Tuesday, June 30, 2015

नए व्यापारियों के तौर-तरीके

पिछले दिनों हमारे देश में व्यापार के नए तौर तरीकों को लेकर काफी चर्चाएं हुई हैं. जो लोग पारम्परिक तरीकों से व्यापार करते हैं, उनके हित इन नए खिलाड़ियों के आने से आहत हुए हैं, और इसलिए उनका इनके विरोध में आवाज़ उठाना समझ में आता है. इनसे कुछ शिकायतें सरकार की भी हैं. तौर-तरीके क्योंकि नए हैं इसलिए कुछ तो अस्पष्टताएं हैं और कुछ डण्डी मारने की प्रवृत्ति – जो हमारे स्वभाव का स्वाभाविक हिस्सा है. यह भी कि सरकार अपने नियंत्रक अधिकार और इंस्पेक्टर राज के वर्चस्व को भला क्यों छोड़ दे? कुछ और बातें भी इस बीच हुईं, मसलन एक नई कार टैक्सी सेवा में कुछ जगहों पर महिलाओं से बदसुलूकी हुई, तो इस तरह की सेवाओं के विरोध का माहौल बना.

लेकिन अपने हाल के कुछ अनुभव पहले आपसे साझा कर लूं, फिर इस बात को थोड़ा आगे बढ़ाना चाहूंगा. पिछले कई बरसों से मैं पास की एक दुकान से अण्डरवियर बनियान वगैरह  खरीदता हूं.  दुकानदार से जान-पहचान-सी हो गई है. खरीदरारी न करना हो तब भी उधर से गुज़रते हुए दुआ सलाम हो जाती है. अभी पिछले दिनों उसके पास अण्डरवियर खरीदने गया. साइज़ को लेकर कुछ अनिश्चितता लगी तो मैंने कहा कि मैं भुगतान करके ये चार अण्डरवियर ले जा रहा हूं,  अगर साइज़ को लेकर कोई दिक्कत हुई तो शाम तक लौटा दूंगा. बताता चलूं, उसके यहां ट्रायल रूम जैसी कोई सुविधा नहीं है. उसने कहा कि लौटा मैं भले ही दूं, वो नकद पैसे नहीं लौटायेगा, मुझे उतनी ही या उससे अधिक राशि की खरीदरारी ही करनी होगी. मुझे और कोई चीज़ खरीदनी नहीं थी. उसके अण्डरवियर लौटाए और अन्यत्र चला गया. ध्यान दें कि यहां उत्पाद को पहन कर देखने पर उसकी कोई आपत्ति नहीं थी. अगर होती तो वो कोई और चीज़ देने को क्यों तैयार होता. अब इसी के सामने रख कर देखें मेरा यह अनुभव. अपने वर्तमान ब्रॉडबैण्ड से असंतुष्ट हो मैंने दूसरे प्रदाता की सेवा लेने का फैसला किया. आवेदन की औपचारिकताएं पूरी कर लेने के बाद मुझे सलाह दी गई कि बेहतर हो वायरलेस मॉडेम सह राउटर मैं ही खरीद लूं. फिर वे आकर इंस्टॉलेशन कर देंगे. मैंने एक डॉट कॉम विक्रेता को एक राउटर का ऑर्डर भेज दिया, तीसरे दिन वो राउटर मुझे डिलीवर हो गया, और पांचवें दिन ब्रॉडबैण्ड कम्पनी का तकनीशियन इंस्टॉलेशन करने मेरे घर आ गया. उसने राउटर देखते ही कहा कि यह काम नहीं आएगा.  उससे बात करके मुझे समझ में आया कि मैंने ग़लत उत्पाद मंगवा लिया था. एक बार तो मन खराब हो गया कि ये पैसे बर्बाद हो गए! फिर उस विक्रेता  की साइट पर जाकर देखा तो पाया कि वहां खरीदे  हुए उत्पाद को लौटाने का भी प्रावधान है. बहुत सरल-सी प्रक्रिया पूरी की. ऑनलाइन प्रश्नावली में मुझसे यह तो पूछा गया कि मैं उनका उत्पाद क्यों लौटा रहा हूं लेकिन कोई ना-नुकर नहीं की गई. इतना ही नहीं, उनका आदमी आज सुबह मेरे घर आकर बाकायदा रसीद देकर वो उत्पाद मुझसे ले गया, यानि उसे लौटाने के लिए भी मुझे कोई कष्ट नहीं करना पड़ा. और बड़ा चमत्कार तो यह कि इस बात को बमुश्किल तीन घण्टे बीते हैं कि मेरे पास अपनी पूरी राशि के रिफण्ड होने की सूचना आ गई है.

