Tuesday, April 29, 2014

एक सच्चे पुस्तक प्रेमी को नमन!

इस सप्ताह मुझे एक विलक्षण व्यक्तित्व और उनके प्रेरणादायी कृतित्व के बारे में जानने का मौका मिला. मैं उनसे इतना अधिक प्रभावित हुआ हूं कि इस सप्ताह का अपना यह कॉलम उन्हीं की स्मृति को समर्पित कर रहा हूं.

मुझे जयपुर लाइब्रेरी एण्ड इंफोर्मेशन सोसाइटी ने विश्व पुस्तक दिवास और किन्हीं स्वर्गीय मास्टर मोती लाल जी संघी की 139 वीं जयंती पर उनके द्वारा स्थापित श्री सन्मति पुस्तकालय में ‘पुस्तकों और सूचना स्रोतों के बदलते स्वरूप’ पर व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया गया था. मैं स्वीकार करता हूं कि इस आयोजन में जाने से पहले मुझे स्व. मास्टर जी के बारे में कोई जानकारी नहीं थी. लेकिन वहां उनके बारे में जो जानकारी मुझे मिली, और फिर वहां से मिली पाठ्य सामग्री से उनके बारे में जो कुछ मैंने जाना, उसे आपसे साझा करना बहुत ज़रूरी लग रहा है.

मोती लाल जी का जन्म 25 अप्रेल 1876 को चौमू के एक सामान्य परिवार में हुआ था. छठी कक्षा तक की पढ़ाई करने के बाद वे जयपुर आ गए और यहां से मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की और फिर इण्टरमीजिएट तक पढ़े. अपनी पढ़ाई अधबीच में छोड़ पहले तो उन्होंने जीवन निर्वाह के लिए ट्यूशनें कीं और फिर कई स्कूलों में नौकरियां कीं. साठ साल की उम्र पूरी करने पर 30 साल की सरकारी नौकरी पूरी करने के बाद जब वे रिटायर हुए तो उनकी पेंशन बीस रुपये प्रतिमाह थी.

अपनी नौकरी के दौरान ही गणित विषय के इन  मास्टर साहब को पुस्तकों से प्यार हो गया था और वे हर महीने कम से कम दस रुपये किताबों पर खर्च करने लगे थे. बहुत जल्दी उनके पास किताबों का एक अच्छा खासा संग्रह हो गया और उससे उन्होंने 1920 में अपने घर के पास सन्मति पुस्तकालय की स्थापना कर दी. अपनी नौकरी से बचे वक़्त में वे अपने दोस्तों और परिचितों के घर अपने पुस्तकालय की पुस्तकें लेकर जाते और उनसे उन्हें पढ़ने का अनुरोध करते. एक निश्चित समय के बाद वे उनके पास पहले दी गई किताब वापस लेने और नई किताब देने जाते. इस बीच अगर कोई वह किताब न पढ़ पाता तो वे उसे पढ़ने के लिए प्रेरित भी करते.

अपने रिटायरमेण्ट के बाद तो वे पूरी तरह से इस पुस्तकालय के ही होकर रह गए. उनका सारा समय पुस्तकालय में ही गुज़रता,  सिर्फ भोजन करने ही अपने घर जाते. संसाधनों का अभाव था, इसलिए इस पुस्तकालय के पितु मातु सहायक स्वामी सखा सब कुछ वे ही थे. वे ही बाज़ार  जाकर किताबें खरीदते, उनको रजिस्टर में दर्ज़ करते, उनपर कवर चढ़ाते, पाठकों को इश्यू करते, और लौटी हुई किताबों को जमा करते. अगर ज़रूरत होती तो पाठक के घर किताब पहुंचाने में भी वे संकोच  नहीं करते.

उनके पास जितने साधन थे उनके अनुसार वे नई किताबें खरीदते और पाठकों को सुलभ कराते. अगर ज़रूरत पड़ती तो किसी किताब की सौ तक प्रतियां भी वे खरीदते ताकि पाठकों की मांग की पूर्ति हो सके. उनके जीवन काल में इस पुस्तकालय में तीस हज़ार किताबें हो गई थीं. पुस्तकालय के संचालन के बारे में उनका अपना मौलिक और व्यावहारिक सोच था. नियम कम से कम थे. सदस्यों से न कोई प्रवेश शुल्क लिया जाता, न कोई मासिक या वार्षिक शुल्क, यहां तक कि कोई सुरक्षा राशि भी नहीं ली जाती थी. कोई पाठक जितनी चाहे किताबें इश्यू करवा सकता था. और जैसे इतना ही काफी न हो, किताब कितने दिनों के लिए इश्यू की जाएगी, इसकी भी कोई सीमा नहीं थी. उन्हें किसी अजनबी और ग़ैर सदस्य को भी किताब देने में कोई संकोच नहीं होता था. आपको किताब पढ़नी है तो रजिस्टर में अपना नाम पता लिखवा दीजिए और किताब ले जाइये! मास्टर मोती लाल जी का निधन 1949 में हुआ. लेकिन उनका बनाया श्री सन्मति पुस्तकालय अब भी उसी शान और उसी सेवा भाव से पुस्तक प्रेमियों की सेवा कर रहा है.

निश्चय ही आज के सन्मति पुस्तकालय के पीछे राज्य सरकार का वरद हस्त है और मास्टर साहब के प्रशंसक दानियों की उदारता का भी इसमें काफी बड़ा योगदान है. पुस्तकालय एक बड़े पाठक समुदाय  की निस्वार्थ सेवा कर रहा है. समय के अनुसार इसने अपनी सेवाओं में काफी बदलाव और परिष्कार भी किया है.  लेकिन मैं तो यहां मास्टर साहब और उनके जज़्बे को सलाम करना चाहता हूं. कहने की ज़रूरत नहीं कि जिस हिन्दी पट्टी में हम पुस्तक संस्कृति के अभाव का रुदन करते नहीं थकते हैं उसी पट्टी के बीच में रहकर, अपने अत्यल्प साधनों के बल पर उस सामान्य व्यक्ति ने जो कुछ कर दिखाया वह हमें न केवल आश्वस्त करता है, प्रेरित भी करता है कि अगर हम भी ठान लें तो अपने परिवेश को बदल  सकते हैं.

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर में मंगलवार दिनांक 29 अप्रेल, 2014 को 'आधी कमाई से किताबें खरीद बनाया पुस्तकालय' शीर्षक से प्रकाशित लेख का मूल पाठ! 

Tuesday, April 22, 2014

क़िस्सा एक अति उत्साही शायर का

आज आपसे एक पुराना अनुभव साझा कर रहा हूं.  बात काफी पुरानी है. मैं एक कस्बाई कॉलेज में हिन्दी प्राध्यापक था और जैसा कि हिन्दी प्राध्यापकों के साथ आम तौर पर होता है, जहां भी कोई संयोजन वगैरह करना  होता, मुझे याद कर  लिया जाता था. उस कस्बे में हर बरस शिक्षक दिवस और कौमी एकता दिवस  पर जन सम्पर्क विभाग एक छोटी-मोटी कवि गोष्ठी  आयोजित करता था, जिसे सम्मानपूर्वक कवि सम्मेलन कहकर पुकारा जाता था. कस्बे के और आस-पास के तमाम नवोदित, उभरते हुए, स्थापित और वरिष्ठ कवि-शायर वगैरह इनमें शिरकत करते. वो ज़माना टेलीविज़न के आने से पहले का था और उस छोटे कस्बे  में लोगों के पास मनोरंजन के दूसरे कोई खास विकल्प भी नहीं थे इसलिए श्रोता भी काफी  जुट जाते थे. अब कह सकता हूं कि अगर तीस  कवि-शायर इनमें सहभागिता करते तो उनमें से दो-तीन ही स्तरीय होते, शेष तो बस होते थे!

उस साल भी,  पिछले कई सालों की तरह शिक्षक दिवस पर कवि गोष्ठी का संचालन करने का दायित्व मुझे ही दिया गया था. कुछ कवि-शायरों से मैंने अनुरोध किया था कि वे अपनी रचनाएं सुनाएं, और बहुतों ने मुझसे अनुरोध किया था कि वे भी अपनी रचना सुनाना चाहते हैं. इस तरह रचना पाठ करने वालों की काफी बड़ी लिस्ट हो गई थी. छोटे कस्बों की परम्परानुसार मां सरस्वती की तस्वीर के आगे दीप प्रज्ज्वलन और मुख्य अतिथि की शान में कसीदे वगैरह पढ़ने के बाद गोष्ठी शुरु हुई. उस दिन मुख्य अतिथि को फूलों की माला नहीं पहनाई जा सकी, क्योंकि बाज़ार  में उस दिन ढूंढे से भी फूल माला नहीं मिल सकी थी. उसकी बजाय उन्हें रेशम की वो चमकीली माला पहना कर काम चलाया गया, जो आम तौर पर देवताओं की तस्वीर पर लटकाने के काम  आती है. मुख्य अतिथि जी ने उस माला को देखकर नाक भौं भी सिकोड़ी थी,  जिस पर कार्यक्रम प्रभारी स्थानीय जन सम्पर्क अधिकारी  ने उनके कान में सफाई देते हुए क्षमा याचना भी कर ली थी. 

गोष्ठी ठीक ही चल रही थी. मैं एक-एक करके कवियों-शायरों को बुलाता जा रहा था. पहले मैं कवि का नाम पुकारता, उनका संक्षिप्त परिचय देता और फिर उनसे रचना पाठ का आग्रह करता. अगर श्रोताओं को उनकी रचनाएं ज़्यादा पसन्द आतीं और वे उनसे और सुनाने  की फरमाईश करते तो मैं भी उनसे एक और रचना सुनाने का अनुरोध  कर देता, जिसे वे सहर्ष स्वीकार करते अन्यथा मैं उनकी पठित रचनाओं पर एक संक्षिप्त रस्मी प्रशंसात्मक टिप्पणी करते हुए अगले कवि का नाम पुकार लेता. 

