दूसरी जगह ले जाया जाता है तो उसे जंजीर में जकड़ कर न ले जाया जाय. लेकिन करीब करीब सारे कानून यह कहते हैं कि अगर उस महिला के कारण हवाई यात्रा में किसी खतरे की आशंका हो अथवा खुद उस महिला या अन्यों  की सुरक्षा को कोई खतरा हो तो यह निषेध अप्रभावी होगा.

हम फिर उस महिला के प्रकरण पर लौटते  हैं. अपने साथ हुए व्यवहार को उस महिला ने न्यायालय में चुनौती दी. उस 28 वर्षीया अनाम महिला ने कहा कि वह नहीं चाहती है कि जिस तरह का अमानवीय व्यवहार उसे सहना पड़ा वैसा किसी भी और महिला को सहन करना पड़े. न्यायालय ने उसको सहानुभूतिपूर्वक सुना. महिला का आरोप था कि उसके साथ  किया गया बर्ताव अमानवीय था और उस से राज्य के नियमों का उल्लंघन  हुआ है.  आखिरकार न्यूयॉर्क नगर प्रशासन को उस महिला को छह लाख दस हज़ार डॉलर की मुआवज़ा राशि देकर अपना मान बचाना पड़ा. वैसे न्यूयॉर्क नगर प्रशासन ने अपनी टांग ऊपर रखते हुए यह अवश्य कहा कि उन्होंने कुछ भी ग़लत नहीं किया है. लेकिन इसी के साथ सबसे ख़ास बात यह कि इस महिला के प्रकरण के बाद वहां का पुलिस प्रशासन अपने गश्त विषयक नियमों पर पुनर्विचार करते हुए उन्हें संशोधित करने की दिशा में सक्रिय हो गया है.

न्यायालय में अपनी विजय पर हर्षित उस महिला की प्रतिक्रिया बड़ी संज़ीदा थी. उसने कहा कि उसे इस बात की खुशी है कि उसकी इस कानूनी लड़ाई के कारण भविष्य में अन्यों को उस तरह के त्रासद अनुभव से गुज़रने की यंत्रणा से मुक्ति मिल सकेगी जिस तरह के अनुभव से उसे गुज़रना पड़ा है. उसने यह भी कहा कि वो अपने परिवार जन को या किसी भी नज़दीकी व्यक्ति को वह सब नहीं बताना चाहेगी जो उसको सहना पड़ा है. वह यह भी नहीं चाहेगी कि उसकी बेटी को कभी भी यह पता चले कि उसका जन्म किन हालात में हुआ. और यही वजह है कि उसने अपना नाम गोपनीय रखने का आग्रह किया है.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न  दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, दिनांक 09 जुलाई, 2019 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.


Tuesday, July 2, 2019

किम के 'किमोनो' ब्राण्ड से जापानी आहत !


अपने देश में हम आए दिन किसी न किसी मुद्दे पर कुछ लोगों की भावनाएं आहत होने के बारे में पढ़ते सुनते रहते हैं. कभी कोई लेख, तो कभी कोई गाना तो कभी कोई फिल्म किसी न किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचा देते हैं और उसके बाद कभी धरना, तो कभी प्रदर्शन, कभी बंद तो कभी तोड़ फोड़ का सिलसिला चल निकलता है. हमें लगता था कि हमारी ही भावनाएं इतनी नाज़ुक हैं कि ज़रा-सी बात पर आहत हो जाती हैं, अब जब सुदूर जापान से वहां के निवासियों की भावनाएं आहत खोने की ख़बर आई है तो लगता है कि भावनाएं  और  जगह भी इतनी ही  नाज़ुक होती हैं.

जापानियों की भावनाएं आहत हुई हैं एक प्रख्यात अमरीकी  अभिनेत्री, मॉडल, टीवी स्टार, और व्यवसायी किम कार्दशियन की वजह से. किम को उनके एक रियलिटी शो कीपिंग अप विद द कार्दशियनस  के लिए ख़ास तौर पर जाना जाता है. किम ने हाल में भीतर पहनने वाले कपड़ों की एक बड़ी शृंखला लॉंच की है. जिस लेबल के अंतर्गत उन्होंने यह शृंखला लॉंच की है उसका नाम उन्होंने रखा है किमोनो. और यही नाम फसाद की जड़ है. असल में किमोनो एक जापानी परिधान का नाम है जिसे पारम्परिक रूप से औपचारिक अवसरों पर पहना जाता है. किमोनो एक लम्बा-सा चोगेनुमा परिधान होता है. इसकी आस्तीनें चौड़ी होती हैं और इसे  एक कमरबंद से बांधा जाता है. इसका प्रयोग प्राय: बतौर जैकेट किया जाता है. अब क्योंकि यह पारम्परिक जापानी परिधान है, बहुत सारे जापानियों को इस बात से सख़्त आपत्ति है कि एक पारम्परिक औपचारिक परिधान के नाम से भीतर पहनने वाले वस्त्र क्यों बेचे जा रहे हैं! अनेक जापानियों ने किम के इस नामकरण को उनके अज्ञान का परिचायक बताते हुए अनुपयुक्त बल्कि सांस्कृतिक रूप से अपमानजनक तक कह दिया है.

युका ओहिश नामक एक महिला ने अपनी आपत्ति इस तरह व्यक्त की है: "अपने उत्पाद/कम्पनी को एक जापानी नाम देना आपके लिए आकर्षक हो सकता है, लेकिन हम इस बात से बहुत आहत महसूस कर रहे हैं कि इस शब्द का प्रयोग एक ऐसे उत्पाद के लिए किया जा रहा है जिसका उससे कोई लेना-देना ही नहीं है. इस तरह हमारी संस्कृति को ठेस पहुंचाई जा रही है." युको कातो नामक एक जापानी पत्रकार ने लिखा कि "आपके अण्डरवियर बहुत उम्दा हैं, लेकिन पारम्परिक जापानी परिधानों से लगाव रखने वाली मुझ जैसी जापानी स्त्री के के लिए इस नामकरण का औचित्य समझ से परे है. कृपया इस नामकरण पर पुनर्विचार करें." इस पत्रकार ने अपनी आपत्ति को और स्पष्ट करते हुए आगे लिखा है, "कुल मिलाकर बात यह है कि आपने अण्डरवियरों की एक शृंखला तैयार की है और उसे 'पारम्परिक जापानी परिधान' का नाम  देकर बेच रही हैं." एक अन्य जापानी ने और उग्र होते हुए लिखा है, "जापानी संस्कृति की हत्या करने के लिए आपका आभार. लेकिन मेरी संस्कृति आपके हाथों का खिलौना नहीं है. क्या आपके मन में उन लोगों के प्रति तनिक भी  सम्मान का भाव नहीं है जो आपके परिवार के नहीं हैं? आपने इस उत्पाद को तैयार करने में पूरे पंद्रह साल लगाए हैं लेकिन इतने बरसों में आप एक भी सांस्कृतिक सलाहकार नहीं तलाश पाईं." 