अब एक अन्य प्रसंग. अभी तीन दिन पहले किसी पारिवारिक प्रसंग में रेल से कहीं जाना हुआ. जैसे ही रेल्वे स्टेशन से बाहर निकले हमेशा की तरह ऑटो  वालों ने घेर लिया. पूछने पर बताया कि मेरे घर तक पहुंचाने का वे एक सौ पचास रुपया लेंगे. जब मैंने कहा कि यह काफी ज़्यादा है तो वे लोग बोले कि हमने आपको सामान का पैसा तो बताया ही नहीं  है,  वो हम अलग चार्ज करते हैं. मुझे ऑटो में आना नहीं था. क्यों आता? विकल्प मुझे मालूम था. एक दिन पहले ही तो मैं घर से स्टेशन गया था. एकदम मुंह अन्धेरे मेरी ट्रेन थी. अपने स्मार्ट फोन पर एप के ज़रिये  टैक्सी कॉल की थी. ठीक साढ़े तीन मिनिट में टैक्सी आ गई थी (जबकि ऑटो बुलाने मुझे थोड़ी दूर जाना पड़ता) और घर से स्टेशन की अठारह मिनिट में पूरी हुई साढ़े आठ किलोमीटर की यात्रा का  बिल छियानवे रुपये का बना था.  कोई मुझे बताए कि एक वातानुकूलित टैक्सी कार आपको जो दूरी छियानवे रुपये में तै करवा रही हो उसी दूरी के लिए आप ऑटो को एक सौ पचास रुपये क्यों देना चाहेंगे?

मेरी सहानुभूति हमेशा बड़े खिलाड़ियों की तुलना में छोटे खिलाड़ियों के प्रति रहती है. बहुत बार यहां तक हुआ है कि ऑटो छोड़कर मैंने रिक्शा पकड़ा है. मॉल की बजाय नुक्कड़ का दुकानदार हमेशा मेरा प्रिय रहा है. लेकिन जब इस तरह के अनुभव होते हैं तो सोचना पड़ता है कि मेरी और मुझ जैसों की सहानुभूति के दम पर ये कब तक टिके रहेंगे?

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अन्तर्गत मंगलवार, 30 जून, 2015 को नए व्यापारियों के तौर-तरीके, अच्छी सेवा से ब्राण्ड बनाना शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, June 23, 2015

क्या ज़रूरी है हरेक के लिए शादी करना?

हाल में हैदराबाद के एक ऑनलाइन डेटिंग पोर्टल ‘क्वैक क्वैक’  ने ‘हैप्पीली सिंगल’ नाम से एक अभियान चलाया जो फेसबुक पर बहुत जल्दी वायरल हो कर लगभग  25 लाख लोगों तक पहुंच चुका है. इस अभियान में बैंगलूर के युवाओं से यह जानने की कोशिश की गई कि उनके मां-बाप क्या-क्या तर्क देकर उन पर शादी के बंधन में बंध जाने का दबाव बनाते हैं. इनमें से अधिकांश तर्क वे हैं जिन्हें  हम अपनी फिल्मों के चिर-परिचित संवादों के रूप में जानने के साथ-साथ अपने इर्द गिर्द भी कई दफा सुन चुके होंगे. ऐसे कुछ तर्कों का आनंद आप भी लीजिए:

