Tuesday, January 17, 2017

उनके भीतर छिपी हुई थी दुर्वासा और परशुराम की टू-इन-वन आत्मा

हाल में राजस्थान की राजधानी में आयोजित हुए रुक्टा (राजस्थान यूनिवर्सिटी एण्ड कॉलेज टीचर्स असोसिएशन) राष्ट्रीय के अधिवेशन में प्रांत की मुख्य मंत्री जी ने कॉलेज शिक्षकों को भी विश्वविद्यालय शिक्षकों के समान पदनाम देने की घोषणा कर लम्बे समय से की जा रही मांग को पूरा कर दिया. विश्वविद्यालय में जहां असिस्टेण्ट प्रोफ़ेसर, असोसिएट प्रोफ़ेसर और प्रोफ़ेसर पदनाम होते हैं वहीं कॉलेज शिक्षकों के लिए मात्र एक पदनाम हुआ करता था – लेक्चरर यानि व्याख्याता. जब मैंने अपनी नौकरी की शुरुआत की तब राज्य में कॉलेज शिक्षकों के लिए विश्वविद्यालय शिक्षकों से भिन्न और उनसे न्यून वेतनमान हुआ करते थे. फिर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की  अनुशंसानुसार हमें भी उनके समान वेतनमान तो मिलने लग गए लेकिन पदनाम उनसे भिन्न बना रहा, और यह बात सबको चुभती भी रही. सरकार के दरवाज़े पर बार-बार गुहार लगाई जाती  रही, और सरकार भी सैद्धांतिक रूप से सहमत होती  रही. लेकिन बात उससे आगे नहीं बढ़ सकी. कोई चार दशकों की लम्बी प्रतीक्षा के बाद मुख्य मंत्री जी की घोषणा से यह आस बंधी है कि कॉलेज और विश्वविद्यालय शिक्षकों के बीच का यह पदनाम गत भेद-भाव अब ख़त्म हो जाएगा.

यह तो हुई औपचारिक और आधिकारिक बात! लेकिन इसी के साथ एक मज़ेदार हक़ीक़त यह भी है कि हममें से बहुत सारे कॉलेज शिक्षक अपनी नौकरी के पहले दिन से ही स्वयं को प्रोफ़ेसर कहते और कहलाते रहे हैं. इतना ही नहीं, राज्य और केंद्र के अब भूतपूर्व हो चुके एक मंत्री जी और राज्य के एक वर्तमान मंत्री जी को सरकारी लिखत-पढ़त में भी  प्रोफ़ेसर ही सम्बोधित किया जाता है, भले ही उन्होंने किसी विश्वविद्यालय में कभी नहीं पढ़ाया. एक समय था जब शिक्षक संगठन  ने भी अपने सदस्यों को सलाह दी थी कि सरकार की घोषणा का इंतज़ार किये बिना वे खुद को विश्वविद्यालय वाले पदनामों से विभूषित कर लें. इन तमाम बातों का ज़िक्र करते हुए मुझे अनायास अपनी नौकरी के पहले कुछ  महीनों में मिले एक ऐसे अनूठे व्यक्तित्व की याद आ गई है जिन्हें विस्मृत कर पाना नामुमकिन है. वे संस्कृत के व्याख्याता थे और हम लोगों की तुलना में ख़ासे वरिष्ठ थे. कोढ़ में खाज यह कि वे पी-एच.डी भी थे. वे हम सबको प्रो. साहब कहकर सम्बोधित करते थे और अपनी वरिष्ठता के रुतबे का पूरा प्रयोग करते हुए यह अपेक्षा करते थे कि हम सब भी एक दूसरे को प्रो. साहब कहकर ही सम्बोधित करें. अगर हममें से कोई किसी को नाम लेकर सम्बोधित कर देता या अपना परिचय व्याख्याता (जो हमारा वैध पदनाम था) के रूप में दे देता तो उनके कोप का भाजन बने बगैर नहीं रहता. उनके कोप की बात एक और चर्चा के बिना अधूरी रहेगी. वे पी-एच.डी. थे और हमेशा चाहते थे कि हम उनको न तो उनके जाति सूचक नाम से सम्बोधित करें, प्रथम नाम से सम्बोधन का तो कोई सवाल ही नहीं उठता था, न प्रोफ़ेसर साहब कह कर सम्बोधित करें. उन्हें केवल और केवल डॉ साहब सम्बोधन स्वीकार्य था. कई बार असावधानीवश इससे इतर सम्बोधन कर उनके कोप भाजन  बन चुके हम लोगों को धीरे-धीरे इसमें एक दुष्टतापूर्ण आनंद मिलने लगा था और आए दिन हममें से कोई न कोई उन्हें उनके जाति सूचक उपनाम से सम्बोधित कर देता. इधर हममें से किसी के भी मुंह से यह सम्बोधन निकलता और उधर उनके भीतर बिराजमान दुर्वासा और परशुराम की  टू-इन-वन आत्मा हुंकार भर कर उठ खड़ी होती. अब यह बात तो याद नहीं कि अपने विषय में उनकी पैठ कितनी गहरी थी, लेकिन यह बात अच्छी तरह याद है कि हिंदी और अंग्रेज़ी इन दोनों भाषाओं में उनकी लेखन क्षमता अद्भुत थी. उनके भीतर अवस्थित दुर्वासा और परशुराम उनकी कलम की नोक से कागज़ों पर उतरते और पापियों-अपराधियों को क्षत-विक्षत करने में  जुट जाते. उनके सारे प्रहार लिखित रूप में होते. अपना सारा गुस्सा वे पत्रों में व्यक्त करते. जिस किसी ने भी उन्हें डॉ साहब से भिन्न सम्बोधन से अपमानित किया होता उसके  नाम वे पोस्टकार्ड लिखते और जितनी अप्रिय बातें वे लिख सकते उसमें लिख डालते. ज़ाहिर है कि अगले दिन वो पोस्टकार्ड कॉलेज के स्टाफ रूम में रखे डाक के डिब्बे में प्रकट  होता और  जिसके नाम वह प्रेषित किया गया होता उससे पहले अन्य सारे लोग उसे पढ़ चुके होते. यही तो वे डॉ साहब चाहते भी थे. लेकिन ख़ास बात यह कि जितनी जल्दी वे नाराज़ होते उतनी ही जल्दी प्रसन्न भी हो जाते. नाराज़ करने वाला विनम्रतापूर्वक उनसे क्षमा मांगता, उनकी विद्वत्ता की प्रशंसा करता और तीन मिनिट की वार्ता में पाँच दफ़ा उन्हें डॉ साहब कहकर सम्बोधित करता तो वे पिघलने में भी  देर नहीं करते. लेकिन क्योंकि हम लोगों के लिए तो यह एक कौतुक मात्र था, कुछ ही देर बाद हममें से कोई और उन्हें डॉ साहब से इतर कोई और सम्बोधन देकर फिर उनके दुर्वासा-सह-परशुराम को काम पर लगा देता. पता नहीं अब वे डॉ साहब कहां हैं!  

▪▪▪ 
जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, दिनांक 17 जनवरी, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.


Tuesday, January 10, 2017

एक पुरुष ने जीती महिलाओं की साइक्लिंग प्रतिस्पर्धा

कुछ बातें असल में उतनी अजीब और चौंकाने वाली होती नहीं हैं, जितनी वे पहली नज़र में प्रतीत होती हैं. अब इसी वृत्तांत को लीजिए जिसके लिए मेरा विश्वास है कि शीर्षक पढ़ते ही आप चौंक गए होंगे! भला ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई पुरुष महिलाओं की प्रतिस्पर्धा में विजयी हो जाए?  लेकिन हुआ तो है ही. हांयह ज़रूर है कि जब आप पूरी बात जान लेंगे तो आपका आश्चर्य उतना नहीं रह जाएगा, जितना इस वृत्तांत को पढ़ना शुरु करते समय था. आपके धैर्य की अधिक परीक्षा लेने से बचते हुए मैं सीधे इस घटना पर  ही आ जाता हूं.