इन और इस तरह की अनेक आपत्तियों का जवाब देते हुए किम ने एक बयान ज़ारी कर कहा है कि उनकी मंशा ऐसे किसी परिधान को डिज़ाइन या ज़ारी करने की नहीं है जो किसी भी तरह किसी पारम्परिक परिधान से मिलता-जुलता हो या उसका अनादर करने वाला हो. उन्होंने यह भी कहा है कि उनके मन में जापानी संस्कृति में विद्यमान किमोनो के महत्व के प्रति गहरा सम्मान है. लेकिन उन्होंने यह भी कह दिया कि अपने परिधानों की शृंखला का नाम बदलने का उनका कोई इरादा नहीं है. वैसे, जहां जापानी मूल के लोग किम की इस परिधान शृंखला के नामकरण को लेकर आहत और आक्रोशित हैं वहीं ऐसे लोग भी हैं जो खुलकर और सुविचारित तर्कों के साथ  किम का समर्थन कर रहे हैं. ऐसे लोगों में से एक हैं अमरीकी अभिनेत्री और गायिका टिया कैरेर. टिया ने लिखा है, "मैं एक फिलिपिनो हूं और मैं किमोनो पहनती हूं. मुझे यह समझ में नहीं आता कि मैं किमोनो क्यों नहीं पहन सकती? मैं जापानी कपड़े पहनती हूं, चीनी कपड़े पहनती हूं. क्या मुझे केवल फिलिपिनो वेशभूषा तक ही  सीमित रहना चाहिए? हम एक बहु-सांस्कृतिक, बहु-प्रजातीय दुनिया में जी रहे हैं. इसलिए यह बात  मेरी समझ से परे है. मैंने किम को किमोनो पहने देखा है. वो अगर अपनी कम्पनी का नाम किमोनो रखती है तो इसमें क्या ग़लत है?" टिया ने बहुत तल्ख़ होते हुए पूछा है कि आखिर हम कहां जा रहे हैं? क्या हमें हर बात के लिए सांस्कृतिक पुलिस से इजाज़त लेनी होगी?"

उनके सवाल में दम तो है!
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत  मंगलवार, दिनांक  02 जुलाई, 2019 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.



Tuesday, June 25, 2019

लड़कियां शादी के बाद सरनेम नहीं बदलना चाहती हैं !


दुनिया के ज़्यादातर समाजों और देशों में यह चलन है कि विवाह के बाद लड़की अपना कुलनाम (सरनेम)  बदल कर अपने पति का कुलनाम अपना लेती है. उदाहरण के लिए मेरी पत्नी विवाह पूर्व अपने पिता का कुलनाम गुप्ता प्रयुक्त करती थीं,  विवाहोपरान्त वे गुप्ता नहीं, अग्रवाल कुलनाम काम में लेने लगीं. भारत जैसे परम्परा प्रधान देश में इस बात का अपवाद वे लोग रहे जो कला संस्कृति आदि के ऐसे क्षेत्रों में कार्यरत थे या हैं जहां कुलनाम बदलने से पहचान का संकट पैदा हो सकता था. यही कारण है  कि कथाकार मन्नू भण्डारी (राजेंद्र यादव से विवाह के बाद भी) मन्नू यादव नहीं हुईं या सुधा अरोड़ा सुधा भाटिया नहीं हुईं. वैसे सबने ऐसा नहीं किया. बहुतों ने परम्परा का अनुसरण भी किया. लेकिन जैसे-जैसे नया सोच प्रमुखता पाने लगा, इस बात पर सवाल उठाये जाने लगे कि आखिर लड़की ही क्यों अपना कुलनाम बदले? इस सवाल का  सकारात्मक जवाब देते हुए कुछ पुरुषों ने भी विवाहोपरान्त अपना कुलनाम  बदल पत्नी का कुलनाम अंगीकार किया, और कुछ स्त्रियों ने समझौते का मार्ग अपनाते हुए अपना विवाहपूर्व का कुलनाम बरक़रार रखते हुए उसके साथ पति का कुलनाम भी जोड़ लिया. इस तरह कुछ स्त्रियों ने एक की बजाय दो कुलनाम धारण कर अपने विवाह पूर्व  के कुलनाम को भी अपने साथ जोड़े रखा. इसका एक उदाहरण अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी कुंद्रा के नाम में देखा जा सकता है. लेकिन बहुतों के लिए दो कुलनाम  अपना लेना भी स्त्री पुरुष समानता का परिचायक नहीं है. यहां एक सवाल यह भी उठता है कि पुरुष और स्त्री में से किसका कुलनाम पहले प्रयुक्त किया  जाए, और क्यों! एक व्यावहारिक दिक्कत भी इसमें है  और वह यह कि जैसे जैसे वंश आगे बढ़ता जाएगा, नाम के साथ और कुलनाम  जुड़ते जाएंगे और पांच सात पीढ़ियों के बाद तो नाम इतना लम्बा हो जाएगा कि लेख जैसा लगने लगेगा.

