Tuesday, October 20, 2026

कैसे लोग थे वे!

 


घटना सन 1980 के आसपास की है. मैं राजकीय महाविद्यालय सिरोही में हिंदी का प्राध्यापक था. उस समय मेरे प्राचार्य प्रो महेश कुमार भार्गव थे. मैं उनके प्रिय प्राध्यापकों में से एक था. और जहां तक मेरे मन में उनके प्रति सम्मान की बात है, केवल इतना लिखूंगा कि इस घटना के लगभग दो दशक बाद जब मैं उसी कॉलेज का प्राचार्य बना और मुझे भी उसी प्राचार्य कक्ष में उसी कुर्सी पर बैठने का सौभाग्य प्राप्त हुआ तो मैं कुछ देर को ठिठक कर यह सोचता रहा कि क्या मैं उस कुर्सी पर बैठने के काबिल हूं जिस पर कभी प्रो महेश कुमार भार्गव जैसे महान प्राचार्य बैठा करते थे! आगे बात करूं इससे पहले दो बातें बताता चलूं. पहली यह कि उस समय सिरोही का यह महाविद्यालय बहुत बड़ा नहीं था. हम लगभग बीस संकाय सदस्य थे. दूसरी बात यह कि किसी भी कॉलेज का प्राचार्य होना बहुत चुनौतीपूर्ण होता है. उसके पास वैसी कोई ताकत और सुरक्षा नहीं होती है जैसी (नेताओं की तो बात छोड़ ही दीजिए) किसी छोटे-से प्रशासनिक अधिकारी के पास भी होती है. आप एक एसडीएम के कमरे में भी बगैर इजाज़त के नहीं घुस सकते जबकि किसी बड़े से बड़े कॉलेज के प्राचार्य के कक्ष में कोई भी विद्यार्थी (या अभिभावक, या नागरिक) कभी भी घुस सकता है. यह प्राचार्य की ही सामर्थ्य है कि वह इस तरह के सुरक्षा विहीन माहौल में रहकर अपने कर्तव्य का निर्वहन करता है.

अब मैं अपनी मूल बात पर लौटता हूं.
हमारे कॉलेज के विद्यार्थियों ने किसी बात पर हड़ताल कर दी थी और वे कॉलेज के बाहर धरना दिये हुए थे. दिसंबर का महीना था. सर्दी अपने पूरे यौवन पर थी. हम लोग भी खाना खाकर रजाई में घुस चुके थे. शायद रात के आठ-साढ़े आठ बजे का समय था. मेरी डोरबेल बजी. इतनी रात गए, इस ठण्ड में कौन आया होगा? यह सोचते हुए दरवाज़ा खोला तो पाया कि सामने प्राचार्य भार्गव साहब खड़े हैं. मैं कुछ कहूं उससे पहले ही वे बोले, "डीपी, कपड़े बदल कर बाहर आ". फिर अपनी कार की तरफ मुंह कर उन्होंने श्रीमती भार्गव को आवाज़ दी और कहा कि वे मेरे यहां मेरी पत्नी के साथ बैठें. उस ज़माने में प्राचार्य का जिस तरह का सम्मान हम लोगों के मन में हुआ करता था उसके अनुरूप कुछ भी पूछने का तो सवाल था ही नहीं. मैंने जल्दी से कपड़े बदले और बाहर आकर भार्गव साहब की कार में बैठ गया. न वे कुछ बोले और न मैंने कुछ पूछा. कार सीधे हमारे कॉलेज के बाहर जाकर रुकी. हड़ताली लड़के लोग कुछ आंच वगैरह जलाकर वहां जमे हुए थे. भार्गव साहब कार से उतरे, उनके साथ-साथ मैं भी उतरा. सीधे विद्यार्थियों के पास गए और बोले, "तुम लोगों के पास सर्दी से बचाव का क्या इंतज़ाम है?” ज़ाहिर है कि उनके पास कोई ख़ास इंतज़ाम नहीं था. भार्गव साहब ने कहा, “अभी हम टेण्ट हाउस जाते हैं और तुम लोगों के लिए गद्दे रज़ाई भिजवाते हैं”. हम दोनों कार में बैठे और चले शहर के इकलौते टेण्ट हाउस की तरफ. रास्ते में मेरी जिज्ञासा को भांप भार्गव साहब बोले, “देखो डीपी, ये हैं तो हमारे ही बच्चे! इन्हें हम ठण्ड में कैसे ठिठुरने दे सकते हैं?"
टेण्ट हाउस से उनके लिए पर्याप्त गद्दे-रजाई भिजवा दिए गए.
अब यह कहने की ज़रूरत नहीं है, फिर भी कह रहा हूं कि अगली सुबह जब प्राचार्य भार्गव साहब कॉलेज के प्रवेश द्वार पर पहुंचे तो जो विद्यार्थी बीते कल प्राचार्य मुर्दाबाद के नारे लगा रहे थे वे ही उनके लिए मालाएं लिए खड़े थे और नारे लगा रहे थे- प्राचार्य जी ज़िंदाबाद!
एक ज़माना वो भी था!


