Tuesday, July 19, 2016

फ्रांस के राष्ट्रपति का महंगा केश-प्रेम

शायद पूरी दुनिया में ऐसा ही होता है. चुने जाने से पहले नेता सादगी की बातें करते हैं, अगर प्रतिपक्ष में होते हैं तो जो सत्ता में हैं उनकी फिज़ूलखर्ची की जी खोल कर आलोचना करते हैं, लेकिन जब वे खुद सत्तासीन हो जाते हैं तो जैसे कोई जादू की छड़ी घूमती है और पिछली बातें उन्हें याद ही नहीं रहतीं हैं. भारत में तो हम इस प्रवृत्ति के इतने अभ्यस्त हो चुके हैं कि अब ऐसा होना हमें न तो चौंकाता है और न व्यथित करता है. हममें से बहुत सारे  लोग यह भी मानते हैं कि कथनी और करनी का यह भेद औरों की तुलना में हम भारतीयों में अधिक है. लेकिन अब  सुदूर फ्रांस से जो ख़बर आई है उसने हमारे इस सोच को डगमगा दिया है. फ्रांस में सन 2012 में हुए राष्ट्रपति के चुनाव में फ्रांस्वां ओलांद विजयी रहे थे. उनसे पहले 2007 से 2012 तक वहां के राष्ट्रपति थे निकोलस सार्कोजी, जो अपनी खासी महंगी और विलासितापूर्ण जीवन शैली के लिए लगातार चर्चाओं में रहे थे. इनके खिलाफ़ अपने चुनाव अभियान में फ्रांस्वां ओलांद ने अपने सादे  जीवन का भरपूर यशोगान  किया था और खुद को मिस्टर नॉर्मल के रूप में जनता के सामने पेश किया था. जीत जाने के बाद उन्हें समाजवादी राष्ट्रपति ही कहा  भी गया. लेकिन अब उन्हीं के अंत:पुर से जो ख़बरें बाहर आई हैं उनसे उनकी कौशल पूर्वक निर्मित यह सादगीपूर्ण छवि पूरी तरह नष्ट हो गई है. 

फ्रांस के एक व्यंग्यात्मक साप्ताहिक अख़बार ले-कानार-एंशेने में यह बात उजागर हुई है कि राष्ट्रपति महोदय ने अपने थोड़े-से बचे बालों की साज-संवार  के लिए अनुबंध पर एक हेयर ड्रेसर रखा है. इस हेयर ड्रेसर का नाम ओलिवर बी. बताया गया है. इस हेयर ड्रेसर को प्रतिमाह दस हज़ार यूरो (भारतीय मुद्रा में करीब 7.15 लाख रुपये) के अनुबंध  पर पूरे पांच साल के लिए रखा गया है. यानि इसे  पांच बरस में छह लाख यूरो का  भुगतान होगा. इन ओलिवर  महाशय को इस नियमित वेतन के अलावा मकान, वितीय सहायताएं  और अन्य परिवार विषयक सुख सुविधाएं भी देय हैं. दस हज़ार यूरो प्रतिमाह की यह राशि कितनी बड़ी है इसे समझने के लिए यह जान लेना काफी होगा कि इन राष्ट्रपति महोदय के काबिना सदस्यों को 9,940 यूरो का वेतन देय होता है और खुद राष्ट्रपति महोदय को 14,910 यूरो प्रतिमाह वेतन के रूप में मिलते हैं. अनुबंध के अनुसार ओलिवर को चौबीसों घण्टे राष्ट्रपति महोदय की सेवा में हाज़िर रहना होता है.  वे राष्ट्रपति जी की विदेश यात्राओं में भी उनके साथ जाते हैं. हर सुबह, हर भाषण से पहले और जब भी राष्ट्रपति जी चाहें ओलिवर को उनकी सेवा में उपस्थित होना होता है. अनुबंध में यह भी उल्लिखित है कि वे अपने काम आदि के बारे में और उस दौरान प्राप्त सूचनाओं को लेकर  पूरी गोपनीयता बरतेंगे. ओलिवर की सेवा शर्तें  इतनी कड़ी है कि उन्हें अपनी संतान के जन्म के अवसर पर भी छुट्टी नहीं मिल सकी.

कोई व्यक्ति, भले ही वह किसी देश का  राष्ट्रपति ही क्यों न हो, अपनी साज सज्जा कैसे करे, यह उसका निजी मामला है और इस पर कोई बहस होनी नहीं चाहिए. लेकिन फ्रांस्वां ओलांद का अपने बालों से यह मोह चर्चा का विषय इसलिए बन गया कि ओलिवर बी. की यह  नियुक्ति सरकारी खर्चे पर की गई है. और जब खुद सरकार ने इस बात का पुष्टि कर दी है तो इस बात को सनसनीखेज पत्रकारिता या विरोधियों की दुर्भावना का नाम भी नहीं दिया जा सकता.

इधर फ्रांस्वां ओलांद के नेतृत्व वाली सरकार अर्थव्यवस्था में तथाकथित सुधार के लिए उठाए गए बहुत सारे कदमों के लिए न केवल निन्दा वरन हिंसक प्रदर्शनों तक का सामना कर रही है, और  इनकी  वजह से उनकी लोकप्रियता का ग्राफ इतना नीचे गिर चुका है कि उन्हें फ्रांस का अब  तक का सबसे अलोकप्रिय राष्ट्रपति कहा जाने लगा है. अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकने के लिए वे कम्पनियों के लिए अपने कर्मचारियों को दी जाने वाली  सुविधाओं में कटौती और उन्हें नौकरी से निकालने की राह सुगम करते जा रहे हैं. ऐसे में स्वाभाविक ही है कि अपने  धन  का ऐसा दुरुपयोग  जनता को अप्रिय लगा है. सोशल मीडिया पर चटखारे लेकर इसकी चर्चाएं हो रही हैं.  लोग यह भी नहीं भूल सके हैं कि पूर्व  राष्ट्रपति निकोलस सार्कोजी ने अपनी सेवा में एक मेकअप आर्टिस्ट तैनात कर रखा था जिसे हर माह आठ हज़ार यूरो का भुगतान  किया जाता था. जनता पूछ रही है कि दोनों में क्या अंतर है?

इस तरह की ख़बरों से लगता है कि जनता की  गाढ़ी कमाई के पैसों को पानी की तरह बहाने के काम में किसी भी देश के नेता पीछे नहीं रहना चाहते हैं.
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जयपुर  से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 19 जुलाई, 2016 को चर्चा में फ्रांस के राष्ट्रपति का महंगा केश-प्रेम शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 


Tuesday, July 12, 2016

सिटी ऑफ कल्चर का जश्न एक अनूठे अन्दाज़ में

हाल में इंग्लैण्ड के पूर्वी यॉर्कशायर के किंग्स्टन शहर  में एक अनूठा आयोजन हुआ. अमरीका के एक जाने-माने छायाकार स्पेंसर ट्यूनिक ने इस किंग्स्टन शहर की  फेरेन्स आर्ट गैलेरी के बुलावे पर करीब बत्तीस सौ लोगों का एक इंस्टॉलेशन निर्मित करवाया. फेरेन्स गैलेरी वालों ने यह आयोजन अगले बरस हल शहर को यूके सिटी ऑफ कल्चर के रूप में  नामित किये जाने के उत्सव के एक अंग के रूप में किया था. न्यूयॉर्क के मिडलटाउन के एक यहूदी परिवार में जन्मे फोटोग्राफर स्पेंसर ट्यूनिक की ख्याति ऐसे ही विशालकाय इंस्टॉलेशन को शूट करने के लिए है. वे पिछले बीस बरसों में सिडनी के ऑपेरा हाउस, मॉण्ट्रियल के प्लेस डेस आर्ट्स, मेक्सिको सिटी, विएना के एरनेस्ट हैप्पल स्टेडियम और जर्मनी के म्यूनिख शहर जैसे अनेक बड़े सांस्कृतिक केन्द्रों पर ऐसे नब्बे से ज़्यादा आर्ट इंस्टॉलेशन बनवा और उन्हें शूट कर  चुके हैं.

