Tuesday, December 17, 2013

घर से बाहर घर जैसा खाना

भारतीय मध्यवर्ग के जीवन में बहुत तेज़ी से जो बदलाव आ रहे हैं उनमें से एक खान-पान को लेकर है. कहा जाता रहा है कि यह वर्ग अपने खान-पान की रुचियों को लेकर बहुत प्रयोगशील नहीं है, लेकिन यह स्थिति अब धीरे-धीरे बदल रही है. मध्यवर्ग भी अपने खान-पान को लेकर खासा प्रयोगशील  होता जा रहा है, जिसका प्रमाण  हैं हर शहर-कस्बे में नए नए खुलते जा रहे किसम-किसम के और देश-देश के  व्यंजनों के आउटलेट्स.

मध्यवर्ग में बाहर खाने का प्रचलन भी बहुत तेज़ी से बढ़ा है. बहुत ज़्यादा समय नहीं बीता है जब इस वर्ग  में बाहर खाने-पीने को लेकर संकोच ही नहीं, अस्वीकार का भी भाव हुआ करता था. लेकिन अब हालत यह हो गई है कि अगर आप सप्ताहांत में बाहर खाना खाना चाहें तो आपको एक से ज़्यादा जगहों पर घूमना पड़ सकता है या काफी प्रतीक्षा करनी पड़ सकती है. न केवल सप्ताहांतों में, तीज-त्यौहारों पर भी बाहर खाने का चलन बढ़ता जा रहा है. छोटे-मोटे पारिवारिक आयोजन रेस्तराओं में होने लगे हैं और अब तो भाई-दूज जैसे मौकों पर भी बहन-भाई घर की बजाय रेस्तरां को पसन्द करने लगे हैं. करवा चौथ जैसे अवसरों पर तो यह बात और जुड़ जाती है कि पति व्रत  रखने वाली प्रेमिल पत्नी को चूल्हे-चौके के झंझट से बचा रहा है.  बाहर खाने को स्त्री मुक्ति के साथ भी जोड़ कर देखा जाने लगा है. वही बात कि कम से कम एक दिन तो स्त्री को घर के इस तरह के कामों से मुक्ति मिले.

लोगों के खान-पान की आदतों में आए बदलाव को बाज़ार में आ रहे नए-नए व्यंजनों या उनके सहायक पदार्थों की भारी भीड़ में भी देखा जा सकता है. अनेक तरह के पैकेट आने लगे हैं जिन्हें ‘बस दो मिनिट’ में कम से कम मेहनत में आप टेबल पर लाकर खाने  योग्य बना सकते हैं. रेडीमेड मसाले या तैयार अदरक लहसुन मिर्ची इमली  आदि के पेस्ट भी इसी श्रंखला में हैं. इस सबके बीच जो बात मुझे सबसे मज़ेदार लगती है वो यह है कि चीज़ों को बेचने के लिए क्या-क्या किया जाता है.

आप देखेंगे कि बाज़ार में जो उत्पाद बेचे जाते हैं वे आपको बताते हैं कि उनका उपयोग करके आप घर पर होटल जैसा खाना तैयार कर उसका मज़ा ले सकते हैं. यहां एक साथ अर्थशास्त्र और स्वाद शास्त्र की मदद लेकर आपको आकर्षित किया जाता है. होटल में जाना महंगा होता है, इसलिए आप उस उत्पाद का प्रयोग कर घर पर ही होटल वाले शानदार स्वाद का मज़ा ले लीजिए!  लेकिन आपने यह  भी देखा होगा कि बहुत सारे होटल, और उनमें भी वो जो खासे महंगे होते हैं, आपको ‘घर जैसे खाने’ का लालच देते हैं. उनके विज्ञापनों को देखकर अक्सर मुझे विज्ञापन लिखने वालों की सूझ-बूझ पर सन्देह होने लगता है. फिर सोचता हूं कि हो सकता है यह निमंत्रण उन ‘बेचारों’ के लिए हो जिन्हें नौकरी या टूअर आदि के कारण घर से बाहर रहना पड़ रहा हो और जो घर को बुरी तरह मिस कर रहे हों! मैंने कभी  इस तरह के रेस्तरां के व्यंजनों का स्वाद नहीं चखा है. लेकिन जानने की उत्सुकता ज़रूर है कि क्या वे लोग भी घिया की सब्ज़ी, मूंग की दाल और जली हुई, कड़ी या कल सुबह की बची रोटी सर्व करते हैं?

और इसी से मुझे याद आ रहा है अपने एक मित्र के साथ घटित एक प्रसंग. एक दिन मुलाक़ात हुई तो बातचीत  से पता चला कि उनके सामने के दो दाँत भूतपूर्व हो गए हैं. कारण  पूछा तो उन्होंने बताया कि कल उनकी धर्म पत्नी जी ने जो रोटी  बनाई थी वो बहुत कड़ी थी! मैंने बहुत सहज भाव से कहा, “तो आपको खाने से मना कर देना चाहिए था!” और उन्होंने उससे भी अधिक सहज भाव से जवाब दिया, “वो ही तो किया था!” आशा करता हूं कि घर जैसा खाना खिलाने का वादा करने वाले होटल यह भी ज़रूर करते होंगे.

असल में यह जो बाहर खाने-वाने का चलन बढ़ा है इसमें एक बहुत बड़ी भूमिका इस बात की भी है कि स्त्रियां बहुत बड़ी तादाद में घर से बाहर निकल कर नौकरी वगैरह करने लगी हैं. यह स्वाभाविक ही है कि जब उन्होंने एक अतिरिक्त ज़िम्मेदारी ओढ़ी है तो अपने पहले वाले दायित्वों में से कुछ को वे हल्का करें. अब तो नई पीढ़ी  में बहुत सारे युगल ऐसे भी देखने को मिल जाते हैं जो सुबह आठ बजे नौकरी पर निकलते हैं और रात नौ बजे लौटते हैं. उनके यहां किसी भी पत्नी  से यह उम्मीद करना कि दिन भर की कड़ी मेहनत के बाद वो अपने पतिदेव के सम्मान में गरमा गरम खाना तैयार कर परोसेगी, न केवल अव्यावहारिक, बल्कि अमानवीय भी होगा. और मुझे लगता है कि अगर हम स्त्रियों का बाहर काम करना स्वीकार कर सकते हैं तो फिर लोगों के बाहर खाना खाने को भी उसी सहज भाव से स्वीकार करना चाहिए.  
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय  अपराह्न दैनिक  न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत 17 दिसम्बर, 2013 को  होटल में घर का स्वाद...अजब पहेली शीर्षक से प्रकाशित टिप्पणी का मूल आलेख! 

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