घटना यह है कि अमरीका में जिलियन बियर्डन नामक एक छत्तीस वर्षीय जन्मना पुरुष ने महिलाओं की एक बड़ी साइक्लिंग प्रतिस्पर्धा में जीत हासिल कर ली है.  उन्होंने अपनी निकटतम महिला प्रतिस्पर्धी अन्ना स्पार्क्स से महज़ एक सेकण्ड के अंतराल से यह प्रतिस्पर्धा जीती है. तीसरे स्थान पर रहने वाली सुज़ैन सोन्ये इनसे पूरे बाईस मिनिट पीछे रही. यह प्रतिस्पर्धा थी एरिज़ोना में आयोजित हुई 106 मील वाली एल टुअर डी टस्कन. इस प्रतिस्पर्धा में बियर्डन ने 4 घण्टे 36 मिनिट का समय लगाया. इसी मुकाबले में पुरुषों के वर्ग में जीत हासिल करने वाले मेक्सिको के ओलम्पिक साइक्लिस्ट   ह्युगो रेंजल ने यह दूरी उनसे 25 मिनिट कम समय में तै की.

अब आप इससे आगे की बात भी जान लें. इन जिलियन बियर्डन का जन्म तो एक पुरुष के रूप में हुआ था लेकिन वे खुद को एक ट्रांसजेण्डर स्त्री ही मानते थे.  इस मामले में बहुत बड़ी बात यह रही कि बग़ैर वह  शल्य क्रिया (सेक्स रिअसाइनमेण्ट सर्जरी) करवाये  जिसके द्वारा उनके यौनांगों को स्त्री स्वरूप प्रदान किया जाता, उन्होंने इस मुकाबले में एक स्त्री के रूप में हिस्सा लिया और जीत हासिल की. यह करिश्मा सम्भव हुआ इण्टरनेशनल ओलम्पिक काउंसिल के एक ताज़ा तरीन फैसले के कारण. काउंसिल ने अपने इस फैसले में यह व्यवस्था दी थी कि नेशनल फेडरेशन सभी ट्रांसजेण्डर एथलीटों को इस बात की अनुमति प्रदान करेगा  कि वे बगैर सेक्स रिअसाइनमेण्ट सर्जरी करवाये ही ओलम्पिक और अंतर्राष्ट्रीय मुकाबलों में अपने चाहे गए वर्ग (पुरुष या स्त्री) में हिस्सेदारी कर सकेंगे. इस फैसले में यह व्यवस्था की गई कि वे एथलीट जिनका जन्म स्त्री के रूप में हुआ है लेकिन जो खुद को पुरुष मानते  हैं वे बिना किसी अवरोध के पुरुषों की प्रतिस्पर्धाओं में भागीदारी कर सकेंगे. और  इसी तरह वे ट्रांसजेण्डर एथलीट जिनका जन्म पुरुष के रूप में हुआ लेकिन जो स्वयं को स्त्री मानते हैं वे स्त्रियों वाली प्रतिस्पर्धाओं में भाग ले सकेंगी. लेकिन इसके साथ एक शर्त भी रख दी गई. शर्त यह कि ऐसे प्रतिस्पर्धियों को सम्बद्ध मुकाबले से पहले एक बरस तक निर्धारित टेस्टास्टरोन का निर्वहन  करना होगा, यानि वे उस स्पर्धा में तभी हिस्सा ले सकेंगी जब उक्त अवधि में उनका टेस्टास्टरोन स्तर मानक से नीचे रहेगा. इसी नए नियम के कारण जिलियन बियर्डन यह करिश्मा कर सकीं.

यहीं यह भी जान लेना उपयुक्त होगा कि इण्टरनेशनल ओलम्पिक काउंसिल के इस नए फैसले से पहले तक 2003 में ज़ारी गई गाइडलाइन्स प्रभावी थीं जिनके अनुसार किसी भी ट्रांसजेण्डर एथलीट के लिए अपने जन्म से भिन्न लिंग वाली स्पर्धा में भाग लेने के लिए  सेक्स रिअसाइनमेंट सर्जरी करवाना ज़रूरी था. लेकिन अब इण्टरनेशनल ओलम्पिक काउंसिल ने यह कहते हुए कि ट्रांसजेण्डर एथलीट्स को उनके मनचीते वर्ग की स्पर्धाओं में भाग लेने से वंचित नहीं रखा जा सकता, वाज़िब प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करने के लिए यह नई व्यवस्था लागू की है. अपनी बात को और अधिक स्पष्ट करते हुए काउंसिल ने कहा है कि वाज़िब प्रतिस्पर्धा के लिहाज़ से यह उचित नहीं लगता कि एथलीटों पर सर्जिकल एनाटॉमिकल बदलावों की पूर्व शर्त लादी जाए. विकासमान कानूनों और मानवाधिकारों की अवधारणा के लिहाज़ से भी ऐसा करना अनुचित होगा.

ज़ाहिर है कि इण्टरनेशनल ओलम्पिक काउंसिल का यह फैसला ट्रांसजेण्डर लोगों के प्रति तेज़ी से बदलते  जा रहे  सामाजिक और विधिक सोच की परिणति है. सारी दुनिया में बहुत तेज़ी से ट्रांसजेण्डर जन के प्रति सहानुभूति और सद्भाव की जो बयार बह रही है, इस फैसले को उसी के संदर्भ  में देखा जाना चाहिए.  खुद जिलियन बियर्डन जो कि ट्रांसजेण्डर अधिकारों के लिए संघर्ष करने वालों में अग्रणी हैं और जिन्होंने दुनिया के पहले ट्रांसजेण्डर साइक्लिंग समूह की स्थापना भी की है,  ने भी इस नई व्यवस्था और इसके तहत हुई अपनी जीत का स्वागत करते हुए यह उम्मीद ज़ाहिर की है कि स्त्री वर्ग में हुई उनकी इस जीत से अन्य ट्रांसजेण्डर्स एथलीटों को भरपूर प्रोत्साहन मिलेगा. भले ही इण्टरनेशनल ओलम्पिक काउंसिल का यह फैसला अनिवार्यत: मान्य नियम न होकर राष्ट्रीय और खेल विषयक संस्थाओं के लिए अनुशंसा मात्र है, फिर भी इसके दूरगामी परिणामों से इंकार नहीं किया जा सकता.


▪▪▪  
जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत  मंगलवार, 10 जनवरी, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, January 3, 2017

खो कर फिर से पाई ज़िंदगी की सबसे अनमोल धरोहर!

ब्रिटेन की एक युवती एलोईस डेकर को क्या मालूम था कि किरगिज़स्तान की पहाड़ियों की रोमांचक यात्रा उनके जीवन का एक बेहद रोचक अध्याय भी लिख जाएगी! अपनी यात्रा के दूसरे दिन यकायक उन्हें पता चला कि उनकी दिवंगत मां का जो ब्रेसलेट वे पहने रहती थींवो कहीं गुम हो गया है. पुरानी अंगूठियों के सोने को गलाकर बनवाया गया यह ब्रेसलेट एलोईस की मां को उनकी मां से विरासत में मिला था और  जहां तक एलोईस की स्मृति जाती थी, उन्होंने हमेशा ही अपनी मां की कलाई में यह ब्रेसलेट देखा था. लेकिन ज़िंदगी के आखिरी बरसों में जब वे बहुत कमज़ोर हो गई थीं, यह ब्रेसलेट बार-बार उनकी कलाई से उतर जाता था और आखिर तंग आकर उन्होंने इसे उतार कर रख दिया था. कमरा साफ़ करते हुए अचानक एक दिन एलोईस ने इस ब्रेसलेट को देखा और अपनी कलाई में पहन लिया. उनकी मां ने यह देख अपनी खुशी ज़ाहिर की और यह उम्मीद भी जताई कि किसी दिन एलोईस भी इसे अपनी संतान को हस्तांतरित कर देगी. इसके कुछ ही महीनों बाद एलोईस की मां रोज़मरी का देहांत हो गया. लेकिन उस ब्रेसलेट में जाने क्या कशिश थी कि तब से कभी भी एलोईस ने उसे अपनी कलाई से नहीं उतारा. शायद आभूषण भी हमें अपनों से जोड़े रखने का एक सशक्त माध्यम होते हैं. ख़ास तौर से वे आभूषण जो हमें विरासत में प्राप्त होते हैं.