भारत में भले ही यह सवाल बहुत अहम न हो, पश्चिम में, जहां से स्त्री मुक्ति और स्त्री समानता का वर्तमान  विमर्श सारी दुनिया में फैला है वहां इस समस्या के नए नए समाधान खोजे जा रहे हैं और उन पर चर्चाएं भी खूब हो रही हैं. हाल में वाशिंगटन डी.सी. अमरीका की एक बत्तीस वर्षीया चीफ़ एक्ज़ीक्यूटिव शैरॉन गोल्डबर्ग ने जब योनाथन क्विक से विवाह करने का निर्णय किया तो उन दोनों ने इस मसले पर खूब गहनता से विचार विमर्श किया. उनके इस विमर्श की परिणति  इस बात में हुई कि विवाह के बाद वे दोनों अपने-अपने वर्तमान कुलनाम त्याग कर एक नए कुलनाम गोल्डक्विक का प्रयोग करने लगेंगे. ज़ाहिर है कि यह नया कुलनाम उन दोनों के वर्तमान कुलनामों का मिश्रण है. उनका सोच यह है कि अंतत: विवाह भी तो एक नए परिवार  का सृजन है, तो फिर नया कुलनाम भी क्यों न सृजित कर लिया जाए! वैसे विवाह के बाद स्त्री पति का नाम अपनाये या नहीं, इस बात को लेकर अमरीकी समाज में पर्याप्त खुलापन पहले से विद्यमान रहा है लेकिन यह खुलापन कुलनाम को अपनाने या न अपनाने तक ही सीमित रहा है. दो कुलनामों को मिलाकर नया कुलनाम रचने का यह सिलसिला अपेक्षाकृत नया है. इस बदलाव को एक और नव विवाहित युगल ने कुछ दूसरे अंदाज़ में अपनाया है. रैचेल एकॉफ ने जब ली लेविटर से विवाह किया तो उन दोनों ने अपने-अपने कुलनाम बरक़रार रखे, लेकिन यह तै किया कि उनके बच्चे एक नए कुलनाम का प्रयोग करेंगे. यह कुलनाम होगा – लेविकॉफ जो ज़ाहिर है कि इन दोनों के कुलनामों को मिलाकर बनाया गया है.

मां-बाप के कुलनाम बाद वाली पीढ़ियां भी काम में लें, यह रिवायत इंगलैण्ड में बारहवीं शताब्दी के आसपास चलन में आई थी. असल में तब वहां बहुत थोड़े से नाम चलन में थे और इस कारण किसी छोटे-से गांव में पंद्रह बीस रॉबर्ट और तीस-चालीस जेम्स मिल जाया करते थे. एक रॉबर्ट को दूसरे से अलग करके पहचानने और सम्पत्ति का सही उत्तराधिकारी निर्धारित करने के लिए कुलनाम की ज़रूरत पड़ी. अब क्योंकि स्त्रियों  को भी सम्पत्ति ही माना जाता था, वे भी पति का कुलनाम धारण करने लगीं.

लेकिन दो कुलनामों को मिलाकर नया कुलनाम बनाने से भी समस्या का समाधान नहीं हो रहा है. इसलिए नहीं हो रहा है कि बहुत सारे पुरुष (और स्त्रियां  भी) अपने वर्तमान कुलनाम से इतना गहरा जुड़ाव महसूस करते हैं कि वे उसे छोड़ना नहीं चाहते हैं. जो लोग बहुत सम्पन्न या अत्यधिक प्रतिष्ठित हैं वे भी इस बात के लिए तैयार नहीं हैं कि जिस कुलनाम से उनकी प्रतिष्ठा प्रदर्शित  होती है उसे छोड़ दें. भला कोई टाटा-बिड़ला-अम्बानी-बच्चन अपना कुलनाम कैसे छोड़ सकता है? फिर नया कुलनाम अपनाने की एक व्यावहारिक कठिनाई भी नज़र अंदाज़  नहीं की जा सकती है. कठिनाई यह कि अमरीका जैसे देशों में एक कुलनाम को त्याग कर दूसरा कुलनाम अपनाना खासा झंझट का और खर्चीला काम है.

लेकिन इन तमाम उलझनों  और असुविधाओं के बावज़ूद स्त्री समानता के पक्षधर पुरानी रिवायत को ज़ारी रखने को तैयार नहीं हैं. वैसे भी, बदलाव तो आहिस्ता-आहिस्ता ही होता है. क्या पता दो-चार सौ बरसों बाद कुलनाम लुप्त ही हो जाएं!
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गगत मंगलवार, 25 जून, 2019 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, June 18, 2019

उनके लिए तो किसी की मृत्यु भी एक व्यवसाय है!

लीजिए साहबकैलिफोर्निया की एक स्टार्ट अप कम्पनी ने लोगों के  समग्र जीवनानंत  अनुभव को नया आकार  देने का बीड़ा उठाया है. बैटर प्लेस फॉरेस्ट्स नामक इस कम्पनी ने दावा किया है कि वह जीवन के अंत के सम्पूर्ण अनुभव को पूरी तरह बदल देगी. अभी तक तो होता यह रहा है कि जैसे ही कोई व्यक्ति आखिरी सांस  लेता है उसके परिजन पारम्परिक विधि से उसके अंतिम संस्कार की तैयारियों में जुट जाते हैं. विभिन्न समाजों में  इन अंतिम संस्कारों के रूप अलग-अलग हैं. मसलन कहीं देह को सुपुर्दे  ख़ाक किया जाता है तो कहीं उसे अग्नि को समर्पित किया जाता है. पश्चिम में जहां ईसाई धर्म के मानने वाले अधिक हैंसामान्यत: शव को ताबूत में रखकर पृथ्वी को समर्पित कर दिया जाता है.

अमरीका जैसे हर चीज़ में व्यावसायिक सम्भावनाएं तलाश कर लेने वाले समाज में मृत्यु को भी एक बड़े उद्यम और व्यवसाय के रूप में स्थापित कर लिया गया है. और जब जीवन में सब कुछ पर महंगाई की मार पड़ रही है तो भला मौत पर उसका असर कैसे न हो! एक मोटे अनुमान के अनुसार हाल के बरसों में अमरीका में अंतिम संस्कार की लागत में दुगुनी वृद्धि हो चुकी है. ऐसा बताया जाता है कि अब अमरीका में एक शव के  अंतिम संस्कार की लागत सामान्यत: पंद्रह से बीस हज़ार डॉलर के आसपास होने लगी है. और जैसे इतना ही काफ़ी न होबढ़ते शहरीकरण के कारण कब्रस्तानों के लिए ज़मीन का टोटा भी होता जा रहा है. इन बातों का एक असर यह भी हुआ है कि अब बहुत सारे अमरीकी भी पारम्परिक अंतिम  संस्कार की बजाय दाह संस्कार का वरण करने लगे हैं. इस बदलाव के बावज़ूद अमरीका में अंतिम संस्कार का बाज़ार काफ़ी बड़ा है. लगभग 20 बिलियन डॉलर प्रतिवर्ष. इसी बड़े बाज़ार और घटती ज़मीन ने बैटर प्लेस फॉरेस्ट्स जैसे स्टार्ट अप को इस नवाचार के लिए प्रेरित किया है.

