Tuesday, November 3, 2015

जीना यहां, मरना वहां

राजस्थान के हर  क्षेत्र में इस आशय का कथन प्रचलित है कि चाहे कमतर महत्व का अन्न ही क्यों न खाना पड़े, अपना इलाका छोड़कर कहीं नहीं जाएंगे. जैसे गेहूं छोड़कर मक्की खाना, लेकिन मेवाड़ छोड़कर कहीं नहीं जाना. आप मेवाड़ की जगह मारवाड़ कर दें, यह कथन मारवाड़ का हो जाएगा. और अपनी धरती से प्रेम केवल राजस्थान वासियों को ही नहीं रहा है. बहादुर शाह ज़फर के एक दरबारी शायर शेख इब्राहीम ‘जौक’ ने भी तो कहा था,  “कौन जाए पर जौक दिल्ली की गलियां छोड़कर!” लेकिन इसी के साथ यह भी याद रखने की बात है कि हमारे ही देश में जीवन के अंतिम समय काशी चले जाने और वहीं प्राण त्याग करने का सपना भी देखा जाता रहा है.

लेकिन इधर हाल में आई एक रपट ने, लगता है कि काशी से उसका यह गौरव भी छीन लेना चाहा है. सिंगापुर का एक परोपकारी संगठन लियन फाउण्डेशन पिछले कई बरसों से द क्वालिटी ऑफ डेथ इण्डेक्स नामक एक सर्वेक्षण करवाता है. इस  सर्वेक्षण में दुनिया भर के कोई सवा सौ रोग लक्षण नियंत्रण विशेषज्ञ चिकित्सकों के साथ साक्षात्कार करके यह जानने का प्रयास किया जाता है कि किस देश में मृत्य पूर्व देखभाल की सुविधाएं कैसी हैं! तो इस बार अस्सी देशों से जुटाई गई जानकारी के अनुसार यह पाया गया है कि पूरी दुनिया में मरने के लिए सबसे उम्दा देश ब्रिटेन है. यानि, आप चाहे जहां रहें, मरने के लिए ब्रिटेन चले जाएं! अगर ब्रिटेन जाना मुमकिन न हो तो ऑस्ट्रेलिया जाएं, वहां भी न जा सकें आयरलैण्ड चले जाएं और अगर वह भी सम्भव न हो तो बेल्जियम का रुख कर लें.

यानि अगर आप सुख पूर्व मरना चाहते हैं तो आपको किसी न किसी अमीर  देश का ही रुख करना चाहिए. यह बात स्वाभाविक भी है. समृद्ध देश ही तो अपने नागरिकों की समुचित देखभाल का  खर्चा उठा  सकते हैं. वैसे यह जानना कम रोचक नहीं होगा कि इस अध्ययन के अनुसार ब्रिटेन में जीवन के अंत समय में देखभाल करने वाली इन सेवाओं का 80 से 100 प्रतिशत भार स्वयं रोगी द्वारा नहीं वरन अधिकांशत: सेवाभावी संगठनों द्वारा वहन किया जाता है.

द इकोनॉमिस्ट इण्टेलिजेंस यूनिट द्वारा किए गए इस अध्ययन में व्यापक राष्ट्रीय नीतियों, राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवाओं में रोग के लक्षण नियंत्रित करने वाली सेवाओं के व्यापक समावेशन, सुदृढ़ होसपाइस आन्दोलन, और इस मुद्दे पर गहन सामुदायिक संलग्नता को आधार बनाया गया. ज़ाहिर है कि इन सबके मूल में है किसी भी देश के नागरिकों का आर्थिक स्तर. और यही कारण है कि आर्थिक संसाधनों की कमी और आधारभूत ढांचे के अभाव में विकासशील और तीसरी  दुनिया के बहुत सारे देश अपने नागरिकों को सामान्य कष्ट निवारक सुविधाएं भी सुलभ नहीं करवा पाते हैं. लेकिन इसके बावज़ूद यह जानना भी कम सुखद नहीं है कि अपनी आर्थिक सीमाओं के बावज़ूद पनामा जैसा छोटा देश अपनी प्राथमिक चिकित्सा सेवाओं में रोग के लक्षणों के नियंत्रण के तंत्र का समावेश कर इकत्तीसवें स्थान पर पहुंच सका है. ऐसा ही सुखद परिणाम मंगोलिया ने भी प्राप्त किया है जिसने होसपाइस सुविधाओं और शिक्षा का विस्तार कर अठाइसवां स्थान पा लिया है. एक और ख़ास बात यह भी कि मंगोलिया ने यह चमत्कार एक अकेले  डॉक्टर  के दम पर कर दिखाया है.  और तो और युगाण्डा जैसा देश भी दर्दनाशक दवाओं की उपलब्धता बढ़ाकर पैंतीसवें स्थान तक पहुंच सका है.

इतना सब बताते हुए भी मैं अपने देश भारत का ज़िक्र करने से बचता रहा हूं. वजह आप समझ सकते हैं. अस्सी देशों की सूची में हम सड़सठवें स्थान पर हैं. अगर खुश होना चाहें तो यह जान लें कि चीन हमसे भी पीछे है. वह इकहत्तरवें स्थान पर है. लेकिन जब आप यह जानेंगे कि हमारे ही महाद्वीप का एक देश ताइवान छठी पायदान पर है, तो आपकी यह खुशी भी उदासी में तबदील हो जाएगी. बात सिर्फ अमीरी की भी नहीं है. बात है सरकार की नीतियों की, उसकी प्राथमिकताओं की और समाज की बेहतरी में जन भागीदारी की.

एक तरफ जहां इस अध्ययन में पहले नम्बर पर आने वाले देश ब्रिटेन में भी यह शिकायत की  जा रही है कि वहां हर नागरिक को समुचित सुविधाएं मयस्सर नहीं हो रही हैं, वहीं तीसरी दुनिया के बहुत सारे देशों में, जिनमें हमारा अपना देश भी शामिल है, राष्ट्रीय बजट का बहुत ही छोटा हिस्सा स्वास्थ्य और देखभाल सेवाओं पर केन्द्रित रखा जाता है और उसमें भी यदा-कदा कटौती कर दी जाती है. ऐसे में अपने देश की वित्तीय प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार तो ज़रूरी हो ही जाता है. भला कौन नहीं चाहेगा कि जिस  मिट्टी में वह पला बढ़ा है उसी मिट्टी की गोद में वह चिर  निद्रा में भी लीन हो जाए!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 03 नवम्बर, 2015 को जीना यहां, मरना वहां, ताकि आसानी से कट जाए बुढ़ापा शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.    
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