Thursday, June 26, 2008

एक और दिन ऐसा

‘ट्यूज़डेज़ विद मॉरी’ और ‘फाइव पीपुल यू मीट इन हेवन’ जैसी बेस्टसेलर किताबों के लेखक मिच एल्बॉम का पेपरबैक संस्करण में हाल ही में आया उपन्यास फोर वन मोर डे उन आंतरिक संघर्षों को उजागर करता है जिनसे हममें से हरेक को कभी न कभी जूझना पडता है. मानवीय सम्बन्धों में, चाहे वे परिवारजन के हों, मित्रों के हों या अजनबियों के, कभी-न-कभी मन में यह बात आती ही है कि क्या हम इनका निर्वाह और ज़्यादा बेहतर तरीके से नहीं कर सकते थे? और जो बीत चुका है उसके सन्दर्भ में यह सवाल भी उठता है कि अब क्या किया जा सकता है!

‘फोर वन मोर डे’ उपन्यास का आधार यह विचार है कि अगर आपको जीवन का एक और दिन एक ऐसे व्यक्ति के साथ बिताने को मिले जो अब आपकी ज़िन्दगी में नहीं है, तो वह व्यक्ति कौन होगा! उपन्यास के केन्द्रीय चरित्र चार्ल्स ‘चिक’ बेनेटो के लिए तो यह व्यक्ति उसकी मां है. उपन्यास के प्रारम्भ में हम पाते हैं कि एक अवसाद भरी रात में चार्ल्स, अधेड उम्र का शराबी, आत्म हत्या करने के कगार पर है. उसका काम काज और परिवार सब टूट-बिखर चुके हैं. धीरे-धीरे हम इस चार्ल्स के जीवन से परिचित होते हैं. बचपन में उसके पिता कहा करते थे कि या तो तुम मामा’ज़ बॉय हो सकते हो या पापा’ज़ बॉय; दोनों एक साथ नहीं हो सकते. चार्ल्स ने पिता का लाडला होना चुना. न केवल चुना, अपनी युवावस्था पिता को खुश करने में झोंक भी डाली. पिता ने चाहा कि वह बेसबॉल खेले, तो उसने खेला. यहां तक कि जब चार्ल्स 11 साल का था, तब उसके पिता हालांकि उसे छोड गये, फिर भी उसने बेसबॉल चैम्पियन बनने के उनके सपने से नाता नहीं तोडा. आखिर वह एक छोटी टीम का सदस्य बना और धीरे-धीरे तरक्की करता चला.

इस सबके साथ उसकी मां पोसी ने बमुश्किल उसे पाला पोसा, बहिन रॉबर्टा ने भी उसके लिए अनेक त्याग किए. चार्ल्स उम्र भर अपने पिता को ही खुश करने में लगा रहा, मां की उपेक्षा करके भी. एक हादसे में उसकी टांग चोटग्रस्त होती है तो बेसबॉल का बडा खिलाडी बनने का उसका (असल में तो उसके पिता का) ख्वाब चकनाचूर हो जाता है. तब चार्ल्स को महसूस होता है कि पिता से उसका रिश्ता तो इस खिलाडी वाले कैरियर की नींव पर टिका था. उसके जेह्न से पिता धीरे-धीरे धूमिल होने लगते हैं और वह अपना ग़म ग़लत करने के लिए शराब का सहारा लेता है. इसी दौरान उसकी नौकरी भी छूट जाती है. वह यह भी पाता है कि उसके आर्थिक संकटों से उबरने में उसके पिता उसकी तनिक भी मदद नहीं करते. तब उसे एहसास होता है कि उसने अपनी मां की तो घोर उपेक्षा की थी. लेकिन तब तक मां को मरे को आठ साल बीत चुके हैं. उसे एक और गहरा आघात इस बात का लगता है कि खुद उसकी बेटी उसे न तो अपनी शादी के बारे में बताती है और न उसमें उसे बुलाती है. इन सबसे व्यथित होकर वह आत्महत्या का इरादा बनाता है. यही है इस उपन्यास का प्रस्थान बिन्दु!

लेकिन, आत्महत्या से पहले वह अपने छोटे-से गांव जाता है और संयोगवश अपने पुराने घर जा पहुंचता है. वहां पहुंच कर वह स्तब्ध रह जता है. उसकी मां, जो आठ साल पहले मर चुकी है, अब भी वहीं रह रही है और वह उसका स्वागत ऐसे करती है जैसे इस बीच कुछ हुआ ही नहीं है. और फिर बीतता है एक और दिन, आम दिन, ऐसा दिन जो हममें से हरेक बिताना चाहता है. अपने खोये मां-बाप के साथ, परिवार की भूली बिसरी बातें करते हुए, अपने किये - न किये के लिये क्षमा याचना करते हुए. इसी बातचीत के दौरान उसे अपनी मां के किये बहुत सारे ऐसे त्यागों का पता चलता है जिनसे वह अब तक अनजान था. मां उसे ढाढस बंधाती है और वह आत्महत्या का इरादा छोड अपनी ज़िन्दगी की पटरी से उतरी गाडी को फिर से पटरी पर लाने का निश्चय करता है.

इस कथा को बहुत आसानी से भूत-प्रेत की कथा कह कर खारिज किया जा सकता है. लेकिन सोचिए, क्या हर परिवार के पास इस तरह की कोई प्रेत कथा नहीं होती? जो लोग दुनिया छोड चुके हैं वे भी तो हमारी स्मृति में बने रहते हैं. अगर उन्हें भूत-प्रेत कह दिया जाए तो क्या हर्ज़ है? एक और बात, जब आप चार्ल्स और उसकी मां की बातचीत पढते हैं तो जो मानसिक विरेचन होता है और जैसी नैतिक सलाह आपको मिलती है, लगता है कि वह इस प्रविधि से ही सम्भव थी. पूरा उपन्यास एक ही बात कहता है और वह यह कि जीवन में सबसे बडी अहमियत प्रेम की है. वैसे, मिच घुमा फिराकर यही बात अपनी हर कृति में कहते हैं. आज के टूटते-दरकते मानवीय सम्बन्धों वाले विकट समय में इस सन्देश की कितनी ज़रूरत है, यह कहने की आवश्यकता नहीं.

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Discussed book:
For One More Day
By Mitch Albom
Published by: Hyperion
Paperback, 197 pages
US $ 10.80

राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट 'जस्ट जयपुर' में मेरे साप्ताहिक कॉलम वर्ल्ड ऑफ बुक्स के अंतर्गत 26 जून 2008 को प्रकाशित.








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