Tuesday, February 19, 2019

जनसंख्या की कमी से जूझते एक देश की दास्तान


मध्य यूरोप का एक छोटा-सा देश हंगरी इन दिनों एक अजीबो-गरीब संकट से जूझ रहा है. जब मैं अजीबो-गरीब संकट की बात कर रहा हूं तो मेरे मन में अपने देश के हालात भी साथ-साथ चहलकदमी कर रहे हैं. ऑस्ट्रिया, स्लोवेनिया, क्रोएशिया, रोमानिया, सर्बिया और स्लोवाकिया जैसे देशों से चारों तरफ घिरा हुआ यह देश अपने सुदीर्घ इतिहास, उच्च आय वाली मौज़ूदा अर्थ व्यवस्था और बेहद मज़बूत पर्यटन उद्योग के लिए जाना जाता है. हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट की गणना यूरोप के सबसे खूबसूरत शहरों में होती है  और हर बरस कोई 44 लाख लोग यह शहर घूमने आते हैं. इस वजह से इसे यूरोप के छठे सर्वाधिक लोकप्रिय शहर का दर्ज़ा हासिल है.  देश के लोग खूब सुखी हैं. यहां की उन्नत व्यवस्थाओं की वजह से लोगों को बहुत आसानी से स्वच्छ पेयजल सुलभ है और वर्ल्ड हैप्पीनेस  रिपोर्ट में इस देश को 69 वां स्थान प्राप्त है.

आप भी सोच रहे होंगे कि जब सब कुछ इतना अच्छा है तो फिर संकट क्या है? संकट है जनसंख्या का. और इसीलिए मुझे अपना भारत याद आ रहा है. हंगरी का संकट हमसे एकदम उलट है. सन सत्तर से ही यहां की जनसंख्या लगातार घटती जा रही है. कभी इस देश की जनसंख्या एक करोड़ दस लाख थी, वह अब घटकर अट्ठानवे लाख चार हज़ार रह गई है. और यह बात हंगरी की सरकार को बेहद परेशान किए हुए है. प्रधानमंत्री विक्टर ओरबान ने तो यहां तक कह दिया है कि अगले पांच बरसों तक उनकी सरकार का सर्वाधिक महत्वपूर्ण लक्ष्य ही इस जनसंख्या की गिरावट को रोकने का रहेगा. असल में हंगरी की सरकार की चिंता केवल घटती जनसंख्या को लेकर ही नहीं है. समस्या यह भी है कि वहां युवाओं की तुलना में वृद्धों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है. हंगरी में आयु सम्भाव्यता खासी ऊंची यानि 76.1 वर्ष है. विशेषज्ञों का अनुमान है कि बहुत जल्दी यह बढ़कर 86.7 वर्ष तक जा पहुंचेगी. इसकी वजह से सन 1990 में जहां इस देश में प्रति एक हज़ार  शिशु (0-14 वर्ष) चौंसठ साल की उम्र वाले पैंसठ लोग हुआ करते थे, अब उनकी संख्या बढ़कर एक सौ अट्ठाइस तक जा पहुंची है. इसके विपरीत हाल के बरसों में चौदह वर्ष तक के बच्चों की संख्या में बहुत ज़्यादा कमी आई है. ज़ाहिर है इन बदलावों का असर यहां की उत्पादकता पर पड़ रहा है. मेहनत करने वाले युवा घटते जा रहे हैं और बहुत कम काम कर सकने वाले वृद्ध बढ़ते जा रहे हैं.

हाल में संयुक्त राष्ट्र संघ ने विश्व जनसंख्या सम्भावनाओं के संशोधित अनुमान की जो रिपोर्ट प्रकाशित की है उसमें भी इन बदलावों पर चिंता ज़ाहिर करते हुए यह भयावह आशंका व्यक्त की गई है कि अगर कोई बड़ा चमत्कार न हुआ तो इस शताब्दी के आखिर तक केंद्रीय और  मध्य यूरोप की पूरी जनसंख्या ही विलुप्त हो जाएगी. इसी रिपोर्ट में यह डर भी व्यक्त किया गया है कि सन 2100 तक हंगरी की जनसंख्या घटकर मात्र साठ लाख रह जाएगी. और ऐसा तब होगा जब इस शताब्दी के अंत तक धरती की जनसंख्या  बढ़कर 11.2 बिलियन हो जाएगी. इस रिपोर्ट का यह आकलन हमारे लिए विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है कि सन 2017 से 2050 तक दुनिया की जनसंख्या की कुल वृद्धि सिर्फ नौ देशों में सिमट कर रह जाएगी. ये नौ देश हैं: भारत, नाइजीरिया, कॉंगो गणराज्य, पाकिस्तान, इथोपिया, तंजानिया गणतंत्र, अमरीका, युगाण्डा और इण्डोनेशिया.

हंगरी की जनसंख्या समस्या का एक आयाम यह भी है कि वहां की सरकार इस बात को अधिक पसंद नहीं करती है कि अन्य देशों के लोग वहां आकर बसें. इसलिए फिलहाल तो हंगरी के वैज्ञानिक  जहां इस जुगत में हैं कि कैसे बढ़ी उम्र में भी लोगों की कार्यक्षमता को बनाए रखा जाए, वहां की सरकार अपने विभिन्न प्रयासों के माध्यम से लोगों को अधिक संतानोत्पत्ति के लिए प्रेरित करने में जुटी हुई है. इस बात पर विमर्श ज़ारी है कि क्यों नहीं तीन से अधिक संतानों को जन्म देने वाली माताओं को आजन्म आयकर से मुक्ति प्रदान कर दी जाए. इस बात पर भी विचार चल रहा है कि माताओं को तो मातृत्व अवकाश मिलता ही है, अब  पिताओं को भी पैतृक अवकाश दिया जाने लगे. हंगरी में एक व्यवस्था यह भी है कि सरकार  नियमित रूप से जनता से विचार  विमर्श कर भावी नीतियां तै करती है. इस विमर्श में भी जनसंख्या की कमी से निबटने के विभिन्न उपायों पर चर्चाएं होती रहती हैं और उम्मीद की जा रही है कि अगले विमर्श से जो सुझाव आएंगे वे देश की जनसंख्या विषयक नीतियां निर्धारित करने में प्रयुक्त किए जाएंगे. हो सकता है हंगरी और भारत की स्थितियों की तुलना करते हुए आपको भी निदा फाज़ली साहब का यह शेर याद आ जाए: 
कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता
कहीं ज़मीं तो कहीं आसमाँ नहीं मिलता.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 19 फरवरी, 2019 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.

Tuesday, February 5, 2019

उन्हें अपनी शेष ज़िंदगी जेल में गुज़ारना रास आ रहा है!


आम तौर पर जापान को कानून का पालन करने वालों का देश माना जाता है लेकिन इधर वहां कुछ अजीब ही घटित हो रहा है. आंकड़े बताते हैं कि पिछले बीस बरसों से वहां अपराध करने वाले बुज़ुर्गों की संख्या बढ़ती जा रही है. 1997 में जहां पैंसठ पार के अपराधी बीस में से एक हुआ करते थे,  अब वे बीस में से चार होने लगे हैं. ग़ौर तलब है वहां बुज़ुर्गों की संख्या इसी अनुपात में नहीं बढ़ी है. यही नहीं, ये बुज़ुर्ग बार-बार अपराध करने लगे हैं. सन 2016 में पैंसठ पार के जिन ढाई हज़ार बुज़ुर्गों को सज़ा हुई उनमें से कम से कम एक तिहाई ऐसे थे जो पांच  बार पहले भी सज़ा पा चुके थे.

इस चौंकाने वाली हक़ीक़त के पीछे का सच यह है कि जापान में बुज़ुर्गों को जो पेंशन मिलती है उसे वे अपने जीवन यापन के लिए अपर्याप्त पाते हैं  और दूसरी तरफ जापानी कानून व्यवस्था इतनी मज़बूत है कि छोटे-से छोटे अपराध के लिए भी काफी सज़ा देती है. तीसरी बात यह कि जापानी जेलों में कैदियों को न केवल मुफ्त रहने-खाने की सुविधा मिलती है, वहां की सरकार इस बात का भी बराबर ध्यान रखती है कि जेलों में किसी को भी, जिसमें बुज़ुर्ग भी शामिल हैं, कोई असुविधा न हो. ऐसे में अपर्याप्त आर्थिक साधनों वाले बुज़ुर्गों को भूखे मरने की बजाय जेल में जाकर ज़िंदगी बिताना रास आने लगा है. उनसठ वर्षीय तोशियो तकाता का कहना है कि जैसे ही उसके पास के पैसे ख़त्म हुए, उसने सड़क पर पड़ी किसी की साइकिल उठाई और उसे लेकर पुलिस स्टेशन जा पहुंचा. वहां जाकर उसने कहा कि मैंने यह साइकिल  चुराई है. कानूनी कार्यवाही  के बाद उसे एक साल की कैद की सज़ा सुना दी गई. एक साल बाद जब वह जेल से छूटा तो फिर भूख उसके सामने खड़ी थी. इस बार उसने एक चाकू उठाया और एक पार्क में बैठी कुछ महिलाओं के सामने जाकर उसे लहरा दिया. किसी को नुकसान  पहुंचाने का उसका कोई इरादा नहीं था. एक स्त्री उसे देखकर डर गई, उसने पुलिस को बुला लिया और तोशियो तकाता का मनचाहा हो गया. उसे फिर जेल भेज दिया गया. एक मज़े की बात यह और है कि जापान में कोई जेल चला जाए तो भी उसकी पेंशन ज़ारी रहती है और उसके खाते में जमा होती रहती है. पिछले आठ में से चार बरस इस तरह जेल में बिताकर अब तोशियो कुछ समय के लिए आर्थिक चिंताओं से मुक्त हो गया है.