स्पेंसर ट्यूनिक के इस इंस्टॉलेशन  के लिए काफी पहले से तैयारियां शुरु कर दी गई थीं और नागरिकों से अनुरोध किया गया था कि वे इसके लिए पंजीकरण करा लें. इस इंस्टॉलेशन के लिए स्पेंसर को ढाई से तीन हज़ार के बीच लोगों  की ज़रूरत थी लेकिन नागरिकों का  उत्साह इतना सघन था कि बत्तीस सौ नागरिक निर्धारित स्थल पर पहुंच गए. हल के सिटी सेण्टर को जाने वाले सारे रास्ते आधी रात से अगली सुबह दस बजे तक के लिए बन्द कर दिये गए थे. नागरिक गण बताए गए स्थान पर सुबह तीन बजे से एकत्रित होने लगे थे. उनमें युवा भी थे और वृद्ध भी. सशक्त भी और अशक्त भी. तेज़-तेज़ चल कर आने वाले भी तो बैसाखियों के सहारे बमुश्क़िल आने वाले या व्हील चेयर्स पर बिठा कर लाये जाने वाले भी. और अब इस इंस्टॉलेशन की खास बात बता दूं. इस इंस्टॉलेशन में सारे नागरिकों को निर्वस्त्र होकर हिस्सा लेना था. उनकी सहायता के लिए बहुत सारे अवैतनिक स्वयंसेवक भी मौज़ूद थे जिन्होंने उन्हें निर्वस्त्र होने में और फिर उनकी देहों को रंगने में मदद की. इन स्वयंसेवकों को ‘न्यूड रेंगलर्स’  अर्थात निर्वस्त्र लड़ाकों का नाम दिया गया था. करीब तीन घण्टे चले इस फोटो शूट के लिए इन तीन हज़ार दो सौ लोगों को अपने तमाम वस्त्रादि उतार कर अपनी देह को चार अलग-अलग शेड्स वाले नीले रंग से रँगना था. इन चार शेड्स का चयन फेरेन्स की आर्ट गैलेरी के संग्रहालय की  कृतियों के आधार पर किया गया था.

जहां तक भाग लेने वालों की देह को रंगने का सवाल है, आयोजकों ने इसके पीछे दो मक़सद बताए. एक तो यह कि नीला रंग समुद्र का प्रतीक है और यह आयोजन वहां के समुद्रीय इतिहास की स्मृति में है और  इसीलिए ये  इंस्टॉलेशन किंग्स्टन शहर के समुद्रीय  इतिहास के लिहाज़ से महत्वपूर्ण एकाधिक स्थलों पर किए गए थे,  और दूसरी बात यह कि भाग लेने वालों को यह एहसास होगा कि उनके शरीर पर कोई आवरण तो है, भले ही वह रंग का ही क्यों न हो. यानि इस तरह उन्हें अपने संकोच से निज़ात मिल सकेगी. लेकिन जिन लोगों ने इस इंस्टॉलेशन में भाग लिया, उनमें से अधिकांश की प्रतिक्रियाओं से लगा कि उनके मन में संकोच जैसा कोई भाव आया ही नहीं. उदाहरण के लिए इस समूह में शामिल अस्सी वर्षीय कला संग्राहक स्टीफेन जानसेन को लीजिए जो चौंसठ बरस की उम्र से इस तरह के आयोजनों का हिस्सा बन रहे हैं और अब तक बीस बार उनमें शिरकत कर चुके हैं. उन्हें नग्नता की अपेक्षा शीत का भय था, लेकिन फिर उन्हें यह भी  याद आया कि 2008 में डब्लिन में तो मौसम बहुत ज़्यादा सर्द था.   

इतने बड़े जन समूह को देख स्पेंसर स्वाभाविक रूप से आह्लादित थे. उन्हें लगा जैसे एक विशालकाय किंतु नाज़ुक-लचीली  नीली देह और कंक्रीट की दुनिया आमने-सामने है और इसमें वे एक दिलचस्प गति देख रहे थे. इस मंज़र की एक और व्याख्या उन्होंने इस तरह की कि नीले जन समूह में उन्हें मौसम के बदलाव के कारण आया समुद्री ज्वार समुद्र दिखाई दिया. उन्हें लगा जैसे इन देहों के माध्यम से पूरी मानवता ही शहर की गलियों में प्रवाहित हो रही है.  
    
इन इस्टॉलेशंस पर आधारित स्पेंसर ट्यूनिक के छायाचित्रों की प्रदर्शनी सन 2017 में उस वक़्त आयोजित की जाएगी जब इस हल शहर को यूके सिटी ऑफ कल्चर घोषित करने के उत्सव आयोजित होंगे. यूके में हर चौथे साल किसी शहर को सिटी ऑफ कल्चर घोषित किया जाता है. आयोजकों का खयाल है कि इस इंस्टॉलेशन  के माध्यम से वे अपने शहर के हज़ारों लोगों को कलाकृति का हिस्सा बनने का भी अवसर दे रहे हैं. इंस्टॉलेशन में भाग लेने वले नागरिकों को हालांकि कोई पारिश्रमिक देय नहीं है, उनमें से जिनकी वय 18 से अधिक है उन्हें इस कृति का एक सीमित संस्करण वाला छायाचित्र प्रदान किया जाएगा.

इस इंस्टॉलेशन की जो छवियां अभी सामने आई हैं वे निस्संदेह स्पेंसर के काम के प्रति गहरी उत्कंठा जगाती हैं.
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 12 जुलाई, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.     

Tuesday, July 5, 2016

साथ बैठने वाला प्रभावित करता है आपकी ड्राइविंग

शायद इस बात से थोड़ा सुकून मिले कि युवाओं द्वारा बेहद तेज़ गति से वाहन चलाकर दुर्घटनाएं  करने की समस्या से अकेले हम भारतवासी ही त्रस्त नहीं हैं. अगर अमरीका के एक अन्वेषण  केन्द्र की रपट पर भरोसा करें तो वहां युवा  लोगों की  मृत्यु का सबसे बड़ा कारण ट्रैफिक दुर्घटनाएं ही हैं, और अकेले एक बरस (2014) में वहां इन दुर्घटनाओं ने 2600 किशोरों को मौत के घाट उतार दिया. जहां इस बात पर संतोष किया जा सकता है कि सतत प्रयासों से 2005 से 2014 तक आते-आते इन प्राणघातक दुर्घटनाओं की संख्या में पचास प्रतिशत की कमी लाई जा सकी है, वहीं इस बात पर चिंता  होना भी स्वाभाविक है कि 2014 से 2015 तक आते-आते इनमें दस प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है.

लेकिन जैसी अमरीका की रिवायत है वहां इंसान  की जान को वाकई कीमती समझा जाता है और उसे बचाने के हर मुमकिन प्रयास किये जाते हैं. अमरीका में, बावज़ूद इस बात के कि हर राज्य के अपने नियम-कानून हैं, सामान्यत: ड्राइविंग लाइसेंस मिलना बहुत आसान नहीं माना जाता है. लेकिन अब इन नियमों को और कठोर बनाने के लिए सोचा जाने लगा है. इसी के साथ वहां के विश्वविद्यालय और शोध संस्थान लगातार शोध करते हुए दुर्घटनाओं के कारणों और उनसे बचाव के तौर-तरीकों पर गहन और प्रामाणिक शोध करते रहते हैं और इस तरह की शोधों के परिणामों को नई नीतियों के निर्माण के वक़्त समुचित अहमियत भी दी जाती है. अब इसी बात को लीजिए कि वहां की एक काउण्टी में 2004 में हुई एक सड़क दुर्घटना में एक हाईस्कूल की फुटबॉल टीम के तीन खिलाड़ियों की मृत्यु के बाद से शुरु हुआ शोध का सिलसिला अब तक ज़ारी है. तब नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ ने लेज़र उपकरणों  और वीडियो कैमरों से लैस शोधकर्ताओं की कई टीमों  को भेजकर यह पड़ताल शुरु की थी कि किसी युवा के साथ अगर गाड़ी में कोई अन्य व्यक्ति भी हो तो उसकी ड्राइविंग पर उसकी उपस्थित का क्या प्रभाव होता है. तब शोधकर्ताओं ने पाया कि अगर गाड़ी में युवा लोग सवार हों तो दुर्घटना की आशंकाएं अधिक होती हैं.

