Saturday, October 17, 2026

अब कभी नहीं आएगा यश भाई का फ़ोन!

 


विश्वास नहीं होता कि आज डॉ. यश गोयल को स्मृतिशेष हुए पूरा एक साल बीत गया है. अब भी जैसे यह आस बनी रहती है कि कभी मोबाइल घनघनाएगा और हम बतियाने लगेंगे. लेकिन अब यह आस कभी पूरी नहीं होगी. यही जीवन का कटु सत्य है!
डॉ. यश गोयल से मेरा रिश्ता बहुत पुराना था. अस्सी के दशक में पहली बार उनसे मिला था. अब भी याद है, हमारी यह मुलाकात जालोर में हुई थी. राजस्थान साहित्य अकादमी का कोई आयोजन था. मेरे गुरु डॉ. प्रकाश आतुर तब अकादमी के अध्यक्ष बने ही थे. यश जी उन दिनों शौकिया पत्रकारिता किया करते थे. उन्होंने डॉ. आतुर का एक साक्षात्कार किया था, जो शायद अकादमी का अध्यक्ष बनने के बाद उनका पहला साक्षात्कार था. उसके बाद यश जी से जो रिश्ता बना, वह लगातार गहरा और मजबूत होता गया.
वे जोधपुर में रहते थे और पारिवारिक कारणों से हमारा भी जोधपुर आना-जाना खूब होता था. संयोग यह था कि वहां उनके और हमारे घरों के बीच पैदल मुश्किल से दस मिनट की दूरी थी. सो, जब भी जोधपुर जाना होता, मैं उनके घर जरूर जाता. तब अम्मा और बाबूजी भी थे. पत्नी और मैं यश जी के विवाह में भी शामिल हुए थे. इस तरह हमारा रिश्ता केवल दो व्यक्तियों तक सीमित नहीं रहा, उसमें परिवार भी शामिल होता गया.
वह चिट्ठियों का जमाना था. मुलाकात नहीं हो पाती तो चिट्ठियों के जरिए संवाद बना रहता. फिर वे पोस्ट डॉक्टोरल शोध के लिए अमेरिका चले गए. वहां से भी उनके पत्र आते रहे. अमेरिका में रहते हुए उन्होंने बहुत कुछ सीखा और फ्रांज काफ्का पर एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक भी लिखी. भारत लौटकर वे सक्रिय पत्रकारिता की दुनिया में आ गए. अनेक संस्थानों में काम किया, लेकिन हमारे बीच का संपर्क हमेशा बना रहा.
इसी बीच उन्होंने कहानियां और व्यंग्य लिखना भी शुरू कर दिया. अपने लेखन को लेकर वे हमेशा उत्साहित रहते थे और खूब छपे भी. अपनी किसी रचना को लेकर मन में कोई शंका उठती, तो मुझे फोन कर लेते. रचना पर बात शुरू होती और कब फिसलकर जिंदगी की बातों तक पहुंच जाती, पता ही नहीं चलता. हम अपने सुख-दुख साझा करते. उन बातचीतों में साहित्य भी होता था और जीवन भी, विचार भी होते थे और एक-दूसरे की फिक्र भी.
लेकिन अपनी परेशानियों के बारे में बात करने में वे बहुत संकोची थे. इतनी निकटता के बावजूद, और मेरे बार-बार पूछने पर भी, उन्होंने कभी अपनी रुग्णता के बारे में खुलकर बात नहीं की. उनकी गंभीर बीमारी के समाचार मुझे दूसरे सूत्रों से ही मिले. दरअसल, वे किसी को कष्ट नहीं देना चाहते थे. इसके उलट, अगर उन्हें आपके किसी कष्ट का पता चल जाए, तो उसके निवारण तक चैन से नहीं बैठते थे.