तो, जैसे ही एलोईस को यह भान हुआ कि वह बेशकीमती ब्रेसलेट उनसे ज़ुदा हो गया है, उनके पैरों तले की ज़मीन ही खिसक गई. हॉंग कॉंग में जन्मीं मां से  ब्रिटेन में पली बढ़ी उसकी बेटी को जो ब्रेसलेट प्राप्त हुआ था वह किरगिज़स्तान के बियाबान में कहीं खो गया था. वे अपनी सूनी कलाई को बार-बार देखतीं और महसूस करतीं कि उनके अस्तित्व का एक भाग उनसे ज़ुदा हो गया है. असल में वह ब्रेसलेट उनकी उस मां की एक और अंतिम  भौतिक निशानी था जो अब केवल स्मृतियों में शेष  रह गई  थीं. लेकिन अनहोनी तो हो ही चुकी थी. जितना वे खोज सकती थीं, उतना खोजा भी, लेकिन ब्रेसलेट नहीं मिला. बहुत भारी और उदास मन से जैसे-तैसे उन्होंने अपनी यात्रा पूरी की. और फिर लौट आईं अपने देश में अपने घर.

कुछ सप्ताह बाद अप्रत्याशित कुछ हुआ. उन्हें फेसबुक पर एलामान असानबेव का एक संदेश मिला. एलामान किरगिज़स्तान में उनके कई गाइडों में से एक था. उसने अपने संदेश के साथ एक तस्वीर संलग्न की थी, और बस इतना ही लिखा था: “मैं नहीं जानता कि यह वही है भी या नहीं!” लेकिन एलोईस उस तस्वीर को देखते ही जान गई थीं कि यह वही है. वही, यानि उनका खोया हुआ ब्रेसलेट! और जैसे मुर्दे में जान आ जाए, वे एकदम से खिल उठीं. लेकिन अब एक और बड़ा सवाल उनके सामने था. सुदूर किरगिज़स्तान से वो ब्रेसलेट मंगवाया कैसे जाए? डाक सेवाओं पर उनको ज़्यादा भरोसा नहीं था, और जब उन्होंने  कूरियर से मंग़वाने के बारे में सोचा तो यह बात याद आई कि तमाम कूरियर कम्पनियां यह हिदायत देती हैं  कि उनके माध्यम से कीमती आभूषण आदि न भेजे जाएं. उन्होंने इस सम्भावना को भी खंगाला कि कोई परिचित मिल जाए जो किरगिज़स्तान से आ रहा हो तो उसे यह कष्ट दे दिया जाए, लेकिन ऐसी कोई सम्भावना बनी नहीं. फिर तो एक ही विकल्प बचा था, कि वे खुद वहां जाकर उस ब्रेसलेट को लातीं. एक सुखद संयोग यह और बन गया कि नवम्बर में फ्लाइट्स सस्ती हो जाती हैं, तो इसका फायदा  उठाकर  वे खुद ही लंदन से मॉस्को होती हुईं किरगिज़स्तान की राजधानी जा पहुंची और वहां से छह घण्टे की सड़क यात्रा कर उस कम्पनी के दफ्तर में पहुंच गई जिसने उसे वो गाइड उपलब्ध कराया था. कम्पनी के मैनेजर ने उक्त एलामान असानबेव को बुलवा भेजा, और जैसे ही वह आया, उसने यह कहते हुए कि “यह रहा” एलोईस को  वो ब्रेसलेट थमा दिया! एलामान उस मैनेजर को अपनी स्थनीय बोली  में कुछ बता रहा था, जिसमें से एलोईस को सिर्फ एक शब्द समझ में आया था‌ टॉयलेट! यानि वो ब्रेसलेट उसे टॉयलेट के आस-पास से मिला था.

कल्पना कीजिए कि कैसा रहा होगा वह क्षण एलोईस के लिए! वे बार-बार उस ब्रेसलेट को देख रही थीं,  छू रही थीं और फिर हाथ में पहन कर महसूस कर रही थीं जैसे उनकी अपूर्णता पूर्णता में तबदील हो गई है. इक्कीस घण्टों का सफ़र तै कर जब एलोईस अपने घर लौटीं तो उनका ध्यान इस बात पर गया कि वहां मां की हर तस्वीर में उनकी कलाई में यह ब्रेसलेट मौज़ूद था. उन्हें लगा कि जीवन की सबसे मूल्यवान वस्तु अब उनके पास है! और वे सोच रही थीं कि जब अगली किसी यात्रा पर निकलेंगी तो इस ब्रेसलेट को पहन कर जाएं या नहीं?  

▪▪▪ 
जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 03 जनवरी, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, December 27, 2016

ज़रूरी है सोशल मीडिया पर सक्रियता की अति से बचना

सजीव सम्पर्कों में भरोसा रखने वाले भारतीय समाज के लिए आभासी जगत का सोशल मीडिया अपेक्षाकृत नई परिघटना है, फिर भी इस बात को स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि पारम्परिक भारतीय  समाज ने भी इसे बहुत तेज़ी से अपनाया है. जहां युवा पीढ़ी ने तकनीक पर अपनी अधिक पकड़ की वजह से इस मीडिया का अधिक प्रयोग किया है, गई पीढ़ी के लोग भी इसके प्रयोग में बहुत पीछे नहीं हैं. मेरे इस प्रयोग गई पीढ़ीको अन्यथा न लिया जाए, मैं खुद इसी पीढ़ी से ताल्लुक रखता हूं. यह प्रयोग केवल शरारतन किया गया है. सोशल मीडिया के तमाम मंचों पर भारतीय सक्रियता देखी जा सकती है. जहां इन मंचों पर सक्रिय लोग इनकी उपादेयता को लेकर आश्वस्त हैं, वहीं अनेक विचारशील लोग और वे लोग जो इनसे दूरी बनाए हुए हैं, न केवल इनकी उपादेयता पर सवाल उठाते हैं, इनके दुष्प्रभावों को लेकर भी चिंतित पाए जाते हैं. सोशल मीडिया को लेकर सबसे बड़ी शिकायत तो इसके आभासी चरित्र की वजह से ही की जाती है. यानि यहां जो होता है वो होकर भी नहीं होता. आपके सौ दौ सौ मित्र यहां होते हैं,लेकिन वे असल में मित्र होते  ही  नहीं. एक बहु प्रचलित लतीफे को याद किया जा सकता है कि एक ऐसा व्यक्ति जिसके फेसबुक पर चार हज़ार मित्र थे, जब अपनी अंतिम यात्रा पर निकला तो उसकी अर्थी उठाने वाले चार कंधे भी बड़ी मुश्क़िल से जुटाए जा सके.

इधर अपने देश में सोशल मीडिया पर सामाजिक-राजनीतिक सक्रियता भी खूब देखी जाती है. लोग घर से निकले बग़ैर ही इस मीडिया के मंच पर भारी भारी क्रांतियां कर रहे हैं. अब तो विरोध-प्रदर्शन  और एकजुटता के दिखावे के लिए किसी सार्वजनिक जगह पर जाकर मोमबत्ती  जलाने की भी ज़रूरत नहीं रह गई है. तकनीक की मेहरबानी से आप अपने कम्प्यूटर, लैपटॉप, डेस्कटॉप या मोबाइल पर ही मोमबत्ती जला लेते हैं. इस मीडिया की महत्ता और ताकत को हमारे राजनीतिज्ञों और दलों ने भी समझा और इसका अपने-अपने हित में इस्तेमाल किया है. पिछले चुनाव के बाद देश के हर महत्वपूर्ण राजनीतिक दल ने सोशल मीडिया पर अपनी सक्रियता बढ़ाई है. सरकार ने भी जनता तक अपनी बात पहुंचाने के लिए इसका प्रयोग करना शुरु किया है. इन सकारात्मक बातों के साथ-साथ, कहा जाता है कि विभिन्न राजनीतिक दलों ने विरोध के स्वरों को कुचलने  के लिए छ्दम प्रयोक्ताओं (ट्रॉल्स) का भी प्रयोग करना शुरु किया है. सोशल  मीडिया पर सक्रिय इस प्रजाति  के प्राणी अपनी हिंसक, अभद्र, आक्रामक  और प्राय: अश्लील टिप्पणियों से शत्रुओंको क्षत-विक्षत करने का प्रयत्न करते पाए जाते हैं.

