Tuesday, March 3, 2015

किताबें अब झांकती हैं फेसबुक की दीवारों से

गुलज़ार साहब की एक बहुत मशहूर नज़्म है – किताबें झांकती हैं बन्द अलमारी के शीशों से/ बड़ी हसरत से ताकती हैं, महीनों अब मुलाकातें नहीं होतीं.  किताबों के परिदृश्य में पिछले चन्द  बरसों में जो बदलाव आया है उसे देखते हुए मुझे यह नज़्म पुरानी लगने लगी है. बहुत पुरानी बात नहीं है जब मेरी भाषा हिन्दी में सामान्यत: किताब का एक संस्करण ग्यारह सौ प्रतियों का होता था. तब जो मुद्रण तकनीक प्रचलित थी उसके लिहाज़ से भी शायद इतनी प्रतियों से कम छापना व्यावहारिक नहीं होता था. बहुत सारी किताबों की, जिनमें पाठ्य पुस्तकें और लुगदी साहित्य का ज़िक्र ख़ास तौर पर किया जा सकता है, इससे काफी ज़्यादा प्रतियां भी छपती  थीं. लोकप्रिय उपन्यासकार गुलशन नन्दा के एक उपन्यास ‘झील के उस पार’  की पांच लाख प्रतियों के छपने और बिकने की चर्चा काफी समय तक होती रही थी. और बात ऐसी भी नहीं है  कि सिर्फ लुगदी साहित्य ही बिकता रहा है. हिन्दी में ही तुलसी और प्रेमचन्द की बात तो छोड़िये, धर्मवीर भारती का ‘गुनाहों का देवता’, भगवतीचरण वर्मा का ‘चित्रलेखा’, श्रीलाल शुक्ल का ‘राग दरबारी’, शिवानी और नरेन्द्र कोहली के अनेक उपन्यास, दुष्यंत कुमार का ग़ज़ल  संग्रह ‘साये में धूप’  उन बहुत सारी किताबों में से कुछ हैं जो खूब बिकी हैं और अब भी बिकती हैं. संस्करण, और पुनर्मुद्रण की इस चर्चा को आगे बढ़ाने से पहले इस बात का ज़िक्र भी करता चलूं कि विदेशी हैरी पॉटर वगैरह को तो छोड़िये, हमारे अपने मुल्क के लोकप्रिय कथाकार चेतन भगत के हालिया प्रकाशित उपन्यास ‘हाफ़ गर्लफ्रैण्ड’ की बीस लाख प्रतियों के पहली खेप में और एक  साल में इससे दस लाख और प्रतियों के बिकने की चर्चाएं खूब हो चुकी हैं. और यह बात तब जब हम यह कहते नहीं थकते हैं कि अंग्रेज़ी इस देश के मात्र दो प्रतिशत की भाषा है. 

