Tuesday, July 25, 2017

कुछ समुदायों की घटती जनसंख्या भी है समस्या

सामान्यत: इस बात से सभी सहमत हैं कि भारत की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है इसकी बढ़ती हुई जनसंख्या. आज़ादी के बाद से विभिन्न सरकारों ने अपने-अपने अंदाज़ में जनसंख्या वृद्धि पर काबू पाने के प्रयास किए हैं और उन प्रयासों को आंशिक सफलता भी मिली है. सोचा जा सकता है कि अगर वे प्रयास न किए गए होते तो आज हम किस हाल में होते. इसके बावज़ूद कुछ संगठन और लोग ऐसे भी हैं जो इस बात पर चिन्तित होते हैं कि कुछ जातियों/धर्मों को मानने वालों की जनसंख्या उतनी नहीं बढ़ रही है जितनी उनकी बढ़ रही है जिनसे उनको ख़तरा है. लेकिन अगर ऐसों की  बात न भी करें तो हमारे विविधता भरे देश में कम से कम एक समुदाय ऐसा मौज़ूद है जिसकी संख्या निरंतर छीजती जा रही है और यह समाज तेज़ी से विलुप्त होने की तरफ बढ़ रहा है. संकट इतना गहरा है कि अब सरकार की तरफ से और खुद इस समुदाय  के लोगों की तरफ से भी इस समुदाय की जनसंख्या बढ़ाने के लिए अनेक प्रयास किए जा रहे हैं.

मैं बात पारसी समुदाय की कर रहा हूं. वही पारसी समुदाय, जिसकी चर्चा अपनी ख़ास जीवन शैली, सुरुचि, उच्च शैक्षिक स्तर और समृद्धि के लिए होती है. 1941 में देश में जहां पारसियों की संख्या 114,000 थी वहीं 2001 की जनगणना में ये 69 हज़ार से भी कम रह गए थे और 2011 की जनगणना में तो इनकी संख्या और भी  घटकर मात्र 57, 264 ही रह गई थी. इसी बात से चिंतित होकर भारत सरकार के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय ने पारसियों को अपनी आबादी बढ़ाने के लिए प्रेरित करने के लिए सन 2013 से जियो पारसी’  नाम से एक अभियान चला रखा है.  इस अभियान के पहले चरण में, जो जल्दी ही पूरा होने वाला है, सरकार ने एक बड़ी राशि इस निमित्त प्रदान की है कि जिन पारसी युगलों की आय एक निश्चित सीमा से कम है उन्हें संतानोत्पत्ति विषयक उपचार कराने के लिए आर्थिक सहायता दी जा सके. इसके अलावा इस अभियान के अंतर्गत विज्ञापन, काउंसिलिंग और अन्य तरीकों से भी पारसियों को जनसंख्या बढ़ाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है. अभियान के शुरुआती समय में कई विज्ञापन ज़ारी किये गए जिनमें पारसियों से गर्भ निरोधक इस्तेमाल न करने का भी अनुरोध किया गया. ये तमाम बातें भारत सरकार की परिवार नियोजन को प्रोत्साहित करने वाली नीतियों के खिलाफ़ हैं. एक तरफ जहां इस अभियान का जम कर उपहास हुआ वहीं दूसरी तरफ इसके सकारात्मक परिणाम भी सामने आये, लेकिन तीसरी तरफ़ खुद पारसी समुदाय के भीतर से कुछ लोगों ने इसका विरोध किया. यहां तक कहा  गया कि यह अभियान स्त्री को मात्र संतानोत्पत्ति करने वाली मान कर चलता है.

यह समझना भी ज़रूरी होगा कि आखिर क्यों पारसी जनसंख्या इतनी घटती जा रही है. असल में पारसी समुदाय एक सुगठित लेकिन बंद समुदाय है जहां जो कुछ भी बाहरी है वह सब निषिद्ध  है. अगर कोई महिला पारसी समुदाय से बाहर शादी कर लेती है तो वह पारसी नहीं रह जाती है, और अगर कोई किसी अन्य समुदाय से हो और किसी पारसी से विवाह कर ले तो उसके बच्चों को भी पारसी का दर्ज़ा नहीं दिया जाता है. किसी भी ग़ैर पारसी के लिए पारसी मंदिर में आना वर्जित  होता है. यही नहीं लगभग तीस प्रतिशत पारसी स्त्री-पुरुष तो विवाह ही नहीं करते हैं. देश में जो पारसी आबादी है उसमें से कम से कम तीस प्रतिशत की उम्र साठ से ऊपर है. और जैसे यह सब पर्याप्त न हो, देश में पारसियों की फर्टिलिटी दर मात्र 0.8 है जबकि औसत भारतीयों में यह दर 2.3 है. यहीं यह भी याद कर लिया जाना उपयुक्त होगा कि जब फर्टिलिटी दर 2.1 होती है तो जनसंख्या स्थिर  हो जाती है.

इस अभियान का विरोध करने वालों का कहना है कि पारसियों को ज़्यादा बच्चे पैदा करने के लिए उकसाने की बजाय पारसी संस्कृति की रक्षा और उसके संवर्धन के लिए प्रयास किये जाने चाहिए. लेकिन समझा जा सकता है कि यह तर्क  महज़ विरोध करने के लिए दिया गया तर्क है. अगर पारसी संस्कृति का बहुत ज़्यादा समर्थन किया जाएगा तो यह समुदाय सिकुड़ते-सिकुड़ते लुप्त ही हो जाएगा. जब आप अपने तमाम खिड़की दरवाज़े बंद कर देंगे तो यही होगा. और यही वजह है कि पारसी समुदाय के भीतर से भी आम तौर पर इस सरकारी पहल का स्वागत हो रहा है और समझदार लोग कहने लगे हैं कि यह अभियान काफी पहले शुरु कर दिया जाना चाहिए  था. यह तो आने वाला समय ही बताएगा कि यह सरकारी अभियान पारसी समुदाय को बचा पाने में कितना सफल रहता है!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 25 जुलाई, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.  

Tuesday, July 18, 2017

कुत्ता पुराण उर्फ़ अच्छे परिवारों के कुत्ते भी अच्छे होते हैं!

अगर कोई व्यक्ति अमरीका के किसी बड़े शहर में कोई घर या अपार्टमेण्ट खरीदना या किराये पर लेना चाहे तो उसे न सिर्फ अपनी आर्थिक-सामाजिक  स्थिति, अपने परिवार आदि के बारे में आश्वस्तिदायक एवम प्रामाणिक जानकारियां सुलभ करानी होती हैं, अगर वो पालतू कुत्ता भी रखता है तो उसे उस कुत्ते के खानदान और चाल-चलन के बारे में भी समुचित और सत्यापित जानकारियां देनी होती हैं. न सिर्फ इतना, बहुत सारे अपार्टमेण्ट प्रबंधन तो बाकायदा कुत्तों के इण्टरव्यू भी लेने लगे हैं. एक भावी किरायेदार ने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया है कि उनसे उनके और उनके परिवार के बारे में जितने सवाल-जवाब किये गए उससे कहीं ज़्यादा सवाल उनके कुत्ते से पूछे गए. और कुत्तों को लेकर यह सजगता केवल अमरीका में ही नहीं बरती जा रही है. कनाडा और ऑस्ट्रेलिया  से भी ऐसी ही ख़बरें आ रही हैं. शायद दुनिया के और भी अनेक देशों में यह चलन हो गया हो कि किसी को मकान किराये पर देने से पहले उसके पालतू कुत्ते के बारे में भी आश्वस्त हो जाया जाए ताकि वहां रहने वाले अन्य लोगों को कोई असुविधा न हो. यहीं यह स्मरण कर लेना भी प्रासंगिक होगा कि पश्चिमी देशों में नागरिक सुविधाओं की सुनिश्चितता पर बहुत ज़ोर रहता है. कोई भी किसी अन्य को अपनी छोटी से छोटी सुविधा या अधिकार का हनन नहीं करने देता है और सरकारें भी इस काम में मददगार साबित होती हैं. इन सारी बातों को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए.  