यहीं यह जानना भी रोचक होगा कि जापान अपने देश को अपराध मुक्त रखने के बारे में इतना अधिक सजग है कि छोटे से छोटे अपराध के लिए पर्याप्त से अधिक सज़ा देता है, भले ही इससे सरकार  पर कितना ही अधिक आर्थिक भार क्यों न पड़े. एक उदाहरण से इस बात को समझा जा सकता है. वहां अगर कोई दो सौ येन (भारतीय मुद्रा में करीब एक सौ तीस रुपये) का सेण्डविच चुराए तो उसे दो साल की जेल होती है और इस पर सरकार लगभग साढे चौपन लाख रुपये का खर्च करती है. जापानी समाज में इस बात पर भी गहन चर्चा होने लगी है कि क्यों न पेंशन राशि को बढ़ाकर इस अपराध वृत्ति और इस पर होने वाले व्यय पर नियंत्रण पाया जाए.

लेकिन इन बुज़ुर्गों के अपराध की राह पर चल निकलने के पीछे केवल आर्थिक कारण ही नहीं हैं. एक अन्य बड़ा कारण वहां की सामाजिक व्यवस्था में आ रहे बदलाव के कारण बुज़ुर्गों का बढ़ता जा रहा अकेलापन भी है. अनेक कारणों से नई पीढ़ी अपने मां-बाप को अपने साथ नहीं रख पा रही है और अगर ढलती  उम्र में कोई बुज़ुर्ग अपने जीवन साथी को भी खो बैठे तो अकेलेपन का त्रास उसके लिए असहनीय हो उठता है. समाज में अन्यथा भी एकाकीपन बढ़ता जा रहा है. सामाजिक सम्बल व्यवस्था लगातार छीजती  जा रही  है. किसी को किसी से कोई मतलब नहीं रह गया है. ऐसे में कई बुज़ुर्गों को जेल में मिलने वाला साहचर्य भी ललचाता है. सुखद बात यह है कि जापान की सरकार जेल व्यवस्था में लगातार सुधार कर और अधिक कर्मचारियों की भर्ती कर यह सुनिश्चित करती जा रही है कि वहां इन बुज़ुर्गों को कोई कष्ट न हो. ये प्रयास भी बहुत ज़ोर शोर से किये जा रहे हैं कि बुज़ुर्ग बग़ैर अपराध की राह पर गए अपने समाज में ही बाकी ज़िंदगी गुज़ारने के बारे में  सोचें.  लेकिन इसके बावज़ूद बहुत सारे बुज़ुर्ग जीवन के कष्टों से हार मान कर आत्महत्या तक कर लेते हैं.

जापान की ये स्थितियां हमें भी बहुत कुछ सोचने को मज़बूर करती हैं. इसलिए कि कमोबेश हमारे यहां भी बुज़ुर्गों की हालत ऐसी ही है. ऊपर से यह बात और कि हमारे पास वैसी मानवीय और संवेदनशील जेल व्यवस्था भी नहीं है!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक स्तम्भ कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 05 फरवरी, 2019 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, January 29, 2019

अपने वृद्धजन को सम्मानप्रद जीवन सुलभ कराता है जापान !


तमाम विकसित देशों में से जापान की एक अलग पहचान यह भी है कि वहां वृद्धों की संख्या बहुत तेज़ी से बढ़ रही है. माना जाता है कि अभी वहां पैंसठ पार के लोग कुल आबादी का 26.7 प्रतिशत हैं. वैसे, इस मामले में अन्य अनेक एशियाई देश भी जापान से बहुत पीछे तो नहीं हैं. सिंगापुर में जहां 2015 में वरिष्ठ नागरिक कुल जनसंख्या का मात्र 13.7 प्रतिशत थे, अनुमान किया जा रहा है कि सन 2020 तक वे 17.7 प्रतिशत और 2030 तक 27 प्रतिशत हो जाएंगे.  मलेशिया में वहां की कुल जनसंख्या के लगभग 9.8 प्रतिशत लोग साठ पार के हैं और यह संख्या वहां की आबादी की 9.8 प्रतिशत है. हमारे अपने देश भारत में भी वरिष्ठ  नागरिकों की संख्या तेज़ी से बढ़ती जा रही है. असल में इस सब के पीछे जनसंख्या नियंत्रण और बेहतर जीवन स्थितियों, उन्नत स्वास्थ्य सुविधाओं और सेहत के लिए बढ़ती जा रही जागरूकता का मिला जुला योगदान है. लोगों की औसत उम्र में तेज़ी से इज़ाफ़ा हुआ है. चीन जैसे देश में लम्बे समय तक एक संतान उत्पन्न करने की नीति का चलन हो  या हमारे अपने भारत में हम दो हमारे दोके नारे पर अमल का असर हो, विभिन्न देशों की जनसंख्या में युवा और वृद्ध का अनुपात बहुत तेज़ी से बदल रहा है. इसीलिए यह भी कहा जाने लगा है कि बहुत सारे एशियाई देशों में तो भविष्य का रंग श्वेत (केशों के संदर्भ में!) होने जा रहा है.

भले ही एशियाई देशों में उम्र का सम्मान होता हो, व्यावहारिक धरातल पर यह बढ़ती उम्र वाली जनसंख्या अनेक समस्याएं भी पैदा करती हैं. उम्र के संतुलन में आए इस बदलाव का असर यह हो रहा है कि काम करने और कमाने वाले युवाओं की तुलना में काम न कर  सकने वाले और अधिक सुविधाओं की ज़रूरत वाले वृद्धों की संख्या बढ़ने से सरकारों की ज़िम्मेदारियां भी बढ़ती जा रही हैं. तीसरी दुनिया के बहुत सारे देश जहां इन समस्याओं का सामना करने के बारे में अभी सोच ही रहे हैं, यह जानना बहुत सुखद है कि जापान अपने वरिष्ठ जन की सुख सुविधाओं का कितना ज़्यादा  और किस सूझ बूझ के साथ खयाल रखता है. असल में खयाल रखने का यह भाव वहां की जीवन शैली में इस तरह से घुला मिला है कि इसे पूरी तरह सरकारी प्रयास भी नहीं कहा जा सकता है. दुनिया के और बहुत सारे देशों की तरह जापान में भी गांवों और छोटे कस्बों से लोग काम धंधे के लिए बड़े शहरों का रुख करते रहे हैं. लेकिन वहां फुरुसालो नामक एक व्यवस्था अभी भी चलन में है जिसकी वजह से अपनी पूरी कामकाजी ज़िंदगी शहरों में बिताने के बाद लोग अपने अपने मूल स्थानों को लौट आते हैं और वहां अपने जाने-पहचाने परिवेश में अपने बचपन और किशोरावस्था के साथियों के साथ बाकी ज़िंदगी सुकून के साथ बिता पाते हैं. इस व्यवस्था के तहत वे अपने-अपने घरों में सुख और स्वतंत्रता के साथ रहते हैं लेकिन उन्हें यह आश्वस्ति भी रहती है कि अगर कोई ज़रूरत  पड़ी तो उनके बचपन के संगी साथी उनकी मदद के लिए दौड़े आएंगे. ये लोग वहां रहकर किसी न किसी काम  में व्यस्त  भी रहते हैं. देखा गया है कि अस्सी बल्कि नब्बे साल की उम्र वाले लोग भी बड़े सहज भाव से खेती बाड़ी का काम करते हैं. वे अपनी दिनचर्या भी अपने दम पर संचालित करते हैं. इस सबके पीछे सोच यह है कि जब तक व्यक्ति सक्रिय रहता है, उसकी ज़िंदगी की गाड़ी चलती रहती है. जैसे ही वह निष्क्रिय होता है, गाड़ी के पुर्ज़ों में जंग लगने लगता है और यमराज के कदमों की आहट सुनाई देने लगती है. इस तरह यह फुरुसालो व्यवस्था अपने वरिष्ठ नागरिकों के लिए सम्मान के साथ सक्रिय और संतोषप्रद जीवन यापन  में मददगार साबित होती है.