मुझ पर तो उनके अनेक उपकार हैं. जब भी कोई संकट आया, मैंने निस्संकोच उन्हें बताया और उन्होंने उसी तत्परता से मेरे संकट को दूर करने की कोशिश की. वे केवल आश्वासन देने वाले मित्र नहीं थे, जरूरत पड़ने पर आगे बढ़कर मदद करने वाले व्यक्ति थे. आज पीछे मुड़कर देखता हूं तो ऐसे बहुत-से प्रसंग याद आते हैं. एक-एक प्रसंग के साथ उनकी आत्मीयता, तत्परता और दूसरों के लिए कुछ कर गुजरने का उनका स्वभाव फिर से आंखों के सामने आ खड़ा होता है.
अपने लेखन को लेकर वे जितने संजीदा थे, अपने समकालीनों के लेखन को प्रोत्साहित करने के मामले में भी उतने ही उदार और सक्रिय थे. दूसरों की रचनात्मक उपलब्धियों को पहचानना, उनकी सराहना करना और उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना कोई छोटी बात नहीं है. लेखकों की दुनिया में, जहां कभी-कभी प्रशंसा भी उदारता मांगती है, यश जी इस मामले में बहुत खुले दिल के थे.
मैं उन्हें एक लेखक और एक मनुष्य, दोनों रूपों में याद करता हूं. व्यक्ति के रूप में वे विलक्षण थे. परदुखकातर. दूसरों के दुख से व्यथित होने और उसे दूर करने के लिए अपनी ओर से कुछ करने की बेचैनी उनमें थी. मुझे लगता है कि यही मानवीय संवेदना उनके लेखन को भी वजन देती थी. उनकी रचनाओं को पढ़ते हुए और उनके साथ बिताए समय को याद करते हुए यह बात बार-बार महसूस होती है कि लेखक की असली पहचान केवल उसकी प्रकाशित रचनाओं से नहीं बनती, उसके मनुष्य होने से भी बनती है.
उनका अंतिम समय बहुत कष्ट में बीता. इतना अधिक कष्ट कि मुझे बार-बार साहिर लुधियानवी की ये पंक्तियां याद आती रहीं:
गुरेज़ का नहीं कायल हयात से लेकिन,
जो सच कहूं तो मुझे मौत भी नागवार नहीं!
आज ही के दिन, पिछले बरस, वे हम सबको छोड़कर दूसरी दुनिया में चले गए. लेकिन मेरा मन मानने को तैयार नहीं कि यश भाई का संसार अब समाप्त हो गया है. मुझे भरोसा है कि वहां भी वे नई कहानियों के बारे में सोच रहे होंगे, वहां के हालात पर व्यंग्य रच रहे होंगे, उस दुनिया के समाचार हम तक पहुंचाने की योजनाएं बना रहे होंगे और अपने आसपास के जीवों के संकट दूर करने में सक्रिय होंगे. उनकी कल्पनाशीलता, उनकी जिज्ञासा, उनकी लेखकीय बेचैनी और दूसरों के लिए कुछ कर गुजरने का उनका स्वभाव भला मृत्यु के साथ कैसे समाप्त हो सकता है!
यश भाई अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन मेरी जिंदगी में वे हमेशा रहेंगे. और मुझे विश्वास है कि मेरी तरह बहुत-से लोगों की जिंदगी में भी उनकी जगह कोई नहीं ले सकेगा. कुछ रिश्ते समय के साथ पुराने नहीं पड़ते, कुछ आवाजें स्मृति में लगातार सुनाई देती रहती हैं और कुछ लोग चले जाने के बाद भी हमारे भीतर अपनी जगह बनाए रखते हैं. यश भाई मेरे लिए ऐसे ही लोगों में से एक हैं.
उनकी स्मृति को सादर नमन!