अगर तुमने शादी नहीं की तो समाज में तुम्हारे पिता की प्रतिष्ठा मिट्टी में मिल जाएगी./ तुम गैर ज़िम्मेदार और निकम्मे हो. शादी करने से ज़िम्मेदारी आ जाएगी./ जब तक तुम शादी नहीं कर लोगे तुम्हारी छोटी बहिन की भी शादी नहीं होगी./ लड़का अमीर खानदान का है. वो तुम्हें सुखी रखेगा./ मेरे दादाजी की अंतिम इच्छा  यही है कि न सही अपना पड़पोता, कम से कम वे पोते की शादी तो देख लें./ यह शिक्षा कैरियर, बिज़नेस सब बेकार है, अगर तुम्हारा अपना परिवार न हो./ तुम्हें शादी कर लेनी चाहिए क्योंकि हमारे पड़ोसी इस बात को लेकर बहुत बातें बनाने लगे  हैं./ तुम्हारे सारे दोस्तों की शादियां हो गई है, अब तो तुम भी कर  लो./ अपने कज़िन को ही देखो, उसकी शादी हो चुकी है और वो बहुत खुश है./ मेरे मां बाप बूढ़े हो रहे हैं इसलिए वे चाहते हैं कि अब तो मेरी देखभाल करने वाला कोई हो./ वो एक गोरी, खूबसूरत ब्राह्मण लड़की है. तुम्हें भला और क्या चाहिये?/ उम्र गुज़र जाने के बाद तुम्हें कोई लड़का नहीं मिलने वाला./ अगर तुमने देर से शादी की तो तुम्हारे बच्चे नहीं हो पाएंगे./ इससे पहले कि लड़की मुंह काला करवा दे, इसकी शादी कर डालो./ हमने तुम्हारे लिए इतना सब कुछ किया है और तुम हमारी यह एक छोटी-सी तमन्ना भी पूरी नहीं कर सकते?/ और आखिरी और सबसे ज्यादा पॉपुलर कथन है -  लोग क्या कहेंगे?

कहना अनावश्यक है कि इस बदले हुए समय में, जब विवाह की औसत आयु काफी ऊपर जा चुकी है, युवाओं के सपने नई ऊंचाइयां छूने लगे हैं, शिक्षा के प्रसार के साथ-साथ कैरियर से जुड़ी आकांक्षाएं निरंतर बड़ी होती जा रही हैं, जीवन में भौतिक सुख सुविधाओं का महत्व बढ़ता जा रहा है, नैतिकता और दैहिक शुचिता के पुराने मानदण्ड अप्रासंगिक होते जा रहे हैं, युवाओं को अपने मां बाप से इस तरह के संवाद सुनना प्रीतिकर नहीं लगता है. कभी वे बातों को टालते हैं, कभी कम या ज़्यादा कड़ा प्रतिरोध करते हैं, और कभी उनके आगे समर्पण कर अपनी तमन्नाओं का खून भी हो जाने देते  हैं.

लेकिन मैं यह सारी चर्चा यह सवाल उठाने के लिए कर रहा हूं कि क्या विवाह आवश्यक है? और यह कितना उचित है कि मां-बाप अपनी संतान पर दबाव बनाएं या इमोशनल ब्लैक मेल करके उनको विवाह के लिए विवश करें? अब जबकि पढ़े लिखे परिवारों में सामान्यत: ठीक ठाक उम्र हो जाने तक युवा अपनी शादी के बारे में सोचते ही नहीं हैं, यानि तब तक वे खासे परिपक्व भी हो चुके होते हैं, तो फिर उनके शादी करने न करने का फैसला भी क्या उन पर ही नहीं छोड़ दिया जाना चाहिए? और स्पष्ट कहूं कि क्या शादी न करने के विकल्प को भी पारिवारिक और सामाजिक स्वीकृति नहीं मिल जानी चाहिए?

