Tuesday, May 24, 2016

क्या पुलिस को भी संरक्षण मिलना चाहिए?

अपने देश में आए दिन कभी यहां से तो कभी वहां से पुलिस कर्मियों के साथ दुर्व्यवहार,  मारपीट और  यहां तक कि कभी-कभी उनकी हत्याओं तक की खबरें आती रहती हैं. पुलिस के साथ बदसुलूकी तो आम बात है और अच्छी खासी समझ रखने वाले भी उनके प्रति अपशब्दों और अपमानजनक अभिव्यक्तियों का प्रयोग करते रहते हैं. ऐसे में मुझे सुदूर अमरीका से आया एक समाचार विशेष रूप से ध्यानाकर्षक लगा. उस समाचार की चर्चा और विश्लेषण से पहले उसकी पृष्ठभूमि बता दूं.    

संयुक्त राज्य अमरीका के बहुत सारे राज्यों में उन लोगों को अतिरिक्त दण्ड देने के प्रावधान हैं जो नस्ल या धर्म के आधार पर किसी के विरुद्ध किसी भी तरह का अपराध करते हैं. यानि वहां अगर कोई किसी खास समूह से संलग्नता  के आधार पर किसी से  घृणा  करते हुए कोई अपराध करता है तो उस अपराध की गम्भीरता को बढ़ा कर देखा जाता है. सामान्यत: इस घृणा  में जातीयता, लैंगिकता या शारीरिक अक्षमता को शामिल किया जाता रहा है. लेकिन अब वहीं के एक राज्य लुइज़ियाना में बहुत जल्दी एक नया विधेयक पारित होकर लागू होने वाला है जिससे इस घृणा-अपराध कानून के तहत जन-सुरक्षा कार्मिकों (पुलिस और अग्नि रक्षक) को भी एक संरक्षक प्रजाति माना जाने लगेगा. इस विधेयक के लागू हो जाने के बाद इन सुरक्षा कार्मिकों के विरुद्ध किसी भी तरह का गम्भीर अपराध करने वालों पर पाँच हज़ार डॉलर तक का आर्थिक दण्ड या उन्हें पाँच साल के कारावास की सज़ा दी जा सकेगी. उल्लेखनीय है कि लुइज़ियाना ऐसा करने वाला अमरीका का पहला राज्य होगा. लुइज़ियाना में इस विधेयक को ‘ब्ल्यू लाइव्ज़  मैटर’  (नीली वर्दी वालों की भी जान कीमती होती है) के नाम से जाना जा रहा है. इस नामकरण का इतिहास यह है कि फर्ग्युसन  में  सन 2014 में माइकल ब्राउन नामक एक निहत्था अश्वेत किशोर पुलिस की गोलीबारी में मारा गया था और तब पुलिस की इस तथाकथित  ज़्यादती के खिलाव एक बड़ा अभियान  शुरु हुआ था जिसे ‘ब्लैक  लाइव्ज़ मैटर’ कहा गया था. अब इस ब्ल्यू लाइव्ज़  वाले नए अभियान के समर्थकों का कहना है कि ज़्यादा हमले तो पुलिस पर ही होते हैं, जबकि असल   में तो वह  कानून व्यवस्था स्थापित करने के अपने दायित्व का ही निर्वहन कर रही होती है.
इस बात की पुष्टि  नेशनल लॉ एन्फोर्समेण्ट मेमोरियल फंड के इस दावे से भी होती है कि सन 2015 में कम से कम 124  पुलिस अधिकारी अपना कर्तव्य निर्वहन करते हुए मारे गए थे. एफबीआई ने भी पिछले सप्ताह जो आंकड़े ज़ारी किए हैं उनके अनुसार सन 2015 में 41 कानून और व्यवस्था अधिकारी अपना कर्तव्य पालन करते हुए दुर्भावनापूर्वक मार डाले गए थे.

स्वाभाविक ही है कि इस तरह के हमलों ने प्रभावितों को और सरकार को विचलित किया है. लेकिन लुइज़ियाना राज्य जो कदम करीब-करीब उठा चुका है उससे सभी सहमत हों, ऐसा फिर भी नहीं है. न्यू ऑर्लियंस स्थित ब्लैक यूथ प्रोजेक्ट 100 ऐसा ही एक एक्टिविस्ट समूह है जो इस कदम से तीव्र असहमति रखता है. अपने तीव्र प्रतिवाद में उसने  कहा है कि घृणा-अपराध विधेयक में पुलिस को भी एक संरक्षित वर्ग के रूप में शामिल कर लेने से एक ऐसी संस्था को और अधिक संरक्षण मिलने लगेगा जो पहले से ही अपने कर्म, नीति और प्रभाव में आंकड़ों द्वारा नस्लीय साबित हो चुकी है. इस संगठन का यह भी कहना है कि हम तो इसे पुलिस की नृशंसता के विरुद्ध लोगों द्वारा चलाये जा रहे अभियान के खिलाफ एक विधायी आक्रमण और राजनीतिक प्रतिकार के रूप में देखते हैं.  इसी तरह एण्टी डिफेमेशन लीग के क्षेत्रीय निदेशक ने भी इस कदम को अविवेकपूर्ण बताया है. इस विधेयक के आलोचकों को आशंका यह है कि अगर यह लागू हो गया तो इसका दुरुपयोग पुलिस के खिलाफ होने वाले प्रतिरोध को कुचलने में किया जाने लगेगा. बोस्टन स्थित नॉर्थ ईस्टर्न यूनिवर्सिटी के  अपराध शास्त्री  जैक लेविन ने तो और भी मार्के की बात कही है. उन्होंने आशंका व्यक्त की है कि हो सकता है संरक्षित समूहों की इस सूची में बाद में और कुछ समूह जोड़ दिये जाएं. लेकिन पुलिस को इस सूची में शामिल करने की सबसे बड़ी बुराई यह है कि वह उन बहुत सारे संगठनों में से एक है जो पहले ही काफी खतरनाक हैं. लेविन ने एक और गौर तलब बात यह कही है कि जिन खतरों की बात कहते हुए पुलिस को यह संरक्षण प्रदान किया जाने वाला है वे तो उसके कर्तव्य का हिस्सा हैं.

यानि सरकार का सोच एक तरफ और बहुत सारे संगठनों का सोच उसके विपरीत. और दोनों के अपने-अपने सशक्त तर्क. सोचें कि अगर हमारे देश में भी ऐसा ही कुछ हो तो हमारी प्रतिक्रिया  क्या होगी!   

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 24 मई, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकशित आलेख का मूल पाठ. 
  

Wednesday, May 18, 2016

चैन से सोना है तो जाग जाओ

कबीरदास की उलटी बाणी।
बरसै कंबल भीगै पानी  ।।

ये पंक्तियां हम सबने कभी न कभी पढ़ी या सुनी होगी. अटपटी या विरोधाभासी बात सुनते ही हम चौंक पड़ते हैं और सोचने लगते हैं कि अरे, ऐसा कैसे सम्भव है.  और बस इसी से कहने वाले का मक़सद पूरा हो जाता है. वो यही तो चाहता है कि हम उसकी तरफ ध्यान दें. आपको टीवी का वो विज्ञापन भी ज़रूर याद होगा जिसमें एक डरावना-सा शख़्स आकर आपसे कहता है: ‘चैन से  सोना है तो जाग जाओ!’ मन तो बहुत करता है कि अगर वो बन्दा कहीं मिल जाए तो पूछूं कि भाई मेरे, जागने से भला सोने का क्या नाता है? लेकिन कम्बख़्त मिलता ही नहीं है. और अभी तो हद्द ही हो गई है. इसी बन्दे का एक नज़दीकी रिश्तेदार सात समुद्र  पार अमरीका में और प्रकट हो गया है. इसका नाम है सेम्युअल पेरी. इसने एक गम्भीर शोध करने के बाद जो निष्कर्ष हम सब पर उछाला है उसे पढ़कर आप भी चौंक जाएंगे. पेरी ने कहा है कि जो लोग सप्ताह में एक बार से ज़्यादा पोर्न देखते हैं वे उन लोगों की तुलना में जो इससे कम या बिल्कुल भी पोर्न नहीं देखते हैं, अधिक धार्मिक होते हैं. मतलब बिल्कुल स्पष्ट है. अगर आपको धार्मिक होना है तो नियमपूर्वक पोर्न देखना शुरु कर दीजिए! है ना चैन से सोना है तो जाग जाओ वाली बात!   

