Tuesday, April 5, 2016

सामान्य की सम्भावनाएं चुक जाने के बाद असामान्य का रुख

बहुत सारी फिल्मों और टीवी प्रोग्रामों को देखते हुए क्या आपको भी ऐसा लगता है कि इनको क्यों बनाया गया है और कोई औसत  बुद्धि वाला इंसान भी इन्हें कैसे देख या झेल सकता है! उनका तर्कातीत होना, ऊल जुलूल होना, मूर्खतापूर्ण होना और अशालीन होना जैसे महज़ यह परखने लिए होता है कि उन्हें  देखते हुए आप अपना धैर्य खोते  हैं या नहीं! लेकिन जिन चीज़ों को देखते हुए आप कुढ़ते-चिढ़ते हैं उनका भी एक वफ़ादार दर्शक समुदाय होता है. अगर न हो तो उन्हें बनाया ही न जाए! जो लोग इस तरह की फिल्में या प्रोग्राम बनाते हैं उनकी नज़रें बॉक्स ऑफिस या टी आर पी पर टिकी होती हैं. अगर आप मनोरंजन की दुनिया के निकट अतीत को खंगालें तो पाएंगे कि इस तरह की निर्मितियों की अतार्किकता और बेहूदगी घटने की बजाय बढ़ी ही है. जो चीज़ दस-पाँच बरस पहले कल्पनातीत थी आज वह इतनी आम हो चुकी है कि आपको चौंकाती तक नहीं है. क्या पता कि इन्हें बनाने वालों का संकट यह हो कि सामान्य की तो सारी सम्भावनाएं चुक गई हैं, इसलिए अब उन्हें असामान्य का ही रुख करना है.

इधर ब्रिटेन  से एक ख़बर यह आई है कि वहां के एक लोकप्रिय चैनल पर जो कि नई तरह के कार्यक्रम प्रस्तुत करने के जुनून में सीमाएं लांघ जाने के लिए जाना जाता है,  एक नया शो  लाया जा रहा है. इस शो का नाम है ‘साइंस ऑफ अट्रेक्शन’  यानि आकर्षण का विज्ञान. लेकिन कहते हैं न कि नाम में क्या रखा है? असल बात तो है शो की विषय वस्तु. तो यह एक डेटिंग शो होगा, लेकिन इसके निर्माताओं का कहना है कि यह अब तक के तमाम डेटिंग शो’ज़ से नितान्त  भिन्न होगा. अब यह भी जान लीजिए कि इसमें भिन्न क्या होगा? इस शो के शुरु में आठ युवा स्त्री-पुरुषों को एक सी-थ्रू बक्से में रखा जाएगा! नयापन यह होगा कि ये सबके सब एकदम निर्वस्त्र होंगे! इन आठ में से एक स्त्री और एक पुरुष वे होंगे जिन्हें शेष छह में से अपने लिए एक-एक साथी का चयन करना है. इस शो का शीर्षक तो  सम्मानजनक है ही, इसे और गरिमा प्रदान करने के लिए इसमें एक साइकोलॉजिस्ट  को भी शामिल किया गया है जो प्रतियोगियों का मनोविश्लेषण प्रस्तुत कर इस शो में बौद्धिकता का तड़का लगाएगा. चुनाव करने वाले स्त्री-पुरुष एक-एक करके प्रतियोगियों को भिन्न-भिन्न मापदंडों  पर परखते हुए खारिज करते जाएंगे और अंत  में जब इन दोनों के लिए एक-एक साथी बच रहेगा तो ये उसके साथ डेट पर चले जाएंगे.  यह पूरा शो कुल तीन राउण्ड्स में होगा. पहले राउण्ड की तो चर्चा हो ही चुकी  है. दूसरे राउण्ड में प्रतियोगियों को वस्त्र धारण करने होंगे और फिर उनका आकलन उनके ड्रेस सेंस के आधार पर होगा. तीसरे और अंतिम दौर में प्रतियोगी अपने-अपने बारे में बताएंगे और इस आधार पर उनके व्यक्तित्वों का विश्लेषण किया जाएगा. जिन दो प्रतिभागियों को अपने लिए साथी चुनने हैं वे भी अपनी बात कहेंगे और बताएंगे कि किसी को वे क्यों पसन्द या नापसन्द कर रहे हैं.

इस शो की विषय वस्तु के आधार पर यह अनुमान भी लगाया जा रहा है कि शायद इसका नाम ‘साइंस ऑफ अट्रेक्शन’  न होकर ‘नेकेड अट्रेक्शन’  रहे. इस अनुमान का एक आधार यह भी है कि अमरीका में ‘डेटिंग नेकेड’  शीर्षक वाला एक शो काफी कामयाब रह चुका है. लोकप्रिय तो ‘ब्लाइण्ड डेट’  शीर्षक कार्यक्रम भी काफी रहा है लेकिन जिस शो की हम चर्चा  कर रहे हैं उसके निर्माताओं का दावा है कि उनका यह शो अब तक का सबसे अनूठा शो होगा. कहना अनावश्यक है कि अपने शो को अनूठा बनाने के क्रम में वे नग्नता और अश्लीलता से कोई दूरी नहीं बरतेंगे. अभी तक इस शो के जो प्रोमोज़ जारी हुए हैं उनसे भी इस बात की पुष्टि होती है. और जैसे इतना ही पर्याप्त न हो, निर्माताओं की तरफ से यह भी कहा जा चुका है कि इस शो में गे और लेस्बियन प्रतिभागियों पर भी एपिसोड होंगे.

सुखद आश्चर्य की बात यह है कि भले ही इस शो का निर्माण प्रारम्भ हो चुका है, निर्माताओं को इसके लिए आठ प्रतिभागी जुटाने में भी काफी मशक्कत करनी पड़ रही है. वे सोशल  मीडिया पर लोगों को पुकार रहे हैं लेकिन लोग हैं कि अपनी गरिमा को दांव पर लगाने को तैयार नहीं हैं. लेकिन देर-सबेर प्रोग्राम तो बनेगा ही. मुझे फिक्र इस बात की सता रही है कि हमारे अपने देशी निर्माता जो हर विदेशी प्रोग्राम की नकल करने को आतुर रहते हैं, उन्हें इस प्रोग्राम से ‘प्रेरणा ग्रहण’ करने से कौन रोकेगा, और कब तक?  
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक  न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 05 अप्रेल, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

    

Tuesday, March 29, 2016

बन्द करनी पड़ रही हैं जेलें क्योंकि घट रहे हैं अपराध!

एक तरफ जहां दुनिया के ज़्यादातर देश इस बात से त्रस्त हैं उनकी जेलों में जगह कम पड़ती जा रही है वहां एक देश ऐसा भी है जिसका संकट भिन्न और कम से कम हमारे लिए तो कल्पनातीत है. लगभग 170 लाख की आबादी वाला देश नीदरलैण्ड इस बात से परेशान है कि उसकी जेलों में जितने लोगों के लिए स्थान है उससे बहुत कम लोग उनमें बन्द हैं, और इस कारण सरकार को बेवजह जेलों का व्यय भार वहन करना पड़ रहा है. नीदरलैण्ड  की जेलों में कुल चौदह हज़ार कैदियों  के लिए जगह है जबकि वहां कैदियों  की संख्या ग्यारह हज़ार छह सौ ही  है. और यह स्थिति आज ही नहीं पैदा हुई है.  कम कैदियों की वजह से वहां  खाली  पड़ी  जेलों को बन्द करने का सिलसिला 2004 से ही जारी है.  2009 में वहां आठ जेलों को बन्द किया गया और फिर 2013 में उन्नीस और जेलों को बन्द करना पड़ा था. अब पाँच और जेलों को बन्द किए जाने की चर्चा ज़ोरों पर है.  लेकिन जेलों को बन्द करने से एक अन्य समस्या पैदा हो जाती है. बन्द की गई जेलों के कर्मचारियों को कहां समायोजित किया जाए? अभी वहां जितनी जेलें खाली पड़ी हैं अगर उन सबको  बन्द कर दिया  जाए तो करीब दो हज़ार लोग बेकार हो जाएंगे.  ऐसे में नीदरलैण्ड  सरकार ने एक दिलचस्प क़दम उठाया है. कदम है अपनी जेल सुविधाओं की आउटसोर्सिंग. अभी कुछ ही समय पहले  नॉर्वे ने अपने एक हज़ार से ज़्यादा कैदी नीदरलैण्ड  की जेलों में भेजने का फैसला किया है क्योंकि वहां उनके लिए जगह की कमी पड़ रही थी. ये जेलें नॉर्वे के नियमों के अनुसार संचालित की  जाएंगी  लेकिन इनके कर्मचारी  नीदरलैण्ड के होंगे. इससे पहले 550 बेल्जियन अपराधी  नीदरलैण्ड  की जेलों में रह रहे हैं.   

