Wednesday, August 12, 2026

आप शहर को छोड़ दें, शहर आपको नहीं छोड़ता है!

 इस बार एक लंबे अंतराल के बाद उदयपुर जाना हुआ.


उदयपुर—जहाँ मेरा जन्म हुआ, जहाँ मेरी पूरी पढ़ाई हुई, जहाँ मेरे जीवन के, -बचपन और किशोरावस्था के- इतने वर्ष बीते कि वह शहर कभी मेरे लिए केवल एक शहर रहा ही नहीं.  लेकिन फिर धीरे-धीरे वह शहर मेरे हाथों से फिसलता गया.  या शायद सच यह है कि मैं ही उससे दूर होता गया.  होते-होते एक दिन ऐसा आया कि मैंने पूरी तरह उस शहर को अलविदा कह दिया.

नौकरी के सिलसिले में पूरे पैंतीस वर्ष उदयपुर से बाहर रहा, लेकिन अपना मकान  वहाँ था, इसलिए शहर से एक रिश्ता बना रहा.  फिर वह मकान भी बेच दिया.  जो थोड़ा-बहुत सामान बचा था, उसे भी वहाँ से लेकर नए खरीददार को वह मकान  सौंप आया.  लगा कि अब शायद उदयपुर से मेरा रिश्ता पूरी तरह समाप्त हो गया.

लेकिन क्या अपने जन्म देने वाले शहर से कोई रिश्ता सचमुच समाप्त हो सकता है?

मेरा तो नहीं हुआ.

रह-रहकर वह शहर याद आता है.  और उसके साथ याद आता है वह मकान, जो कभी मेरा घर था, और जो अब लगभग पूरी तरह बदल चुका है.


उस मकान के नए मालिक सुरेंद्र वैष्णव से यदा-कदा व्हाट्सएप या फोन पर बात हो जाती है.  पिछले दिनों उन्होंने उस भवन के नवीनीकरण के बाद की कुछ तस्वीरें भेजीं.  तस्वीरें देखते ही मन एक बार फिर उस मकान को अपनी आँखों से देखने के लिए व्याकुल हो उठा.  पता नहीं कब मैंने पत्नी या बेटी से इसका ज़िक्र कर दिया.  उसी का जो परिणाम हुआ, उसकी कहानी यहाँ लिख रहा हूँ.


इस बार उदयपुर जाना एक पारिवारिक विवाह के कारण हुआ.  मेरे भतीजे की बेटी का विवाह था. इन लोगों से हमारी आत्मीयता इतनी सघन है कि बेंगलुरु से बेटी ने भी अपनी व्यस्तता को किनारे रखकर उसमें आने का फैसला किया.  बेटा क्योंकि विदेश में है, उसके लिए चाह कर भी आना संभव नहीं हुआ. आने से पहले बेटी ने  हम दोनों से बात की और कहा कि विवाह के बाद एक दिन और उदयपुर में रहेंगे.  हमें भी यह प्रस्ताव अच्छा लगा.  परिवार के विवाह में तो स्वाभाविक ही बहुत व्यस्तता रहती है; उसके बाद का समय पूरी तरह हमारा अपना होगा.


बेटी ने मुझसे दो-तीन बार पूछा—विवाह के बाद हम कहाँ ठहरेंगे?

वह मुझसे किसी अच्छे होटल का सुझाव चाह रही थी.  मैंने जो सुझाव दिए, उसे पसंद नहीं आए.  मेरा कहना था कि या तो उसी रिसॉर्ट में जहां विवाह हो रहा है, एक दिन और रुक जाएंगे, या फिर उदयपुर पहुँचकर कोई उपयुक्त होटल देख लेंगे.  आखिर उदयपुर हमारे लिए कोई नया शहर तो है नहीं!

मेरा ध्यान इस बात की तरफ गया ही नहीं कि बेटी के मन में कुछ और चल रहा है.

