Tuesday, May 30, 2017

क्या वाकई अगले कुछ सालों में पैट्रोल बहुत सस्ता हो जाएगा?

इन दिनों अमरीका के एक फ्यूचरिस्ट (भविष्यवादी) टोनी सेबा की कुछ भविष्यवाणियां खूब चर्चा में हैं. अपनी तीन किताबों में उन्होंने जो कुछ लिखा है और जिसे वे अपने भाषणों में भी प्राय: दुहराते हैं, उन भविष्यवाणियों के अनुसार सन 2030 तक दुनिया में 80 प्रतिशत राज मार्ग अनुपयोगी हो जाएंगे, लगभग 80 प्रतिशत कार बाज़ार सिमट चुका होगा और इतनी ही पार्किंग स्पेस ग़ैर ज़रूरी हो जाएगी, व्यक्तिगत कारों की अवधारणा करीब-करीब ख़त्म हो जाएगी और कार बीमा व्यवसाय एकदम ठप्प हो जाएगा. उनकी इन भविष्यवाणियों का आधार यह सोच है कि सन 2030 तक आते-आते पूरी दुनिया में ऊर्जा के लिए पैट्रोल आदि की जगह सौर या पवन ऊर्जा का प्रयोग होने लगेगा, अधिकांश वाहन विद्युत चालित होंगे और इन सबकी वजह से पैट्रोल की कीमतें घट कर 30 रुपया प्रति लिटर तक आ जाएंगी.

हो सकता है कि सेबा की ये भविष्यवाणियां सुन कर आप चौंकें और इन पर विश्वास भी न करें. असल में क्या होगा, यह तो भविष्य के गर्भ में है लेकिन अगर थोड़ा पीछे मुड़कर देखें तो पाएंगे कि दुनिया बदल तो ऐसे ही रही है. कोई नई तकनीक आती है और यकायक सब कुछ बदल जाता है. कुछ बरस पहले भला किसने सोचा होगा कि एक छोटा-सा मोबाइल फोन कितना कुछ बदल देगा! आज लैण्डलाइन टेलीफोन एक अजूबा लगने लगे हैं. और कम्प्यूटर तथा  डिजिटल उपकरणों ने कैसे हमारे जीवन को बदला है! संगीत के मामले में कैसे बदलाव आये हैं! रिकॉर्ड्स, एल पी, कैसेट्स, सीडी ये सब एक एक करके लुप्त हो गए, और आज सारा संगीत भौतिक से डिजिटल रूप में आ गया है. फोटोग्राफी में कितने बदलाव हमारे देखते-देखते आए है! अगर बहुत पहले की बात करें तो एक नई धातु तकनीक आई और उसने पाषाण युग का समापन कर दिया. अगर ये सारे बदलाव हुए हैं तो ज़रा सोचिये कि ऊर्जा के मामले में ऐसा क्यों नहीं हो सकता?  तेल, गैस, कोयला और आणविक जैसे निष्कर्षण आधारित ऊर्जा साधन भी एक दिन नई और बेहतर तकनीक के आ जाने से अलाभकारी साबित होकर अप्रासंगिक हो ही सकते हैं!

टोनी सेबा की बातें चाहे जितनी अविश्वसनीय लगें, अगर ठण्डे दिमाग से सोचें तो काफी हद तक मानने काबिल लगती हैं. उनका अनुमान है कि सन 2020-21 तक तो तेल की कीमतें बढ़ती जाएंगी और उसके बाद वे घटने लगेंगी. अपने बेहतर समय में जो तेल सौ मिलियन डॉलर प्रति बैरल बिकेगा उसी की कीमत बाद के दस बरसों में घटते-घटते, ज़रा सांस रोककर सुनें, पच्चीस डॉलर प्रति बैरल तक आ जाएगी. अब ज़रा उनकी बात के पीछे छिपे तर्क को समझें. उनका अनुमान है कि सन 2030 तक दुनिया के तमाम सड़क पर चलने वाले वाहन, बस, कार, ट्रक – सभी बिजली से चलने लगेंगे. उनका कहना है कि किसी एक देश में नहीं, पूरी दुनिया में ऐसा हो जाएगा. नीदरलैण्ड ने तो यह कह ही दिया है कि सन 2035 तक वहां केवल शून्य-उत्सर्जन वाली कारें ही बिक सकेंगी. हमारे अपने केंद्रीय ऊर्जा मंत्री पीयूष गोयल ने भी यह सम्भावना व्यक्त की है कि भारत में अगले पंद्रह बरसों में पैट्रोल या डीज़ल चालित कारें बिकना बंद हो जाएंगी. असल में यह सब तकनीकी बदलाव के कारण सम्भव होता दिखाई दे रहा है. टोनी सेबा की इस बात में दम लगता है कि बहुत जल्दी वह समय आ जाएगा जब सौर ऊर्जा कोयला, पवन, आणविक अथवा प्राकृतिक गैस से सस्ती हो जाएगी. उनका अनुमान है कि सन 2020 तक सौर ऊर्जा इनमें से किसी भी साधन के परिवहन की लागत से भी सस्ती हो जाएगी. इसका मतलब यह हुआ कि आप कितनी ही सस्ती  ऊर्जा पैदा कर लें, उस पर कितनी ही सब्सिडी भी दे दें, तब भी परिवहन लागत के कारण वह प्रतिस्पर्धा में पिछड़ जाएगी.

टोनी सेबा ने एक और बात कही है जो ग़ौर तलब है. उनका कहना है कि नई तकनीक व्यापार के नए रंग ढंग भी लेकर आ रही हैं. अब यही बात देखिये कि जिनके पास अपनी कार है वे कितनी देर उसे चलाते हैं और कितनी देर वह कार गैरेज में या पार्किंग में खड़ी रहती है! टोनी के अनुसार कार 96% समय खड़ी ही रहती है. यह बात समझ में आ जाने के बाद अपने वाहनों से हमारा रिश्ता बदलना अवश्यम्भावी है. और इसकी आहट उबर, ओला जैसी सेवाओं की बढ़ती जा रही लोकप्रियता में सुनी जा सकती है. अगर निजी वाहन घटेंगे तो उनका दूरगामी और व्यापक प्रभाव अवश्यम्भावी है. असल में हमारे चारों तरफ जो बदलाव होते हैं, प्राय: वे हमारी नज़र से ओझल रहते हैं. शायद हम उन्हें देखकर भी नहीं देखते हैं. ऐसे में टोनी सेबा जैसे लोग हमारी आंखों में उंगली डाल कर उन बदलावों को हमें दिखाते और उनके लिए तैयार करते हैं. यही उनका बड़ा योगदान है.  


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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 30 मई, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित  आलेख का मूल पाठ. 
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