बैटर प्लेस फॉरेस्ट्स वाले अलग-अलग जगहों पर खूब सारी ज़मीन खरीद रहे हैं  और उस ज़मीन के छोटे-छोटे  हिस्से लोगों को इस आश्वासन के साथ बेच रहे हैं  कि उसे यथावत रखा जाएगाउसका कोई विकास नहीं किया जाएगा. विकास से यहां आशय आधुनिक निर्माण आदि से है. हांइस ज़मीन पर तरह तरह के पेड़ लगाए गए हैं और ऐसे हज़ारों पेड़ भावी मृतकों को बेचे जा चुके हैं. मौत के बाद के जीवन’  के लिए चिंतित लोग वहां जाते हैंअपनी पसंद का पेड़ चुनते  हैं और उनके नाम की एक पट्टिका वहां लगा दी जाती है. बहुत सारे लोग पेड़ विहीन ज़मीन भी चुनते हैं. ऐसे लोगों में से जब किसी का निधन होता है तो उसकी राख व अस्थियां खाद आदि के साथ मिश्रित कर उस ज़मीन में या उस पेड़ की जड़ों में डाल दी जाती है. कम्पनी का वादा है कि अगर कभी ऐसा कोई पेड़ मर गया तो उसकी जगह उसी प्रजाति का नया पेड़ लगा दिया जाएगा. कम्पनी का करोबार ठीक चल रहा है. अभी उसमें पैंतालीस लोग काम कर रहे हैं और अगर कम्पनी के दावों पर विश्वास करें तो हज़ारों लोगों ने वहां अपने अंतिम संस्कार के लिए पेड़ खरीद लिये हैं.

इस तरह अपने अंतिम संस्कार के लिए ज़मीन और पेड़ आरक्षित करने का न्यूनतम खर्च तीन हज़ार डॉलर है. इस राशि में किसी सामान्य प्रजाति का नया लगाया पौधा मिलता हैजबकि जो लोग तीस हज़ार डॉलर तक खर्च करने की हैसियत रखते हैं उन्हें दुर्लभ और महंगी  प्रजाति का  विकसित पेड़ मिल जाता है. और हांजो लोग और भी कम खर्च करना चाहते हैं वे मात्र नौ सौ सत्तर डॉलर खर्च कर किसी सामुदायिक वृक्ष की जड़ों में अपना डेरा डालने का अधिकार प्राप्त कर सकते हैं. कुछ लोग अपने लिए कोई अकेला खड़ा पेड़ चुनते हैं तो कोई मौत के बाद भी समूह में रहने की ललक के साथ समूह में लगाए गए पेड़ों में से एक का चुनाव कर लेते हैं. एक और बात. क्योंकि ज़माना तकनीक का है तो मौत के बाद भी तकनीक का दामन थामे रहा जा सकता है. जो लोग अपनी जेब थोड़ी और ढीली कर सकते हैं वे अपना एक डिजिटल मेमोरियल वीडियो भी बनवा सकते हैं ताकि जब कोई उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करने आए तो वो बारह मिनिट का यह वीडियो देख उनकी यादों में डूब सके. 

स्टार्ट अप की इस योजना की कामयाबी पर बहुतों को संशय भी है. उन्हें लगता है कि जब रात को चुपचाप जाकर किसी खाली पड़ी ज़मीन पर अपने प्रियजन के अंतिम अवशेष को निशुल्क विसर्जित किया जा सकता है तो भला इतनी बड़ी राशि कोई क्यों खर्च करेगायह देखना दिलचस्प  होगा कि मृत्यु के इस कारोबार की परिणति क्या होती है!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के  अंतर्गत मंगलवार, दिनांक 18 जून, 2019 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Wednesday, June 12, 2019