और सेम्युअल पेरी ने यह बात बग़ैर किसी आधार के कह दी हो, ऐसा भी नहीं है. यूनिवर्सिटी  ऑफ ओक्लाहोमा में समाजशास्त्र और धार्मिक  अध्ययन विषय के सहायक प्रोफेसर पेरी ने सन 2006 से 2012 तक यानि पूरे छह  साल तक गहन अध्ययन करने के बाद  ऐसा कहा है. यह अध्ययन उसने पोर्ट्रेट्स ऑफ अमेरिकन लाइफ स्टडी (पाल्स) नामक एक प्रतिनिधि राष्ट्रीय सर्वेक्षण के साथ मिलकर किया. इस अध्ययन में भाग  लेने वाले कुल  1314 वयस्कों ने, जो अमरीकी समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं, नियमित रूप से अपने पोर्न उपभोग के बारे में सूचनाएं दीं और अपने धार्मिक व्यवहार के बारे में अनेक सवालों के जवाब दिए. अब इस अध्ययन के परिणाम जर्नल ऑफ सेक्स रिसर्च में प्रकाशित होकर  चर्चित हो रहे हैं.  पेरी ने पाया है कि जो लोग महीने में दो-तीन दफा ही पोर्न देखते हैं उनकी रुचि धर्म में बहुत ही कम होती है, जबकि इससे अधिक आवृत्ति से ऐसा करने वालों की धार्मिक रुचि में थोड़ी-सी वृद्धि लक्ष्य की गई. पेरी ने इस बात को समझाते हुए कहा है कि असल में होता यह है कि जब कोई धर्मपरायण व्यक्ति कभी-कभार  पोर्न देखता है तो उसे अपराध-बोध होता है और वो अपनी आस्था से थोड़ा डिग जाता है. लेकिन जब कोई व्यक्ति नियमित रूप से ऐसा करता है तो शायद वह अपने इस व्यवहार को संतुलित करने के लिए और खुद को यह दिलासा देने के लिए कि वह पथभ्रष्ट नहीं हो रहा है, धर्म में अधिक रुचि लेने लगता है. यानि जो लोग नियमित रूप से पोर्न देखते हैं वे अपने अपराध बोध को कम करने के लिए ईश्वर की शरण में ज़्यादा जाने लगते हैं. उनकी धार्मिक जिज्ञासाएं भी बढ़ जाती हैं.  पेरी ने अपने अध्ययन में यह भी पाया कि नियमित रूप से पोर्न देखने वाले धर्म स्थलों में अधिक जाते  और धार्मिक क्रियाकलापों में ज़्यादा सक्रिय रूप से भाग लेते हैं. पेरी ने यह भी बताया कि यह प्रवृत्ति स्त्रियों और पुरुषों  में एक समान  पाई गई. लेकिन ऊपर जिस सर्वेक्षण का ज़िक्र किया गया है उसमें यह बात  भी स्वीकार की गई है कि सामान्य रूप से पुरुषों की तुलना में स्त्रियां अधिक धार्मिक होती हैं, हालांकि धार्मिक संशयों  के मामले में पुरुष उनसे आगे पाए गए हैं. 

निश्चय ही पेरी का यह सर्वेक्षण इस विषय पर अंतिम सत्य की तरह स्वीकार नहीं किया जा सकता. मज़ाक की बात अलग है, यह निष्कर्ष निकाल लेना क़तई  युक्तिसंगत नहीं हो सकता कि अगर लोगों की धार्मिक रुचि  में वृद्धि करनी हो तो उन्हें पोर्न देखने को प्रेरित किया जाए. असल में धर्म या सद आचरण और व्यक्ति के निजी आचरण का रिश्ता इतना सीधा-सपाट नहीं होता है कि तुरंत किसी निष्कर्ष पर पहुंच जाया जाए. यह भी सही है कि पोर्नोग्राफी की न सराहना की जा सकती है और न उसका समर्थन किया जा सकता है. प्रथमत: और अंतत: भी, यह एक विकृति ही है. पेरी का सर्वेक्षण चाहे जो कहे, इस विकृति से दूरी बनाए रखने में ही मनुष्यता का हित निहित है, लेकिन इसी के साथ यह भी कहा जाना ज़रूरी है कि यह सर्वेक्षण पारम्परिक रूप से चले आ रहे सोच को ध्वस्त कर चीज़ों को नए नज़रिये से देखने की प्रेरणा देता है. 
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 17 मई, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.         

Wednesday, May 11, 2016

जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी...

जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी... कहा था हमारे तुलसी बाबा ने, लेकिन खुद उन्हें कहां मालूम रहा होगा कि ठेठ इक्कीसवीं सदी में और वो भी भारत से बहुत दूर इण्डोनेशिया में उनकी यह बात  सही साबित हो जाएगी. हुआ यह कि अभी कुछ ही समय पहले इण्डोनेशिया के सुलावेसी प्रांत के बांगई द्वीप पर एक इक्कीस वर्षीय मछुआरे को एक आदमकद स्त्री (जैसी) ‘देह’  समुद्र में तैरती हुई मिली. तीन दिन पहले सूर्यग्रहण होकर चुका था, और क्योंकि इण्डोनेशिया के वे भले लोग अलौकिक शक्तियों में बहुत गहरी आस्था रखते हैं, पार्दिन नामक उस भोले-भाले ग्रामीण को लगा कि हो न हो यह कोई देवी है और किसी अलौकिक चमत्कार की वजह से यहां आन पहुंची है. या हो सकता है कि वह  सूर्य ग्रहण के परिणामस्वरूप ही धरती पर आ गिरी हो.  पार्दिन उस ‘देह’  को बहुत एहतियाद से कालुपापी गांव स्थित अपने घर ले गया, और वहां उसकी बूढ़ी मां ने बड़े जतन से उस ‘देह’  को सहेजा, उसे नए कपड़े पहनाए और अपनी धार्मिक आस्थाओं के अनुरूप उसे एक हिजाब भी धारण करा दिया. इतना ही नहीं, वे लोग रोज़ उसको नई पोशाक धारण  करवाने लगे और बहुत आदर पूर्वक उसे एक कुर्सी पर बिराजमान करा दिया.

धीरे-धीरे पूरे गांव में यह बात फैलने लगी कि पार्दिन के घर एक बिदादरी (एक तरह की अप्सरा) अवतरित हुई है. और जैसा इस तरह के मामलों में सर्वत्र होता है वहां भी हुआ कि उस बिदादरी के अवतरण को लेकर अनेक किंवदंतियां प्रचलित होने लगी. कहा जाने लगा कि जब वो पार्दिन को मिली तो बहुत व्यथित थी, समुद्र किनारे औंधे मुंह लेटी हुई थीं, रो रही थी, और ऐसी अनेक बातें बहुत तेज़ी से फैलने लगीं. कुछ लोग यह तक कहने लगे कि वह तो स्वर्ग से धरती पर आ गिरी अप्सरा है और इसी कारण वह रोती हुई पाई गई थी. यानि जितने मुंह उतनी बातें. 

इण्डोनेशियाई समाचार पोर्टल देतिक ने तो उस बिदादरी की हिजाब युक्त तस्वीरें भी  पोस्ट कर दीं और इस तरह बिदादरी (क्या पता इस शब्द और हमारे ‘विद्याधरी’  में कोई रिश्ता हो!) के अवतरित होने की चर्चा जंगल की आग की तरह फैलने लगी. जब चर्चाएं कुछ ज़्यादा ही फैलने लगीं तो स्थानीय पुलिस के भी कान खड़े हुए. उसकी चिंता यह थी कि कहीं इस बिदादरी के अवतरण की वजह से कानून  व्यवस्था न गड़बड़ा जाए. पुलिस तेज़ी से हरकत में आई. और जब पुलिस ने पूरी पड़ताल की तो वो सच्चाई सामने आई जिसने मुझे बाबा तुलसीदास को याद करने को प्रेरित किया.

स्थानीय  पुलिस चीफ़ हेरु प्रमुकार्णो ने बताया कि असल में वह कोई बिदादरी नहीं थी, बल्कि जिसे वे भोले-भाले ग्रामीण कोई देवी समझ रहे थे वो तो एक सेक्स टॉय (प्लास्टिक की बनी एक स्त्री देह थी, जिसे हवा भर कर फुला लिया जाता है और यौन आनंद के लिए इस्तेमाल किया जाता है) था/थी. लेकिन वे बेचारे भोले-भाले ग्रामीण, जो शहरी आबादी और माहौल से बहुत दूर रहते हैं और जिनकी पहुंच इण्टरनेट जैसी नई सूचना तकनीक तक क़तई नहीं है, वे भला आधुनिक समाज के इन चोंचलों को कैसे जान सकते थे? तो उचित ही उन्होंने उस खिलौना गुड़िया को अपनी बिदादरी समझ लिया. बाद में एक स्थानीय नागरिक इकबाल ने पत्रकारों को बताया भी कि हो सकता है कि  किसी नाव  से यह डॉल नीचे गिर पड़ी होगी या गिरा  दी गई होगी. 

वैसे इसी क्रम में यह जानना भी कम दिलचस्प नहीं होगा कि हालांकि अपने देश में तो सेक्स टॉयज़ का इस्तेमाल वैध  नहीं है इसलिए अपने यहां ऐसी घटनाएं सुनने को नहीं मिलती हैं, दुनिया के अन्य बहुत सारे देशों में इन्हें लेकर मनोरंजक प्रसंग उत्पन्न होते ही रहते हैं. सन 2012 में चीन के एक रेडियो स्टेशन से यह खबर प्रसारित हुई थी कि वहां  के एक किसान को एक कुंए में बेशकीमती मशरूम का विशाल टुकड़ा मिला है जिसमें  जादुई औषधीय गुण हैं. लेकिन बाद की पड़ताल से पता चला कि असल में वो सिलिकोन से बना एक सेक्स टॉय था. उसी बरस तुर्की  में किसी ने एक स्त्री देह को पानी में डूबते-उतराते देख पुलिस को खबर कर दी और फौरन ही गोताखोरों की एक टीम उस ‘स्त्री’ के बचाव के लिए पानी  में कूद पड़ी. लेकिन बचाव अभियान पूरा होने पर  पता चला कि वो हवा भरी हुई एक सेक्स डॉल थी. और उसी साल पूर्वी चीन के शेण्डोंग प्रांत में भी ऐसी ही एक घटना हुई जब 18 पुलिस अधिकारियों को एक ऐसी ही ‘स्त्री’  को बचाने के लिए खासी मशक्कत करनी पड़ी. सोचिये, यथार्थ का  पता चलने पर उन बेचारों पर क्या गुज़री होगी. वहां इस बचाव अभियान को देखने के लिए नदी तट पर हज़ारेक लोग इकट्ठा भी  हो गए थे.     


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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, दिनांक 10 मई 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.  