इनका जीवन सुगम हो और सहजता से चलता रहे इसके लिए सरकार भी बहुत समझदारी भरा सहयोग देती है. मसलन मोबाइल के इस काल में इन गांवों और कस्बों में पारम्परिक लैण्डलाइन फोन बरकरार रखे गए हैं ताकि ये वृद्धजन  मोबाइल को रोज़-रोज़ चार्ज करने जैसे झंझटों और नई तकनीक से जूझने की उलझनों से बचे रहकर अपने परिवारजन के सम्पर्क में रह सकें. इसी तरह जिन गांवों में पर्याप्त चिकित्सा सुविधा नहीं है वहां भी सरकार निकटवर्ती कस्बों या शहरों से सप्ताह में कम से कम दो दफा डॉक्टर भेज कर इन्हें पर्याप्त चिकित्सा सम्बल सुलभ कराती है. जो  लोग इतने ज़्यादा अशक्त या असमर्थ हो गए हैं कि अपना खना खुद नहीं बना सकते उन्हें तैयार भोजन सुलभ करा दिया जाता है. ऐसे अनेक प्रयास बिना किसी शोरगुल के करके जापान अपने वृद्धजन को सम्मानप्रद जीवन जीने का जो सुख प्रदान कर रहा है, वह शेष दुनिया के लिए भी अनुकरणीय है.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक स्तम्भ कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 29 जनवरी, 2019 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 


Tuesday, January 22, 2019

उसने फ्रांस के राष्ट्रपति से सार्वजनिक क्षमा याचना करवा ली!


जॉसेट ऑडिन की उम्र अब 87 वर्ष है लेकिन उन्हें पचास के दशक की वे तमाम घटनाएं जस की तस याद हैं. एक लम्बी लड़ाई लड़ी है उन्होंने, और अब जब वह लड़ाई एक सार्थक परिणति तक पहुंच गई है तो उन्हें गहरा संतोष है कि उनके प्रयत्न व्यर्थ नहीं गए. क्या और क्यों थी उनकी लड़ाई? पचास के दशक में जॉसेट  अल्जीयर्स विश्वविद्यालय में गणित की पढ़ाई कर रही थीं. एक लेक्चर के दौरान उनकी नज़रें मॉरिस से मिलीं, पहली नज़र में प्यार हुआ और अंतत: उन्होंने शादी कर ली. उनकी खुशियों भरी  ज़िंदगी में तीन नन्हें  फूल खिले और सब कुछ बहुत खुशनुमा था. यह वह समय था जब उनका देश अल्जीरिया फ्रांसिसी शासन से  अपनी आज़ादी के लिए संघर्ष कर रहा था. जॉसेट और मॉरिस  भी अपनी तरह से इस संघर्ष में योग दे रहे थे. लेकिन इनका योगदान सशस्त्र संघर्ष के रूप में  न होकर वैचारिक और प्रचार के स्तर तक सीमित था. ये दोनों ही कम्युनिस्ट विचारधारा से जुड़े थे. 1957 में मॉरिस विश्वविद्यालय में गणित पढ़ा रहा था और जॉसेट घर पर रहकर बच्चों का लालन-पालन कर रही थी. तभी स्थानीय पुलिस को पता चला कि ऑडिन दम्पती  ने अपने घर में एक ऐसे कम्युनिस्ट नेता को शरण दे रखी है जिसकी पुलिस को तलाश है.

एक रात पुलिस ने ऑडिन दम्पती के घर का दरवाज़ा खटखटाया और मॉरिस को, जिनकी उम्र तब मात्र पच्चीस बरस थी, अपने साथ ले गई. उनकी पत्नी ने जब यह पूछा कि मॉरिस को कब तक छोड़ दिया जाएगा, तो उन्हें बताया गया कि अगर सब कुछ ठीक पाया गया तो उन्हें  आधे घण्टे में मुक्त कर दिया जाएगा. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. करीब दो या तीन सप्ताहों के बाद जॉसेट को सूचित किया गया कि उनके पति फरार हो गए हैं. विडम्बना यह कि उन्हें यह सूचना अच्छी ख़बरकहकर दी गई. जॉसेट भी समझ गई थी कि इस ख़बर का असल अर्थ क्या है. बाद में उन्हें एक नज़दीकी दोस्त से, जो कि मॉरिस से अगले दिन गिरफ्तार किया गया था पता चला कि मॉरिस को एक टेबल पर बांधकर भयंकर  यंत्रणा दी गई थी. जॉसेट जानती थी कि उनका मॉरिस अब कभी नहीं लौटेगा, लेकिन वे यह बात आधिकारिक रूप से जानना चाहती थीं. यही उनका संघर्ष था.

जॉसेट के पास न धन बल था, न और कोई ताकत. उनके पास बस थी कलम और लड़ते रहने का जज़्बा. जिस किसी को वे लिख सकती थीं, उसे उन्होंने लिखकर गुहार की. पत्रकारों को, राजनेताओं को सबको उन्होंने लिखा, लिखती रहीं. इसी बीच 1962 में अल्जीरिया को फ्रांसिसी दासता  से मुक्ति भी मिल गई. कुछ बरसों बाद जॉसेट भी अपने बच्चों को लेकर पेरिस चली गईं. लेकिन उन्होंने अपना संघर्ष ज़ारी  रखा. इसी बीच उन्हें टुकड़ों टुकड़ों में यह जानकारी मिली कि किस तरह मॉरिस को यातनाएं दी गईं. एक वरिष्ठ गुप्तचर अधिकारी ने तो यहां तक स्वीकार कर लिया कि उन्होंने ही मॉरिस को मारने का आदेश दिया था. लेकिन जॉसेट तो इस बात की आधिकारिक स्वीकृति की तलबगार थीं. उनकी बेटी मिशेल ने कहा, “मेरी मां किसी से यह नहीं चाह रही थी कि वो क्षमा याचना करे. वे तो बस सच्चाई जानना और इस बात को स्वीकार करवाना चाहती थी कि इस सबके लिए फ्रांसिसी निज़ाम उत्तरदायी था.” जॉसेट का पत्र लिखना ज़ारी रहा. अधिकांश पत्र अनुत्तरित रहे, बहुत कम का उन्हें जवाब मिला. लेकिन आखिरकार उनके प्रयत्नों की जीत हुई. सन 2014 में फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांसुआ होलांद ने पहली बार आधिकारिक रूप से इस बात को स्वीकार किया कि मॉरिस की  मृत्यु हिरासत में हुई थी.

लेकिन होलांद के बाद राष्ट्रपति बने इमैनुएल मैक्रों ने तो कमाल ही  कर दिया. मॉरिस ने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि ऐसा होगा. जॉसेट उन्हें कोई पत्र लिखती उससे पहले ही उन्होंने खुद पहल करते हुए जॉसेट से सम्पर्क किया और उसे एक पत्र लिखा. बात यहीं ख़त्म नहीं हो गई. कुछ समय बाद बाकायदा एक सरकारी घोषणा पत्र ज़ारी किया गया जिसमें मॉरिस की मृत्यु के लिए फ्रांसिसी सरकार के उत्तरदायित्व को स्वीकार किया गया. उन्होने कहा कि एक ऐसी व्यवस्था बना ली गई थी जिसमें किसी भी संदिग्ध घोषित किये गए व्यक्ति को पकड़ कर उससे पूछताछ करने के नाम पर उसे भयंकर यातनाएं दी जाती थीं. राष्ट्रपति  खुद जॉसेट के घर गए और उन्होंने यह कहते हुए कि मॉरिस को यातनाएं देने के बाद मारा गया अथवा  उन्हें इतनी यातनाएं दी गईं  कि उनकी मृत्य हो गई, जॉसेट व उनके परिवार के लोगों से माफ़ी मांगी.

बेशक जॉसेट ने जीवन में जो खोया वह उन्हें नहीं मिला, लेकिन यह बात भी कम महत्व की नहीं है कि उनका अनवरत संघर्ष अकारथ नहीं गया और एक शक्तिशाली राष्ट्र के मुखिया ने उनसे सार्वजनिक क्षमा याचना की.
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 22 जनवरी, 2019 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, January 15, 2019

जीत की कोई उम्मीद नहीं फिर भी लड़ रही है वो!