अब विवाद फ्रेंच फ्राइ के जन्म स्थान का


अपने देश में रसगुल्ले की व्युत्पत्ति को लेकर चले विवाद से हम सब भली भांति परिचित हैं. सामान्यत: यह माना जाता रहा है कि इसका जन्म बंगाल में हुआ, और हममें से बहुत सारे लोग बंगाली मिठाईके प्रतिनिधि के तौर पर रसगुल्ले को ही जानते हैं.  लेकिन इस धारणा को चुनौती  दी उड़ीसा ने. कहते हैं कि इस मिठाई का जन्म पुरी के जगन्नाथ मंदिर में हुआ था. एक प्रचलित कहानी के मुताबिक रथयात्रा के बाद जब भगवान जगन्नाथ वापस लौटे तो उन्होंने दरवाजा बंद पाया क्योंकि देवी लक्ष्मी उनसे नाराज थीं. उनकी नाराजगी इस वजह से थी कि जगन्नाथ उन्हें अपने साथ नहीं ले गए थे. रूठी देवी को मनाने के लिए जगन्नाथ ने उन्हें रसगुल्ला पेश किया और इसे पाकर देवी प्रसन्न हो गईं. रसगुल्ला उड़ीसा में 13वीं शताब्दी से बन रहा है. अभी भी रथयात्रा के बाद जब भगवान वापस मंदिर पहुंचते हैं तो रसगुल्ले ही उन्हें देवी के क्रोध से बचाते हैं. लेकिन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उड़ीसा के इन तमाम तर्कों को नकार दिया गया और पश्चिम बंगाल को जीआई टैग यानि जियोग्राफिकल इंडिकेशन दे दिया गया. यानि अब आधिकारिक रूप से यह  माना जा चुका है कि रसगुल्ले की उत्पत्ति बंगाल में हुई थी. 
हमारे रसगुल्ला विवाद का तो पटाक्षेप हो गया, लेकिन अब दुनिया के दूसरे छोर पर एक अन्य खाद्य पदार्थ को लेकर कई देश अपने-अपने दावे प्रस्तुत कर रहे हैं. यह खाद्य पदार्थ है फ्रेंच फ्राइ. जी बिल्कुल वही फ्रेंच  फ्राई जो आलू के लम्बे लम्बे टुकड़ों को तलकर तैयार की जाती है. आम तौर पर हम लोग इसे एक अमरीकी उत्पाद मानते हैं क्योंकि हमारे पास तो यह लोकप्रिय अमरीकी फास्ट फूड रेस्तराओं की श्रंखलाओं के माध्यम  से ही पहुंचा है. लेकिन इसकी वंशावली का मामला बहुत पेचीदा है. हाल में बेल्जियम ने यूनेस्को के दरबार में एक गुहार लगाई है कि फ्रेंच फ्राइ को बेल्जियन सांस्कृतिक विरासत के रूप में मान्यता प्रदान  की जाए. ज़ाहिर है कि जब गुहार लगाई है तो पर्याप्त प्रमाण और तर्क भी प्रस्तुत किए ही होंगे. इसके नाम में भले ही फ्रांस  शामिल हो, फ्राइ के इतिहास के विशेषज्ञ  बेल्जियम के एक नामी शेफ़ एल्बर्ट वर्डेयेन का कहना है कि “अमरीकी लोग इसे फ्रेंच फ्राइ कहते हैं, लेकिन यह फ्रेंच फ्राइ नहीं है. असल में तो यह फ्रेंचभाषी (बेल्जियम की) फ्राइ है.” आम धारणा भी यही है कि अपने मूल रूप में फ्राइ का जन्म फ्रेंचभाषी बेल्जियम के नामुर नगर में हुआ. असल में वहां के  निवासी तली हुई मछली के शौकीन थे. लेकिन जब 1680 की सर्दियों में वहां की मीयूज़ नामक प्रमुख नदी जम गई तो लोगों ने अपनी तली हुई मछली खाने की तलब को तले हुए आलू खाकर पूरा किया. और इस तरह इस व्यंजन का जन्म हुआ. जहां तक इसके वर्तमान नाम का सवाल है, माना जाता है कि प्रथम विश्वयुद्ध के समय फ्रेंचभाषी बेल्जियम में तैनात अमरीकी सैनिकों ने इन तले हुए आलुओं को फ्रेंच फ्राइ कहना शुरु किया और अब यही  नाम सर्व स्वीकृत है.
लेकिन पाक कला के बहुत सारे इतिहासकार इस धारणा से सहमत नहीं हैं. पियरे लेकलर्क उनमें से एक हैं. वे इस धारणा को अस्वीकार करते हुए  कहते हैं कि चाहे आप यह मान भी लें कि इस व्यंजन का जन्म नामुर में हुआ, 1680 की बात गले नहीं उतरती है क्योंकि उस इलाके में आलू 1735 से पहले होते ही नहीं थे. उनकी दूसरी असहमति तलने को लेकर है. उनका तर्क है कि अठारहवीं शताब्दी में तेल वगैरह वसा पदार्थ सामान्य जन के लिए विलासिता माने जाते थे. मक्खन बहुत महंगा था, पशु वसा दुर्लभ  थी और वनस्पतिजन्य वसा भी बड़ी कंजूसी से काम में ली  जाती थी. किसान लोग इस बेशकीमती वसा को तलने जैसे काम में बर्बाद करने की बजाय ब्रेड पर लगाकर या सूप में डालकर सीधे ही खाना ज़्यादा उपयुक्त समझते थे. पियरे लेकलर्क का कहना है कि यह बात शायद ही कभी पता चल सके कि तले हुए आलू के इस व्यंजन का आविष्कार किसने और कहां किया. लेकिन इतना निश्चित है कि यह उत्पाद फेरीवालों की देन है. और शायद  इसी वजह से इसका जन्म प्रमाण पत्र हासिल कर सकना लगभग असम्भव है.
अब बहुत सारे लोग इस पचड़े में न पड़कर मात्र यह स्वीकार कर संतुष्ट  हो जाना चाहते हैं कि जन्म इसका चाहे जहां हुआ हो, आज प्रमुखत: यह एक अमरीकी व्यंजन है क्योंकि औसतन एक अमरीकी साल में 29 पाउण्ड फ्रेंच फ्राइ उदरस्थ कर लेता है. अमरीका के पड़ोसी देश कनाडा का भी  इसकी लोकप्रियता के प्रसार में बड़ा योगदान है. वहां की एक कम्पनी फ्रोज़न फ्रेंच फ्राइ की दुनिया की सबसे बड़ी निर्मात्री है. शुक्र है कि अब तक अमरीका या  कनाड़ा से इस व्यंजन पर अपनी दावेदारी नहीं ठोकी है.
वैसे, जो फ्रेंच फ्राइ के स्वाद के दीवाने हैं उन्हें इस बात से फर्क़ भी क्या पड़ने वाला है कि इसका जन्म किस देश में हुआ! 

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत बुधवार, दिनांक 12 जून, 2019 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, June 4, 2019

किस्सा तस्वीरें बनाकर गांव को बचा लेने वाले रेनबो ग्रैण्डपा का


उस गांव को अब सारी दुनिया रेनबो विलेज यानि इंद्रधनुषी गांव के नाम से जानने लगी है. ज़्यादा बड़ा नहीं है यह गांव, लेकिन आप इसकी किसी भी गली में निकल जाएं, वहां की हर दीवार पर कोई न कोई आकृति अंकित है. कहीं किसी दीवार से शेर झांक रहे हैं तो किसी और दीवाल पर बिल्लियां चुहल करती नज़र आ रही हैं. कहीं बड़ी-बड़ी आंखों वाले पाण्डा खिलवाड़ कर रहे हैं  तो तो कहीं मोर नाच रहे हैं. किसी दरवाज़े से कोई वृद्ध पुरुष (यानि उसकी तस्वीर) झांक रहा होगा तो कहीं सामुराई नृत्य मुद्रा में होंगे. कहीं अंतरिक्ष यात्री हवा में तैरते नज़र आएंगे तो कहीं एक दूसरे की आंखों की गहराई में डूबे प्रेमीजन आपको लुभा रहे होंगे. और यह सब किया-धरा है उस बूढ़े बाबा का जिसे अब ग्रैण्डपा रेनबो यानि इंद्रधनुष वाले दादाजी के नाम से जाना जाता है. इस अजीबो ग़रीब गांव को देखने हर बरस पूरी दुनिया से कोई दसेक लाख लोग आते हैं. ‌