यानि सोशल मीडिया का एक हिस्सा है जो सोशल नहीं रह गया है. लेकिन बात सिर्फ इतनी ही नहीं है. भारत के बाहर दुनिया के अन्य देशों में भी सोशल मीडिया के दुष्प्रभावों  पर चिंता होने लगी है. हाल में अमरीका के पिट्सबर्ग  विश्वविद्यालय के सेण्टर फॉर रिसर्च ऑन मीडिया, टेक्नोलॉजी  एण्ड हेल्थ ने अपने एक अध्ययन में पाया है कि एकाधिक सोशल मीडिया मंचों पर सक्रिय रहने वालों के अवसाद  और चिंता ग्रस्त होने की आशंका अधिक रहती है. इस अध्ययन में यह बताया गया है कि जो लोग सात से दस तक सोशल मीडिया मंचों पर सक्रिय रहते हैं वे अधिकतम दो मंचों पर सक्रिय रहने वालों की तुलना में तीन गुना ज़्यादा अवसाद ग्रस्त या व्याकुल रहते हैं. अध्ययन में यह जानने का भी प्रयास किया गया कि ऐसा क्यों होता है. असल  में जब कोई अनेक मंचों पर सक्रिय होता है तो वह अपनी छवि को लेकर बहुत व्याकुल हो जाता है और उसका निर्वहन करने की फिक्र उसे अवसाद या व्याकुलता की तरफ ले जाती है. होता यह है कि आप अपने दिन का  प्रारंभ अन्य लोगों से अपनी तुलना करते हुए करते हैं  और महसूस करते हैं कि औरों की तुलना में आप पिछड़ गए हैं.  ऐसा ही हुआ सेन डियागो के एक 33 वर्षीय उद्यमी जैसन  ज़ुक के साथ. विभिन्न  मंचों पर उसने अपने तैंतीस हज़ार फॉलोअर्स तो जुटा लिये लेकिन उसके बाद उसे महसूस होने लगा कि वो इस डिजिटल विश्व में उन  फॉलोअर्स  की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर पा रहा है. और यही बात उसके मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालने लगी. इन मंचों के प्रयोक्ता जानते हैं कि कम लाइक्स का मिलना किस तरह लोगों को चिंतित कर देता है. शायद इन्ही तमाम कारणों से पश्चिम  में तो लोगों को सलाह दी जाने लगी है कि वे तीन से ज़्यादा मंचों पर सक्रिय न रहें, और यह भी कि बीच-बीच में इन मंचों से पूरी तरह अनुपस्थित भी होते रहें. उक्त जैसन ज़ुक को दी गई तीस दिनों के सोशल मीडिया डीटॉक्स की सलाह को इसी संदर्भ में याद कर लेना उपयुक्त होगा.
 ▪▪▪ 
जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अन्तर्गत मंगलवार, 27 दिसम्बर, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख  का मूल पाठ. 

Tuesday, December 20, 2016

टीवी शो में सांसद की जगह नज़र आया एक हैण्डबैग

अपने देश में कभी नेहरु खानदान के कपड़े पेरिस से धुल कर आने की बात उनकी अमीरी के गुणगान के लिए की जाती थी लेकिन बाद में इसी बात को उनकी विलासिता का द्योतक बना कर पेश किया जाने लगा. एक गृह मंत्री जी के बार-बार कपड़े बदलने की चर्चाएं लोक स्मृति से लुप्त भी नहीं हुई थीं कि एक बहुत महंगा और नाम लिखा सूट चर्चाओं के केंद्र में आ गया. लेकिन अगर आप यह सोच कर लज्जित होते रहे हों कि हमारे देश में राजनीति का स्तर नीतियों की बजाय नेताओं के निजी पहनने-ओढ़ने तक उतर आया है तो ज़रा ठहर कर यह वृत्तांत भी पढ़ लीजिए. 
  
बीबीसी वन के लोकप्रिय व्यंग्यात्मक शो हैव आई गोट  न्यूज़ फॉर यू के एक एपीसोड में पैनलिस्ट पॉल मेर्टन के साथ ब्रिटेन की पूर्व काबीना मंत्री और मौज़ूदा सांसद निकी मॉर्गन को शिरकत करनी थीलेकिन उनकी जगह दर्शकों ने देखा उनके चमड़े के भूरे रंग के हैण्डबैग  को. शो के प्रोड्यूसर्स ने पिछली सितम्बर में इस शो के लिए निकी मॉर्गन को अनुबंधित किया था, लेकिन इसी बीच निकी ब्रिटिश प्रधानमंत्री के साथ एक अप्रिय विवाद में उलझ गईं. हुआ यह कि प्रधानमंत्री टेरीज़ा मे ने 995 पाउण्ड कीमत का अमंदा वेकली द्वारा डिज़ाइन किया हुआ लेदर ट्राउज़र पहन कर एक फोटो शूट में हिस्सा लिया तो निकी उन पर यह कहते हुए पिल पड़ीं कि प्रधानमंत्री की इस तरह की विलासितापूर्ण फैशन रुचि उनके निर्वाचन क्षेत्र के लोगों को शायद ही पसंद आए. उन्होंने यह और कह दिया कि मेरे पास कोई लेदर ट्राउज़र नहीं है, और मेरा खयाल है कि मैंने अपने  शादी के जोड़े के सिवा कभी किसी चीज़ पर इतना पैसा नहीं खर्चा है. इस विवाद की चर्चाओं को सोशल मीडिया  तक तो पहुंचना ही था  और वहां इन्हें एक नया नाम मिल गया‌ ट्राउज़र गेट.

इन चर्चाओं के परवान चढ़ने के साथ दो बड़ी बातें हुईं. पहली तो यह कि दस डाउनिंग स्ट्रीट ने निकी मॉर्गन को नकारना शुरु कर दिया. इस टिप्पणी के बाद प्रधानमंत्री जी की जॉइण्ट चीफ़ ऑफ स्टाफ़ सुश्री हिल ने ब्रेक्सिट पर विचार करने के लिए काफी पहले निकी को दिया निमंत्रण वापस ले लिया. ये सुश्री हिल प्रधानमंत्री की गेट कीपरमानी जाती हैं. एक ब्रिटिश अख़बार ने सुश्री हिल का एक टेक्स्ट मैसेज ही छाप दिया जिसमें उन्होंने उसी बैठक में आमंत्रित एक अन्य सज्जन को यह कहा है कि “उस  औरत को नम्बर दस में फिर कभी ना लाया जाए.” नम्बर दस डाउनिंग स्ट्रीट ब्रिटिश प्रधानमंत्री के राजकीय आवास नाम है.  दूसरा काम यह हुआ कि सत्ता पक्ष के खबरियों ने खासी गहन खोज  बीन के बाद यह पता कर लिया कि प्रधानमंत्री जी के महंगे ट्राउज़र की आलोचना करने वाली निकी मॉर्गन भी महंगी चीज़ों से परहेज़ नहीं करती हैं. इन लोगों ने एक तस्वीर खोज निकाली जिसमें निकी मॉर्गन के हाथ में एक खासे महंगे और लक्ज़री ब्राण्ड मलबरी का बैग है जिसकी कीमत प्रधानमंत्री जी द्वारा पहने गए ट्राउज़र की कीमत से महज़ 45 पौण्ड कम यानि 950 पाउण्ड बताई गई. जैसा कि इन सारे प्रकरणों में होता है, निकी मॉर्गन के एक नज़दीकी सूत्र ने तुरंत इस खबर का खण्डन यह कहते हुए कर दिया कि यह बैग हाल का नहीं बल्कि एक दशक पुराना है, और इसे निकी ने खुद नहीं खरीदा था, बल्कि यह उन्हें भेंट में मिला था. लेकिन विवाद इतने पर कैसे थम सकता था? इस पक्ष ने यह बात भी खोज निकाली कि टेरीज़ा मे  ने लक्ज़री लेग्स नामक एक कम्पनी से 140 पाउण्ड मूल्य के वस्त्र बलात लिये थे.  सरकारी दस्तावेज़ों को खंगाल कर यह भी पता लगा लिया गया कि उन्होंने इंग्लैण्ड  और पाकिस्तान के बीच हुए एक दिवसीय क्रिकेट  मैच के लिए दो टिकिट स्वीकार किये थे, वे बीबीसी प्रॉम्स में भी गई थीं और उन्होंने एक दक्षिण पंथी अख़बार और प्रेस बैरन की तरफ से आयोजित डिनर का निमंत्रण भी स्वीकार किया था. सरकारी विवरणों को टटोलकर इतना तक जान लिया गया कि टेरीज़ा मे हेलीकन डेज़ नामक एक कम्पनी से एक डिज़ाइनर स्कार्फ़ बतौर  उपहार स्वीकार कर चुकी हैं.

