Tuesday, December 3, 2013

हम तो लुट गए खड़े ही खड़े

शादियों का सीज़न पूरे यौवन पर है. सड़क पर निकलिये  तो आपको कहीं पता चलेगा कि ये देश वीर जवानों का है और थोड़ा आगे निकलेंगे तो मेरे यार की शादी है की नाचती-गाती  मुनादी सुनाई देगी. शादी का मतलब सबके लिए अलग-अलग होता है. दूल्हा दुल्हन के लिए अलग, उनके मां-बाप के लिए अलग, रिश्तेदारों के लिए अलग, और उन ‘मानस के राजहंसों’ के लिए अलग जिन्हें बुलाने को स्नेह निमंत्रण भेजे जाते हैं. इन बेचारे मानस के राजहंसों  की हालत हर आने वाले निमंत्रण के साथ पतली होती जाती है. महीने के बजट में उस निमंत्रण पत्र का मान कैसे फिट होगा, ज़्यादातर मध्यमवर्गीय लोगों  के  लिए यह सोच उस शादी के समारोह के उल्लास की समस्त सम्भावनाओं पर भारी पड़ा जाता है.
 
मुझे अपनी नौकरी के वे शुरुआती दिन याद हैं जब हमारे कॉलेज में कोई बीसेक प्राध्यापक हुआ करते थे और कॉलेज के किसी भी विद्यार्थी के परिवार में अगर शादी होती तो वो अपने किसी विश्वास पात्र को इस बात के लिए तैनात करता कि वो सारे प्राध्यापकों को लेकर आए और उनका विशेष ध्यान रखे. जीमण, जी हां, तब जीमण होते थे, ज़मीन पर पंगत में बैठ कर होता था और तीन-चार युवा हम सबको मनुहार कर-करके जिमाते थे. भरपेट जीम लेने के बाद बारी आती थी ‘आशीर्वाद’ देने की. तब लिफाफों का प्रचलन नहीं हुआ था. हमारे एक साथी इस काम में माहिर माने जाते थे इसलिए  हम सब उनको आगे करते और वे अपने हाथ में एक-एक रुपये के पाँच  नोट ताश  के पत्तों की तरह जमा कर वर या वधू के पिताश्री को भेंट करते. साथ-साथ वे हें-हें भी करते जाते. हम सब भी उनका अनुसरण करते. 

तब से अब तक देश की सारी नदियों में बहुत सारा पानी बह गया है. जीमण  की  जगह वृषभ भोज ने ले ली है. मेरा मतलब है बफ़े डिनर से  है. यह इतना आम हो गया है कि अब लोगों ने इसका उपहास करना भी बन्द कर दिया है. बफ़े डिनर के साथ-साथ शादियों का आकार इतना बड़ा होने लगा है कि न बुलाने वाला आपको पहचानता है और न आप अपने होस्ट को जानते हैं. एक शादी में आव भगत करने वाली सजी-धजी विनम्र  युवतियों  को मैं बहुत देर तक घर परिवार की सदस्याएं मानकर उनका अभिवादन करता रहा. और एक अन्य शादी में पहुंच कर शीतल पेय आदि ग्रहण करने के बाद जब अचानक एक पुराने मित्र से भेंट हुई और थोड़ी इधर-उधर की बातें  हुई मुझे पता चला कि जिस शादी में मुझे शामिल होना है वो तो दूसरी तरफ के पाण्डाल में है. ऐसे अनेक किस्से हैं.

जब भी शादियों की बात होती है, मुझे बरसों पहले की एक घटना याद आए बग़ैर नहीं रहती है. मेरे एक प्रिंसिपल महोदय की बेटी की शादी थी. प्रिंसिपल भी ऐसे वैसे नहीं, अंग्रेजों के जमाने के जेलर-नुमा. उनके यहां शादी में हमने पहली बार देखा कि ‘आशीर्वाद’ स्वीकार करने के लिए बाकायदा एक काउण्टर लगाया गया था, जिस पर उनके एक नज़दीकी  रिश्तेदार तैनात थे. ज़ाहिर है कि वे हममें से किसी को नहीं जानते थे. वैसे तो उस ज़माने में शादियों का आकार क्योंकि छोटा होता था, वर या वधू के परिवार के लोग हर मेहमान से  व्यक्तिश: परिचित हुआ करते थे.  लेकिन यह तो अफसर की बेटी की शादी का मामला था. इसलिए व्यवस्था भी अलग तरह की थी. तब तक लिफाफों का प्रचलन नहीं हुआ था. नोट नंगे  ही दिए जाते थे. हममें से एक-एक प्राध्यापक जाता, उन रिश्तेदार महोदय के सामने अपना पाँच रुपये का नोट पेश करता, वे नाम पूछते और उसी नोट पर वह नाम लिखकर अपने हाथ में लिए एक हैण्ड बैग में रख लेते. इस तरह हम सब मुलाजिमों ने अपना दायित्व निर्वहन कर लिया. तभी शहर के एक नामी वकील साहब वहां आए. उन्होंने बड़ी ठसक से अपनी जेब से सौ रुपये का नोट निकाला, और उन प्रभारी रिश्तेदार महोदय को पेश किया. तब क्योंकि शादी में आशीर्वाद के लिए पाँच  रुपये का रेट फिक्स्ड था, रिश्तेदार महोदय ने बहुत सहज भाव से उस सौ रुपये के नोट पर उन वकील साहब का नाम लिखा और अपने उस हैण्ड बैग से हम सबके दिए हुए नोट  निकाल कर उन वकील साहब को दे दिए.
सोच सकते हैं, तब हम सबके दिल पर क्या गुज़री होगी? बेहोश  होकर धराशायी होने में बस थोड़ी ही कमी रही. अफसोस केवल अपने पाँच  रुपयों का नहीं था, उससे भी ज़्यादा फिक्र इस बात की थी कि प्रिंसिपल साहब के दरबार में हमारा ‘आशीर्वाद’ गैर हाज़िर पाया जाएगा तो उनको कितना बुरा लगेगा! औरों की मैं नहीं जानता, मुझे तो अपने प्रिय कवि नीरज बुरी तरह याद आ रहे थे – कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

लेकिन क्या ज़माना था वो भी!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न  दैनिक न्यूज़ टुडै में प्रकाशित होने वाले म्रे साप्ताहिक  कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत दिनांक 03 दिसम्बर 2013 को प्रिंसिपल के दरबार  में हमारा 'आशीर्वाद' गैर हाज़िर शीर्षक से प्रकाशित टीप का मूल आलेख. 
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