इन इंद्रधनुष वाले दादा जी का असल नाम है ह्युआंग युंग फू और अभी इनकी उम्र मात्र 86 बरस है.  अभी  भी, जब सारा गांव नींद के आगोश में बेसुध पड़ा होता है, बाबाजी अपना पेण्टिंग का साजो सामान लेकर गली में निकल पड़ते हैं और जो भी जगह खाली नज़र आती है उसे अपनी सतरंगी कलाकृति से सजा डालते हैं. इन बाबाजी की कथा बड़ी अजीब है. अजीब भी और प्रेरक भी.  इनका जन्म हुआ था चीन में, और चीन-जापान युद्ध तथा द्वितीय विश्व युद्ध में में सहभागिता करने के अलावा इन्होंने चीन के राष्ट्रवादी दल की गतिविधियों में भी हिस्सा लिया था. लेकिन जब इस दल को पराजय का सामना करना पड़ा तो चीन से भाग कर ताइवान आए बीस लाख लोगों में से एक ये ह्युआंग युंग फू भी थे. इन लोगों को बसाने के लिए ताइवान की तत्कालीन सरकार ने तुरत फुरत कुछ  काम चलाऊ गांव बना डाले, और आहिस्ता आहिस्ता ऐसा ही एक गांव हमारे ह्युआंग युंग फू का स्थायी निवास बन गया.

काल का पहिया घूमता रहा, उनके बहुत सारे साथी विभिन्न कारणों से गांव छोड़ कर अन्यत्र जा बसे और अनेक इस लोक को छोड़  कर उस लोक में चले गए, जहां से कोई वापस नहीं आता है. और आखिर में हुआ यह कि 1200 परिवारों वाले केंद्रीय ताइवान  के उस गांव में जिसे अब रेनबो विलेज के नाम से जाना जाता है, अकेले ह्युआंग युंग बच रहे. सरकार ने गांव की उस ज़मीन पर एक आधुनिक सर्व सुविधा सम्पन्न अपार्टमेण्ट कॉम्प्लेक्स बनाने की महत्वाकांक्षी योजना तैयार की और गांव में बचे इकलौते निवासी ह्युआंग युंग फू के सामने प्रस्ताव रखा कि वो सरकार से मुआवज़ा राशि लेकर कहीं और चला जाए. जो प्रस्ताव सरकार के लिए उसकी उदारता का परिचायक था वही इस बूढ़े के लिए हृदय विदारक और स्तब्ध कर देने वाला था. उसने तो अपनी पूरी ज़िंदगी में इस गांव और अपने दो कमरों के इस मामूली-से घर को ही अपना जाना-समझा था. भला अब इस पकी उम्र में वह कहां जाकर नया घर बसाये, और क्यों?  और उसकी हताशा अभिव्यक्त हुई उसकी कला में. जब कुछ न सूझा तो उसने अपने घर की दीवारों पर तस्वीरें बनाने में अपने को डुबो कर जैसे इस आसन्न खतरे की अनदेखी करने की चेष्टा  की. सबसे पहले उसने बनाई एक चिड़िया, फिर आई कुछ बिल्लियां और इस तरह उसने अपने कला कर्म में खुद को भुलावा देना ज़ारी रखा. अपने घर की दीवारों  को आकृतियों से सजा डालने के बाद उसने गांव के अन्य खाली पड़े घरों की दीवारों पर तस्वीरें बनाना शुरु कर दिया. संयोग यह बना कि जिन दिनों वह  यह काम करने लगा था, उन्हीं दिनों निकटवर्ती लिंग तुंग  विश्वविद्यालय का एक  छात्र उस गांव में आया और जब उसने ह्युआंग युंग फू की व्यथा-कथा जानी तो उसे लगा कि इस आदमी की तो मदद करनी चाहिए. उसने गांव में बनी पेण्टिंग्स की कुछ तस्वीरें खींची और उनको लेकर इस अनाम कलाकार के रंगों वगैरह के लिए पैसे जुटाने और गांव के मूल स्वरूप को बचाने का एक अभियान शुरु कर दिया.

बहुत जल्दी यह अभियान वायरल हो गया और यह मुद्दा राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गया. कुछ ही माह में मेयर के पास अस्सी  हज़ार ई मेल पहुंच गई जिनमें  यह अनुरोध था कि गांव के मूल स्वरूप को नष्ट न किया जाए. अंतत: सरकार को भी  अपना इरादा बदलना पड़ा. गांव में बची हुई ग्यारह इमारतों, गलियों और आस पास के क्षेत्र को एक सार्वजनिक पार्क के रूप में संरक्षित कर लिया गया.  हालांकि अब उसकी सेहत ठीक  नहीं रहती  है फिर भी बूढ़ा ह्युआंग युंग फू हर सुबह अपना साजो सामान लेकर पेण्टिंग्स बनाने निकल पड़ता है. उसने अपने घर के बाहर एक डॉनेशन बॉक्स रख रखा है जिसमें लोग स्वेच्छा से पैसे डाल जाते हैं और उनसे वह रंग वगैरह खरीद लाता है.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 04 जून, 2019 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 


Tuesday, May 28, 2019

देशों की सीमाओं को नकारती है यह लाइब्रेरी!


जब आप हास्केल फ्री लाइब्रेरी में प्रवेश करते हैं तो लगता है कि आप किसी आम कस्बाई अमरीकी लाइब्रेरी में घुसे हैं. बस एक फर्क़ पर आपका ध्यान जाता है  कि यहां जो लकड़ी का काम  है यानि फर्नीचर, अलमारियां वगैरह हैं वे सब अधिक भव्य और पुरानी शैली के हैं. फिर आपका ध्यान इस बात पर भी जाता है कि यहां का जो स्टाफ है वह कभी अंग्रेज़ी बोलता है तो कभी फ्रेंच, और हां, यह बात भी कुछ अजीब लगती है कि इस अमरीकी लगने वाली लाइब्रेरी में फ्रांस-कनाडा के इतिहास पर किताबों की बहुतायत है. और हां, सबसे अधिक ध्यानाकर्षक तो है इस लाइब्रेरी के फर्श पर चिपका हुआ एक काला टेप जो इसे दो भागों में बांटता प्रतीत होता है.