Tuesday, May 3, 2016

‘बुनियादी’ उर्फ़ आओ लौट चलें आदिम युग की ओर

अगले महीने से सेण्ट्रल लंदन में किसी  अज्ञात स्थान  पर एक नया रेस्तरां खुलने जा रहा है. रेस्तरां बहुत बड़ा नहीं है. मात्र बयालीस लोग उसमें बैठ सकेंगे. लेकिन उत्सुकता का आलम  यह है कि ये पंक्तियां लिखे जाने तक तीस हज़ार लोग उसकी प्रतीक्षा सूची में अपने नाम लिखवा चुके हैं. और यह तब है जबकि यह पहले से बता दिया गया है कि वह रेस्तरां मात्र तीन महीनों के लिए खोला जा रहा है यानि कुल मिलाकर चार हज़ार से भी कम लोग उसमें भोजन करने का अवसर पा सकेंगे.

इस रेस्तरां को संचालित करने वाली  कम्पनी लॉलीपॉप के संस्थापक सेब लायल का कहना है कि वे चाहते हैं कि लोगों को बग़ैर किसी मिलावट के एक शाम का लुत्फ़ लेने का मौका दिया जाना चाहिए. एक ऐसी शाम जहां वर्तमान औद्योगिक सभ्यता का  कोई ताम-झाम मौज़ूद न हों. यानि खाने में न कोई रसायन हों, न कृत्रिम रंग, और न उसे गैस वगैरह  पर पकाया जाए;  न  बिजली की चौंधियाने वाली रोशनी हो, न आपकी निजता में घुसपैठ करती मोबाइल की घण्टियां, और ..... और सबसे ख़ास बात, अगर आप  चाहें तो वस्त्र भी न हों! इस ‘वस्त्र एच्छिक’ (क्लोद्स  ऑप्शनल)  रेस्तरां के दो खण्ड होंगे, एक वस्त्रों वाला और दूसरा ‘प्योर’. इस प्योर सेक्शन में जाकर भोजन करने के लिए आपको पूरी तरह निर्वस्त्र होना होगा. रेस्तरां में कपड़े उतारने के लिए निर्धारित स्थान होगा,  गाउन उपलब्ध कराए जाएंगे और आपके कपड़ों को सुरक्षित रखने के लिए लॉकर्स की सुविधा भी होगी.  यह तो कहना अनावश्यक ही है कि इस रेस्तरां में फोटोग्राफी पूरी तरह वर्जित होगी. सेब लायल के अनुसार इस रेस्तरां को खोलने  के पीछे असल विचार यह है लोग सच्ची आज़ादी का अनुभव कर सकें.

योजना यह है कि जैसे ही आप रेस्तरां में पहुंचेंगे, आपको एक चेंजिंग रूम तक ले जाया जाएगा और फिर एक गाउन देकर कहा जाएगा कि आप अपने पहने हुए वस्त्रादि एवम अन्य सामान लॉकर में सुरक्षित रख दें. इसके बाद आपको यह विकल्प होगा कि जो न्यूनतम वस्त्र आपने अपने शरीर पर बचा रखे हैं,  खाने की टेबल पर जाने से पहले  उनका भी परित्याग कर दें. हर अतिथि की टेबल और दूसरे अतिथि की टेबल के बीच बांस और खपच्चियों  का बना झीना-सा  पर्दा होगा जिससे आपकी निजता बनी रहे. मोमत्तियों का उजाला केवल इतना होगा कि आपको अन्य लोगों की छाया-आकृति ही  नज़र आ सकेगी. अपने वस्त्रों का आपने भले ही परित्याग कर दिया हो, काफी बड़े आकार के नैपकिन्स  आपको सुलभ कराए जाएंगे ताकि गरमागरम खाने से आपका बचाव हो सके. और इसी तरह, संक्रमण से बचाव को ध्यान में रखते हुए यह इंतज़ाम  भी रहेगा  कि भोजन करने वालों की देह और कुर्सियों का सीधा सम्पर्क न हो.

और हां, वहां वेटर्स वगैरह भी न्यूनतम वस्त्रों में ही होंगे. अलबत्ता स्वच्छता का लिहाज़ करते हुए खाना बनाने वालों को कपड़े पहने रहने की अनुमति होगी.  इस रेस्तरां का नाम, हम हिन्दी भाषी  लोग  लोग चाहें  तो इस बात पर अतिरिक्त खुशी हासिल कर सकते हैं, ‘बुनियादी’  होगा. बुनियादी यानि आधारभूत यानि प्राकृतिक. और इसलिए यहां जो भोजन परोसा जाएगा वो भी इसी तरह का होगा. वेगन खाद्य के अलावा यहां ग्रिल्ड मीट होगा जिसे लकड़ी की आंच पर (न कि बिजली या गैस पर) पकाया जाएगा और परोसा भी उसे हाथ से बने मिट्टी के बर्तनों में ही जाएगा. खाना-खाने के लिए आपको जो चम्मच-छुरी-कांटे वगैरह  दिये जाएंगे वो खाद्य सामग्री के ही बने हुए होंगे यानि आप उन्हें भी खा सकेंगे.  रसोईघर में प्लास्टिक  और धातु  के पदार्थ पूरी तरह वर्जित रहेंगे. रेस्तरां का फर्नीचर केवल लकड़ी से बना  होगा और निहायत  प्राकृतिक नज़र आएगा. सेब लायल का कहना है कि उनका विचार यह नहीं है कि आप निर्वस्त्र होकर भोजन करें, बल्कि असल विचार तो यह है कि यह पूरा अनुभव आपको आधारभूत अनुभव की प्रतीति कराए, यानि आपको लगे कि आप उस आदिम काल खण्ड में लौट गए हैं जहां केवल निहायत ज़रूरी साजो-सामान हुआ करता था. 

और जहां तक निर्वस्त्र होकर भोजन करने की बात है, सेब लायल मानते हैं कि दरअसल उनका यह रेस्तरां-प्रयोग नग्नता के बारे में समाज के वर्तमान  सोच को चुनौती देने के लिए है. वर्तमान समाज कपड़े उतारने को विद्रोह का पर्याय मान बैठा है, जबकि मनुष्य अकसर निर्वस्त्र होता ही रहता है. जब आप बिस्तर पर जाते हैं तब भी निर्वस्त्र होते हैं और जब किसी समुद्र तट  पर जाते हैं या सोना बाथ लेते हैं तब भी अपने कपड़े उतारते हैं.  यानि यह कोई अस्वाभाविक और चौंकाने वाली बात है ही नहीं.  

अब देखना है कि साठ ब्रिटिश पाउण्ड मूल्य वाले  इस अनूठे फाइव कोर्स भोजन का लोग कितना आनंद लेते हैं!   

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 03 मई, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 
अगले महीने से सेण्ट्रल लंदन में किसी  अज्ञात स्थान  पर एक नया रेस्तरां खुलने जा रहा है. रेस्तरां बहुत बड़ा नहीं है. मात्र बयालीस लोग उसमें बैठ सकेंगे. लेकिन उत्सुकता का आलम  यह है कि ये पंक्तियां लिखे जाने तक तीस हज़ार लोग उसकी प्रतीक्षा सूची में अपने नाम लिखवा चुके हैं. और यह तब है जबकि यह पहले से बता दिया गया है कि वह रेस्तरां मात्र तीन महीनों के लिए खोला जा रहा है यानि कुल मिलाकर चार हज़ार से भी कम लोग उसमें भोजन करने का अवसर पा सकेंगे.

इस रेस्तरां को संचालित करने वाली  कम्पनी लॉलीपॉप के संस्थापक सेब लायल का कहना है कि वे चाहते हैं कि लोगों को बग़ैर किसी मिलावट के एक शाम का लुत्फ़ लेने का मौका दिया जाना चाहिए. एक ऐसी शाम जहां वर्तमान औद्योगिक सभ्यता का  कोई ताम-झाम मौज़ूद न हों. यानि खाने में न कोई रसायन हों, न कृत्रिम रंग, और न उसे गैस वगैरह  पर पकाया जाए;  न  बिजली की चौंधियाने वाली रोशनी हो, न आपकी निजता में घुसपैठ करती मोबाइल की घण्टियां, और ..... और सबसे ख़ास बात, अगर आप  चाहें तो वस्त्र भी न हों! इस ‘वस्त्र एच्छिक’ (क्लोद्स  ऑप्शनल)  रेस्तरां के दो खण्ड होंगे, एक वस्त्रों वाला और दूसरा ‘प्योर’. इस प्योर सेक्शन में जाकर भोजन करने के लिए आपको पूरी तरह निर्वस्त्र होना होगा. रेस्तरां में कपड़े उतारने के लिए निर्धारित स्थान होगा,  गाउन उपलब्ध कराए जाएंगे और आपके कपड़ों को सुरक्षित रखने के लिए लॉकर्स की सुविधा भी होगी.  यह तो कहना अनावश्यक ही है कि इस रेस्तरां में फोटोग्राफी पूरी तरह वर्जित होगी. सेब लायल के अनुसार इस रेस्तरां को खोलने  के पीछे असल विचार यह है लोग सच्ची आज़ादी का अनुभव कर सकें.

योजना यह है कि जैसे ही आप रेस्तरां में पहुंचेंगे, आपको एक चेंजिंग रूम तक ले जाया जाएगा और फिर एक गाउन देकर कहा जाएगा कि आप अपने पहने हुए वस्त्रादि एवम अन्य सामान लॉकर में सुरक्षित रख दें. इसके बाद आपको यह विकल्प होगा कि जो न्यूनतम वस्त्र आपने अपने शरीर पर बचा रखे हैं,  खाने की टेबल पर जाने से पहले  उनका भी परित्याग कर दें. हर अतिथि की टेबल और दूसरे अतिथि की टेबल के बीच बांस और खपच्चियों  का बना झीना-सा  पर्दा होगा जिससे आपकी निजता बनी रहे. मोमत्तियों का उजाला केवल इतना होगा कि आपको अन्य लोगों की छाया-आकृति ही  नज़र आ सकेगी. अपने वस्त्रों का आपने भले ही परित्याग कर दिया हो, काफी बड़े आकार के नैपकिन्स  आपको सुलभ कराए जाएंगे ताकि गरमागरम खाने से आपका बचाव हो सके. और इसी तरह, संक्रमण से बचाव को ध्यान में रखते हुए यह इंतज़ाम  भी रहेगा  कि भोजन करने वालों की देह और कुर्सियों का सीधा सम्पर्क न हो.