इन देशों में जब इतना सब हो रहा है तो बहुत स्वाभाविक है कि उद्यमी लोग इसमें भी अपना रोज़गार और मुनाफ़ा खोज लें. अमरीका में, जहां जानवर पालने का चलन खूब है,  पालतू जानवरों की एक पूरी की पूरी इण्डस्ट्री ही उठ खड़ी हुई है, जो उनके मालिकों को मकान दिलवाने में मदद करने के लिए इन पालतू कुत्तों का डीएनए  टेस्ट करवाती हैं, उनकी वंशावली प्रमाणित करती है, उनके खानदानी होने का प्रमाण पत्र प्रदान  करती है, उनके फोटो शूट करवाती है ( बतर्ज़ प्रोपोज़ल फोटोज़!) और ज़रूरत पड़ने पर उनके सद व्यवहार के प्रमाण पत्र भी ज़ारी करती है.  और जैसे इतना ही पर्याप्त न हो, वहां एक अमरीकन  कैनल क्लब तक है जो कुत्तों के लिए गुड सिटिजन सर्टिफिकेट कोर्स भी  संचालित करता है. काफी पुराने इस क्लब की  प्रगति का यह आलम है कि जहां साल 1989 में इस क्लब ने सिर्फ  1300 कुत्तों को ग्रेजुएट की उपाधि प्रदान की थी, पिछले बरस इस संस्थान से 65,000 श्वान स्नातक हुए. अकेले न्यूयॉर्क शहर में इस क्लब के 75 मान्य इंस्ट्रक्टर्स  और परीक्षक हैं, जो हर बरस कम से कम 2500 कुत्तों की परीक्षा लेते हैं. इसी तरह के अन्य भी  अनेक संस्थान हैं. इनके प्रमाण पत्र व अनुशंसा पत्र बहुत मूल्यवान माने जाते हैं. 

बहुत सारे ऐसे संस्थान भी खुल गए हैं जो भावी मकान मालिक द्वारा लिये जाने वाले इण्टरव्यू के लिए कुत्तों को प्रशिक्षित  करते हैं. ऐसे ही एक संस्थान के कैनाइन गुड सिटिजन प्रोग्राम  के अंतर्गत  कुत्तों को दस स्किल्स सिखाई जाती हैं जिनमें निर्देश पर बैठ जाना और कहने पर अपरिचितों के साथ शालीनता से पेश आना भी शामिल होता है. लेकिन मज़े की बात यह कि अपने देश की तरह परदेस में भी ऐसे प्रतिभाशाली लोग कम नहीं हैं जो हर चीज़ के लिए वैकल्पिक शॉर्ट कट तलाश लेते हैं. वहां भी उस्ताद लोग  प्रशिक्षण की परेशानी  से बचने के लिए अपने कुत्तों को या तो नशीली दवा खिला देते हैं या फिर इण्टरव्यू से ठीक पहले उन्हें इतना थका डालते हैं कि वे इण्टरव्यू के वक्त आक्रामक व्यवहार कर ही नहीं पाते हैं. अनेक इमारतों में कुत्तों की अधिकतम वज़न सीमा भी निर्धारित होती है जिसकी पालनार्थ लोग अपने कुत्तों  को कई दिन भूखा तक रखते हैं. बहुत सारी इमारतों में कुछ ख़ास नस्लों के कुत्तों को वर्जित करार दिया जाता है और इसका तोड़ उस्तादों ने यह निकाला है कि वे उनका डीएनए परीक्षण  करवा कर यह स्थापित कर देते हैं कि वह कुत्ता उस नस्ल का नहीं है जिसका नज़र आ रहा है.

कुल मिलाकर तू डाल-डाल मैं पात-पात का खेल ज़ारी है. असल में रिहायशी इलाकों और इमारतों का प्रबंधन करने वाले चाहते हैं कि किसी के भी पालतू कुत्ते से औरों को कोई  असुविधा न हो. इसी लिहाज़ से न्यूयॉर्क  के एक सम्पन्न रिहायशी इलाके की एक प्रतिष्ठित बिल्डिंग ने तो अपने यहां एक डॉग इण्टरव्यूवर  की नियुक्ति की है जो भावी किरायेदारों के कुत्तों का बाकायदा इण्टरव्यू लेती हैं. यह भद्र महिला उम्मीदवार श्वान को अपने साथ काम करने वाली लड़कियों से मिलवाती है और फिर उसकी प्रतिक्रिया को परखती हैं. वे खुद भी उस कुत्ते को छू कर उसकी प्रतिक्रिया  का आकलन करती हैं. इस भद्र महिला का यह कथन बहुत अर्थपूर्ण है कि अच्छे परिवारों के कुत्ते भी अच्छे होते हैं!


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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 18 जुलाई, 2017 को अमरीका में उद्योग बना पालतू जानवरों का शौक शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, July 11, 2017

तबीयत से उछाला एक पत्थर और कर दिया आकाश में छेद!

मंगोलिया की डॉक्टर ओदोंतुया दवासुरेन जब महज़ सत्रह बरस की थीं और घर से काफी दूर लेनिनग्राड में रहकर पढ़ाई कर रही थीं तब फेफड़ों के कैंसर ने पिता को उनसे छीन लिया था. बाद में कभी उन्होंने बताया कि उन्हें इस बात का अब भी  मलाल है कि वे अपने पिता के अन्तिम  दर्शन तक नहीं कर सकीं, और अपनी बड़ी बहन से ही उन्हें यह भी पता चला कि उनके पिता लगातार असह्य वेदना झेलते रहे. इसके कई बरस बाद, जब वे डॉक्टर बन चुकीं तब भी उन्हें अपने असंख्य मरीज़ों के अलावा अपने निकट के लोगों की वेदना का मूक दर्शक बनना पड़ा. उनकी सास उनके साथ ही रहती थीं और ओदोंतुया ने लिवर कैंसर से जूझती,  दर्द से तड़पती और शांत मृत्यु के लिए विकल अपनी सास की पीड़ा को गहराई से महसूस किया. वे उनकी हर तरह से सेवा करतीं लेकिन उन्हें दर्द से निज़ात दिलाने में असमर्थ थीं.

उनकी असमर्थता का एक ख़ास संदर्भ  है. भले ही तब दुनिया के दूसरे देशों में असाध्य रोगों से ग्रस्त मरणासन्न रोगियों की पीड़ा कम करने के लिए ख़ास व्यवस्थाएं (पैलिएटिव केयर)  सुलभ थीं, खुद उनके देश मंगोलिया में उनके लिए सामान्य दर्द निवारकों से अधिक कुछ भी सुलभ नहीं था. यह आकस्मिक ही था कि सन 2000 में डॉक्टर ओदोंतुया को यूरोपियन पैलिएटिव केयर असोसिएशन की एक कॉन्फ्रेंस  में भाग लेने के लिए स्टॉकहोम (स्वीडन) जाने का अवसर  मिला और वहां मिली जानकारियों ने उनमें नई ऊर्जा का संचार कर डाला. तब तक तो वे पैलिएटिव केयर जैसी किसी अवधारणा से ही परिचित नहीं थी. स्वीडन से लौटकर उन्होंने अपने देश के स्वास्थ्य मंत्रालय से जब अपने देश में भी ऐसी ही सुविधाएं सुलभ कराने का अनुरोध किया तो पलट कर उनसे ही पूछा गया कि जब देश में ज़िंदा लोगों के लिए ही पर्याप्त चिकित्सा सुविधाएं देने के संसाधनों का अभाव है तो भला मरणासन्न लोगों को कोई सुविधा देने की बात सोची भी कैसे जा सकती है!

