कोई तो कारण होगा कि अस्सी के दशक का यह प्रसंग अब याद आ रहा है!
लगभग चालीस बरस कम नहीं होते हैं स्मृति के धूमिल हो जाने के लिए. और शायद हो ही गई थी, लेकिन अब जैसे यादों पर जमी धूल हट गई है और सब कुछ बहुत अच्छी तरह याद आ रहा है. छोड़िये इस बात को कि यह बात अब ही क्यों याद आ रही है! आप तो बात का आनंद लीजिए!
मैंने अपनी नौकरी का बहुत बड़ा समय पश्चिमी राजस्थान के एक छोटे-से कस्बे सिरोही के राजकीय महाविद्यालय में बिताया. जो लोग इस कस्बे को नहीं जानते उन्हें बता दूं कि राजस्थान का एकमात्र पर्वतीय पर्यटन स्थल इसी सिरोही ज़िले में स्थित है. मेरा महाविद्यालय राजस्थान के पुराने और ऐसे महाविद्यालयों में से एक था जिसे कम से कम वे लोग बहुत आदर से स्मरण करते हैं जो वहां काम कर चुके हैं. असल में पूरा पश्चिमी राजस्थान ही बहुत शांत इलाका है इसलिए वहां स्थित यह महाविद्यालय प्रांत के अन्य कई इलाकों के बहुत अशांत और कुख्यात महाविद्यालयों से बहुत भिन्न था और है. मैंने क्योंकि वहां अपनी नौकरी के बीस से ज़्यादा साल गुज़ारे मेरे मन में इस महाविद्यालय के प्रति बहुत गहरा अनुराग है और यहां की अनेक खट्टी मीठी यादें मेरे स्मृति कोष में जमा हैं.
आज मैं जिस याद को साझा कर रहा हूं उसका संबंध एक हद तक इस बात से भी है कि मैं वहां हिंदी का व्याख्याता था. हमारे कॉलेजों में हिंदी व्याख्याता को पढ़ाने के अलावा अन्य बहुत सारे कामों के लिए भी अपरिहार्य और उपयुक्त माना जाता है. यह वृत्तांत पढ़ने वालों को भले ही इन कामों के बारे में पढ़कर कुछ अजीब लगे, लेकिन यह एक यथार्थ है कि हिंदी व्याख्याता को प्राचार्य का भाषण, संस्था की वार्षिक रिपोर्ट, अभिनंदन पत्र, शोक संदेश लिखने जैसे अनेक काम करने के लिए एकमात्र योग्य व्यक्ति माना जाता है. इन कामों में ऐसे ही और भी अनेक काम जुड़ते रहते हैं. कहना अनावश्यक है कि ये सारे काम मैंने भी किए हैं. मैं जिस समय को स्मरण कर रहा हूं उस समय मेरे महाविद्यालय के प्राचार्य एक दबंग, अति उत्साही, महत्वाकांक्षी, आत्म प्रशंसा प्रिय व्यक्ति थे. उन्हें इस बात में ख़ास दिलचस्पी थी कि उनके महाविद्यालय की ख़बरें हर रोज़ अखबारों में छपे. और महाविद्यालय की ख़बरों में सबसे महत्वपूर्ण होता ख़ुद उन प्राचार्य जी का नामोल्लेख. अगर वह होता तो उन्हें ख़बर काम की लगती और अगर उनका नाम उस ख़बर में नहीं होता तो फिर वह ख़बर, चाहे उसमें महाविद्यालय की कितनी भी प्रशंसा क्यों न हो, बेकार लगती. उन्होंने मुझे महाविद्यालय का पीआरओ (जन सम्पर्क अधिकारी) बना दिया और मेरा काम यही था कि हर रोज़ कई अखबारों को ऐसी ख़बरें लिखकर भेजूं जिनमें अनिवार्यत: प्राचार्य जी का नामोल्लेख हो. स्वीकार करता हूं कि अध्यापन के अलावा यह काम भी मैंने निष्ठा से किया. अब पीछे मुड़कर देखता हूं तो इसमें मुझे कोई ख़ास बुराई भी नज़र नहीं आती. कुल मिलाकर तो मैं अपने महाविद्यालय की छवि का ही निर्माण कर रहा था!