और हां, वहां वेटर्स वगैरह भी न्यूनतम वस्त्रों में ही होंगे. अलबत्ता स्वच्छता का लिहाज़ करते हुए खाना बनाने वालों को कपड़े पहने रहने की अनुमति होगी.  इस रेस्तरां का नाम, हम हिन्दी भाषी  लोग  लोग चाहें  तो इस बात पर अतिरिक्त खुशी हासिल कर सकते हैं, ‘बुनियादी’  होगा. बुनियादी यानि आधारभूत यानि प्राकृतिक. और इसलिए यहां जो भोजन परोसा जाएगा वो भी इसी तरह का होगा. वेगन खाद्य के अलावा यहां ग्रिल्ड मीट होगा जिसे लकड़ी की आंच पर (न कि बिजली या गैस पर) पकाया जाएगा और परोसा भी उसे हाथ से बने मिट्टी के बर्तनों में ही जाएगा. खाना-खाने के लिए आपको जो चम्मच-छुरी-कांटे वगैरह  दिये जाएंगे वो खाद्य सामग्री के ही बने हुए होंगे यानि आप उन्हें भी खा सकेंगे.  रसोईघर में प्लास्टिक  और धातु  के पदार्थ पूरी तरह वर्जित रहेंगे. रेस्तरां का फर्नीचर केवल लकड़ी से बना  होगा और निहायत  प्राकृतिक नज़र आएगा. सेब लायल का कहना है कि उनका विचार यह नहीं है कि आप निर्वस्त्र होकर भोजन करें, बल्कि असल विचार तो यह है कि यह पूरा अनुभव आपको आधारभूत अनुभव की प्रतीति कराए, यानि आपको लगे कि आप उस आदिम काल खण्ड में लौट गए हैं जहां केवल निहायत ज़रूरी साजो-सामान हुआ करता था. 

और जहां तक निर्वस्त्र होकर भोजन करने की बात है, सेब लायल मानते हैं कि दरअसल उनका यह रेस्तरां-प्रयोग नग्नता के बारे में समाज के वर्तमान  सोच को चुनौती देने के लिए है. वर्तमान समाज कपड़े उतारने को विद्रोह का पर्याय मान बैठा है, जबकि मनुष्य अकसर निर्वस्त्र होता ही रहता है. जब आप बिस्तर पर जाते हैं तब भी निर्वस्त्र होते हैं और जब किसी समुद्र तट  पर जाते हैं या सोना बाथ लेते हैं तब भी अपने कपड़े उतारते हैं.  यानि यह कोई अस्वाभाविक और चौंकाने वाली बात है ही नहीं.  

अब देखना है कि साठ ब्रिटिश पाउण्ड मूल्य वाले  इस अनूठे फाइव कोर्स भोजन का लोग कितना आनंद लेते हैं!   
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Tuesday, April 26, 2016

जो हमें समझ न आए उस कर्म की भी कोई सार्थकता हो सकती है

उसका नाम है क्रिस सेवियर. संयुक्त राज्य अमरीका के टेनेसी इलाके के इस  निवासी ने ह्यूस्टन की संघीय अदालत में एक अजीबोगरीब वाद प्रस्तुत किया है. उसकी शिकायत है कि वो अपनी 2011 मॉडल की मैकबुक (लैपटॉप) से शादी करना चाहता है लेकिन हैरिस काउण्टी (यानि ज़िला) ने उसे विवाह का लाइसेंस  प्रदान करने से मना कर दिया है. इस तरह उसे उसके विवाह करने के अधिकार से वंचित किया गया है. क्रिस ने यह वाद अपनी काउण्टी के डिस्ट्रिक्ट क्लर्क, गवर्नर और अटॉर्नी जनरल के खिलाफ प्रस्तुत किया है. क्रिस  ने इसी तरह के वाद दो और संघीय अदालतों में प्रस्तुत किये हैं और उनकी योजना बारह और अदालतों में ऐसे ही वाद प्रस्तुत करने की है. ऐसा वे इस उम्मीद में कर रहे हैं कि कम से कम दो अदालतें तो उनके पक्ष में फैसला देंगी.  उनका कहना है कि ये वाद वे इसलिए प्रस्तुत कर रहे हैं ताकि सही हक़ीक़त सामने आ सके. असल में इन वादों के माध्यम से वे अमरीकी सर्वोच्च न्यायालय के जून माह के उस ऐतिहासिक फैसले का विरोध   करना चाह रहे हैं जिसने समान-सेक्स विवाहों को वैध करार दिया था. इसे यों भी समझा जा सकता है कि अपने इन वादों के माध्यम से क्रिस अपने देश के न्यायालयों को यह धमकी देना चाह रहे हैं कि वे यह स्वीकार कर लें कि उन्होंने समान सेक्स के बीच विवाह की अनुमति देने का जो फैसला  दिया है वह  नैतिक रूप से दोषपूर्ण है, और अगर वे यह मानने को तैयार नहीं हैं और अपने निर्णय पर अडिग हैं तो फिर  उन्हें भी एक महंगी मशीन के साथ विवाह बन्धन में बंधने की अनुमति प्रदान कर दें.

खुद को क्रिश्चियन बताने वाले और इलेक्ट्रॉनिक संगीत के प्रस्तुतकर्ता क्रिस का कहना है कि उनका यह वाद न तो बेहूदा है और न ही व्यंग्यात्मक, लेकिन वे यह अवश्य मानते हैं कि  अमरीकी सर्वोच्च  न्यायालय के इस फैसले ने संविधान का ही अपहरण कर डाला है, और इसलिए इस वाद के माध्यम से वे यह कहते हुए कि समान सेक्स वाले दो व्यक्तियों के बीच विवाह ठीक वैसी ही बात है जैसी मनुष्य और मशीन के बीच विवाह, एक कर्कश तर्क प्रस्तुत कर रहे हैं. “सवाल यह है कि क्या हमारी नीतियां ऐसी होनी चाहिएं जो इस तरह की जीवन शैली  को प्रोत्साहित करें? सरकार लोगों को इस तरह की जीवन शैली अपनाने के लिए प्रोत्साहित करके किसी का भी भला नहीं कर रही है. ज़रूरत इस बात की है कि हम विवाह को ठीक से  परिभाषित करें.” यह कहना है क्रिस का. 

स्वाभाविक है कि क्रिस के ये तर्क बहुतों के गले नहीं उतरे हैं और उन्होंने अपनी-अपनी तरह से इनका विरोध किया है. टेक्सस राज्य के रिपब्लिकन स्टेट अटॉर्नी जनरल पेक्सटन ने संघीय जज महोदय से अनुरोध किया है कि वे इस वाद को अस्वीकृत कर दें. उनका तर्क है कि समान-सेक्स विवाह की अनुमति देने वाला अमरीकी सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय मानव और मानवेतरों यानि मनुष्य और मशीनों पर लागू नहीं होता है. टेक्सस के ही एक गे  मैट वुल्फ जो इसी वर्ष अपने साथी से विवाह करने वाले हैं, का भी कहना है कि वो हर तर्क जो दो सामान्य प्रेम करने वाले मानवों के बीच समानता और सहमति के आधार पर होने वाले विवाह की तुलना किसी और से करके उसका विरोध करना चाहता है, ग़लत है. उनका मानना है कि इस तरह के विरोधी तर्क व्यक्ति विशेष के भय और सोचे समझे अज्ञान पर आधारित हैं. 

इस वाद और विवाद पर अमरीकी अदालतें क्या फैसला देती हैं यह तो आने वाला समय ही बताएगा, लेकिन इस बीच यह जान लेना भी रोचक होगा कि क्रिस नामक यह व्यक्ति पहले भी अजीबोगरीब हरकतें करता रहा है. तीन बरस पहले उसने अमरीका की उसी विख्यात कम्प्यूटर निर्माता कम्पनी पर एक दावा ठोका था जो मैकबुक बनाती है. अपनी पचास पन्नों की शिकायत में क्रिस ने कहा था कि इस कम्पनी के उत्पादों में वे तमाम सुरक्षा इंतज़ामात नहीं हैं जो अवांछित अश्लील सामग्री के हमलों से उनके उपयोगकर्ताओं को बचा  सकें. क्रिस का कहना था कि इस तरह की अश्लील सामग्री खुद उसके जीवन को विषाक्त कर चुकी है. उन्होंने अदालत से अनुरोध किया था कि वे कम्पनी को पाबन्द करे कि  वो अपने उत्पाद इस तरह के सुरक्षा प्रावधानों के बाद ही बेचेगी.

पहली नज़र में भले ही क्रिस जैसे लोगों के ये कृत्य ऊल जुलूल लगें, यह नहीं भूला जाना चाहिए कि दुनिया में बहुत सारे सकारात्मक बदलावों का सूत्रपात  ऐसे ही कृत्यों से हुआ है.   
  