लेकिन एक चिकित्सक होने के नाते ओदोंतुया इस बात से भली भांति परिचित थीं कि मंगोलिया में इस सुविधा की कितनी ज़रूरत है. वे जानती थीं कि उनके देश में लिवर कैंसर से मरने वालों की तादाद वैश्विक औसत से छह गुना ज़्यादा है और इसमें लगातार वृद्धि होती जा रही है. इस तरह के रोगियों का अंत बहुत कारुणिक और कष्टप्रद  होता है. ऐसे में, ओदोंतुया यह मानने लगी थीं कि मृत्यु से पहले की सुखद ज़िंदगी मनुष्य का आधारभूत अधिकार है, और वे इसे दिलाने के लिए लगातार प्रयत्न करती रहीं. देश के स्वास्थ्य मंत्रालय के सामने अपनी बात सशक्त रूप से रखने के लिए उन्होंने मरणासन्न लोगों से उनके घरों पर जाकर मुलाक़ातें की और उनके अनुभवों को फिल्मांकित किया. उन्होंने पाया कि ऐसे बहुत सारे रोगियों को अस्पताल वाले जबरन घर भेज दिया करते हैं और वे असहाय रोगी दर्द से कोई निज़ात न पाकर मृत्यु की मांग तक करने लगते हैं.

आखिर ओदोंतुया के प्रयास  सफल हुए और सन 2002 में मंगोलिया सरकार ने मरणासन्न लोगों को राहत देने के लिए एक राष्ट्रीय पैलिएटिव केयर कार्यक्रम की शुरुआत करने की घोषणा की. इसके बाद से अब तक की प्रगति यह है कि अब उस देश का हर प्रादेशिक अस्पताल यह सुविधा सुलभ कराने लगा है और देश में बहुत सारे होसपिस  केंद्र भी खुल गए हैं. सबसे बड़ी बात यह हुई है कि ऐसे रोगियों को राहत पहुंचाने के लिए मॉर्फिन की आपूर्ति बढ़ा दी गई है. डॉक्टर ओदोंतुया के प्रयासों से पहले मंगोलिया के अधिकारी मॉर्फिन के वितरण में इसलिए कृपणता बरतते थे कि उन्हें भय था कि इसकी सुलभता नशे के प्रसार में सहायक बन जाएगी. लेकिन अब वहां कैंसर के रोगियों को उनकी ज़रूरत के मुताबिक मॉर्फिन दे दी जाती है, और वो भी निशुल्क. ज़ाहिर है कि इससे उनके कष्टों में काफी कमी आई है. ओदोंतुया के प्रयासों से मंगोलिया में हज़ारों डॉक्टरों को प्रशिक्षित किया गया है ताकि वे इस तरह के रोगियों को दर्द निवारण में और सुखपूर्ण अंतिम जीवन बिताने में सहायक बन सकें. खुद डॉक्टर ओदोंतुया अब भी नियमित रूप से ऐसे रोगियों के सम्पर्क में रहती हैं और न सिर्फ उन्हें समुचित  चिकित्सकीय सहायता सुलभ कराती हैं, जब उन्हें लगता है कि अब मृत्य के सिवा कोई विकल्प नहीं बचा है तो उन्हें मानसिक रूप से मृत्यु के लिए तैयार भी करती हैं.

डॉक्टर ओंदोतुया का यह वृत्तांत एक बार फिर हमें आश्वस्त करता है कि दुनिया में भले लोगों की कमी नहीं है और हमारे कवि दुष्यंत कुमार ने ठीक  ही कहा है कि “कैसे आकाश में सूराख़ हो नहीं सकता/ एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो.”  

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 11 जुलाई, 2017 को प्रकशित आलेख का मूल पाठ.   

Tuesday, July 4, 2017

मशीनें मनुष्य की पूरक ही हैं, विकल्प नहीं!

अठारहवीं शताब्दी में ब्रिटेन मे शुरु हुई औद्योगिक क्रांति ने हमारे जीवन को आधारभूत रूप से बदल कर रख दिया. जीवन का हर पहलू इससे प्रभावित हुआ. कल तक जो काम मनुष्य सिर्फ और सिर्फ अपने हाथों से करता था, वे काम आहिस्ता-आहिस्ता मशीनों की मदद से किये जाने लगे. स्वाभाविक ही है कि ऐसा होने से मनुष्य को बहुत सारे मेहनत-मज़दूरी वाले  कामों से मुक्ति मिली और उसका जीवन सुगम हुआ. औद्योगिक क्रांति का असर केवल मानवीय श्रम तक ही सीमित नहीं रहा, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तमाम क्षेत्रों को इसने प्रभावित किया. अपने श्रम और प्रयत्नों को कम कर वे तमाम काम मशीनों से करवाने के मनुष्य के प्रयास अभी भी थमे नहीं हैं. बल्कि कुछ अर्थों में तो ये प्रयास और अधिक तेज़ भी हुए हैं. कल तक जिन कामों को मशीनों से करवाने की कल्पना तक नहीं की जा सकती थी, अब वे काम भी मशीनों से करवाये जाने लगे हैं.

ऐसा करने से जहां मनुष्य के श्रम में काफी कटौती  हुई है वहीं एक नई आशंका भी उत्पन्न हो गई है. समझदार लोग इस बात से चिंतित होने लगे हैं कि अगर यही क्रम जारी रहा तो एक दिन ऐसा भी आ सकता है कि मनुष्य द्वारा किये जाने वाले तमाम काम मशीनों से ही करवाये जाने लगें. मशीनों को इतना समर्थ बना दिया जाए कि वे उन सभी कामों को अधिक दक्षता से और अपेक्षाकृत कम खर्चे में करने लग जाएं! अगर वाकई ऐसा हो गया तो क्या सारी मानवता बेरोज़गार नहीं हो जाएगी? बहुत सारे लोग अभी से यह सोच कर आशंकित हैं कि कल को उनका काम मशीनें करने लगेंगी और उनके पास करने को कुछ रह ही नहीं जाएगा!  इसी आशंका के तहत ऑक्सफोर्ड  विश्वविद्यालय के फ्यूचर ऑफ ह्युमेनिटी (मानवता का भविष्य)  संस्थान ने दुनिया के 352 शीर्षस्थ वैज्ञानिकों से जवाब मांग कर उन जवाबों के आधार पर यह अनुमान लगाने का प्रयास किया है कि कितने बरसों में मनुष्यों द्वारा किये जाने वाले सारे काम मशीनें करने लगेंगी. इस पड़ताल में पाया गया है कि फिलहाल इस बात की पचास प्रतिशत सम्भावना है कि आगामी एक सौ बीस बरसों में मशीनें  मनुष्यों द्वारा किये  जाने वाले सारे काम करने लगेंगी. इस निष्कर्ष से उन सभी को आश्चर्य हुआ है जो यह सोच कर भयभीत थे कि ऐसा निकट भविष्य में ही हो जाएगा!

वैज्ञानिकों का सोच यह है कि मशीनें मेहनत का काम तो आसानी से कर लेती हैं लेकिन जहां विवेक की आवश्यकता होती है वहां वे पिछड़ जाती हैं, हालांकि कृत्रिम बुद्धि (आर्टीफीशियल इण्टेलीजेंस) का प्रयोग बहुत तेज़ी से बढ़ता जा रहा है. अब यही बात देखें कि सन दो हज़ार दस में एक रोबोट एक साधारण तौलिये  को तह करने में उन्नीस मिनिट लगा रहा था वहीं दो बरस बाद ही वह पांच मिनिट में एक जीन्स को और छह मिनिट में एक टी शर्ट को तहाने लगा था. कृत्रिम बुद्धि का प्रयोग करते हुए सन दो हज़ार सत्ताइस तक मानव रहित ट्रक चालन की कल्पना की जा रही है.

हममें से बहुतों ने यह बात नोट की होगी कि जब हम किसी ऑनलाइन  स्टोर  पर कोई चीज़ तलाश करते हैं तो तुरंत हमें उससे मिलती-जुलती चीज़ों के लिए सुझाव मिलने लगते हैं, और यह काम मानव नहीं करता है. इसी कामयाबी से उल्लसित होकर यह कल्पना भी की जाने लगी है कि सन दो हज़ार तरेपन तक आते-आते शल्य चिकित्सक का काम रोबोट करने लगेंगे और उससे भी चार बरस पहले यानि सन उनचास तक मशीनें ही बेस्ट सेलिंग उपन्यास भी लिखने लग जाएंगी! इस काम की शुरुआत तो हो ही चुकी है. गूगल अपने यंत्रों को रोमाण्टिक उपन्यास और समाचार लेख लिखने के लिए प्रशिक्षित कर रहा है. बेंजामिन नामक उनका एक यंत्र छोटी-छोटी साइंस फिक्शन पटकथाएं लिखने भी लगा है.