विवाह के दौरान उसने अचानक बताया—“पापा, मैंने होटल शिव निवास पैलेस में कमरा बुक कर लिया है.”


मैंने इसका नाम तो सुना था, और मेरा अनुमान था कि यह बहुत महँगा होटल होगा.

वह मेरे अनुमान से भी कहीं अधिक महँगा निकला.

होटलों की मेरी सूची में तो वह था ही नहीं.  लेकिन बेटी ने बुक कर लिया था तो अब क्या कहा जा सकता था!


विवाह सानंद सम्पन्न हुआ.  सच कहूँ तो अपनी अब तक की जिंदगी में इतना शानदार और सुरुचिपूर्वक नियोजित विवाह मैंने नहीं देखा.  अच्छा लगा कि हमारे परिवार ने ऐसा आयोजन किया. हम सारे ही लोग निम्न मध्यमवर्ग की पैदाइश हैं. इसलिए यह सब और अधिक आनंदित करता है.


अगली सुबह बेटी ने टैक्सी बुलाई.  हम शहर से बाहर स्थित उस रिसॉर्ट से शिव निवास पैलेस की ओर चल पड़े.

जैसे ही टैक्सी उदयपुर के भीतरी हिस्से में पहुँची, मेरे मानस-पटल पर बचपन और किशोरावस्था की स्मृतियाँ एक-एक करके झिलमिलाने लगीं.  उससे पहले अशोक नगर से गुजरते हुए बाईं ओर अपना कॉलेज—तब का एम.बी. कॉलेज— दिखा तो अचानक वह समय सामने आ गया जब मैं यहाँ विद्यार्थी था.  1967 के बाद इस परिसर में शायद एक-दो बार ही आया हूँ.


सूरजपोल से गुजरे तो बहुत-सी यादें ताजा हो गईं.  प्रयाग दास जी का स्थल नज़र आया तो महंत मुरली मनोहर शरण जी का स्नेह भी याद आया. बालकवि बैरागी के कारण उनसे परिचय हुआ था और फिर उनका अकुंठ स्नेह मुझे भी मिला. अमल का कांटा पार करते हुए जब एक जगह कालाजी गोराजी लिखा हुआ नज़र आया तो एकदम से यह बात याद आई कि यहीं तो मेरा जन्म हुआ था. मां जो बताया करती थीं, उसे याद किया तो अनुमान हुआ कि वह शायद कोई मिशनरी अस्पताल रहा होगा. वे किसी मिस साहब की खूब चर्चा किया करती थीं, जो कदाचित वहाँ की अंग्रेज़ नर्स रही होंगी. उससे थोड़ा आगे बढ़े तो शीतला माता का मंदिर आया और फिर गाड़ी चढ़ाई चढ़ने लगी. मैं पत्नी को बताने लगा कि हमारे समय में उदयपुर में कोई भी विवाह समारोह शीतला माता की पूजा के बिना शुरू नहीं होता था. ऐसी बहुत सारी यादें ताज़ा होती गईं.

शहर बदल गया था, लेकिन मेरे भीतर का उदयपुर अभी भी वैसा का वैसा था.

शिव निवास पैलेस उदयपुर के राजमहल का ही एक अंग है.  उदयपुर के दूरदर्शी महाराणा भगवत सिंह ने जगमंदिर को होटल (लेक पैलेस) में बदलकर जिस परंपरा की शुरुआत की थी, बाद में अनेक राजाओं-महाराजाओं ने उसका अनुकरण किया.  महाराणा भगवत सिंह वर्तमान महाराजा श्रीजी लक्ष्यराज सिंह के दादा थे.

मेरे पिता जी बताया करते थे कि उनका महाराणा भूपाल सिंह जी (जो भगवत सिंह जी के पिता थे) के यहाँ खूब आना-जाना था और उन्होंने भगवत सिंह जी को अपनी गोद में खिलाया था.  उन्हीं भगवत सिंह के पुत्र अरविंद सिंह उदयपुर के उसी एम.बी. कॉलेज में मेरे सहपाठी थे.