एस भाग्यम शर्मा: जीवन की खुली खिड़कियां

 


कुछ लोग अपनी उम्र के साथ चलते हैं और कुछ ऐसे होते हैं, जो अपनी उम्र को अपने पीछे चलने के लिए विवश कर देते हैं. भाग्यम एम. शर्मा दूसरी तरह के लोगों में हैं. उम्र के आठवें दशक में पहुँच चुकी इस वरिष्ठ लेखिका और अनुवादक से जब जयपुर के किसी साहित्यिक आयोजन में मुलाकात होती है, तो सहज ही लगता है कि उम्र के बारे में हमारी बनाई हुई धारणाएँ कितनी रूढ़ और भ्रांत हैं. उम्र बढ़ने के साथ जीवन की सक्रियता कम होनी ही चाहिए, नए काम करने की इच्छा मंद पड़ ही जानी चाहिए और कुछ नया सीखने का उत्साह तो लगभग समाप्त हो ही जाना चाहिए. भाग्यम जी को देखकर इन धारणाओं पर अविश्वास होने लगता है.

जयपुर के साहित्यिक आयोजनों में उनसे प्रायः भेंट हो जाती है. उनके व्यक्तित्व में एक सहज आत्मीयता है. न कोई अतिरिक्त आडंबर, न अपने अनुभवों और उपलब्धियों का प्रदर्शन और न ही वरिष्ठता का ऐसा दबाव, जो सामने वाले को संकोच में डाल दे. वे मिलती हैं तो एक ऐसे व्यक्ति की तरह, जिसके भीतर जीवन के प्रति उल्लास और उत्सुकता अब भी बने हुए हैं. उनकी सहजता और सरल हृदयता उन्हें अपने आसपास के लोगों से जोड़ती है. मैंने प्रायः उन्हें युवा लेखक-लेखिकाओं से घिरा हुआ ही देखा है. साहित्य में वरिष्ठता का एक अर्थ यह भी है कि व्यक्ति अपने अनुभवों से दूसरों को समृद्ध करे, लेकिन अपने व्यक्तित्व को इतना सहज बनाए रखे कि लोग उसके निकट आने में संकोच न करें. भाग्यम जी में यह गुण विशेष रूप से दिखाई देता है.

उनके साहित्यिक व्यक्तित्व का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष तमिल से हिंदी में किया गया उनका विपुल अनुवाद-कार्य है. दो भाषाओं के बीच पुल बनाना केवल शब्दों को एक भाषा से दूसरी भाषा में पहुँचा देना नहीं है. भाषा के साथ एक समाज की स्मृतियाँ, सांस्कृतिक मान्यताएँ, संवेदनाएँ और जीवन को देखने का विशिष्ट ढंग भी जुड़ा होता है. अनुवादक का दायित्व है कि वह इन सबको समझे और दूसरी भाषा में इस तरह व्यक्त करे कि मूल रचना की आत्मा सुरक्षित रहे और नए पाठक के लिए उसका अर्थ-संसार भी खुल सके.

भारत की भाषायी विविधता हमारी बड़ी सांस्कृतिक संपदा है, लेकिन विडंबना यह है कि एक ही देश में रहने के बावजूद हम अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य से बहुत कम परिचित होते हैं. हिंदी का पाठक जब तमिल साहित्य की किसी महत्त्वपूर्ण रचना तक पहुँचता है, तो उसके पीछे अनुवादक का श्रम, धैर्य और संवेदनशीलता होती है. इस दृष्टि से भाग्यम जी का काम केवल साहित्यिक कर्म नहीं, बल्कि भाषाओं और संस्कृतियों को निकट लाने वाला प्रयास भी है.

अनुवाद के लिए दोनों भाषाओं पर अधिकार आवश्यक है, लेकिन केवल भाषायी दक्षता पर्याप्त नहीं होती. इसके लिए धैर्य, सूक्ष्म दृष्टि और मूल रचना के भीतर उतरने की क्षमता चाहिए. कई बार अनुवादक को अपनी भाषा की स्वाभाविक अभिव्यक्ति और मूल भाषा के विशिष्ट मुहावरे के बीच संतुलन बनाना पड़ता है. यह ऐसा श्रम है, जिसकी कठिनाई पाठक को अक्सर दिखाई नहीं देती. वह अनूदित रचना पढ़ता है, लेकिन उसके सहज पाठ के पीछे लगी मेहनत का उसे अहसास तक नहीं होता.