लेकिन सबसे अच्छी बात यह है कि इस क्षेत्र में जो लोग काम कर रहे हैं वे अपने लक्ष्यों को लेकर बहुत स्पष्ट हैं. उनके मन में यह बात एकदम साफ़ है कि यह तकनीक मनुष्य के लिए पूरक बन कर आएगी, न कि उसका विकल्प बनकर. उनके मन में यह बात भी बहुत साफ़ है कि तकनीक कभी भी मनुष्य को विस्थापित नहीं कर सकती है. और यह सब तब जबकि वे यह भी जानते हैं कि जिस गति से तकनीकी विकास हो रहा है उसे देखते हुए ऐसा कोई काम नहीं बचने वाला है जो मनुष्य करता हो और जिसे मशीन न कर सके. लेकिन ये लोग मज़ाक-मज़ाक में एक गम्भीर बात कह देते हैं. इनका कहना है कि सबकुछ हो चुकने के बाद भी कुछ काम तो मनुष्य के लिए ही बच रहेंगे, जैसे गिरजाघर के पादरी का काम. खुद मनुष्य यह नहीं चाहेगा कि किसी चर्च में उसे हाड़-मांस के पादरी की बजाय रोबोट मिले!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 04 जुलाई, 2017 को इसी  शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Thursday, June 29, 2017

किस्सा तलाक की देवी का

हर भाषा में ऐसे अनगिनत शब्द होते हैं, जिनका किसी भी दूसरी भाषा में ठीक-ठीक अनुवाद नामुमकिन होता है. अंग्रेज़ी भाषा का ऐसा ही एक शब्द है डीवा (Diva) जिसकी उत्पत्ति जिस इतालवी संज्ञा से हुई उसका  अर्थ हमारी देवी के निकट माना जा सकता है, लेकिन अंग्रेज़ी में जिसका प्रयोग गीत-संगीत, नृत्य, ऑपेरा, सिनेमा और पॉप संगीत की शीर्षस्थ महिला शख़्सियतों के लिए होने लगा. बाद में इस शब्द के साथ कुछ शरारती अर्थ-ध्वनियां भी जुड़ गईं और यह शब्द ठीक देवी जैसा पाक-साफ़ नहीं रह गया. इस शब्द की याद मुझे आई  इंग्लैण्ड की उनचास वर्षीया सुश्री वर्डाग के संदर्भ  में, जिन्हें डीवा ऑफ डिवॉर्स यानि तलाक की देवी कहा जाता है. इन सुश्री वर्डाग की काबिलियत का आलम यह है कि इनकी कानूनी फर्म की लंदन में अवस्थिति की वजह से लंदन को ही डिवॉर्स कैपिटल ऑफ द वर्ल्ड के रूप में जाना जाने लगा है. सुश्री वर्डाग की ख्याति अत्यधिक वैभवशाली व्यक्तियों को उनकी असफल वैवाहिक ज़िंदगी से मुक्ति और अधिकतम सम्भव हर्ज़ाना राशि दिलवाने के लिए है. कहा जाता है कि इनकी इस ख्याति के कारण पूरी दुनिया में जैसे ही किसी वैभव सम्पन्न युगल की शादी पर संकट के बादल मण्डराने लगते हैं, दोनों के बीच सुश्री वर्डाग के पास पहले पहुंचने की एक उन्मादपूर्ण स्पर्धा भी शुरु हो जाती है. दोनों की दिली तमन्ना होती है कि अदालत में सुश्री वर्डाग उसका प्रतिनिधित्व करे न कि उसके साथी का. और जब उनकी ख्याति इतनी है तो इस बात पर कोई आश्चर्य क्यों हो कि  उनकी फीस लगभग आठ सौ पाउण्ड (कर अतिरिक्त) प्रति घण्टा है और मात्र बारह बरस  पहले शुरु हुई उनकी फर्म वर्डाग्ज़ की सालाना आय एक करोड़ पाउण्ड आंकी जाती है.

इन सुश्री वर्डाग का जन्म ऑक्सफोर्ड में  एक अंग्रेज़ मां और पाकिस्तानी पिता के घर हुआ, लेकिन जब वे बहुत छोटी थीं तभी उनके पिता उन लोगों को छोड़ कर पाकिस्तान जा बसे और उनका लालन-पालन अकेले उनकी मां ने किया. कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद वर्डाग ने लंदन में वित्तीय और वाणिज्यिक कानून के क्षेत्र में काम करना शुरु किया और उसमें काफी सफल भी रहीं.  वर्ष 2000 में उनके कैरियर  में एक बड़ा मोड़ तब आया जब उन्हें खुद अपने तलाक का मुकदमा लड़ना पड़ा, और इसमें रोचक बात यह रही कि यह मुकदमा लड़ने वाले उनके वकील ने भी बाकायदा सपारिश्रमिक  उनकी सेवाएं लीं. और तभी उन्हें महसूस हुआ कि भले ही वित्तीय कानून बौद्धिक रूप से बेहद दिलचस्प हों, पारिवारिक कानून का क्षेत्र भी उनसे कम रोचक नहीं होता है. बल्कि यहां तो आप व्यक्तियों के निजी जीवन में आ रही मुश्क़िलों के लिए, उनकी ज़मीन-जायदादों और व्यापारों को बचाने के लिए तथा इस बात के लिए कि उनके सम्पर्क उनके बच्चों  के साथ बने रहें - इन  आधारभूत बातों के लिए  लड़ते हैं. और इस एहसास के बाद सन 2005 में उन्होंने वित्तीय और वाणिज्यिक कानून का काम छोड़ अपने घर के ही एक कमरे से पारिवारिक कानून की प्रैक्टिस शुरु कर दी. शुरुआत में उनके पास एक भी मुवक्किल नहीं था और तीन बच्चों के भरण पोषण की ज़िम्मेदारी उन पर थी. वर्डाग ने अपनी पहचान बनाने के लिए बहुत द्रुत गति से नेटवर्किंग की. जहां भी मौका मिलता वे पहुंच जातीं  और अपना परिचय देतीं. और तभी उन्हें अपनी पहली मुवक्किल मिली, जिसके बच्चे भी उनके बच्चों वाले स्कूल में थे. उसे वे अच्छी भरणपोषण राशि दिलवा पाईं तो उनका नाम हुआ, और उनके पास और केस आने लगे. आज स्थिति यह है कि उनके पांच ऑफिसों में कुल पचपन वकील काम करते हैं. भले ही उनकी कम्पनी के सारे मुकदमे इंग्लैण्ड की अदालतों में चलते हों, खुद सुश्री वर्डाग  पिछले दो बरसों से दुबई में रहने लगी हैं. इसके पीछे भी उनकी नेटवर्किंग ही है. वे मध्यपूर्व के बेहद अमीर भावी मुवक्किलों पर अपना ध्यान केंद्रित कर रही हैं.

इतनी कामयाबी की एक परिणति ईर्ष्याओं  और आलोचनाओं में होना अस्वाभाविक नहीं है. उनके आलोचकों का कहना है कि वे आत्म  प्रचार पर ज़रूरत से ज़्यादा ज़ोर देती हैं और अपने  मुकदमे लड़ते समय अत्यधिक आक्रामक हो जाती हैं. इसका जवाब देते हुए वर्डाग कहती हैं कि सामान्यत:  मैं दूसरे  पक्ष के साथ बहुत विनम्रता के साथ पेश आती हूं, लेकिन मुकदमेबाजी के वक़्त मैं खूंखार  हो उठती हूं. हो सकता है कि कुछ लोगों को एक औरत का यह रूप न भाता हो!

सुश्री  वर्डाग जानती हैं कि उन्हें डीवा कहा जाता है. लेकिन ज़रा उनकी यह बात भी  तो सुनें: “आप भले ही मेरे लिए डीवा का प्रयोग अपमानजनक अर्थों में करते हों, मैं तो इसे एक कॉम्प्लीमेण्ट  की तरह लेती हूं. डीवा का मतलब होता है वो जो बेबाक हो, जिसके इरादे पक्के हों और जो रंगीन और तड़क भड़क से भरपूर हो!” 
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जयपुर से प्रकशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 27 जून, 2017 को प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, June 20, 2017

हम सबकी दुआएं तुम्हारे साथ हैं, कल्याणी!