बहुत बार ऐसा कुछ जानने को मिलता है कि मन गहरे अवसाद में डूब जाता है. इण्डोनेशिया की चालीस वर्षीया नूरिल मकनून के बारे में जानकर ऐसा ही हुआ. वे तीन बच्चों की मां है और बाली के पूर्व में अवस्थित द्वीप की रहने वाली हैं. सन 2010 में उन्हें एक स्कूल में लेखा सहायक की अस्थायी नौकरी मिली तो जीवन की गाड़ी कुछ आराम से चलने लगी. लेकिन यह आराम बहुत समय नहीं रहा. तीन बरस बाद उनके स्कूल में एक नया प्रिंसिपल आया और उसने उनका सुख चैन सब छीन लिया. प्रिंसिपल साहब जब चाहते नूरिल को अपने चैम्बर में बुला भेजते और उससे खुलकर अपने अंतरंग जीवन  की बातें करने लगते. स्कूल के समय के बाद वे उसे वक़्त बेवक़्त फोन करके भी यही सब करते. और जैसे इतना ही पर्याप्त न हो, एक तरफ तो वे नूरिल से कहते कि वो भी उनके साथ अंतरंगता कायम करे और दूसरी तरफ स्कूल के कर्मचारियों के सामने इस बात की डींग हांकते कि नूरिल से उनका अफेयर चल रहा है. बेचारी नूरिल बहुत भारी मन से उनकी ये फूहड़ और अश्लील हरकतें सहती रहने को विवश थी. इसलिए विवश थी कि उसकी नौकरी अस्थायी थी और वह जानती थी कि शिकायत करने का मतलब होगा अपनी नौकरी से हाथ धो बैठना.

लेकिन परेशानी के इसी दौर में एक दिन उसे न जाने क्या सूझा कि प्रिंसिपल ने जब उसे फोन किया और हमेशा की तरह गंदी बातें करने लगा तो उसने उन बातों को रिकॉर्ड कर लिया. यह रिकॉर्डिंग उसने अपने पति को तो सुनाई ही उसके साथ-साथ अपनी एक सहकर्मी को भी सुनाई, और उसी सहकर्मी ने यह बात स्टाफ के कुछ और लोगों को बता दी. अब हुआ यह कि नूरिल की ग़ैर मौज़ूदगी में उसके स्टाफ के कुछ लोगों ने उसके फोन से इस रिकॉर्डिंग की कॉपी बना ली अपने कुछ साथियों को भी सुना दी. उड़ते उड़ते यह बात प्रिंसिपल तक भी जा पहुंची. उसे तो आग-बबूला होना ही था. प्रिंसिपल ने नूरिल को बुला कर धमकाया और कहा कि जब तक वो उस रिकॉर्डिंग को डिलीट नहीं कर देती, उसके अनुबंध को विस्तार नहीं दिया जाएगा. नूरिल के मना कर देने पर उसे नौकरी से निकाल दिया गया.

असल दुखदायी प्रकरण इसके बाद शुरु हुआ. नूरिल को नौकरी से निकाल देने के बाद प्रिंसिपल ने पुलिस में शिकायत दर्ज़ कराई कि नूरिल ने उसके विरुद्ध मानहानि का आपराधिक काम किया है. पुलिस ने कोई दस-बारह बार नूरिल को तफ़्तीश के लिए बुलाया और अंतत: उसे गिरफ़्तार  कर लिया. अभियोग पक्ष ने उस पर अश्लील सामग्री के वितरण का, न कि मानहानि का,  आरोप लगाया. नूरिल को दो महीने ज़ेल में गुज़ारने पड़े, हालांकि इस बीच उसके स्कूल की सहकर्मियों ने अपने ये बयान भी दर्ज़ कराए कि उस रिकॉर्डिंग  का वितरण नूरिल ने नहीं किया था अपितु उन्होंने ही उसके फोन से उसे लेकर वितरित किया था. नूरिल के वकील ने भी यह तर्क दिया कि नूरिल ने यह रिकॉर्डिंग अपने बचाव के लिए की थी और इसे अपने ही पास रखा था, उसने इसका वितरण भी नहीं किया था. उधर प्रिंसिपल ने अपने बचाव में यह कहा कि फोन पर सुनाई दे रहे वार्तालाप का नूरिल से कोई सम्बंध नहीं है. इस वार्तालाप में वे तो एक अमरीकी पोर्न अभिनेत्री को सम्बोधित कर ये बातें कह रहे हैं. अंतत:  अदालत ने भी पाया कि इस मामले में नूरिल दोषी नहीं है.

लेकिन किस्सा यहां ख़त्म नहीं हुआ. प्रिंसिपल  के वकील इसके बाद इस मामले को इण्डोनेशिया के कानूनी प्रावधानों के तहत सुप्रीम कोर्ट ले गए और वहां बग़ैर नूरिल को अपनी बात कहने का कोई मौका दिये, निचली अदालत के फैसले को उलटते हुए नूरिल को अश्लील सामग्री के वितरण का दोषी करार दे दिया गया.  उसे छह माह के कारावास और पैंतीस हज़ार डॉलर के जुर्माने की सज़ा सुना दी गई.  अगर वो यह राशि जमा न  करा सके तो उसे तीन माह का अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा. इस सारे मामले का एक दुखद पहलू यह और है कि प्रिंसिपल को वहां के स्थानीय प्रशासन में और बड़े तथा महत्वपूर्ण पद पर भेज दिया गया.

असल में इण्डोनेशिया के कानून अभी भी बहुत हद तक स्त्री विरोधी हैं. किसी स्त्री के विरुद्ध अश्लील बातें करना अपराध नहीं माना जाता है. औरतों से अपेक्षा की जाती है कि वे न केवल पुरुषों की इस तरह की अभद्रताओं  को सहती रहेंगी,  अपनी नौकरी की खातिर उच्चाधिकारियों को ‘खुश’ भी करेंगी.  स्त्रियों के विरुद्ध होने वाले अपराधों की पड़ताल के लिए वहां महिला पुलिस की भारी कमी है, और इसके मूल में वहां प्रचलित वर्जिनिटी टेस्ट की शर्मनाक व्यवस्था भी है. इस सबके बावज़ूद नूरिल अपनी लड़ाई ज़ारी रखे है. वह वहां प्रतिरोध की एक प्रतीक बन कर उभरी है, हालांकि इस लड़ाई में उसकी जीत की उम्मीद शायद ही किसी को हो.
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 15 जनवरी, 2019 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, January 8, 2019

है अंधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?


हरिवंश राय बच्चनके एक बेहद लोकप्रिय गीत की कुछ पंक्तियां हैं: जो बसे हैं वे उजड़ते हैं प्रकृति के जड़ नियम से/ पर किसी उजड़े हुए को फिर बसाना कब मना है/ है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है।  ये पंक्तियां मुझे याद आईं एक साहसी महिला शबीना मुस्तफ़ा  की संघर्ष  गाथा को जानते  हुए. इस बात से किसी को कोई अंतर नहीं पड़ना चाहिए कि वे किस देश की नागरिक हैं. उनकी शादी को महज़ अठारह महीने हुए थे और दो माह का बेटा उनकी गोद में था, तभी एक दिन उन्हें यह मनहूस ख़बर मिली कि उनके पति फ्लाइट लेफ़्टिनेण्ट सईद सफी मुस्तफ़ा  लापता हैं! तब वे विश्वविद्यालय में पढ़ रही थीं. ज़िंदगी जैसे थम-सी गईं. बहुत सारे सपने देखे थे शबीना  ने, वे सब तहस-नहस हो गए. बहुत सारे सपने उनके पति ने भी देखे थे. एक सपना वे यह भी देखा करते थे कि ज़िंदगी में कभी आगे चलकर वे समाज के वंचित तबकों के बच्चों के लिए एक स्कूल खोलेंगे. लेकिन जब सपने देखने वाली आंखें ही नहीं रहीं तो सपनों की बात ही क्या  की जाए!

लेकिन सबकुछ के बावज़ूद ज़िंदगी तो चलती ही है. उसे चलाना ही पड़ता है. शबीना ने भी अपनी सारी हिम्मत बटोरी और ज़िंदगी को पटरी पर लाने में जुट गई. अगले दसेक बरस भारी संघर्ष के रहे. लेकिन वो जूझती रही. तभी अनायास उसकी ज़िंदगी में एक ऐसा पल आया कि काफी कुछ बदल गया. हुआ यह कि जान-पहचान की एक औरत अपनी बेटी को लेकर उसके पास आई. वो अपनी बेटी को सिलाई की क्लास में दाखिला दिलवाना चाहती थी लेकिन उसे यह कहकर वहां से भगा दिया गया था कि उस लड़की को पढ़ना लिखना नहीं आता है इसलिए उसे वहां भर्ती नहीं किया जा सकता है.  अब मां यह गुज़ारिश कर रही थी कि शबीना उस बच्ची को पढ़ा दिया करे, और अगर मुमकिन हो तो पास-पड़ोस की कुछ और बच्चियों को भी वह पढ़ा दे. पढ़ाने के लिए जो जगह सोची गई वह थी शबीना के घर का खाली पड़ा गैरेज. शबीना ने उस पल को याद करते हुए बाद में बताया, “जैसे ही मैंने उन बच्चियों की चेहरों की तरफ देखा, मैं उन्हें मना करने की हिम्मत नहीं जुटा सकी.” और इस तरह महज़ चौदह बच्चियों से उस परियोजना की शुरुआत हुई जो आज गैरेज स्कूल के नाम से विख्यात  है. शुरुआती समय अभावों से भरा था. न फर्नीचर था, न ब्लैकबोर्ड, न अभ्यास पुस्तिकाएं और न लेखन सामग्री. लेकिन वो किसी ने कहा है न कि लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया, तो दोस्तों ने मदद की, और काम चल निकला. किसी ने लकड़ी दी,किसी ने पत्थर, किसी ने ब्लैकबोर्ड भेंट  किये तो किसी ने लेखन सामग्री. खुद शबीना सुबह नौकरी पर जाती और दोपहर बाद जब लौटती  तो उसके पास अपने दफ्तर के सहकर्मियों  द्वारा दिये गए ऑफिस के बचे खुचे कागज़ होते, और होतीं छोटी-बड़ी पेंसिलें. वो खुद कागज़ पर लाइनें खींच कर अभ्यास पुस्तिकाएं तैयार करती और बच्चों को पढ़ाती.