इस बार अपनी लिस्ट में से मैंने एक नए शायर को पुकारा. मैंने उन्हें पहले कभी नहीं सुना था, हालांकि वैसे मैं उन्हें जानता था क्योंकि  उस छोटे कस्बे में सभी सबको जानते थे. वे मंच पर आए और उस ज़माने के एक लोकप्रिय फिल्मी गाने ‘दिल के अरमां आंसुओं में बह गए’ की धुन पर कोई तुकबन्दी जैसी चीज़ उन्होंने पढ़ी. उनकी वो रचना  ख़त्म होती, उससे पहले अचानक सामने से एक नौजवान दौड़ता हुआ आया और उनके गले में ताज़ा गुलाब के फूलों की एक माला डाल कर लौट गया. श्रोताओं के एक समूह ने उनसे एक और रचना सुनाने का आग्रह किया और उन्होंने बिना संयोजक की तरफ देखे, फौरन अपनी दूसरी रचना जो शायद उससे भी बुरी थी, सुनाना शुरु कर दिया. इस रचना  पाठ के दौरान उसी तरह चार बार और उनको मालाएं पहनाई गईं.  मुख्य अतिथि जी कुपित निगाहों से पी आर ओ साहब को देख रहे थे और उनकी आंखें कह रही थीं कि तुम तो कह रहे थे कि फूलों की मालाएं नहीं मिलीं, फिर ये कहां से आ गईं? उधर मैं उन कूड़ा रचनाओं से तंग आ रहा था. लेकिन श्रोताओं के समने कोई तमाशा न करना मेरी विवशता थी. जैसे ही उन शायर महोदय ने अपनी दूसरी रचना ख़त्म की, मैंने ज़रा भी मोहलत दिए बग़ैर, एकदम से उनको धन्यवाद देकर वह प्रकरण ख़त्म करना चाहा, लेकिन उनके चाहने वाले पुरज़ोर अन्दाज़ में ‘वंस मोर’ ‘वंस मोर’ चिल्लाने लगे. बात को सम्हालने  की गरज़ से मैंने श्रोताओं  से कहा कि मैं उनकी गुणग्राहकता का आदर करता हूं और यह विश्वास दिलाता हूं कि गोष्ठी के अगले दौर में इन शायर महोदय से आपको और भी रचनाएं  सुनवाऊंगा, लेकिन अभी तो आप हमारी गोष्ठी के अगले कवि जी को सुनिये. और जैसे-तैसे करके वो गोष्ठी ख़त्म हुई.

मुझे बाद में पता चला कि उन शायर महोदय का अपने चाहने वालों से इस बात पर काफी झगड़ा हुआ कि उन्होंने पैसे तो दस मालाओं दिये थे लेकिन पांच ही मालाएं क्यों पहनाई गईं! उधर, चाहने वालों का कहना था कि उन्होंने कुछ मालाएं उनकी तीसरी रचना के लिए बचा कर रखी थी, लेकिन उनके प्रयोग का मौका ही नहीं आया.  

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़  टुडै में  मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 22 अप्रेल, 2014 को फूलों की माला और वंस मोर की तुकबन्दी शीर्षक से प्रकाशित मनोरंजक संस्मरण का मूल पाठ. 

Wednesday, April 16, 2014

आंखों देखी बनाम कानों सुनी


अभी कल ही हैदराबाद से एक बहुत पुराने मित्र का बड़ा आत्मीयता भरा पत्र आया. उन्होंने एक अखबार की कतरन संलग्न करते हुए लिखा कि वे शीर्षक देख कर इस ‘आंखों देखी’ नामक फिल्म को देखने गए, लेकिन निराश हुए. निराश होने की वजह यह थी कि शीर्षक से उन्हें लगा था कि यह फिल्म मेरी इसी से मिलते-जुलते शीर्षक (आंखन देखी) वाली किताब पर आधारित होगी, जबकि वास्तव में ऐसा नहीं था. वैसे यह फिल्म ‘आंखों देखी’ इधर की सबसे ज़्यादा चर्चित और प्रशंसित फिल्मों में से एक है. फिल्म की प्रशंसा देश में ही नहीं विदेश में भी हुई है. इसे साउथ एशियन इण्टरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में बेस्ट फीचर फिल्म का ऑडिएंस अवार्ड भी मिला है और अब इसे 12 वें एनुअल इंडियन फिल्म फेस्टिवल ऑफ लॉस एंजेलिस (आईएफएफएलए) के अंतर्गत लॉस एंजेलिस में भी दिखाया जाएगा.

फिल्म की कहानी बड़ी रोचक है. पुरानी दिल्ली की एक संकड़ी गली के दो कमरों और एक दालान वाले छोटे-से मकान में पचास पार के बाऊजी अपने भरे-पूरे परिवार के साथ रहते हैं. जगह कम है लेकिन परिवार खुश है. हालात कुछ ऐसे बनते हैं कि बाऊजी एक दिन अचानक यह तै कर लेते हैं कि वो सिर्फ उसी बात पर यकीन करेंगे जो उन्होंने अपनी आंखों से देखी होगी. और इसके बाद उनकी ज़िंदगी दुश्वार होने लगती है. वे यह मानने को तैयार नहीं हैं कि भारत का प्रधान मंत्री कौन है, वे यह मानने को तैयार नहीं है कि आज कौन-सा वार है, वे यह मानने को तैयार नहीं हैं कि पृथ्वी गोल है, क्योंकि उन्हें लगता है कि अगर वे किसी गोले पर चलें तो गिर पड़ेंगे. वे यह भी मानने को तैयार नहीं हैं कि शेर दहाड़ता है, क्योंकि उन्होंने उसे कभी दहाड़ते हुए नहीं सुना है. वे अपनी ट्रेवल एजेण्ट की नौकरी छोड़ देते हैं क्योंकि वे किसी को एम्सटर्डम यात्रा का प्लान इसलिए नहीं बेच पाते हैं कि वे खुद कभी वहां नहीं गए हैं. उनका परिवार उनसे तंग आने लगता है. उधर उनका छोटा भाई ऋषि जिसे वे बेहद चाहते हैं, सपरिवार उनका घर छोड़ कर दूसरी जगह रहने चल जाता है. इस बात से बाऊजी बहुत आहत होते हैं और बीमार पड़ जाते हैं. जब उनकी पत्नी यह कहती है कि उनकी असली बीमारी तो यह है कि वे बोलते बहुत ज़्यादा हैं, तो वे बोलना भी बंद कर देते हैं. लेकिन इससे उन्हें लगता है कि वे चीज़ों पर ज़्यादा अच्छी तरह ध्यान केंद्रित कर पा रहे हैं.

और इसी के साथ, कुछ लोगों को यह भी लगता है कि उनकी बात में दम है, और वे एक पहुंचे हुए इंसान हैं. वे उनके अनुयायी बन जाते हैं. फिल्म में काफी कुछ घटित होता है. उस सबकी चर्चा यहां अनावश्यक है.
मैं तो यह सोच रहा हूं कि अगर हम सब भी अपनी ज़िंदगी का मूल मंत्र इस बात को बना लें कि जो अपनी आंखों से देखेंगे उसी पर विश्वास करेंगे तो क्या होगा? क्या ऐसी कोई ज़िद करने से ज़िंदगी सहज स्वाभाविक रूप से चल सकती है? कल्पना कीजिए कि कोई आपसे पूछे कि आपके पिता कौन थे, तो आप क्या जवाब देंगे? अगर आपकी यह ज़िद आपके स्कूली जीवन में ही शुरु हो जाए तो आपकी पढ़ाई का क्या होगा? इतिहास में तो आप कभी पास हो ही नहीं सकेंगे. आपने न अकबर को देखा है न अशोक को! कमोबेश भूगोल का भी यही हाल होगा. जब इस फिल्म के बाऊजी ही पृथ्वी को गोल नहीं मानते हैं तो आप भला क्यों मानने लगे?

मज़ेदार हालात तो चुनाव के दौरान पैदा होंगे. कल्पना कीजिए कि तमाम लोग इस बात का निर्वाह कर रहे हैं जो उन्होंने अपनी आंखों से देखा है वही कहेंगे और उसी पर भरोसा करेंगे, तो हमारे चुनावों के सबसे बड़े मुद्दों में से एक, भ्रष्टाचार तो जड़-मूल से ही ख़त्म हो जाएगा. आखिर किसने किसका भ्रष्टाचार देखा है? मैं तो सोच-सोचकर हैरान और हलकान हूं कि अगर ऐसा हो जाए तो चुनाव लड़ा किन बातों पर जाएगा? इस बात पर कि दो उम्मीदवारों में से कौन ज़्यादा गोरा या कौन ज़्यादा फिट है? हो सकता है तब दो या दो से ज़्यादा उम्मीदवारों के बीच खाने-पीने की या कुश्ती की प्रतियोगिता रखी जाए और इन्हीं आधारों पर उनकी जीत-हार घोषित की जाए! वैसे, अगर ऐसा हो जाए तो बुरा भी क्या है? आज चुनावों में जो कटुता, कर्कशता, भोण्डापन, भद्दापन, बदमज़गी बढ़ते जा रहे हैं, उनसे तो निज़ात मिलेगी!

आपका क्या ख़याल है?
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, दिनांक 15 अप्रेल, 2014 को जब ज़िद ने कर दिया जीना दुश्वार शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.

Tuesday, April 8, 2014

जो आपकी फिक्र करते हैं उन्हें हमारा सलाम!