भाग्यम जी का लेखकीय संसार अनुवाद तक सीमित नहीं है. वे हिंदी में कहानियाँ लिखती हैं, लघुकथाएँ रचती हैं और प्रेरक लेखों के माध्यम से अपने विचार व्यक्त करती हैं. इस तरह उनका साहित्यिक व्यक्तित्व ग्रहण करने और देने, दोनों की प्रक्रियाओं से निर्मित हुआ है. एक ओर वे तमिल साहित्य की रचनात्मक उपलब्धियों को हिंदी के पाठकों तक पहुँचाती हैं, दूसरी ओर अपने अनुभवों, विचारों और संवेदनाओं को हिंदी में अभिव्यक्त करती हैं. यह दोतरफा संवाद उनके साहित्यिक जीवन को व्यापक अर्थ देता है.

इन साहित्यिक उपलब्धियों से इतर उनके व्यक्तित्व का एक पक्ष ऐसा है, जो मुझे विशेष रूप से प्रभावित करता है. उन्होंने सत्तर वर्ष की आयु पार करने के बाद कार चलाना सीखा. यह बात सुनने में भले ही छोटी लगे, लेकिन इसके भीतर जीवन के प्रति उनके दृष्टिकोण का एक महत्त्वपूर्ण संकेत छिपा है. हमारे समाज में एक निश्चित उम्र के बाद व्यक्ति से अपेक्षा की जाती है कि वह अपनी गतिविधियाँ सीमित कर ले, नए प्रयोगों से बचे और धीरे-धीरे अपनी पुरानी उपलब्धियों के सहारे जीवन बिताने लगे. कई बार व्यक्ति स्वयं भी इन अपेक्षाओं को अपनी नियति मान लेता है और अपनी इच्छाओं को यह कहकर टाल देता है कि अब इस उम्र में क्या नया करना!

भाग्यम जी ने ऐसी धारणाओं को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया. कार चलाना सीखने का उनका निर्णय केवल एक नया कौशल अर्जित करना नहीं था. उसमें अपनी स्वतंत्रता का विस्तार करने, अपनी सुविधा के लिए दूसरों पर निर्भरता कम करने और जीवन को अधिक सक्रिय बनाने की इच्छा भी शामिल थी. इस निर्णय का सबसे दिलचस्प पक्ष यह है कि अब वे जयपुर की भीड़भाड़ वाली सड़कों पर स्वयं कार चलाकर साहित्यिक समारोहों में आती हैं. यातायात की अव्यवस्था, लगातार बजते हॉर्न और अचानक सामने आ जाने वाले वाहनों के बीच गाड़ी चलाना आसान नहीं है. ऐसे में उनका इस तरह आयोजनों में पहुँचना मुझे उनकी जीवंतता और आत्मनिर्भरता का सुंदर प्रतीक लगता है.

मैं नहीं जानता कि कार चलाना सीखते समय उन्होंने मन में क्या सोचा होगा या पहली बार जयपुर की सड़कों पर स्वयं गाड़ी लेकर निकलते हुए उन्हें कैसा अनुभव हुआ होगा. लेकिन उनका यह सहज-सा व्यवहार अपने आप में एक संदेश बन जाता है. जीवन में नया कुछ करने के लिए किसी विशेष उम्र का इंतजार नहीं करना चाहिए और न ही किसी उम्र के आ जाने पर अपने लिए नए कामों के दरवाजे बंद कर लेने चाहिए. उम्र हमारी जीवन-यात्रा का एक तथ्य है, उसकी संभावनाओं की अंतिम सीमा नहीं.

