Tuesday, October 20, 2026

स्मृति शेष: रमेश चंद्र भार्गव

 


अभी कुछ ही दिन पहले यह दुखद सूचना मिली कि हमारे एक पुराने आत्मीय श्री रमेश चंद्र भार्गव जी का निधन हो गया. इस सूचना से जैसे यादों का एक पिटारा ही खुल गया.

असल में श्री भार्गव साहब सिरोही में, जहां मैं लगभग 25 बरस रहा, हमारे पड़ोसी और मित्र थे. वे उस समय सिरोही में खनन अभियंता (माइनिंग इंजीनियर) थे और उसी शांति नगर कॉलोनी में रहते थे जहां हम लोग भी एक किराये के मकान में रहते थे. भार्गव साहब भी किराये के घर में ही रहते थे. भार्गव साहब का और मेरा घर आमने-सामने था, एकदम आमने-सामने तो नहीं, बस इतनी दूरी पर कि पैदल जाएं तो तीन मिनिट में पहुंच जाएं. शांति नगर सिरोही की नई बसी कॉलोनी थी और तब तक उसकी बसावट बहुत सघन नहीं हुई थी. जो भी लोग उस समय उस कॉलोनी में रहते थे, उन सभी में आपस में अच्छा मेल-जोल था. वैसे भी वह समय मेल जोल का था. लोग एक दूसरे के घर आते-जाते थे. अब सब कुछ बदल चुका है. शायद सिरोही में भी बदला होगा.
फिर दोहरा देता हूं कि बात सत्तर के दशक के उत्तरार्ध या अस्सी के दश के पूर्वार्द्ध की होगी, जब हम लोग एक ही कॉलोनी के वासी थे. यहां उनसे जुड़ी जो स्मृति साझा करना चाह रहा हूं उसकी पृष्ठभूमि बता देना ज़रूरी है.
मुझे उस समय भी पढ़ने का बहुत शौक था, बल्कि सच तो यह है कि तब ज़्यादा शौक था. अब तो उम्र ने उस शौक को बहुत क्षीण कर दिया है. और तब अपने इस शौक को पूरा करने की सुविधा भी भरपूर थी. मेरे कॉलेज की लाइब्रेरी बहुत समृद्ध थी. केवल इतना ही नहीं, कॉलेज के और मेरे घर के बीच स्थित सारणेश्वर जी ज़िला पुस्तकालय भी बहुत समृद्ध और व्यवस्थित था. मैं वहां से भी खूब किताबें ला-लाकर पढ़ लेता था. अपने कॉलेज की लाइब्रेरी पर तो पूरा हक़ था ही. अब जब मैं कम पढ़ पाता हूं तो अपने मन को यह कहकर भी दिलासा देता हूं कि मैंने पहले ही बहुत पढ़ लिया है. अरे, मैं बात तो भार्गव साहब की करना चाह रहा था, भटक गया? नहीं, भटका बिल्कुल नहीं हूं. उनसे मेरी ट्यूनिंग बैठने का सबसे बड़ा कारण यही था कि वे भी किताबों के और पढ़ने के शौकीन थे. लेकिन इतना कहकर मुझे संतोष नहीं हो रहा है. वे पढ़ने के भयंकर वाले शौकीन थे. ज़्यादा उचित तो यह कहना होगा कि अत्यंत भयंकर वाले शौकीन थे. और मैं उनके शौक का पोषण करने में समर्थ था. उन्हें पढ़ने का शौक था और मेरे पास किताबों की कमी नहीं थी. वे हर दूसरे तीसरे दिन मेरे पास आते और दो-चार किताबें पढ़ने के लिए ले जाते. यह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं है कि अब तक की ज़िंदगी में वैसा रुचिवान पाठक मुझे दूसरा कोई नहीं मिला. भार्गव साहब कैसे गंभीर और रुचिवान पाठक थे, इस बात का अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि जब वे कोई किताब मुझे पढ़कर लौटाते तो उस पर अपनी टिप्पणी भी अवश्य साझा करते. कहने का आशय यह है कि वे वाकई किताब पढ़ते और मन से पढ़ते थे.
एक बार का प्रसंग मेरे मानस पटल पर अमिट है. उसी को साझा करने के लिए मैंने यह भूमिका बनाई है. शाम को वे मेरे यहां आए, चाय वगैरह पी और फिर जाते-जाते बोले कि “डीपी, पढ़ने के लिए कुछ दे”. अजीब संयोग कि उस दिन मैं बहुत ग़रीब था. मुझे लगा कि मेरे पास ऐसी कोई किताब नहीं है जो मेरे ख़याल से उनकी रुचि की हो. मैंने उनसे कह भी दिया कि आपकी रुचि की कोई किताब आज मेरे पास नहीं है. फिर भी उन्होंने इसरार किया, कि कोई तो किताब होगी! मैंने अपनी अलमारी टटोली और उन्हें बताया कि आज तो एक ही किताब मेरे पास है, और इसमें आपकी कोई रुचि होगी नहीं. उन्होंने पूछा कौन-सी किताब है, तो मैंने बताया कि डॉ रामविलास शर्मा की 'भारत के प्राचीन भाषा परिवार और हिंदी’ का पहला खण्ड मेरे पास है. मैं उन दिनों. एमए के विद्यार्थियों को भाषाविज्ञान पढ़ाता था. जिन्हें जानकारी नहीं हो उन्हें बताता चलूं कि एमए के पाठ्यक्रम में भाषा विज्ञान को सर्वाधिक नीरस माना जाता है. यह एक तरह से हमारा तकनीकी विषय है. भार्गव साहब ने कहा कि मैं उन्हें वही किताब दे दूं. मुझे लगा कि वे इसे उलट-पलटकर मुझे लौटा देंगे. लेकिन मेरा अनुमान एकदम ग़लत साबित हुआ. वे अगली सुबह ही मेरे पास आए और बोले कि रात भर में मैंने यह पूरी किताब पढ़ ली है और अब तुमसे इसे डिस्कस करने आया हूं.
मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि जिस तरह उन्होंने उस किताब को समझा उस तरह से तो मैंने भी नहीं समझा था, हालांकि वह मेरा विषय था. उन्होंने मुझसे आग्रह करके उस किताब के शेष दो खण्ड भी मेरे कॉलेज की लाइब्रेरी से मंगवाए और उन्हें भी उतनी ही दिलचस्पी से पढ़ा. पढ़ने के प्रति उनके अनुराग का यह तो एक प्रसंग है. उनकी रुचि दुनिया के हर विषय में थी और किताबों के मामले में वे सर्वभक्षी थे. ऐसे कई और प्रसंग मेरे स्मृति कोष में जमा हैं. लेकिन अभी इतना ही.
ऐसे विद्वान, ज्ञान पिपासु, और शानदार दोस्त के न रहने के समाचार से कितना व्यथित हूं, कल्पना की जा सकती है.
उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि!

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