डॉ. यश गोयल से मेरा रिश्ता बहुत पुराना था. अस्सी के दशक में पहली बार उनसे मिला था. अब भी याद है, हमारी यह मुलाकात जालोर में हुई थी. राजस्थान साहित्य अकादमी का कोई आयोजन था. मेरे गुरु डॉ. प्रकाश आतुर तब अकादमी के अध्यक्ष बने ही थे. यश जी उन दिनों शौकिया पत्रकारिता किया करते थे. उन्होंने डॉ. आतुर का एक साक्षात्कार किया था, जो शायद अकादमी का अध्यक्ष बनने के बाद उनका पहला साक्षात्कार था. उसके बाद यश जी से जो रिश्ता बना, वह लगातार गहरा और मजबूत होता गया.
वे जोधपुर में रहते थे और पारिवारिक कारणों से हमारा भी जोधपुर आना-जाना खूब होता था. संयोग यह था कि वहां उनके और हमारे घरों के बीच पैदल मुश्किल से दस मिनट की दूरी थी. सो, जब भी जोधपुर जाना होता, मैं उनके घर जरूर जाता. तब अम्मा और बाबूजी भी थे. पत्नी और मैं यश जी के विवाह में भी शामिल हुए थे. इस तरह हमारा रिश्ता केवल दो व्यक्तियों तक सीमित नहीं रहा, उसमें परिवार भी शामिल होता गया.
वह चिट्ठियों का जमाना था. मुलाकात नहीं हो पाती तो चिट्ठियों के जरिए संवाद बना रहता. फिर वे पोस्ट डॉक्टोरल शोध के लिए अमेरिका चले गए. वहां से भी उनके पत्र आते रहे. अमेरिका में रहते हुए उन्होंने बहुत कुछ सीखा और फ्रांज काफ्का पर एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक भी लिखी. भारत लौटकर वे सक्रिय पत्रकारिता की दुनिया में आ गए. अनेक संस्थानों में काम किया, लेकिन हमारे बीच का संपर्क हमेशा बना रहा.
इसी बीच उन्होंने कहानियां और व्यंग्य लिखना भी शुरू कर दिया. अपने लेखन को लेकर वे हमेशा उत्साहित रहते थे और खूब छपे भी. अपनी किसी रचना को लेकर मन में कोई शंका उठती, तो मुझे फोन कर लेते. रचना पर बात शुरू होती और कब फिसलकर जिंदगी की बातों तक पहुंच जाती, पता ही नहीं चलता. हम अपने सुख-दुख साझा करते. उन बातचीतों में साहित्य भी होता था और जीवन भी, विचार भी होते थे और एक-दूसरे की फिक्र भी.
लेकिन अपनी परेशानियों के बारे में बात करने में वे बहुत संकोची थे. इतनी निकटता के बावजूद, और मेरे बार-बार पूछने पर भी, उन्होंने कभी अपनी रुग्णता के बारे में खुलकर बात नहीं की. उनकी गंभीर बीमारी के समाचार मुझे दूसरे सूत्रों से ही मिले. दरअसल, वे किसी को कष्ट नहीं देना चाहते थे. इसके उलट, अगर उन्हें आपके किसी कष्ट का पता चल जाए, तो उसके निवारण तक चैन से नहीं बैठते थे.
मुझ पर तो उनके अनेक उपकार हैं. जब भी कोई संकट आया, मैंने निस्संकोच उन्हें बताया और उन्होंने उसी तत्परता से मेरे संकट को दूर करने की कोशिश की. वे केवल आश्वासन देने वाले मित्र नहीं थे, जरूरत पड़ने पर आगे बढ़कर मदद करने वाले व्यक्ति थे. आज पीछे मुड़कर देखता हूं तो ऐसे बहुत-से प्रसंग याद आते हैं. एक-एक प्रसंग के साथ उनकी आत्मीयता, तत्परता और दूसरों के लिए कुछ कर गुजरने का उनका स्वभाव फिर से आंखों के सामने आ खड़ा होता है.
अपने लेखन को लेकर वे जितने संजीदा थे, अपने समकालीनों के लेखन को प्रोत्साहित करने के मामले में भी उतने ही उदार और सक्रिय थे. दूसरों की रचनात्मक उपलब्धियों को पहचानना, उनकी सराहना करना और उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना कोई छोटी बात नहीं है. लेखकों की दुनिया में, जहां कभी-कभी प्रशंसा भी उदारता मांगती है, यश जी इस मामले में बहुत खुले दिल के थे.
मैं उन्हें एक लेखक और एक मनुष्य, दोनों रूपों में याद करता हूं. व्यक्ति के रूप में वे विलक्षण थे. परदुखकातर. दूसरों के दुख से व्यथित होने और उसे दूर करने के लिए अपनी ओर से कुछ करने की बेचैनी उनमें थी. मुझे लगता है कि यही मानवीय संवेदना उनके लेखन को भी वजन देती थी. उनकी रचनाओं को पढ़ते हुए और उनके साथ बिताए समय को याद करते हुए यह बात बार-बार महसूस होती है कि लेखक की असली पहचान केवल उसकी प्रकाशित रचनाओं से नहीं बनती, उसके मनुष्य होने से भी बनती है.
उनका अंतिम समय बहुत कष्ट में बीता. इतना अधिक कष्ट कि मुझे बार-बार साहिर लुधियानवी की ये पंक्तियां याद आती रहीं:
गुरेज़ का नहीं कायल हयात से लेकिन,
जो सच कहूं तो मुझे मौत भी नागवार नहीं!
आज ही के दिन, पिछले बरस, वे हम सबको छोड़कर दूसरी दुनिया में चले गए. लेकिन मेरा मन मानने को तैयार नहीं कि यश भाई का संसार अब समाप्त हो गया है. मुझे भरोसा है कि वहां भी वे नई कहानियों के बारे में सोच रहे होंगे, वहां के हालात पर व्यंग्य रच रहे होंगे, उस दुनिया के समाचार हम तक पहुंचाने की योजनाएं बना रहे होंगे और अपने आसपास के जीवों के संकट दूर करने में सक्रिय होंगे. उनकी कल्पनाशीलता, उनकी जिज्ञासा, उनकी लेखकीय बेचैनी और दूसरों के लिए कुछ कर गुजरने का उनका स्वभाव भला मृत्यु के साथ कैसे समाप्त हो सकता है!
यश भाई अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन मेरी जिंदगी में वे हमेशा रहेंगे. और मुझे विश्वास है कि मेरी तरह बहुत-से लोगों की जिंदगी में भी उनकी जगह कोई नहीं ले सकेगा. कुछ रिश्ते समय के साथ पुराने नहीं पड़ते, कुछ आवाजें स्मृति में लगातार सुनाई देती रहती हैं और कुछ लोग चले जाने के बाद भी हमारे भीतर अपनी जगह बनाए रखते हैं. यश भाई मेरे लिए ऐसे ही लोगों में से एक हैं.
उनकी स्मृति को सादर नमन!

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