जयपुर ट्रैफिक पुलिस ने फेस बुक पर एक छोटी-सी वीडियो क्लिप ज़ारी की है. यह  क्लिप कहती है कि सड़क पार करने के दो तरीके होते हैं. और फिर यह  उन दो तरीकों के नमूने पेश करती है.  मात्र एक मिनिट नौ सेकण्ड की इस क्लिप में पहले एक नौजवान जयपुर के भारी ट्रैफिक के बीच अपनी बाइक पर आड़े तिरछे कट मारता हुआ सड़क पार करता है. इस तरह के जां बाजों से हम रोज़ रू-बरू होते हैं!  लेकिन जयपुर ट्रैफिक पुलिस ने इस तरह के बहादुरों की शान में यह वीडियो क्लिप जारी नहीं की है. जिनकी शान में यह क्लिप जारी की गई है उनका प्रवेश थोड़ी देर से  होता है. ये भी चार पैर वाले हैं. पहले जो वीर आए थे दो पैर उनके थे और दो उनकी बाइक के. अब इस क्लिप में जो आते हैं, चारों पैर उनके अपने हैं. नहीं समझे ना आप? जयपुर ट्रैफिक के इस नायक को हम श्वान उर्फ कुत्ते जी के नाम से जानते हैं. ये सड़क पर आते हैं, दांये-बांये देखते हैं, लाल बत्ती होने और ट्रैफिक रुकने का इंतज़ार करते हैं, फिर सावधानी  से आधी सड़क पार करते हैं, ट्रैफिक  के लिए लाइट हरी हो जाने पर ऐन चौराहे पर रुकते हैं, लाइट लाल होने का इंतज़ार  करते हैं और फिर जब लाइट लाल हो जाती है तो बची हुई आधी सड़क पार करते हैं.

इस  क्लिप में जो नौजवान है उसकी बाइक सामने से आती एक कार से टकराती है  और जिस तरह वो और उनकी बाइक उछलते हैं उससे आशंका होती है कि बाद में उनके साथ ज़रूर कुछ अघटनीय घटित हुआ होगा. हमारे यहां एक मुहावरा है ना कि कुत्ते की मौत मरना!....लेकिन इस क्लिप में जो कुत्ता है वो सुरक्षा से सड़क पार कर जाता  है और उसके साथ कुछ भी अप्रिय घटित नहीं होता है.

इस वीडियो को देखकर मुझे कई सबक मिले हैं. पहला सबक तो यह है कि अगर आप कुत्ते की मौत न मरना चाहें तो कुत्ते की तरह सड़क पार करें! दूसरा यह कि बहादुरी से सड़क इंसान ही पार कर सकता है, कुत्ता तो भीषण डरपोक प्राणी है. ऐसा जीना भी क्या जीना, लल्लू! तीसरा यह कि अगर ग़ालिब आज होते तो इस वीडियो को देखकर ज़रूर लिखते  – आदमी से बेहतर है कुत्ता बनना.... क्योंकि इसमें मिलती हैं लाइक्स ज़्यादा!

जबसे यह वीडियो देखा है, मैं गहरे विचार में डूबा हूं! आखिर जयपुर ट्रैफिक पुलिस को हमें शिक्षा देने के लिए तमाम प्राणियों में से यह श्वान ही क्यों मिला? चाहते तो हाथी को भी ले सकते थे. आपको पता ही होगा कि संस्कृत कवियों ने गज गामिनियों की शान में कितने कसीदे पढ़े हैं! अगर आपने संस्कृत राम: रामौ रामा:  से आगे न भी पढ़ी हो तो उन  विख्यात चित्रकार के बारे में तो ज़रूर पढ़ा सुना होगा जो कभी माधुरी दीक्षित पर मर मिटे थे. उन्होंने ‘गज गामिनी’  नाम से एक पूरी फिल्म ही बना डाली थी! चलो, हमारी ट्रैफिक पुलिस को हाथी पसंद नहीं आया तो कोई बात नहीं! वे जंगल के राजा को ले सकते थे! अगर उन्होंने शेर को फिल्म में लेकर हमें सीख दी होती तो हम गर्व से यह तो कहते कि भाई हम शेर की तरह सड़क पार करते  हैं!  लेकिन गर्व करने का यह मौका भी उन्होंने हमसे छीन लिया. इन्होंने आदर्श बनाया भी तो उस प्राणी को जिसे प्राय: एक प्राकृतिक कृत्य के संदर्भ में दीवारों पर अमर किया जाता रहा है: देखो! अमुक यह कर रहा है! क्या अब लज्जित करने के लिए उसी तर्ज़ पर यह कहा जाएगा कि देखो आदमी सड़क पार कर रहा है?

अब आप ही बताएं कि एक श्वान को हम अपना आदर्श कैसे मान लें? क्या लोगों से जाकर यह कहें कि इंसान की तरह ज़िंदा रहने के लिए हम कुत्ते की तरह सड़क पार करते हैं? कुत्ते की तरह सड़क पार करके ज़िंदा रहने से क्या कुत्ते की मौत मर जाना बेहतर नहीं होगा? और जीकर भी क्या होगा? अगर ज़िंदा रह भी गए तो कोई यमला पगला दीवाना आकर हमारा खून ही तो पियेगा! साथ में एक दो गालियां और देगा!

लेकिन मित्रों यह सब बैठे ठाले का चिंतन था. कभी-कभार दिमाग में ख़लल आ जाता है ना! सच तो यह है कि जयपुर ट्रैफिक पुलिस की यह वीडियो हमें बेहद पसंद आई है और  हम चाहते हैं कि हर नागरिक न सिर्फ इसे देखे, बल्कि इससे सबक भी ले! इंसान की ज़िंदगी बहुत कीमती है, हमें कोई हक़ नहीं है कि हम उसे नष्ट करें! अगर जयपुर ट्रैफिक पुलिस हमारी ज़िंदगी को लेकर इतनी फिक्रमंद है तो हम उनके सोच को सलाम करते हैं!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै  में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत दिनांक 08 अप्रेल, 2014 को प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, April 1, 2014

कई रस हैं बनारस में

जबसे भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार ने अपना 2014 का लोकसभा का चुनाव बनारस से लड़ने की घोषणा की है,  देश के प्राचीनतम और पवित्रम नगरों में से एक यह नगर एक बार फिर से दुनिया भर के मीडिया के आकर्षण का केंद्र बन गया है. लेकिन ऐसा नहीं है कि काशी और वाराणसी  के नामों से भी जाना जाने वाला यह शहर इससे पहले कम महत्वपूर्ण था. बल्कि सच तो यह है कि राजनीति के गर्दो-गुबार ने इस शहर के समृद्ध  अतीत को थोड़ा धूमिल ही किया है. और इसी से याद आता है कि यह नगर नई कविता के बहुत महत्वपूर्ण कवि धूमिल का भी था. जी हां, वे ही धूमिल जिनके कविता संग्रह  ‘संसद से सड़क तक’  के बगैर आधुनिक हिंदी कविता की कोई तस्वीर बनती ही नहीं है.  बीट जनरेशन के अमरीकी यहूदी  कवि एलेन गिंसबर्ग ने इसी शहर में रहकर अपना महत्वपूर्ण सृजन किया और साठ के दशक में यह शहर दुनिया भर के हिप्पियों वगैरह के आकर्षण का केंद्र बना रहा. इस शहर का महत्व तो इतना ज़्यादा रहा है कि इसके नाम पर लोग अपने बच्चों के नाम रखते थे जैसे- बनारसी दास या काशीनाथ.

और बात जब साहित्य की आ ही गई है तो यह भी याद कर लेना चाहिए कि गोस्वामी तुलसीदास ने अपना रामचरितमानस इसी नगर में लिखा था और कबीर भी यहीं हुए थे. और ये ही क्यों, रविदास और कबीर के गुरु रामानंद भी तो यहीं के थे. हिंदी साहित्य के आधुनिक काल  की शुरुआत जिनसे होती है वे भारतेंदु हरिश्चंद्र और उनके लगभग समकालीन राजा शिवप्रसाद सितारेहिंद, जासूसी तिलस्मी उपन्यासों के सर्जक देवकीनंदन खत्री, महान आलोचक रामचंद्र शुक्ल, कथा सम्राट प्रेमचंद, कामायनीकार जयशंकर प्रसाद और हमारे समय के एक बहुत बड़े कथाकार-निबंधकार-आलोचक आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, कथाकार  शिवप्रसाद सिंह और ललित निबंधकार विद्यानिवास मिश्र  उन महान साहित्यकारों में से कुछ हैं जो बनारस में हुए. 

बात अगर भारतीय शास्त्रीय संगीत की करें तो बनारस घराने के इस शहर ने पण्डित रवि शंकर और उस्ताद बिस्मिल्लाह खान जैसे भारत रत्नों  के अलावा  पण्डित ओंकारनाथ   ठाकुर, गिरिजादेवी, सिद्धेश्वरी देवी, अनोखे लाल, सामता प्रसाद उर्फ गुदई महाराज, कण्ठे  महाराज, राजन और साजन मिश्र, सितारा देवी, गोपीकृष्ण जैसे अनेक संगीत रत्न दिये हैं. कला प्रेमियों और इतिहास वेत्ताओं की जब भी याद आएगी, राय कृष्णदास और उनके सुयोग्य पुत्र आनंद कृष्ण के साथ-साथ बी एच यू परिसर में स्थित उनका भारत भवन याद आए बगैर नहीं रहेगा. और बी एच यू की बात करेंगे तो भला उसके निर्माता मदन मोहन मालवीय को कोई कैसे याद नहीं करेगा?