लेकिन इन्हीं तमाम बातों  के बरक्स यह एक त्रासद सच्चाई है कि हिन्दी की आम किताब  का संस्करण अब ग्यारह सौ प्रतियों से सिकुड़ते-सिकुड़ते तीन सौ, बल्कि उससे भी कम तक आन पहुंचा है. और यह कहते हुए मैं उस नए प्रिण्ट ऑन डिमाण्ड नामक फिनोमिना की बात नहीं कर रहा हूं जिसमें संख्या की कोई बात रह ही नहीं गई है:  अगर आपको एक प्रति चाहिये तो एक छाप कर दे दी जाती है. बेशक यह बात मुमकिन हुई  है नई मुद्रण तकनीकी की वजह से जहां पुस्तक के पाठ को कम्पोज़ करके कम्प्यूटर में सेव करना और यथावश्यकता प्रतियां मुद्रित कर लेना सम्भव हो गया है. अब भला क्यों कोई प्रकाशक ज़्यादा प्रतियां छापने में अपने कागज़, लागत तथा गोदाम की स्पेस को ब्लॉक करे? और इसी स्थिति ने हिन्दी में एक नई प्रजाति को पनपाया है. उस नई प्रजाति ने अपना नाम तो अभी पुराने वाला  ही रखा है – प्रकाशक, लेकिन असल में काम वह मुद्रक का करता है. जैसे पहले आप किसी प्रिण्टर के पास जाकर अपनी बिल बुक, शादी या मौत मरण का कार्ड छपवा लाते थे, वैसे ही अब इस नए प्रकाशक के पास जायें, और पैसे देकर अपने लिखे को छपवा लें. उसे इस बात से कोई मतलब नहीं है कि आप कैसा, क्या और क्यों छपवा रहे हैं? आपने पैसे दिये, उसने छाप दिया. बेचने की परवाह भी उसे नहीं करनी है. इसलिए वो ज़्यादा प्रतियां भी नहीं छापता  है. उतनी ही  छापता  है जितनी छापने  के आपने पैसे दिये हैं. दस-बीस प्रतियां अपने पास रखकर शेष सारी वो आपको दे देता है. और आपके पास भी  उन्हें बेचने का कोई तंत्र तो है नहीं, सो कुछ प्रतियां आप दोस्तों, रिश्तेदारों को सप्रेम  भेंट करते हैं, कुछ माननीय समीक्षकों को सादर ‘समीक्षार्थ’ प्रेषित करते हैं और बस हो जाते हैं साहिबे दीवान! अरे, यह सब कहते हुए मैं एक ख़ास बात तो भूल ही गया. किताब छपवा लेने के बाद दो ज़रूरी काम आप सबसे पहले करते हैं. पहला तो यह कि फेसबुक और ट्विट्टर जैसे सोशल मीडिया पर उस किताब की खबर प्रसारित  कर ‘सबको मालूम है सबको खबर हो गई’ का माहौल बनाते हैं और फिर उसके लोकार्पण का जुगाड़ बिठाते हैं. लोकार्पण चाहे जैसा और चाहे जिस स्तर का हो, उसकी सचित्र खबर भी इन माध्यमों पर एकाधिक बार प्रसारित करना आप नहीं भूलते. अनेक लोकार्पण तो इतने हास्यास्पद होते हैं कि कुछ पूछिये मत. लेकिन वह ज़िक्र फिर कभी.  आपकी किताब चाहे किसी लाइब्रेरी और किसी पाठक तक न भी पहुंचे, फेसबुक आदि की दीवार से उसकी छवि ज़रूर नुमायां होती रहती है, और इसीलिए मुझे लगता है कि मैं गुलज़ार साहब की इस  नज़्म को संशोधित करके कहूं – किताबें झांकती हैं फेसबुक की दीवारों से.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 03 मार्च, 2015 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.        