 


स्मृति शेष: रमेश चंद्र भार्गव

 


अभी कुछ ही दिन पहले यह दुखद सूचना मिली कि हमारे एक पुराने आत्मीय श्री रमेश चंद्र भार्गव जी का निधन हो गया. इस सूचना से जैसे यादों का एक पिटारा ही खुल गया.

असल में श्री भार्गव साहब सिरोही में, जहां मैं लगभग 25 बरस रहा, हमारे पड़ोसी और मित्र थे. वे उस समय सिरोही में खनन अभियंता (माइनिंग इंजीनियर) थे और उसी शांति नगर कॉलोनी में रहते थे जहां हम लोग भी एक किराये के मकान में रहते थे. भार्गव साहब भी किराये के घर में ही रहते थे. भार्गव साहब का और मेरा घर आमने-सामने था, एकदम आमने-सामने तो नहीं, बस इतनी दूरी पर कि पैदल जाएं तो तीन मिनिट में पहुंच जाएं. शांति नगर सिरोही की नई बसी कॉलोनी थी और तब तक उसकी बसावट बहुत सघन नहीं हुई थी. जो भी लोग उस समय उस कॉलोनी में रहते थे, उन सभी में आपस में अच्छा मेल-जोल था. वैसे भी वह समय मेल जोल का था. लोग एक दूसरे के घर आते-जाते थे. अब सब कुछ बदल चुका है. शायद सिरोही में भी बदला होगा.
फिर दोहरा देता हूं कि बात सत्तर के दशक के उत्तरार्ध या अस्सी के दश के पूर्वार्द्ध की होगी, जब हम लोग एक ही कॉलोनी के वासी थे. यहां उनसे जुड़ी जो स्मृति साझा करना चाह रहा हूं उसकी पृष्ठभूमि बता देना ज़रूरी है.
मुझे उस समय भी पढ़ने का बहुत शौक था, बल्कि सच तो यह है कि तब ज़्यादा शौक था. अब तो उम्र ने उस शौक को बहुत क्षीण कर दिया है. और तब अपने इस शौक को पूरा करने की सुविधा भी भरपूर थी. मेरे कॉलेज की लाइब्रेरी बहुत समृद्ध थी. केवल इतना ही नहीं, कॉलेज के और मेरे घर के बीच स्थित सारणेश्वर जी ज़िला पुस्तकालय भी बहुत समृद्ध और व्यवस्थित था. मैं वहां से भी खूब किताबें ला-लाकर पढ़ लेता था. अपने कॉलेज की लाइब्रेरी पर तो पूरा हक़ था ही. अब जब मैं कम पढ़ पाता हूं तो अपने मन को यह कहकर भी दिलासा देता हूं कि मैंने पहले ही बहुत पढ़ लिया है. अरे, मैं बात तो भार्गव साहब की करना चाह रहा था, भटक गया? नहीं, भटका बिल्कुल नहीं हूं. उनसे मेरी ट्यूनिंग बैठने का सबसे बड़ा कारण यही था कि वे भी किताबों के और पढ़ने के शौकीन थे. लेकिन इतना कहकर मुझे संतोष नहीं हो रहा है. वे पढ़ने के भयंकर वाले शौकीन थे. ज़्यादा उचित तो यह कहना होगा कि अत्यंत भयंकर वाले शौकीन थे. और मैं उनके शौक का पोषण करने में समर्थ था. उन्हें पढ़ने का शौक था और मेरे पास किताबों की कमी नहीं थी. वे हर दूसरे तीसरे दिन मेरे पास आते और दो-चार किताबें पढ़ने के लिए ले जाते. यह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं है कि अब तक की ज़िंदगी में वैसा रुचिवान पाठक मुझे दूसरा कोई नहीं मिला. भार्गव साहब कैसे गंभीर और रुचिवान पाठक थे, इस बात का अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि जब वे कोई किताब मुझे पढ़कर लौटाते तो उस पर अपनी टिप्पणी भी अवश्य साझा करते. कहने का आशय यह है कि वे वाकई किताब पढ़ते और मन से पढ़ते थे.
