Tuesday, March 29, 2016

बन्द करनी पड़ रही हैं जेलें क्योंकि घट रहे हैं अपराध!

एक तरफ जहां दुनिया के ज़्यादातर देश इस बात से त्रस्त हैं उनकी जेलों में जगह कम पड़ती जा रही है वहां एक देश ऐसा भी है जिसका संकट भिन्न और कम से कम हमारे लिए तो कल्पनातीत है. लगभग 170 लाख की आबादी वाला देश नीदरलैण्ड इस बात से परेशान है कि उसकी जेलों में जितने लोगों के लिए स्थान है उससे बहुत कम लोग उनमें बन्द हैं, और इस कारण सरकार को बेवजह जेलों का व्यय भार वहन करना पड़ रहा है. नीदरलैण्ड  की जेलों में कुल चौदह हज़ार कैदियों  के लिए जगह है जबकि वहां कैदियों  की संख्या ग्यारह हज़ार छह सौ ही  है. और यह स्थिति आज ही नहीं पैदा हुई है.  कम कैदियों की वजह से वहां  खाली  पड़ी  जेलों को बन्द करने का सिलसिला 2004 से ही जारी है.  2009 में वहां आठ जेलों को बन्द किया गया और फिर 2013 में उन्नीस और जेलों को बन्द करना पड़ा था. अब पाँच और जेलों को बन्द किए जाने की चर्चा ज़ोरों पर है.  लेकिन जेलों को बन्द करने से एक अन्य समस्या पैदा हो जाती है. बन्द की गई जेलों के कर्मचारियों को कहां समायोजित किया जाए? अभी वहां जितनी जेलें खाली पड़ी हैं अगर उन सबको  बन्द कर दिया  जाए तो करीब दो हज़ार लोग बेकार हो जाएंगे.  ऐसे में नीदरलैण्ड  सरकार ने एक दिलचस्प क़दम उठाया है. कदम है अपनी जेल सुविधाओं की आउटसोर्सिंग. अभी कुछ ही समय पहले  नॉर्वे ने अपने एक हज़ार से ज़्यादा कैदी नीदरलैण्ड  की जेलों में भेजने का फैसला किया है क्योंकि वहां उनके लिए जगह की कमी पड़ रही थी. ये जेलें नॉर्वे के नियमों के अनुसार संचालित की  जाएंगी  लेकिन इनके कर्मचारी  नीदरलैण्ड के होंगे. इससे पहले 550 बेल्जियन अपराधी  नीदरलैण्ड  की जेलों में रह रहे हैं.   

यह जानना रोचक और ज्ञानवर्धक होगा कि नीदरलैण्ड  में न सिर्फ अपराध दर में लगातार कमी आ रही है, वहां के जज लोग सजाएं देने में भी कंजूसी बरतने लगे हैं जिसके परिणामस्वरूप  अपराधियों को जेलों में औसतन कम समय बिताना पड़ रहा है. दुनिया के अन्य देशों की तुलना में नीदरलैण्ड के ड्रग कानून ज्यादा  उदार  माने जाते हैं, फलत: इस कारण जेल जाने वालों की संख्या कम हो जाती है. लेकिन ऐसा नहीं है कि नीदरलैण्ड में अपराध के आंकड़ों को कम करके  बताने के लिए लोगों को सज़ा नहीं दी जाती है. वहां वाकई गम्भीर  अपराधों में भी लगातार कमी आती जा रही है. नीदरलैण्ड में  अपराधियों को सज़ा देने की बजाय उनके  सुधार और पुनर्वास करने को तथा अपराधों को घटित होने से रोकने या उन्हें कम करने के प्रयासों को वरीयता दी जाती है और ऐसे प्रयास किये जाते हैं जिनके कारण लोग समाज की मुख्यधारा में रहते हुए और समाज के लिए उपयोगी बने रहते हुए अपने किए की सज़ा भुगतते हैं. इसके लिए वहां एक एंकल (टखना) मॉनिटरिंग की इलेक्ट्रॉनिक व्यवस्था भी चलन में है जिसके चलते राज्य को अपराधी की हलचल की जानकारी तो रहती है लेकिन उसे जेल में बन्द नहीं रखा जाता है. इस व्यवस्था का एक लाभ यह और होता है कि राज्य को किसी व्यक्ति को जेल में रखने पर जो खर्चा करना होता है वह बच जाता है. अनुमानत: एक व्यक्ति को जेल में रखने पर पचास हज़ार डॉलर प्रति वर्ष खर्च आता है. इस तरह अगर सरकार एक साल में एक हज़ार लोगों को जेल में नहीं रखती है तो वह हर साल पाँच सौ लाख डॉलर बचा लेती है जिनका बेहतर इस्तेमाल हो सकता है. सरकार के इन प्रगतिशील और उन्नत तौर तरीकों का परिणाम यह हुआ है कि नीदरलैण्ड  में प्रति एक लाख नागरिक मात्र 69 कैदी हैं. इस दर की तुलना अमरीका की दर से करने पर दो भिन्न व्यवस्थाओं का अंतर स्पष्ट हो जाता है. अमरीका में प्रति एक लाख नागरिक सात सौ सोलह कैदी हैं और यह दर दुनिया में सर्वाधिक है. अमरीका की जेलें खचाखच भरी हुई हैं और वहां की सरकार को अपने कैदियों को निजी और कॉर्पोरेट स्वामित्व वाली जेलों तक में भेजने को मज़बूर होना पड़ता है. वैसे इस तरह की निजी  जेलों में उन्हीं अपराधियों को भेजा जाता है जिनके अपराध  छोटे और इस तरह के होते हैं जिनसे कोई और प्रभावित नहीं हुआ होता है. इस तरह के अपराधों में किसी के पास थोड़ी मात्रा में ड्रग पाये जाने जैसे अपराध शामिल होते हैं.   असल में दुनिया  के ज़्यादातर देशों में अपराध के लिए दंड का प्रावधान तो है लेकिन जेल से आए हुए व्यक्ति के सुधार और पुनर्वास की समुचित व्यवस्था न होने का दुष्परिणाम यह होता है कि जेल से बाहर आया व्यक्ति फिर से जेल चला जाने को विवश हो जाता है. इस तरह अपराध का आंकड़ा लगातार बढ़ता जाता है.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 29 मार्च, 2016 को नीदरलैण्ड में अपराध कम तो जेलों पर मण्डराया ख़तरा शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 
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