हिंदी फिल्मों और फिल्मकारों को भी इस शहर ने खूब आकर्षित किया है. अगर ‘डॉन’  में अमिताभ बच्चन ने इसी शहर का पान खा कर अपनी अकल का ताला खोला तो ‘खुल्लम खुल्ला’  में गोविंदा को अपनी नायिका के लिए यहां के पान की उपमा ही सबसे अच्छी लगी – ये लड़की नहीं ये बनारस का पान है. पान के अलावा, हमारे फिल्मकारों को जब भी ठगी की कोई कहानी पसंद आई तो उन्हें बनारस ही याद आया. बनारसी ठगों की कारगुज़ारियों पर आधारित 1968 की दिलीप कुमार-संजीव कुमार अभिनीत ‘संघर्ष’  हो या बाद की ‘बनारसी बाबू’, ‘बनारसी ठग’  या ‘दो ठग’ – ये सब बनारस की एक  खास तरह की छवि सामने लाने वाली फिल्में रहीं. ‘यमला पगला दीवाना’ - पार्ट 1 और पार्ट 2   के ठगों ने भी अपने उल्टे सीधे कामों के लिए बनारस की धरती को ही उपयुक्त पाया. लेकिन इधर के फिल्मकारों को इस शहर की याद प्रेम के संदर्भ में भी आने लगी  है. सुमधुर गाने ‘बनारसिया’  वाली धनुष और सोनम की प्रेम कहानी ‘रांझणा’  की कथा भूमि  बनारस ही है और थोड़ा समय पहले आई ‘बनारस अ मिस्टिक लव स्टोरी’ और आने वाली ‘इसक तेरा’   के केंद्र में भी बनारस ही था और है. और हां, ‘राम तेरी गंगा मैली’, ‘लागा चुनरी में दाग’ और विवादित फिल्म ‘वॉटर’ की नायिकाओं की दुर्दशा का भी कोई न कोई सम्बंध इसी शहर से जुड़ता है.

अब जबकि देश की तमाम चुनावी हलचलों के केंद्र में यह पवित्र नगर है, यह याद दिलाता चलूं कि इसी नगर के एक कथाकार शिव प्रसाद मिश्र ‘रुद्र’ काशिकेय ने अपने  एक उपन्यास ‘बहती गंगा’ में  इस नगर के दो सौ बरसों के इतिहास को अनूठे अंदाज़ में समेटा है और इसी नगर के एक अन्य नामचीन कथाकार काशीनाथ सिंह  की किताब ‘काशी का अस्सी’  अपने विलक्षण अंदाज़े बयां और इस  शहर को एक अलग नज़र से देखने और दिखाने के लिए चुनाव हो चुकने के बरसों बाद भी याद रखी जाएगी. फिलहाल तो देखना यह है कि क्या आने वाले चुनाव  उन हालात को थोड़ा भी बदल पाने में कामयाब होंगे, जिनसे क्षुब्ध होकर  कभी धूमिल को लिखना पड़ा था कि
क्या आज़ादी सिर्फ़ तीन थके हुए रंगों का नाम है 
जिन्हें एक पहिया ढोता है 
या इसका कोई खास मतलब होता है?

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत 01 अप्रेल, 2014 को 'क्या गुल खिलाएगा 'धूमिल' का शहर बनारस'   शीर्षक से प्रकाशित आलेख  मूल पाठ.  

Tuesday, March 25, 2014

सलाम कीजिए...आली जनाब आए हैं!

कमलेश्वर के उपन्यास ‘काली आंधी’ पर आधारित ‘आंधी’  फिल्म में गुलज़ार साहब का लिखा हुआ एक गीत था: ‌'सलाम कीजिए..आली जनाब आए हैं. ये पाँच सालों का देने हिसाब आए हैं..' .  इन दिनों चारों तरफ़ इन्हीं  आली जनाबों की धूम है. लेकिन एक फर्क़ है. फर्क़ यह है कि आजकल आली जनाब अपने पांच सालों का हिसाब देने की बजाय दूसरों के पांच सालों का हिसाब मांगने में ज़्यादा रुचि लेते हैं. वैसे इससे कोई ज़्यादा फर्क़ नहीं पड़ता. ये लोग आपस में ही एक दूसरे को इतना बेपर्दा किए दे रहे हैं कि हिसाब देने न देने की कोई अहमियत नहीं रह गई है. इन सबके बारे में जान कर बेचारा मतदाता शायर खलिश बडौदरा की तरह सोच रहा है: ऐसे-वैसे कैसे-कैसे हो गए/ कैसे-कैसे ऐसे-वैसे हो गए! 

चुनाव के दिनों में जो कुछ भी होता है वो सब हो रहा है. जनता या देश की सेवा के लिए अपनी भूली-बिसरी ललक का यकायक याद आ जाना, टिकिटों  के लिए मारा-मारी, रूठना-मनाना, एक से दूसरे दल में आना-जाना, एक चुनाव क्षेत्र की भरपूर सेवा कर लेने के बाद दूसरे चुनाव क्षेत्र का रुख करना, कहीं टिकिट लेने के लिए तो कहीं टिकिट न लेने के लिए अजीबो-गरीब तर्क देना, अपनी कमीज़ को दूसरों की  कमीज़ से उजला बताना, अपने दागों को अच्छा साबित करना – सब कुछ हो रहा है.

इनमें से हरेक अपनी जीत के प्रति पूरी तरह आश्वस्त है, या कम से कम आश्वस्त होने का दिखावा  कर रहा है, ताकि माहौल  बना रहे. टिकिट मिल जाने के बाद अपने समर्थकों के साथ जुलूस में जाकर नामांकन पत्र  दाखिल किए जाएंगे और उसके बाद पूरी विनम्रता से मतदाता को एहसास कराया जाएगा कि ‘पितु मातु सहायक स्वामी सखा’ जो भी हो तुम्हीं हो. तुम्हीं  मेरे मंदिर, तुम्हीं  देवता हो. कम से कम वोटिंग मशीन पर बटन दबाने तक तो हो ही. बाद की बाद में देखी जाएगी. फिर तुम कहां, हम कहां! ढूंढते रह जाओगे!

यह सब पिछले चुनावों में भी हुआ था, उससे पिछले में भी, उससे भी पिछले में भी, और इंशाअल्लाह आगे भी होता रहेगा. और इस सबके बीच हमारा जनतंत्र परिपक्व होता रहेगा, आगे बढ़ता रहेगा, मज़बूत होता रहेगा. हम सब भी इन  सबका भरपूर आनंद लेते हैं. जब हम लोग छोटे थे तब राजनीतिक दलों वाले बिल्ले वगैरह बांटा करते थे और हम बच्चे बड़ी हसरत भरी निगाहों से दाताओं को ताका करते थे. अब जीवन स्तर ऊंचा उठ गया है, उनका भी और हमारा भी. आज बच्चे, कम आय वालों की बस्तियों के बच्चे  तक,  बिल्लों जैसी तुच्छ  चीज़ों के लिए नहीं भागते हैं. निर्वाचन विभाग ने उम्मीदवारों द्वारा किए जाने वाले खर्च की सीमा यों ही तो नहीं बढ़ाई है. चुनाव बहुत तेज़ी से हाई टेक हुए हैं. हाई टेक भी और हाई प्रोफाइल भी. अब उम्मीदवार मतदाता के दर पर आने की जहमत भी कम ही उठाते हैं. इसकी जगह बड़ी सभाओं, उनके लाइव टेलीकास्टों और सोशल मीडिया के भरपूर प्रयोग ने ले ली है. प्रचार के तरीके अधिक परिष्कृत और अधिक अप्रत्यक्ष होते जा रहे हैं. इन तमाम बातों का असर यह ज़रूर हो रहा है कि अब कम साधन सम्पन्न उम्मीदवार या दल के लिए चुनाव  जीतना तो दूर, लड़ना भी दुश्वार होता जा रहा है. बात सब ‘आम’  की करते हैं, लेकिन होते ख़ास हैं. वो दिन हवा हुए जब लोग साइकिल पर घूम कर या ज़्यादा से ज़्यादा किसी जर्जर जीप पर सवार  होकर चुनाव जीत लिया करते थे. अब नेता तो  दूर रहा, कार्यकर्ता भी इन विनम्र  साधनों से काफी ऊपर उठ चुका है.

बदलाव पर आप चाहे जितना रोना-धोना कर लें, या शालीन भाषा में कहें तो विमर्श कर लें, वो होकर रहता है. उसे रोक पाना नामुमकिन होता है. लेकिन इन तमाम  बदलावों के बीच एक बात अभी भी जस की तस है, और वो है नेता और जनता का रिश्ता. आपने मरहूम अहमद फ़राज़ साहब की ये ग़ज़ल ज़रूर सुनी होगी. तमाम नामचीन गायकों ने इसे गाया है. एक दफ़ा फिर इस ग़ज़ल के चंद अशआरों को सुनिये और सुनते हुए महबूब की बजाय अपने लीडर का तसव्वुर कीजिए. शायद कुछ मज़ा आए:

रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ
आ, फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ

पहले से मरासिम[1] न सही, फिर भी कभी तो
रस्मो-रहे-दुनिया ही निभाने के लिए आ

किस-किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम
तू मुझसे ख़फ़ा है, तो ज़माने के लिए आ 

अब तक दिले-ख़ुशफ़हम[2] को हैं तुझसे उमीदें
ये आख़िरी शम्ऐं भी बुझाने के लिए आ

जैसे तुम्हें आते हैं न आने के बहाने 
ऐसे ही किसी रोज़ न जाने के लिए आ



[1] मेल-जोल
[2] शीघ्र बात समझ जाने वाला दिल
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत 25 मार्च, 2014 को प्रकाशित आलेख का मूल पाठ! 