कार चलाना सीखने के साथ ही उन्होंने कंप्यूटर का इस्तेमाल करना भी सीखा और उसमें इतनी निपुणता अर्जित कर ली कि अब अपना सारा काम स्वयं कंप्यूटर पर करती हैं. यह भी उसी सीखने की इच्छा का विस्तार है, जो उन्हें नए समय और उसकी सुविधाओं से जोड़ती है. वे अपने लिए तकनीक के दरवाजे बंद नहीं करतीं, बल्कि उसे अपने जीवन का उपयोगी हिस्सा बना लेती हैं.

भाग्यम जी ने अपनी उम्र को कभी अपनी ढाल नहीं बनाया. हमारे यहाँ उम्र कई बार अनुभव की पहचान होने के बजाय विशेष रियायत पाने का साधन बन जाती है. व्यक्ति चाहता है कि उसकी उम्र को देखते हुए उससे कम अपेक्षा की जाए और उसकी निष्क्रियता को सहज मान लिया जाए. भाग्यम जी के व्यक्तित्व में ऐसी किसी मानसिकता का आग्रह दिखाई नहीं देता. वे अपने काम करती हैं, साहित्यिक गतिविधियों में भाग लेती हैं और अपनी रुचियों को सक्रिय बनाए रखती हैं.

उनके जीवन का एक और पक्ष मुझे बहुत प्रभावित करता है. वे जयपुर में अकेली रहती हैं. अकेलापन बहुतों को आत्मदया का शिकार बना देता है. हम दूसरों से अपेक्षाएँ करने लगते हैं और उनके पूरा न होने पर भुनभुनाते रहते हैं. लेकिन भाग्यम जी टाइम बैंक जैसी गतिविधि से जुड़कर अपनी क्षमता भर दूसरों के जीवन को सुगम बनाने में लगी रहती हैं. मैं इसे बहुत बड़ी बात मानता हूँ. अपने अकेलेपन को दूसरों के लिए उपयोगी होने की संभावना में बदल देना आसान नहीं है. भाग्यम जी की सक्रियता में मुझे यही सकारात्मक जीवन-दृष्टि दिखाई देती है.

यह सब लिखते हुए मैं यह भी कहना चाहूँगा कि सक्रिय बने रहने का अर्थ हर समय व्यस्त रहना या अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन करते रहना नहीं है. जीवन की सार्थकता इस बात से भी तय होती है कि हमारे भीतर जीने की इच्छा कितनी प्रबल है, हम अपने आसपास की दुनिया में कितनी रुचि लेते हैं और दूसरों से हमारा संबंध कितना जीवंत है. भाग्यम जी की आत्मीयता और सरल हृदयता उनके व्यक्तित्व के उतने ही महत्त्वपूर्ण पक्ष हैं, जितना उनका साहित्यिक कर्म और उनकी आत्मनिर्भरता. स्वयं उन्होंने मुझे अनगिनत बार सपत्नीक अपने यहाँ आने और उनके हाथों से बनाए दक्षिण भारतीय व्यंजनों का आनंद लेने के लिए आमंत्रित किया है. सोशल मीडिया पर प्रायः उनके आतिथ्य की सूचनाएँ मिलती रहती हैं. उनके लिए लोगों से मिलना-जुलना केवल औपचारिक सामाजिक गतिविधि नहीं, बल्कि जीवन का आनंद लेने और दूसरों के साथ अपने सुख बाँटने का एक तरीका है. उनकी जीवंतता का यह पक्ष भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है.

उन्हें अनेक पुरस्कारों और सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है. किसी भी लेखक के लिए उसके काम की सार्वजनिक स्वीकृति प्रसन्नता और संतोष का विषय होती है. पुरस्कार बताते हैं कि किसी व्यक्ति के योगदान को पहचाना गया है, लेकिन किसी लेखक के व्यक्तित्व का पूरा मूल्यांकन केवल पुरस्कारों की सूची से नहीं किया जा सकता. यह भी देखना होता है कि अपने काम के साथ-साथ उसने कैसा मनुष्य होना चुना है और अपने आसपास के लोगों से कैसा संबंध बनाया है.