माननीय प्रधानमंत्री जी पर इतने प्रहार करने वाली निकी मॉर्गन की बजाय अगर बीबीसी वन के शो में दर्शकों को उनके हैण्डबैग के दर्शन कर संतुष्ट होना पड़ा तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए. लेकिन हम निकी मॉर्गन के हास्य बोध की दाद ज़रूर देंगे जिन्होंने यह कह कर कि अगर शो वालों ने उनसे मांगा होता तो वे खुद उन्हें अपना बैग दान में दे देतीं अपनी टाँग तो ऊपर रख ही  ली है. प्रशंसा उनके इस संयम की भी की जानी चाहिए कि उन्होंने बजाय कोई अप्रिय बात कहने के मात्र यह कहा है कि वे इस शो से अप्रत्याशित परिस्थितियों की वजह से अनुपस्थित हैं.

▪▪▪  
जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अनत्रगत मंगलवार, 20 दिसम्बर, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, December 13, 2016

मानवाधिकारों के मलबे पर स्वास्थ्य का नाच!

सुदूर तुर्कमेनिस्तान में वहां के राष्ट्रपति महोदय ने पूरे-दमखम के साथ अपने देश को स्वस्थ बनाने का एक अभियान छेड़  रखा है. सारी सरकार  फिटनेस का प्रचार करने और देश को धूम्रपान मुक्त बनाने के प्रयासों में जुटी है. विश्व स्वास्थ्य संगठन तक ने सरकार के इस प्रयास को सराहा है और देश में धूम्रपान घटाने के प्रयासों की सराहना स्वरूप एक प्रमाण पत्र भी प्रदान किया है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अध्यक्ष के पास खड़े मुस्कुराते हुए राष्ट्रपति महोदय की एक तस्वीर जिसमें उन्होंने उक्त प्रमाण पत्र और एक मेडल हाथ में ले रखा है, पूरे देश में हर कहीं देखी जा सकती है. लगता है जैसे राष्ट्रपति  महोदय अपने अदृश्य विरोधियों से कह रहे हैं कि देख लो, अब तो अंतर्राष्ट्रीय संस्था ने भी  हमारे प्रयासों को मान्यता दे दी है!

तो क्या राष्ट्रपति महोदय को इस नेक काम के लिए भी अपने विरोधियों की आलोचनाओं का शिकार होना पड़ रहा है? जिन्हें तुर्कमेनिस्तान के बारे में तनिक भी जानकारी है वे इस बात से भली-भांति परिचित होंगे कि इस देश की गणना दुनिया के सबसे अधिक दमनात्मक देशों में होती है और वहां के वर्तमान राष्ट्रपति गुरबानगुली बेर्दीमुहम्मदोव का मानवाधिकार विषयक रिकॉर्ड यह है कि उनके शासन काल में यह देश इस लिहाज़ से दुनिया के निकृष्टतम  देशों में शुमार किया जाने लगा है. लेकिन राष्ट्रपति महोदय नहीं चाहते कि कोई उनके देश में हो रहे मानवाधिकारों  के हनन पर बात तक करे. वे इस मुद्दे पर भी कोई चर्चा करना पसंद नहीं करते कि क्यों उनके आलोचक जेलों से अचानक गायबहो जाते हैं. तो ऐसे राष्ट्रपति महोदय ने अपने देश को स्वस्थ बनाने का यह अभियान चला रखा है और देशवासियों को उनका स्पष्ट संदेश है कि या तो वे उनके अभियान को खुशी-खुशी स्वीकार कर लें और या फिर अपने मुंह बंद रखें. भय उनकी शासन शैली का सबसे मुख्य तत्व है. एक विदेशी पत्रकार ने लिखा है कि उसने तुर्कमेनिस्तान की राजधानी की खूब चौड़ी लेकिन सुनसान सड़कों  का दौरा किया और पाया कि खूबसूरत फव्वारों से सजी संगमरमर की खूबसूरत इमारतों वाले  उस शहर की सारी सड़कें सुनसान पड़ी थीं. लेकिन इसके बावज़ूद उसे लगा कि उसकी हर गतिविधि पर नज़र रखी जा रही थी. जैसे ही उसने तस्वीरें लेने के वास्ते अपना कैमरा निकाला, जाने  कहां से वाकी-टॉकी थामे एक अधिकारी प्रकट हुआ और उसने स्थानीय भाषा में उस पर अपनी नाराज़गी का इज़हार किया और वहां से नौ दो ग्यारह हो जाने को कहा.  पत्रकार कहता है कि उसका लहज़ा ऐसा था कि मेरे पास उसके आदेश का पालन करने के सिवा और कोई चारा ही नहीं था.

ऐसे राष्ट्रपति महोदय ने वहां हेल्थ एण्ड हैप्पीनेसका यह जो अभियान चला रखा है उसकी सराहना और समर्थन की ही आवाज़ें और छवियां सामने आती हैं. ज़ाहिर है कि इससे भिन्न की न किसी को इजाज़त है और न किसी की हिम्मत. हाल में वहां स्वास्थ्य माह मनाया गया जिसमें सरकारी कर्मचारी सार्वजनिक जगहों पर प्रात:कालीन व्यायाम करते प्रदर्शित किये गए, सरकारी टेलीविज़न पर मज़दूरों, बाबुओं, अफसरों और संसद और मंत्रालय के कर्मचारियों को उत्साहपूर्वकइस अभियान में भागीदारी करते बार-बार दिखाया गया.  यह जानने की कोशिश करना बेमानी होगा कि क्या यह सब वे स्वेच्छा से कर रहे थे?  सरकारी टीवी पर खुद राष्ट्रपति महोदय को  स्वास्थ्य प्रचार रैलियों में साइकिल चलाते और जिम में कसरत करते दिखाया जाता है और आम  लोग राष्ट्रपति जी की मंशा की सराहना करते नहीं थकते हैं. टीवी पर विदेशी सिगरेटों की होली जलाने के दृश्य भी खूब दिखाये जाते हैं.

तुर्कमेनिस्तान के अतीत से परिचित लोग इन राष्ट्रपति महोदय का एक प्रसंग अकसर दबी ज़ुबान से सुनाते हैं. राष्ट्रपति जी घुड़दौड़ के शौकीन ही नहीं हैं, यदा-कदा वे खुद इसमें हिस्सा भी लेते हैं. कई बरस पहले ऐसी ही एक घुड़दौड़ में जब वे हिस्सा ले रहे थे तो घोड़ा गिर पड़ा और उस पर सवार महामहिम भी धरती पर गिर पड़े. सारा मंज़र कैमरों में कैद हो रहा था. अचानक एक सुरक्षा अधिकारी खड़ा हुआ और चिल्लाकर बोला, कैमरे बंद कर दें. इसके बाद वहां मौज़ूद सभी छायाकारों के कैमरों को खंगाला गया, और इस रिकॉर्डिंग  को मिटाने के बाद ही उन्हें वहां से जाने दिया गया. इसके बाद टीवी पर मात्र यह दिखाया गया कि महामहिम ने एक रेस में भाग लिया था. इन दिनों तुर्कमेनिस्तान में इस प्रसंग का ज़िक्र इस टिप्पणी के साथ किया जाता है कि जैसे इस खबर में से एक अप्रिय प्रसंग को काट कर इसे दिखाया गया उसी तरह आजकल वहां के कुरूप यथार्थ की छवियों को मिटाकर इस स्वास्थ्य अभियान को प्रचारित किया जा रहा है. 
 ▪▪▪  
जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 13 दिसम्बर, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, December 6, 2016

सर्जनात्मक गतिविधियां ज़रूरी हैं बेहतरी के लिए

अकादमिक दुनिया में हर दिन नई शोध होती है और बहुत दफा हम पाते हैं कि अब तक हमारा जो सोच था उसे नई शोध ने ग़लत साबित कर दिया है. वैसे यह कोई नई बात भी नहीं है. बहुत पहले से ऐसा होता रहा है. यह बात मानव की वैचारिक गतिशीलता को रेखांकित करती है. हमारी सबसे बड़ी ताकत ही यह है कि हम नई जानकारियां मिलने या नए तथ्य सामने आने पर अपनी पहले बनी हुई धारणाओं को बदलने को तैयार हो जाते हैं. बेशक जीवन के कुछ पक्षों और मानव जाति के कुछ पॉकेट्स में भयंकर रूढि‌बद्धता भी है जहां न केवल किसी बदलाव की कल्पना तक दुश्वार है, उसकी चर्चा तक का सामना भीषण आक्रामकता के साथ किया जाता है. लेकिन  मोटे तौर पर मानवता बहुत खुले मन से नए विचारों को स्वीकार करती है. बदलाव का यह सहज स्वीकार ही मानव जाति के उत्थान का उत्प्रेरक  भी है.