Tuesday, February 24, 2015

विवाह, विदाई और वर-वधू

कोई पांचेक साल बाद फिर अहमदाबाद जाने का सुयोग जुटा. पिछली बार गया था तो साबरमती आश्रम के माहौल और अदालज री बाव की सुखद स्मृतियां बहुत दिनों तक मन प्राण को मुदित करती रही थीं. इस बार अमदावाद नी गुफा, जिसे हुसैन दोषी गुफा के नाम से भी जाना जाता है,  सूची में सर्पोपरि थी. जाने की वजह इस बार भी वही थी:  एक विवाह समारोह में सहभागिता. हम मध्यमवर्गीय लोगों के जीवन में अधिकांश यात्रा प्रसंग तो इन्हीं सामाजिक वजहों से आते हैं. याद आया कि पिछली बार की यात्रा में वरमाला के बाद वर-वधू को ‘आशीर्वाद’ यानि लिफाफा  देने और फोटो खिंचवाने के लोग किस तरह पंक्तिबद्ध अपनी बारी की शालीन प्रतीक्षा कर रहे थे! जब एक जन फोटो वगैरह खिंचवा कर हटता तभी दूसरा आगे जाता. मेरे लिए यह दृश्य विलक्षण और परम आनंदपूर्ण था. इस बार फिर इसी दृश्य को देख कर मुदित होने का आकांक्षी था. परिवार और आयोजन स्थल वही थे  अत: स्वाभाविक है कि अतिथि समुदाय भी कमोबेश वही था. लेकिन मेरे सुख की पुनरावृत्ति नहीं हुई. आप कुछ और समझें उससे पहले ही स्पष्ट कर दूं कि होस्ट परिवार ने वैसी कोई व्यवस्था रखी ही नहीं. और एक तरह से तो अच्छा ही हुआ. मैं तो हर शादी में जाकर बेचारे वर-वधू के बारे में सोच कर दुखी होता हूं कि इतने सारे मेहमानों के साथ फोटो खिंचवा कर स्माइल देते-देते वे कितने पस्त हो जाते  होंगे! असल में शादी का यह फोटो सेशन एक ऐसी बेकार की रिवायत है जिससे जितनी जल्दी छुटकारा पा सकें, पा लिया जाना चाहिये. न घर वाले कभी उन तस्वीरों को देखते होंगे न मेहमानों को कभी वे तस्वीरें देखने को मिलती होंगी! फिर इतनी ज़हमत किस लिए?

इस विवाह का एक दृश्य मुझे बहुत लम्बे समय तक याद रहेगा. हम लोग विवाह में वधू पक्ष की तरफ से सम्मिलित थे. अंतरजातीय विवाह था. वर और वधू दोनों पक्षों ने सहज स्वाभाविक उल्लास से इस रिश्ते को स्वीकार किया और पूरे मन से विवाह समारोह का आयोजन किया. विवाह की रस्में दोनों समाजों की प्रथानुसार सम्पन्न की गईं. दृश्य यह था. वर वधू मंच पर खड़े थे. वधू की मां ने कन्यादान की रस्म पूरी की और मंच से नीचे उतरते उतरते उनकी रुलाई बहुत ज़ोर से फूट पड़ी. उन्हें यह लगा होगा कि बस, अब इस क्षण से मेरी बेटी ‘पराई’ हो गई. इस प्रतीति पर भला कौन होगा जो द्रवित होने से खुद को रोक सके. बहुत स्वाभाविक था यह. लेकिन तभी मेरी नज़र दुल्हन की तरफ चली गई. और मुझे यह देखकर अत्यधिक अचरज हुआ कि वह  इस भाव प्रवाह से एकदम अछूती, अपने अनुराग में मुदित-मगन थीं. जी, आप ग़लत न समझें. यह लिखते हुए मेरे मन में उस युवती  के प्रति किसी भी तरह की शिकायत  का कोई भाव नहीं है. यह एक छवि भर है.

असल में, इस दृश्य के बारे में लिखने की ज़रूरत मुझे इसलिए महसूस हुई कि इसने दो एक महीने पहले सम्पन्न एक और विवाह की याद मेरे मन में ताज़ा कर दी. उस विवाह में हम लोग वर पक्ष की ओर से सम्मिलित थे. वह विवाह भी हमारे बाद वाली पीढ़ी की संतति का ही था, और प्रेम  विवाह ही था जो दोनों पक्षों के अभिभावकों की आनंदपूर्ण सम्मति से सम्पन्न हुआ था. उस विवाह के बाद वर या वधू किसी ने फेस बुक पर जो बहुत सारी तस्वीरें पोस्ट की थीं उनमें से एक तस्वीर और उस पर आई हुई बहुत सारी मज़ेदार प्रतिक्रियाओं की स्मृति ने मुझे इस दृश्य के बारे में लिखने को प्रेरित किया. वह तस्वीर विदाई के क्षणों  की थी जिसमें वधू के साथ-साथ वर भी लगभग रुदन मुद्रा में था. इसी बात को लेकर वर-वधू के मित्रों ने अपनी प्रतिक्रियाओं में वर की मैत्रीपूर्ण खिंचाई की थी. हम सब जानते हैं कि रोना बहुत संक्रामक होता है. अगर आपके पास कोई रोने लगे तो आप अपने को भी वैसा ही करने से रोक नहीं पाते हैं. तो उस समय जब दुल्हन अपने मां-बाप से विदा लेते हुए रोने लगी होगी तो उसके वियोग भाव से दूल्हा भी अप्रभावित नहीं रहा होगा और उसी क्षण को फोटोग्राफर ने कैद कर लिया था. लेकिन हमारे यहां इस बात को कोई कैसे स्वीकार कर ले कि जब दुल्हन विदा हो रही  है तो दूल्हा भी रुंआसा हो जाए! तो ये थी विवाहों की दो छवियां. और हां, बात तो मैंने अमदावाद नी गुफा के ज़िक्र से शुरु की थी. गूगल कर चुकने के बाद भी हम यह न जान पाए थे कि उसे शाम चार बजे से पहले नहीं देख सकते, इसलिए भरी दोपहर वहां जाकर भी उसे देखे बिना लौटना पड़ा. यानि अहमदाबाद एक बार  और जाने का  कम से कम एक आकर्षण  तो मन में है ही!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत 24 फरवरी, 2015 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.   