एक बार का प्रसंग मेरे मानस पटल पर अमिट है. उसी को साझा करने के लिए मैंने यह भूमिका बनाई है. शाम को वे मेरे यहां आए, चाय वगैरह पी और फिर जाते-जाते बोले कि “डीपी, पढ़ने के लिए कुछ दे”. अजीब संयोग कि उस दिन मैं बहुत ग़रीब था. मुझे लगा कि मेरे पास ऐसी कोई किताब नहीं है जो मेरे ख़याल से उनकी रुचि की हो. मैंने उनसे कह भी दिया कि आपकी रुचि की कोई किताब आज मेरे पास नहीं है. फिर भी उन्होंने इसरार किया, कि कोई तो किताब होगी! मैंने अपनी अलमारी टटोली और उन्हें बताया कि आज तो एक ही किताब मेरे पास है, और इसमें आपकी कोई रुचि होगी नहीं. उन्होंने पूछा कौन-सी किताब है, तो मैंने बताया कि डॉ रामविलास शर्मा की 'भारत के प्राचीन भाषा परिवार और हिंदी’ का पहला खण्ड मेरे पास है. मैं उन दिनों. एमए के विद्यार्थियों को भाषाविज्ञान पढ़ाता था. जिन्हें जानकारी नहीं हो उन्हें बताता चलूं कि एमए के पाठ्यक्रम में भाषा विज्ञान को सर्वाधिक नीरस माना जाता है. यह एक तरह से हमारा तकनीकी विषय है. भार्गव साहब ने कहा कि मैं उन्हें वही किताब दे दूं. मुझे लगा कि वे इसे उलट-पलटकर मुझे लौटा देंगे. लेकिन मेरा अनुमान एकदम ग़लत साबित हुआ. वे अगली सुबह ही मेरे पास आए और बोले कि रात भर में मैंने यह पूरी किताब पढ़ ली है और अब तुमसे इसे डिस्कस करने आया हूं.
मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि जिस तरह उन्होंने उस किताब को समझा उस तरह से तो मैंने भी नहीं समझा था, हालांकि वह मेरा विषय था. उन्होंने मुझसे आग्रह करके उस किताब के शेष दो खण्ड भी मेरे कॉलेज की लाइब्रेरी से मंगवाए और उन्हें भी उतनी ही दिलचस्पी से पढ़ा. पढ़ने के प्रति उनके अनुराग का यह तो एक प्रसंग है. उनकी रुचि दुनिया के हर विषय में थी और किताबों के मामले में वे सर्वभक्षी थे. ऐसे कई और प्रसंग मेरे स्मृति कोष में जमा हैं. लेकिन अभी इतना ही.
ऐसे विद्वान, ज्ञान पिपासु, और शानदार दोस्त के न रहने के समाचार से कितना व्यथित हूं, कल्पना की जा सकती है.
उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि!

वे छवि निर्माण तकनीक के सफल प्रयोक्ता थे!

 कोई तो कारण होगा कि अस्सी के दशक का यह प्रसंग अब याद आ रहा है!