यह जानना रोचक और ज्ञानवर्धक होगा कि नीदरलैण्ड  में न सिर्फ अपराध दर में लगातार कमी आ रही है, वहां के जज लोग सजाएं देने में भी कंजूसी बरतने लगे हैं जिसके परिणामस्वरूप  अपराधियों को जेलों में औसतन कम समय बिताना पड़ रहा है. दुनिया के अन्य देशों की तुलना में नीदरलैण्ड के ड्रग कानून ज्यादा  उदार  माने जाते हैं, फलत: इस कारण जेल जाने वालों की संख्या कम हो जाती है. लेकिन ऐसा नहीं है कि नीदरलैण्ड में अपराध के आंकड़ों को कम करके  बताने के लिए लोगों को सज़ा नहीं दी जाती है. वहां वाकई गम्भीर  अपराधों में भी लगातार कमी आती जा रही है. नीदरलैण्ड में  अपराधियों को सज़ा देने की बजाय उनके  सुधार और पुनर्वास करने को तथा अपराधों को घटित होने से रोकने या उन्हें कम करने के प्रयासों को वरीयता दी जाती है और ऐसे प्रयास किये जाते हैं जिनके कारण लोग समाज की मुख्यधारा में रहते हुए और समाज के लिए उपयोगी बने रहते हुए अपने किए की सज़ा भुगतते हैं. इसके लिए वहां एक एंकल (टखना) मॉनिटरिंग की इलेक्ट्रॉनिक व्यवस्था भी चलन में है जिसके चलते राज्य को अपराधी की हलचल की जानकारी तो रहती है लेकिन उसे जेल में बन्द नहीं रखा जाता है. इस व्यवस्था का एक लाभ यह और होता है कि राज्य को किसी व्यक्ति को जेल में रखने पर जो खर्चा करना होता है वह बच जाता है. अनुमानत: एक व्यक्ति को जेल में रखने पर पचास हज़ार डॉलर प्रति वर्ष खर्च आता है. इस तरह अगर सरकार एक साल में एक हज़ार लोगों को जेल में नहीं रखती है तो वह हर साल पाँच सौ लाख डॉलर बचा लेती है जिनका बेहतर इस्तेमाल हो सकता है. सरकार के इन प्रगतिशील और उन्नत तौर तरीकों का परिणाम यह हुआ है कि नीदरलैण्ड  में प्रति एक लाख नागरिक मात्र 69 कैदी हैं. इस दर की तुलना अमरीका की दर से करने पर दो भिन्न व्यवस्थाओं का अंतर स्पष्ट हो जाता है. अमरीका में प्रति एक लाख नागरिक सात सौ सोलह कैदी हैं और यह दर दुनिया में सर्वाधिक है. अमरीका की जेलें खचाखच भरी हुई हैं और वहां की सरकार को अपने कैदियों को निजी और कॉर्पोरेट स्वामित्व वाली जेलों तक में भेजने को मज़बूर होना पड़ता है. वैसे इस तरह की निजी  जेलों में उन्हीं अपराधियों को भेजा जाता है जिनके अपराध  छोटे और इस तरह के होते हैं जिनसे कोई और प्रभावित नहीं हुआ होता है. इस तरह के अपराधों में किसी के पास थोड़ी मात्रा में ड्रग पाये जाने जैसे अपराध शामिल होते हैं.   असल में दुनिया  के ज़्यादातर देशों में अपराध के लिए दंड का प्रावधान तो है लेकिन जेल से आए हुए व्यक्ति के सुधार और पुनर्वास की समुचित व्यवस्था न होने का दुष्परिणाम यह होता है कि जेल से बाहर आया व्यक्ति फिर से जेल चला जाने को विवश हो जाता है. इस तरह अपराध का आंकड़ा लगातार बढ़ता जाता है.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 29 मार्च, 2016 को नीदरलैण्ड में अपराध कम तो जेलों पर मण्डराया ख़तरा शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, March 15, 2016

मेक्सिको पुलिस का एक अनूठा प्रयोग

जब भी पुलिस शब्द कानों में पड़ता है एक ख़ास किस्म की दृढ़ता भरी, रौब-दाब वाली छवि जेह्न में उभर आती है. पुलिस का काम ही कुछ ऐसा है कि उसकी छवि इससे इतर हो ही नहीं सकती. उसे कानून  व्यवस्था  कायम करनी होती है, अपराध पर नियंत्रण पाना होता है, नागरिकों को सुरक्षा प्रदान करनी होती है, वगैरह. और यह सब दृढ़ता के बिना मुमकिन नहीं हो सकता. लेकिन अगर कुछ समय पहले आप मेक्सिको गए होते तो आप मेरी बात से ज़रूर असहमत  होते. असल में वहां सन 2013 में एक रिटायर्ड जनरल रोनाल्डो यूजीनियो हिडाल्गो एडी ने एक ख़ास किस्म की ब्रिगेड का गठन किया था. और  जब  मेक्सिको के 57 वें राष्ट्रपति एनरिक पेना निएटो ने इस ब्रिगेड के सदस्यों के साथ खिंचाई हुई अपनी एक फोटो प्रकाशित करवाई तब से यह ब्रिगेड  चर्चाओं में आई.

असल में मेक्सिको के अकापुल्को इलाके के पुलिस चीफ ने वहां की नगरपालिका पुलिस के विस्तार के रूप में एक टूरिस्ट असिस्टेंस ब्रिगेड का गठन किया था जिसमें 18 से 28 वर्ष की वय वाली कुल 42 युवतियां शामिल थीं. इस ब्रिगेड का मुख्य दायित्व था वहां के पर्यटकों की संतुष्टि सुनिश्चित  करना. इसके लिए उन्हें वहां के समुद्र तटों की निगरानी करनी होती थी, पैदल चलने वालों की सुविधा के लिए ट्रैफिक को  नियंत्रित करना होता था और जब तक पुलिस उन्हें गिरफ्तार न कर ले तब तक अपराधियों को हथकड़ी लगाकर रखना होता और इसी तरह के अन्य दायित्वों का निर्वहन करना होता था. ये सारे काम करने  के लिए इस ब्रिगेड की सदस्याओं को आत्म रक्षा, जीवन रक्षा और भीड़ को नियंत्रित करने के लिए   मेक्सिकन फेडेरल सेना की तरफ से तीन महीने का  प्रशिक्षण दिया जाता था. इन्हें हर माह करीब साढ़े चार सौ डॉलर का वेतन दिया जाता था.

और अब ख़ास बात. इस ब्रिगेड में युवतियों को उनके शारीरिक आकर्षण के आधार पर भर्ती किया जाता था और उन्हें टाइट फिटिंग वाली यूनीफॉर्म पहननी होती  थी, जिसमें भूरे रंग के बरमूडा शॉर्ट्स, हल्के नीले रंग के पोलो शर्ट्स, गुलाबी लिपस्टिक और सनग्लासेस शामिल थे. इन्हें  4.7 इंच की हील पहननी होती थी. इस ब्रिगेड की शिफ्ट सुबह सात बजे से शुरु होती थी और सबसे पहले तीस मिनिट तक इन्हें मेक अप करना होता था, जिसके बाद म्युनिसिपल फोर्स के वरिष्ठ अधिकारी इनका  मुआयना करते.  उसके  बाद ही ये अपनी ड्यूटी पर जा सकती थीं. इस ब्रिगेड को दुनिया की सबसे ज़्यादा सेक्सी पुलिस टुकड़ी कहा और  माना जाता था. यह सुनकर भी अगर आप चौंक नहीं रहे हैं तो फिर यह और जान लीजिए कि अधिकारी गण को इस बात से कोई आपत्ति नहीं थी कि यह पुलिस टुकड़ी पर्यटकों के साथ फ्लर्ट करे, क्योंकि वे चाहते थे कि पर्यटक वहां की सुहानी यादें अपने साथ लेकर जाएं.

अब ज़रा इस सबकी पृष्ठभूमि भी जान लीजिए. दर असल मेक्सिको के इस हिस्से की अर्थव्यवस्था का अस्सी प्रतिशत पर्यटन पर आधारित है लेकिन जब से वहां ड्रग माफिया के आपसी टकरावों ने गैंग वार्स की शक्ल अख्तियार की, वहां का पर्यटन बहुत बुरी तरह से प्रभावित हुआ. तब वहां के प्रशासन को लगा कि पर्यटकों का भरोसा और उनका दिल जीतना ज़रूरी है. उन्हें यह भी लगा कि ऐसी नवाचारी पुलिस उनमें ज़िम्मेदारी और विश्वास का भाव जगा सकेगी, और महिलाओं की यह टुकड़ी शायद भ्रष्ट तौर तरीकों से भी दूरी बरतेगी. और न केवल पर्यटकों ने बल्कि खुद इन पुलिस कर्मियों ने भी इस प्रयोग की सराहना की. एक पुलिस कर्मी ने अपना अनुभव  साझा करते हुए कहा कि आप अनुमान भी नहीं लगा सकते कि कोई बेहद खतरनाक ड्राइवर भी उस वक्त कितना शालीन बन जाता है जब कोई सेक्सी लड़की उसके खिलाफ़ कार्यवाही करती है.

लेकिन मेक्सिको के उस राज्य में पुलिस की कमान जैसे ही एक नए  चीफ ने सम्हाली, यह प्रयोग बीते ज़माने की बात बना दिया गया. इस नए चीफ एडुआर्डो बाहेना ने इस  टुकड़ी की 13 कार्मिकों की तो छुट्टी ही कर दी और शेष को हुक्म दिया कि वो पुलिस की आम वर्दी पहनना शुरु कर दें. कुछ कार्मिकों ने इस बदलाव का भी स्वागत किया है. मसलन उनमें से एक, रोसा का कहना है कि जब वे उस सेक्सी यूनीफॉर्म में होती थीं तो लोग ताज्जुब करते हुए उनके पास आते थे, क्योंकि मैं  असल पुलिस वाली लगती ही नहीं थीं. अब जब मैं पुलिस की वर्दी और पुलिस के जूते पहनती हूं तो मुझे गर्व महसूस होता है. गर्व तो मुझे पहले भी था लेकिन अब वह बढ़ गया है.

होली दूर नहीं है. इसलिए अब ज़रा यह कल्पना करने का कष्ट कीजिए कि अगर कभी हमारे देश में भी ऐसा प्रयोग किया गया तो हमें  कैसी छवियां देखने को मिलेंगी?

