Wednesday, September 10, 2008

सच्चाई ज़रूरी है आज के अतिवादी समय में

पुलिट्ज़र पुरस्कार विजेता पत्रकार रोन सस्किण्ड की हाल ही में प्रकाशित किताब ‘द वे ऑफ द वर्ल्ड: ए स्टोरी ऑफ ट्रुथ एण्ड होप इन एन एज ऑफ एक्स्ट्रीमिज़्म’ ने इन दिनों अमरीका को बड़ी असहज स्थिति में डाल रखा है. किताब में कुछ बेहद सनसनीखेज रहस्योद्घाटन किए गए हैं. बात इतनी आगे बढ़ गई है कि सीनेट सेलेक्ट कमिटी ऑन इण्टेलीजेंस और हाउस ज्यूडिशियरी कमिटी को कहना पड़ा है कि रोन ने जो खुलासे किए हैं, उनकी पड़ताल की जाएगी. वैसे, जैसा इस तरह के मामलों में हमेशा होता है, सम्बद्ध पक्षों ने खण्डन का कर्मकाण्ड पूरा कर लिया है. आखिर रोन ने ऐसा क्या कह दिया है इस किताब में? रोन ने कहा है कि 2003 में व्हाइट हाउस ने अमरीकी गुप्तचर एजेंसी सी आई ए को आदेश दिया था कि वह ईराक़ और अल-कायदा की नज़दीकी प्रकट करने वाले जाली दस्तावेज़ तैयार और प्रचारित करे. आदेश का पालन करते हुए सी आई ए ने एक जाली पत्र तैयार किया. पत्र ईराक़ी गुप्तचर सेवा के प्रमुख हाब्बुश ने सद्दाम हुसैन को ‘लिखा’ था. एक जुलाई 2001 की तारीख वाले इस पत्र में कहा गया कि 9 सितम्बर की घटना के रिंग लीडर मोहम्मद अत्ता को इस काण्ड के लिए ईराक़ में प्रशिक्षित किया गया. रोन कहते हैं कि इस जाली पत्र ने व्हाइट हाउस की सारी समस्याएं हल कर दीं.
रोन की यह किताब अनेक दस्तावेज़ी साक्ष्यों के हवाले से बताती है कि बुश प्रशासन युद्ध के कई सप्ताह पहले ईराक़ी गुप्तचर सेवा के प्रमुख से यह जान चुका था कि ईराक़ के पास महाविनाश के हथियार नहीं हैं. लेकिन इस सच्चाई को झुठलाते हुए ईराक़ी गुप्तचर सेवा के प्रमुख से अमरीकियों को यह भरोसा दिलवाने वाला पत्र लिखवाया गया कि ईराक़ के पास महाविनाश के हथियार हैं और उसकी संलग्नता अल-क़ायदा के साथ है. अमरीका ने गुप्तचर सेवा प्रमुख को इस ‘सेवा’ के बदले पचास लाख डॉलर प्रदान किए.
ये और ऐसे अनेकानेक सनसनीखेज खुलासे करते हुए पुस्तक के लेखक रोन सस्किण्ड कहते हैं कि एक देश के रूप में अमरीका पथभ्रष्ट हो गया है और वह नैतिक सत्ता, जो कि उसके अस्तित्व का आधार है, उसके हाथ से फिसल चुकी है. रोन बेहद भावपूर्ण शब्दों में अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहते हैं कि इस समय की सबसे बड़ी चुनौती -आतंकवादियों के हाथों में आणविक हथियार– का सामना करने वाली नैतिक नेतृत्व क्षमता अमरीका खो चुका है. किताब के अनेक केन्द्रीय विचारों में से एक है कथनी और करनी के बीच की बढती खाई, अमरीकी सरकार और अधिकारियों द्वारा की जाने वाली नैतिकता की बड़ी-बड़ी बातें, हवाई वक्तव्य और उनके बरक्स उसकी काली करतूतें. किताब में एक जगह बेनज़ीर भुट्टो को यह कहते हुए उद्धृत किया गया है, “रोन, मैं अपनी तमाम ज़िन्दगी इन प्रजातांत्रिक मूल्यों की बात करती रही हूं, लेकिन पिछले महीने ही मुझे उनकी ताकत का एहसास हुआ है.” किताब में खूब सारी घटनाएं और अनेक याद रह जाने वाले किरदार हैं. बेनज़ीर भुट्टो मुशर्रफ से पूछती हैं कि क्या उनकी जान की रक्षा की जाएगी? और इसके जवाब में मुशर्रफ कहते हैं कि “यह इस बात पर निर्भर करता है कि हमारे रिश्ते कैसे रहते हैं. इसे अच्छी तरह समझ लें.” रोन टिप्पणी करते हैं कि यह उत्तर किसी माफिया डॉन की धमकी जैसा लगता है. रोन यह भी बताते हैं कि अपने आखिरी दिनों में बेनज़ीर को यह समझ में आ गया था कि अमरीका ने आदर्श को एक तरफ रख कर अवैध सत्ता से हाथ मिलाते हुए उन्हें दर किनार करना शुरू कर दिया था.
किताब अमरीकी सरकार द्वारा मानवाधिकार हनन के अनेक प्रसंगों, और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर किए जाने वाले अगणित हमलों के प्रसंग उजागर करती हुई ऐसे अनेक चरित्रों को सामने लाती है जो अन्धेरे में रोशनी की मानिन्द हैं. ऐसा ही एक चरित्र है संयुक्त राष्ट्र संघ की शरणार्थी आयुक्त वेण्डी चेम्बरलिन का. वेण्डी कहती हैं, “अगर पूरे दिन के काम के बाद, शाम को आप यह पाएं कि आपने अपनी शपथ का पूरा निर्वाह किया है तो फिर आपका कोई शत्रु हो ही नहीं सकता, और अगर हो भी तो वह अपराजेय नहीं हो सकता.”
किताब आज के आपाधापी और मूल्यहीनता के समय में, जबकि सच्चाई, न्याय और जवाबदेही केवल शब्दों तक सिमट कर रह गई है नैतिक मूल्यों की ज़रूरत को बहुत प्रखरता से रेखांकित करती है.
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Discussed book:
The Way of the World: A Story of Truth and Hope in an Age of Extremism
By Ron Suskind
Published by Harper
432 pages , Hardcover
US $ 27.95

राजस्थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्ट में मेरे पाक्षिक कॉलम 'किताबों की दुनिया' में 07 सितम्बर, 2008 को प्रकाशित आलेख का असम्पादित रूप.








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