आहिस्ता आहिस्ता शबीना को प्रायोजक मिले, उसने स्कूल के लिए बेहतर जगह किराये पर ली और बच्चों को ज़रूरी सामान्य शिक्षा देने के काम को विस्तार देते हुए चिकित्सा सहायता, प्रौढ़ शिक्षा,  पोषण कार्यक्रम, शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम, बचत कार्यक्रम वगैरह भी संचालित करने शुरु किए. लेकिन इन सबको करते हुए शबीना अपने मूल काम को नहीं भूली. उसने अपने यहां आने वाली बच्चियों के आत्म विश्वास को बढ़ाने और उनके नज़रिये को व्यापक बनाने के लिए बहुत सारे कार्यक्रम चलाए. परिणाम यह हुआ कि उस शहर के कुछ सबसे निर्धन बच्चों ने जब अपनी नाट्य प्रस्तुतियां दीं तो शहर के सबसे धनी लोग उनके लिए तालियां बजा रहे थे. जो बच्चे कभी अपने मुहल्ले की परिधि को नहीं लांघ सके थे वे शैक्षिक भ्रमण पर दूसरे शहरों और प्रांतों में जाने लगे थे. अब उनके पास स्कूल यूनिफॉर्म भी थी और साफ़ सुथरी किताबें-कॉपियां  और आकर्षक बस्ते भी.

शबीना जो कर रही थी और कर रही है, उसमें रुकावटें भी कम नहीं आईं. लेकिन हर संकट ने उसका हौंसला और बुलंद किया और वो नई ऊर्जा से अपना काम करती रही. आज उसका गैरेज स्कूल पांच सौ बच्चियों के जीवन में शिक्षा का उजाला फैला रहा है. अब स्कूल के पास तमाम ज़रूरी संसाधन हैं और सबसे बड़ी बात यह कि उस स्कूल से  पढ़कर निकलने वाली बहुत सारी बच्चियां अपनी ज़िंदगी को बेहतर बनाने में कामयाब हुई  हैं. शबीना अब पहले से ज़्यादा सुखी और संतुष्ट हैं. लेकिन बीते दिन अब भी उनकी यादों में जस के तस हैं. भावुक होते हुए वे बताती हैं, “मेरे  पति की मौत के कुछ ही दिनों बाद कुछ बच्चे मेरे पास आए और बोले कि आपके स्वर्गीय पति ने हमें अपनी शिक्षा पूरी करने के लिए आर्थिक सहायता दी थी.” जो काम उनके पति ने शुरु किया था, उसे आगे बढ़ाने का सुख अब उनके सारे निजी दुखों पर हावी हो चुका है.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 08 जनवरी, 2019 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, January 1, 2019

क्या इंसानी जीवन का कोई मूल्य नहीं है?

नाइजीरिया का वो सरकारी अस्पताल हमारे देश के आम सरकारी अस्पतालों जैसा ही है. कहीं टाइल उखड़ा हुआ है तो कहीं प्लास्टर. गद्दे मैले हैं और हर तरफ़ बदइंतज़ामी का आलम है.  मरीज़ों की भीड़ है. तभी जाने कहां से एक चुस्त-दुरुस्त, चालीसेक बरस का अमीर-सा लगने वाला शख़्स अपनी काले रंग  की शानदार मर्सीडीज़ से निकल कर अस्पताल के वार्ड में दाखिल होता है. उसके साथ चल रहे अमले में से एक आदमी उसके हाथ में कुछ कागज़ थमा देता है और उन कागज़ों पर सरसरी  नज़र डालते हुए वो अपने साथियों से कुछ पूछताछ करता है. उस आदमी का नाम है ज़ील अकाराइवाय और उसके साथियों ने उसे जो  कागज़ थमाये हैं उनमें अस्पताल के उन रोगियों का विवरण है जो ठीक हो चुके हैं और घर जा सकते हैं लेकिन क्योंकि वे अस्पताल का बिल चुकाने में असमर्थ हैं, मज़बूरन वहां पड़े हुए हैं. वैसे नाइजीरिया के कुछ अस्पताल अपने रोगियों को यह सुविधा भी प्रदान करते हैं कि वे अपने बिल का भुगतान किश्तों में कर दें, लेकिन बहुत सारे रोगियों के लिए ऐसा भी करना सम्भव नहीं होता है. ज़ील अकाराइवाय  ऐसे ही एक मरीज़ के पास जाता है, उससे उसके रोग के बारे में पूछता है और  फिर यह जानना चाहता है कि वो अपने अस्पताल के बिल का भुगतान कैसे  करेगा? रोगी हताशा भरी आवाज़ में बस यह कह पाता है:  “मैं भगवान से प्रार्थना कर रहा हूं!” ज़ील उसे कुछ नहीं कहता है, लेकिन आगे बढ़ते  हुए अपने साथियों में से एक को कुछ इशारा करता है, जिसका आशय यह है कि उसके बिल का भुगतान कर दिया जाए. और इस तरह वह पूरे वार्ड का चक्कर लगाता है, कई रोगियों के बिल का भुगतान करने के निर्देश देता है और अस्पताल से बाहर निकल जाता है. 

ज़ील ने, जो एक फाइनेंसियल कंसलटेण्ट है अपने साथियों को स्पष्ट निर्देश दे रखे हैं कि किसी भी रोगी को यह पता नहीं चलना चाहिए कि उसके अस्पताल के बिल का भुगतान किसने किया है. वह यह भी नहीं चाहता कि जिन लोगों की उसने मदद की है उनमें से कोई उसके प्रति कृतज्ञ हो. लेकिन हां, वह यह ज़रूर चाहता है कि बाद में कभी कोई इस बात का ज़िक्र ज़रूर करे कि जब वो अस्पताल में भर्ती  था और ज़रूरतमंद था तो कोई आसमानी फरिश्ता आया था और उसने आकर उसके बिल का भुगतान कर दिया था. फरिश्ते वाली बात को ध्यान में रखकर ही ज़ील ने अपने प्रोजेक्ट को नाम दिया है – ‘एंजल प्रोजेक्ट’  यानि फरिश्ता परियोजना. ज़ील ईसाई धर्मावलम्बी है और उसका कहना है कि उसके  धर्म ने ही उसे यह सिखाया है कि हममें से हरेक किसी न किसी की मदद कर सकता है. उसका सोच यह है कि आप जिस आसमानी फरिश्ते का तसव्वुर करते हैं वह तो आपमें ही मौज़ूद होता है. इस एंजल  प्रोजेक्ट के लिए ज़ील के दोस्त और परिवार जन भी उसे आर्थिक सहयोग देते हैं और वह पाई पाई का हिसाब रखता है और उन्हें बताता है कि उनकी दी हुई राशि से उसने किस-किसके कितने बिल का भुगतान किया है. 

ज़ील ने अपने इस प्रोजेक्ट के लिए एक नियम यह बना रखा है कि वह केवल उन रोगियों के बिलों का भुगतान करेगा जो ठीक हो चुके हैं और बिल का भुगतान न कर सकने की वजह से अस्पताल में फंसे हुए हैं. यानि एंजल प्रोजेक्ट रोगियों के इलाज़ के लिए पैसा नहीं देता है. लेकिन बहुत बार ऐसा भी होता है वार्ड का दौरा करते हुए उसे किसी रोगी की करुण कथा कुछ इस तरह मज़बूर कर देती है कि वो खुद अपने बनाये नियम को तोड़कर उसकी मदद करने को विवश  हो उठता है. लेकिन अपनी हर मदद के बाद, चाहे वो ठीक हो चुके रोगी के अस्पताल का बिल चुकाना हो या किसी गम्भीर रोगी के उपचार का खर्चा उठाना हो, ज़ील पहले से ज़्यादा उदास हो जाता है. उदास भी और अपनी सरकार से नाराज़ भी. वो कहता है कि “मात्र यह बात कि मुझ जैसे किसी शख़्स को अस्पताल में बिल का भुगतान न कर पाने की वजह से फंसे पड़े रोगी  की मदद के लिए आगे आना पड़ता है, इस बात को साबित करने के लिए पर्याप्त है कि हमारी व्यवस्था में कितनी नाइंसाफ़ी है. आखिर हम एक मुकम्मिल  स्वास्थ्य बीमा योजना क्यों नहीं लागू कर सकते हैं?” यहीं यह भी जान लेना उपयुक्त होगा  कि नाइजीरिया में मात्र पांच प्रतिशत लोगों को स्वास्थ्य बीमा सुलभ है. कुछ गुस्से और क्षोभ के मिले-जुले स्वरों में ज़ील पूछता है: “हर सप्ताह मैं अनिवार्य स्वास्थ्य बीमा योजना लागू न होने की वजह  से लोगों को कष्ट  पाते और अपनी जान गंवाते देखता हूं. क्या इंसानी जीवन का कोई मूल्य नहीं है?”   
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न  दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 01 जनवरी, 2019 को इसी  शीर्षक से प्रकाशित आलेेेख का मूल पाठ.    