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 15 मार्च, 2016 को मैक्सिको में सुन्दरता से अपराध पर काबू पाने का हुआ प्रयास शीर्षक से प्रकाशित  आलेख का मूल पाठ.  

Tuesday, March 8, 2016

महज़ धूल का एक कण नहीं हूं मैं

संयुक्त राज्य अमरीका के उत्तर पश्चिमी  राज्य साउथ कैरोलिना के एक हाई स्कूल में हाल में घटी घटना का वर्णन हमें काफी कुछ सोचने को विवश कर रहा  है. घटना यह है कि एक कक्षा खत्म होने और दूसरी शुरु होने के बीच के लगभग चार मिनिट के अंतराल में एक तैंतीस वर्षीय शिक्षिका अपना मोबाइल कक्षा में ही छोड़ कर किसी और काम से बाहर चली जाती है. तभी एक सोलह वर्षीय विद्यार्थी उनका मोबाइल उठाता है, उसकी सामग्री को खंगालता है और उसमें से उस अध्यापिका की चार कम वस्त्रों वाली या निर्वसन तस्वीरों को अपने मोबाइल कैमरे में कैद कर लेता है. तभी वो शिक्षिका लौट आती है. विद्यार्थी उससे कहता है कि आपके फैसले का दिन आन पहुंचा है. शिक्षिका इस बात को बहुत गम्भीरता से नहीं लेती है. लेकिन  इसके बाद वो विद्यार्थी उन चार तस्वीरों के रंगीन प्रिण्ट बनवा कर अपनी मैं’म के मेल बॉक्स में पहुंचाता है, इन तस्वीरों में से एक के पीछे वो उन्हें और उनके बेटे को धमकी का एक सन्देश भी लिख भेजता है. इसी के साथ वो विद्यार्थी उन तस्वीरों में से एक को सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों से अपने सहपाठियों के साथ साझा भी करता है. शिक्षिका बाद में बताती हैं कि उन्होंने ये सेल्फियां वैलेण्टाइन दिवस पर अपने पति को भेजने के लिए ली थीं, और उनके मोबाइल में कोई पास-कोड नहीं था.

इतना वृत्तांत बहुत आम किस्म का है. जिन लोगों का शिक्षण संस्थाओं से ज़रा भी ताल्लुक है वे जानते हैं कि विद्यार्थी इससे भी गम्भीर ‘शरारतें’ करते रहते हैं और शिक्षकगण अपनी तरह से उनका सामना भी करते रहते हैं. लेकिन यहां घटनाक्रम कुछ अलग मोड़ लेता है. वो शिक्षिका जब अपने प्रिंसिपल से इस घटना की शिकायत करती है तो उसे सलाह दी जाती है कि वो इसकी अनदेखी कर दे. लेकिन उससे अगले ही दिन उसे बुला कर कहा जाता है कि ज़िला अधीक्षक ने उसका इस्तीफा मांगा है! वो अधीक्षक से बात करके इसकी वजह जानना चाहती है तो उसे कहा जाता है  कि इस्तीफा इसलिए मांगा जा रहा है कि एक तो उसके फोन में आपत्तिजनक सामग्री थी, और दूसरे यह कि उसने यह सामग्री अपने विद्यार्थियों को सहज  सुलभ करवाई! ये अधीक्षक महोदय बाद में अपने एक बयान में कहते हैं कि सबूतों और बयानों से अनुमान होता है कि जब यह घटना घटी तब वो शिक्षिका उस जगह पर नहीं थी जहां पर उसे होना चाहिए था. इस वजह से एक विद्यार्थी ने उनके मोबाइल फोन से अनुपयुक्त सामग्री  चुरा कर उसे औरों के साथ साझा कर ली. यानि अगर वो शिक्षिका  अपने विद्यार्थियों की ठीक से निगरानी करती तो एक बहुत गम्भीर समस्या को घटित  होने से रोक सकती थी. उन्होंने यह भी कहा कि इस घटना का विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा.

इसके फौरन बाद, घटनाक्रम से क्षुब्ध होकर इस शिक्षिका ने अपना इस्तीफा दे दिया. उसकी पीड़ा यह भी थी कि स्कूल ने उस विद्यार्थी के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की. लेकिन इस्तीफा देने के अगले ही दिन उसने  यह कहते हुए इसे वापस लेने की पेशकश कर डाली कि तब मैं अपने  कैरियर के बारे में फैसला करने की सही मन:स्थिति में नहीं थी. लेकिन उसके  अनुरोध को अनसुना  किया गया.

इसके बाद जो होता है वह ग़ौर तलब है. उस इलाके के कोई ग्यारह हज़ार नागरिक एक ऑनलाइन याचिका पर दस्तखत कर प्रशासन से मांग करते हैं कि उस शिक्षिका को फिर से काम  पर लिया जाए. “जिन हालात में उन्हें बाहर किया गया है वे पूरी तरह अस्वीकार्य हैं.”  इससे उत्साहित उस शिक्षिका ने भी कहा कि “मैं जानती हूं कि मैंने कोई कानून  नहीं तोड़ा है. हम सबके मोबाइल फोनों में अनुपयुक्त तस्वीरें होती हैं. अपने पति के साथ अंतरंग रिश्ते रखना अनुचित बात नहीं है. यह भी कि वो विद्यार्थी सही और गलत का फर्क जानता है. मेरे मोबाइल से तस्वीरें निकालने और उन्हें बाहर भेजने का आखिरी  फैसला तो उसी का था.”

इससे भी अहम बात यह कि वहां के विद्यार्थियों ने भी एक ऑनलाइन याचिका  दायर की है जिसमें कहा गया है कि “यह शिक्षिका उसकी निजता पर भीषण प्रहार की शिकार है. एक विद्यार्थी ने उनकी निजी तस्वीरों को गैर कानूनी रूप से  चुराया और अपने स्कूल के दूसरे विद्यार्थियों को भेजा.” खुद उस शिक्षिका ने भी एक  बहुत महत्वपूर्ण बयान में कहा कि “अपने लिए खुद मुझी को खड़ा  होना पड़ेगा. अगर मैं इस बात को भुला दूं तो मुझे लगेगा कि मैं महज़ धूल का एक कण हूं और तब मैं अपने ज़िला कार्यालय को इस बात की इजाजत दे रही होऊंगी कि वो मुझे रौंद  डाले.”

क्या इन बातों में आपको भी एक परिपक्व और विकसित प्रजातंत्र की झलक मिलती है?

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अन्तर्गत मंगलवार, दिनांक 08 मार्च, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, March 1, 2016

बुलेट ट्रेन के साथ चला आया एक सपना!

बुलेट ट्रेन का  सपना  साकार होने का  इंतज़ार करते और रेल मंत्री जी के बजट भाषण में सन 2020 तक हर आकांक्षी को कन्फर्म्ड सीट मुहैया करवाने के आश्वासन से मुदित मेरे मन में  एक और सपना देखने की तमन्ना अंगड़ाई लेने लगी है. ख़ास बात यह कि मेरा यह सपना महज़ रेल तक सीमित नहीं है, हालांकि शुरुआत इसकी रेल से सम्बद्ध एक ख़बर को पढ़कर ही हुई है. यह खबर उसी जापान से आई है जिसके साथ भारत ने बुलेट ट्रेन के लिए एक करार पर दस्तखत किए हैं. रोचक बात यह है कि बहुत तेज़ी से घटती जा रही जन्म दर, बढ़ती जा रही वृद्ध आबादी और सन 2060 तक अपनी एक तिहाई आबादी के कम हो जाने के आसन्न संकटों ने जापान के सामने जो बहुत सारी चुनौतियां खड़ी कर रखी हैं  उनके चलते वहां खाली घरों की तादाद निरंतर बढ़ती जा रही है, कामगार घटते जा रहे  हैं और इस तरह की बातों का असर  जिन पर पड़ रहा है उनमें से एक जापान की रेल व्यवस्था भी है. बल्कि कड़वी सचाई तो यह है कि इन कारणों और जापान की बहुत कुशल तीव्र गति की रेलों के फैलाव की वजह से ग्रामीण जापान की रेल व्यवस्था बुरी तरह से चरमराने लगी है. बहुत सारे स्टेशन ऐसे हैं जहां यात्री भार इतना कम हो चुका है कि उन्हें बन्द कर देने के सिवा और कोई विकल्प ही नहीं बचा है.

जापान  के सुदूर उत्तर में एक द्वीप है होक्काइडो, जिसके निकट एंगारु नामक एक कस्बा है. पिछले कुछ बरसों में यहां से गुज़रने वाली कम से कम बीस रेलें बन्द की जा चुकी हैं.  इसी एंगारु कस्बे के नज़दीक के एक रेल्वे स्टेशन कामी-शिराताकी को भी बन्द करने की प्रक्रिया तीन बरस पहले शुरु कर दी गई थी. लेकिन इसी प्रक्रिया के दौरान जापानी रेल  अधिकारियों का ध्यान इस बात की तरफ़ गया कि  पिछले कुछ समय से एक यात्री लगभग नियमित रूप से इस स्टेशन से रेल में चढ़ता और वहीं उतरता है. अधिक पड़ताल की गई तो पता चला कि वह इकलौता यात्री और  कोई नहीं एक स्कूली छात्रा है जो इस स्टेशन से रेल में बैठकर अपने स्कूल जाती है और इसी रेल  से शाम को लौट आती है. जब जापानी रेल अधिकारियों को यह बात पता चली तो उन्होंने क्या किया? उन्होंने इस स्टेशन और इस रेल को बन्द करने के अपने निर्णय को स्थगित कर दिया. इसलिए स्थगित कर दिया ताकि वो छात्रा  निर्बाध रूप से स्कूल जा सके. जापानी रेल अधिकारियों ने फैसला किया कि यह रेल मार्च 2016 में वित्तीय वर्ष की समाप्ति तक चलती रहेगी. 2016 को इसलिए चुना गया ताकि तब तक वो लड़की  अपनी स्कूली पढ़ाई पूरी कर लेगी.  