Tuesday, March 18, 2014

तुम क्या जानो क्या हाल कर दिया था तुमने हमारा

हम सबको इस तरह के अनुभव होते ही रहते हैं. किसी की तनिक-सी उदासीनता, या लापरवाही, या ग़ैर ज़िम्मेदारी – आप जो भी चाहे नाम दे लें उसे, दूसरों के लिए बहुत बड़ी परेशानी का सबब बन जाती है. ऐसा नहीं है कि ऐसी  ग़लती सिर्फ दूसरों से ही होती है, मुझसे  कभी हुई ही नहीं. मुझसे भी शायद अनेक दफ़ा ऐसी चूक हुई होगी, और मेरे अनजाने में उसे दूसरों ने भुगता होगा. इसीलिए आज  किसी और की एक चूक की चर्चा आपसे कर रहा  हूं.

उस दिन अस्पताल गया तो किसी और ही काम से था, लेकिन लगा कि अपना बीपी भी लगे हाथों चैक करवा लूं. डॉक्टर साहब से दुआ-सलाम थी. उन्होंने बीपी चैक करके  कहा कि बेहतर होगा मैं अपना ईसीजी करवा लूं. न सिर्फ कहा, ईसीजी करने वाले टैक्नीशियन को बुला मुझे उनके हवाले भी कर दिया. तब मैं जयपुर के नज़दीक, कोटपुतली  के स्नातकोत्तर  कॉलेज में उपाचार्य था. कुछ ही दिनों  पहले सिरोही से पदोन्नति पर वहां पहुंचा था. संयोगवश टैक्नीशियन महोदय उसी कॉलोनी में रहते थे जिसमें मैं रहता था, और मुझे पहचानते थे. उन्होंने तसल्ली से मेरा ईसीजी किया और उसका प्रिण्ट आउट मुझे देकर डॉक्टर साहब के पास भेज दिया.

ईसीजी की उस रपट को देखते ही डॉक्टर साहब की मुख मुद्रा गम्भीर हो गई. उन्होंने सलाह दी कि मुझे फौरन जयपुर जाकर एस एम एस अस्पताल में खुद को दिखाना चाहिए. मैंने पूछा कि क्या कोई ख़ास चिंता की बात है, तो वे मेरे सवाल  को टाल गए. मुझे कुछ ही देर बाद एक शादी में शमिल होने के लिए सिरोही जाने के लिए कोटपुतली से निकलना  था. घर आया. मुंह ज़रूर ही लटका हुआ होगा. पत्नी ने पूछा कि क्या बात है, तो मैंने कोई जवाब नहीं दिया. उन्होंने भी  स्थिति की गम्भीरता समझ ज़्यादा ज़ोर नहीं दिया. अपने पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार हम लोग कोटपुतली से निकल कर अगली सुबह सिरोही पहुंच गए. मैं रास्ते भर अनमना बना रहा. स्वाभाविक ही है कि मेरे अनमनेपन का असर पत्नी पर भी पड़ा. शादी में जाने का उत्साह और उल्लास हवा हो चुका था.

नहा धोकर सिरोही के सरकारी अस्पताल पहुंचा, जहां मेरे एक अत्यंत आत्मीय डॉक्टर सामने ही मिल गए. उदासी शायद मेरे चेहरे पर चिपकी हुई थी. उन्होंने वजह पूछी तो मैंने ईसीजी की रपट आगे कर दी. उन्होंने एक नज़र उस पर डालते ही पूछा कि “अग्रवाल साहब, यह किसकी रिपोर्ट उठा लाए?”  जब मैंने कहा कि यह तो मेरी ही रिपोर्ट है, तो उन्होंने अविश्वास  भरी नज़र से मुझे देखा, जैसे कह रहे हों, क्यों मज़ाक करते हो? मैंने फिर से उन्हें कहा कि यह मेरी ही रिपोर्ट  है, कल ही मैंने अपना ईसीजी करवाया है और इसी के  आधार पर डॉक्टर साहब ने मुझे राज्य के सबसे बड़े अस्पताल चले जाने की अर्जेण्ट सलाह दी है.

मेरे मित्र डॉक्टर साहब को शायद उस रिपोर्ट पर क़तई विश्वास नहीं हो रहा था. असल में कोतपुतली जाने से पहले मैं उनके नियमित सम्पर्क में था और मेरे स्वास्थ्य की स्थिति  से वे भली-भांति परिचित थे. उन्होंने पहले मेरा बीपी चैक किया और फिर मुझे एक बार और ईसीजी करवा लेने के लिए कहा. मैं बड़ी उलझन में था कि मामला आखिर क्या है! लेकिन अपने यहां इस बात का कोई रिवाज़ नहीं है डॉक्टर, चाहे वो आपका कितना ही नज़दीकी क्यों न हो, आपके मर्ज़ के बारे में आपसे खुलकर  बात करे. बहरहाल, मैंने एक बार फिर अपना ईसीजी करवाया और उसकी रिपोर्ट लेकर डॉक्टर साहब के पास पहुंचा. एक नज़र उस पर डालते ही वे मुझसे बोले, “देखो, मैंने कहा था ना कि वो रिपोर्ट आपकी हो ही नहीं सकती! आप एकदम ठीक हैं!” उन्होंने मुझे एक बार फिर आश्वस्त किया कि मैं तनिक भी चिंता न करूं, सब कुछ ठीक है, और फिर मुझे चाय पिला कर  विदा किया.

माहौल बदल चुका था. खुशी-खुशी घर  आया, पत्नी को सारा किस्सा बताया राहत की खूब लम्बी सांस ली, बहुत मज़े से शादी का लुत्फ लिया, और फिर हम दोनों कोटपुतली लौट गए.
यह संयोग ही था, कि अगले दिन जैसे ही मैं घर से कॉलेज जाने के लिए निकला, सामने वे तकनीशियन महोदय मिल  गए. मैंने शिकायत भरे लहज़े में उनसे कहा कि आपने मेरा कैसा ईसीजी किया.......मेरी तो जान ही निकाल दी! पहले तो उन्होंने मुझसे पूरा वाकया सुना, और फिर बड़े बेपरवाह लहज़े में बोले, “हां, सर, हमारी वो मशीन थोड़ी खराब है. कई बार वो ग़लत रिपोर्ट  दे देती है.” यानि उन्हें अपनी मशीन के चाल चलन की जानकारी थी.

मुझे समझ में नहीं आया कि मैं उनसे क्या कहूं? उनकी मासूमियत लाजवाब थी. होती भी क्यों नहीं? उन्हें क्या पता कि मैं इस बीच कितने विकट मानसिक तनाव से गुज़र चुका था!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै  में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 18 मार्च 2014 को 'खराब मशीन की ईसीजी ने बढ़ा दी धड़कन' शीर्षक से प्रकाशित लेख का मूल पाठ 

Tuesday, March 11, 2014

अच्छे काम की तारीफ़ भी की जानी चाहिए!

कुछ विभागों के बारे में इतना ज़्यादा  नकारात्मक पढ़ने सुनने को मिल चुका होता है कि हम यह मानने को तैयार ही नहीं होते हैं कि ये विभाग कोई सही और  अच्छा काम भी करते हैं! ऐसे विभागों की अगर कोई सूची बनाई जाए तो पुलिस विभाग का नाम उसमें काफी ऊपर आएगा. लेकिन अगर कोई कहे कि पुलिस के बारे में जो बातें बार-बार कही-सुनी जाती हैं, वे पूरी तरह सच नहीं है, और पुलिस ईमानदारी से काम करती है, तो भला कौन विश्वास करेगा? मैं भी नहीं करता, अगर मुझे एक ख़ास अनुभव नहीं हुआ होता. और उस अनुभव ने पुलिस के बारे में मेरी धारणा को एकदम बदल दिया.

बात ज़्यादा पुरानी नहीं हुई है. हम लोग जयपुर में अपना घर बंद करके छह महीनों के लिए अमरीका गए थे. पड़ोसी बहुत अच्छे हैं, इसलिए किसी को घर पर सुलाया नहीं, उन्हीं को कह कर चले गए कि वे घर का ध्यान रखें! साढ़े चार महीने सकुशल निकल गए. अचानक एक दिन जयपुर से अमरीका फोन आया कि हमारे घर  में चोरी हो गई है और घर का कुण्डा ताला टूटा पड़ा है.  घबराहट स्वाभाविक थी. पहले तो अपने  एक  स्थानीय रिश्तेदार से कहा कि वो जाकर घर सम्हाले, टूटा कुण्डा ताला वगैरह  बदलवा दे, और फिर सूरत में रह रहे बेटे से कहा कि वो एक दफा जयपुर आ जाए और घर को सम्हाल कर पुलिस में रपट वगैरह  लिखवा दे. और ये सारे काम हो गए.

कोई पंद्रह बीस दिन बाद हमारे पड़ोसियों ने बेटे को फोन करके कहा कि वो पुलिस से सम्पर्क करे, और जब उसने पुलिस से सम्पर्क किया तो उसे बताया गया कि हमारे घर में चोरी करने वाले को पकड़ लिया गया है और उससे काफी सामान बरामद हुआ है. आगे जो हुआ उसे संक्षेप में कहूं तो मात्र इतना कि हमारा चोरी गया सामान करीब-करीब पूरा मिल गया, और वो भी यथा कार्यक्रम अपना अमरीका प्रवास पूरा करके हमारे भारत  लौटने  के बाद. तब तक वो सामान पुलिस के पास सुरक्षित पड़ा रहा, कोई अमानत में खयानत नहीं हुई. हां, अदालती औपचारिकताएं हमें पूरी करनी पड़ीं, और उनमें कुछ अलग तरह के अनुभव भी हुए,  लेकिन  उनकी चर्चा यहां अप्रासंगिक होगी. 