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अन्तर्गत मंगलवार, दिनांक 26 अप्रेल, 2016 को  जो हमें समझ न आए उस कर्म की भी हो सकती है कोई सार्थकता शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 


Tuesday, April 19, 2016

शेक्सपीयर कुछ भी कहें, नाम की अहमियत कम नहीं है

महान अंग्रेज़ी लेखक विलियम शेक्सपीयर का यह कथन आपने ज़रूर सुना होगा-  व्हाट्स इन अ नेम, यानि नाम में क्या रखा है? उनके अमर नाटक रोमियो एण्ड जूलियट में यह बात जूलियट से कहलाई गई  है. शेक्सपियर ने भले ही अपने एक किरदार  से यह कहला दिया हो, दुनिया में नाम  की अहमियत जस की तस है. और मज़े की बात तो यह कि बाकी दुनिया की बात तो छोड़िये, खुद शेक्सपीयर के देश यानि ब्रिटेन में हाल की एक घटना ने एक बार फिर उनके इस बहु उद्धृत कथन पर  सवालिया निशान लगा दिया है.

वहां के वेल्स की पॉविस काउण्टी की एक महिला ने जब अपनी हाल में जन्मी  बेटी का नाम सायनाइड  (एक घातक ज़हर) और उसके भाई का नाम प्रीचर (धर्मोपदेशक) रखना चाहा  तो वहां की एक अदालत के जज  ने उन्हें इस बात की अनुमति नहीं दी. आप पूछेंगे  कि कोई अपनी संतान का नामकरण क्या करना चाहता है इसमें अदालत कहां बीच में आती है? तो,  मैं बता ही देता हूं. हुआ यह कि इस पॉविस काउण्टी काउंसिल के कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं को जब यह बात पता चली कि उनके इलाके की एक महिला अपने हाल में जन्मे दो जुड़वां बच्चों का अजीबोगरीब नामकरण करना चाह रही है तो उन्हें बीच में कूद पड़ना ज़रूरी लगा. इस पर एक जज ने उस महिला द्वारा अपने नवजात बच्चों के ये असामान्य नाम रखने पर निषेधाज्ञा जारी कर दी.

लेकिन उस महिला ने भी इस  निषेधाज्ञा को सहज रूप से स्वीकार करने की बजाय इसके खिलाफ अपने वकीलों के माध्यम से अपील करना उचित समझा. उसके वकीलों का तर्क था कि वो अपने बच्चों का क्या नामकरण करे यह उसका सहज स्वाभाविक मानवीय अधिकार है और इस पर लगाई गई कोई भी रोक उसके अपने पारिवारिक जीवन के प्रति सम्मान के उसके अधिकार का उल्लंघन होगी.  तीन जजों ने उनकी इस अपील को सहानुभूतिपूर्वक सुना और फिर यह निर्णय सुनाया कि किसी बच्ची  का  नामकरण एक घातक ज़हर के नाम पर करना क़तई स्वीकार्य नहीं है. इन जजों  ने अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा कि रुचियों और  फैशन में आने वाले बदलावों और तेज़ी से विकसित होती हुई निजता की अवधारणाओं को स्वीकार करने के बावज़ूद वे मानते हैं कि किसी बच्ची के लिए सायनाइड नाम बहुत अजीब है. इससे पहले उस बच्ची की मां ने अपने पक्ष में दलीलें देते हुए कहा था कि उनका मानना है कि सायनाइड एक प्यारा और खूबसूरत नाम है, इसका सम्बन्ध तो फूलों और पौधों से है  और यह सकारात्मक संकेत भी देता है. अपनी बात को उन्होंने इस तर्क के साथ स्पष्ट  किया कि हिटलर और गोयबल्स जैसों की जान लेना तो उनके खयाल से एक उम्दा  काम था और  इसलिए वे मानती हैं कि यह नाम एक सकारात्मक संदेश देता है.  उस महिला ने प्रीचर नाम का  भी यह कहते  हुए समर्थन किया  कि यह नाम बहुत कूल है और इससे एक सशक्त आध्यात्मिक संदेश मिलता है. उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि इस नाम से मिलने वाला सन्देश भविष्य में भी उनके बेटे को सम्बल प्रदान करेगा. लेकिन जज उनके वकीलों और उनकी दलीलों से संतुष्ट नहीं हुए और उन्होंने कहा कि यह मामला उन दुर्लभतम मामलों में से एक है जिनमें अदालत को किसी बच्ची को उसके सायनाइड नाम की वजह से  भविष्य में निश्चित रूप से होने वाली मानसिक क्षति से बचाने के लिए हस्तक्षेप करने को मज़बूर होना पड़ रहा है. उनका कहना था कि इस तरह का नाम भविष्य में उस बच्ची के लिए उस बर्ताव की आशंका पैदा करता है जिसे तंग करने की सामान्य सीमाओं से काफी आगे  का माना जा सकता है. इन जजों ने स्वीकार किया कि प्रीचर नाम अजीब होते हुए भी उतना बुरा नहीं है. लेकिन कुल मिलाकर उनका फैसला यह रहा कि इन जुड़वां शिशुओं के हक़ में यही बात उपयुक्त रहेगी कि उनके नाम उनके सौतेले भाई बहनों द्वारा चुन लिये जाएं.     


जजों के इस फैसले के पीछे नाम की व्याख्या और उससे निकलने वाली ध्वनियां तो थी हीं, उस महिला का त्रासद अतीत भी था. उन जजों के संज्ञान में यह बात भी थी कि उस महिला की ये जुड़वां संतानें किसी बलात्कार का परिणाम  थीं. यही नहीं, वह मानसिक रुग्णता से भी ग्रस्त रह चुकी थी, ड्रग्स और मदिरापान की लत की शिकार थी और  ग़लत बर्ताव करने वाले पुरुषों की संगत में रह चुकी थी. शायद इन्हीं सब वजहों  से उसकी पहले की तीन संतानें भी उसकी छत्र छाया से दूर अन्य पोषणकर्ता अभिभावकों के पास पल रही थीं.
 

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 19 अप्रैल, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित  आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, April 12, 2016

स्वीडन ने आम नागरिकों को बनाया देश का राजदूत!

दुनिया का हर देश कोशिश करता  है कि अन्य देशों के निवासी न केवल उसके बारे में अधिक से अधिक जानकारी प्राप्त करें;  वह यह भी चाहता है कि अन्य देश उसके प्रति सद्भावना भी रखें. सद्भावना के प्रसार के लिए अनगिनत प्रयास किए जाते हैं. एक से दूसरे देश में शिष्टमण्डल जाते हैं, कलाकारों का आदान-प्रदान होता है, राजनयिक गतिविधियां होती हैं, बड़े नेता एक दूसरे के देशों की  सद्भावना  यात्राएं करते हैं- ऐसे ही अन्य  अनगिनत काम और प्रयास किए जाते हैं.  कहना अनावश्यक है कि सद्भावना  का यह प्रसार छवि को ही उजला नहीं बनाता है, व्यावसायिक सम्भावनाओं को भी पंख देता है.

महज़ दस लाख से भी कम आबादी वाला यूरोप महाद्वीप का देश स्वीडन दुनिया के सर्वाधिक शांत देशों में से एक माना जाता है. लेकिन इसी के साथ यह बात भी जोड़ देना उपयुक्त होगा कि दुनिया के ऐसे दस देशों की सूची में, जहां बलात्कार सर्वाधिक होते हैं, यह देश तीसरे नम्बर पर आता है. भारत का नम्बर इस देश के फौरन बाद यानि चौथा  है. लेकिन संख्याओं का यह खेल खासा भ्रामक भी है. असल में तो स्वीडन दुनिया के उन देशों में अग्रणी है जहां स्त्री-पुरुष समानता सर्वाधिक है और स्त्रियों को अपनी बात कहने की और अपने लिए सुरक्षा पाने की सबसे अधिक सुविधाएं सुलभ हैं. यही कारण है कि स्वीडन में एक लाख की जनसंख्या पर बलात्कार के अड़सठ मामले दर्ज़ होते हैं, जबकि भारत में उसी एक लाख जनसंख्या पर मात्र दो मामले दर्ज़ होते हैं. यानि स्वीडन की यह ‘कुख्याति’ असल में उसके इस  गुण की वजह से है कि वहां स्त्री किसी अन्याय को सहने की बजाय उसका प्रतिरोध करती है.  तो इस तरह आंकड़े असल से भिन्न तस्वीर पेश कर डालते हैं. यथार्थ यह है कि 2014 की ग्लोबल जेण्डर गैप रिपोर्ट के अनुसार लैंगिक समानता के मामले में स्वीडन  दुनिया के  शीर्षस्थ देशों में शुमार है.

इसी स्वीडन देश के पर्यटन विभाग ने हाल ही में अन्य देशों के बीच अपने देश की छवि को और अधिक निखारने के लिए एक महत्वपूर्ण पहल की है. आज उसी की चर्चा. स्वीडिश पर्यटन एजेन्सी ने ‘कॉलिंग स्वीडन’ नाम से एक सेवा शुरु की है जो पूरी दुनिया के लोगों को आमंत्रित करती है कि वे दिए गए नम्बर पर कॉल करें तो उनकी बात किसी स्वीडिश नागरिक से होगी और उससे वे किसी भी  मुद्दे पर बात कर सकेंगे. इसके लिए इस स्वीडिश एजेंसी ने एक विज्ञापन देकर अपने देश के नागरिकों को आमंत्रित किया कि वे एक एप डाउनलोड करें जिसके  माध्यम से वे अगले दो महीनों  तक किसी अनजान  विदेशी से संवाद कर सकेंगे. अब जैसे ही कोई विदेशी उस दिए गए नम्बर पर फोन करता है उसे आकस्मिक रूप से चुने गए किसी स्वीडिश नागरिक से जोड़ दिया जाता है और फिर वे दोनों  किसी भी विषय या मुद्दे पर बात कर सकते हैं. अभी हाल ही में शुरु हुई इस सेवा से तीन हज़ार स्वीडी नागरिक जुड़ चुके हैं, और साढ़े साथ हज़ार कॉल उन्हें प्राप्त हो चुके हैं.  