चार्ल्स डिकेंस का किरदार, क्रिसमस और ब्रेक अप!




बड़ा दिन यानि क्रिसमस पश्चिमी दुनिया के सबसे बड़े त्योहारों में से एक है. लेकिन इसे तो विडम्बना ही कहेंगे कि अब इंग्लैण्ड में यही उल्लास पर्व कुछ लोगों और विशेष रूप से युवाओं के लिए अवसाद के अवसर  के रूप में उभर रहा है. हाल में वहां की एक डेटिंग साइट ने एक अनौपचारिक सर्वे में  यह पाया  है कि हर  दस में से एक ब्रिटिश अपने साथी से इसलिए ब्रेक अप कर रहा है ताकि वह क्रिसमस पर अपने साथी को उपहार देने के खर्चे से बच सके. बावज़ूद इस बात के कि  यह जानकारी एक डेटिंग साइट ने दी है, इस आशंका को अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए कि डेटिंग साइट का फायदा लोगों के एकल होने में  ही है, लेकिन अन्य अनेक स्रोतों से भी इस बात की पुष्टि होने से लगता है कि इस बात में सच्चाई है.  

रोचक बात यह है कि इस प्रवृत्ति ने अंग्रेज़ी शब्दकोश में एक नया शब्द भी जोड़ दिया है: स्क्रूजिंग. यहीं यह याद दिलाता चलूं कि एबेनेज़र स्क्रूज चार्ल्स डिकेंस के उपन्यास ‘ए क्रिसमस कैरोल’ (1843) के नायक का नाम है और यह एक कंजूस किरदार है. इसी के नाम पर स्क्रूज शब्द अंग्रेज़ी में कंजूसी से सम्बद्ध हो गया और अब यह स्क्रूजिंग शब्द अपने साथी से उन्हें क्रिसमस पर उपहार देने के खर्चे से बचना चाहने के कारण  ब्रेक अप कर लेने की प्रवृत्ति के लिए प्रयुक्त होने लग गया है. आंकड़ा विशेषज्ञ द्वय  डेविड मैक केण्डलेस और ली ब्रायन ने लगभग दस हज़ार फ़ेसबुक स्टेटसों का अध्ययन कर यह बताया है कि साल के किसी भी अन्य दिन की तुलना में ग्यारह दिसम्बर  को  सबसे ज़्यादा ब्रेक अप होते हैं. इससे भी इस बात की पुष्टि होती है कि क्रिसमस से पहले बहुत सारे जोड़ों में ब्रेक अप हो जाता है. यहीं यह भी जान लेना उपयुक्त होगा कि इंग्लैण्ड में यह त्योहारी मौसम ख़ासा खर्चीला  होता है. खाना पीना नए कपड़े, सजावट, पटाखे, रोशनी और उपहार – इन सबमें जेबें बहुत ढीली हो जाती हैं. अगर बैंक ऑफ  इंग्लैण्ड की बात मानें तो एक औसत ब्रिटिश परिवार दिसम्बर माह में करीब पांच  सौ पाउण्ड अधिक खर्च करता है. ऐसे में यह बात आसानी से समझी जा सकती है कि प्रेम करने वाले युगल उपहार देने के खर्च को लेकर कितने गहरे दबाव और तनाव में रहते होंगे! और यही वजह है कि एक अध्ययन के अनुसार 18 से 34 के आयु वर्ग वाले लोग इस मौसम में अपने रिश्ते तोड़ने के मामले में औरों से आगे पाए जाते हैं. और हां, यह भी जान लीजिए  कि रिश्ते तोड़ने के मामले में लड़के लड़कियों से कहीं आगे रहते हैं. ऐसा करने वाले ग्यारह प्रतिशत लड़कों का मुक़ाबला सात प्रतिशत लड़कियां ही करती हैं. 

एक लड़के ने बड़ी दिलचस्प बात कही. उसने कहा कि मैंने दिसम्बर के शुरु में अपनी गर्ल फ्रैण्ड को छोड़ दिया और फिर जनवरी में वापस उससे रिश्ता बना लिया. इस तरह मैं उसे क्रिसमस पर उपहार देने से बच गया. हो सकता है यह एक अतिवादी प्रसंग हो, लेकिन तलाक मामलों की विशेषज्ञ वकील शीला मैकिण्टोश स्टेवर्ड का यह कथन भी ग़ौर तलब है कि अब नई तकनीक के आ जाने की वजह से रिश्ते तोड़ना पहले से ज़्यादा सुगम हो गया है. अब यह बात कहने के लिए दोनों पक्षों को आमने-सामने होने की शर्मिन्दगी नहीं झेलनी पड़ती है और वे तकनीक के माध्यम से ही यह काम कर लेते हैं. शीला एक और ख़ास बात कहती हैं. वे कहती हैं कि इसी तकनीक ने  और विशेष रूप से सोशल  मीडिया ने युवाओं के सामने बहुत सारी चुनौतियां, तनाव और आकर्षण भी कड़े कर दिये हैं जिनकी वजह से उनके लिए अपने रिश्तों को बनाये रखना पहले से ज़्यादा कठिन होता जा रहा है. अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए वे कहती हैं कि यह क्रिसमस स्क्रूजिंग भी उनमें से बहुतों के लिए अपने रिश्तों को तोड़ने का एक सुविधाजनक बहाना बन गया है. रिश्ते के न चलने की वजह तो कोई और होती है लेकिन नाम  वे इसका ले  लेते हैं.  

ऐसे में कुछ लोग मज़ाक-मज़ाक में यह भी कहने लगे हैं कि अगर आपका रिश्ता महज़ टूटा है, स्क्रूज नहीं हुआ है तो आप किस्मत वाले हैं. कम से कम आपको उपहार तो मिल ही गया है! एक 29 वर्षीया युवती क्लैरिसा ऐसी ही किस्मत वाली है जिसे उसके मित्र ने पहले उपहार दिया और फिर ब्रेक अप किया. यह अलग बात है कि क्लैरिसा ने वो उपहार अपने पास न रखकर अपने मित्र को लौटा दिया, क्योंकि वो उसकी कोई स्मृतियां भी अपने पास नहीं रखना चाहती थी. और यहीं अंत में यह जानकारी भी कि भले ही स्क्रूजिंग के साथ क्रिसमस जुड़ा हुआ है, साल में सबसे कम ब्रेक अप क्रिसमस वाले दिन ही होते हैं.
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 25 दिसम्बर, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.

Tuesday, December 18, 2018

पुणे वालों ने समझ लिया है कि जल है तो कल है


हमें जो सहजता से सुलभ होता रहता है हम उसकी महत्ता से अनजान रहते हैं. हम शायद कभी यह सोचते भी नहीं हैं कि अगर कल को इस सुलभता पर कोई संकट आ गया तो हमारा हश्र क्या होगा. इससे और ज़्यादा ख़तरनाक बत यह है कि अपनी आश्वस्तियों के चलते हम ख़तरों की आहटों, बल्कि चेतावनियों तक को अनसुना करते जाते हैं. अब यही बात देखिये ना कि भारत के नीति आयोग द्वारा ज़ारी की गई कम्पोज़िट वॉटर  मैनेजमेण्ट  इंडेक्स में दो टूक शब्दों में कहा गया है कि भारत तेज़ी से भयंकर जल संकट की तरफ़ बढ़ रहा है. इस रिपोर्ट के अनुसार सन 2030 के आते-आते आधा भारत पेयजल के लिए तरसने लगेगा. इससे भी ज़्यादा चिंताजनक बात यह है कि सन 2020 तक भारत के इक्कीस बड़े शहरों में, जिनमें दिल्ली, मुम्बई, हैदराबाद और चेन्नई जैसे महानगर भी शामिल हैं, भूजल ख़त्म हो चुका होगा. और वैसे हालात तो अभी भी कोई ख़ास अच्छे  नहीं हैं. हर बरस कोई दो लाख लोग सुरक्षित पेय जल के अभाव में दम तोड़ देते हैं. लेकिन हम हैं कि इन सारी बातों की अनदेखी कर बड़ी निर्ममता से पानी को बर्बाद करते रहते हैं. हमें जैसे कल की कोई फिक्र नहीं है.