विवाह संस्था के समर्थन में जो तर्क अब तक दिये जाते रहे हैं, हम उनके विस्तार और पक्ष विपक्ष में न जाएं और केवल यह सोचें कि जिस देश में स्त्री-पुरुष अनुपात 943 है और इसमें लगातार गिरावट आती जा रही  है, वहां सबका विवाह तो वैसे ही मुमकिन नहीं है. लेकिन  ज़्यादा महत्व की बात यह है कि क्या अब मां-बाप के दायित्वों और सामाजिक संरचना  को नए सिरे से परिभाषित करने का समय नहीं आ गया है? एक समय था जब मां-बाप अपने बच्चों की शादी करके ही अपने आप को दायित्व मुक्त मानते थे, हालांकि दायित्व  मुक्त होते तब भी नहीं थे. क्या हर्ज़ है अगर अब वे अपने बच्चों को पढ़ा लिखाकर, आत्म निर्भर बना कर उनके जीवन के अन्य निर्णय खुद उन्हें करने के लिए स्वतंत्र छोड़ दें? अब तो कैरियर के मामले में भी यह हो रहा है कि जहां पहले मां-बाप यह कहते थे कि हम अपने बच्चों को ये बनाएंगे और वो बनाएंगे, उनकी जगह आज के समझदार मां-बाप कहने लगे हैं कि हमारे बच्चे जो बनना चाहेंगे वो बनने में हम उनको सहयोग देंगे. ऐसे में अगर कोई युवक या युवती विवाह न करने का फैसला करता है तो क्यों न उस फैसले को भी सहर्ष स्वीकार किया जाए!

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत  मंगलवार, 23 जून, 2015 को 'क्या शादी के लिए ज़रूरी है इमोशनल अत्याचार'  शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.         

Tuesday, June 16, 2015

महिलाएं ही क्यों बदलें अपना नाम

बात काफी पुरानी है. मैं शायद कॉलेज का विद्यार्थी था. एक कवियित्री की कविताएं मुझे बहुत अच्छी लगती थीं. फिर यकायक वे दृश्य से गायब हो गईं. वो मीडिया सक्रियता का ज़माना भी नहीं था कि कुछ पता चलता. फिर कुछ समय बाद एक और कवयित्री अवतरित हुईं जिनका प्रथम नाम वही था, लेकिन कुलनाम या सरनेम  भिन्न था. हमें यह बात पता लगने में काफी समय लग गया कि विवाह के बाद वे अपने पिता के कुलनाम  की जगह पति का कुलनाम  लगाने लगी थीं. वैसे भारतीय समाज में यह बात आम है. लड़कियां विवाह के बाद उस कुलनाम को जिसका प्रयोग वे अब तक कर रही थीं, त्याग कर अपने पति का कुलनाम लगाने लगती हैं.

कलाओं और शो बिज़ की दुनिया में ऐसा नहीं भी होता है. हेमा मालिनी हमेशा हेमा मालिनी ही रहती हैं और आशा भोसले भी आशा बर्मन नहीं हो जाती हैं. याद करें तो साहित्य की दुनिया से भी ऐसे उदाहरण मिल जाएंगे. मन्नू भण्डारी मन्नू यादव नहीं हुईं और न सुधा अरोड़ा सुधा भाटिया बनीं. लेकिन हमारी  सामाजिक व्यवस्था में इन्हें अल्पसंख्यक अपवाद ही माना जाएगा. कई बार तो यह तक होता है कि विवाह के बाद लड़की को इसलिए अपना मूल नाम बदल लेना होता है कि उस नाम वाली कोई लड़की उसके नए परिवार में पहले से मौज़ूद थी.