लगभग चालीस बरस कम नहीं होते हैं स्मृति के धूमिल हो जाने के लिए. और शायद हो ही गई थी, लेकिन अब जैसे यादों पर जमी धूल हट गई है और सब कुछ बहुत अच्छी तरह याद आ रहा है. छोड़िये इस बात को कि यह बात अब ही क्यों याद आ रही है! आप तो बात का आनंद लीजिए!
मैंने अपनी नौकरी का बहुत बड़ा समय पश्चिमी राजस्थान के एक छोटे-से कस्बे सिरोही के राजकीय महाविद्यालय में बिताया. जो लोग इस कस्बे को नहीं जानते उन्हें बता दूं कि राजस्थान का एकमात्र पर्वतीय पर्यटन स्थल इसी सिरोही ज़िले में स्थित है. मेरा महाविद्यालय राजस्थान के पुराने और ऐसे महाविद्यालयों में से एक था जिसे कम से कम वे लोग बहुत आदर से स्मरण करते हैं जो वहां काम कर चुके हैं. असल में पूरा पश्चिमी राजस्थान ही बहुत शांत इलाका है इसलिए वहां स्थित यह महाविद्यालय प्रांत के अन्य कई इलाकों के बहुत अशांत और कुख्यात महाविद्यालयों से बहुत भिन्न था और है. मैंने क्योंकि वहां अपनी नौकरी के बीस से ज़्यादा साल गुज़ारे मेरे मन में इस महाविद्यालय के प्रति बहुत गहरा अनुराग है और यहां की अनेक खट्टी मीठी यादें मेरे स्मृति कोष में जमा हैं.
आज मैं जिस याद को साझा कर रहा हूं उसका संबंध एक हद तक इस बात से भी है कि मैं वहां हिंदी का व्याख्याता था. हमारे कॉलेजों में हिंदी व्याख्याता को पढ़ाने के अलावा अन्य बहुत सारे कामों के लिए भी अपरिहार्य और उपयुक्त माना जाता है. यह वृत्तांत पढ़ने वालों को भले ही इन कामों के बारे में पढ़कर कुछ अजीब लगे, लेकिन यह एक यथार्थ है कि हिंदी व्याख्याता को प्राचार्य का भाषण, संस्था की वार्षिक रिपोर्ट, अभिनंदन पत्र, शोक संदेश लिखने जैसे अनेक काम करने के लिए एकमात्र योग्य व्यक्ति माना जाता है. इन कामों में ऐसे ही और भी अनेक काम जुड़ते रहते हैं. कहना अनावश्यक है कि ये सारे काम मैंने भी किए हैं. मैं जिस समय को स्मरण कर रहा हूं उस समय मेरे महाविद्यालय के प्राचार्य एक दबंग, अति उत्साही, महत्वाकांक्षी, आत्म प्रशंसा प्रिय व्यक्ति थे. उन्हें इस बात में ख़ास दिलचस्पी थी कि उनके महाविद्यालय की ख़बरें हर रोज़ अखबारों में छपे. और महाविद्यालय की ख़बरों में सबसे महत्वपूर्ण होता ख़ुद उन प्राचार्य जी का नामोल्लेख. अगर वह होता तो उन्हें ख़बर काम की लगती और अगर उनका नाम उस ख़बर में नहीं होता तो फिर वह ख़बर, चाहे उसमें महाविद्यालय की कितनी भी प्रशंसा क्यों न हो, बेकार लगती. उन्होंने मुझे महाविद्यालय का पीआरओ (जन सम्पर्क अधिकारी) बना दिया और मेरा काम यही था कि हर रोज़ कई अखबारों को ऐसी ख़बरें लिखकर भेजूं जिनमें अनिवार्यत: प्राचार्य जी का नामोल्लेख हो. स्वीकार करता हूं कि अध्यापन के अलावा यह काम भी मैंने निष्ठा से किया. अब पीछे मुड़कर देखता हूं तो इसमें मुझे कोई ख़ास बुराई भी नज़र नहीं आती. कुल मिलाकर तो मैं अपने महाविद्यालय की छवि का ही निर्माण कर रहा था!