और जैसे इतना ही पर्याप्त न हो, जापान के रेल अधिकारियों ने एक और बात की. इस रेल का टाइमटेबल उस छात्रा के स्कूल के टाइमटेबल  के अनुरूप बनाया जाता है. अगर उसका स्कूल किसी दिन बन्द है तो उस दिन रेल नहीं चलती है और अगर किसी दिन जल्दी छुट्टी होती है तो उस दिन रेल भी जल्दी आती है. इसे कहते हैं प्रशासन की संवेदनशीलता. वैसे तो अपने देश में भी प्रभावशाली जन के लिए इस तरह की ‘संवेदनशीलता’ की ख़बरें समाचार माध्यमों में आती ही रहती हैं, लेकिन एक अनाम-सी स्कूली छात्रा  के लिए इस तरह का निर्णय करने की यह अनूठी घटना हम सबके मन में एक सपना तो जगाती ही है. शायद इसी तरह के सपने की बात राष्ट्रपिता बापू ने भी हर आँख का आंसू पोंछने की तमन्ना ज़ाहिर करते हुए की थी.

जापान के रेल विभाग के इस प्रशंसनीय फैसले को उचित ही पूरी दुनिया में सराहा गया है. एक चीनी आधिकारिक प्रसारक की फेसबुक पोस्ट में जब यह बात सामने आई तो तुरंत ही इसे 5700 बार साझा किया गया और बाईस हज़ार लोगों ने इसकी सराहना की. हरेक ने  इस बात की खुले मन से सराहना की ही. एक व्यक्ति ने वहां जो लिखा, वह बहुत महत्वपूर्ण है. उसके शब्द हैं: “भला कौन होगा जो ऐसे देश के लिए जहां की सरकार एक अकेले  के लिए इतना करने को तैयार हो, अपने प्राण तक न्यौच्छावर  नहीं कर देना चाहेगा? सुशासन का असल रूप यही तो है कि वो सीधे ग्रासरूट्स  तक पहुंचे. उसके लिए हर नागरिक का महत्व होना  चाहिए. कोई बच्चा तक पीछे नहीं छूटना चाहिए!” 

हम जापान से बुलेट ट्रेन ले रहे हैं, तो उम्मीद करनी चाहिए कि उसके साथ जापानी  रेल प्रशासन की सुशासन की यह भावना भी स्वत: चली आएगी.  

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर  कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 01 मार्च, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, February 23, 2016

जाओ, पहले अपने पवित्र होने का प्रमाण पत्र लेकर आओ!

अपने देश में जारी होने वाले कुछ अजीबो गरीब फतवों और खापों के फरमानों से अगर आप पर्याप्त दुःखी न हो चुके हों तो ज़रा दूर देश के इस फैसले के बारे में भी जान लीजिए. आज मैं बात कर रहा हूं सुदूर दक्षिण अफ्रीका की जहां के क्वाज़ुलु नैटाल इलाके के एक ज़िले उथुकेले की मेयर दुदु माज़िबुको ने एक ऐसा आदेश ज़ारी किया है जो आपको सोचने को मज़बूर करेगा कि अभी इक्कीसवीं सदी चल रही है या दसवीं-बारहवीं सदी. जिस नगरपालिका की ये मेयर हैं उसने इस साल से अपने यहां के युवाओं को उच्च शिक्षा के लिए वार्षिक छात्रवृत्तियां प्रदान करने की घोषणा की थी. बताया गया कि वैसे तो यह नगरपालिका अपने इलाके के सौ से ज़्यादा विद्यार्थियों को उच्च अध्ययन के लिए यह छात्रवृत्ति प्रदान करती है लेकिन इस बरस इसमें एक और प्रावधान जोड़ कर  इसे केवल उन छात्राओं तक सीमित कर दिया गया  है जो इस आशय का प्रमाण पत्र प्रस्तुत करेंगी कि वे उस तिथि विशेष तक कुंवारी (वर्जिन) हैं. और क्योंकि इस योजना का लाभ छात्रा के शिक्षण संस्थान में अध्ययन के तमाम वर्षों तक देय है, इसे प्राप्त करने की इच्छुक  छात्रा को अपनी छात्रवृत्ति का नवीनीकरण कराने के लिए हर बरस इस आशय का  प्रमाण पत्र देना होगा.  बताया गया है कि इस बरस सोलह छात्राओं ने इस आशय का प्रमाण पत्र देकर यह छात्रवृत्ति प्राप्त कर ली है.

बहुत स्वाभाविक है कि इस आदेश पर तीव्र प्रतिक्रियाएं हुई हैं. मानव अधिकार समूहों और लैंगिक समानता के पक्षधरों ने उचित ही यह सवाल उठाया है कि कौमार्य की जांच की शर्त केवल युवतियों पर ही क्यों लागू  की जा रही है?  उन्होंने इसे व्यक्ति की निजता का हनन भी माना है. एक एक्टिविस्ट जेसिका थॉर्प ने इस भेदभाव  को भी रेखांकित किया है कि छात्रों को तो उनके कौमार्य या उसकी  अनुपस्थिति के लिए पुरस्कृत या दंडित नहीं किया जाता है जबकि छात्राओं पर यह मापदण्ड लागू किया जा रहा है. वहां के अनेक जाने-माने शिक्षाविदों ने खुलकर यह बात कही है कि सेक्सुअली  सक्रिय होने का शिक्षा ग्रहण करने से कोई सम्बन्ध नहीं है और इस कारण सेक्स को शिक्षा प्राप्त करने के अवसरों के साथ जोड़ना अनुपयुक्त है. मेयर महोदया ने अपने निर्णय को उचित ठहराते हुए कहा था  कि कौमार्य का प्रमाण देने का यह प्रावधान लड़कियों को पवित्र और सेक्सुअल गतिविधियों से दूर रखकर उन्हें अपनी पढ़ाई पर ध्यान केन्द्रित करने में मददगार साबित होगा. एक स्थानीय रेडियो स्टेशन से अपने प्रसारण में उन्होंने फरमाया, “हमारे वास्ते तो यह एक तरीका है आपको इस बात के लिए धन्यवाद देने का कि आपने अभी तक अपने आप को खुद के लिए बचाए रखा है और तब तक बचाए रखेंगी जब तक कि  आप डिग्री या प्रमाण पत्र प्राप्त नहीं कर लेतीं.”

जब मेयर महोदया के इस फैसले की ज़्यादा ही आलोचना  हुई तो उन्होंने कहा कि यह योजना तो उस इलाके में एच आई वी, एड्स और अवांछित गर्भधारण के मामलों को नियंत्रित  करने के लिए लाई गई है. वैसे, यह बात सही है कि दुनिया में एच आई वी का फैलाव दक्षिण अफ्रीका में बहुत ज़्यादा है. 2013 के आंकड़ों  के अनुसार उस देश में 63 लाख लोग इससे ग्रस्त थे. वहां के अपराध के आंकड़े बताते हैं कि साल 2014-2015 के मध्य सेक्सुअल अपराधों के 53, 617  मामले  दर्ज़  हुए थे, हालांकि जानकारों का कहना है कि असली तस्वीर तो इससे भी बुरी है.

लेकिन इन  आंकड़ों  के बावज़ूद इस बात से कोई सहमत नहीं हो पा रहा है कि मेयर महोदया का यह फरमान उचित है और इससे हालात सुधर जाएंगे.   देश के जेण्डर समानता के अध्यक्ष तक ने कह दिया है कि भले ही मेयर के इरादे नेक हों,  हम कौमार्य के आधार  पर छात्रवृत्ति देने के उनके निर्णय  से सहमत नहीं हैं. यह तो गर्भधारण और कौमार्य के आधार पर लैंगिक भेदभाव का मामला है और लड़कों के भी खिलाफ़ है.” यहीं यह बात भी ग़ौर तलब है कि दक्षिण अफ्रीका में सहमति से यौन सम्बध कायम करने की उम्र 16 बरस है और कुछ अपवादों में इसे घटाकर 12 से 16 बरस तक भी लाया जा सकता है. बल्कि इस जानकारी के सन्दर्भ में तो छात्रवृत्ति के लिए कौमार्य परीक्षण की शर्त और अधिक असंगत प्रतीत होने लगती है. यह शर्त और अधिक  हास्यास्पद इस जानकारी से भी लगने लगती है कि कौमार्य परीक्षण जुलु परम्पराओं के आधार पर किए जाने की बात कही गई है. जुलु परम्परा में यह परीक्षण वृद्धाएं करती हैं जो आम तौर पर किसी लड़की की आंखों और  उसके चलने के ढंग को देखकर ही फैसला सुना देती हैं कि वो कुमारी है या नहीं.
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगल्वार, 23 फरवरी, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Wednesday, February 17, 2016

धीरे-धीरे बोल, कोई सुन ना ले!

