Tuesday, February 9, 2016

न उनकी रस्म नई है न अपनी रीत नई!

राजनेताओं के खिलाफ़ धरने प्रदर्शन वगैरह  कोई नई बात नहीं है. उनके काम काज और फैसलों से अनगिनत लोगों की ज़िन्दगियां प्रभावित होती हैं और यह बात कभी भी सम्भव नहीं हो सकती है कि सब पर अनुकूल प्रभाव ही पड़ें. जिन्हें उनके फैसलों से लाभ होता है वे अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करने के लिए उनकी शान में जब तक सूरज चाँद रहेगा नुमा कसीदे पढ़ते हैं. लेकिन जो उनके फैसलों से प्रतिकूलत: प्रभावित होते हैं वे लिखते हैं, प्रदर्शन करते हैं, सियाही, जूता फेंकते हैं, नारे लगाते हैं..वगैरह. और सत्ता तंत्र इन तमाम विरोध प्रदर्शनों को यथासम्भव बाधित करने का प्रयास करता है. लेकिन सरकारी अमले की सारी कोशिशों के बावज़ूद अगर कोई किसी भी तरह अपना विरोध प्रदर्शन करने में कामयाब हो जाए तो पहले तो नेता जी के समर्थक उस पर अपनी ताकत का प्रयोग करते हैं और फिर सरकारी तंत्र अपनी तरह से उसे ‘देखता’  है.  यह तो कहा ही जाता है कि विरोध प्रदर्शन का यह तरीका ‘ग़ैर कानूनी’ है.

और कमोबेश जो अपने देश में होता है शायद वही दुनिया के अन्य देशों में भी होता है. यह समझ पाना मुश्क़िल है कि आखिर क्यों सरकारी तंत्र सरकार के रहनुमाओं के खिलाफ किसी भी तरह की आवाज़ को उठने नहीं देना चाहता. क्या वाकई हम सब निन्दक नियरे राखिये आँगन कुटी छवाय वाले समय से बहुत दूर निकल आए हैं? शायद ऐसा भी नहीं है. अगर ऐसा होता तो फैज़ अहमद फैज़ ने अपनी  नज़्म निसार मैं तेरी गलियों के ए वतन में  यह नहीं लिखा होता:

यूँ ही हमेशा उलझती रही है ज़ुल्म से ख़ल्क़
न उनकी रस्म नई है,     न अपनी रीत नई

ये सारी बातें मेरे जेह्न में आई सुदूर न्यूज़ीलैण्ड  की एक घटना की  खबर पढ़ते हुए. हाल ही में पूरे पाँच साल चली वार्ताओं के बाद ऑकलैण्ड में एक समझौते पर हस्ताक्षर किये गए. अमरीका की अगुआई में किए गए इस ट्रांस पैसिफिक पार्टनरशिप समझौते में अमरीका, जापान, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, मेक्सिको, वियतनाम, मलेशिया, न्यूज़ीलैण्ड, ब्रुनेई, सिंगापुर, पेरु और चिली ये बारह देश शामिल हैं और माना  जा रहा है कि यह विश्व के सबसे बड़े व्यापारिक समझौतों में से एक है. समूह में शामिल इन बारह देशों की कुल जनसंख्या करीब 80 करोड़ है और इन देशों का दुनिया की अर्थव्यवस्था में योगदान 40 प्रतिशत आंका गया है. इस प्रशांत तटीय भागीदारी समझौते का लक्ष्य सदस्य देशों के बीच व्यापार व निवेश की सभी बाधाओं को दूर करना बताया गया है.

लेकिन जिस जगह इस समझौते पर हस्ताक्षर किये गए वहां की तमाम  सड़कें हज़ारों प्रदर्शनकारियों ने जाम कर रखी थी. उनका कहना था कि इस समझौते से लोग न सिर्फ अपनी नौकरियां गंवा बैठेंगे, इन देशों की सम्प्रभुता भी खतरे में पड़ेगी. बात यहीं तक सीमित रहती तो मैं इसके बारे में लिखता भी नहीं. हुआ यह कि नॉर्थ आइलैण्ड के एक शहर वैतांगी  में  न्यूज़ीलैण्ड के आर्थिक विकास मंत्री  स्टीवन जॉयस पत्रकारों से बात करते हुए जब इस समझौते के फायदे गिना रहे थे, तभी अचानक जोसी बटलर नामक एक महिला ने गुलाबी रंग का एक डिल्डो (कृत्रिम लिंग) मंत्री  की तरफ फेंका और उस महिला का  निशाना इतना सच्चा था कि वह सीधा मंत्री महोदय के होठों से जा टकराया. उसके बाद तो जो अपने देश में होता है वही  वहां भी हुआ. पुलिस ने उस महिला को पूरी अशिष्टता से धर दबोचा, और ज़ाहिर है कि उसके बाद कानून ने अपना काम किया ही होगा. 

लेकिन तब तक मीडिया भी बीच में आ चुका था. एक साक्षात्कार में जोसी बटलर  ने कहा कि मैं यहां एक नर्स की हैसियत से हूं और मुझे रोगियों के अधिकारों  की चिंता है,  क्योंकि मुझे लगता है कि इस समझौते के बाद दवाइयां और उपचार बहुत महंगे हो जाएंगे और ज़्यादा लोग मौत की तरफ धकेले जाएंगे. इसलिए मुझे बहुत बुरा लग रहा है. एक और बयान में उसने और भी कड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कहा कि यह समझौता हमारी सम्प्रभुता के साथ बलात्कार जैसा है, यह हमारे देश के साथ बलात्कार है क्योंकि इस समझौते के द्वारा हम अपने अधिकार और अपनी आज़ादी का सौदा कर रहे हैं.

इस सारे प्रकरण में मुझे मज़ेदार लगा उन मंत्री जी का बयान. इस घटना के फौरन बाद उन्होंने पत्रकारों से कहा कि मुझे नहीं लगता कि ऐसी घटनाएं रोज़-रोज़ घटित होती हैं. कुल मिलाकर तो मुझे यह खासा मज़ाकिया लगा है. राजनीति में हर रोज़ नए अनुभव  होते हैं. जनता की सेवा का यही तो सबसे बड़ा सुफल है!” 

आप नहीं कहेंगे- थ्री चीयर्स फॉर मंत्री जी!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर में मंगलवार, 09 फरवरी, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 
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