तो, ऐसे ही एक दिन प्राचार्य जी ने मुझे अपने ऑफिस में बुलाया और कहा कि मैं अखबारों को एक ख़बर उनके हवाले से भेजूं. ख़बर यह कि प्राचार्य अमुक जी ने बताया है कि हम अपने कॉलेज में 36 प्रतिशत पर एडमिशन देते हैं लेकिन हमारे कॉलेज का रिज़ल्ट अस्सी प्रतिशत रहता है. याद दिलाता चलूं कि न्यूनतम उत्तीर्ण प्रतिशत 36 होता है. वे दिन बहुत मारा मारी के नहीं थे इसलिए कुछ विद्यार्थियों को इस न्यूनतम प्रतिशत पर भी प्रवेश मिल जाता था. उनके इस बयान की विसंगति यह थी कि इस न्यूनतम उत्तीर्ण प्रतिशत और परिणाम के बीच कोई रिश्ता नहीं था. अगर रिश्ता ढूंढना ही चाहें तो यह बनता कि हम शत प्रतिशत उत्तीर्ण विद्यार्थियों को प्रवेश देते हैं और उनमें से अस्सी प्रतिशत उत्तीर्ण होते हैं. ज़ाहिर है कि यह एक नकारात्मक बात होती. मैंने प्राचार्य जी के सामने अपनी आपत्ति रखी, लेकिन उन्होंने इस आपत्ति को यह कहते हुए सिरे से खारिज़ कर दिया कि आप तो जैसा मैं कह रहा हूं वैसा लिख दें. मैंने लिख दिया और जैसा प्रत्याशित था, अगले दिन कुछ अखबारों में यह ख़बर छप भी गई!
मैं किसी काम से बाज़ार गया तो अनायास एक अभिभावक से मुलाकात हो गई. उन्होंने कहा कि आपके प्राचार्य जी तो बहुत डायनैमिक हैं! मैंने कहा कि कैसे, तो वे बोले, आपने आज का अखबार नहीं पढ़ा? अखबार ने लिखा है कि कैसे उन्होंने इस कॉलेज को इतना अच्छा बना दिया है कि छत्तीस परसेंट वाले अस्सी परसेंट तक जा पहुंचे हैं! मैं समझ गया कि उन अभिभावक जी को यह समझ में आया था कि हम बहुत औसत बुद्धि वाले विद्यार्थियों को प्रवेश देते हैं और उन्हें बहुत काबिल बना देते हैं. मेरे प्राचार्य जी शायद यही तो चाहते थे. अपने ज़माने में वे भी छवि निर्माण के उस्ताद थे!
और जब यह प्रसंग याद आया तो इससे जुड़ा एक और प्रसंग कैसे भूल सकता हूं? विश्वविद्यालय की परीक्षाओं के परिणाम आने लगे थे. शायद बीए फाइनल का परिणाम आया था. यह परीक्षा देने वाले हमारे महाविद्यालय के पचास प्रतिशत विद्यार्थी उत्तीर्ण हुए थे. प्राचार्य जी ने मुझे बुलाया और आदेश दिया कि मैं इस परिणाम की एक ख़बर बनाकर अखबारों को भिजवा दूं. मैंने ख़बर बना कर उसे टाइप करवाया और जब वह ख़बर प्राचार्य जी के पास हस्ताक्षर के लिए पहुंची तो एक बार फिर मुझे बुलवाया गया. प्राचार्य जी ने बड़े प्यार से फरमाया, "डॉ साहब, इस पचास प्रतिशत को पैंसठ प्रतिशत कर दीजिए!" मैंने विनम्रता से कहा कि सर, यह तो ठीक नहीं होगा. हम ग़लत बयानी कैसे कर सकते हैं? मेरी आपत्ति से एकदम अप्रभावित प्राचार्य जी ने आदेशात्मक स्वर में कहा, "मैं जैसा कह रहा हूं वैसा कर दीजिए!" फिर अपने स्वर को मुलायम करते हुए बोले, "डॉ साहब, कौन चैक कर रहा है कि वास्तविक रिज़ल्ट क्या रहा है! आप तो जैसा मैं कह रहा हूं वैसा लिख कर भेज दीजिए!" अगले दिन यह ख़बर भी छप गई और अभिभावकों ने फिर महसूस किया कि इस बार उनके शहर के महाविद्यालय में जो प्राचार्य आए हैं, वे बहुत कर्मठ हैं!
तब का अनुभव मुझे अब याद आ रहा है और मैं समझ पा रहा हूं कि छवि निर्माण ऐसे ही होता है! कोई नहीं देखता कि सच्चाई क्या है!
सब वही देखते हैं जो यत्नपूर्वक उन्हें दिखाया जाता है!