मनोविज्ञान की दुनिया में अब तक यह  माना जाता रहा है कि अगर किसी व्यक्ति के मन में सकारात्मक भाव (तकनीकी शब्दावली में पी.ए. पॉज़िटिव अफेक्ट) मौज़ूद हों तो  उसकी सर्जनात्मता बढ़ जाती है. हम सब भी ऐसा ही मानते रहे हैं.  लेकिन अब न्यूज़ीलैण्ड के ओटागो  विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग के शोधार्थियों ने तेरह दिन तक 658 विद्यार्थियों के क्रियाकलाप का गहन अध्ययन करने के बाद यह कहा है कि अगर कोई व्यक्ति किसी दिन अधिक सर्जनात्मक गतिविधियों में रत रहता है तो अगले दिन वह अन्य दिनों की तुलना में ज़्यादा उत्साह और अधिक प्रफुल्लता का अनुभव करता है. इस शोध ने अब  तक प्रचलित धारणा को सर के बल खड़ा कर दिया है. डॉ तामलिन कॉनर के नेतृत्व में की गई  इस शोध को इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है कि इसने सकारात्मक भाव से सर्जनात्मकता में वृद्धि के विचार के विपरीत जाकर सर्जनात्मकता से सकारात्मकता की वृद्धि की अवधारणा  को स्थापित किया है. अगर शांत मन से सोचें तो यह निष्कर्ष सही भी प्रतीत होता है. जब हम खुद को किसी सर्जनात्मक कर्म में डुबो लेते हैं तो न सिर्फ शांति का अनुभव करते हैं,   उत्फुल्लित  भी महसूस करते हैं. जब भी कोई इस तरह के किसी काम में अपने आप को व्यस्त करता है, उसका तनाव खुद-ब-खुद दूर हो जाता है, उसे अपने नकारात्मक विचारों से मुक्ति मिल जाती है और वो मानसिक रूप से बेहतर अनुभव करने लग जाता है. यह हम सबके साथ होता है. विश्वास न हो तो इसे आज़मा कर भी देख सकते हैं. तो ऐसे में यह मानना उपयुक्त होगा कि  डॉ तामलिन कॉनर अपने शिधार्थियों के शोध के बाद जिस नतीज़े पर पहुंची हैं वो तर्कसंगत है.

ओटागो विश्वविद्यालय के इस शोध कार्य में हालांकि शोधार्थियों ने उक्त 658 विद्यार्थियों से औपचारिक रूप से तो यह नहीं पूछा था कि उन्होंने कौन-कौन-सी सर्जनात्मक गतिविधियों में भाग लिया, इससे पहले किए गए एक अध्ययन में अनौपचारिक रूप से यह जानने का प्रयास किया गया था कि लोग क्या-क्या सर्जनात्मक काम करते हैं. उसी अध्ययन में यह बात पता चली थी कि गाने लिखना, कविता कहानी जैसा सर्जनात्मक लेखन करना सर्वाधिक लोकप्रिय है. सर्जनात्मक काम के कुछ अन्य उदाहरण हैं किसी भी तरह की चित्रकला या कलाकृति का निर्माण जैसे रेखांकन, तस्वीर बनाना, यहां तक कि ग्राफिक या डिजिटल कला में रत होना, सांगीतिक कला में निमग्न होना अर्थात गाना या बजाना, और अगर उदार होकर सोचें तो कलाकारी का क्षेत्र इनसे भी काफी आगे तक बढ़ जाएगा, मसलन रसोई घर में जाकर कोई नई पाक विधि आज़माना या कोई उम्दा डिश बनाना, स्वेटर बुनना, कशीदाकारी करना या क्रोशिए का काम करना आदि.

ओटागो विश्वविद्यालय का यह शोध-अध्ययन एक प्रतिष्ठित पत्रिका द जर्नल ऑफ पॉज़िटिव साइकोलॉजीमें प्रकाशित हुआ है और इसके साथ दी गई टिप्पणी में सही ही कहा गया है कि “कुल मिलाकर इस अध्ययन से  सकारात्मक मनोवैज्ञानिक क्रियाकलापों के उन्नयन के लिए रोज़मर्रा के सर्जनात्मक कर्म के निरंतर बढ़ते जा रहे स्वीकरण की पुष्टि ही होती है.” यहीं यह याद कर लेना भी अप्रासंगिक नहीं होगा कि अपने देश में भी शिक्षण संस्थाओं में सांस्कृतिक कार्यकर्मों के प्रोत्साहन के मूल में यही भाव विद्यमान रहा है, हालांकि धीरे-धीरे सांस्कृतिक कार्यक्रम एक रस्म अदायगी बन कर रह गए या उनके स्वरूप में बहुत सारी विकृतियां आ गईं. यह बात भी याद की जानी चाहिए कि देश के श्रेष्ठतम शिक्षण संस्थानों जैसे आई आई टी वगैरह में बाकायदा सर्जनात्मक लेखन विभाग होते हैं और स्पिक मैके जैसी संस्थाएं शिक्षण संस्थाओं में शास्त्रीय संगीत की प्रस्तुतियां करवाती हैं. इन सबसे भी इस शोध कार्य के निष्कर्षों की पुष्टि  ही होती है.

▪▪▪
जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 06 दिसम्बर, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 
  

Tuesday, November 29, 2016

इटली में होटल में ठहरें मुफ्त में. शर्तें लागू!

विकट समय में एक अच्छी ख़बर. इटली में कुछ होटल आपको अपने यहां मुफ्त में ठहरने का ऑफर  दे रहे हैं. लेकिन आप वहां जाने के लिए तैयारियां शुरु करें उससे पहले बारीक लिखावट वाली कुछ शर्तों को जान लेना आपके हित में  होगा. पहली बात तो यह कि यह सुविधा इटली के सारे होटल नहीं दे रहे हैं. दूसरी बात यह कि इस सुविधा के साथ एक और ख़ास शर्त जुड़ी है. शर्त यह है कि होटल  में ठहरने वाले युगल को नौ माह बाद अपने यहां शिशु जन्म का प्रमाण पत्र देना होगा. अगर वह सही पाया गया तो अभी जितने समय आप होटल में रुके हैं उतने ही समय फिर से निशुल्क रुक सकेंगे या अभी आपने जो भुगतान किया है वह आपको लौटा दिया जाएगा. और यह सुविधा इटली के एक शहर असीसी के होटल असोसिएशन द्वारा वहां के दस चुनिंदा होटलों में ठहरने पर ही देय होगी. यहीं यह भी बताता चलूं कि इटली में इन दिनों औसतन एक डबल बेड रूम का किराया करीब सौ यूरो होता है. भारत में फिलहाल एक यूरो करीब सत्तर रुपये का है. इससे आप होने वाली बचत का अनुमान लगा सकेंगे.  