बहुत लम्बे अर्से तक मानवीय यौनिक (सेक्सुअल)  व्यवहार के बारे में कोई भी चर्चा किन्से रिपोर्ट्स के ज़िक्र के बग़ैर अधूरी रही है. अल्फ्रेड किन्से इण्डियाना विश्वविद्यालय में प्राणीशास्त्र के प्रोफेसर थे और इन्होंने किन्से  इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च इन सेक्स, जेण्डर एण्ड रिप्रोडक्शन की स्थापना की थी. जिन्हें किन्से रिपोर्ट्स के नाम से जाना जाता है वे दरअसल पुरुषों और स्त्रियों के यौनिक व्यवहारों का विश्लेषण करने वाली क्रमश: 1948 तथा 1953 में प्रकाशित दो अलग-अलग किताबें हैं. अपने ज़माने में किन्से की ये रिपोर्ट्स खासी विवादास्पद मानी गई थीं क्योंकि इनमें तब तक वर्जित माने जाने वाले बहुत सारे मुद्दों पर खुलकर चर्चा की गई थी.  लेकिन इन रिपोर्ट्स के छह दशक बाद पूरी दुनिया इतनी अधिक बदल चुकी है कि हर मुद्दे पर बहुत खुलकर बातें होने लगी हैं और उन बातों से आहत होना तो दूर की बात है, कोई चौंकता भी नहीं है.

किन्से ने लगभग 6000 स्त्रियों से व्यक्तिगत साक्षात्कार करने के बाद उनके यौनिक व्यवहार और इस विषयक उनकी पसन्द नापसन्द का विश्लेषण करते हुए पुरुषों और स्त्रियों की यौनिक  गतिविधियों का तुलनात्मक खाका प्रस्तुत किया था. इसे याद करते हुए हाल ही  में आए एक हज़ार से ज़्यादा स्त्रियों पर किए गए ग्लैमर सर्वे को देखें तो जहां हम यह पाते हैं कि आज का  यह सर्वे भी किन्से की इस बात से सहमति  ज़ाहिर करता है कि मानवीय यौनिक व्यवहार में एक निरंतरता होती  है लेकिन हर व्यक्ति की यौनिक पसन्द नापसन्द परिवर्तनशील होती है, वहीं इस सर्वे में भाग लेने वाली स्त्रियों में से कम से कम 63 प्रतिशत ऐसी हैं जो अपनी यौनिक पहचान को किसी एक लेबल तक सीमित नहीं रखना  चाहती हैं. इस बात को अगर थोड़ा खोलकर कहना हो तो यों कहा जा सकता है कि ये स्त्रियां केवल पुरुषों की तरफ ही नहीं, स्त्रियों की तरफ भी आकृष्ट हो सकती हैं और उनसे रिश्ते रख सकती हैं. इतना ही नहीं, इनमें से 47 प्रतिशत स्त्रियों ने तो खुलकर इस बात को स्वीकार भी किया है वे अन्य स्त्रियों की तरफ आकर्षित हुई हैं. 31 प्रतिशत ने और भी आगे बढ़ते हुए अन्य स्त्रियों के साथ यौनिक अनुभव साझा करने की बात भी स्वीकार की है. लेकिन एक मज़ेदार विरोधाभास यह भी सामने आया कि इस सर्वे  में भाग लेने वाली स्त्रियों में से 63 प्रतिशत ने यह कहा  कि वे ऐसे किसी पुरुष को डेट नहीं करेंगी जिसने किसी अन्य पुरुष के साथ दैहिक रिश्ते कायम किये हों. 

अगर आप यह सोचते हों कि यह सब तो उस पश्चिम की बातें हैं जो बहुत उदार, खुला या जो भी आप  समझते हों वो है, तो मैं बहुत विनम्रतापूर्वक  आपसे  निवेदन करना चाहूंगा कि कृपया पोर्नहब डॉट कॉम द्वारा हाल ही में जारी की गई वार्षिक रिपोर्ट पर भी एक नज़र डाल लें.  पोर्नहब दरअसल एक एडल्ट वीडियो वेबसाइट है लेकिन  हाल ही में इसने एक रिकॉर्ड लेबल लॉंच किया है, इसकी अपनी एक वस्त्र श्रंखला है, हाल ही में इसने एक स्कॉलरशिप फण्ड निर्मित किया है और एक नया अभियान बॉडी पॉजिटिव भी इसने शुरु किया है. तो इस पोर्नहब ने अपने सर्वेक्षण के आधार पर भारतीय महिलाओं को लेकर कुछ  बड़े खुलासे  किये हैं, जो काफी चौंकाने वाले हैं. पोर्नहब के अनुसार भारत की महिलाएं दुनिया में सर्वाधिक पोर्न देखने वाली महिलाओं में तीसरे स्थान पर हैं. पहले और दूसरे स्थान पर क्रमश: अमरीका और यू.के. की महिलाएं हैं. ज़ाहिर है कि कनाडा, जर्मनी फ्रांस वगैरह  सब देशों की स्त्रियां पीछे हैं. दूसरी बात यह कि औसतन दुनिया भर के पुरुषों की तुलना में भारतीय स्त्रियां पोर्न देखने में थोड़ा-सा ज़्यादा समय बिताती हैं. तीसरी और और भी अधिक चौंकाने वाली बात पोर्नहब के अपने दर्शकों के आंकड़ों के विश्लेषण के आधार पर यह है कि जहां दुनिया भर की स्त्रियां औसतन 35.3 वर्ष की उम्र में इस एडल्ट वेबसाइट पर आती हैं, भारतीय स्त्रियां 22 वर्ष की उम्र में ही आने लगती हैं. पोर्नहब ने अपने दर्शकों का लैंगिक आधार पर विश्लेषण करते हुए यह भी बताया है कि जहां पूरी दुनिया में औसतन 24% महिलाएं इस वेबसाइट को देखती हैं वहीं, भारत में यह प्रतिशत 30 है. वैसे अगर खुश होना चाहें तो यह याद कर सकते हैं कि जमैका और निकारागुआ में यह प्रतिशत क्रमश: 40 और  39 है.

किन्से रिपोर्ट और फिर ग्लैमर के सर्वे के सन्दर्भ में पोर्नहब के वार्षिक प्रतिवेदन के इन आंकड़ों की चर्चा से इतना तो स्पष्ट है कि जीवन के अंतरंग क्रियाकलापों को लेकर खुलेपन की बयार केवल कुख्यात पश्चिम में ही नहीं अपने पारम्परिक भारत में भी बहने लगी है. बेशक, यह बयार खुशी का नहीं फिक्र का ही पैगाम ला रही है.
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 16 फरवरी, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, February 9, 2016

न उनकी रस्म नई है न अपनी रीत नई!

राजनेताओं के खिलाफ़ धरने प्रदर्शन वगैरह  कोई नई बात नहीं है. उनके काम काज और फैसलों से अनगिनत लोगों की ज़िन्दगियां प्रभावित होती हैं और यह बात कभी भी सम्भव नहीं हो सकती है कि सब पर अनुकूल प्रभाव ही पड़ें. जिन्हें उनके फैसलों से लाभ होता है वे अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करने के लिए उनकी शान में जब तक सूरज चाँद रहेगा नुमा कसीदे पढ़ते हैं. लेकिन जो उनके फैसलों से प्रतिकूलत: प्रभावित होते हैं वे लिखते हैं, प्रदर्शन करते हैं, सियाही, जूता फेंकते हैं, नारे लगाते हैं..वगैरह. और सत्ता तंत्र इन तमाम विरोध प्रदर्शनों को यथासम्भव बाधित करने का प्रयास करता है. लेकिन सरकारी अमले की सारी कोशिशों के बावज़ूद अगर कोई किसी भी तरह अपना विरोध प्रदर्शन करने में कामयाब हो जाए तो पहले तो नेता जी के समर्थक उस पर अपनी ताकत का प्रयोग करते हैं और फिर सरकारी तंत्र अपनी तरह से उसे ‘देखता’  है.  यह तो कहा ही जाता है कि विरोध प्रदर्शन का यह तरीका ‘ग़ैर कानूनी’ है.

और कमोबेश जो अपने देश में होता है शायद वही दुनिया के अन्य देशों में भी होता है. यह समझ पाना मुश्क़िल है कि आखिर क्यों सरकारी तंत्र सरकार के रहनुमाओं के खिलाफ किसी भी तरह की आवाज़ को उठने नहीं देना चाहता. क्या वाकई हम सब निन्दक नियरे राखिये आँगन कुटी छवाय वाले समय से बहुत दूर निकल आए हैं? शायद ऐसा भी नहीं है. अगर ऐसा होता तो फैज़ अहमद फैज़ ने अपनी  नज़्म निसार मैं तेरी गलियों के ए वतन में  यह नहीं लिखा होता:

यूँ ही हमेशा उलझती रही है ज़ुल्म से ख़ल्क़
न उनकी रस्म नई है,     न अपनी रीत नई

ये सारी बातें मेरे जेह्न में आई सुदूर न्यूज़ीलैण्ड  की एक घटना की  खबर पढ़ते हुए. हाल ही में पूरे पाँच साल चली वार्ताओं के बाद ऑकलैण्ड में एक समझौते पर हस्ताक्षर किये गए. अमरीका की अगुआई में किए गए इस ट्रांस पैसिफिक पार्टनरशिप समझौते में अमरीका, जापान, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, मेक्सिको, वियतनाम, मलेशिया, न्यूज़ीलैण्ड, ब्रुनेई, सिंगापुर, पेरु और चिली ये बारह देश शामिल हैं और माना  जा रहा है कि यह विश्व के सबसे बड़े व्यापारिक समझौतों में से एक है. समूह में शामिल इन बारह देशों की कुल जनसंख्या करीब 80 करोड़ है और इन देशों का दुनिया की अर्थव्यवस्था में योगदान 40 प्रतिशत आंका गया है. इस प्रशांत तटीय भागीदारी समझौते का लक्ष्य सदस्य देशों के बीच व्यापार व निवेश की सभी बाधाओं को दूर करना बताया गया है.