समझा जा सकता है कि स्वीडिश पर्यटन एजेंसी ने इस योजना के माध्यम से अपने देश के आम नागरिक को भी अपना राजदूत बनाने का प्रयास किया है. यह  आशंका हो सकती है कि क्या पता कब कोई स्वीडी नागरिक ऐसी गैर ज़िम्मेदाराना हरकत कर जाए कि देश की छवि संवरने की बजाय बिगड़ जाए, मसलन वो अपने देश के बारे में कोई ग़लत बात कह दे, उसकी आलोचना कर दे या और कुछ नहीं तो सामने वाले से अशिष्ट बर्ताव ही कर डाले!   इन आशंकाओं को पूरी तरह निर्मूल भी नहीं ठहराया जा सकता. और ऐसा भी नहीं है कि स्वीडिश पर्यटन एजेंसी ने इन आशंकाओं को मद्दे नज़र नहीं रखा. लेकिन उसने बहुत सोच विचारकर बलपूर्वक यह कहा कि हर नागरिक नेक इरादों वाला होता है और हमें उस पर भरोसा करना चाहिए! वैसे स्वीडन में अपने देश वासियों पर भरोसा करने की परम्परा पहले से मौज़ूद है. मसलन, वहां एक आधिकारिक सरकारी ट्विटर खाता है जिसका संचालन हर सप्ताह एक भिन्न नागरिक करता है और उसे यह अधिकार होता है कि वह देश की तरफ से किसी भी मुद्दे पर अपनी राय व्यक्त करे. यह राय सकारात्मक भी हो सकती है, नकारात्मक भी.

है ना यह बहुत बड़ी बात! आखिर क्यों नहीं किसी देश को अपने आम नागरिक पर भरोसा करना चाहिए? स्वीडिश एजेंसी का यह सोच कि पेशेवर राजदूत का काम अपनी जगह, अगर उसी के साथ  आम नागरिक को भी अपने देश का प्रतिनिधित्व करने का अवसर प्रदान किया जाए तो उसके बेहतर परिणाम सामने सकते हैं, दुनिया के और देशों के लिए भी अनुकरणीय न भी हो तो विचारणीय तो है ही.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, दिनांक 12 अप्रेल, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, April 5, 2016

सामान्य की सम्भावनाएं चुक जाने के बाद असामान्य का रुख

बहुत सारी फिल्मों और टीवी प्रोग्रामों को देखते हुए क्या आपको भी ऐसा लगता है कि इनको क्यों बनाया गया है और कोई औसत  बुद्धि वाला इंसान भी इन्हें कैसे देख या झेल सकता है! उनका तर्कातीत होना, ऊल जुलूल होना, मूर्खतापूर्ण होना और अशालीन होना जैसे महज़ यह परखने लिए होता है कि उन्हें  देखते हुए आप अपना धैर्य खोते  हैं या नहीं! लेकिन जिन चीज़ों को देखते हुए आप कुढ़ते-चिढ़ते हैं उनका भी एक वफ़ादार दर्शक समुदाय होता है. अगर न हो तो उन्हें बनाया ही न जाए! जो लोग इस तरह की फिल्में या प्रोग्राम बनाते हैं उनकी नज़रें बॉक्स ऑफिस या टी आर पी पर टिकी होती हैं. अगर आप मनोरंजन की दुनिया के निकट अतीत को खंगालें तो पाएंगे कि इस तरह की निर्मितियों की अतार्किकता और बेहूदगी घटने की बजाय बढ़ी ही है. जो चीज़ दस-पाँच बरस पहले कल्पनातीत थी आज वह इतनी आम हो चुकी है कि आपको चौंकाती तक नहीं है. क्या पता कि इन्हें बनाने वालों का संकट यह हो कि सामान्य की तो सारी सम्भावनाएं चुक गई हैं, इसलिए अब उन्हें असामान्य का ही रुख करना है.

इधर ब्रिटेन  से एक ख़बर यह आई है कि वहां के एक लोकप्रिय चैनल पर जो कि नई तरह के कार्यक्रम प्रस्तुत करने के जुनून में सीमाएं लांघ जाने के लिए जाना जाता है,  एक नया शो  लाया जा रहा है. इस शो का नाम है ‘साइंस ऑफ अट्रेक्शन’  यानि आकर्षण का विज्ञान. लेकिन कहते हैं न कि नाम में क्या रखा है? असल बात तो है शो की विषय वस्तु. तो यह एक डेटिंग शो होगा, लेकिन इसके निर्माताओं का कहना है कि यह अब तक के तमाम डेटिंग शो’ज़ से नितान्त  भिन्न होगा. अब यह भी जान लीजिए कि इसमें भिन्न क्या होगा? इस शो के शुरु में आठ युवा स्त्री-पुरुषों को एक सी-थ्रू बक्से में रखा जाएगा! नयापन यह होगा कि ये सबके सब एकदम निर्वस्त्र होंगे! इन आठ में से एक स्त्री और एक पुरुष वे होंगे जिन्हें शेष छह में से अपने लिए एक-एक साथी का चयन करना है. इस शो का शीर्षक तो  सम्मानजनक है ही, इसे और गरिमा प्रदान करने के लिए इसमें एक साइकोलॉजिस्ट  को भी शामिल किया गया है जो प्रतियोगियों का मनोविश्लेषण प्रस्तुत कर इस शो में बौद्धिकता का तड़का लगाएगा. चुनाव करने वाले स्त्री-पुरुष एक-एक करके प्रतियोगियों को भिन्न-भिन्न मापदंडों  पर परखते हुए खारिज करते जाएंगे और अंत  में जब इन दोनों के लिए एक-एक साथी बच रहेगा तो ये उसके साथ डेट पर चले जाएंगे.  यह पूरा शो कुल तीन राउण्ड्स में होगा. पहले राउण्ड की तो चर्चा हो ही चुकी  है. दूसरे राउण्ड में प्रतियोगियों को वस्त्र धारण करने होंगे और फिर उनका आकलन उनके ड्रेस सेंस के आधार पर होगा. तीसरे और अंतिम दौर में प्रतियोगी अपने-अपने बारे में बताएंगे और इस आधार पर उनके व्यक्तित्वों का विश्लेषण किया जाएगा. जिन दो प्रतिभागियों को अपने लिए साथी चुनने हैं वे भी अपनी बात कहेंगे और बताएंगे कि किसी को वे क्यों पसन्द या नापसन्द कर रहे हैं.

इस शो की विषय वस्तु के आधार पर यह अनुमान भी लगाया जा रहा है कि शायद इसका नाम ‘साइंस ऑफ अट्रेक्शन’  न होकर ‘नेकेड अट्रेक्शन’  रहे. इस अनुमान का एक आधार यह भी है कि अमरीका में ‘डेटिंग नेकेड’  शीर्षक वाला एक शो काफी कामयाब रह चुका है. लोकप्रिय तो ‘ब्लाइण्ड डेट’  शीर्षक कार्यक्रम भी काफी रहा है लेकिन जिस शो की हम चर्चा  कर रहे हैं उसके निर्माताओं का दावा है कि उनका यह शो अब तक का सबसे अनूठा शो होगा. कहना अनावश्यक है कि अपने शो को अनूठा बनाने के क्रम में वे नग्नता और अश्लीलता से कोई दूरी नहीं बरतेंगे. अभी तक इस शो के जो प्रोमोज़ जारी हुए हैं उनसे भी इस बात की पुष्टि होती है. और जैसे इतना ही पर्याप्त न हो, निर्माताओं की तरफ से यह भी कहा जा चुका है कि इस शो में गे और लेस्बियन प्रतिभागियों पर भी एपिसोड होंगे.

सुखद आश्चर्य की बात यह है कि भले ही इस शो का निर्माण प्रारम्भ हो चुका है, निर्माताओं को इसके लिए आठ प्रतिभागी जुटाने में भी काफी मशक्कत करनी पड़ रही है. वे सोशल  मीडिया पर लोगों को पुकार रहे हैं लेकिन लोग हैं कि अपनी गरिमा को दांव पर लगाने को तैयार नहीं हैं. लेकिन देर-सबेर प्रोग्राम तो बनेगा ही. मुझे फिक्र इस बात की सता रही है कि हमारे अपने देशी निर्माता जो हर विदेशी प्रोग्राम की नकल करने को आतुर रहते हैं, उन्हें इस प्रोग्राम से ‘प्रेरणा ग्रहण’ करने से कौन रोकेगा, और कब तक?  
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक  न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 05 अप्रेल, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

    

Tuesday, March 29, 2016

बन्द करनी पड़ रही हैं जेलें क्योंकि घट रहे हैं अपराध!