असल में इटली इस समय अनेक बड़ी समस्याओं से जूझ रहा है. कहा जा रहा है कि वहां जन्म दर बहुत तेज़ी से घटती जा रही है. सन 1960 की तुलना में यह घट कर आधी ही रह गई है. माना  जा रहा है कि एक राष्ट्र के रूप में इटली के एकीकरण के बाद से पिछले बरस वहां जन्म दर अपने न्यूनतम पर थी. औसतन इटली की स्त्रियां 1.39 शिशुओं को जन्म देती हैं जो यूरोपीय संघ के 1.58 वाले औसत से काफी कम है. यह अनुमान लगाया गया है कि अगर यही रुझान बना रहा तो अगले दस सालों में वहां सन 2010 की तुलना में लगभग साढे तीन लाख यानि चालीस प्रतिशत शिशु कम जन्म लेंगे. इस स्थिति को ‘जनसांख्यिक  कयामत’  का नाम दिया गया है. और इसी सम्भावित कयामत का सामना करने के लिए असीसी शहर के होटल मालिकों ने हाल में यह  ‘फर्टिलिटी  रूम’  नामक अभियान शुरु किया है. इस अभियान के तहत दिये जाने वाले कमरों में मोमबत्तियां, पुष्प और संगीत जैसी रोमाण्टिक सुविधाएं भी प्रदान की जा रही हैं.  होटल संगठन के  एक प्रवक्ता का कहना है कि “किसी शिशु को जन्म देना प्रेम की गहनतम अभिव्यक्ति है और हमें जीवन की बहुत सारी कठिनाइयों के बावज़ूद इसको  प्रोत्साहित करना चाहिए.” उन्होंने आपने इस अभियान के लिए नारा भी बनाया है: “कम टू असीसी. टुगेदर.” 

लेकिन असीसी के होटल व्यवसाइयों का यह नेक इरादा बहुतों को पसंद नहीं भी आया है. कुछ को लग रहा है कि यह अभियान असीसी शहर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक छवि के अनुरूप नहीं है. यह नगर पोप फ्रांसिस की जन्मभूमि के रूप में भी जाना जाता है. लोगों की इस नापसंदगी  ने स्थानीय प्रशासन को भी इस अभियान से दूरी बरतने को मज़बूर कर दिया और वहां के एक काउंसिलर को बाकायदा बयान ज़ारी कर कहना पड़ा कि वे इस बात का पता लगाएंगे कि कहीं यह अभियान असीसी की छवि को आहत तो नहीं कर रहा है. इसी संदर्भ में यह भी याद किया जा सकता है कि कुछ समय पहले इटली के स्वास्थ्य मंत्री महोदय को भी इसी समस्या का सामना करने के लिए 22 सितम्बर को ‘फर्टिलिटी दिवस’ मनाने के लिए ज़ारी किए गए पोस्टरों को वापस लेने को मज़बूर कर दिया था क्योंकि लोगों ने उन्हें असंवेदनशील और उन स्त्रियों के खिलाफ़ माना था जो किसी कारण गर्भ धारण कर पाने में असमर्थ हैं. 

वैसे इटली में जन्म दर में यह गिरावट अकारण नहीं है. वहां की आर्थिक अनिश्चितता  और  अत्यधिक बेरोज़गारी इसके मूल में है. हालांकि यह बात भी सही है कि बेरोज़गारी के हालात अब कुछ सुधरने लगे हैं. फिर भी स्थिति काफी चिंताजनक बनी हुई है. इसी बेरोज़गारी के चलते अनेक यूरोपीय देशों की तरह यहां भी ‘नो चाइल्ड बेनेफिट’  योजना लागू है.  कामकाजी महिलाओं पर यह खतरा भी मण्डराता रहता है कि अगर वे मां बन गईं तो उन्हें अपनी  नौकरी से हाथ धोना पड़ सकता है. इटली में कामकाजी महिलाओं के लिए उनके शिशुओं की देखभाल की सुविधाएं  भी बहुत कम हैं. ये ही कारण इस बात  के भी मूल में है कि वहां स्त्रियां अपने मातृत्व को स्थगित करने लगी हैं और सन 2002 से 2012 के बीच चालीस  बरस से अधिक की आयु में मां बनने वाली स्त्रियों की संख्या दुगुनी हो गई है. औसतन वहां स्त्रियां इकत्तीस बरस  सात माह की आयु में पहली दफा मां बन रही हैं. 
सारी दुनिया गहरी दिलचस्पी से इस बात को देख रही है कि विषम आर्थिक परिस्थितियों के बीच घटती जन्म दर की समस्या का सामना इटली जैसा परम्परा प्रेमी  देश कैसे करता है! 

▪▪▪
जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 29 नवम्बर, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.

Tuesday, November 22, 2016

हर कोई त्रस्त है डिजिटल दुनिया के नए वायरस से

आजकल डिजिटल दुनिया में एक वायरस ने सबके नाकों में दम कर रखा है. उस वायरस  का नाम है –फ़ेक न्यूज़. यानि मिथ्या समाचार. यह वायरस इतना अधिक फैल चुका है कि लोग बरबस एक पुरानी कहावत को फिर से याद करने लगे हैं. कहावत है – झूठ तेज़ रफ़्तार  से दौड़ता है जबकि सच लंगड़ाता हुआ उसका पीछा  करने की कोशिश करता है.  हाल में सम्पन्न हुए अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव के दौरान भी ऐसा ही  हुआ, और खूब हुआ. सामाजिक मीडिया पर यह बात खूब चली कि पोप फ्रांसिस ने डोनाल्ड ट्रम्प का समर्थन किया है, या कि लोकप्रिय मतदान में ट्रम्प महाशय हिलेरी क्लिण्टन से आगे चल रहे हैं. कहना अनावश्यक है कि ये ख़बरें आधारहीन  थीं. लेकिन इन और इनकी तरह की अन्य ख़बरों के प्रसार का आलम यह था कि अमरीका में समाचारों का विश्लेषण करने वाली एक संस्था को यह कहना पड़ा कि फेसबुक पर बीस शीर्षस्थ वास्तविक और प्रमाणिक खबरों की तुलना में बीस शीर्षस्थ मिथ्या खबरों को शेयर्स, लाइक्स और कमेण्ट्स के रूप में अधिक समर्थन हासिल हुआ. आम तौर पर माना जाता है कि इस तरह की मिथ्या खबरों को फैलाने का काम या तो कुछ लालची स्कैमर्स करते हैं और या फिर भोले-भाले नासमझ लोग. लेकिन अमरीका में तो विभिन्न प्रत्याशियों और निर्वाचित जन प्रतिनिधियों को भी इस तरह की आधारहीन खबरों को फैलाते हुए पाया गया है. मसलन नेब्रास्का के एक रिपब्लिकन सीनेटर ने हाल में ट्वीट करके कहा कि कुछ लोगों को पैसे देकर उनसे ट्रम्प के खिलाफ दंगे करवाए गए. यह एक झूठ था जिसे जान-बूझकर प्रचारित किया गया था. इस तरह की अनेक झूठी खबरों के निर्माता एक व्यक्ति ने तो वॉशिंगटन पोस्ट में यह बात लिख ही दी कि उसकी रची हुई बहुत सारी क्लिण्टन विरोधी खबरों को, बिना उनकी उनकी प्रमणिकता जांचे,  ट्रम्प के समर्थकों और उनके चुनाव अभियान के आयोजकों ने बढ़ चढ़कर प्रसारित किया. इस लेखक ने यह भी कयास लगाया है कि उसके  द्वारा रची गई इन मिथ्या  खबरों का भी रिपब्लिकन विजय में कुछ न कुछ योगदान अवश्य रहा है. 

लेकिन विचारणीय  बात यह है कि क्या झूठ के इस फैलाव के लिए सिर्फ इनके निर्माता ज़िम्मेदार हैं, या कि कुछ ज़िम्मेदारी उस सोशल मीडिया की भी है जिसके मंच का इस्तेमाल झूठ के फैलाव के लिए किया जाता है. यहीं यह बात भी याद कर लेना  उचित होगा कि सामाजिक मीडिया के मंचों के माध्यम से झूठ के प्रचार-प्रसार का यह कारोबार केवल अमरीका में ही नहीं चल रहा है. म्यांमार जैसे देश में शरारतपूर्ण खबरों की वजह से जातीय हिंसा फैलाई गई तो इण्डोनेशिया, फिलीपींस वगैरह में चुनाव जीतने के लिए इसका इस्तेमाल किया गया. पश्चिमी अफ्रीका में इबोला वायरस  के बारे में झूठ फैलाया गया तो कोलम्बिया में शांति स्थापना प्रयासों के पक्ष में किए जाने वाले जनमत संग्रह के बारे में दुष्प्रचार के लिए इसका इस्तेमाल  किया गया. खुद अपने देश में इसके इस्तेमाल के बारे में कुछ भी लिखना  इसलिए अनावश्यक है कि हम सब उससे भली-भांति परिचित हैं. सच और झूठ के  बीच फर्क़ करना ही मुश्क़िल होता जा रहा है. कभी-कभी तो लगता है कि भूसे के ढेर में जैसे सुई खो जाया करती है वैसे ही झूठ  के ढेर  में सच खो गया है. 