लेकिन इसी दुखी करने वाले परिदृश्य  के बीच महाराष्ट्र के पुणे शहर से जो खबर आई  है वह अंधेरे में प्रकाश की किरण की मानिंद आह्लदित  कर देने वाली है. ख़बर यह है कि पुणे के बहुत सारे रेस्तराओं ने अपने ग्राहकों को पानी के आधे भरे हुए गिलास देना शुरु कर दिया है, और वह भी मांगने पर. हां, ज़रूरत होने पर ग्राहक और पानी मांग सकता है और वह उसे दिया भी जाता है. न केवल इतना, ग्राहक गिलासों में जो पानी छोड़ देते हैं उसे भी रिसाइकल करके पौधों को सींचने या सफाई के काम में इस्तेमाल कर लिया जाता है. पुणे के रेस्टोरेण्ट एण्ड होटलियर्स असोसिएशन के अध्यक्ष गणेश शेट्टी बताते हैं कि अकेले उनके कलिंगा नामक रेस्तरां में हर रोज़ करीब आठ सौ ग्राहक आते हैं और उन्हें आधा गिलास पानी देकर वे रोज़ आठ सौ लिटर पानी बचाते हैं. पुणे के ही एक अन्य रेस्तरां के मालिक ने अपने यहां लम्बे गिलासों की बजाय छोटे गिलास रखकर पानी बचाने के  अभियान में सहयोग दिया है. बहुत सारे होटल वालों ने अपने शौचालयों को इस तरह से बनवाया है कि उनमें पानी की खपत पहले से कम होती है. अनेक प्रतिष्ठानों ने वॉटर  हार्वेस्टिंग प्लाण्ट लगवा लिये हैं और अपने कर्मचारियों को कम पानी इस्तेमाल करने के लिए प्रशिक्षित कराया है. गणेश शेट्टी की इस बात  को सबने अपना मूल  मंत्र बना लिया है कि पानी की एक एक बूंद कीमती है और अगर हमें अपने भविष्य को बचाना है तो अभी से सक्रिय होना होगा.

मुम्बई के पास स्थित पुणे के निवासियों ने कोई दो बरस पहले पहली दफा जल संकट की आहटें सुनी थी. तब फरवरी और मार्च के महीनों में वहां जल आपूर्ति आधी कर दी गई थी, और एक दिन छोड़कर पानी सप्लाई किया जाता था. तभी सरकार की तरफ से जल के उपयोग-दुरुपयोग के बारे में कड़े निर्देश ज़ारी कर दिये गए थे और लोगों को सलाह दी गई थी कि वे अपनी अतिरिक्त जल  ज़रूरतों के लिए बोरवेल भी खुदवाएं. इन दो महीनों के लिए शहर में तमाम निर्माण कार्यों पर रोक लगा दी गई थी, और कार गैरेज वालों को कहा गया था कि वे केवल जल रहित यानि सूखी सर्विसिंग करें. होटलों के स्विमिंग पूल बंद कर दिये गए, वहां होने वाले लोकप्रिय रेन वॉटर आयोजनों को प्रतिबंधित कर दिया गया और यहां तक हुआ कि होली पर भी पानी का इस्तेमाल नहीं किया गया. इस तरह पानी के हर दुरुपयोग को रोकने की कोशिश की गई और जिसने भी निषेधों का उल्लंघन किया उसे भारी जुर्माना भरना पड़ा. फिर अक्टोबर से स्थायी रूप से पानी की दस प्रतिशत कटौती लागू कर दी गई.  हालांकि पिछले बरस पुणे में ठीक ठाक बारिश  हुई थी फिर भी कुछ तो मौसम में आए बदलाव, कुछ बढ़ते शहरीकरण और कुछ पानी बर्बाद करने की हमारी ग़लत आदतों की वजह से अब फिर वहां जल संकट के गहराने की आहटें सुनाई देने लगी हैं. लग रहा है कि हालात पहले  से भी बदतर हो गए हैं, इसलिए पानी बचाने के लिए और अधिक सक्रियता ज़रूरी हो गई है. इसी क्रम में वहां के होटलों और रेस्तराओं ने यह सराहनीय क़दम उठाया है. वैसे, पुणे देश का एकमात्र ऐसा शहर नहीं है जहां जल संकट इतना सघन हुआ है. पिछले बरस शिमला से भी ऐसी ही ख़बरें आई थीं, और इन समाचारों ने भी सबका ध्यान खींचा था कि उद्यान नगरी बेंगलुरु  में भी पानी की कमी हो रही है. ऐसे में पुणे के होटल व रेस्तरां व्यवसाइयों की इस पहल का न केवल स्वागत, बल्कि अनुकरण भी किया जाना चाहिए.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 18 दिसम्बर, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, December 4, 2018

हमने ही नहीं औरों ने भी बदले हैं अपने शहरों के नाम!


यह बहुत दिलचस्प बात है कि अपनी अनेक असमानताओं के बावज़ूद आजकल भारत और ऑस्ट्रेलिया में एक बात समान देखी जा सकती है. यह समानता है नाम परिवर्तन को लेकर चल रही बहसों के मामले में. जहां हमारे अपने देश में हाल में कई शहरों के नाम बदले गए हैं और अब कई अन्य शहरों के नाम बदलने के सुझाव-प्रस्ताव सामने आ रहे हैं और इस बदलाव को लेकर लोगों के मनों में खासा उद्वेलन है, वहीं सुदूर ऑस्ट्रेलिया में भी कुछ-कुछ ऐसा ही हो रहा है. इसी माह के प्रारम्भ में सिडनी की सिटी काउंसिल ने अपने शहर के एक पार्क के नाम को बदलने के प्रस्ताव को सर्व सम्मति से स्वीकृति दी है. अब तक इस पार्क को प्रिंस एल्फ्रेड पार्क  नाम से जाना जाता था, लेकिन नवम्बर 2017 में इस पार्क में कोई तीस हज़ार ऑस्ट्रेलियाई नागरिक समलिंगी विवाह (सेम सेक्स मैरिज) पर राष्ट्रीय मतदान का परिणाम जानने के लिए एकत्रित हुए थे. इसी पार्क में ऑस्ट्रेलिया का इसी मक़सद के लिए बहु चर्चित यस अभियान चला था. और जब मतदान का परिणाम अभियान चलाने वालों के पक्ष में आया (और इस कारण बाद में उस देश के कानून में बदलाव हुआ) तो पार्क में ज़बर्दस्त उत्सव मनाया गया. इसी अभियान और उत्सव की स्मृति को स्थायी बनाने के लिए सिडनी के इस पार्क का नया नामकरण किया गया- इक्वलिटी ग्रीन. इस नए नाम परिवर्तन से पहले भी ऑस्ट्रेलिया में अनेक जगहों के नाम बदलने की चर्चाएं चलती रही हैं.

असल में ऑस्ट्रेलिया में एक समूह है जो इस बात पर बल देता है कि इस देश की जड़ों और इसके भविष्य को मद्देनज़र रखते हुए बहुत सारे नामों को इस तरह बदला जाना ज़रूरी है कि उनसे एक अधिक समकालीन ऑस्ट्रेलिया का बोध हो सके. इस तरह के लोगों का प्रतिनिधित्व  करने वाली ऑस्ट्रेलियाई राजधानी क्षेत्र की एक राजनीतिज्ञ बी कॉडी कैनबरा के कुछ क्षेत्रों का भी नाम बदलवाना चाहती हैं. उनका कहना है कि यहां के अनेक नाम ऐसे  हैं जो या तो बुरे लोगों के नामों पर रखे गए हैं या जिन नामों की वजह से पीड़ितों को ठेस पहुंचती है. उनका कहना है कि  ये नाम या तो इसलिए रख दिये गए कि तब बहुत सारी जानकारियां उपलब्ध नहीं थीं या फिर तब बहुत सारे कामों के बारे में समाज का नज़रिया अलहदा हुआ करता था. बी कॉडी का कहना है कि नामों में बदलाव की मांग वे उन्हें मिले नागरिकों के बहुत सारे अनुरोधों के कारण कर रही हैं. इनमें से ज़्यादातर अनुरोध ऐसे लोगों के नामों से जाने जाने वाले स्थानों के बारे में हैं जिन पर आपराधिक कृत्यों में लिप्त होने के अथवा ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों पर अत्याचार करने  के आरोप हैं या फिर उनकी भूमिका युद्ध के दौरान संदिग्ध रही है. ऐसे लोगों में वे एक पूर्व गवर्नर जनरल सर विलियम स्लिम का नाम लेती हैं जिन पर 1950 में लड़कों के साथ दुराचार के आरोप लगे थे, या पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के पूर्व गवर्नर का नाम लेती हैं जिन्होंने 1834 में एक नरसंहार कराया था.