और अब उसी शोध को आगे बढ़ाते हुए इसमें ड्राइविंग सिम्यलेशंस और ब्रेन स्कैन्स  को भी  शामिल कर लिया गया है. इस शोध में एक प्रयोग यह किया गया कि सोलह से अठारह बरस के आयु समूह के ऐसे कुछ युवाओं से जिन्हें हाल ही में डाइविंग लाइसेंस मिला था, कहा गया कि उनमें से हरेक के साथ एक और युवा को बिठाकर ड्राइविंग सिम्यलेशन किया जाएगा. और यहीं एक छल किया गया. उनके साथ जिस युवा को बिठाया गया वो खास तौर पर इस काम के लिए प्रशिक्षित था और एक स्क्रिप्ट के तहत बर्ताव कर रहा था. ऐसे दो तरह के युवाओं को इन नए ड्राइवर युवाओं के साथ बिठाया गया. एक वर्ग का युवा कुछ देर से पहुंचता है और आते ही कहता है कि मुझे देर हो जाने की वजह यह है कि मैं धीमे ड्राइव करता हूं, और फिर रास्ते में हर पीली बत्ती पर भी गति धीमी करता रहा. दूसरे वर्ग का  युवा भी इसी तरह देर से आया, लेकिन आते ही बोला कि देरी के लिए माफी चाहता हूं. आम तौर पर तो मैं काफी तेज़ ड्राइव करता हूं लेकिन आज मुझे बहुत सारी लाल बत्तियों पर रुकना पड़ा. इसके बाद ये लोग अपने-अपने साथियों के साथ सिम्युलेटर्स  पर बैठते हैं. नया आया युवा ड्राइव करता है और जो पहले वाला और वास्तविक युवा ड्राइवर  है वह उसके साथी के रूप बैठ जाता है. बाद में आए दोनों युवा अपनी-अपनी भूमिकाओं के अनुरूप यानि एक संयत तरह से और दूसरा आक्रामक तरह से ड्राइव करते हैं. और इसके बाद असल युवा ड्राइवरों  को ड्राइव करने को कहा जाता है.


जो परिणाम सामने आते हैं वे बहुत अहम हैं. आक्रामक युवा के साथ जो युवक बैठा था, जब वो वाहन चलाता है तो खुद भी आक्रामक और ग़ैर ज़िम्मेदार हो जाता है. इसके विपरीत, संयत युवा के साथ जो युवक बैठा था जब उसे खुद गाड़ी चलानी होती है तो उसका बर्ताव संयत ही रहता है. इससे यह निष्कर्ष निकाला गया कि ड्राइव करने वाले के साथ जो व्यक्ति बैठता  है उसका असर ड्राइव करने वाले पर ज़रूर पड़ता है. और इससे संग़ति को लेकर हमारे यहां प्रचलित बहुत सारे कथनों को भी बल मिलता है. अमरीका में इस तरह के अनेक प्रयोग किये गए हैं और उन सभी के नतीजे करीब-करीब एक जैसे हैं. इन नतीज़ों के आधार पर अब वहां ड्राइविंग को और अधिक सुरक्षित और ज़िम्मेदारीपूर्ण बनाने के लिए विभिन्न कार्ययोजनाएं तैयार की जा रही हैं.

आशा की जानी चाहिए कि हमारे यहां भी वक्तव्यों और घोषणाओं के पार जाकर कुछ ठोस और सकारात्मक किया जाएगा.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 05 जुलाई, 2016 को इसी शीर्षक से प्र्काशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, June 28, 2016

मॉडर्न आर्ट यानि आधुनिक कला को लेकर इतने सारे लतीफे प्रचलन में हैं कि हममें से शायद ही कोई हो जिसे तुरंत इस तरह के कुछ रोचक प्रसंग याद न आ जाएं! कहना  अनावश्यक है कि ये सब शरारती दिमागों की उपज हैं और यथार्थ से इनका शायद ही कोई सम्बन्ध हो. लेकिन हाल में अमरीका के सैन फ्रांसिस्को शहर में अवस्थित विख्यात आधुनिक कला संग्रहालय (म्यूज़ियम ऑफ मॉडर्न आर्ट) में जो घटित हुआ उसने यह सोचने को मज़बूर कर दिया है कि क्या पता इन लतीफों में यथार्थ का भी कुछ पुट हो. हुआ यह कि टी जे खयातैन  नामक एक सत्रह वर्षीय किशोर अपने कुछ साथियों के साथ इस संग्रहालय को देखने गया. 1935 में स्थापित इस  संग्रहालय  के एक लाख सत्तर हज़ार वर्गफीट क्षेत्र में पेण्टिंग, स्थापत्य, फोटोग्राफी, मूर्तिकला, डिज़ाइन और मीडिया आर्ट की तैतीस हज़ार कृतियां प्रदर्शित हैं और  और यह न सिर्फ अमरीका के सबसे बड़े संग्रहालयों में से एक है, आधुनिक और समकालीन कला के लिहाज़ से इसे दुनिया के बेहतरीन संग्रहालयों में शुमार किया जाता है. 

तो इस टी जे खयातैन को संग्रहालय की बहुत सारी कलाकृतियों ने बेहद प्रभावित किया, लेकिन  कुछ कलाकृतियां उसे बेहद सामान्य भी लगीं. जैसे जब उसने एक भूरे-से कम्बल पर एक स्टफ्ड पशु जैसी कलाकृति को देखा तो उसके जेह्न में यह सवाल उठा कि आखिर इसमें कलात्मक क्या है? उसने अपने आस-पास के अन्य कलाप्रेमियों से भी जानना चाहा कि क्या वो कृति उन्हें भी उतनी ही सामान्य लग रही है? लेकिन यह पूछते हुए उसके मन में यह बात भी आई कि जब कलाप्रेमी किसी संग्रहालय में जाते हैं तो वे जो कुछ भी उस संग्रहालय के परिवेश के बीच देखते हैं उसी में उन्हें कला के दर्शन होने लगते हैं और वे उसकी कलात्मक व्याख्या भी करने लगते हैं.

टी जे खयातैन के शरारती दिमाग में विचार आया कि क्यों न इस बात को आजमा कर ही देख लिया जाए! पता चल जाएगा कि आधुनिक कला की हक़ीक़त क्या है. इस संग्रहालय में प्रदर्शित हर कृति महान है या यहां कुछ भी प्रदर्शित कर दो तो उसे महान मान लिया जाता है.  तो उसने किया यह कि संग्रहालय के चमकीले फर्श पर अपना ऐनक रख दिया और फिर थोड़ा दूर खड़ा होकर वहां आने-जाने वालों की प्रतिक्रियाएं देखने लगा. उसके साथ उसके दोस्त भी थे. उन लोगों ने पाया कि कुछ ही क्षणों  में ‘कलाप्रेमी’ उस ‘कलाकृति’ के इर्द गिर्द जुटने लगे. वे बहुत तल्लीनता और बारीकी से उसका अवलोकन कर रहे थे, उसकी गम्भीर व्याख्याएं कर रहे थे, और कुछ तो अलग-अलग कोणों से उसकी छवियां भी अपने कैमरों में कैद कर रहे थे. कुछ दर्शकों ने तो उस मामूली ऐनक को उत्तर आधुनिक कला का मास्टरपीस तक घोषित कर दिया. टी जे खयातैन ने बाद में कहा कि मुझे लगा जैसे वे दर्शक गण उस ऐनक को वर्तमान संस्कृति के मूक होते जाने की अभिव्यक्ति की तरह देख रहे थे या यह मान रहे थे कि इस कृति के माध्यम  से कलाकार ने ज़िन्दगी को चश्मे के शीशों  के माध्यम से देखना चाहा है. खयातैन को लगा जैसे दर्शक मायोपिया (निकट दृष्टि दोष) या रियल आईज़ (असल नेत्र) जैसे शीर्षक वाली किसी कृति का अवलोकन कर रहे हैं.