उसका नाम कल्याणी है, कल्याणी सरकार. वैसे यह उसका विवाह पूर्व का नाम है. अब वह कल्याणी  मण्डल है. पश्चिमी बंगाल के नादिया ज़िले के एक बहुत छोटे गांव की इस 32 वर्षीया युवती के जीवन में कुछ भी तो असाधारण नहीं है, फिर भी उसकी चर्चा हो रही है. बचपन में पढ़ना चाहती थी लेकिन ज़िंदगी के हालात कुछ ऐसे बने कि आठवीं कक्षा में आते-आते स्कूल को अलविदा कहना पड़ गया. सपना यह देखती थी कि पढ़-लिख कर सरकारी नौकरी करने लगेगी, लेकिन ऐसे सपनों का चकनाचूर हो जाना अपने यहां आम है. मां-बाप ने जैसे-तैसे उसकी शादी की और अपनी ज़िम्मेदारी से मुक्त हो गए. हर आम हिंदुस्तानी युवती की तरह कल्याणी ने भी अपने हालात को मौन भाव से स्वीकार कर लिया. संयुक्त परिवार था. घर की बहू के लिए कामों की कोई कमी थोड़े ही होती है. दिन तो  घर के काम-काज निबटाने में ही बीत जाता. खुद के बारे में सोचने का कभी मौका  ही नहीं मिला. और इसी बीच वे दो से तीन भी हो गए. बेटा बिप्लब आहिस्ता-आहिस्ता बड़ा होने लगा तो कल्याणी के मन में दबा हुआ सपना भी जैसे अंगड़ाई  लेने लगा. उस सपने को खाद-पानी दिया उसके पति बलराम ने.

दोनों ने अपने गांव के रबींद्र मुक्त विद्यालय में नाम लिखवा लिया. बल्कि सच तो यह है कि कल्याणी का साथ देने के लिए पति बलराम ने भी स्कूल में अपना नामांकन करवाया. इसलिए कि कल्याणी को अजीब न लगे. यह बात अलग है कि बलराम अपनी रोजी-रोटी के संघर्ष के बीच पढ़ाई के लिए समुचित समय नहीं निकाल पाया. भले ही उसके पास गांव में थोड़ी-सी ज़मीन है, घर का काम चलाने के लिए तो उसे दूसरों के खेतों में मज़दूरी करनी ही पड़ती है. खुद कल्याणी भी घर  में बकरियां पालती है. इस तरह दोनों के अनथक श्रम से बमुश्क़िल सात हज़ार रुपये जुट पाते हैं. इतने में जैसे-तैसे उनके परिवार का  काम  चल जाता है.  और हां, यह बताना तो भूल ही गया कि उनकी बेटा बिप्लब भी सत्रह बरस का हो गया है और वह भी पढ़ रहा है.

लेकिन जो बात  बतानी थी वह तो छूटी  ही जा रही है. कल्याणी की चर्चा इस बात के लिए हो रही है कि इस बरस उसने अपने पति और बेटे के साथ बारहवीं की परीक्षा दी, और न केवल दी, उसमें कामयाबी भी हासिल की. यह एक अनूठी घटना थी जिसमें पति, पत्नी और बेटे तीनों ने एक साथ एक परीक्षा दी, और तीन में से दो इस परीक्षा में सफल भी हुए. बलराम की नाकामयाबी की वजह बताना अनावश्यक है. कल्याणी का  कहना है कि उसके पति को भला पढ़ाई का समय ही कहां मिल पाता था, लेकिन उसका इरादा है कि वह अपने पति को अगले बरस फिर परीक्षा देने के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित करेगी. खुद कल्याणी को भी परीक्षा में कोई  भारी सफलता नहीं मिली है. उसे भी  मात्र 44% अंक प्राप्त हुए हैं और वह अपनी इस सीमित कामयाबी से अनभिज्ञ भी नहीं है. एक इण्टरव्यू में उसने कहा भी है कि उसे ज़्यादा खुशी तो तब होती  जब उसने इस परीक्षा में टॉप किया होता.

कल्याणी और बलराम के बेटे बिप्लब को इस परीक्षा में 47% अंक प्राप्त हुए हैं. उसका कहना है उसे अपने मां-बाप पर गर्व है, हालांकि वह संकोच के साथ यह भी बता देता है कि शुरु-शुरु में अपने मां-बाप के साथ एक ही कक्षा में बैठते हुए उसे अटपटा भी लगता था. लेकिन उन लोगों  ने बड़ी जल्दी अपने दोस्त भी बना लिये थे. और इसके बाद, थोड़ी शरारत के साथ वह यह कहना भी नहीं भूलता है कि सबसे अच्छी बात तो यह थी उसके मां-बाप बहुत ही कम कक्षाओं में उपस्थित हो सके. वह  यह भी बताता है कि कुछ विषयों में तो उसकी मां और उसके बीच बड़ी स्वस्थ प्रतिस्पर्धा भी रही. हंसते हुए वह बताता है कि अंग्रेज़ी में तो हम दोनों ही कमज़ोर थे.

लेकिन सबसे  ख़ास बात तो वह है जो कल्याणी ने कही है. यहां आप एक जीवट वाली भारतीय स्त्री का स्वर साफ़ सुन सकते हैं.  उसने कहा है कि शुरु-शुरु में तो लगा था कि मुझे जो कुछ करना है वह मैं कर चुकी हूं. अब भला और क्या करना है? लेकिन अब जब मेरी इतनी चर्चा हो गई है तो मुझे लग रहा है कि मुझे भी थम नहीं जाना चाहिए. अब मेरी इच्छा है कि मैं कॉलेज भी जाऊं. क्या पता किसी दिन सरकारी नौकरी पाने का मेरा सपना भी पूरा हो जाए!

कल्याणी, हम सबकी दुआएं तुम्हारे साथ है!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 20 जून, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, June 13, 2017

चार देशों में स्त्री की हैसियत का पैना विश्लेषण

पाउलिना पॉरिज़्कोवा एक जानी-मानी सुपर मॉडल रही हैं और उनका उपन्यास अ मॉडल समरखूब पढ़ा गया है. भारत में उनकी अधिक चर्चा नहीं हुई है, लेकिन मुझे हाल में उनका एक लेख पढ़ने को मिला और उसे पढ़ते हुए लगा कि इसके सार को अपने पाठकों के साथ साझा किया ही जाना चाहिए. इस छोटे-से लेख में उन्होंने बहुत ही कुशलता से साथ दुनिया के अनेक देशों में स्त्री की हैसियत को बयान कर दिया है.

पाउलिना मूलत: चेकोस्लोवाकिया की रहने वाली हैं, जहां स्त्री की हैसियत एक दासी जैसी है. दिन भर मेहनत मजदूरी, और शाम को घर लौट कर घर का सारा काम, पति की सेवा और उसके बाद भी उपेक्षा  और अपमान. लेकिन मात्र नौ बरस की  उम्र में जब उन्हें स्वीडन जाना  पड़ा तो वहां उन्हें एक नई ही दुनिया देखने को मिली. स्कूल में उन्हें एक लड़के ने इस बिना पर थोड़ा सताया कि वे एक आप्रवासी हैं, तो तुरंत ही उनकी एक दोस्त ने, जो कद-काठी में बहुत छोटी थी, जम कर उस लड़के की कुटम्मस कर डाली. पाउलिना के लिए यह बात  कल्पनातीत थी  लेकिन उन्हें इस बात से और अधिक आश्चर्य हुआ कि उनकी कक्षा में किसी को भी यह बात असामान्य नहीं लगी. इस एक घटना से उन्हें यह बात समझ में आ गई कि स्वीडन में उनकी हैसियत किसी लड़के से कमतर नहीं है. यह जैसे उनके जीवन का पहला पाठ था. फिर तो उनका ध्यान इस बात पर भी गया कि स्वीडन में घर का काम भी स्त्री-पुरुष मिल-जुल कर करते थे. खुद उनके पिता भी घर की सफाई और खाना पकाने का काम निस्संकोच करने लगे थे. वैसे इसकी एक वजह यह भी थी कि तब तक वे अपनी चेकोस्लोवाकियन  पत्नी को तलाक देकर एक स्वीडिश स्त्री को जीवन साथी बना चुके थे.