Tuesday, February 17, 2015

जैसी दुनिया इधर है वैसी ही उधर भी है


इधर हाल ही में दूरस्थ देश हंगरी की एक ख़बर पढ़ी तो बड़े कष्ट के साथ यह अनुभूति हुए बग़ैर नहीं रही कि कुछ मामलों में दुनिया एक-सी है. पहले ख़बर तो बता दूं आपको. हंगरी के शहर माको में एक व्यवस्था है कि साल के पहले जन्मे बच्चे को मेयर द्वारा ढाई सौ पाउण्ड की राशि प्रदान की जाती है. इस साल इस राशि का हक़दार बना रिकार्डो रैक्ज़ नामक बच्चा, और उसके मां-बाप के साथ उसकी तस्वीर वहां के अखबारों में छपी. यहां तक तो सब ठीक था. इस तस्वीर के छपने के बाद हंगरी की दक्षिणपंथी जोब्बिक पार्टी के उपनेता इलोड नोवाक ने अपने फेसबुक पन्ने पर इस नवजात और इसकी मां की तस्वीर इस सूचना के साथ लगाई कि यह बालक  23 वर्षीया जिप्सी मां की तीसरी संतान है. उन्होंने यह भी लिखा कि “हंगरी मूल के लोगों की आबादी दिन पर दिन कम होती जा रही है और बहुत जल्दी हम अपने ही देश में अल्पसंख्यक  बन जाएंगे. फिर एक दिन ऐसा आएगा जब वे हंगरी का नाम बदलने का फैसला लेंगे. उस वक़्त हम देश की सबसे बड़ी समस्या  से रू-ब-रू होंगे.” और यहीं आपको यह भी बता दूं कि इस जोब्बिक पार्टी के  समर्थक जिप्सियों के लिए अक्सर यह कहते हैं कि “ये चूहों और परजीवियों की तरह पैदा होते हैं.” इलोड नोवाक के इस वक्तव्य पर खूब  प्रतिक्रियाएं हुईं. आशा है कि आपको अब तक यह बात तो स्पष्ट हो ही गई होगी कि क्यूं इस प्रसंग से मुझे अपने देश की कष्टप्रद अनुभूति हुई. इस बात को और आगे बढाऊं उससे पहले क्यों न मशहूर शायरा फहमीदा रियाज़ की एक लोकप्रिय नज़्म की कुछ पंक्तियां आपको सुनाता चलूं? वे लिखती हैं:

तुम बिल्कुल हम जैसे निकले
अब तक कहाँ छिपे थे भाई
वो मूरखता, वो घामड़पन
जिसमें हमने सदी गंवाई
आखिर पहुँची द्वार तुम्हारे 
अरे बधाई, बहुत बधाई।

इसी नज़्म के एक अन्य बंद में वे कहती हैं:

कौन है हिंदू, कौन नहीं है
तुम भी करोगे फ़तवे जारी
होगा कठिन वहाँ भी जीना
दाँतों आ जाएगा पसीना
जैसी तैसी कटा करेगी
वहाँ भी सब की साँस घुटेगी

यानि क्या भारत, क्या इसके पड़ोसी मुल्क और क्या अन्य देश – सबके हाल एक जैसे हैं. चलिये फिर से हंगरी वाले प्रसंग पर लौट जाएं!