इस किशोर ने संग्रहालय के फर्श पर रखे इस ऐनक और उसे सराहते दर्शकों की छवि को अपने कैमरे में कैद कर जब ट्विटर पर पोस्ट किया तो वो छवि फौरन ही वायरल हो गई और सिर्फ एक दिन में उसे चालीस हज़ार  लोगों ने साझा कर डाला. और जैसे इतना ही पर्याप्त न हो, उसे ट्विटर मोमेण्ट में भी शुमार कर लिया गया. लेकिन इस सबके बावज़ूद, यह किशोर टी जे खयातैन आधुनिक कला का प्रशंसक है. उसका कहना है कि हो सकता है कभी-कभी आधुनिक कला को लेकर कोई चुहल हो जाए, लेकिन अंतत: तो यह हमारी सर्जनात्मकता को अभिव्यक्ति देने का एक सशक्त माध्यम है. हो सकता है कुछ को इसमें मज़ाक नज़र आए, लेकिन बहुतों को इसमें आध्यात्मिकता के भी तो दर्शन होते हैं. मॉडर्न आर्ट के बारे में उसके इस निष्कर्ष से शायद ही कोई असहमत हो कि यह खुले और कल्पनाशील मन वालों के लिए आनंदप्रद है.

और यहां तक इस शरारत का सवाल है, यह याद कर लेना भी प्रासंगिक होगा कि ऐसी शरारतें होती ही रहती हैं. सन 2014 में किसी ने ऐसी ही शरारत रेस्तरां समीक्षकों को मैक्डॉनल्ड के उत्पाद  परोस कर भी की थी.  इन्हें बहुत गम्भीरता से लेने की बजाय इनका लुत्फ लेकर भुला दिया जाना चाहिए.


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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 28 जून, 2016 को जनाब, यह है मॉडर्न आर्ट का मास्टरपीस शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.  

Tuesday, June 21, 2016

फ्रांस से शुरु हुआ नई तरह का जन-आन्दोलन

इस बरस मार्च के आखिरी दिन से फ्रांस की राजधानी पेरिस से एक नई तरह के आन्दोलन का सूत्रपात हुआ है. हिन्दी में इस आन्दोलन को कहा जा सकता है ‘जागो  सारी रात!’ और जैसा कि नाम से ही ज़ाहिर हो जाता है, हर शाम छह बजते-बजते लोग पेरिस के रिपब्लिक चौक में इकट्ठा होते हैं और विभिन्न मुद्दों पर अपनी बात कहते हैं. पृष्ठभूमि में यह बात कि   पेरिस  में फरवरी माह में कोई तीन चार सौ लोग मिले और यह विचार करने लगे कि ऐसा क्या किया जाए कि सरकार थोड़े दबाव में आए. और तब एक विचार यह भी आया कि क्यों न लोग एक जगह एकत्रित हों और घर जाएं ही नहीं. बस इसी विचार से जन्मा यह आन्दोलन.   इसकी  शुरुआत हुई फ्रांस के जटिल  श्रम कानून को शिथिल बनाने वाले वहां की वर्तमान सरकार के तथाकथित सुधारवादी कदमों का विरोध करने के लिए लोगों के इकट्ठा होने से. पहला अनुभव बहुत दिलचस्प रहा. लोग पेरिस के उस चौक में इकट्ठा होने ही लगे थे  कि मूसलाधार बारिश होने लगी. इसके बावज़ूद लोग आते रहे और डटे रहे. काफी देर बाद बारिश रुकी, लेकिन लोग फिर भी वहां से गए नहीं. और फिर हर रोज़ लोग वहां जुटने लगे. तब इस आन्दोलन का कोई सुविचारित स्वरूप निर्धारित नहीं  था. चौक में अनगिनत लोग सिर्फ इस आस में इकट्ठा हो गए थे कि सरकार उनकी मांगों की तरफ ध्यान देगी. न आन्दोलन का कोई नेता था और न कोई रूपरेखा. जिसकी जो मर्ज़ी में आए, बोलने लगता था. कुछ अराजक तत्वों के घुस आने की वजह से यदा-कदा यह जमावड़ा छोटी-मोटी हिंसा का शिकार भी हुआ, लेकिन आहिस्ता-आहिस्ता एक व्यवस्था  कायम होने लगी. लोग ही एक दूसरे की मदद करने लगे, संसाधन जुटाने लगे और एक आत्मीयतापूर्ण लेकिन प्रतिरोधक मेले का–सा माहौल बनने लगा.  वक्ताओं के लिए स्टैण्ड आ गया, छोटे-मोटे टैण्ट लगा दिये गए और साधारण काम चलाऊ जलपान की व्यवस्था भी हो गई. कुछ समितियां भी बना ली गई जो समाज और संविधान की नई रूपरेखाओं पर विचार करने लगी हैं. इतना ही नहीं, एक गायक समूह भी तैयार हो गया जो क्रांतिकारी गाने गाता है, और कुछ लोग नारे कविताएं भी रचने लगे हैं. ऐसा लगता है जैसे एक नया लघु समाज उभरने लगा है.


और अब जब इस आन्दोलन  चलते हुए तीन माह से ज़्यादा बीत चुके हैं, इसकी निरंतरता शेष  दुनिया का भी  ध्यान आकर्षित करने लगी है. इस आन्दोलन का बगैर किसी नेतृत्व के इतने समय तक चल जाना यह साबित करता है कि फ्रांस की जनता का अपने राजनीतिज्ञों से मोहभंग  हो चुका है और वहां की वाम सरकार यह साबित करने में नाकामयाब रही है कि वह शक्तिशाली वित्तीय संस्थाओं के दबाब से मुक्त है. लोग  अपने देश के शासन  से भी नाखुश हैं. उनमें से अनेक को लगता है कि वहां आपातकाल जैसे हालात हैं. नागरिकों पर नज़र रखने वाले नए कानून, न्याय व्यवस्था में किए गए बदलाव और सुरक्षा विषयक धर-  पकड़ का बढ़ते जाना लोगों को आहत कर रहा है.  अब यह आन्दोलन पेरिस और फ्रांस की सीमाओं से बाहर निकलकर बेल्जियम, जर्मनी और स्पेन के अस्सी  से ज़्यादा शहरों में फैल चुका है. जर्मनी से बाहर के देशों में इसी तरह के आन्दोलन के माध्यम से सरकारी बजट में कटौती, वैश्वीकरण, बढ़ती जा रही असमानता, निजीकरण और यूरोप महाद्वीप की कठोर प्रवासी  विरोधी नीतियों का विरोध  हो रहा है. किसी ने बहुत सही टिप्पणी की है कि इस जन-प्रतिरोध की शुरुआत पेरिस में नहीं हुई है और न यह फ्रांस तक सीमित रहने वाला है. यह आन्दोलन सीमा रहित है, देशों की परिधियों से मुक्त है और  जो भी इससे जुड़ना चाहते हैं उन सबका स्वागत करता है.

इस आन्दोलन का खुद-ब-खुद शुरु होना और इतने समय तक न सिर्फ जारी रहना बल्कि मज़बूत भी होते जाना इस बात की भी गवाही देता है कि अगर दुनिया में कहीं वास्तविक बदलाव आया तो उसके वाहक नागरिक गण ही होंगे. बहुत दिलचस्प  बात यह है कि अभी तक इस आन्दोलन का न  तो कोई नेता है और किसी संगठन का बैनर यहां दिखाई देता है. यह बात खुद फ्रांस वासियों को चकित करती है. इस स्वत: स्फूर्त आन्दोलन की एक महती कामयाबी यह भी है कि फ्रांस सरकार इसका नोटिस लेने को विवश हुई है और उसने युवा आन्दोलनकारियों के तात्कालिक तुष्टिकरण के लिए चार पाँच सौ मिलियन यूरो की विद्यार्थी सहायता की घोषणा कर दी है. एक सरकारी विज्ञप्ति के अनुसार इस राशि से रोज़गार की तलाश कर रहे युवा स्नातकों  को अनुदान और  अन्य काम सीखने वालों व विद्यार्थियों को सहायता दी जा सकेगी.      