लेकिन ऑस्ट्रेलिया में भी सारे लोग उनके विचारों से सहमत नहीं हैं. ऑस्ट्रेलियाई राजधानी क्षेत्र के सह-सभापति जेफ़ ब्राउन का विचार है कि नाम परिवर्तन एक अजीब और उलझन भरा काम है क्योंकि इसकी वजह से अनगिनत लोगों को अपने सम्पर्क विवरण में बदलाव करना पड़ता है और इलेक्ट्रॉनिक नक्शों और अभिलेखों में भी बहुत सारे बदलाव करने पड़ते हैं. उनका स्पष्ट मत है कि सामान्यत: सारे नाम चिर स्थाई होते हैं. लेकिन इन दो परस्पर विरोधी मतों के बावज़ूद ऑस्ट्रेलिया में कुछ नाम बदले गए हैं. सन 2016 में एक सफल अभियान के बाद क्वींसलैण्ड के एक  द्वीप का जो नाम उसके ब्रिटिश खोजकर्ता  स्ट्रेडब्रोक के नाम पर था, उसे वहां के मूल ऑस्ट्रेलियाई निवासियों के नाम पर मिंजेरबा रखा गया. वहां की स्थानीय जंदाई भाषा में इस शब्द का अर्थ होता है धूप में द्वीप. ऑस्ट्रेलिया के उत्तरी क्षेत्र में वहां के मूल निवासियों को सम्मान देने के लिए सर्वाधिक नाम बदले गए हैं. ऑस्ट्रेलिया में वहां के मूल निवासियों के प्रति बढ़ती जा रही सदाशयता की एक झलक इस नाम परिवर्तन में भी देखी जा सकती है.

और जब बात नाम परिवर्तन की ही चल गई है तो यह भी याद कर लेना कम रोचक नहीं होगा कि दुनिया के जिन  बहुत सारे शहरों को आज हम जिन नामों से जानते हैं वे उनके बदले हुए नाम हैं. क्या आपको यह बात पता है कि अमरीका का जाना माना शहर न्यूयॉर्क पहले न्यू एम्सटर्डम  नाम से जाना जाता था? या वियतनाम का हो ची मिन्ह शहर 1976 तक  सैगोन नाम से जाना जाता था? या कनाडा के टोरण्टो और ओटावा शहर क्रमश: यॉर्क और बायटाउन नामों से जाने जाते थे? या नॉर्वे का ओस्लो 1925 तक क्रिस्टियनिया हुआ करता था!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ  उधर के अंतर्गत मंगलवार, 04 दिसम्बर, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, November 27, 2018

स्विटज़रलैण्ड में गाय के सींग बनाम सब्सिडी


यह पूरा वृत्तांत मैं आपको प्रजातंत्र के असली रूप से परिचित कराने के लिए लिख रहा हूं. घटना दुनिया के बहुत छोटे लेकिन बेहद खूबसूरत देश स्विटज़रलैण्ड की है. इस वृत्तांत से पता चलता है कि वहां किस तरह एक सामान्य व्यक्ति का सोच पूरे  देश को जनमत संग्रह के लिए प्रेरित  कर सकता है. जनतंत्र  की आधारभूत परिकल्पना भी यही है  कि हरेक की बात सुनी जाए. आपको थोड़ा पीछे यानि सन 2010 में ले चलता हूं. स्विटज़रलैण्ड का एक उनसठ वर्षीय किसान आर्मिन कापौल अपने देश के संघीय कृषि कार्यालय को एक पत्र लिखता है और जब कुछ इंतज़ार के बाद उसे लगता है कि उसके पत्र पर कोई हलचल नहीं हुई है तो वह एक अभियान छेड़ कर अपने प्रिय मुद्दे के समर्थन में एक लाख लोगों के हस्ताक्षर जुटाता है ताकि उस मुद्दे पर जनमत संग्रह कराया जा सके. मुद्दा क्या था?  रोचक बात यह है कि आर्मिन कापौल ने यह संघर्ष अपने या इंसानी हितों के लिए न करके अपने देश की गायों के लिए किया. स्विटज़रलैण्ड  में बछड़े के जन्म लेने के तीसरे चौथे सप्ताह में ही उसके सींग काट दिये जाते हैं और फिर उसका विकास बिना सींग वाले प्राणी के रूप में ही होता है. वहां यह माना जाता है कि सींग वाली गायों का रख-रखाव ज़्यादा महंगा पड़ता है. इसके अलावा, जब वे किसी बाड़े में रहती हैं तो उनके सींग कई बार अन्य गायों के लिए घातक भी साबित हो जाते हैं. इसलिए वहां बिना सींग वाली गायों को पालना ज़्यादा सुगम और व्यावहारिक माना जाता रहा है. लेकिन पिछले कुछ समय से विभिन्न संगठनों ने इस कर्यवाही को पशुओं की गरिमा के विरुद्ध मान कर इसके खिलाफ़ आवाज़ उठानी शुरु की. आर्मिन कापौल का अभियान भी इसी आवाज़ का एक हिस्सा है.

आर्मिन और उसके साथी महसूस करते हैं कि सींगों का होना न केवल गायों की पाचन शक्ति में मददगार होता है, इनसे उनकी सेहत और पारस्परिक सम्पर्क में भी मदद मिलती है. वहां बाकायदा अध्ययन कर  बहुत सारी गायों पर सींग न होने के दीर्घकालीन दुष्परिणाम भी देखे गए हैं. लेकिन यह बात तो स्वयंसिद्ध है कि अगर किसान सींग वाली गायें पालेंगे तो उनके रख रखाव का खर्च बहुत बढ़ जाएगा. इसलिए स्वाभाविक ही है कि जब बात पैसों की होगी तो किसान गायों की गरिमा और उनकी  सेहत की बजाय अपनी जेब को देखेंगे और वे उनके सींग निकालने की प्रक्रिया ज़ारी रखना चाहेंगे. और इसलिए आर्मिन कार्पोल और उनके साथी चाहते हैं कि आर्थिक  कारणों से किसान गायों को सींग विहीन करने के लिए मज़बूर न हों. यह तभी सम्भव होगा जब सरकार सींग वाली गायें रखने के लिए किसानों को सब्सिडी देने का फैसला  करे. यानि यह मुद्दा गायों से होता हुआ सब्सिडी पर जाकर टिकता है. सब्सिडी की अनुमानित राशि है डेढ़ करोड स्विस फ्रैंक. बता दूं कि एक स्विस फ्रैंक करीब सत्तर रुपयों के बराबर होता है. स्विस सरकार फिलहाल यह अनुदान राशि खर्च करने के मूड में नहीं है, और इसलिए वह तर्क दे रही है कि सींग न केवल गायों के लिए, बल्कि उनके पालकों के लिए भी ख़तरनाक होते हैं और सींग वाली गायों को रखने के लिए ज़्यादा जगह की भी ज़रूरत होती है. स्विटज़रलैण्ड के कृषि मंत्री ने तो यहां तक कह दिया है कि पशु अधिकारों के समर्थक  यह मुद्दा उठाकर अपने ही पाले में गोल करने पर उतारू हैं.

स्विटज़रलैण्ड में जनमत संग्रह की पुष्ट परम्परा है और वहां लोगों का रुझान आम तौर पर स्पष्ट नज़र भी आ जाता है. लेकिन यह एक ऐसा मुद्दा है जिस पर तराज़ू के दोनों पलड़े लगभग समान स्थिति में हैं. एक तरफ जहां ऑर्गेनिक फूड असोसिएशन और  अनेक पशु संरक्षण समूह इस मुद्दे का खुलकर समर्थन कर रहे हैं वहीं वहां की शक्तिशाली स्विस फार्मर्स  यूनियन ने अपने सदस्यों से कह दिया है कि वे जिस तरफ चाहें उस तरफ वोट दें. इसका परिणाम यह हुआ है कि एक सर्वे में 49 प्रतिशत लोग सब्सिडी का समर्थन करते पाए गए तो उनसे मात्र तीन प्रतिशत कम लोग सब्सिडी देने का विरोध करने वाले पाए गए.

जनमत संग्रह हो जाएगा और उसके परिणाम भी सामने आ जाएंगे. लेकिन हम भारतीयों के लिए यह वृत्तांत दो महत्वपूर्ण सबक छोड़ जाएगा. एक तो यह कि स्विस लोग अपनी गायों से किस हद तक प्रेम करते हैं और उनकी छोटी-से छोटी बात को लेकर कितने व्यथित और उद्वेलित होते हैं. उनके लिए गाय नारेबाजी और लड़ाई झगड़े का विषय न होकर असल लगाव का मामला है. और दूसरी बात यह कि वहां प्रजातंत्र का असली और वरेण्य रूप मौज़ूद है जो हरेक की बात सुनता और उस पर अपनी राय देने का हक़ देता है.
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 27 नवम्बर, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.