शिव निवास पैलेस सचमुच पैलेस है.  हमारा सुइट पिछोला झील के ठीक सामने था.  खिड़की से होटल लेक पैलेस दिखाई दे रहा था और उसके पीछे बादलों में से सज्जनगढ़ झाँक रहा था.  कमरे में थोड़ा व्यवस्थित होने के बाद बेटी ने कहा—“चलें, शहर घूम आते हैं.”

होटल की गोल्फ कार्ट से हम त्रिपोलिया तक आए और वहाँ से एक ऑटो किया कि जहाँ-जहाँ हम चाहें, वह हमें ले जाए.

और तभी मेरी ट्यूबलाइट जली. मुझे बेटी का ‘षड्यंत्र’ समझ में आया! षडयंत्र शब्द नकारात्मक है, लेकिन मुझे कोई और अभिव्यक्ति सूझ नहीं रही है, इसलिए इसका उपयोग कर लिया है.

उसके मन में यह बात बैठी हुई थी कि पापा अपना पुराना घर और अपना पुराना शहर फिर से देखना चाहते हैं.  उसने बहुत सावधानी से पूरी योजना बनाई थी और मुझे तनिक भी संदेह नहीं होने दिया.

उसने बाकी सारे विकल्पों को दरकिनार करके उसी होटल को चुना जो मेरे पुराने घर के इलाके में था.  उसकी योजना थी कि पापा अपने पुराने घर के आसपास ही रहें और अपने अतीत की स्मृतियों को फिर से जी सकें.

मैं अनजान बना रहा और वह अपना काम करती रही.

ऑटो में बैठने से पहले हमने अपने पुराने घर के नए स्वामी सुरेंद्र वैष्णव को फोन करके अनुरोध किया कि वे वहाँ पहुँच जाएँ, ताकि हम घर को भीतर से एक बार फिर देख सकें.  वह भला आदमी अपने सारे काम छोड़कर दौड़ा चला आया.

राजमहल के द्वार से जगदीश मंदिर के सामने होते हुए जब हम जगदीश रोड पर स्थित अपने पुराने घर के सामने पहुँचे, सुरेंद्र हमारा इंतजार कर रहे थे.


बाजार की शक्ल-सूरत काफी बदल चुकी थी.  बहुत-से पुराने मकान गायब हो गए थे और उनकी जगह नए मकानों ने ले ली थी.  लेकिन सड़क वही थी, मोहल्ला वही था.  पता नहीं अब वहाँ किसी को यह बात मालूम भी है या नहीं कि मेरे जमाने में इस जगह को ‘सेठों की ओळ’ कहा जाता था. वजह यह कि उस मुहल्ले में बहुत सारे घर सेठ कंदोई लोगों के थे. सेठ कंदोई, आज की भाषा में पारंपरिक शेफ़! शादी ब्याह में खाना बनाने वाले.

वहीं मेरी वह दुकान थी, जहाँ बैठकर मैंने 1959 में अपने पिता के देहावसान के बाद जैसे-तैसे अपना घर चलाया था.  वहीं घड़ीसाजी की थी.  पहले उस दुकान पर एक लम्बा साइनबोर्ड हुआ करता था – भगतराम रामप्रताप. बाद में जब नया साइनबोर्ड बना तो उस पर लिखवाया गया था – बाबू रामप्रताप दुर्गाप्रसाद. भगतराम मेरे दादाजी का नाम था. तो इस दुकान को 1967 में मेरी नौकरी लगने के बाद स्थायी रूप से बंद कर दिया गया —और शायद उसी दिन अपनी माँ के मन में एक स्थायी नाराजगी का बीज भी मैंने बो दिया था.  