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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 21 जून, 2016 को इसी शीर्षक  से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, June 14, 2016

बिना काम वेतन मिलने से दुःखी यह प्राणी

आम तौर पर हर नौकरी करने वाले की एक ही शिकायत होती है कि उससे बहुत ज़्यादा काम लिया जा रहा है. इसी शिकायत को हमारे ‘ये बेचारा काम के बोझ का मारा’ जैसे विज्ञापन भी अपना अप्रत्यक्ष समर्थन देते हैं. लेकिन हाल में सुदूर पेरिस में एक कामगार फ्रेडरिक डेस्नार्ड ने इससे भिन्न ही शिकायत की है. बहुत महंगे परफ्यूम्स के लिए विख्यात पेरिस की एक कम्पनी में दिसम्बर 2006 से काम कर रहे और वहां 2010 से 2014 के बीच जनरल सर्विस डाइरेक्टर रहे डेस्नार्ड का कहना है कि कम्पनी उनसे बिना कोई काम लिये चार हज़ार डॉलर प्रतिमाह का भुगतान करती रही. पैसा तो उन्हें  ठीक मिल रहा था, लेकिन केवल इतने भर से वो संतुष्ट नहीं थे. डेस्नार्ड ने अपने वकील की मार्फत कम्पनी पर आरोप लगाया है कि हालांकि वे एक वरिष्ठ प्रबन्धकीय पद पर नियुक्त थे, उनके  वरिष्ठ जन उन्हें  बॉय कहकर बुलाते और उनसे  अपने बच्चों को खेल के मैदान से लाने जैसे बहुत छोटे-मोटे निजी काम करवाते. बाद में तो उनके  पास करने को इतना कम काम रह गया कि उनके  बॉस ने उनसे यह कह दिया कि वो घर चले जाएं,  जब उन्हें ज़रूरत होगी वे वे बुला लेंगे, और फिर उन्होंने बुलाया ही नहीं. डेस्नार्ड का आरोप है कि उनसे  कम काम  लेने की यह प्रक्रिया उन्हें  नरक में धकेलने का एक छद्म थी और यह उनके  लिए दु:स्प्वन साबित हुई. इससे उन्हें कई किस्म की स्वास्थ्य समस्याएं होने लगीं जिनमें अल्सर, नींद की समस्या और गहन अवसाद शामिल हैं. इन्हीं समस्याओं के चलते वे  मिर्गी का दौरा पड़ने से एक कार दुर्घटना का शिकार हुए, काफी दिनों तक कोमा में रहे और  फिर उन्हें छह माह से भी ज़्यादा समय सिक लीव पर रहना पड़ा. सन 2014 में इस सिक लीव पर रहते हुए ही उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया.

डेस्नार्ड ने इस मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य क्षति के लिए तथा उन्हें न मिल सकी पदोन्नति की वजह से  हुई क्षति की एवज में कम्पनी से चार लाख डॉलर का हर्ज़ाना मांगा है. डेस्नार्ड ने अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए यह भी कहा है कि हालांकि अपनी नौकरी के काल में उन्हें बहुत कम काम देकर नैतिक और विशेष रूप से शारीरिक रूप से भी नष्ट किया जा रहा था फिर भी वे बिना किसी शिकायत के वहां बने रहे क्योंकि उन्हें पता था कि नौकरियों के लिहाज़ से बाज़ार बहुत बुरे दौर से गुज़र रहा था. डेस्नार्ड ने अपनी अवस्था के लिए एक नूतन अभिव्यक्ति ‘बोर आउट’ का प्रयोग किया है. असल में एक प्रचलित अभिव्यक्ति है ‘बर्न आउट’ जिसका आशय है किसी को बहुत ज़्यादा काम के बोझ के नीचे कुचल डालना. डेस्नार्ड की यह अभिव्यक्ति इसी का विलोम है, जिसका अभिप्राय यह  है कि किसी को बहुत कम काम देकर नष्ट कर डालना. डेस्नार्ड के वकील का कहना है कि ‘बोर आउट’ को काम की कमी की वजह से होने वाले नैतिक शून्यीकरण के रूप में समझा जा सकता है जिसके मूल में यह विचार होता है कि मुझे कुछ नहीं करने के एवज़ में इतना पैसा दिया जा रहा है.


डेस्नार्ड के वकील ने आरोप लगाया है कि कम्पनी की  तो नीयत ही यही थी कि डेस्नार्ड को इतना बोर कर डाला जाए कि वह खुद नौकरी छोड़ दे ताकि कम्पनी उसे काम से निकालने पर देने वाले बेरोज़गारी भत्ते  या और किसी भी तरह के मुआवज़े के भुगतान से बच जाए. इस वकील ने कहा कि शुरु-शुरु में तो डेस्नार्ड को ऐसा आदर्श कर्मचारी माना जाता था जो अपने काम के प्रति पूर्णतया समर्पित है. लेकिन 2009 से उसको दिए जाने वाले काम में कटौती की जाने लगी और फिर 2012 में जब कम्पनी के हाथ से एक बड़ा अनुबंध फिसल गया और कम्पनी अपने बहुत सारे कर्मचारियों को काम से निकालने पर मज़बूर होने लगी तब से उसके पास करने को कुछ रह ही नहीं गया. डेस्नार्ड की इस शिकायत पर स्वाभाविक ही उनकी नियोजक कम्पनी ने अपना बचाव किया और कम्पनी के वकील ने कहा कि अगर ऐसा था तो डेस्नार्ड अपने उच्चाधिकारियों से या किसी कर्मचारी संगठन से इस बारे में कोई शिकायत क्यों नहीं की.

कहा जा रहा है कि डेस्नार्ड का यह केस फ्रांस में अपनी तरह का पहला केस है, हालांकि वहां की अर्थव्य्वस्था बहुत बुरे दौर से गुज़र रही है. एक शोधकर्ता ने बताया है कि लगभग तीस प्रतिशत फ्रेंच कर्मचारी इसी तरह के बोर आउट अवसाद के शिकार हैं. यह भी एक तथ्य है कि अभी तक फ्रेंच कानून में इस अभिव्यक्ति बोर आउट को कोई स्वीकृति नहीं है.

देखना है कि फैसला किसके हक़ में आता है – डेस्नार्ड के या कम्पनी के!
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम  कुछ इधर कुछ उधर के अन्तर्गत मंगलवार, 14 जून, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.  


Tuesday, June 7, 2016

बेटियों के पक्ष में राष्ट्रगान में बदलाव की मांग

कनाडाई संसद में वहां के एक लिबरल सांसद मॉरिल  बेलांगर ने राष्ट्रगान में संशोधन का एक बिल पेश कर रखा  है.  वे चाहते हैं कि कनाडा के  वर्तमान राष्ट्रगान में आने वाले शब्दों ‘तुम अपने सभी बेटों में देशभक्ति जगाते हो’ को बदल कर ‘तुम हम सबमें देशभक्ति जगाते हो’ कर दिया जाए, यानि वे इसे बेटों तक सीमित नहीं रहने देना चाहते हैं. मॉरिल का कहना है कि इस संशोधन के माध्यम से वे उन स्त्रियों को भी मान देना चाहते हैं  जिन्होंने आज के कनाडा को आकार देने में अपना योग दिया है. मॉरिल ने संसद के पिछले अधिवेशन में भी यह संशोधन प्रस्तुत किया था लेकिन तब यह संशोधन इसका विरोध करने वाले 144 मतों के विरुद्ध केवल 127 मत ही पा सका था. लेकिन अब मॉरिल के इस बिल को न केवल काफी समर्थन मिल रहा है, इसे जल्दी  से जल्दी पारित करने के लिए भी प्रयास किए जा रहे हैं. इसकी वजह यह है कि मॉरिल एक असाध्य रोग से गम्भीर रूप से पीड़ित हैं,  और उनका स्वास्थ्य निरंतर गिरता जा रहा है. वे बिल्कुल भी नहीं बोल पाते हैं. यहां तक कि कनाडाई संसद में जनवरी में यह बिल भी उन्होंने अपने आइ पैड पर स्थापित एक टेक्स्ट टू स्पीच प्रोग्राम की मदद से ही प्रस्तुत किया था. चाहा जा रहा है कि यह संशोधन उनके जीवन काल में ही पारित हो जाए. जिन सांसदों ने पिछली दफा इस संशोधन का विरोध  किया था उनमें से भी अनेक इस बार इसका समर्थन कर रहे हैं.