ऐसा वायरस फैलाने से जिनके किसी भी तरह के कोई हित सधते हैं, यानि उन्हें ऐसा करने के लिए पैसा मिलता है या वे अपने पक्ष को सबल करने के उत्साहितिरेक में ऐसा करते हैं, उनको छोड़ शेष लोग तो स्वाभाविक रूप से इस प्रवृत्ति से चिंतित हैं और इसके खिलाफ़ हैं. ऐसे लोगों ने बार-बार सोशल मीडिया के नियंताओं के आगे गुहार लगाकर उनसे मदद भी मांगी है. और ऐसा भी नहीं है कि वे लोग इस बार में हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं. मार्क ज़ुकरबर्ग ने तो सन 2012 में ही अपने निवेशकों को लिखे एक पत्र में यह कहा था कि वे चाहते हैं कि सोशल मीडिया समाज के उत्थान में सहयोगी बने. अब भी फेसबुक के संचालक झूठ के खिलाफ़ लामबंद हैं. आर्थिक क्षति उठाकर भी वे मिथ्या ख़बरों वाली साइट्स पर फेसबुक पॉवर्ड  विज्ञापन नहीं दे रहे हैं. गूगल वाले भी ऐसा ही कर रहे हैं. इन्हीं गर्मियों में फेसबुक ने तकनीकी रूप से ऐसा करने का भी प्रयास किया है कि हमें अपनी न्यूज़ फ़ीड्स में समाचार संगठनों की फ़ीड्स की तुलना में दोस्तों और परिवार जन की ज़्यादा फ़ीड्स देखने को मिलें. ज़ाहिर है कि इस प्रयास से झूठ के फैलाव को रोकने में कुछ तो कामयाबी हासिल होगी. लेकिन लड़ाई लम्बी है और प्रतिपक्ष बहुत चालाक. 
▪▪▪
जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न  दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 22 नवम्बर, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, November 15, 2016

जो पहले जन्मा वो छोटा और जो बाद में जन्मा वह बड़ा है!

फिल्म 'हिना' का वो गाना याद है ना: 'देर करता नहीं हूं देर हो जाती है.'  सोचता हूं कि अगर इसे बदल कर यों कर दिया जाए कि 'गड़बड़ करता नहीं हूं, गड़बड़ हो जाती है, तो कैसा रहे?'  ना, ना, आप ग़लत न समझें. मैंने कोई गड़बड़ नहीं की है. अलबत्ता सात समुद्र पार के अमरीका में ज़रूर एक मज़ेदार गड़बड़ हो गई. उसी का किस्सा आपको सुनाने के लिए यह भूमिका मैंने बनाई है. पिछले दिनों अमरीका के मैसाचुसेट्स राज्य के एक कस्बे के अस्पताल में एक अजीबोगरीब स्थिति पैदा हो गई. इसी छह नवम्बर को अल्लसुबह इस राज्य के एक छोटे-से कस्बे के एक अस्पताल में एमिली और सेठ पीटरसन के परिवार में दो जुड़वां बेटों की आमद हुई. सुबह एक बजकर उनतालीस  मिनिट पर एमिली ने जन्म दिया पांच पाउण्ड के सेम्युअल को, और इसके ठीक इकत्तीस मिनिट बाद इस खूबसूरत दुनिया में अवतरित हुए इनसे चौदह औंस  अधिक वज़न वाले इनके लघु भ्राता रोनान. आप सही गणना कर रहे हैं कि रोनान इस दुनिया में अवतरित हुए ठीक दो बजकर दस मिनिट पर. इस तरह बड़े भाई सैम्युअल हुए और छोटे भाई हुए रोनान.

लेकिन अस्पताल से इनके जन्म के जो प्रमाण पत्र ज़ारी हुए उनमें सैम्युअल के जन्म का समय प्रात: 1.39 और रोनान के जन्म का समय प्रात: 1.10 अंकित किया गया. अगर आप सोच रहे हैं कि ऐसा उलटफेर अस्पताल के किसी कर्मचारी की चूक  की वजह से हुआ होगा, तो आपको अपने सोच पर पुनर्विचार  करना होगा. आप भी कहेंगे कि इसमें पुनर्विचार की ज़रूरत कहां है? ग़लती तो ग़लती है. लेकिन अब मैं आपको बताता हूं कि यह ग़लती नहीं है.

इस बात  को समझने के लिए हमें उस व्यवस्था को समझना होगा जिससे हम अपरिचित हैं और जो व्यवस्था जो दुनिया के कुछ अन्य देशों की तरह अमरीका के अधिकांश राज्यों में भी चलन में है. व्यवस्था यह है  कि साल के गर्म महीनों की शुरुआत के समय घड़ी की सुइयों को एक घण्टा आगे खिसका दिया जाए. इससे सुबह एक घण्टे  बाद होती है और दिन  एक घण्टे बाद तक बना रहता है. इस व्यवस्था को डे लाइट सेविंग टाइम –संक्षेप में डीएसटी-  कहा जाता है. अमरीका में मार्च के दूसरे रविवार से यह व्यवस्था लागू होती है और नवम्बर के पहले रविवार को समाप्त हो जाती है. राज्य विशेष के स्थानीय समय के अनुसार सुबह दो बजे से इस व्यवस्था की शुरुआत होती है. भारत में ऐसा नहीं होता है, इसलिए हम इस व्यवस्था से अनभिज्ञ हैं. याद रखें कि नवम्बर के पहले रविवार (इस बरस छह नवम्बर को पहला रविवार था) से अमरीका में घड़ी की सुइयां एक घण्टा पीछे कर दी गई थीं. अब शायद यह बात स्पष्ट हो गई हो कि जब सैम्युअल महाशय इस दुनिया में अवतरित हुए तब घड़ी में समय हो रहा था एक बजकर उनतालीस मिनिट. लेकिन जब इसके ठीक इकतीस  मिनिट बाद उनके लघु भ्राता रोनान महाशय ने इस दुनियाँ में पदार्पण किया तब तक अमरीकी डे लाइट सेविंग व्यवस्था के अनुसार वहां की घड़ियों की सुइयां एक घण्टा पीछे की जा चुकी थीं. इसलिए इकतीस  मिनिट बाद दुनिया में पधारने वाले रोनान भइया के जन्म  का समय कागज़ों में अंकित किया गया एक बजकर दस मिनिट. यानि ठीक इकतीस  मिनिट छोटे रोनान अपने ही बड़े भाई सैम्युअल को छोटा साबित करते हुए उनसे  उनतीस मिनिट बड़े बन गए. और वो भी आधिकारिक रूप से. है ना मज़ेदार बात!

इस पूरे मामले का मज़ा लेते हुए इनकी मां, बत्तीस वर्षीया एमिली पीटरसन ने बताया कि उनके पतिदेव उनके पास आकर बोले कि तुम्हारे लिए एक पहेली है! छोटे बड़े की यह उलझन सुनकर एक बार  तो एमिली भी चकरा गई. लेकिन फिर उसे लगा कि इसमें क्यों दिमाग खपाया जाए. लेकिन जब एक दिन बाद ही अस्पताल की नर्स ने उससे कहा कि वो चालीस बरसों से वहां काम कर रही है लेकिन ऐसा वाकया पहली दफा सामने आया है, तो एमिली को भी लगा कि बात है तो ग़ौर  तलब. लेकिन अब वो भी जीवन में आ गई इस उलझन का भरपूर लुत्फ़ ले रही है. एमिली हंसते हुए कहती हैं कि भले ही सैम्युअल और रोनान के बीच छोटे-बड़े की यह उलझन आ खड़ी हुई है, इनकी बड़ी बहन ऑब्रे तो इनसे बड़ी ही है, और बड़ी रहेंगी. मामले का सौहार्द्रपूर्ण पटाक्षेप करती हुई एमिली कहती हैं, "मैं उम्मीद करती हूं कि अपने भावी जीवन में सैम्युअल और रोनान इस बात को लेकर कोई झगड़ा नहीं करेंगे!"  

▪▪▪
जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 15 नवम्बर, 2016 को 'अमरीका में डीएसटी सिस्टम से बड़ा भाई हुआ छोटा' शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.