तो, ऐसे ही एक दिन प्राचार्य जी ने मुझे अपने ऑफिस में बुलाया और कहा कि मैं अखबारों को एक ख़बर उनके हवाले से भेजूं. ख़बर यह कि प्राचार्य अमुक जी ने बताया है कि हम अपने कॉलेज में 36 प्रतिशत पर एडमिशन देते हैं लेकिन हमारे कॉलेज का रिज़ल्ट अस्सी प्रतिशत रहता है. याद दिलाता चलूं कि न्यूनतम उत्तीर्ण प्रतिशत 36 होता है. वे दिन बहुत मारा मारी के नहीं थे इसलिए कुछ विद्यार्थियों को इस न्यूनतम प्रतिशत पर भी प्रवेश मिल जाता था. उनके इस बयान की विसंगति यह थी कि इस न्यूनतम उत्तीर्ण प्रतिशत और परिणाम के बीच कोई रिश्ता नहीं था. अगर रिश्ता ढूंढना ही चाहें तो यह बनता कि हम शत प्रतिशत उत्तीर्ण विद्यार्थियों को प्रवेश देते हैं और उनमें से अस्सी प्रतिशत उत्तीर्ण होते हैं. ज़ाहिर है कि यह एक नकारात्मक बात होती. मैंने प्राचार्य जी के सामने अपनी आपत्ति रखी, लेकिन उन्होंने इस आपत्ति को यह कहते हुए सिरे से खारिज़ कर दिया कि आप तो जैसा मैं कह रहा हूं वैसा लिख दें. मैंने लिख दिया और जैसा प्रत्याशित था, अगले दिन कुछ अखबारों में यह ख़बर छप भी गई!
मैं किसी काम से बाज़ार गया तो अनायास एक अभिभावक से मुलाकात हो गई. उन्होंने कहा कि आपके प्राचार्य जी तो बहुत डायनैमिक हैं! मैंने कहा कि कैसे, तो वे बोले, आपने आज का अखबार नहीं पढ़ा? अखबार ने लिखा है कि कैसे उन्होंने इस कॉलेज को इतना अच्छा बना दिया है कि छत्तीस परसेंट वाले अस्सी परसेंट तक जा पहुंचे हैं! मैं समझ गया कि उन अभिभावक जी को यह समझ में आया था कि हम बहुत औसत बुद्धि वाले विद्यार्थियों को प्रवेश देते हैं और उन्हें बहुत काबिल बना देते हैं. मेरे प्राचार्य जी शायद यही तो चाहते थे. अपने ज़माने में वे भी छवि निर्माण के उस्ताद थे!
और जब यह प्रसंग याद आया तो इससे जुड़ा एक और प्रसंग कैसे भूल सकता हूं? विश्वविद्यालय की परीक्षाओं के परिणाम आने लगे थे. शायद बीए फाइनल का परिणाम आया था. यह परीक्षा देने वाले हमारे महाविद्यालय के पचास प्रतिशत विद्यार्थी उत्तीर्ण हुए थे. प्राचार्य जी ने मुझे बुलाया और आदेश दिया कि मैं इस परिणाम की एक ख़बर बनाकर अखबारों को भिजवा दूं. मैंने ख़बर बना कर उसे टाइप करवाया और जब वह ख़बर प्राचार्य जी के पास हस्ताक्षर के लिए पहुंची तो एक बार फिर मुझे बुलवाया गया. प्राचार्य जी ने बड़े प्यार से फरमाया, "डॉ साहब, इस पचास प्रतिशत को पैंसठ प्रतिशत कर दीजिए!" मैंने विनम्रता से कहा कि सर, यह तो ठीक नहीं होगा. हम ग़लत बयानी कैसे कर सकते हैं? मेरी आपत्ति से एकदम अप्रभावित प्राचार्य जी ने आदेशात्मक स्वर में कहा, "मैं जैसा कह रहा हूं वैसा कर दीजिए!" फिर अपने स्वर को मुलायम करते हुए बोले, "डॉ साहब, कौन चैक कर रहा है कि वास्तविक रिज़ल्ट क्या रहा है! आप तो जैसा मैं कह रहा हूं वैसा लिख कर भेज दीजिए!" अगले दिन यह ख़बर भी छप गई और अभिभावकों ने फिर महसूस किया कि इस बार उनके शहर के महाविद्यालय में जो प्राचार्य आए हैं, वे बहुत कर्मठ हैं!
तब का अनुभव मुझे अब याद आ रहा है और मैं समझ पा रहा हूं कि छवि निर्माण ऐसे ही होता है! कोई नहीं देखता कि सच्चाई क्या है!
सब वही देखते हैं जो यत्नपूर्वक उन्हें दिखाया जाता है!
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