लेकिन ऐसा भी नहीं है कि हर कोई इस संशोधन का समर्थन  ही कर रहा है. कनाडा के कंज़र्वेटिव तथा उसके सहयोगी दलों के सदस्य आम तौर पर इसके विरोध में हैं. उनका कहना है कि “राष्ट्रीय प्रतीकों में बदलाव का मार्ग बहुत फिसलन भरा है. हो सकता है कि कल को कोई वनस्पति विज्ञानी उठ खड़ा हो और कहने लगे कि हमारे राष्ट्रीय ध्वज में मेपल की पत्ती का आकार सही नहीं है इसलिए उसे बदल दिया जाए. कल को कोई और भी किसी राष्ट्रीय प्रतीक के लिए इसी तरह की मांग कर सकता है.” एक कंज़र्वेटिव सांसद एरिन ओ’टूल का कहना है कि हालांकि उन्हें मॉरिल की अवस्था  से गहरी सहानुभूति है, वे इसे उचित नहीं मानते कि कनाडा की विरासत के महत्वपूर्ण हिस्सों के साथ कोई छेड़छाड़ की जाए.

वैसे यहीं यह जान लेना भी कम रोचक नहीं होगा कि मॉरिल जो संशोधन चाह रहे हैं अगर वो कर दिया गया तो कनाडाई राष्ट्रगान का नया रूप करीब-करीब वैसा ही हो जाएगा जैसा यह 1914 से पहले था. असल में 1914 में ही ‘तुम हममें सच्ची देशभक्ति  जगाते हो’ को बदल कर ‘तुम अपने सभी बेटों में देशभक्ति जगाते हो’ किया गया था. और इसके मूल में यह तमन्ना थी कि प्रथम विश्व युद्ध के दौर में देश के लिए समुद्र पार जाने वाले युवकों में देश भक्ति  का जोश जगाया  जा सके. वैसे कनाडा के इस राष्ट्रगान  ने बदलावों के कई दौर देखे और झेले  हैं.  इस गीत की रचना मूल रूप  से फ्रेंच भाषा में 1880 में हुई थी. एक समय तो ऐसा भी रहा जब कनाडा की फ्रेंच भाषी जनता तो यह गान  गाती थी और वहां की अंग्रेज़ी भाषी जनता इसकी बजाय अंग्रेज़ी राष्ट्रगान ‘गॉड  सेव द किंग’ ही गाती थी. फिर 1906 में इस फ्रेंच राष्ट्रगान का रॉबर्ट स्टेनली वियर नामक कनाडाई कवि और जज रचित यह अंग्रेज़ी संस्करण चलन में आया. इसके बाद इसमें दो बार संशोधन हुए. इसका वर्तमान प्रचलित रूप 1980 से चलन में है.

यही यह भी बता दूं कि  अगर यह बदलाव हो गया तो अपने राष्ट्रगान में बदलाव करने वाला कनाडा पहला देश नहीं होगा. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जर्मनी ने अपने राष्ट्रगान में बदलाव किया था, तो सद्दाम हुसैन के पराभव के बाद इराक़ ने भी ऐसा ही  किया. रंगभेद खत्म कर देने के बाद दक्षिण अफ्रीका ने अपने राष्ट्रगान में बदलाव किया तो सोवियत संघ के पतन के बाद रूस के राष्ट्रगान में बदलाव किया गया. बाद में सन 2000 में व्लादीमिर पुतिन ने फिर से पुराने राष्ट्रगान  को अपना लिया लेकिन मूल के एक पद को छोड़ दिया. हाल में सन 2012 में ऑस्ट्रिया ने भी अपने राष्ट्रगान के पहले छन्द में थोड़ा बदलाव करते हुए बेटों के साथ बेटियों को भी जोड़ लिया. स्विटज़रलैण्ड में इस आलोचना के बाद कि वहां का राष्ट्रगान कुछ अधिक ही धार्मिक है, एक सार्वजनिक प्रतियोगिता के द्वारा ज़्यादा आधुनिक शब्दावली वाला गीत तलाश किया गया. एक विजेता घोषित भी कर दिया गया लेकिन स्विस सरकार ने अभी तक इस बदलाव पर मतदान नहीं कराया है.

अब देखना है कि कनाडा में यह बदलाव हो पाता है या नहीं. फिलहाल तो वहां बहसों का बाज़ार गर्म है.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 07 जून, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, May 31, 2016

तुम्हारा शॉर्ट बहुत ज़्यादा शॉर्ट है मैगी!

भारत में यह आम धारणा है कि पश्चिम और विशेष रूप से अमरीका पहनने-ओढ़ने  और आचार-विचार जैसी निजी बातों के मामले  में तमाम वर्जनाओं से मुक्त है. मान लिया गया है कि यह समाज बहुत उदार है और जैसा आपको मनचीता  करने की भरपूर और निर्बाध आज़ादी देता है. यानि कोई इस बात की परवाह नहीं करता कि आपने कैसे कपड़े पहन रखे रखे हैं,  और आप क्या खा-पी रहे हैं! आम धारणा अपनी जगह और यथार्थ अपनी जगह. यथार्थ यह कि खान-पान की पूरी आज़ादी के बावज़ूद ऐसा नहीं है कि आप कहीं भी धूम्रपान या मदिरापान  कर लें. मर्यादाओं के भीतर रहकर ही आप यह सब कर सकते हैं. 

और जहां तक कपड़ों की बात है, भले ही पश्चिम को हमने अल्प वस्त्रों और देह-प्रदर्शन का पर्याय मान लिया है, हाल की एक घटना इस मिथ को भी ध्वस्त करती है.  इस घटना का ताल्लुक है सिएटल की एक मज़ाकिया परफॉर्मर मैगी मैक मफिन से. मैगी हवाई यात्रा कर न्यूयॉर्क से बोस्टन पहुंची थी और फिर बोस्टन से सिएटल जाने के लिए फ्लाइट का इंतज़ार कर रही थी. कतार में खड़े हुए उसे कोई पौन घटा बीत चुका था कि एयरलाइंस  की एक कर्मचारी उसके पास आई और विनम्रता से उससे बोली कि फ्लाइट क्रू ने खूब सोच विचार कर उसको यह बताने को कहा है कि जो वस्त्र उसने पहन रखे हैं वे उपयुक्त नहीं हैं और पायलट  ने यह कहलवाया है कि वह इन वस्त्रों के ऊपर कुछ और पहन ले, अन्यथा उसे  यात्रा करने की इजाज़त नहीं दी जाएगी.  उसने एक लम्बी बांह वाला स्वेटर, घुटनों से ऊपर यानि जंघाओं तक के मोजे और एक बहुत छोटा शॉर्ट पहन रखा था. असल में हवाई कम्पनी को, बल्कि क्रू को उसके इसी बेहद छोटे शॉर्ट पर आपत्ति थी.

बहुत छोटे शॉर्ट पर आपत्ति की यह  बात एकबारगी तो  अविश्वसनीय लगती है, लेकिन ऐसा हुआ. मैगी ने कहा कि उसके पास और कोई वस्त्र नहीं हैं अन्यथा वो उस शॉर्ट को बदल कर कुछ और पहन लेती. उसने एयरलाइंस को यह विकल्प भी सुझाया कि वो अपने स्वेटर को खोल कर कमर पर लपेट लेगी. लेकिन पायलट  इस पर सहमत नहीं हुआ. मैगी ने यह भी सुझाया कि उसे एक कम्बल दे दिया जाए जिससे वो खुद को ढक लेगी, लेकिन उसका यह प्रस्ताव भी नामज़ूर कर दिया गया. क्योंकि आपत्ति पायलट  की तरफ से थी, एयरलाइंस ने उसके सामने यह प्रस्ताव भी रखा कि अगर वो चाहे तो उसकी बुकिंग किसी अन्य फ्लाइट में कर दी जाए.  लेकिन यह प्रस्ताव उसे स्वीकार्य नहीं था. आखिर हुआ यह कि मैगी ने हवाई अड्डे की किसी दुकान पर जाकर बाईस डॉलर में एक स्लीप ट्रंक खरीद कर उसे पहना. तब कहीं वह अपनी इच्छित फ्लाइट में बोर्ड कर सकी.