दिलचस्प और प्रशंसनीय बात यह है कि पुलिस ने हमारे यहां चोरी करने वाले उस चोर को पकड़ा कैसे? हुआ यह कि पुलिस की नियमित गतिविधि के तहत एक चोर पकड़ा गया और उसके पास से काफी सारा माल बरामद हुआ. पुलिस उस चोर से यह नहीं जान सकी कि उसने कहां-कहां चोरी की थी. पुलिस चाहती तो आसानी से उस माल को हजम कर सकती थी, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया. उसने उस माल के मालिक का पता लगाने की भरपूर  कोशिश की. जो माल पुलिस को उससे बरामद हुआ, उसमें एक टू-इन-वन यानि रेडियो कम कैसेट रिकॉर्डर भी था, जिस पर किसी रेडियो रिपेयरिंग शॉप का लेबल लगा था. पुलिस उस टू-इन-वन को लेकर उस शॉप पर पहुंची और वहां से पता लगा कि यह टू इन वन अमुक जगह रहने वाले किसी व्यक्ति का था. जब पुलिस उस व्यक्ति को  तलाश करती वहां पहुंची तो बताया गया कि वह व्यक्ति तो वहां से अमुक कॉलोनी में रहने चला गया है. उसी बरामद हुए सामान में एक कीमती कैमरा भी था जिसमें एक आधी काम में ली हुई फोटो फिल्म भी थी. पुलिस ने उस फिल्म को धुलवाया तो उसमें किसी बच्चे की बर्थ डे पार्टी की कुछ तस्वीरें मिलीं. पुलिस उन तस्वीरों को लेकर हमारे घर वाली कॉलोनी में आई और वो तस्वीरें जब हमारे पड़ोसियों को दिखाई गईं तो उन्होंने तुरंत बता दिया कि वे हमारे पोते के जन्म दिन की तस्वीरें हैं. तो इस तरह उस रेडियो रिपेयरिंग शॉप और कैमरे की फिल्म के माध्यम से पुलिस ने यह पता लगाया कि बरामद हुआ यह सामान हमारा   है.

यह पूरा वृत्तांत लिखने का मेरा मकसद यही बताना है कि जिस पुलिस को कोसने का कोई मौका हम नहीं छोड़ते हैं, वो भी काम करती है लेकिन उसके काम की कोई तारीफ़  नहीं करता. मुझे यह कहना भी ज़रूरी लग रहा है कि मेरे घर हुई इस चोरी के मामले में पुलिस ने जो भी किया वो अपनी पहल पर किया, न कि मेरे किसी दबाव या प्रभाव के कारण. एक नागरिक के रूप में मुझे लगता है कि जो लोग हमारी सेवा के लिए नियोजित हैं, उनके मूल्यांकन में बेवजह अनुदार और नकारात्मक होकर हम उन्हें हतोत्साहित ही करते हैं. अगर उनके प्रति हम अपना रुख सकारात्मक बनाएं तो निश्चय ही वे और अधिक उत्साह  के साथ हमारी सेवा करेंगे.

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत 11 मार्च 2014 को कभी-कभी पुलिस भी होती है तारीफ की हक़दार शीर्षक से प्रकाशित कड़ी का मूल पाठ. 

Thursday, March 6, 2014

यह योग्यता हममें भरपूर मात्रा में है!

पिछले दिनों एक सरकारी विभाग के अनुभव की अपनी व्यथा-कथा सोशल मीडिया के मंच पर साझा की तो बहुत सारे मित्रों ने भी अपने वैसे ही अनुभव साझा कर दिए. लगा कि  बस ज़ख्म को कुरेद भर देने की देर थी. वैसे अपने यहां सरकारी दफ़्तरों  में कमोबेश एक-सा हाल है. अगर कभी कहीं सुगमता से काम हो जाए तो विश्वास ही नहीं होता है. आप किसी दफ़्तर में किसी भी काम के लिए चले जाएं,  पहला जवाब तो यही मिलेगा कि यह काम नहीं हो सकता. बल्कि उससे भी पहले यह होगा कि अगर आप सुबह पहुंचे हैं तो बताया जाएगा कि यह काम शाम को होता है और शाम को पहुंचे हैं तो आपको सुबह आना चाहिए था. अगर किसी चमत्कार से आप सही सुबह या सही शाम पहुंच भी गए हों तो जो सज्जन आपका काम करने के लिए नियुक्त हैं वे छुट्टी पर/दौरे पर/मीटिंग में होंगे, इसलिए आपको ‘कल’ आना होगा. एंड यू नो, टुमारो नेवर कम्स!

काम करवाने की प्रक्रिया भी आसान नहीं होती है. एक आवेदन पत्र लिखिए, उसके साथ आवश्यक दस्तावेजों की राजपत्रित अधिकारी द्वारा सत्यापित करवाई हुई फोटो प्रतियां नत्थी कीजिए, उस आवेदन पत्र पर दफ्तर के बड़े साहब से मार्किंग करवाइये, फीस जमा करवाइये, और फिर आवेदन पत्र जमा करवाइये. शायद ही कभी ऐसा हो कि आपको बताया जाए कि कल आपका काम हो जाएगा, और हो जाए! लगाते रहिये चक्कर! तंग आकर बड़े साहब से मिलना चाहेंगे तो या तो वे चेम्बर में नहीं होंगे (दौरे पर या  मीटिंग में कौन जाएगा?) और अगर हुए तो उनका पी ए आपको उनसे मिलने नहीं देगा.

इससे मुझे याद आया कि कुछ बरस पहले जब मैं अपने विभाग के एक बड़े पद पर आसीन हुआ और वहां आने वाले लोगों को सहज रूप से सुलभ होने लगा तो सबसे पहली शिकायत मेरे पी ए साहब को ही हुई. पहले तो उन्होंने मुझे सदाशयतापूर्ण सलाह दी कि मैं इस तरह आसानी से लोगों से न मिला करूं और जब मैंने उनकी सलाह नहीं मानी तो उन्होंने इधर-  उधर कहना शुरु किया कि ये साहब तो दफ्तर का अनुशासन ही ख़त्म किए दे रहे हैं!

जब बात सरकारी काम काज की चल  ही निकली है तो लगे हाथों अपना एक और मज़ेदार अनुभव आपसे साझा कर लूं. हुआ यह कि मेरी बेटी ने,  जिस शहर में वो पढ़ रही थी वहां एक मोपेड खरीदी. परिवहन विभाग के एक अजीबो गरीब नियम के अनुसार  उसका रजिस्ट्रेशन उसी शहर में हो सकता था जहां के आप मूल निवासी हों. और हमारा यह मूल निवास बेटी की पढ़ाई वाले उस शहर से 200 किलोमीटर दूर था. मेरे शहर के डीटीओ (ज़िला परिवहन अधिकारी) से मेरी अच्छी जान पहचान थी, सो मैं उनके पास सारे कागज़ात लेकर पहुंचा कि वे उस वाहन का रजिस्ट्रेशन कर दें. उन्होंने बड़ी आत्मीयता से मुझे बिठाया, चाय पिलाई और फिर मेरे कागज़ देखकर पूछा कि वाहन कहां है? मैंने बताया कि वाहन तो वहीं है जहां से उसे खरीदा गया है. उन्होंने बहुत ही सहजता से कहा कि बस आप दो मिनिट के लिए वो वाहन  यहां ले आइये, मैं फौरन रजिस्ट्रेशन कर दूंगा, ज़रा भी देर नहीं लगाऊंगा. मेरे सारे अनुरोध उनकी  सरकारी नियमों से बंधी कर्तव्यपरायणता के आगे निष्फल रहे. मुंह लटका कर बाहर निकल ही रहा था कि मेरा एक पड़ोसी  मिल गया. दुआ सलाम के बाद उसने मुझसे वहां आने की वजह पूछी, और मैंने अपनी पूरी राम कहानी उसे सुना दी. वो वहीं मुझे एक ट्रांसपोर्ट एजेण्ट के पास ले गया, जो संयोग से मेरा भी परिचित था. उसने कहा कि यह तो कोई काम ही नहीं है. आसानी से हो जाता, लेकिन आप क्योंकि साहब के पास चले गए थे और मामला उनके ध्यान में आ चुका है, इसलिए थोड़ा खर्चा होगा. जितना खर्चा उसने बताया वो 200 किलोमीटर दूर से वाहन लाने ले जाने से तो कम ही था. मैंने हामी भरी, कागज़ात उसे सौंपे, और अगले दिन उसके बताए समय पर जब पहुंचा तो वाहन के रजिस्ट्रेशन के कागज़ात तैयार थे. एक बार तो मेरा मन हुआ कि अपने उन डीटीओ मित्र के पास जाऊं और पूछूं  कि कल जो काम नियम  विरुद्ध था, आज वही काम उन्हीं के हस्ताक्षरों से कैसे हो गया, लेकिन फिर सोचा मेरा चाहे कुछ न बिगड़े, उस एजेण्ट को परेशानी हो सकती है, और यह सोचकर सीधा अपने घर चला आया.

इतने बरस बहुत सारे सरकारी दफ्तरों  की  धूल फांककर मुझे एक ही बात समझ में आई है और वह यह कि काम की प्रक्रिया को जटिल बनाने में, लोगों की परेशानियों में वृद्धि  करने में और आपको ग़लत तरीकों से काम  करवाने के लिए मज़बूर करने में हमारी सरकारी मशीनरी का कोई जवाब नहीं है.

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे  साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर  में  मंगलवार दिनांक 05 मार्च, 2014 को 'सरकारी दफ्तर...और काम कल होने का फेर' शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ!   

Tuesday, February 25, 2014

हम किधर जा रहे हैं?