पाउलिना हाई स्कूल में पहुंची तो उन्होंने नोटिस किया कि लड़के लड़कियों की तरफ आकर्षित होते हैं, उनके निकट आना चाहते हैं, लेकिन निर्णायक  हैसियत लड़कियों की है. वे चाहें तो उनके अनुरोध को स्वीकार करें, चाहे तो अस्वीकार. और इस एहसास ने खुद उन्हें अपनी निगाहों में ताकतवर बनाया. वहां हाल यह था कि कि अगर कोई लड़की किसी लड़के का प्रणय प्रस्ताव स्वीकार कर लेती तो वह लड़का ईर्ष्या का पात्र बन जाता और इस बात का उत्सव मनाया जाता. लड़की को कोई बुरी निगाह से नहीं देखता था. पाउलिना लिखती हैं कि स्कूल की नर्स बग़ैर कोई सवाल पूछे  मांगने पर गर्भ निरोधक दे दिया करती थी और स्कूल में दी जाने वाली सेक्स एजूकेशन की वजह से वे यौन रोगों और अवांछित गर्भधारण के बारे में काफी कुछ जान गई थीं. सबसे बड़ी बात यह कि उन्हें यह समझ में आ गया था कि स्त्रियां न केवल वह सब कुछ कर सकती हैं जो पुरुष कर सकते हैं, वे ऐसा भी कुछ कर सकती हैं जो पुरुष कभी नहीं कर सकता. वे मां बन सकती हैं. और इस एहसास ने उन्हें महसूस करा दिया कि स्त्रियां पुरुषों से अधिक सामर्थ्य रखती हैं.

लेकिन जब पंद्रह की होने पर वे मॉडलिंग के लिए पेरिस  गईं तो उनका ध्यान इस बात पर गया कि वहां पुरुषों  का बर्ताव स्त्रियों के प्रति कितना भिन्न है! वे आगे बढ़कर स्त्रियों के लिए दरवाज़े खोलते हैं, उनकी डिनर का बिल चुकाने को तत्पर रहते हैं, और कुल मिलाकर यह एहसास कराने की भरसक कोशिश करते हैं कि स्त्रियां बेहद नाज़ुक और इतनी बेवकूफ होती हैं कि वे खुद का खयाल नहीं रख सकती हैं. यहां आकर पाउलिन को खुशी नहीं हुई. लगा जैसे उनके पास जो ताकत थी, उसे ढक दिया गया है! और फिर अठारह की होने पर वे अमरीका जा पहुंचती हैं, एक अमरीकी से उन्हें प्रेम हो जाता है. वहां के बारे में अब तक की उनकी धारणाएं तेज़ी से बदलने लगती हैं. वे एक चिकित्सिका के पास जाती हैं तो वो उनकी देह के बारे में बड़े संकोच से बात करती है. और वहीं उन्हें यह एहसास होता है कि अमरीका में स्त्री की देह पर खुद उसके सिवा सबका हक़ है. उसकी यौनिकता पर उसके पति का हक़ है, खुद अपने बारे में उसकी राय पर उसका नहीं उसके सोशल सर्कल का हक़ है, और उसके गर्भाशय पर सरकार का हक़ है. सब चाहते हैं कि वो एक मां का, एक प्रेमिका का और बहुत कम वेतन पर एक कामकाजी औरत का किरदार निभाये और साथ ही छरहरी और युवा भी बनी रहे. पाउलिना बहुत अर्थपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहती है कि अमरीका में स्त्री को कहा तो यह जाता है कि तुम सब कुछ कर सकती  हो, लेकिन जब वो ऐसा करने की कोशिश  करती है तो उसे धराशायी कर दिया जाता है! और यह सब देख कर उन्हें लगता है कि जिस फेमिनिस्ट शब्द को वे भूल चुकी थीं, उसे फिर से याद कर लेना ज़रूरी है!


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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 13 जून, 2017 को फेमिनिज़्म की कसौटी  पर पश्चिमी  देश शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, June 6, 2017

खाइये मन भाता, पहनिए जग भाता

चाहता कोई नहीं है कि विवाद खड़ा हो, लेकिन अनायास ऐसा कुछ हो जाता है कि चाय  के प्याले में तूफ़ान आ जाता है. जो लोग राजनीति की दुनिया में हैं, हो  सकता है कि वे कभी-कभार जान-बूझकर भी विवादास्पद कुछ कह या कर देते हों, मुझे नहीं लगता कि संस्थान भी ऐसा ही करते होंगे. अब हाल का यह प्रसंग लीजिए जो घटित तो सुदूर बेल्जियम में हुआ है लेकिन जिसकी चर्चा सारी दुनिया में हो रही है. मुझे पूरा विश्वास है कि इस घटना का सूत्रपात जहां से हुआ वहां किसी की मंशा कोई विवाद खड़ा करने की नहीं रही होगी. आइये, पहले घटना जान लें.

बेल्जियम की ब्रसेल्स फ्री यूनिवर्सिटी के मेडिकल स्नातकों का दीक्षांत समारोह होने वाला था. सामान्यत: सारी दुनिया में दीक्षांत समारोह का कोई न कोई  ड्रेस कोड होता है, और उसे यथासुविधा बदला भी जाता है, जैसे अपने देश में कई जगहों पर काले गाउन की बजाय भारतीय वेशभूषा प्रचलन में आई है. लेकिन ब्रसेल्स  की इस यूनिवर्सिटी ने अपने नव स्नातकों को एक ई मेल भेजा जिसमें ऐसा कुछ कह दिया गया कि किसी ने क्षुब्ध होकर उस ई मेल को फेसबुक पर साझा कर दिया, और उसके बाद तो ऐसे मामलों में जो होना है वही हुआ. एक से एक तीखे बयान, उपहासात्मक टिप्पणियां, गुस्से की अभिव्यक्तियां वगैरह-वगैरह. ऐसा क्या था उस ई मेल में? उसमें जो कहा गया था उसका सरल-सा अनुवाद यह हो सकता है कि “सौंदर्यात्मक  दृष्टि से यह उपयुक्त होगा कि इस अवसर पर पुरुष एक उम्दा सूट पहन कर आएं, और युवतियां  स्कर्ट के साथ ऐसी ड्रेस पहनें जिसकी नेकलाइन नाइस रिवीलिंगहो.”  यह बात बहुत दिलचस्प लग सकती है कि भारत में जहां हम लोग आम तौर पर पश्चिमी दुनिया के देशों  को वेशभूषा के मामले में खासा उदार और उन्मुक्त मानते हैं, वहां भी इस मेल को सहजता से नहीं लिया गया. इतना ज़्यादा हो हल्ला मचा कि अंतत: इस मेल को भेजने वाली फैकल्टी ऑफ मेडिसिन को इस आशय का एक बयान ज़ारी कर कि इस मेल में युवा स्नातकों के लिए  वेशभूषा के जो निर्देश दिये गए हैं वे उन मूल्यों के विरुद्ध हैं जिनका निर्वहन इस  विश्वविद्यालय और फैकल्टी द्वारा किया जाता है, क्षमा याचना करनी पड़ी. वैसे  इस मेल में भी कह दिया गया था कि महिलाओं के लिए इस सलाह को मानना ज़रूरी नहीं है. एक बहुत रोचक बात बाद में उजागर हुई और वह यह कि यह मेल विश्वविद्यालय के उस सचिवालय द्वारा ज़ारी किया गया था जिसमें केवल महिलाएं काम करती हैं!