एक तरफ जहां दुनिया के ज़्यादातर देश इस बात से त्रस्त हैं उनकी जेलों में जगह कम पड़ती जा रही है वहां एक देश ऐसा भी है जिसका संकट भिन्न और कम से कम हमारे लिए तो कल्पनातीत है. लगभग 170 लाख की आबादी वाला देश नीदरलैण्ड इस बात से परेशान है कि उसकी जेलों में जितने लोगों के लिए स्थान है उससे बहुत कम लोग उनमें बन्द हैं, और इस कारण सरकार को बेवजह जेलों का व्यय भार वहन करना पड़ रहा है. नीदरलैण्ड  की जेलों में कुल चौदह हज़ार कैदियों  के लिए जगह है जबकि वहां कैदियों  की संख्या ग्यारह हज़ार छह सौ ही  है. और यह स्थिति आज ही नहीं पैदा हुई है.  कम कैदियों की वजह से वहां  खाली  पड़ी  जेलों को बन्द करने का सिलसिला 2004 से ही जारी है.  2009 में वहां आठ जेलों को बन्द किया गया और फिर 2013 में उन्नीस और जेलों को बन्द करना पड़ा था. अब पाँच और जेलों को बन्द किए जाने की चर्चा ज़ोरों पर है.  लेकिन जेलों को बन्द करने से एक अन्य समस्या पैदा हो जाती है. बन्द की गई जेलों के कर्मचारियों को कहां समायोजित किया जाए? अभी वहां जितनी जेलें खाली पड़ी हैं अगर उन सबको  बन्द कर दिया  जाए तो करीब दो हज़ार लोग बेकार हो जाएंगे.  ऐसे में नीदरलैण्ड  सरकार ने एक दिलचस्प क़दम उठाया है. कदम है अपनी जेल सुविधाओं की आउटसोर्सिंग. अभी कुछ ही समय पहले  नॉर्वे ने अपने एक हज़ार से ज़्यादा कैदी नीदरलैण्ड  की जेलों में भेजने का फैसला किया है क्योंकि वहां उनके लिए जगह की कमी पड़ रही थी. ये जेलें नॉर्वे के नियमों के अनुसार संचालित की  जाएंगी  लेकिन इनके कर्मचारी  नीदरलैण्ड के होंगे. इससे पहले 550 बेल्जियन अपराधी  नीदरलैण्ड  की जेलों में रह रहे हैं.   

यह जानना रोचक और ज्ञानवर्धक होगा कि नीदरलैण्ड  में न सिर्फ अपराध दर में लगातार कमी आ रही है, वहां के जज लोग सजाएं देने में भी कंजूसी बरतने लगे हैं जिसके परिणामस्वरूप  अपराधियों को जेलों में औसतन कम समय बिताना पड़ रहा है. दुनिया के अन्य देशों की तुलना में नीदरलैण्ड के ड्रग कानून ज्यादा  उदार  माने जाते हैं, फलत: इस कारण जेल जाने वालों की संख्या कम हो जाती है. लेकिन ऐसा नहीं है कि नीदरलैण्ड में अपराध के आंकड़ों को कम करके  बताने के लिए लोगों को सज़ा नहीं दी जाती है. वहां वाकई गम्भीर  अपराधों में भी लगातार कमी आती जा रही है. नीदरलैण्ड में  अपराधियों को सज़ा देने की बजाय उनके  सुधार और पुनर्वास करने को तथा अपराधों को घटित होने से रोकने या उन्हें कम करने के प्रयासों को वरीयता दी जाती है और ऐसे प्रयास किये जाते हैं जिनके कारण लोग समाज की मुख्यधारा में रहते हुए और समाज के लिए उपयोगी बने रहते हुए अपने किए की सज़ा भुगतते हैं. इसके लिए वहां एक एंकल (टखना) मॉनिटरिंग की इलेक्ट्रॉनिक व्यवस्था भी चलन में है जिसके चलते राज्य को अपराधी की हलचल की जानकारी तो रहती है लेकिन उसे जेल में बन्द नहीं रखा जाता है. इस व्यवस्था का एक लाभ यह और होता है कि राज्य को किसी व्यक्ति को जेल में रखने पर जो खर्चा करना होता है वह बच जाता है. अनुमानत: एक व्यक्ति को जेल में रखने पर पचास हज़ार डॉलर प्रति वर्ष खर्च आता है. इस तरह अगर सरकार एक साल में एक हज़ार लोगों को जेल में नहीं रखती है तो वह हर साल पाँच सौ लाख डॉलर बचा लेती है जिनका बेहतर इस्तेमाल हो सकता है. सरकार के इन प्रगतिशील और उन्नत तौर तरीकों का परिणाम यह हुआ है कि नीदरलैण्ड  में प्रति एक लाख नागरिक मात्र 69 कैदी हैं. इस दर की तुलना अमरीका की दर से करने पर दो भिन्न व्यवस्थाओं का अंतर स्पष्ट हो जाता है. अमरीका में प्रति एक लाख नागरिक सात सौ सोलह कैदी हैं और यह दर दुनिया में सर्वाधिक है. अमरीका की जेलें खचाखच भरी हुई हैं और वहां की सरकार को अपने कैदियों को निजी और कॉर्पोरेट स्वामित्व वाली जेलों तक में भेजने को मज़बूर होना पड़ता है. वैसे इस तरह की निजी  जेलों में उन्हीं अपराधियों को भेजा जाता है जिनके अपराध  छोटे और इस तरह के होते हैं जिनसे कोई और प्रभावित नहीं हुआ होता है. इस तरह के अपराधों में किसी के पास थोड़ी मात्रा में ड्रग पाये जाने जैसे अपराध शामिल होते हैं.   असल में दुनिया  के ज़्यादातर देशों में अपराध के लिए दंड का प्रावधान तो है लेकिन जेल से आए हुए व्यक्ति के सुधार और पुनर्वास की समुचित व्यवस्था न होने का दुष्परिणाम यह होता है कि जेल से बाहर आया व्यक्ति फिर से जेल चला जाने को विवश हो जाता है. इस तरह अपराध का आंकड़ा लगातार बढ़ता जाता है.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 29 मार्च, 2016 को नीदरलैण्ड में अपराध कम तो जेलों पर मण्डराया ख़तरा शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, March 15, 2016

मेक्सिको पुलिस का एक अनूठा प्रयोग

जब भी पुलिस शब्द कानों में पड़ता है एक ख़ास किस्म की दृढ़ता भरी, रौब-दाब वाली छवि जेह्न में उभर आती है. पुलिस का काम ही कुछ ऐसा है कि उसकी छवि इससे इतर हो ही नहीं सकती. उसे कानून  व्यवस्था  कायम करनी होती है, अपराध पर नियंत्रण पाना होता है, नागरिकों को सुरक्षा प्रदान करनी होती है, वगैरह. और यह सब दृढ़ता के बिना मुमकिन नहीं हो सकता. लेकिन अगर कुछ समय पहले आप मेक्सिको गए होते तो आप मेरी बात से ज़रूर असहमत  होते. असल में वहां सन 2013 में एक रिटायर्ड जनरल रोनाल्डो यूजीनियो हिडाल्गो एडी ने एक ख़ास किस्म की ब्रिगेड का गठन किया था. और  जब  मेक्सिको के 57 वें राष्ट्रपति एनरिक पेना निएटो ने इस ब्रिगेड के सदस्यों के साथ खिंचाई हुई अपनी एक फोटो प्रकाशित करवाई तब से यह ब्रिगेड  चर्चाओं में आई.

असल में मेक्सिको के अकापुल्को इलाके के पुलिस चीफ ने वहां की नगरपालिका पुलिस के विस्तार के रूप में एक टूरिस्ट असिस्टेंस ब्रिगेड का गठन किया था जिसमें 18 से 28 वर्ष की वय वाली कुल 42 युवतियां शामिल थीं. इस ब्रिगेड का मुख्य दायित्व था वहां के पर्यटकों की संतुष्टि सुनिश्चित  करना. इसके लिए उन्हें वहां के समुद्र तटों की निगरानी करनी होती थी, पैदल चलने वालों की सुविधा के लिए ट्रैफिक को  नियंत्रित करना होता था और जब तक पुलिस उन्हें गिरफ्तार न कर ले तब तक अपराधियों को हथकड़ी लगाकर रखना होता और इसी तरह के अन्य दायित्वों का निर्वहन करना होता था. ये सारे काम करने  के लिए इस ब्रिगेड की सदस्याओं को आत्म रक्षा, जीवन रक्षा और भीड़ को नियंत्रित करने के लिए   मेक्सिकन फेडेरल सेना की तरफ से तीन महीने का  प्रशिक्षण दिया जाता था. इन्हें हर माह करीब साढ़े चार सौ डॉलर का वेतन दिया जाता था.

और अब ख़ास बात. इस ब्रिगेड में युवतियों को उनके शारीरिक आकर्षण के आधार पर भर्ती किया जाता था और उन्हें टाइट फिटिंग वाली यूनीफॉर्म पहननी होती  थी, जिसमें भूरे रंग के बरमूडा शॉर्ट्स, हल्के नीले रंग के पोलो शर्ट्स, गुलाबी लिपस्टिक और सनग्लासेस शामिल थे. इन्हें  4.7 इंच की हील पहननी होती थी. इस ब्रिगेड की शिफ्ट सुबह सात बजे से शुरु होती थी और सबसे पहले तीस मिनिट तक इन्हें मेक अप करना होता था, जिसके बाद म्युनिसिपल फोर्स के वरिष्ठ अधिकारी इनका  मुआयना करते.  उसके  बाद ही ये अपनी ड्यूटी पर जा सकती थीं. इस ब्रिगेड को दुनिया की सबसे ज़्यादा सेक्सी पुलिस टुकड़ी कहा और  माना जाता था. यह सुनकर भी अगर आप चौंक नहीं रहे हैं तो फिर यह और जान लीजिए कि अधिकारी गण को इस बात से कोई आपत्ति नहीं थी कि यह पुलिस टुकड़ी पर्यटकों के साथ फ्लर्ट करे, क्योंकि वे चाहते थे कि पर्यटक वहां की सुहानी यादें अपने साथ लेकर जाएं.

अब ज़रा इस सबकी पृष्ठभूमि भी जान लीजिए. दर असल मेक्सिको के इस हिस्से की अर्थव्यवस्था का अस्सी प्रतिशत पर्यटन पर आधारित है लेकिन जब से वहां ड्रग माफिया के आपसी टकरावों ने गैंग वार्स की शक्ल अख्तियार की, वहां का पर्यटन बहुत बुरी तरह से प्रभावित हुआ. तब वहां के प्रशासन को लगा कि पर्यटकों का भरोसा और उनका दिल जीतना ज़रूरी है. उन्हें यह भी लगा कि ऐसी नवाचारी पुलिस उनमें ज़िम्मेदारी और विश्वास का भाव जगा सकेगी, और महिलाओं की यह टुकड़ी शायद भ्रष्ट तौर तरीकों से भी दूरी बरतेगी. और न केवल पर्यटकों ने बल्कि खुद इन पुलिस कर्मियों ने भी इस प्रयोग की सराहना की. एक पुलिस कर्मी ने अपना अनुभव  साझा करते हुए कहा कि आप अनुमान भी नहीं लगा सकते कि कोई बेहद खतरनाक ड्राइवर भी उस वक्त कितना शालीन बन जाता है जब कोई सेक्सी लड़की उसके खिलाफ़ कार्यवाही करती है.