शादियों का सीज़न है. लोग आपस में बातें करते हैं तो हरेक की यही कोशिश होती है कि कैसे खुद को दूसरों से सवाया सिद्ध किया जाए! एक कहता है कि यार, मेरे पास पंद्रह शादियों  के निमंत्रण हैं, क्या करूं, कैसे सब में  जाऊं, तो दूसरा नहले पर दहला मारता हुआ कहता है कि बस, पंद्रह ही? मेरे पास तो पूरे बत्तीस निमंत्रण पत्र पड़े हैं! और इन दोनों की बातें सुनते हुए मैं सोचता हूं कि मैं बड़ा खुशनसीब हूं कि मेरे पास मात्र एक निमंत्रण है और मैं उस शादी का भरपूर लुत्फ ले रहा हूं.

वैसे शादियों की दुनिया में काफी सारे बदलाव हुए हैं. ख़ास बात तो यह कि पहले जो शुद्ध पारिवारिक उत्सव हुआ करता था वो अब एक जन सम्पर्क गतिविधि में रूपांतरित हो चुका है. अब शादी में अपने परिवार की खुशी अपने निकट के लोगों से बांटने की बजाय यह दर्शाने की भावना अधिक आ गई है कि आप कितने  साधन सम्पन्न हैं और आपका सामाजिक घेरा कितना बड़ा है. मुझे नहीं लगता कि किसी भी शादी में आए हज़ार दो हज़ार पांच हज़ार लोगों को बेटे/बेटी के मां-बाप या खुद वर-वधू व्यक्तिश: जानते होंगे. और यही बात उन अतिथियों की तरफ से भी कही जा सकती है.

शादी के पहले वाले विशुद्ध पारिवारिक आयोजनों को भी शादी जितना ही भव्य बनाया जा रहा है और सज्जा, आवभगत, जलपान, भोजन  आदि पर खर्च बढ़ाने के अजीबो-गरीब तरीके तलाश किए जा रहे हैं. हाल ही में एक सेलेब्रिटी से मुलाक़ात हुई जो किसी शादी में पंद्रह मिनिट की अपनी उपस्थिति के लिए मायानगरी से उड़कर आए थे. एक मोटे अंदाज़ के अनुसार उनकी पंद्रह  मिनिट की उपस्थिति का व्यय चार  लाख था. और उस शादी में उन जैसे तीन-चार सेलेब्रिटी बुलवाए गए थे. कहना अनावश्यक है कि जिस परिवार में शादी थी उससे उनका कोई लेना-देना नहीं था. पिछले दिनों हमने अखबारों में पढ़ा ही है कि लोग अपनी शादियों की शोभा बढ़ाने के लिए किन-किन को और कहां-कहां से बुलाते हैं!

और शादी का खाना! कल तक जिन व्यंजनों से शादी की पहचान बनती थी वे कभी के रिटायर हो चुके हैं और उनकी जगह ऐसे-ऐसे व्यंजन ले चुके हैं जो कल्पना से भी परे हैं. व्यंजनों की गिनती करने बैठेंगे तो कैलक्युलेटर की ज़रूरत  महसूस होगी. हम जैसे मध्यमवर्गीय लोग अक्सर शादियों में यह शिकायत करते सुने जाते हैं कि अरे वहां तो इतनी चीज़ें थीं कि उन्हें चखना भी मुमकिन नहीं था! मुझे लगता है कि बात इससे भी आगे बढ़ चुकी है. अब चखना तो छोड़िये, देखना भी मुमकिन नहीं रह गया है. अक्सर ही यह होता है कि एक कहता है कि अमुक व्यंजन बहुत उम्दा था, तो दूसरा कहता है कि अच्छा,  हमने तो  देखा ही नहीं. खाने का बाड़ा इतना बड़ा होता है कि कॉमेडियन राजू श्रीवास्तव की वो बात याद आ जाती है कि भैया इतना खर्चा किया तो कुछ रिक्शा भी चलवा दिये होते!

अब जहां इतने व्यंजन होंगे वहां खाने की बर्बादी तो होनी ही है. ऐसा तो नहीं है कि होस्ट को यह बात मालूम न हो! मुझे अक्सर अपने एक मित्र की बात याद आती है. उनके साथ ऐसी ही एक भव्य शादी में जाना हुआ, तो देखता क्या हूं कि वे किसी स्टॉल पर जाते हैं, वहां से एक प्लेट लेते  हैं और फिर  उसमें से ज़रा-सा चख कर उस प्लेट को डस्टबिन में डालकर दूसरी स्टॉल की तरफ बढ़ जाते हैं. मुझसे खाने की यह बर्बादी सहन नहीं हुई तो मैंने उन्हें टोक दिया. लेकिन उनपर मेरी बात का कोई असर नहीं हुआ. बड़े सहज और लापरवाह भाव से बोले, “जिसने हमें बुलाया है, वो भी तो यही चाहता है! क्या उसे नहीं मालूम कि इतनी सारी चीज़ें हम खा नहीं सकते हैं! ससुरे ने रखी ही इसलिए है कि हम चख लें और आगे बढ़ जाएं!” बात तो ठीक थी.

और इस सब के बीच असल शादी तो नेपथ्य में चली जाती है. ताम-झाम उसके लिए चाहे जितना जुटाया जाए, उसमें दिलचस्पी किसी की नहीं होती. शायद खुद वर-वधू की भी नहीं. पण्डितजी से आग्रह किया जाता है, और आग्रह भी क्या, उन्हें तो डांट कर कहा जाता है कि जल्दी से यह सब निबटा दो.

और यह सारा तमाशा हमारी आंखों के सामने हो रहा है.  हो क्या रहा है, हम खुद इसमें शामिल हैं! मौका मिलता है तो हम भी यही सब करते हैं. अपने साधनों की सीमितता की वजह से कर नहीं पाते हैं तो करने वालों की तरफ़ हसरत भरी निगाहों से ताकते हैं और सोचते हैं कि काश! हम  भी वैसा ही कर पाते!

यारों, कभी तो रुक कर सोचो कि हम किस तरफ़ जा रहे हैं? इस दौड़  का अंत कहां होगा? क्या शादियों की पारिवारिक आत्मीयता वापस नहीं लौटनी चाहिए?  

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत 25 फरवरी, 2014 को आखिर इस दौड़ का अंत क्या होगा शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, February 18, 2014

किताबें और हम

किताबों के साथ हमारा रिश्ता बहुत अजीब है. चाहते हैं कि हमारे चारों तरफ किताबें ही किताबें हों. बस उन्हें छूते, सूंघते, देखते और पढ़ते हुए ज़िंदगी कट जाए! लेकिन जब किताबें इकट्ठी हो जाती हैं तो दूसरी तरह की बेचैनी घेरने लगती है! अरे! वक़्त इतना कम है और कितना कुछ पढ़ने को शेष है! मुझ जैसे मध्यवर्गीय लोगों का एक संकट और है और वह यह कि किताबें इकट्ठी  करने वाले मन का मकान की सीमित जगह से कोई तालमेल नहीं बैठ पाता है. और अगर पत्नी सुरुचि सम्पन्न हो तो यह कष्ट और कि किताबें उनकी आंखों में रड़कती हैं. ख़ास तौर पर पुरानी और जीर्ण-शीर्ण किताबें! मेरी पीढ़ी के लोगों की एक और बहुत बड़ी चिंता यह भी है कि हमारे बाद इन किताबों का क्या होगा? अपने अनेक दिवंगत आत्मीय साहित्य रसिकों के परिवार जन को उनकी बड़े जतन से संजोई लाइब्रेरियों के लिए फिक्र करते मैंने देखा है.

बहरहाल, आज तो मुझे किताबों से जुड़ी एक मज़ेदार घटना की याद आ रही है, उसी को आपसे साझा कर रहा  हूं. इस घटना को साझा करने से पहले यह कह दूं कि जिन मित्र से इस घटना का ताल्लुक है, उनके प्रति अवज्ञा या अवमानना का लेश मात्र भी भाव मेरे मन में नहीं है और उनकी मज़बूरी को अच्छी तरह समझता हूं.  महज़ अपने पाठकों के चेहरे पर मुस्कान लाने के लिए इसे साझा कर रहा  हूं.

दिवाली से पहले के दिन थे. ये दिन कबाड़ियों के लिए ख़ास होते हैं. लोग अपने घरों की सफाई करते हैं, अनुपयोगी सामान निकालते हैं और इस वजह से कबाड़ी लोगों का कारोबार उन दिनों अपने यौवन पर होता है. वो एक छोटा-सा कस्बा था जहां हम रहते थे. कुछेक कबाड़ी जो ठेलों पर अपना धंधा चलाते थे, मुझे भी जानते थे. जानने की वजह यह थी जब भी उनके ठेलों पर किताबें नज़र आतीं, मैं उन्हें रोकता और उनमें से अपने काम की किताबें छांट कर बिना मोलभाव किए खरीद लिया करता था. वे कबाड़ी कोई खास पढ़े लिखे तो थे नहीं, पर उन्हें यह ज़रूर समझ में आता था  कि  यह आदमी वो किताबें खरीदता है जिन्हें कोई दूसरा छूता तक नहीं है. मुझे इन कबाड़ियों से कई दफा बेशकीमती साहित्यिक सामग्री मिल चुकी थी, इसलिए मैं भी उनकी  तलाश में रहता था.