लेकिन यात्रा पूरी करने के बाद उसने कुछ वैध सवाल उठाए. उसने जानना चाहा कि उसकी जो ड्रेस न्यूयॉर्क से बोस्टन की फ्लाइट में आपत्तिजनक नहीं मानी गई वही बोस्टन से सिएटल तक की फ्लाइट में आपत्तिजनक कैसे हो गई? आखिर न्यूयॉर्क में भी तो ट्रांस्पोर्टेशन सिक्यूरिटी एडमिनिस्ट्रेशन ने उसकी  जांच कर बोर्ड करने की अनुमति दी थी. मैगी कहती है कि मुझे कहा गया कि पायलट का फैसला  अन्तिम  होता है और उस पर कोई सवाल नहीं उठाया सकता. जब एक स्थानीय समाचार चैनल ने मैगी की इस आपत्ति के हवाले से सम्बद्ध एयरलाइंस का पक्ष जानना चाहा, तो एयरलाइंस  के प्रवक्ता ने उनके हाथ में यह वक्तव्य थमा दिया: “गेट और ऑन बोर्ड  क्रू ने ग्राहक की वेशभूषा के बारे में विचार किया और वे इस फैसले पर पहुंचे कि उनके शॉर्ट्स  फ्लाइट पर मौज़ूद अन्य परिवार जन को आहत कर सकते हैं. ग्राहक को फ्लाइट के लिए मना नहीं किया गया, बल्कि उनसे नम्रतापूर्वक यह अनुरोध किया गया कि वे कपड़े  बदल लें. ग्राहक इस पर सहमत हो गईं और उनकी  यात्रा निर्बाध सम्पन्न हुई.” इसी बयान में एयरलाइंस ने यह भी कहा कि वह  “यह कठोर निर्णय करने के अपने क्रू के विवेक का समर्थन करती है. लेकिन इसी के  साथ वह  ग्राहक को नए शॉर्ट्स की लागत का पुनर्भरण करने और अपनी सद्भावना के रूप में अगली फ्लाइट में दो सौ डॉलर की  छूट देने की भी घोषणा करती है.”  लेकिन मैगी इससे संतुष्ट नहीं हैं. उनकी मांग है कि पायलट  उनसे माफी मांगे और साथ ही एयरलाइंस भी अपने यात्रियों के लिए एक सुस्पष्ट ड्रेस कोड की घोषणा करे. उन्होंने बहुत गौर तलब बात यह कही है कि मुझे लगता है कि यह बात हमारे पितृ सत्तात्मक समाज की एक ख़ास प्रवृत्ति की द्योतक है कि औरतों को छोटे कपड़े बेचे तो जाते हैं लेकिन जब वे उन्हें पहनती हैं तो उन्हें इसके लिए दण्डित किया जाता है.

बात है तो विचारणीय!   
                  
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जयपुर से प्रकशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ 

उधर के अंतर्गत मंगलवार, 31 मई, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.     

Tuesday, May 24, 2016

क्या पुलिस को भी संरक्षण मिलना चाहिए?

अपने देश में आए दिन कभी यहां से तो कभी वहां से पुलिस कर्मियों के साथ दुर्व्यवहार,  मारपीट और  यहां तक कि कभी-कभी उनकी हत्याओं तक की खबरें आती रहती हैं. पुलिस के साथ बदसुलूकी तो आम बात है और अच्छी खासी समझ रखने वाले भी उनके प्रति अपशब्दों और अपमानजनक अभिव्यक्तियों का प्रयोग करते रहते हैं. ऐसे में मुझे सुदूर अमरीका से आया एक समाचार विशेष रूप से ध्यानाकर्षक लगा. उस समाचार की चर्चा और विश्लेषण से पहले उसकी पृष्ठभूमि बता दूं.    

संयुक्त राज्य अमरीका के बहुत सारे राज्यों में उन लोगों को अतिरिक्त दण्ड देने के प्रावधान हैं जो नस्ल या धर्म के आधार पर किसी के विरुद्ध किसी भी तरह का अपराध करते हैं. यानि वहां अगर कोई किसी खास समूह से संलग्नता  के आधार पर किसी से  घृणा  करते हुए कोई अपराध करता है तो उस अपराध की गम्भीरता को बढ़ा कर देखा जाता है. सामान्यत: इस घृणा  में जातीयता, लैंगिकता या शारीरिक अक्षमता को शामिल किया जाता रहा है. लेकिन अब वहीं के एक राज्य लुइज़ियाना में बहुत जल्दी एक नया विधेयक पारित होकर लागू होने वाला है जिससे इस घृणा-अपराध कानून के तहत जन-सुरक्षा कार्मिकों (पुलिस और अग्नि रक्षक) को भी एक संरक्षक प्रजाति माना जाने लगेगा. इस विधेयक के लागू हो जाने के बाद इन सुरक्षा कार्मिकों के विरुद्ध किसी भी तरह का गम्भीर अपराध करने वालों पर पाँच हज़ार डॉलर तक का आर्थिक दण्ड या उन्हें पाँच साल के कारावास की सज़ा दी जा सकेगी. उल्लेखनीय है कि लुइज़ियाना ऐसा करने वाला अमरीका का पहला राज्य होगा. लुइज़ियाना में इस विधेयक को ‘ब्ल्यू लाइव्ज़  मैटर’  (नीली वर्दी वालों की भी जान कीमती होती है) के नाम से जाना जा रहा है. इस नामकरण का इतिहास यह है कि फर्ग्युसन  में  सन 2014 में माइकल ब्राउन नामक एक निहत्था अश्वेत किशोर पुलिस की गोलीबारी में मारा गया था और तब पुलिस की इस तथाकथित  ज़्यादती के खिलाव एक बड़ा अभियान  शुरु हुआ था जिसे ‘ब्लैक  लाइव्ज़ मैटर’ कहा गया था. अब इस ब्ल्यू लाइव्ज़  वाले नए अभियान के समर्थकों का कहना है कि ज़्यादा हमले तो पुलिस पर ही होते हैं, जबकि असल   में तो वह  कानून व्यवस्था स्थापित करने के अपने दायित्व का ही निर्वहन कर रही होती है.
इस बात की पुष्टि  नेशनल लॉ एन्फोर्समेण्ट मेमोरियल फंड के इस दावे से भी होती है कि सन 2015 में कम से कम 124  पुलिस अधिकारी अपना कर्तव्य निर्वहन करते हुए मारे गए थे. एफबीआई ने भी पिछले सप्ताह जो आंकड़े ज़ारी किए हैं उनके अनुसार सन 2015 में 41 कानून और व्यवस्था अधिकारी अपना कर्तव्य पालन करते हुए दुर्भावनापूर्वक मार डाले गए थे.

