Tuesday, December 10, 2013

आगे की सुध ले....

चुनावों का एक दौर  पूरा हुआ. कुछ लोगों ने इसे  सत्ता का सेमी फाइनल भी कहा. और भी बहुत कुछ कहा. लेकिन फिलहाल मैं अभिव्यक्ति  पर, शब्दों के प्रयोग पर कोई विमर्श  शुरु नहीं कर रहा हूं. इसकी बजाय दो-तीन बातों पर आप सबका ध्यान खींचना चाह रहा हूं.

पहली बात तो यह कि करीब-करीब सब जगह इस बार रिकॉर्ड मतदान  हुआ. आज़ादी के इतने बरसों बाद हमारा मतदाता जागरूक होकर अपने मताधिकार का प्रयोग करने में अधिक सजग हुआ है, यह तो खुशी की बात है ही, प्रसन्नता इस बात की भी है कि निर्वाचन विभाग ने विभिन्न संचार माध्यमों का सदुपयोग कर मतदान के पक्ष में माहौल बनाया और अन्य बहुत सारे घटकों ने इस माहौल को अपना समर्थन देकर मज़बूत किया. परिणाम हम सबके सामने है. इससे यह भी भरोसा होता है कि अगर कोई काम मन लगाकर किया जाए तो उसके परिणाम भी निश्चित  रूप से सामने आते  हैं.

दूसरी बात यह है कि इस बार चुनाव परिणाम बहुत अप्रत्याशित रहे हैं. शायद  हर दफ़ा रहते हैं, लेकिन इस बार कुछ अधिक रहे. न जीतने वालों ने इतनी बड़ी जीत की उम्मीद की थी और न हारने वालों ने इतनी बड़ी हार की आशंका मन में रखी थी. ख़ास तौर पर अपने प्रांत राजस्थान में. मीडिया के अनुमान, एक्ज़िट पोल, ओपीनियन पोल, पण्डितों की भविष्यवाणियां – सब पीछे रह गए. यह अलग बात है कि परिणाम आ जाने के बाद पण्डित लोग (मेरा मतलब है राजनीतिक पण्डित लोग) अपनी-अपनी तरह से इन परिणामों की व्याख्या करते हुए दर्शा रहे हैं कि यह तो होना ही था. मेरा मन करता है कि उनसे पूछूं कि हुज़ूर अगर आप जानते थे तो पहले क्यों नहीं बोले? लेकिन फिर लगता है कि कुछ न कुछ कहना उनकी भी तो विवशता है. अब इस विवशता में वे अगर अपनी विद्वत्ता का भी थोड़ा तड़का लगा रहे हैं, तो इसे क्षम्य माना जाना चाहिए. लेकिन ये जो परिणाम सामने आए हैं, मुझे लगता है कि ये जाने वाली सरकार के लिए तो महत्व रखते ही हैं, आने वाली सरकार के लिए उससे भी अधिक महत्व रखते हैं. इन परिणामों  के बाद हमारे जन प्रतिनिधियों को, राजनीतिक दलों को, शासकों को, सरकारों  को यह बात समझ में आ जानी चाहिए कि जनता न तो सहन करती है और न माफ़. वो अब इतनी समझदार हो गई है कि उसके हाथ में जो ताकत है उसका इस्तेमाल कर आपको अर्श पर ले जा सकती है तो फर्श पर भी पटक सकती है. यानि आप उसकी उपेक्षा न करें.

और यह बात इस बार जो सरकार बनने वाली है उसके लिए तो और अधिक महत्व रखती है. इसलिए रखती है कि आज़ादी के बाद हमारे प्रांत की यह कदाचित पहली ऐसी सरकार होगी जिसके सामने इतना छोटा विपक्ष होगा. लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका को कम करके नहीं आंका जाना चाहिए, लेकिन इस बार जनता जनार्दन ने जो जनादेश दिया है उसमें संभवत: सत्ता पक्ष को ही यह दायित्व भी सौंप दिया है कि अपने कामों की निगरानी भी वह खुद करे. यह बहुत बड़ा दायित्व है. इस सरकार को निरंकुश हो जाने के फिसलन भरे किंतु मोहक मार्ग से खुद अपना बचाव करना होगा.

कभी-कभी मुझे लगता है कि हमारे देश में किसी भी सरकार के लिए जनाकांक्षाओं की कसौटी पर खरा उतरना नामुमकिन है. अगर आप एक नागरिक के रूप में मुझसे जानना चाहें तो मेरी तमन्ना यही होगी  कि मुझसे कम से कम टैक्स लिया जाए और सरकार  मुझे ज़्यादा से ज़्यादा दे. मेरे सारे काम वो करे. आम लोगों की इस अव्यावहारिक तमन्ना को कोई पूरा नहीं कर सकता. लेकिन दो चीज़ें तो हो ही सकती हैं. एक तो यह कि टैक्स लेने और सुविधाएं देने के बीच वाज़िब संतुलन बनाया जाए, और दूसरे यह कि जनता को यह भरोसा दिलाया जाए कि जितना उससे लिया जा रहा है, उसका सदुपयोग हो रहा है. अब तक की त्रासदी यही रही है कि लोगों को लगा है कि उनसे टैक्स आदि के रूप में जो लिया जा रहा है उसका सही उपयोग नहीं हो रहा है.

और एक आखिरी बात. अब तक तो यही देखने में आया है कि चुनाव से पहले जो लोग मतदाता को यह एहसास दिलाते नज़र आते थे कि मतदाता ही सर्वोपरि है, चुनाव परिणाम आने और विजयी हो जाने के बाद  वे पहुंच से परे हो जाते हैं. जनता की सुध उन्हें पूरे पाँच बरस बाद ही आती है. जो लोग जीत कर आए हैं, उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि अब जनता इस बात को स्वीकार नहीं करने वाली है. उन्हें पूरे पाँच  बरस अपने मतदाताओं से जीवंत सम्पर्क बनाए रखना  होगा, और उनकी आशाओं-आकांक्षाओं की न केवल खोज-खबर  लेनी होगी, उनकी पूर्ति के लिए यथासम्भव  प्रयास भी करते रहना होगा. अगर ऐसा न किया गया तो जनता को 2013 को दुहराने में कोई संकोच नहीं होगा.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम 'कुछ इधर कुछ उधर' में 10 दिसम्बर, 2013  को प्रकाशित टिप्पणी का मूल आलेख.       
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