Tuesday, February 2, 2016

क्यों बदल रही है सात समन्दर पार की गुड़िया बार्बी?

1967 में रिलीज़ हुई फिल्म ‘तक़दीर’  में एक गाना था जो बहुत लोकप्रिय हुआ था:
सात समन्दर पार से  
गुड़ियों के बाज़ार से
अच्छी-सी गुड़िया लाना
गुड़िया चाहे ना लाना
पप्पा  जल्दी आ जाना!
और आज हम बात  कर रहे हैं सात समन्दर पार वाली लोकप्रिय गुड़िया बार्बी की!

छप्पन बरसों से पूरी दुनिया के गुड़िया साम्राज्य पर करीब-करीब एक छत्र राज करने वाली इस गुड़िया के रंग-रूप कद-काठी वगैरह में बहुत  बड़े बदलाव किए जा रहे हैं. इसकी निर्माता कम्पनी ने घोषणा की है कि इसी साल यानि 2016 में सात अलग-अलग रंगों की त्वचा वाली, तीस भिन्न-भिन्न  रंगों और चौबीस शैलियों की केश सज्जाओं वाली, नीली, हरी और भूरी आंखों  वाली और तीन अलग-अलग देहाकार वाली बार्बी गुड़ियाएं बाज़ार में आ जाएंगी.

कहना ग़ैर ज़रूरी है कि बार्बी की जानी-पहचानी छवि में यह बदलाव बाज़ार के दबाव में आकर  किया जा रहा है.  बावज़ूद इस बात के कि पूरी दुनिया के करीब एक सौ पचास देशों में बार्बी की दस खरब गुड़ियाएं बेची जा चुकी हैं और अब भी प्रति सैकण्ड तीन गुड़ियाएं बिकती हैं, पिछले कुछ समय से इसकी बिक्री में गिरावट देखी जा रही थी. पिछले एक दशक में पहली दफा सन 2014 में इस उत्पाद को लड़कियों के सबसे ज़्यादा बिकने वाले खिलौने के अपने गौरवपूर्ण स्थान से हाथ धोना पड़ा था. यही नहीं इस अक्टोबर माह में पूरी दुनिया में बार्बी  की बिक्री में चौदह प्रतिशत की गिरावट देखी गई.  बिक्री के अलावा, वैचारिक और सांस्कृतिक स्तर पर भी इस उत्पाद  की काफी आलोचनाएं हो रही थीं. मुस्लिम देशों में जहां इसके अल्प वस्त्रों को लेकर नाराज़गी थी वहीं विचारवान लोग इसे प्लास्टिक प्रिंसेस ऑफ कैपिटलज़्म कहकर गरियाते थे. लेकिन इसकी सबसे मुखर और तीखी आलोचना तो इसकी अयथार्थवादी देह को लेकर होती थी. साढे ग्यारह  इंच वाली मानक बार्बी डॉल को 1/6 के पैमाने पर 5 फिट 9 इंच की आंकते हुए इसे 36-18-33 के आकार की माना गया और इसकी शेष देह की तुलना में इसकी 18 इंच की कमर को अपर्याप्त माना गया. इसी आलोचना के फलस्वरूप 1997 में इसकी कमर पर कुछ और चर्बी चढ़ाई गई.

लेकिन बार्बी को असल खतरा तो हुआ 21 वीं सदी की मम्मियों की तरफ़ से. बार्बी बनाने  वाली कम्पनी  की एक उच्चाधिकारी ने स्वीकार किया कि इस सदी की ये विचारवान माताएं सामाजिक न्याय से प्रेरित  हैं और इन्हें वे उत्पाद अधिक पसन्द आते हैं जिनके पीछे कोई उद्देश्य और मूल्य हों. तानिया मिसाद नामक इस अधिकारी ने बेबाकी से स्वीकार किया कि ये मम्मियां बार्बी को इस श्रेणी में नहीं गिनती हैं. और शायद यही स्वीकारोक्ति है इस बड़े बदलाव के मूल में.

वैसे इस गुड़िया के निर्माण की कथा को जान लेना भी कम रोचक नहीं होगा. बार्बी का निर्माण करने वाली कम्पनी की स्थापना 1945 में एलियट और रुथ हैण्डलर नामक दम्पती ने अपने कैलिफोर्निया स्थित घर के गैराज में की थी. हुआ यह कि रुथ ने अपनी बेटी बार्बरा और उसकी सहेलियों को कागज़ की बनी गुड़ियाओं  से खेलते देखा. ये लड़कियां इन गुड़ियाओं के साथ डॉक्टर-नर्स, चीयरलीडर और व्यापार करने वाली स्त्रियों के बड़ी उम्र वालों के रोल प्ले करवा रही थीं. याद दिलाता चलूं कि उस ज़माने में बाज़ार में सिर्फ दुधमुंही या प्राम में घुमाई जा सकने वाली उम्र की गुड़ियाएं मिलती थीं. तो हैण्डलर ने गुड़ियाओं से खेलने वाली बच्चियों की इस  ज़रूरत को समझा कि वे अपनी तमन्नाओं को मूर्त रूप देने के लिए गुड़ियाओं का प्रयोग  करना चाहती हैं. और तब उन्होंने इस विचार के इर्द गिर्द कि स्त्री के पास भी अपने विकल्प होते हैं, अपनी गुड़िया बार्बी का निर्माण किया. यहीं एक और मज़े की बात बताता चलूं  और वह यह कि हैण्डलर दम्पती ने अपनी बार्बी का निर्माण एक जर्मन गुड़िया बाइल्ड लिली के आधार पर किया था, और भरी-पूरी देह वाली यह गुड़िया बच्चों के लिए नहीं बड़ों के लिए निर्मित थी.

क्या पता इस सबके मूल में एक बात यह भी रही हो कि बार्बी डॉल अपने समय के फैशन को इतनी बारीकी से अंगीकार करती रही है कि आज भी आप तीस-चालीस बरस पहले की बार्बी को देखकर उसकी सज्जा के आधार पर यह बता सकते हैं कि उसका निर्माण किस दशक में हुआ होगा. लेकिन इधर खुद बार्बी के देश अमरीका में और शेष दुनिया में भी स्त्री देह, सौन्दर्य और उन के प्रति नज़रियों  में तेज़ी से जो बदलाव आ रहे हैं उन्होंने बार्बी के निर्माताओं को भी इस बड़े  बदलाव के लिए मज़बूर किया है. अब यह देखना है कि क्या यह बदलाव बार्बी की बिक्री के गिरते हुए हुए ग्राफ़ को थाम पाने में कामयाब होते हैं? इससे भी महत्वपूर्ण यह देखना होगा कि विचारवान लोग इन बदलावों पर क्या कहते हैं! 
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 02 फरवरी, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.  


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