स्वाभाविक ही है कि इस तरह के हमलों ने प्रभावितों को और सरकार को विचलित किया है. लेकिन लुइज़ियाना राज्य जो कदम करीब-करीब उठा चुका है उससे सभी सहमत हों, ऐसा फिर भी नहीं है. न्यू ऑर्लियंस स्थित ब्लैक यूथ प्रोजेक्ट 100 ऐसा ही एक एक्टिविस्ट समूह है जो इस कदम से तीव्र असहमति रखता है. अपने तीव्र प्रतिवाद में उसने  कहा है कि घृणा-अपराध विधेयक में पुलिस को भी एक संरक्षित वर्ग के रूप में शामिल कर लेने से एक ऐसी संस्था को और अधिक संरक्षण मिलने लगेगा जो पहले से ही अपने कर्म, नीति और प्रभाव में आंकड़ों द्वारा नस्लीय साबित हो चुकी है. इस संगठन का यह भी कहना है कि हम तो इसे पुलिस की नृशंसता के विरुद्ध लोगों द्वारा चलाये जा रहे अभियान के खिलाफ एक विधायी आक्रमण और राजनीतिक प्रतिकार के रूप में देखते हैं.  इसी तरह एण्टी डिफेमेशन लीग के क्षेत्रीय निदेशक ने भी इस कदम को अविवेकपूर्ण बताया है. इस विधेयक के आलोचकों को आशंका यह है कि अगर यह लागू हो गया तो इसका दुरुपयोग पुलिस के खिलाफ होने वाले प्रतिरोध को कुचलने में किया जाने लगेगा. बोस्टन स्थित नॉर्थ ईस्टर्न यूनिवर्सिटी के  अपराध शास्त्री  जैक लेविन ने तो और भी मार्के की बात कही है. उन्होंने आशंका व्यक्त की है कि हो सकता है संरक्षित समूहों की इस सूची में बाद में और कुछ समूह जोड़ दिये जाएं. लेकिन पुलिस को इस सूची में शामिल करने की सबसे बड़ी बुराई यह है कि वह उन बहुत सारे संगठनों में से एक है जो पहले ही काफी खतरनाक हैं. लेविन ने एक और गौर तलब बात यह कही है कि जिन खतरों की बात कहते हुए पुलिस को यह संरक्षण प्रदान किया जाने वाला है वे तो उसके कर्तव्य का हिस्सा हैं.

यानि सरकार का सोच एक तरफ और बहुत सारे संगठनों का सोच उसके विपरीत. और दोनों के अपने-अपने सशक्त तर्क. सोचें कि अगर हमारे देश में भी ऐसा ही कुछ हो तो हमारी प्रतिक्रिया  क्या होगी!   

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 24 मई, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकशित आलेख का मूल पाठ. 
  

Wednesday, May 18, 2016

चैन से सोना है तो जाग जाओ

कबीरदास की उलटी बाणी।
बरसै कंबल भीगै पानी  ।।

ये पंक्तियां हम सबने कभी न कभी पढ़ी या सुनी होगी. अटपटी या विरोधाभासी बात सुनते ही हम चौंक पड़ते हैं और सोचने लगते हैं कि अरे, ऐसा कैसे सम्भव है.  और बस इसी से कहने वाले का मक़सद पूरा हो जाता है. वो यही तो चाहता है कि हम उसकी तरफ ध्यान दें. आपको टीवी का वो विज्ञापन भी ज़रूर याद होगा जिसमें एक डरावना-सा शख़्स आकर आपसे कहता है: ‘चैन से  सोना है तो जाग जाओ!’ मन तो बहुत करता है कि अगर वो बन्दा कहीं मिल जाए तो पूछूं कि भाई मेरे, जागने से भला सोने का क्या नाता है? लेकिन कम्बख़्त मिलता ही नहीं है. और अभी तो हद्द ही हो गई है. इसी बन्दे का एक नज़दीकी रिश्तेदार सात समुद्र  पार अमरीका में और प्रकट हो गया है. इसका नाम है सेम्युअल पेरी. इसने एक गम्भीर शोध करने के बाद जो निष्कर्ष हम सब पर उछाला है उसे पढ़कर आप भी चौंक जाएंगे. पेरी ने कहा है कि जो लोग सप्ताह में एक बार से ज़्यादा पोर्न देखते हैं वे उन लोगों की तुलना में जो इससे कम या बिल्कुल भी पोर्न नहीं देखते हैं, अधिक धार्मिक होते हैं. मतलब बिल्कुल स्पष्ट है. अगर आपको धार्मिक होना है तो नियमपूर्वक पोर्न देखना शुरु कर दीजिए! है ना चैन से सोना है तो जाग जाओ वाली बात!   

और सेम्युअल पेरी ने यह बात बग़ैर किसी आधार के कह दी हो, ऐसा भी नहीं है. यूनिवर्सिटी  ऑफ ओक्लाहोमा में समाजशास्त्र और धार्मिक  अध्ययन विषय के सहायक प्रोफेसर पेरी ने सन 2006 से 2012 तक यानि पूरे छह  साल तक गहन अध्ययन करने के बाद  ऐसा कहा है. यह अध्ययन उसने पोर्ट्रेट्स ऑफ अमेरिकन लाइफ स्टडी (पाल्स) नामक एक प्रतिनिधि राष्ट्रीय सर्वेक्षण के साथ मिलकर किया. इस अध्ययन में भाग  लेने वाले कुल  1314 वयस्कों ने, जो अमरीकी समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं, नियमित रूप से अपने पोर्न उपभोग के बारे में सूचनाएं दीं और अपने धार्मिक व्यवहार के बारे में अनेक सवालों के जवाब दिए. अब इस अध्ययन के परिणाम जर्नल ऑफ सेक्स रिसर्च में प्रकाशित होकर  चर्चित हो रहे हैं.  पेरी ने पाया है कि जो लोग महीने में दो-तीन दफा ही पोर्न देखते हैं उनकी रुचि धर्म में बहुत ही कम होती है, जबकि इससे अधिक आवृत्ति से ऐसा करने वालों की धार्मिक रुचि में थोड़ी-सी वृद्धि लक्ष्य की गई. पेरी ने इस बात को समझाते हुए कहा है कि असल में होता यह है कि जब कोई धर्मपरायण व्यक्ति कभी-कभार  पोर्न देखता है तो उसे अपराध-बोध होता है और वो अपनी आस्था से थोड़ा डिग जाता है. लेकिन जब कोई व्यक्ति नियमित रूप से ऐसा करता है तो शायद वह अपने इस व्यवहार को संतुलित करने के लिए और खुद को यह दिलासा देने के लिए कि वह पथभ्रष्ट नहीं हो रहा है, धर्म में अधिक रुचि लेने लगता है. यानि जो लोग नियमित रूप से पोर्न देखते हैं वे अपने अपराध बोध को कम करने के लिए ईश्वर की शरण में ज़्यादा जाने लगते हैं. उनकी धार्मिक जिज्ञासाएं भी बढ़ जाती हैं.  पेरी ने अपने अध्ययन में यह भी पाया कि नियमित रूप से पोर्न देखने वाले धर्म स्थलों में अधिक जाते  और धार्मिक क्रियाकलापों में ज़्यादा सक्रिय रूप से भाग लेते हैं. पेरी ने यह भी बताया कि यह प्रवृत्ति स्त्रियों और पुरुषों  में एक समान  पाई गई. लेकिन ऊपर जिस सर्वेक्षण का ज़िक्र किया गया है उसमें यह बात  भी स्वीकार की गई है कि सामान्य रूप से पुरुषों की तुलना में स्त्रियां अधिक धार्मिक होती हैं, हालांकि धार्मिक संशयों  के मामले में पुरुष उनसे आगे पाए गए हैं. 

निश्चय ही पेरी का यह सर्वेक्षण इस विषय पर अंतिम सत्य की तरह स्वीकार नहीं किया जा सकता. मज़ाक की बात अलग है, यह निष्कर्ष निकाल लेना क़तई  युक्तिसंगत नहीं हो सकता कि अगर लोगों की धार्मिक रुचि  में वृद्धि करनी हो तो उन्हें पोर्न देखने को प्रेरित किया जाए. असल में धर्म या सद आचरण और व्यक्ति के निजी आचरण का रिश्ता इतना सीधा-सपाट नहीं होता है कि तुरंत किसी निष्कर्ष पर पहुंच जाया जाए. यह भी सही है कि पोर्नोग्राफी की न सराहना की जा सकती है और न उसका समर्थन किया जा सकता है. प्रथमत: और अंतत: भी, यह एक विकृति ही है. पेरी का सर्वेक्षण चाहे जो कहे, इस विकृति से दूरी बनाए रखने में ही मनुष्यता का हित निहित है, लेकिन इसी के साथ यह भी कहा जाना ज़रूरी है कि यह सर्वेक्षण पारम्परिक रूप से चले आ रहे सोच को ध्वस्त कर चीज़ों को नए नज़रिये से देखने की प्रेरणा देता है. 
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 17 मई, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.