लेकिन जिस जगह इस समझौते पर हस्ताक्षर किये गए वहां की तमाम  सड़कें हज़ारों प्रदर्शनकारियों ने जाम कर रखी थी. उनका कहना था कि इस समझौते से लोग न सिर्फ अपनी नौकरियां गंवा बैठेंगे, इन देशों की सम्प्रभुता भी खतरे में पड़ेगी. बात यहीं तक सीमित रहती तो मैं इसके बारे में लिखता भी नहीं. हुआ यह कि नॉर्थ आइलैण्ड के एक शहर वैतांगी  में  न्यूज़ीलैण्ड के आर्थिक विकास मंत्री  स्टीवन जॉयस पत्रकारों से बात करते हुए जब इस समझौते के फायदे गिना रहे थे, तभी अचानक जोसी बटलर नामक एक महिला ने गुलाबी रंग का एक डिल्डो (कृत्रिम लिंग) मंत्री  की तरफ फेंका और उस महिला का  निशाना इतना सच्चा था कि वह सीधा मंत्री महोदय के होठों से जा टकराया. उसके बाद तो जो अपने देश में होता है वही  वहां भी हुआ. पुलिस ने उस महिला को पूरी अशिष्टता से धर दबोचा, और ज़ाहिर है कि उसके बाद कानून ने अपना काम किया ही होगा. 

लेकिन तब तक मीडिया भी बीच में आ चुका था. एक साक्षात्कार में जोसी बटलर  ने कहा कि मैं यहां एक नर्स की हैसियत से हूं और मुझे रोगियों के अधिकारों  की चिंता है,  क्योंकि मुझे लगता है कि इस समझौते के बाद दवाइयां और उपचार बहुत महंगे हो जाएंगे और ज़्यादा लोग मौत की तरफ धकेले जाएंगे. इसलिए मुझे बहुत बुरा लग रहा है. एक और बयान में उसने और भी कड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कहा कि यह समझौता हमारी सम्प्रभुता के साथ बलात्कार जैसा है, यह हमारे देश के साथ बलात्कार है क्योंकि इस समझौते के द्वारा हम अपने अधिकार और अपनी आज़ादी का सौदा कर रहे हैं.

इस सारे प्रकरण में मुझे मज़ेदार लगा उन मंत्री जी का बयान. इस घटना के फौरन बाद उन्होंने पत्रकारों से कहा कि मुझे नहीं लगता कि ऐसी घटनाएं रोज़-रोज़ घटित होती हैं. कुल मिलाकर तो मुझे यह खासा मज़ाकिया लगा है. राजनीति में हर रोज़ नए अनुभव  होते हैं. जनता की सेवा का यही तो सबसे बड़ा सुफल है!” 

आप नहीं कहेंगे- थ्री चीयर्स फॉर मंत्री जी!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर में मंगलवार, 09 फरवरी, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, February 2, 2016

क्यों बदल रही है सात समन्दर पार की गुड़िया बार्बी?

1967 में रिलीज़ हुई फिल्म ‘तक़दीर’  में एक गाना था जो बहुत लोकप्रिय हुआ था:
सात समन्दर पार से  
गुड़ियों के बाज़ार से
अच्छी-सी गुड़िया लाना
गुड़िया चाहे ना लाना
पप्पा  जल्दी आ जाना!
और आज हम बात  कर रहे हैं सात समन्दर पार वाली लोकप्रिय गुड़िया बार्बी की!

छप्पन बरसों से पूरी दुनिया के गुड़िया साम्राज्य पर करीब-करीब एक छत्र राज करने वाली इस गुड़िया के रंग-रूप कद-काठी वगैरह में बहुत  बड़े बदलाव किए जा रहे हैं. इसकी निर्माता कम्पनी ने घोषणा की है कि इसी साल यानि 2016 में सात अलग-अलग रंगों की त्वचा वाली, तीस भिन्न-भिन्न  रंगों और चौबीस शैलियों की केश सज्जाओं वाली, नीली, हरी और भूरी आंखों  वाली और तीन अलग-अलग देहाकार वाली बार्बी गुड़ियाएं बाज़ार में आ जाएंगी.

कहना ग़ैर ज़रूरी है कि बार्बी की जानी-पहचानी छवि में यह बदलाव बाज़ार के दबाव में आकर  किया जा रहा है.  बावज़ूद इस बात के कि पूरी दुनिया के करीब एक सौ पचास देशों में बार्बी की दस खरब गुड़ियाएं बेची जा चुकी हैं और अब भी प्रति सैकण्ड तीन गुड़ियाएं बिकती हैं, पिछले कुछ समय से इसकी बिक्री में गिरावट देखी जा रही थी. पिछले एक दशक में पहली दफा सन 2014 में इस उत्पाद को लड़कियों के सबसे ज़्यादा बिकने वाले खिलौने के अपने गौरवपूर्ण स्थान से हाथ धोना पड़ा था. यही नहीं इस अक्टोबर माह में पूरी दुनिया में बार्बी  की बिक्री में चौदह प्रतिशत की गिरावट देखी गई.  बिक्री के अलावा, वैचारिक और सांस्कृतिक स्तर पर भी इस उत्पाद  की काफी आलोचनाएं हो रही थीं. मुस्लिम देशों में जहां इसके अल्प वस्त्रों को लेकर नाराज़गी थी वहीं विचारवान लोग इसे प्लास्टिक प्रिंसेस ऑफ कैपिटलज़्म कहकर गरियाते थे. लेकिन इसकी सबसे मुखर और तीखी आलोचना तो इसकी अयथार्थवादी देह को लेकर होती थी. साढे ग्यारह  इंच वाली मानक बार्बी डॉल को 1/6 के पैमाने पर 5 फिट 9 इंच की आंकते हुए इसे 36-18-33 के आकार की माना गया और इसकी शेष देह की तुलना में इसकी 18 इंच की कमर को अपर्याप्त माना गया. इसी आलोचना के फलस्वरूप 1997 में इसकी कमर पर कुछ और चर्बी चढ़ाई गई.

लेकिन बार्बी को असल खतरा तो हुआ 21 वीं सदी की मम्मियों की तरफ़ से. बार्बी बनाने  वाली कम्पनी  की एक उच्चाधिकारी ने स्वीकार किया कि इस सदी की ये विचारवान माताएं सामाजिक न्याय से प्रेरित  हैं और इन्हें वे उत्पाद अधिक पसन्द आते हैं जिनके पीछे कोई उद्देश्य और मूल्य हों. तानिया मिसाद नामक इस अधिकारी ने बेबाकी से स्वीकार किया कि ये मम्मियां बार्बी को इस श्रेणी में नहीं गिनती हैं. और शायद यही स्वीकारोक्ति है इस बड़े बदलाव के मूल में.

वैसे इस गुड़िया के निर्माण की कथा को जान लेना भी कम रोचक नहीं होगा. बार्बी का निर्माण करने वाली कम्पनी की स्थापना 1945 में एलियट और रुथ हैण्डलर नामक दम्पती ने अपने कैलिफोर्निया स्थित घर के गैराज में की थी. हुआ यह कि रुथ ने अपनी बेटी बार्बरा और उसकी सहेलियों को कागज़ की बनी गुड़ियाओं  से खेलते देखा. ये लड़कियां इन गुड़ियाओं के साथ डॉक्टर-नर्स, चीयरलीडर और व्यापार करने वाली स्त्रियों के बड़ी उम्र वालों के रोल प्ले करवा रही थीं. याद दिलाता चलूं कि उस ज़माने में बाज़ार में सिर्फ दुधमुंही या प्राम में घुमाई जा सकने वाली उम्र की गुड़ियाएं मिलती थीं. तो हैण्डलर ने गुड़ियाओं से खेलने वाली बच्चियों की इस  ज़रूरत को समझा कि वे अपनी तमन्नाओं को मूर्त रूप देने के लिए गुड़ियाओं का प्रयोग  करना चाहती हैं. और तब उन्होंने इस विचार के इर्द गिर्द कि स्त्री के पास भी अपने विकल्प होते हैं, अपनी गुड़िया बार्बी का निर्माण किया. यहीं एक और मज़े की बात बताता चलूं  और वह यह कि हैण्डलर दम्पती ने अपनी बार्बी का निर्माण एक जर्मन गुड़िया बाइल्ड लिली के आधार पर किया था, और भरी-पूरी देह वाली यह गुड़िया बच्चों के लिए नहीं बड़ों के लिए निर्मित थी.

क्या पता इस सबके मूल में एक बात यह भी रही हो कि बार्बी डॉल अपने समय के फैशन को इतनी बारीकी से अंगीकार करती रही है कि आज भी आप तीस-चालीस बरस पहले की बार्बी को देखकर उसकी सज्जा के आधार पर यह बता सकते हैं कि उसका निर्माण किस दशक में हुआ होगा. लेकिन इधर खुद बार्बी के देश अमरीका में और शेष दुनिया में भी स्त्री देह, सौन्दर्य और उन के प्रति नज़रियों  में तेज़ी से जो बदलाव आ रहे हैं उन्होंने बार्बी के निर्माताओं को भी इस बड़े  बदलाव के लिए मज़बूर किया है. अब यह देखना है कि क्या यह बदलाव बार्बी की बिक्री के गिरते हुए हुए ग्राफ़ को थाम पाने में कामयाब होते हैं? इससे भी महत्वपूर्ण यह देखना होगा कि विचारवान लोग इन बदलावों पर क्या कहते हैं! 
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 02 फरवरी, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.  