लेकिन अब आहिस्ता-आहिस्ता यह स्थिति बदल भी रही है. शायद इसकी एक वजह यह भी है कि पहले विवाह कम उम्र में हो जाते थे और तब तक लड़की का अपना कोई व्यक्तित्व विकसित नहीं होता था, इसलिए उसे उसका विलयन नए परिवार में कर डालने में कोई असहजता अनुभव नहीं होती थी. लेकिन अब, जबकि लड़कियां जीवन के अलग-अलग क्षेत्रों में पांव जमा लेने और अपनी हैसियत बना लेने के बाद शादी करने लगी हैं, वे भी इन पुरातन परिपाटियों पर सवाल उठाने, इन्हें चुनौती देने, और कई बार नकारने तक लगी हैं. अमरीका की सिलिकॉन वैली की एक मनोचिकित्सक कैथरीन वेल्ड्स  ठीक ही कहती हैं कि “जैसे-जैसे कामकाजी महिलाओं की संख्या में बढोतरी हुई है उनमें खुद की पहचान बनाने की इच्छा भी बढ़ी है.”   हमें भी अपने आस-पास ऐसी बहुत सारी महिलाएं मिल जाएंगी जिन्होंने या तो विवाह के बाद अपना कुलनाम बदलना ज़रूरी नहीं समझा या पति का कुलनाम अपनाने के बावज़ूद पिता के कुलनाम का भी त्याग नहीं किया. पुरानी परिपाटियों को चुनौती देने या अस्वीकार करने  के और बहुत सारे प्रमाण वेशभूषा और सुहाग चिह्नों के मामलों में भी देखे जा सकते हैं. वही सवाल कि सुहाग चिह्न की अनिवार्यता केवल स्त्री के लिए ही क्यों? 

और इसी सवाल से मुझे याद आई यह बात कि हाल में एक अमरीकी अभिनेत्री ज़ोई साल्डान्या के पति ने अपनी तरह से परम्पराओं को चुनौती दे डाली. उनके पति मार्को पेरेगो ने विवाह के बाद अपना नाम बदलकर मार्को साल्डान्या कर दिया. लेकिन समाज, चाहे वो अमरीका का ही क्यों न हो, भला इस तरह के गैर पारम्परिक क़दमों को आसानी से कहां  स्वीकार करता है? वहां भी मार्को के इस काम की खूब आलोचना हुई, उनका मज़ाक उड़ाया गया. और तब मार्को ने अपने फेसबुक पेज पर इन लोगों को यह जवाब दिया: “इसमें इतनी हैरानी की क्या बात है? क्या इसलिए कि एक आदमी अपनी पत्नी का कुलनाम स्वीकार करेगा?” ख़ास बात तो उन्होंने आगे कही है: “पुरुषों! अपनी पत्नी का कुलनाम ले लेने से आपका वज़ूद ख़त्म नहीं हो जाएगा. बल्कि  इसके साथ ही आप बदलाव के साथ खड़े होने वालों की सूची में याद किए जाएंगे.

और जैसा साहस मार्को ने दिखाया वैसा ही साहस  स्कॉटलैण्ड के ग्लासगो के एक म्यूज़िक प्रमोटर  बेन कॉगहिल ने भी दिखाया. बत्तीस वर्षीय बेन का कहना है कि “मुझे अपनी पत्नी रोवान मार्टिन के नाम का उच्चारण काफी पसन्द है इसलिए  उसे बदल कर मैं  बर्बाद नहीं करना चाहता." उन्होंने यह और कहा कि “यह दिखाता है कि मैं पुरुष प्रधान समाज का विचार नहीं मानता और जो मैं हूं उससे खुश हूं.

लेकिन यह सब कहते हुए मैं इस बात को भी छिपाना नहीं चाहता कि परम्परा से चले आ रहे रीति रिवाज़ों ने हमारी चेतना में बहुत गहरे तक जगह बना रखी है. सन 2013 में एक मेट्रीमोनियल वेबसाइट टॉपनॉट डॉट कॉम ने तेरह हज़ार दुल्हनों पर किए एक सर्वे के बाद बताया था कि अस्सी प्रतिशत महिलाएं अपने पति के कुलनाम को ही अपनाना पसन्द करती हैं. ऐसे में कम से कम मुझे तो बीबीसी के एक प्रोड्यूसर एण्ड्री  ब्राउन का यह क़दम बहुत पसन्द  आया कि  जब उन्होंने हेलेन स्टोन से शादी की तो दोनों के कुलनाम को मिलाकर एक संयुक्त कुलनाम ब्राउनस्टोन्स बनाकर अपने नाम के साथ जोड़ लिया. विवाह अगर दो आत्माओं का मिलन होता है तो दो कुलनामों का भी मिलन क्यों न हो?


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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 16 जून, 2015 को पति ने लगाया पत्नी का सरनेम तो हंगामा क्यों शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.