मुझे लगता है कि अब आपको यह बता ही दिया जाना  चाहिए कि जिस लाइब्रेरी की मैं चर्चा कर रहा हों वह दुनिया की एकमात्र ऐसी लाइब्रेरी है जो दो देशों में स्थित है. यह लाइब्रेरी अमरीका के डर्बी लाइन, वर्मोण्ट और  कनाडा के स्टैंस्टेड, क्यूबेक में स्थित है. लाइब्रेरी का मुख्य द्वार, सामुदायिक सूचना पट्ट और बच्चों की किताबों का खण्ड अगर अमरीका में है तो पुस्तकालय का शेष संग्रह और वाचनालय कनाडा में हैं. इसी भवन की दूसरी मंज़िल पर एक ऑपेरा हाउस भी है और ज़ाहिर है कि वह भी दोनों देशों में स्थित है. इस ऑपेरा हाउस की ज़्यादातर सीटें कनाडा में हैं जहां बैठकर आप वर्मोण्ट, अमरीका की धरती पर होने वाले कार्यक्रमों का लुत्फ़ लेते हैं. हैं ना मज़ेदार बात. इस दोमंज़िला भव्य इमारत का निर्माण एक रईस अमरीकी व्यापारी की कनाडाई पत्नी मार्था हास्केल ने सन 1901 में करवाया था. यह वह समय था जब ये दोनों कस्बे दूध और शक्कर की तरह घुले मिले थे. लोग समान जल स्रोत का पानी पीते थे, एक साथ खेलते थे और यहां तक कि बड़ी लड़ाइयों में भी एक साथ हिस्सा लेते थे. हास्केल परिवार ने इस भवन के निर्माण के लिए इस जगह का चुनाव बहुत सोच समझ कर किया था. वे सीमा के दोनों तरफ के लोगों के बीच आत्मीयता और दोस्ती का प्रसार चाहते थे. उस कालखण्ड में मार्था के मन में यह विचार था कि ऑपेरा हाउस की कमाई से लाइब्रेरी का संचालन हो जाया करेगा. लेकिन चलचित्र के आगमन से लोगों की रुचि में बहुत बदलाव आया और अब हालत यह है कि लाइब्रेरी की आय से ऑपेरा हाउस को ज़िंदा रखा जा रहा है.

अपनी स्थापना के बाद से बहुत लम्बे समय तक यह लाइब्रेरी अपनी पुस्तकों के संग्रह के अलावा भी लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी रही. असल में सीमाएं, चाहे वे किन्हीं भी देशों के बीच की हों, लोगों के मन में एक दुर्निवार आकर्षण जगाती हैं. यह सोचना कि एक विभाजक रेखा के पार सब कुछ अलहदा है, बहुत रोमांचक  होता है. यही रोमांच इस पुस्तकालय और ऑपेरा हाउस में आने वाले लोगों के आकर्षण का कारण रहा और अब भी है. लेकिन ग्यारह सितम्बर 2001 की दुर्भाग्यपूर्ण घटना के बाद से काफी कुछ बदल गया है. उस समय से पहले तो इधर से उधर जाना-आना बहुत ही सहज-स्वाभाविक हुआ करता था. लेकिन इस घटना के बाद इस भवन के परिसर में न सही, आस-पास के माहौल में एक अनकहा तनाव महसूस किया जा सकता है. पुस्तकालय भवन के बाहर भी चौबीसों घण्टे अमरीकी सुरक्षा सेवा का एक वाहन पहरेदारी करता है. रॉयल कैनेडियन माउण्टेड पुलिस के सीमा सुरक्षा सैनिक भी वहां हर पल मौज़ूद रहते हैं. अमरीकी नागरिकों के लिए अब भी इस पुस्तकालय में आना-जाना बहुत सहज है. वे मुख्य द्वार  से सीधे अंदर घुस सकते हैं, लेकिन कनाडाई नागरिकों को क्योंकि तकनीकी रूप से अंतर्राष्ट्रीय सीमा रेखा को पार करना होता है, थोड़ी-सी असुविधा का सामना करना पड़ता है. उन्हें कुछ सुरक्षा कैमरों के आगे से गुज़रते हुए लाइब्रेरी  में प्रवेश  करना होता है. हां इतना ज़रूर है कि एक बार लाइब्रेरी में जाने के बाद वे बहुत सुगमता से अपनी किताबें इश्यू करवा कर लौट आते  हैं. हां, इस बात का ज़रूर ध्यान रखा जाता है कि इस सुविधा का दुरुपयोग करते हुए कोई कनाडाई नागरिक अमरीकी इलाके में ही  न रह जाए. असल में यदा-कदा इस तरह के प्रयास होते भी रहते हैं.  

तमाम बदलावों के बावज़ूद यह भवन दो देशों के बीच की विभाजक रेखा की वजह से अलग हो गए परिवारों को मेल मुलाकात के अवसर सुलभ  कराता है. यह भवन अगर आज भी लोगों को अपनी तरफ खींचता है तो इसके पीछे जो भाव अंतर्निहित है उसे समझा जाना ज़रूरी है. भौगोलिक राजनीतिक तनावों और दुनिया भर में जगह-जगह खड़ी होती जा रही दीवारों के बीच यह भवन संदेश देता है कि सारी सीमाएं अंतत: मानव की कल्पना से उत्पन्न हैं और उन्हें मानना न मानना भी अंतत: हमारे अपने विवेक पर ही निर्भर है.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 28 मई, 2019 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, May 21, 2019

फ़ैशन की दुनिया को 'दुनिया' की फ़िक्र कहां?