अब उस दुकान का रूप बहुत बदल चुका था.  वहाँ बुटीक जैसी एक दुकान थी और उसे एक छोटी-सी लड़की संभाल रही थी.  जाहिर है, उसने वह जगह किराए पर ले रखी थी.

दुकान के बाजू में ऊपर जाने के लिए सीढ़ियाँ हुआ करती थीं.  उन्हीं सीढ़ियों पर बैठकर मेरी माँ और बाद में मौसी अपनी बेनूर जिंदगी का बहुत-सा समय बिताती थीं.  वे सीढ़ियाँ ही उनका ‘रामझरोखा’ थीं, जहाँ बैठकर वे दुनिया का मुजरा लेती थीं.  मोहल्ले की बुजुर्ग होने के नाते मुजरा लेने का उनका हक भी था.

सीढ़ियाँ अब भी थीं, मगर उनका स्वरूप बदल चुका था.

सुरेंद्र के साथ चारु और मैं ऊपर गए.  पत्नी नीचे ही खड़ी रहीं. वे इसी घर में दुल्हन बनकर आई थीं और तब भी उन सीढ़ियों  से घबराती थीं, इस बार और ज़्यादा घबरा गईं.  मेरा मन उन कमरों को देखने का था जिनमें रहकर मैंने बी.ए. और एम.ए. की पढ़ाई की थी और जिनका विस्तृत वर्णन मैंने श्री सुरेश उनियाल द्वारा संपादित खूबसूरत पुस्तक ‘मेरा कमरा’ (काव्यांश प्रकाशन, ऋषिकेश) के दूसरे भाग में किया है.

मेरे उस मकान के खरीददार सुरेंद्र वैष्णव के परिवार में भी इन वर्षों में काफी उथल-पुथल हुई थी. कई सदस्य दिवंगत हो गए. अब वही इस भवन का मालिक है और उसने इसकी व्यावसायिक संभावनाओं का पूरा उपयोग किया है.  उसने बताया कि ऊपर की तीन मंजिलों पर उसने दो-दो कमरे बना दिए हैं, जिन्हें पर्यटकों को किराए पर दिया जा सकता है.  हर कमरे में जरूरी सुविधाएँ हैं.  एसी और टीवी भी हैं.

मैं कल्पना भी नहीं कर पा रहा था कि मेरे उस पुराने घर में यह सब संभव हो सकता है.

लेकिन सुरेंद्र ने कर दिखाया था.

हाँ, इसका एक परिणाम यह हुआ कि जिस कमरे में बैठकर मैंने पढ़ाई की थी, वह अब अस्तित्व में ही नहीं था.  वहाँ ऐसा कुछ भी नहीं था जो मुझे मेरे उस समय की याद दिला सके.

बस एक कल्पना थी—

कि मैं अपने ही पुराने घर में खड़ा हूँ. वहां खड़ा हूं जहां कभी टेबल लैम्प की रोशनी में रात-रात भर पढ़ा करता था.

चौथी मंजिल के बाद खुली छत थी.  पहले तो मैं तीसरी मंज़िल पर ही रुक गया, लेकिन फिर मन नहीं माना तो हाँफते-हाँफते वहाँ भी गया.  क्या पता फिर कभी आना हो या न हो!  ‘बाज़ार फ़िल्म का वो गाना जेहन में गूंजा – देख लो आज हमको जी भर के.


वहाँ से सामने अपना कंवरपदा स्कूल देखा.  घर के ठीक सामने के जैन मंदिर की छत देखी. और देखी वह बदली हुई सड़क भी, जिस पर कभी मेरा रोज का आना-जाना हुआ करता था.

सुरेंद्र ने घर का सामने वाला रूप लगभग जस का तस रखा है.  यह उसकी व्यावसायिक बुद्धि भी है.  उस मोहल्ले की पुरानी इमारतें अब भी पर्यटकों को आकर्षित करती हैं.