इस पूरे प्रसंग का मानवीय पक्ष उभरता है इस बालक रिकार्डो के मां-बाप सिल्विया और पीटर के वक्तव्यों से. पीटर का परिवार मोका शहर के किनारे बसे एक छोटे-से गांव में रहता है और वहां का एकमात्र रोमा (जिप्सी) परिवार है. पीटर सामुदायिक काम करते हैं और ट्रैक्टर तथा  हार्वेस्टर चलाना सीख रहे हैं. उनकी दोनों बेटियां अभी किण्डरगार्टेन  में हैं. पीटर एक ऐसी सुकूनभरी ज़िन्दगी के आकांक्षी हैं जिसमें मीडिया और राजनीति का कोई दखल न हो. उनका कहना है कि हमें, यानि जिप्सियों और हंगेरियनों को,  सिर्फ चमड़ी के रंग के आधार पर अलग किया जाता है जबकि हमारे दिल, खून और हमारी आत्मा सब एक हैं. पीटर और सिल्विया दोनों ही बार-बार यह बात कहते हैं कि हो सकता है हंगरी में कोई नस्लवाद हो, लेकिन उन्होंने इससे पहले कभी उसका अनुभव नहीं किया. “हम इस शहर में रहना पसन्द करते हैं. यहां सभी हमारे प्रति बहुत दयालु हैं.”  लेकिन असल मार्के की बात कही सिल्विया ने. उनके एक-एक शब्द से उनकी पीड़ा व्यक्त होती है. उन्होंने कहा, “लोगों को उनके जन्म के वक़्त से ही निशाना नहीं बनाना  चाहिए. मेरा बच्चा जब 18 साल का हो जाएगा तो वह यह फ़ैसला लेगा कि उसे रोमा के रूप में पहचाना जाए या नहीं. इसमें उसकी क्या ग़लती अगर वो पिछले साल के आखिरी दिन मध्यरात्रि  के कुछ लमहों के बाद इस दुनिया  में आया.”

यह बात बहुत विडम्बनापूर्ण लगती है कि जिसे आपने नहीं चुना है, जैसे अपना जन्म, उससे  जुड़ी तमाम बातें बिना आपकी सम्मति के आप पर लाद दी जाएं! इस बालक रिकार्डो रैक्ज़ ने यह चुनाव नहीं किया है कि वो रोमा है या हंगेरियन, लेकिन इलोड नोवाक महोदय उसे रोमा होने का दण्ड देने के लिए ज़रा भी इंतज़ार नहीं करना चाहते. इसी सन्दर्भ में अपने  सुधि पाठकों को याद दिला दूं कि हिन्दी में बनी कम से कम दो फिल्में तो मुझे तुरंत याद आ रही  हैं जो इस तरह की विडम्बनापूर्ण स्थितियों को सामने लाती हैं. एक है आचार्य चतुरसेन शास्त्री के इसी नाम के उपन्यास पर 1961 में यश चोपड़ा द्वारा बनाई गई ‘धर्मपुत्र’ और दूसरी भावना तलवार निर्देशित 2007 में रिलीज़ हुई ‘धर्म’. फिलहाल हम तो यही आशा कर सकते हैं कि जब हंगरी का यह बालक रिकार्डो बड़ा होगा  तो उसे आज से बेहतर दुनिया मिलेगी.
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जयपुर से प्रकाशित  लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत इसी शीर्षक से आज 17 फरवरी, 2015 को प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.