Thursday, March 6, 2014

यह योग्यता हममें भरपूर मात्रा में है!

पिछले दिनों एक सरकारी विभाग के अनुभव की अपनी व्यथा-कथा सोशल मीडिया के मंच पर साझा की तो बहुत सारे मित्रों ने भी अपने वैसे ही अनुभव साझा कर दिए. लगा कि  बस ज़ख्म को कुरेद भर देने की देर थी. वैसे अपने यहां सरकारी दफ़्तरों  में कमोबेश एक-सा हाल है. अगर कभी कहीं सुगमता से काम हो जाए तो विश्वास ही नहीं होता है. आप किसी दफ़्तर में किसी भी काम के लिए चले जाएं,  पहला जवाब तो यही मिलेगा कि यह काम नहीं हो सकता. बल्कि उससे भी पहले यह होगा कि अगर आप सुबह पहुंचे हैं तो बताया जाएगा कि यह काम शाम को होता है और शाम को पहुंचे हैं तो आपको सुबह आना चाहिए था. अगर किसी चमत्कार से आप सही सुबह या सही शाम पहुंच भी गए हों तो जो सज्जन आपका काम करने के लिए नियुक्त हैं वे छुट्टी पर/दौरे पर/मीटिंग में होंगे, इसलिए आपको कलआना होगा. एंड यू नो, टुमारो नेवर कम्स!

काम करवाने की प्रक्रिया भी आसान नहीं होती है. एक आवेदन पत्र लिखिए, उसके साथ आवश्यक दस्तावेजों की राजपत्रित अधिकारी द्वारा सत्यापित करवाई हुई फोटो प्रतियां नत्थी कीजिए, उस आवेदन पत्र पर दफ्तर के बड़े साहब से मार्किंग करवाइये, फीस जमा करवाइये, और फिर आवेदन पत्र जमा करवाइये. शायद ही कभी ऐसा हो कि आपको बताया जाए कि कल आपका काम हो जाएगा, और हो जाए! लगाते रहिये चक्कर! तंग आकर बड़े साहब से मिलना चाहेंगे तो या तो वे चेम्बर में नहीं होंगे (दौरे पर या  मीटिंग में कौन जाएगा?) और अगर हुए तो उनका पी ए आपको उनसे मिलने नहीं देगा.

इससे मुझे याद आया कि कुछ बरस पहले जब मैं अपने विभाग के एक बड़े पद पर आसीन हुआ और वहां आने वाले लोगों को सहज रूप से सुलभ होने लगा तो सबसे पहली शिकायत मेरे पी ए साहब को ही हुई. पहले तो उन्होंने मुझे सदाशयतापूर्ण सलाह दी कि मैं इस तरह आसानी से लोगों से न मिला करूं और जब मैंने उनकी सलाह नहीं मानी तो उन्होंने इधर-  उधर कहना शुरु किया कि ये साहब तो दफ्तर का अनुशासन ही ख़त्म किए दे रहे हैं!

जब बात सरकारी काम काज की चल  ही निकली है तो लगे हाथों अपना एक और मज़ेदार अनुभव आपसे साझा कर लूं. हुआ यह कि मेरी बेटी ने,  जिस शहर में वो पढ़ रही थी वहां एक मोपेड खरीदी. परिवहन विभाग के एक अजीबो गरीब नियम के अनुसार  उसका रजिस्ट्रेशन उसी शहर में हो सकता था जहां के आप मूल निवासी हों. और हमारा यह मूल निवास बेटी की पढ़ाई वाले उस शहर से 200 किलोमीटर दूर था. मेरे शहर के डीटीओ (ज़िला परिवहन अधिकारी) से मेरी अच्छी जान पहचान थी, सो मैं उनके पास सारे कागज़ात लेकर पहुंचा कि वे उस वाहन का रजिस्ट्रेशन कर दें. उन्होंने बड़ी आत्मीयता से मुझे बिठाया, चाय पिलाई और फिर मेरे कागज़ देखकर पूछा कि वाहन कहां है? मैंने बताया कि वाहन तो वहीं है जहां से उसे खरीदा गया है. उन्होंने बहुत ही सहजता से कहा कि बस आप दो मिनिट के लिए वो वाहन  यहां ले आइये, मैं फौरन रजिस्ट्रेशन कर दूंगा, ज़रा भी देर नहीं लगाऊंगा. मेरे सारे अनुरोध उनकी  सरकारी नियमों से बंधी कर्तव्यपरायणता के आगे निष्फल रहे. मुंह लटका कर बाहर निकल ही रहा था कि मेरा एक पड़ोसी  मिल गया. दुआ सलाम के बाद उसने मुझसे वहां आने की वजह पूछी, और मैंने अपनी पूरी राम कहानी उसे सुना दी. वो वहीं मुझे एक ट्रांसपोर्ट एजेण्ट के पास ले गया, जो संयोग से मेरा भी परिचित था. उसने कहा कि यह तो कोई काम ही नहीं है. आसानी से हो जाता, लेकिन आप क्योंकि साहब के पास चले गए थे और मामला उनके ध्यान में आ चुका है, इसलिए थोड़ा खर्चा होगा. जितना खर्चा उसने बताया वो 200 किलोमीटर दूर से वाहन लाने ले जाने से तो कम ही था. मैंने हामी भरी, कागज़ात उसे सौंपे, और अगले दिन उसके बताए समय पर जब पहुंचा तो वाहन के रजिस्ट्रेशन के कागज़ात तैयार थे. एक बार तो मेरा मन हुआ कि अपने उन डीटीओ मित्र के पास जाऊं और पूछूं  कि कल जो काम नियम  विरुद्ध था, आज वही काम उन्हीं के हस्ताक्षरों से कैसे हो गया, लेकिन फिर सोचा मेरा चाहे कुछ न बिगड़े, उस एजेण्ट को परेशानी हो सकती है, और यह सोचकर सीधा अपने घर चला आया.

इतने बरस बहुत सारे सरकारी दफ्तरों  की  धूल फांककर मुझे एक ही बात समझ में आई है और वह यह कि काम की प्रक्रिया को जटिल बनाने में, लोगों की परेशानियों में वृद्धि  करने में और आपको ग़लत तरीकों से काम  करवाने के लिए मज़बूर करने में हमारी सरकारी मशीनरी का कोई जवाब नहीं है.

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे  साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर  में  मंगलवार दिनांक 05 मार्च, 2014 को 'सरकारी दफ्तर...और काम कल होने का फेर' शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ!   
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