थोड़ी देर ऊपर खड़ा रहा.  अपने अतीत को जैसे साँसों में भरता रहा.  फिर आहिस्ता-आहिस्ता नीचे उतर आया.

मेरे घर से लगी हुई कपड़ों की एक दुकान थी. पता चला, उसके मालिक कैलाश जी अब नहीं रहे.  उसके आगे एक धोबी का घर था.  उस परिवार का लड़का कन्हैयालाल मेरा सहपाठी था और उसकी एक बहन मेरे साथ खेला करती थी.  उनके बारे में भी ऐसे ही समाचार मिले.

सामने के एक सेठ परिवार से हमारी बड़ी आत्मीयता थी. उनका नाम नंद लाल जी था और वे उदयपुर के उस ज़माने के नामी हलवाई थे. झकोरमा पूड़ी (जो अब लुप्त प्राय: है!) बनाने में उनको महारत हासिल थी और उनका कौशल हम प्राय: अपने घर से देखा करते थे. एक ख़ास तरह (जिसे काठा गेहूं कहा जाता था) के आटे से बहुत बड़े आकार की रोटी बेली जाती और फिर उसे आज की रूमाली रोटी की तरह हवा में उछाल-उछाल कर और फैलाया जाता. असल कमाल इसके बाद होता. तेज़ खौलते तेल (या घी) में उस रोटी को तलने के लिए फेंका जाता. क्या मज़ाल कि तेल/घी की एक बूंद भी उछल जाए! उसका स्वाद दैवीय होता था. नंद लाल जी का  बेटा अंबा लाल बाद में सरकारी नौकरी में लग गया. पता चला, वे लोग भी अब दूसरे लोक के वासी हो चुके हैं. अंबा लाल का बेटा ज़रूर मिला.

इतने लंबे अंतराल में यह तो होना ही था.

फिर भी यह ‘होना ही था’ को स्वीकार करना आसान नहीं होता.

मकान की दूसरी तरफ, मेरे घर से सटा हुआ एक टाइपिंग इंस्टीट्यूट था, जिसके मालिक एक मास्टर साहब थे.  पता चला, वे खासे वृद्ध हो गए हैं, लेकिन शाम को वहाँ आते हैं.  उनके बेटे को अपना परिचय दिया और कहा कि उन्हें मेरी याद दिलाए.

एक दुकान छोड़कर पालीवाल जी की कचौरी की दुकान थी.  उदयपुर की अनगिनत इंस्टाग्राम रीलों में अब उसका जिक्र अनिवार्यत: मिलता है.  लोकप्रिय तो वह मेरे जमाने में भी थी, लेकिन अब वह एक ‘क्रेज’ बन चुकी है.

मेरी तमन्ना थी कि इस दुकान की एक कचौरी जरूर खाऊँ.

उस समय गरम कचौरी नहीं निकल रही थी.  जैसी थी, वैसी ही खा ली.

पैसे देने लगा तो दुकान के युवा स्वामी ने लेने से मना कर दिया.

शायद वह मुझे जानता था.


पता नहीं उसने मुझे पहचाना था या केवल मेरे अतीत को.

मेरी आँखें नम हो गईं.

अपने घर को एक बार फिर देखकर और निदा फ़ाज़ली की उस ग़ज़ल को मन ही मन गुनगुनाते हुए, जिसे जगजीत सिंह ने बहुत खूबसूरती से गाया है, हम लोग हाथी पोल की ओर बढ़ गए.

उस ग़ज़ल का एक-एक शेर जैसे मेरी ही बात कह रहा था.

अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं

रुख़ हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं

पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है

अपने ही घर में किसी दूसरे घर के हम हैं

वक़्त के साथ है मिट्टी का सफ़र सदियों से

किस को मालूम कहाँ के हैं किधर के हम हैं

चलते रहते हैं कि चलना है मुसाफ़िर का नसीब

सोचते रहते हैं किस राहगुज़र के हम हैं

हम वहाँ हैं जहाँ कुछ भी नहीं रस्ता न दयार

अपने ही खोए हुए शाम ओ सहर के हम हैं

 

उदयपुर में जन्मा, वहीं बड़ा हुआ, वहीं पढ़ा-लिखा और अब उसी उदयपुर में एक पर्यटक की तरह आना होता है!