Wednesday, January 27, 2016

पॉप अप वेडिंग यानि कम खर्च बालानशीं

इधर अपने भारत में समाचार माध्यम महंगी डेस्टिनेशन वेडिंग्स को ख़ास अहमियत देते हैं और उनके सचित्र विस्तृत समाचार देकर कई बार साहिर  लुधियानवी को याद करने के लिए मज़बूर भी करते रहते हैं. साहिर साहब की मशहूर नज़्म है ना – एक शहंशाह ने दौलत का सहारा लेकर.... लेकिन भाई, दुनिया का चलन है. जिसकी जैसी तमन्ना, आरज़ू और हैसियत होती है वो वैसा ही करता है. और ऐसा भी नहीं है कि महंगी शादियों पर केवल हम भारतीयों का ही एकाधिकार हो. भले ही ‘फैट इण्डियन वेडिंग का लेबल हम पर चिपक गया हो, जिनके पास दौलत है वे इस मौके पर उसे दिखाने और पानी की तरह बहाने से कोई गुरेज़  नहीं करते.

लेकिन सारी दुनिया तो  उन लोगों से भरी नहीं है जिनके पास अकूत वैभव है. जिनके पास बहुत कम है वे भी किसी न किसी तरह गुज़ारा करते हैं और अपने लिए नई राहों का निर्माण भी  करते हैं. बात जब शादियों की ही चल रही है तो क्यों न पश्चिम में आए एक नए ट्रेण्ड का ज़िक्र कर लिया जाए! वहां आजकल एक नई तरह की शादी बहुत लोकप्रिय होती जा रही है. इस शादी का नाम है – पॉप अप वेडिंग. अब पश्चिम में क्योंकि ज़्यादा काम व्यावसायिक रूप से होते हैं, उधर बहुत सारी कम्पनियां खड़ी हो गई हैं जो दावा करती हैं कि उन्हें पॉप अप वेडिंग करवाने में महारत हासिल हैं. उनके विज्ञापन देखें-पढ़ें तो हर कोई पॉप अप वेडिंग के लिए लालायित हो सकता है! लेकिन पहले यह तो जान लें कि यह पॉप अप वेडिंग है क्या!

आप यह समझ लीजिए कि पॉप अप वेडिंग करवाने वाली कम्पनियां शादी करने के इच्छुक   युगल को दुनिया वालों की नज़रों से दूर जाकर यानि भागकर शादी करने का रोमांचक किंतु सुनियोजित मौका प्रदान करती है. रोमांचक और सुनियोजित के अंतर्विरोध को आप थोड़ी देर के लिए नज़र अन्दाज़ कर दीजिए.  ज़ाहिर है कि जब आप भागकर शादी करेंगे तो उसमें मेहमानों की भीड़  भी नहीं होगी, यानि खर्चा भी बहुत कम होगा. तो अगर आप बिना मेहमानों के, बिना किसी ख़ास ताम-झाम के, बिना किसी तनाव के शादी करना चाहते हैं तो पॉप अप वेडिंग आपके लिए एकदम उपयुक्त है. कम्पनी आपके लिए बहुत दिलकश विवाह-स्थल, कुशल फोटोग्राफर, सज्जाकार,  वगैरह  सब कुछ उपलब्ध करा देगी. मेहमानों पर होने वाला खर्चा आप बचा लेंगे. चाहे तो उससे दुनिया घूम लीजिए, या अपना घर खरीद लीजिए. मतलब, अगर आपके पास कुछ धन हो.

और ठीक भी है. अगर बेहद धनी अपने पैसों के बल पर शानदार विवाह कर सकते हैं तो जिनके पास उतना वैभव नहीं है वे भी क्यों न अपनी शादी को यादगार बना लें? और यहीं सामने आती हैं वे कम्पनियां जिन्हें इस तरह की पॉप अप वेडिंग कराने में महारत हासिल है! आप उन्हें मौका तो दीजिए! अब क्या हुआ जो अपनी सेवाओं के लिए आपसे वे कुछ मेहनताना ले रही हैं. आपकी भारी बचत भी तो वे कर रही हैं. उनके पास आपके लिए सब कुछ तैयार है. प्राकृतिक दृश्यावलियों के वास्तविक-से प्रतीत होते बैकड्रॉप, और उन्हें और अधिक यथार्थ दिखाने का कौशल रखने वाले फोटोग्राफर, घुमंतू विवाह वेदियां और आसानी से उपलब्ध कर्मकाण्डी. और इतना ही क्यों? अगर युगल की हसरतें वहीं जंगल में मंगल करने यानि हनीमून मनाने की जाग उठें तो उनके पास एक ऐसा केबिन भी उपलब्ध रहता है जिसमें अच्छे खासे आकार का डबल बेड समा सके.

अगर आपको यह वर्णन थोड़ा कम रोचक लग रहा हो तो चलिये बात को और आगे बढ़ाया जाए! इन वेडिंग प्लानर्स ने एक क़दम और आगे बढ़ते हुए हमारे सामूहिक विवाहों की तर्ज़ पर सामूहिक पॉप अप वेडिंग भी करवाने की शुरुआत कर दी है. ज़ाहिर है कि इसके मूल में अर्थशास्त्र ही है. इस तरह के एक अमरीकी पॉप अप वेडिंग प्लानर ने प्रचारित किया है कि जब आप उनकी सेवाएं लेने का निर्णय कर लेंगे तो मुख्य आयोजन के एक दिन पहले वे एक वेलकम पार्टी में आपका स्वागत करेंगे. उसके बाद यानि अगले और मुख्य दिन हर युगल को अलग-अलग ब्रंच पर ले जाया जाएगा और उसके फौरन बाद उन्हें एक शानदार हॉलीवुड शैली का सौन्दर्य प्रसाधन पैकेज उपलब्ध कराया जाएगा जहां उनकी उपयुक्त केश सज्जा और मेक अप किया जाएगा. और इसके बाद होगी पॉप अप वेडिंग. इसमें हर युगल विवाह वेदी तक जाकर साथ जीने-मरने की शपथ लेगा. हां, कपनी ने हर युगल को इस सरप्राइज़ आयोजन में अधिकतम 14 अतिथि लाने  की भी  अनुमति दी है.

और अब इतना और जान लीजिए कि जहां अमरीका में औसतन एक पारम्परिक विवाह  का  खर्चा 31,213 डॉलर माना जाता है, कम्पनी यह सामूहिक विवाह मात्र 5,000 डॉलर प्रति युगल में सम्पन्न करवाने का वादा कर रही है. है ना सस्ता सौदा?
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक  न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत 27 जनवरी, 2016 को पॉप् अप वेडिंग यानि कम खर्च में शादी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.     

Tuesday, January 19, 2016

एक प्रतिबन्धित किताब की रोचक दास्तान

पूरी दुनिया में ऐसी अनगिनत किताबें हैं जिन्हें विविध कारणों से प्रतिबन्धित किया गया है. प्रतिबन्ध की दो बड़ी वजहें अश्लीलता और राजनीति रही हैं, हालांकि केवल ये ही दो वजहें नहीं रही  हैं. एक समय था जब किताब का केवल भौतिक अस्तित्व हुआ करता था. तब यह प्रतिबन्ध जितना प्रभावी होता था उसकी तुलना में आज प्रतिबन्ध एक रस्म अदायगी बन कर रह गया है. इण्टरनेट के विस्तार के बाद किताब ही क्यों, प्रतिबन्धित ऐसा क्या रह गया है जो सर्व सुलभ न हो!

ऐसी ही एक प्रतिबन्धित लेकिन सर्व सुलभ पुस्तक है मॉयन काम्फ़ (हिन्दी अर्थ: मेरा संघर्ष).  नाज़ी नेता एडॉल्फ हिटलर की यह किताब जो आंशिक  रूप से उनकी आत्मकथा और आंशिक रूप से उनके बड़बोले कथनों का खज़ाना है, पहली दफा 1925 और 1927 में दो खण्डों में प्रकाशित हुई थी और उसके बाद से इसके अनगिनत वैध-अवैध संस्करण पूरी दुनिया में छपे और बिके हैं. कहा जाता है कि 1933 में हिटलर के सत्ता में आने के बाद हर नव विवाहित जोड़े को यह किताब नाज़ी  शासन की तरफ से भेंट  में दी जाती थी.  लेकिन  द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद 1945 में जर्मनी में इसे प्रतिबंधित कर दिया गया और अब भले ही यह कानूनी रूप से वहां प्रतिबन्धित नहीं रह गई है, उसके बाद से आधिकारिक रूप से इसे वहां प्रकाशित ही नहीं किया गया. लेकिन अब, बीते साल (2015)  के आखिरी दिन जर्मनी के बवेरिया  राज्य के पास इसका जो कॉपीराइट था वह सत्तर बरस पूरे कर समाप्त हो गया और इस तरह इसके पुन: प्रकाशन की राह खुल गई.

यह जानना भी कम रोचक नहीं होगा कि बावज़ूद प्रतिबन्ध के, खुद जर्मनी के स्कूलों में भी अन्य नाजी सामग्री के साथ-साथ इस किताब के अंश भी पढ़ाए जाते रहे हैं. लेकिन जब म्यूनिख़ के समकालीन इतिहास संस्थान ने इसके कॉपीराइट की अवधि पूरी होने के बाद इस किताब के एक नए, लगभग 2000 पन्नों के विस्तृत और टिप्पणी युक्त संस्करण को प्रकाशित करने की बात की तो इसके प्रकाशन के विरोध में तीव्र स्वर मुखर हो गए. स्वभावत: इस विरोध का भी विरोध हुआ.