चलिये, इस विवाद का तो पटाक्षेप हो गया, लेकिन बात निकलती  है तो दूर तक जाए बग़ैर नहीं रहती है. इस विवाद की चर्चा करते हुए अनायास मुझे पैरिस में हुए एक ताज़ा सर्वे का ध्यान आ रहा है. फ्रांस की राजधानी में स्थित पैरिस-सॉर्बॉन यूनिवर्सिटी की एक शोधकर्ता डॉ सेवाग कर्टेशियन ने वहां होने वाली एक अंतर्राष्ट्रीय कॉन्फ्रेस में प्रस्तुत करने के लिए जो परिणाम जुटाये हैं वे खासे चौंकाने वाले हैं. उन्होंने कुछ महिलाओं को चुना और फिर उनमें से हरेक की दो तस्वीरें एक एक सौ भावी नियोक्ताओं को भेजीं. एक तस्वीर में उन्हें सामान्य वेशभूषा में दिखाया गया तो दूसरी में वैसी वेशभूषा में जिसका ज़िक्र बेल्जियम के इस विवाद के संदर्भ  में हो चुका है.  यह पाया गया कि बिक्री विभाग की नौकरियों के लिए सामान्य की तुलना में लो-कट ड्रेस वाली युवतियों को 62 इण्टरव्यू कॉल्स ज़्यादा मिले.  और अधिक चौंकाने वाली बात तो यह कि अकाउण्टेंसी विषयक कामकाज के लिए यह फासला 68 कॉल्स का रहा. यहीं यह भी बता दूं कि दोनों मामलों में युवतियों की योग्यता समान थी, यानि यह अंतर सिर्फ उनकी वेशभूषा के कारण आया. डॉ कर्टेशियन ने ठीक  ही कहा है कि काम चाहे जैसा हो, चाहे वो ग्राहकों के साथ सम्पर्क  कर बिक्री करने का हो या कार्यालय में बैठकर हिसाब-किताब करने का, उदार वेशभूषा वालों को अधिक सकारात्मक प्रतिक्रियाएं मिलती हैं. कर्टेशियन का कहना है कि ये परिणाम बहुत चौंकाने वाले और नकारात्मक भले  हों, आश्चर्यजनक तो फिर भी नहीं हैं. वे मानती हैं कि इस क्षेत्र में और अधिक रिसर्च की ज़रूरत है. और जिस कॉन्फ्रेस में प्रस्तुत करने के लिए  वे इन परिणामों तक पहुंची हैं उसमें भी विभिन्न विशेषज्ञ और नीति निर्माता यही विमर्श करने वाले हैं कि हम जैसे दिखाई देते हैं उसकी क्या-क्या परिणतियां होती हैं! 

अपने देश में प्राय: वेशभूषा को लेकर कोई न कोई विवाद होता रहता है. हाल में जब कुछ सरकारों ने अपने कर्मचारियों को यह निर्देश दिया कि वे कार्यालय में जी न्स और टी शर्ट जैसी अनौपचारिक  वेशभूषा में न आएं, तो बहुतों को यह बात नागवार गुज़री. ऊपर उल्लिखित दोनों प्रसंग यह बताने को पर्याप्त हैं कि पहनने-ओढ़ने को लेकर केवल हम ही संवेदनशील नहीं हैं!


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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 06 जून, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, May 30, 2017

क्या वाकई अगले कुछ सालों में पैट्रोल बहुत सस्ता हो जाएगा?

इन दिनों अमरीका के एक फ्यूचरिस्ट (भविष्यवादी) टोनी सेबा की कुछ भविष्यवाणियां खूब चर्चा में हैं. अपनी तीन किताबों में उन्होंने जो कुछ लिखा है और जिसे वे अपने भाषणों में भी प्राय: दुहराते हैं, उन भविष्यवाणियों के अनुसार सन 2030 तक दुनिया में 80 प्रतिशत राज मार्ग अनुपयोगी हो जाएंगे, लगभग 80 प्रतिशत कार बाज़ार सिमट चुका होगा और इतनी ही पार्किंग स्पेस ग़ैर ज़रूरी हो जाएगी, व्यक्तिगत कारों की अवधारणा करीब-करीब ख़त्म हो जाएगी और कार बीमा व्यवसाय एकदम ठप्प हो जाएगा. उनकी इन भविष्यवाणियों का आधार यह सोच है कि सन 2030 तक आते-आते पूरी दुनिया में ऊर्जा के लिए पैट्रोल आदि की जगह सौर या पवन ऊर्जा का प्रयोग होने लगेगा, अधिकांश वाहन विद्युत चालित होंगे और इन सबकी वजह से पैट्रोल की कीमतें घट कर 30 रुपया प्रति लिटर तक आ जाएंगी.

हो सकता है कि सेबा की ये भविष्यवाणियां सुन कर आप चौंकें और इन पर विश्वास भी न करें. असल में क्या होगा, यह तो भविष्य के गर्भ में है लेकिन अगर थोड़ा पीछे मुड़कर देखें तो पाएंगे कि दुनिया बदल तो ऐसे ही रही है. कोई नई तकनीक आती है और यकायक सब कुछ बदल जाता है. कुछ बरस पहले भला किसने सोचा होगा कि एक छोटा-सा मोबाइल फोन कितना कुछ बदल देगा! आज लैण्डलाइन टेलीफोन एक अजूबा लगने लगे हैं. और कम्प्यूटर तथा  डिजिटल उपकरणों ने कैसे हमारे जीवन को बदला है! संगीत के मामले में कैसे बदलाव आये हैं! रिकॉर्ड्स, एल पी, कैसेट्स, सीडी ये सब एक एक करके लुप्त हो गए, और आज सारा संगीत भौतिक से डिजिटल रूप में आ गया है. फोटोग्राफी में कितने बदलाव हमारे देखते-देखते आए है! अगर बहुत पहले की बात करें तो एक नई धातु तकनीक आई और उसने पाषाण युग का समापन कर दिया. अगर ये सारे बदलाव हुए हैं तो ज़रा सोचिये कि ऊर्जा के मामले में ऐसा क्यों नहीं हो सकता?  तेल, गैस, कोयला और आणविक जैसे निष्कर्षण आधारित ऊर्जा साधन भी एक दिन नई और बेहतर तकनीक के आ जाने से अलाभकारी साबित होकर अप्रासंगिक हो ही सकते हैं!

टोनी सेबा की बातें चाहे जितनी अविश्वसनीय लगें, अगर ठण्डे दिमाग से सोचें तो काफी हद तक मानने काबिल लगती हैं. उनका अनुमान है कि सन 2020-21 तक तो तेल की कीमतें बढ़ती जाएंगी और उसके बाद वे घटने लगेंगी. अपने बेहतर समय में जो तेल सौ मिलियन डॉलर प्रति बैरल बिकेगा उसी की कीमत बाद के दस बरसों में घटते-घटते, ज़रा सांस रोककर सुनें, पच्चीस डॉलर प्रति बैरल तक आ जाएगी. अब ज़रा उनकी बात के पीछे छिपे तर्क को समझें. उनका अनुमान है कि सन 2030 तक दुनिया के तमाम सड़क पर चलने वाले वाहन, बस, कार, ट्रक – सभी बिजली से चलने लगेंगे. उनका कहना है कि किसी एक देश में नहीं, पूरी दुनिया में ऐसा हो जाएगा. नीदरलैण्ड ने तो यह कह ही दिया है कि सन 2035 तक वहां केवल शून्य-उत्सर्जन वाली कारें ही बिक सकेंगी. हमारे अपने केंद्रीय ऊर्जा मंत्री पीयूष गोयल ने भी यह सम्भावना व्यक्त की है कि भारत में अगले पंद्रह बरसों में पैट्रोल या डीज़ल चालित कारें बिकना बंद हो जाएंगी. असल में यह सब तकनीकी बदलाव के कारण सम्भव होता दिखाई दे रहा है. टोनी सेबा की इस बात में दम लगता है कि बहुत जल्दी वह समय आ जाएगा जब सौर ऊर्जा कोयला, पवन, आणविक अथवा प्राकृतिक गैस से सस्ती हो जाएगी. उनका अनुमान है कि सन 2020 तक सौर ऊर्जा इनमें से किसी भी साधन के परिवहन की लागत से भी सस्ती हो जाएगी. इसका मतलब यह हुआ कि आप कितनी ही सस्ती  ऊर्जा पैदा कर लें, उस पर कितनी ही सब्सिडी भी दे दें, तब भी परिवहन लागत के कारण वह प्रतिस्पर्धा में पिछड़ जाएगी.