तो उस दिन जब मैं अपने कॉलेज जा रहा था, ऐसे ही एक परिचित कबाड़ी ने मुझे आवाज़ दी, और कहा कि साहब आज तो आपके काम का बहुत सारा माल मेरे पास आया है. मैं रुका, उसने अपना ठेला सड़क के किनारे खड़ा किया और किताबों के एक बड़े ढेर की तरफ इशारा कर मुझे अपने पसंद की किताबें चुन लेने को आमंत्रित किया. वाकई वे उम्दा साहित्यिक किताबें थीं. कविताओं की, कहानियों  की, लेखों की, आलोचना की. शीर्षक देख कर एक किताब हाथ में ली, उसे खोला तो देखा भीतरी पन्ने पर लिखा था – आदरणीय अमुक जी को सादर भेंट! और नीचे लेखक के हस्ताक्षर थे. मेरी दिलचस्पी जागी. दूसरी किताब देखी, वही बात. तीसरी, चौथी, पांचवीं....यानि ये सारी किताबें मेरे मित्र और सहकर्मी के यहां से आई थीं. बात मुझे समझ में आ गई. रचनाकार, विशेष रूप से युवा और उभरते हुए रचनाकार अपनी  नव प्रकाशित किताबें  सम्मति और  आशीर्वाद के लिए अपने वरिष्ठ रचनाकार सथियों को भेंट करते हैं. मेरे उन  मित्र को भी स्वभावत: ऐसी बहुत सारी किताबें  भेंट  में प्राप्त हुई थीं, और उन्होंने दिवाली की सफाई के दौरान उन किताबों से इस तरह निज़ात पाई थी. जैसा मैंने कहा, हम मध्यवर्गीय  लोगों के घरों में इतनी जगह नहीं होती कि जितनी किताबें हम चाहते हैं उन सबको सहेज कर रख सकें, ऐसे में किताबों की छंटनी एक मज़बूरी के रूप में सामने आती है.

ख़ैर! मुझे मज़ाक सूझा. दोस्तों में यह आम बात है. मैंने कोई बीसेक किताबें उस ठेले से खरीदीं. तब वो पचास पैसे में एक किताब देता था. दस रुपये बहुत ज़्यादा नहीं थे मज़ाक के नाम पर. किताबें घर लाया, और जहां-जहां उनके लेखकों ने मेरे परम मित्र का नाम लिखकर अपने दस्तखत कर रखे थे, उनके ठीक नीचे लिखा, आदरणीय अमुक जी को पुन: सादर भेंट! और अपने हस्ताक्षर कर दिए. शाम को उनके घर गया, और पूरी गम्भीरता और विनम्रता से उनसे कहा कि आपके लिए एक छोटी-सी भेंट लेकर हाज़िर हुआ हूं. और यह कहकर उन किताबों का ठीक से बनाया हुआ पैकेट उनके सामने रख दिया. उन्होंने बड़ी उत्सुकता से उस बण्डल को खोला......

और फिर?

बस! फिर क्या हुआ यह मत पूछिये!

इतना कह दूं कि बरसों बीत जाने के बाद अब भी हमारी दोस्ती उतनी ही प्रगाढ़ है! 

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लोकप्रिय दैनिक न्यूज़ टुडै  में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर में 18 फरवरी, 2014 को सप्रेम मिली किताबें कबाड़ी को चढ़ी भेंट शीर्षक से प्रकाशित संस्मरण का मूल आलेख. 

Tuesday, February 11, 2014

यादें सांस्कृतिक कार्यक्रमों की

पिछले कुछ बरसों से जनवरी-फरवरी के महीने अपने प्रांत में शिक्षण संस्थाओं में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए आरक्षित हो गए हैं. अगस्त में छात्र संघों के चुनाव होते हैं, फिर नेताओं की उपलब्धता के अनुसार उनका उद्घाटन होता है (आजकल तो छात्र संघ कार्यालयों का उद्घाटन अलग से होने लगा है) और फिर साल बदलते-बदलते सांस्कृतिक कार्यक्रमों का मूड बनने लगता है. अपनी पैंतीस से भी ज़्यादा  सालों की नौकरी के दौरान मुझे सांस्कृतिक कार्यक्रमों  के अनगिनत रोचक और मज़ेदार अनुभव हुए हैं. आज उन्हीं  में  से कुछ आपसे साझा कर रहा हूं.

जिस  ज़माने की मैं बात कर रहा हूं उस ज़माने में मेरे उस कॉलेज में विद्यार्थियों को नाटक करने का बड़ा शौक था. एक पूरी सांझ नाट्य संध्या के नाम से आयोजित की जाती थी और कम से कम दस-बारह एकांकी मंचित किए जाते थे. कलाकारों का उत्साह अपनी जगह और दर्शकों की हिम्मत अपनी जगह. दोनों में जैसे रस्साकसी चलती थी. उस रात नाट्य संध्या का संयोजन मैं कर रहा था. तेज़ सर्दी थी. कोई छठा या सातवां नाटक ख़त्म हुआ था, मैंने अगले नाटक की उद्घोषणा की और नेपथ्य में अपनी कुर्सी पर आ बैठा. कोई चार-पांच मिनिट हुए होंगे कि उस नाटक के कलाकार भी स्टेज छोड़ वहीं आने लगे. मुझे ताज्ज्जुब हुआ. पूछा क्या हुआ? तो बजाय कुछ बोलने के उन्होंने मुझे मंच की तरफ जाने का इशारा कर दिया.  जाकर  देखा तो ‘ऐसी तनहाई का जवाब नहीं’ वाला आलम था. पूरा पाण्डाल खाली पड़ा था. बेचारे किसके लिए नाटक करते?

थोड़ा और पीछे की तरफ लौटता हूं तो याद आता है कि उस छोटे कस्बे में सहशिक्षा का कॉलेज होने के बावज़ूद लड़कियां मंच पर आने में झिझकती थीं. लड़कियों की भूमिकाएं लड़कों को ही निबाहनी पड़ती थीं. हम लोग एक साहित्यिक नाटक कर रहे थे और सभी चाहते थे कि उसमें नायिका का रोल कोई लड़की ही करे. कई छात्राओं से बात की लेकिन सभी ने अपने मां-बाप की मनाही की दुहाई देते हुए मना कर दिया. अंतत: एक साथी प्राध्यापिका ने मां बाप को मनाने की ठानी और वे बड़े उत्साह के साथ एक लड़की के घर जा पहुंची. अभिभावकों ने भी गर्मजोशी से उनका स्वागत किया, चाय-पानी करवाया. लेकिन जैसे ही उन्होंने यह अनुरोध किया कि वे अपनी बेटी को नाटक में अभिनय करने की अनुमति दें, मां-बाप के तेवर एकदम से बदल गए. दोनों एक स्वर में बोले: “देखो मैडम जी, नौकरी आप करती हो. आपको जो करना है कर लो. हमारी बेटी तो स्टेज पर न आज जाएगी और न कल!” कहना गैर ज़रूरी है कि उस साल वो  नाटक नहीं हुआ.

एक साल तो और भी मज़ेदार वाकया हुआ. मैं नृत्य प्रतियोगिता का प्रभारी था. प्रभारी के नाते मेरी सबसे बड़ी फिक्र यह थी कि कोई अशालीन प्रस्तुति न हो जाए. एक शाम मैं नृत्य प्रस्तुतियों की स्क्रीनिंग कर रहा था. उन दिनों कैसेट पर संगीत बजाकर नृत्य किए जाते थे. ज़्यादातर विद्यार्थी फिल्मी और राजस्थानी गाने बजाकर उनपर नृत्य करने के इच्छुक थे. तभी एक सीनियर छात्र काफी बड़ा कैसेट प्लेयर लेकर आया. मैंने उससे पूछा कि वो किस गाने पर नृत्य करेगा, तो उसने कुछ लापरवाही के भाव से कहा, सर! मैं इंगलिश गाने पर डांस करूंगा.  मैंने उससे गाने का नाम जानना चाहा तो उसने फिर वही जवाब दुहरा दिया. शायद  उसे लगा होगा कि ये हिंदी के प्रोफेसर साहब भला अंग्रेज़ी गाने की अदरक का स्वाद क्या जानते होंगे! ख़ैर! उसने अपना कैसेट प्लेयर सेट किया, अपना हुलिया दुरुस्त किया और अपने एक साथी को इशारा किया तो उसने प्लेयर का प्ले बटन दबा दिया और इसने थिरकना-मटकना शुरु कर दिया. तीन-चार सैकण्ड बीते होंगे कि मुझे समझ में आ गया कि जिस ‘इंगलिश’ गाने पर वो डांस  करना चाहता है वो फ्रेंच संगीतकार शेरोने का उन दिनों कुख्यात नम्बर लव इन सी-माइनर था  जिसमें  शारीरिक सम्बंधों के  संकेत देने वाले ड्रम और  कामोत्तेजक ध्वनियां थीं. ज़ाहिर है कि मैं उस नम्बर से भली  भांति परिचित था (अखिर हम भी तो जवान थे) और उस पर डांस करने की अनुमति देने का तो कोई सवाल ही नहीं उठता था. मैंने फौरन संगीत बंद करने का इशारा किया, और कहा कि वह अपने डांस के लिए कोई और गाना चुन ले. वह विद्यार्थी बार-बार कह रहा था कि सर यह अंग्रेज़ी गाना है, और मैं इसी पर डांस करना चाहता हूं,  और मैं था कि बार-बार उससे कह रहा  था कि वो कोई और गाना चुने. उसे लग रहा था कि मुझे अंग्रेज़ी गाना समझ में नहीं आ रहा है जबकि  मुझे वो नम्बर  कुछ ज़्यादा ही समझ में आ रहा था. चचा ग़ालिब ने शायद  ऐसी ही किसी स्थिति में कहा  होगा: 
यारब न  वो समझे  हैं  न समझेंगे  मेरी बात
दे और दिल उनको जो न दें मुझको ज़ुबाँ और.

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत 11 फरवरी, 2014 को जब हिंदी के प्राध्यापक ने जाना अंग्रेज़ी गाना शीर्षक से प्रकाशित टिप्पणी का मूल आलेख.