भाग्यम जी के मामले में मुझे उनकी उपलब्धियों के साथ उनकी सहजता भी याद रहती है. वे उस तरह की वरिष्ठ लेखिका नहीं हैं, जिनकी उपस्थिति मात्र से औपचारिकता का वातावरण बन जाए. उनसे मिलना साहित्यिक आयोजनों की उस मानवीय ऊष्म का हिस्सा है, जिसके कारण ऐसे आयोजन केवल मंच, वक्तव्य, विमर्श और तालियों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि लोगों को एक-दूसरे के अनुभवों से परिचित होने का अवसर भी देते हैं.

मुझे इस बात का गर्व है कि भाग्यम जी मुझे अपना विश्वासपात्र मानती हैं. अपनी छोटी-बड़ी जिज्ञासाएँ और समस्याएँ वे मुझसे साझा करती रहती हैं. इससे भी बड़ी बात यह है कि वे मेरी सलाह पर भरोसा करती हैं. ऐसे लोग कम ही मिलते हैं, जो दूसरों की राय को इतने खुले मन से स्वीकार करें. यह उनके व्यक्तित्व का एक ऐसा पक्ष है, जो उनकी सहजता के साथ-साथ उनके खुलेपन को भी सामने लाता है.

साहित्य का संबंध अंततः मनुष्य से है. वह हमें जीवन को अधिक ध्यान से देखने, दूसरों के अनुभवों को समझने और अपनी धारणाओं पर पुनर्विचार करने की प्रेरणा देता है. भाग्यम जी का साहित्यिक कर्म हमें भाषाओं के पार देखने की दृष्टि देता है और उनका जीवन हमें उम्र के पार देखने का साहस देता है. उनके व्यक्तित्व में साहित्य और जीवन के बीच कोई अस्वाभाविक दूरी दिखाई नहीं देती. जिस जिज्ञासा और खुलेपन की अपेक्षा हम एक रचनाकार से करते हैं, वे उनके रोजमर्रा के व्यवहार में भी दिखाई देते हैं.

उम्र का बढ़ना जीवन की स्वाभाविक प्रक्रिया है, लेकिन उम्र के साथ जिज्ञासा, उत्साह और आत्मीयता का क्षीण हो जाना कोई अनिवार्यता नहीं है. कुछ लोग अपनी उपस्थिति से यह भरोसा दिलाते हैं कि बीते हुए वर्षों का हिसाब रखने के बजाय आने वाले दिनों के लिए भी उत्सुक रहा जा सकता है. भाग्यम एम. शर्मा जी को जयपुर के किसी साहित्यिक आयोजन में देखता हूँ, तो उनके बारे में यही विचार मन में आता है. वे केवल तमिल और हिंदी के बीच सेतु बनाने वाली वरिष्ठ अनुवादक नहीं हैं, न केवल कहानियों, लघुकथाओं और प्रेरक लेखों की रचनाकार हैं. वे अपने जीवन से यह भी बताती हैं कि सक्रियता की कोई एक निर्धारित उम्र नहीं होती और आत्मनिर्भरता का आनंद किसी भी उम्र में पाया जा सकता है.

अगली बार जयपुर के किसी साहित्यिक समारोह में उनसे मुलाकात होगी, तो संभव है कि मैं उनके अनुवादों, कहानियों या किसी नए लेख के बारे में बात करूँ. लेकिन मन के किसी कोने में उनकी वह छवि भी बनी रहेगी, जिसमें उम्र के आठवें दशक में पहुँची एक लेखिका अपनी कार स्वयं चलाकर आती है और अपनी सहज मुस्कान के साथ साहित्यिक दुनिया की हलचल में शामिल हो जाती है. यह दृश्य किसी उपदेश से अधिक प्रभावशाली है. यह हमें चुपचाप याद दिलाता है कि जीवन से विदा लेने की तैयारी में जुट जाने के बजाय, जब तक संभव हो, उसमें पूरी तरह रमे रहना चाहिए.

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