टोनी सेबा ने एक और बात कही है जो ग़ौर तलब है. उनका कहना है कि नई तकनीक व्यापार के नए रंग ढंग भी लेकर आ रही हैं. अब यही बात देखिये कि जिनके पास अपनी कार है वे कितनी देर उसे चलाते हैं और कितनी देर वह कार गैरेज में या पार्किंग में खड़ी रहती है! टोनी के अनुसार कार 96% समय खड़ी ही रहती है. यह बात समझ में आ जाने के बाद अपने वाहनों से हमारा रिश्ता बदलना अवश्यम्भावी है. और इसकी आहट उबर, ओला जैसी सेवाओं की बढ़ती जा रही लोकप्रियता में सुनी जा सकती है. अगर निजी वाहन घटेंगे तो उनका दूरगामी और व्यापक प्रभाव अवश्यम्भावी है. असल में हमारे चारों तरफ जो बदलाव होते हैं, प्राय: वे हमारी नज़र से ओझल रहते हैं. शायद हम उन्हें देखकर भी नहीं देखते हैं. ऐसे में टोनी सेबा जैसे लोग हमारी आंखों में उंगली डाल कर उन बदलावों को हमें दिखाते और उनके लिए तैयार करते हैं. यही उनका बड़ा योगदान है.  


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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 30 मई, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित  आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, May 23, 2017

फ्रांस में प्रथम महिला की उम्र को लेकर बवाल

फ्रांस की पिछली सरकार में मंत्री रहे इमैनुएल मैक्रॉन ने वहां  की राजनीति में भारी उथल-पुथल मचा दी है.  39 साल की उम्र में वो फ़्रांस की मुख्यधारा की वामपंथी और उदारवादी पार्टियों को हराकर राष्ट्रपति चुने गए हैं. लेकिन फ्रांस में आजकल उनकी इस आश्चर्यजनक जीत से अधिक चर्चा उनकी  पत्नी ब्रिजेट टोग्न्यूकस की हो रही है. वैसे थोड़ी बहुत चर्चा तो उनकी पहले भी होती रही है. इसलिए कि सन 2015 में जब मैक्रॉन को फ्रांस के वित्त मंत्री का दायित्व मिला तब ब्रिजेट ने अपना सफल  कैरियर  छोड़ कर उनकी मदद करना शुरु कर दिया था और फिर राष्ट्रपति  चुनाव के दौरान भी उन्होंने जमकर उनके चुनाव अभियान में हिस्सेदारी निबाही. बताया गया कि इस अभियान के दौरान ब्रिजेट ने अपने पति के हर कदम पर बारीकी से निगाह रखी.  लेकिन अब जबकि मैक्रॉन फ्रांस के राष्ट्रपति निर्वाचित हो चुके हैं, श्रीमती ब्रिजेट मैक्रॉन के बारे में चर्चाओं का स्वर कर्कश और कटु हो गया है. यहीं यह बात याद कर लेना उचित होगा कि ब्रिजेट की आयु चौंसठ वर्ष है यानि वे अपने पति से पच्चीस बरस बड़ी हैं. फ्रांस में आजकल चर्चाएं उम्र के इसी अंतराल को लेकर ज़्यादा हो रही हैं.  वैसे इस तरह की स्त्री-द्वेषी चर्चाएं उनके चुनाव अभियान के दौरान भी हुई थीं लेकिन अब तो पानी सर से ऊपर गुज़रने लगा है.

फ्रांस की जानी-मानी कार्टून पत्रिका शार्ली एब्डो ने हाल ही में अपने कवर पेज पर मैक्रॉन दम्पती का एक कैरीकेचर छापा है और उसके नीचे शीर्षक दिया है: अब वे चमत्कार दिखाने वाले हैं! वैसे तो इस शीर्षक को मैक्रॉन के चुनावी वादों से जोड़ कर अब उनके पूरा होने की सम्भावनाओं के अर्थ में पढ़ा जा सकता है लेकिन जब हम इसे कैरीकेचर के साथ देखते-पढ़ते हैं तो दोनों की आयु के अंतराल के साथ इसका एक अन्य अर्थ भी समझ में आता है जो शालीन नहीं है.  यही वजह है कि वहां के सोशल  मीडिया में सेक्सिस्ट और एजिस्ट कहकर इस कवर की खूब लानत-मलामत की जा रही है. लेकिन इसी सोशल मीडिया पर इन दोनों के लिए अनगिनत भद्दी और बेहूदा टिप्पणियां भी खूब की जा रही हैं. ऐसी ही एक टिप्पणी में ब्रिजेट को पेडोफाइलतक कह दिया गया है, जो अभद्रता की पराकाष्ठा है.

लेकिन बहुत सुखद बात यह है कि संकीर्ण और विकृत मानसिकता से उपजी इन टिप्पणियों का बहुत कड़ा और तीखा विरोध भी हो रहा है. ब्रिजेट की पिछली शादी से जन्मी बत्तीस वर्षीया बेटी भी खुलकर सामने आई हैं और उन्होंने कहा है कि उनकी मां के प्रति ऐसी कुत्सित टिप्पणियां ईर्ष्याजनित हैं. उसने इस बात पर अपनी नाराज़गी का इज़हार किया है कि इक्कीसवीं  सदी के फ्रांस में इस तरह की बेहूदा बातें की जा रही हैं. उन्होंने इन टिप्पणियों को  ब्रिजेट के स्त्री होने के साथ भी जोड़कर देखा है और पूछा है कि क्या किसी पुरुष राजनेता के बारे में भी ऐसी बेहूदा बातें की जाती हैं? स्पष्ट है कि उनका संकेत अधिक आयु वाले पुरुष और कम आयु वाली स्त्री के संग-साथ की तरफ है. और यहीं यह बात भी कि इन चर्चाओं के बाद फ्रांस का मीडिया वहां के और दुनिया भर के राजनेताओं की सूचियां खंगाल  कर स्त्री-पुरुष के उम्र के अंतराल की जानकारियां परोसने में जुट गया है. लेकिन, जैसा कि एक पत्रकार ने लिखा है, अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और उनकी पत्नी मेलानिया के बीच भी उम्र का इतना ही अंतराल है लेकिन इसे लेकर कोई चर्चा नहीं होती है. खुद मैक्रॉन ने भी कहा है कि अगर मैं अपनी पत्नी से बीस बरस बड़ा होता तो किसी ने एक पल को भी इस बात पर ध्यान नहीं दिया होता, लेकिन क्योंकि वे मुझसे बीस बरस  बड़ी हैं, हर कोई इस रिश्ते पर सवाल उठा रहा है.  

मैक्रॉन की पहली मुलाकात ब्रिजेट से जब हुई तब वे महज़ पंद्रह  बरस के थे. एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मी और सात बच्चों में सबसे छोटी ब्रिजेट तब हाई स्कूल में ड्रामा टीचर थीं, विवाहिता थीं और उनके तीन बच्चे भी थे. इस मुलाकात के दो बरस बाद मैक्रॉन ने उनके प्रति अपने प्रेम का इज़हार कर दिया. बाद में ब्रिजेट ने एक साक्षात्कार में कहा कि वे प्रेम में ऐसी बहीं और मैक्रॉन के प्रति उनका आकर्षण इतना प्रबल था कि अंतत: 2006 में उन्होंने अपने तत्कालीन पति जो एक बैंकर थे, को तलाक दे दिया. इससे  अगले बरस उन्होंने मैक्रॉन से विवाह कर लिया. स्वाभाविक ही है कि उनकी यह प्रेम कथा राष्ट्रपति चुनाव अभियान के दौरान भी चर्चा में रही लेकिन सुखद बात यह कि फ्रांस की ज़्यादातर महिला वोटर्स ने इसे कोई मुद्दा नहीं माना. उलटे कुछ ने तो पलटवार करते हुए यह तक कह दिया कि वैसे तो हम पुरुषों को उनसे कम उम्र वाली स्त्रियों के साथ देखने के आदी हैं, लेकिन उसका उलट देखना बेहद सुखद है.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत  मंगलवार, 23 मई, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.