संस्थान के अध्येताओं और इतिहासकारों ने तीन साल अनथक श्रम करके जो नया संस्करण तैयार किया उसके प्राक्कथन में हिटलर के लेखन को ‘अधपका, असंगत और अपठनीय’ कहा गया है. इन विद्वानों को इस लेखन की अनगिनत व्याकरणिक त्रुटियों ने बहुत दुःखी किया. लेकिन इसके बावज़ूद इन्होंने यह समझने और समझाने का प्रयास किया कि हिटलर ने कैसे नस्ल, स्पेस, हिंसा और तानाशाही – इन चार विचारों के आधार पर अपनी नाजी विचारधारा की नींव रखी. किताब के प्रकाशन के आलोचकों को शायद इसीलिए लगा कि हिटलर की विचारधारा को समझाने-समझाने का यह प्रयास वस्तुत: उनके कुकर्मों को मुलायम करते हुए उनकी बेहतर छवि गढ़ने का एक प्रयास है.

लेकिन दूसरे पक्ष का मानना है कि किसी किताब के प्रकाशन को रोके रखना  न तो  सम्भव है और न उचित. बवेरिया राज्य के वित्तमंत्री मार्क्स सोएडर ने कहा है कि इस पुस्तक के प्रकाशन से वे  यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि इसमें कैसी निरर्थक  बातें लिखी हुई हैं और इस तरह के खतरनाक विचारों ने किस तरह पूरी दुनिया में विपदाएं पैदा की हैं. जर्मन असोसिएशन ऑफ टीचर्स के अध्यक्ष जोसेफ क्राउस ने भी  कहा कि इस नए  संस्करण को वहां के हाई स्कूल की कक्षाओं के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए ताकि जर्मनी की नई पीढ़ी पिछली पीढ़ी द्वारा किये गए अत्याचारों को जान कर  अतिवादी सोच के खतरों के प्रति सचेत हो सके. उनका यह भी कहना था कि अगर आप किसी किताब पर रोक लगाएंगे तो तो उसके प्रति उत्सुकता और अधिक बढेगी और लोग आसानी से उपलब्ध  ऑन लाइन संस्करणों का रुख  करेंगे. इससे तो यही अच्छा होगा कि इतिहास और राजनीति के अनुभवी और प्रशिक्षित शिक्षक विद्यार्थियों को इस किताब का परिचय दें.

तो, मॉयन काम्फ़ का यह नया, सुसम्पादित और विस्तृत टिप्पणियों युक्त संस्करण अंतत: मूल देश जर्मनी में प्रकाशित हो गया है और जो प्रारम्भिक खबरें आ रही हैं उनके अनुसार लगभग पाँच किलो वज़न वाला और उनसाठ यूरो (एक यूरो लगभग  74 रुपये के बराबर है) की अच्छी खासी कीमत वाला यह संस्करण प्रकाशकों की उम्मीदों से भी अधिक बिक रहा है. खबर यह भी आई है कि प्रकाशन पूर्व ही पन्द्रह हज़ार प्रतियों का आदेश मिल जाने की वजह से प्रकाशकों को इसके चार हज़ार प्रतियों के प्रथम मुद्रणादेश के भी बढ़ाना पड़ा था और जारी होने के कुछ ही घण्टों बाद अमेज़ॉन  की जर्मन साइट पर यह अनुपलब्ध था.

क्या इस बात से किताब जैसी चीज़ पर प्रतिबन्ध लगाने वाले कुछ सबक लेंगे?  
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 19 जनवरी, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.    

Tuesday, January 12, 2016

गोरे रंग पे न इतना गुमान कर......

यह दुनिया भी अजीब है. जहां भारत सहित अधिकांश एशियाई देशों में गोरी चमड़ी के प्रति अतिरिक्त आकर्षण देखने को मिलता है वहीं उन देशों में जहां चमड़ी प्राकृतिक रूप से गोरी होती है लोग धूप में बैठ बैठकर और विभिन्न प्रकार के  लोशनों आदि का प्रयोग कर उसे ताम्बई रंगत देते हैं.  एक मार्केट रिसर्च कम्पनी ग्लोबल इण्डस्ट्री एनालिस्ट इनकॉर्पोरेटेड ने अनुमान लगाया है कि पूरी दुनिया में वर्ष 2020 तक त्वचा के रंग को हल्का बनाने वाले उत्पादों का कारोबार 23 बिलियन डॉलर्स तक जा पहुंचेगा और उसमें सबसे बड़ी भागीदारी एशिया पैसिफिक क्षेत्र के देशों की होगी. अपने देश में हम आए दिन ऐसे विज्ञापनों से रू-बरू होते रहते हैं जो यह दावा करते हैं कि उनके इस्तेमाल से आपकी  त्वचा का रंग गोरा हो जाएगा.  ये विज्ञापन दाता अपनी बात को वज़न देने के लिए किसी न किसी तरह गोरे रंग की महत्ता को रेखांकित करना भी नहीं भूलते हैं.

लेकिन हाल ही में जब थाइलैण्ड  की एक सौन्दर्य प्रसाधन निर्माता कम्पनी सिओल सीक्रेट ने अपने एक ऑनलाइन विज्ञापन में वहीं की जानी-मानी एक्ट्रेस क्रिस होरवांग के चेहरे को अश्वेत रंग में दर्शाया और उसकी तुलना एक गोरी चमड़ी वाली स्त्री से करते हुए उसे कमतर बताया तो हंगामा खड़ा हो गया. थाई नागरिक इस बात से तो नाराज़ हुए ही कि उनकी प्रिय एक्ट्रेस के चेहरे को  अश्वेत बना दिया गया था,  उन्हें इस वीडियो के नारे “विजेता होने के लिए आपका गोरा होना ज़रूरी है”  पर भी गम्भीर आपत्ति थी. थाई जनता की ये आपत्तियां इतनी पुरज़ोर थीं कि इस कम्पनी को न सिर्फ अपना यह विज्ञापन वापस लेना  पड़ा, उन्हें एक बयान भी जारी करना पड़ा. वैसे बयान था बड़ा मज़ेदार. कम्पनी ने कहा, “भेदभावपूर्ण  या नस्लीय सन्देश देने का हमारी कपनी का कोई इरादा नहीं था. हम तो बस यह कहना चाह रहे थे कि व्यक्तित्व, अपीयरेंस, दक्षताओं और प्रोफेशनिलिटी के सन्दर्भ में आत्म सुधार की बहुत अधिक महत्ता है.” 

इस विज्ञापन से आहत लोगों को स्वभावत: इस स्पष्टीकरण से संतोष नहीं हुआ और उनमें से बहुतों ने सोशल मीडिया पर इस आशय की टिप्पणियां कीं  कि इस तरह के टूटे-फूटे बहानों से काम नहीं चलने  वाला है. जैसा इस तरह के सारे मुद्दों पर होता है, कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्हें यह सारी बहस बेमानी लग रही थी और उनका कहना था  कि भाई, अगर आपको त्वचा को गोरा करने वाले उत्पादों पर आपति है तो उन्हें मत खरीदिये. झगड़े की क्या बात है? ऐसे लोगों को कम्पनी के इस प्रचार वीडियो में  कुछ भी आपत्तिजनक नहीं लगा.
अगर हम इस विवाद से बाहर निकलकर इसी देश यानि थाइलैण्ड में इस तरह के उत्पादों के विज्ञापनों का अतीत खंगालें तो पाएंगे कि यह अपनी तरह का पहला मामला नहीं है. वैसे तो बहुत बड़ी बहु राष्ट्रीय कम्पनियां अपने सौन्दर्य (यानि गोरा बनाने वाले) उत्पादों के विज्ञापन के लिए रेडिएंस और परफेक्ट जैसे शब्दों का चालाकीपूर्ण उपयोग करती ही रही हैं, खुद उस देश की अनेक कम्पनियां भी अपने उत्पादों को बेचने  के लिए पक्के रंग की चमड़ी  वाली युवतियों और स्त्रियों का उपहास करती रही हैं. दरअसल थाइलैण्ड में गहरे रंग की चमड़ी का रिश्ता किसानों और श्रमिकों से कायम किया जाता है. समाज के निचले तबके के इन लोगों को तेज़ धूप में अनथक श्रम करना होता है जिससे इनकी चमड़ी झुलस कर पक्के रंग की हो जाती  है. समाज के ऊंचे तबके के लोग सुरक्षित माहौल में रहते हैं और इस वजह से उनकी चमड़ी का रंग उजला बना रहता है. विज्ञापनों आदि के द्वारा सारा माहौल गोरी चमड़ी के पक्ष में तैयार कर दिया गया है और लोग तथा खास तौर पर स्त्रियां अप्रामाणिक, अवैध और चमड़ी को गोरा बनाने के मिथ्या दावे करने वाले उत्पादों के प्रयोग का खतरा उठाते रहते हैं.  सन 2012  में वहां एक कम्पनी ने तो उस वक़्त हद्द ही कर दी थी जब उसने अपने एक उत्पाद के विज्ञापन में यह दावा किया था कि उसके इस्तेमाल से स्त्री देह के अंतरंग हिस्सों की त्वचा चमकदार और पारभासी (ट्रांसलुसेण्ट) हो जाएगी.   

अभी  दो बरस पहले ही वहां की एक कम्पनी के पेय पदार्थ के एक विज्ञापन चेहरे मोहरे और बोलने के लहज़े से एक व्यक्ति को अफ्रीकी मूल का दर्शाते हुए उसकी बेटी को इस पेय पदार्थ के पीने से काली से गोरी होते हुए दर्शाया गया था. इसी तरह जब वहां की एक कम्पनी ने उन विद्यार्थियों को नकद धनराशि देने का वादा किया जो उसके उत्पादों के प्रयोग से अपनी चमड़ी को गोरा बना लेंगे तो इसका भी पुरज़ोर विरोध किया गया था.


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अयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 12 जनवरी, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.