Tuesday, November 17, 2015

इस एप के आगे सब हैं बेबस और लाचार

कोई इस बात को पसन्द करे या न करे, इंसान जिसके भी सम्पर्क में आता है उसका मूल्यांकन करता ही  है. और यह बात व्यक्ति के लिए ही नहीं, संस्थाओं और प्रतिष्ठानों, बल्कि वस्तुओं के लिए भी इतनी ही सही है. आप किसी से मिलते हैं और उसके पीठ फेरते ही कह उठते हैं, यह आदमी तो कुछ जंचा नहीं! आप किसी दुकान से सामान खरीदते हैं और दुकान से बाहर निकलते-निकलते तो दुकान और सामान दोनों के बारे में अपनी राय बना और ज़ाहिर भी कर चुके होते हैं.

हमारे जीवन में तकनीक की गम्भीर घुसपैठ हुई तो राय निर्माण के इस काम को तकनीक का सहारा भी मिल गया. पहले हम अखबारों और अन्य संचार माध्यमों का इस्तेमाल करते थे, हालांकि वो इस्तेमाल निर्बाध नहीं था और उस के इस्तेमाल की अनेक सीमाएं थीं, लेकिन जब से सोशल मीडिया आया हम सबको एक उन्मुक्त आकाश मिल गया. हम  जिसके बारे में जैसी चाहें राय व्यक्त करने में सक्षम हो गए!  इधर सोशल मीडिया से एक कदम और आगे है एप्स यानि मोबाइल एप्लीकेशंस की दुनिया. हर काम के लिए अनगिनत एप्स मौज़ूद हैं. एक बेहद लोकप्रिय एप का तो नाम ही है व्हाट्सएप!

तो ये एप्स राय की अभिव्यक्ति और धारणा निर्माण के क्षेत्र में भी अपना योग दे रहे हैं. जलपान गृहों के बारे में अपनी राय देने वाले  ज़ोमेटो नामक एप से तो हममें से बहुत सारे लोग वाक़िफ होंगे ही, ऐसा ही एक और एप है येल्प! ऐसे और भी अनगिनत एप होंगे. लेकिन इधर समझदारों और प्रयोगकर्ताओं की दुनिया में एक नए आनेवाले एप को लेकर खासी हलचल मची हुई है. इस एप का नाम है पीपल (Peeple) और यह अपने ज़ारी होने से पहले ही खासा विवादास्पद हो गया है. इसे जारी करने वाली कम्पनी ने इसे ‘येल्प फॉर पीपुल’ यानि लोगों के लिए येल्प कहकर प्रचारित किया था. कम्पनी का तो दावा था कि यह इस बात में क्रांतिकारी बदलाव ला देगा कि हमारे रिश्तों की मार्फत हमें कैसे देखा जाता है!

इस एप में यह सुविधा देने का वादा किया गया था कि आप जिसे भी जानते हैं उसके बारे में नकारात्मक या सकारात्मक कैसी भी राय दे सकते हैं और उसकी स्टार रेटिंग भी कर  सकते हैं, यानि उसे शून्य से पाँच तक जितना चाहें उतने स्टार दे सकते हैं. आप जिनके बारे में यह सब कर सकते हैं उनकी तीन श्रेणियां रखी गई थीं – पर्सनल, प्रोफेशनल और डेटिंग. यानि आपको यह तै करना था कि आप जिन्हें जानते हैं वो इनमें से किस श्रेणी में आता या आती है. इस एप की ख़ास बात यह थी कि अगर आपने किसी के बारे में कोई प्रतिकूल राय भी ज़ाहिर कर दी तो सम्बद्ध व्यक्ति उसके बारे में कुछ नहीं कर सकता था, और आपकी वह प्रतिकूल राय भी कम से कम 48 घण्टों तक तो सजीव रहती ही. दूसरे पक्ष को बस यह हक़ था कि वह आपकी प्रतिकूल राय का प्रतिवाद करने का प्रयत्न करे. इस एप की सबसे ख़तरनाक बात यह थी कि कोई किसी के भी बारे में किसी भी तरह की राय व्यक्त कर सकता था. यानि अगर यह एप प्रचलन में आ गया होता तो हम सब अरक्षित अनुभव करने को विवश हो जाते. इसके दुरुपयोग की आशंकाओं भी निराधार और निर्मूल नहीं कहा जा सकता है.

लेकिन इस एप के ज़ारी होने से पहले ही इसका इतना अधिक विरोध हुआ कि इसकी  डेवलपर  कैलगरी की जूलिया कॉर्ड्र्रे को बचाव की मुद्रा में आकर यह आश्वासन देने को मज़बूर होना पड़ा कि बिना आपकी स्पष्ट अनुमति के आप हमारे प्लेटफॉर्म पर नहीं होंगे. इसी के साथ उन्हें यह भी आश्वासन देना पड़ा कि नकारात्मक टिप्पणियों को हटाने के लिए 48 घण्टों के इंतज़ार की बाधा को भी हटा दिया जाएगा. लेकिन उनके इन  स्पष्टीकरणों  के बाद लोगों को लगा कि अगर नकारात्मक टिप्पणियां करने के अधिकार बहुत ज़्यादा सीमित कर दिये जाएंगे तो फिर यह एप क्लाउट या लिंक्डइन  जैसा पूर्णत: सकारात्मक टिप्पणियों वाला शाकाहारी एप बनकर रह जाएगा!  

लेकिन इस एप को लेकर ज़्यादा आशंकाएं यही सामने आई कि यह लोगों के लिए येल्प की तरह मददगार साबित होने की बजाय उनकी परेशानियों का सबब बन सकता है. कुछ लोगों को एक और आशंका हुई और वह अधिक गम्भीर किंतु बारीक आशंका है. उन्हें लगा कि यह एप विज्ञापन की कमाई का साधन बन सकता है या फिर यह लोगों को अपने मोबाइल नम्बर और अन्य निजी जानकारियां सुलभ कराने के लिए बाध्य कर सकता है – जो अपने आप में एक बहुत बड़ा व्यवसाय है.

यह सारी चर्चा इतना तो साबित करती है कि आज की दुनिया बहुत जटिल होती जा रही है. साधारण और लाभदायक नज़र आने वाली चीज़ें भी बहुत ग़ैर मामूली और नुकसान देह साबित हो सकती हैं!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 17 नवंबर, 2015 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 
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