यही तो जीवन है.

लेकिन इस कहानी में बेटी के उस ‘षड्यंत्र’ का एक सिरा अभी बाकी है.

यह बात लगभग एक दशक पुरानी है.  तब भी बेटी ने एक दिन कहा था—“पापा, क्यों न इस बार हम उदयपुर घूमने चलें?” बेटी हमें घुमाती रहती है. कभी यहां, कभी वहां. खूब ही घुमाया है उसने हमें.

हम दोनों ने हामी भर दी.

उसने बहुत सोच-समझकर फिर उसी इलाके में एक होटल चुना. शायद लेक पिछोला होटल.  मंशा वही थी—पापा को लगे कि वे अपने पुराने घर के आसपास ही रह रहे हैं.

तब हमने सिटी पैलेस देखा, जगदीश मंदिर गए, गणगौर घाट पहुँचे, पिछोला की सैर की, फतहसागर घूमे और जैसे एक बार फिर उदयपुर को जी भरकर जिया. एक पारंपरिक रेस्तरां में जाकर उदयपुर का पारंपरिक खाना भी खाया. झकोरमा पूड़ी भी.

तब भी हम अपने पुराने घर के सामने से गुजरे थे.  कुछ तस्वीरें भी ली थीं. घर के भीतर नहीं जा पाए थे.  उस समय घर का इस तरह नवीनीकरण नहीं हुआ था.

और क्या गजब का संयोग था कि जब हम घर के सामने से होते हुए घंटाघर की तरफ जा रहे थे, यही सुरेंद्र हमें यकायक सड़क पर मिल गए.  उन्होंने हमें पहचान लिया और लगभग जबरन घंटाघर के पास की बहुत विख्यात लाला हलवाई की दुकान पर ले जाकर गुलाब जामुन खिलाए.

उस दिन भी शायद उदयपुर ने हमें पहचान लिया था.

हमारी बेटी इस मामले में विलक्षण है.

उसे बस इतना पता चल जाए कि पापा की कोई इच्छा है.  फिर वह जैसे भी हो, उस इच्छा को पूरा किए बिना चैन नहीं लेती.  और पूरा भी ऐसे ढंग से करती है कि हमें भनक तक नहीं लगती.

वह कभी यह नहीं कहती—“आपने चाहा था, इसलिए मैंने ऐसा किया. ”

शायद यही उसके प्रेम का सबसे सुंदर ढंग है.

वह हमारी इच्छाओं को हमारे कहने से पहले सुन लेती है.

और फिर चुपचाप उन्हें पूरा कर देती है.

यही कौशल उसने अपने भाई के साथ मिलकर हमारी लंदन-पेरिस यात्रा को संभव बनाने में भी इस्तेमाल किया था.

उसकी चर्चा फिर कभी. भाई अर्थात हमारे बेटे विश्वास के प्यार जताने के तरीकों की बात भी कभी अलग से करूंगा. आज तो विचारों की रेल इस पटरी पर चल निकली, तो चलने दिया है.

फिलहाल इतना ही कि उदयपुर से लौटते हुए मुझे लगा—शहर भले ही हाथ से निकल जाए, मकान  भले ही किसी और का हो जाए, गलियाँ बदल जाएँ, परिचित चेहरे एक-एक करके स्मृति में बदल जाएँ, लेकिन आदमी अपने शहर से पूरी तरह कभी विदा नहीं होता.

वह शहर उसके भीतर कहीं रह जाता है.

और कभी-कभी कोई बेटी उस भीतर छिपे शहर का दरवाजा चुपचाप खोल देती है.

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