फ़ैशन की दुनिया सदा से अपारम्परिक, बल्कि कहें परम्परा भंजक रही है. हममें से बहुत सारे लोग जब किसी चैनल पर फैशन परेड में मॉडल्स को अजीब-ओ-गरीब वेशभूषाओं में देखते हैं तो हमारी प्रतिक्रिया अस्वीकार और उपहास की ही होती है. हमें लगता है कि अगर हममें से कोई इस तरह की वेशभूषा धारण कर सड़क पर निकल जाए तो गली के कुत्ते उसकी दुर्गति किये बिना नहीं छोड़ने वाले. लेकिन इस बात से फैशन की  दुनिया के कर्ता धर्ताओं को कोई फर्क़ नहीं पड़ता है. वे अपना काम बदस्तूर ज़ारी रखते हैं. हां, इतना ज़रूर है कि हमें चौंकाने का कोई अवसर वे नहीं छोड़ना चाहते हैं. बदनाम होंगे तो क्या नाम न होगा’ – इस बात में सबसे ज़्यादा विश्वास शायद ये ही लोग करते हैं! अब देखिये ना, इधर हाल में अमरीका के एक फैशन ब्राण्ड ने इंस्टाग्राम पर एक मॉडल की एक तस्वीर पोस्ट की है जिसमें उसने गुलाबी रंग की बहुत बुरी तरह से फटी हुई जीन्स पहन रखी है. पोस्ट होते ही इस तस्वीर पर लाइक्स की और प्रतिक्रियाओं की झड़ी लग गई. ज़ाहिर है कि सारी प्रतिक्रियाएं प्रशंसात्मक नहीं थीं. मज़े की बात यह कि फैशन ब्राण्ड जितना प्रसन्न प्रशंसात्मक प्रतिक्रियाओं से था, उससे कम खुश उन प्रतिक्रियाओं से नहीं था जिनमें इस जीन्स को खूब बुरा बताया गया था.

दरअसल, लगातार ऐसा कुछ करते रहना जिस से लोग उत्तेजित हों, भड़कें और नाराज़गी भरी प्रतिक्रियाएं करें, फैशन की दुनिया की एक सुपरिचित रणनीति है.  उन्हें इस बात से कोई फर्क़ नहीं पड़ता है कि लोग उनके डिज़ाइन किये गए वस्त्रों को ना पहनने काबिल, भद्दे, बेतुके, बेहूदा या हास्यास्पद बता रहे हैं. वे न केवल इस बात से आनंदित होते हैं कोशिश करते हैं कि अगली दफा जो डिज़ाइन वे रैम्प पर उतारें वे पहले से भी ज़्यादा अजीब और लोगों को उकसाने वाले हों. शायद इसी सोच के चलते अमरीका की अलग अलग  फैशन कम्पनियों  ने पुरुषों के लिए पीवीसी निर्मित पारदर्शी  जीन्स, उन्हीं  के लिए ऐसे टॉप जिनमें उनके स्तनाग्र दर्शाने के लिए छेद बने हों, और महिलाओं के लिए अब तक काफी कुख्याति अर्जित कर चुकी डेनिम की पैण्टी जिसे जेण्टीज़  कहा जाता है, बाज़ार में उतारी हैं. जब इस तरह के विचित्र वस्त्र चर्चा में आते हैं तो स्वभावत: सोशल मीडिया पर भी उनकी खूब चर्चा होती है. और इस तरह फैशन उद्योग सोशल मीडिया को भी खाद-पानी सुलभ करा देता है.

लेकिन सोशल मीडिया पर होने वाली तमाम चर्चाएं, चाहे वो सकारात्मक हों, या नकारात्मक अंतत: फैशन उद्योग के लिए लाभदायक ही साबित  होती हैं. अब यही बात लें कि मात्र दो माह पहले जेण्टीज़ पर खूब छींटाकशी की जा रही थी, लेकिन दो महीने बाद ही वैश्विक फैशन खोज प्लेटफॉर्म पर उसकी खोज  में 2250 प्रतिशत उछाल देखा गया. फैशन उद्योग में माना जाता है कि अगर कोई उत्पाद वायरल हो जाए तो उसकी सर्च  में कम से कम  एक हज़ार प्रतिशत का उछाल तो अवश्यम्भावी है. जो लोग इस तरह के फैशन उत्पादों की आलोचना करते हैं, फायदा उनको भी कम नहीं होता है. इन मामलों में दिलचस्पी रखने वाले समुदाय में उनको पहचाना जाने लगता है और अगर वे व्यंग्यपूर्ण प्रतिक्रिया करते हैं तो  उनके अभिव्यक्ति कौशल को सराहा जाता है. उनके फैशन बोध को सम्मान भरी नज़रों से देखा जाता है और फैशन की दुनिया उनकी बातों को गम्भीरता से लेने लगती है.

बात यहीं ख़त्म नहीं हो जाती. जिन उत्पादों की बहुत ज़्यादा आलोचना होती है, उनके लिए भी आहिस्ता-आहिस्ता एक विशेष खरीददार वर्ग तैयार होता जाता है. ये वे लोग होते हैं जो अपने पहनावे के मामले में अत्यधिक प्रयोगशील हैं. इनकी तो तमन्ना ही यह रहती है कि ये जो पहनें वह लोगों की कल्पना से भी परे का हो. ऐसे ही लोगों ने पारदर्शी जींस तक को सोल्ड आउट बना  दिया. ऐसे लोगों ने उसे पहना और फिर उनके पहनावे की खूब चर्चा हुई. पहनावे  की भी और पहनने वालों की भी. ज़ाहिर है कि ऐसा होने से फैशन डिज़ाइनर और निर्माताओं को अपनी मनचाही मुराद मिली. भले ही समाज में इस तरह के प्रयोगशील लोग बहुत ज़्यादा न  हों, यह बात भी सच है कि ये साहसी लोग ही बदलाव की राह का निर्माण करते हैं. अगर ऐसे साहसी लोग न हों तो सोचिये कि आज भी हम वही पहन रहे होते  तो हमारी पिछली पीढ़ियां पहनती थीं. हां, इतना ज़रूर है कि आज प्रयोगशीलता और  साहस का बहुत विस्तार हो गया है.

और हां,यह कहां ज़रूरी है कि हर नया बदलाव आपको पसंद आए ही! क्या पता जो आपको नापसंद हो, और लोग उसी को बहुत अधिक पसंद कर रहे  हों!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 21 मई, 2019 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.