लेकिन मेक्सिको के उस राज्य में पुलिस की कमान जैसे ही एक नए  चीफ ने सम्हाली, यह प्रयोग बीते ज़माने की बात बना दिया गया. इस नए चीफ एडुआर्डो बाहेना ने इस  टुकड़ी की 13 कार्मिकों की तो छुट्टी ही कर दी और शेष को हुक्म दिया कि वो पुलिस की आम वर्दी पहनना शुरु कर दें. कुछ कार्मिकों ने इस बदलाव का भी स्वागत किया है. मसलन उनमें से एक, रोसा का कहना है कि जब वे उस सेक्सी यूनीफॉर्म में होती थीं तो लोग ताज्जुब करते हुए उनके पास आते थे, क्योंकि मैं  असल पुलिस वाली लगती ही नहीं थीं. अब जब मैं पुलिस की वर्दी और पुलिस के जूते पहनती हूं तो मुझे गर्व महसूस होता है. गर्व तो मुझे पहले भी था लेकिन अब वह बढ़ गया है.

होली दूर नहीं है. इसलिए अब ज़रा यह कल्पना करने का कष्ट कीजिए कि अगर कभी हमारे देश में भी ऐसा प्रयोग किया गया तो हमें  कैसी छवियां देखने को मिलेंगी?

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 15 मार्च, 2016 को मैक्सिको में सुन्दरता से अपराध पर काबू पाने का हुआ प्रयास शीर्षक से प्रकाशित  आलेख का मूल पाठ.  

Tuesday, March 8, 2016

महज़ धूल का एक कण नहीं हूं मैं

संयुक्त राज्य अमरीका के उत्तर पश्चिमी  राज्य साउथ कैरोलिना के एक हाई स्कूल में हाल में घटी घटना का वर्णन हमें काफी कुछ सोचने को विवश कर रहा  है. घटना यह है कि एक कक्षा खत्म होने और दूसरी शुरु होने के बीच के लगभग चार मिनिट के अंतराल में एक तैंतीस वर्षीय शिक्षिका अपना मोबाइल कक्षा में ही छोड़ कर किसी और काम से बाहर चली जाती है. तभी एक सोलह वर्षीय विद्यार्थी उनका मोबाइल उठाता है, उसकी सामग्री को खंगालता है और उसमें से उस अध्यापिका की चार कम वस्त्रों वाली या निर्वसन तस्वीरों को अपने मोबाइल कैमरे में कैद कर लेता है. तभी वो शिक्षिका लौट आती है. विद्यार्थी उससे कहता है कि आपके फैसले का दिन आन पहुंचा है. शिक्षिका इस बात को बहुत गम्भीरता से नहीं लेती है. लेकिन  इसके बाद वो विद्यार्थी उन चार तस्वीरों के रंगीन प्रिण्ट बनवा कर अपनी मैं’म के मेल बॉक्स में पहुंचाता है, इन तस्वीरों में से एक के पीछे वो उन्हें और उनके बेटे को धमकी का एक सन्देश भी लिख भेजता है. इसी के साथ वो विद्यार्थी उन तस्वीरों में से एक को सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों से अपने सहपाठियों के साथ साझा भी करता है. शिक्षिका बाद में बताती हैं कि उन्होंने ये सेल्फियां वैलेण्टाइन दिवस पर अपने पति को भेजने के लिए ली थीं, और उनके मोबाइल में कोई पास-कोड नहीं था.

इतना वृत्तांत बहुत आम किस्म का है. जिन लोगों का शिक्षण संस्थाओं से ज़रा भी ताल्लुक है वे जानते हैं कि विद्यार्थी इससे भी गम्भीर ‘शरारतें’ करते रहते हैं और शिक्षकगण अपनी तरह से उनका सामना भी करते रहते हैं. लेकिन यहां घटनाक्रम कुछ अलग मोड़ लेता है. वो शिक्षिका जब अपने प्रिंसिपल से इस घटना की शिकायत करती है तो उसे सलाह दी जाती है कि वो इसकी अनदेखी कर दे. लेकिन उससे अगले ही दिन उसे बुला कर कहा जाता है कि ज़िला अधीक्षक ने उसका इस्तीफा मांगा है! वो अधीक्षक से बात करके इसकी वजह जानना चाहती है तो उसे कहा जाता है  कि इस्तीफा इसलिए मांगा जा रहा है कि एक तो उसके फोन में आपत्तिजनक सामग्री थी, और दूसरे यह कि उसने यह सामग्री अपने विद्यार्थियों को सहज  सुलभ करवाई! ये अधीक्षक महोदय बाद में अपने एक बयान में कहते हैं कि सबूतों और बयानों से अनुमान होता है कि जब यह घटना घटी तब वो शिक्षिका उस जगह पर नहीं थी जहां पर उसे होना चाहिए था. इस वजह से एक विद्यार्थी ने उनके मोबाइल फोन से अनुपयुक्त सामग्री  चुरा कर उसे औरों के साथ साझा कर ली. यानि अगर वो शिक्षिका  अपने विद्यार्थियों की ठीक से निगरानी करती तो एक बहुत गम्भीर समस्या को घटित  होने से रोक सकती थी. उन्होंने यह भी कहा कि इस घटना का विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा.

इसके फौरन बाद, घटनाक्रम से क्षुब्ध होकर इस शिक्षिका ने अपना इस्तीफा दे दिया. उसकी पीड़ा यह भी थी कि स्कूल ने उस विद्यार्थी के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की. लेकिन इस्तीफा देने के अगले ही दिन उसने  यह कहते हुए इसे वापस लेने की पेशकश कर डाली कि तब मैं अपने  कैरियर के बारे में फैसला करने की सही मन:स्थिति में नहीं थी. लेकिन उसके  अनुरोध को अनसुना  किया गया.

इसके बाद जो होता है वह ग़ौर तलब है. उस इलाके के कोई ग्यारह हज़ार नागरिक एक ऑनलाइन याचिका पर दस्तखत कर प्रशासन से मांग करते हैं कि उस शिक्षिका को फिर से काम  पर लिया जाए. “जिन हालात में उन्हें बाहर किया गया है वे पूरी तरह अस्वीकार्य हैं.”  इससे उत्साहित उस शिक्षिका ने भी कहा कि “मैं जानती हूं कि मैंने कोई कानून  नहीं तोड़ा है. हम सबके मोबाइल फोनों में अनुपयुक्त तस्वीरें होती हैं. अपने पति के साथ अंतरंग रिश्ते रखना अनुचित बात नहीं है. यह भी कि वो विद्यार्थी सही और गलत का फर्क जानता है. मेरे मोबाइल से तस्वीरें निकालने और उन्हें बाहर भेजने का आखिरी  फैसला तो उसी का था.”

इससे भी अहम बात यह कि वहां के विद्यार्थियों ने भी एक ऑनलाइन याचिका  दायर की है जिसमें कहा गया है कि “यह शिक्षिका उसकी निजता पर भीषण प्रहार की शिकार है. एक विद्यार्थी ने उनकी निजी तस्वीरों को गैर कानूनी रूप से  चुराया और अपने स्कूल के दूसरे विद्यार्थियों को भेजा.” खुद उस शिक्षिका ने भी एक  बहुत महत्वपूर्ण बयान में कहा कि “अपने लिए खुद मुझी को खड़ा  होना पड़ेगा. अगर मैं इस बात को भुला दूं तो मुझे लगेगा कि मैं महज़ धूल का एक कण हूं और तब मैं अपने ज़िला कार्यालय को इस बात की इजाजत दे रही होऊंगी कि वो मुझे रौंद  डाले.”

क्या इन बातों में आपको भी एक परिपक्व और विकसित प्रजातंत्र की झलक मिलती है?

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अन्तर्गत मंगलवार, दिनांक 08 मार्च, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, March 1, 2016

बुलेट ट्रेन के साथ चला आया एक सपना!

बुलेट ट्रेन का  सपना  साकार होने का  इंतज़ार करते और रेल मंत्री जी के बजट भाषण में सन 2020 तक हर आकांक्षी को कन्फर्म्ड सीट मुहैया करवाने के आश्वासन से मुदित मेरे मन में  एक और सपना देखने की तमन्ना अंगड़ाई लेने लगी है. ख़ास बात यह कि मेरा यह सपना महज़ रेल तक सीमित नहीं है, हालांकि शुरुआत इसकी रेल से सम्बद्ध एक ख़बर को पढ़कर ही हुई है. यह खबर उसी जापान से आई है जिसके साथ भारत ने बुलेट ट्रेन के लिए एक करार पर दस्तखत किए हैं. रोचक बात यह है कि बहुत तेज़ी से घटती जा रही जन्म दर, बढ़ती जा रही वृद्ध आबादी और सन 2060 तक अपनी एक तिहाई आबादी के कम हो जाने के आसन्न संकटों ने जापान के सामने जो बहुत सारी चुनौतियां खड़ी कर रखी हैं  उनके चलते वहां खाली घरों की तादाद निरंतर बढ़ती जा रही है, कामगार घटते जा रहे  हैं और इस तरह की बातों का असर  जिन पर पड़ रहा है उनमें से एक जापान की रेल व्यवस्था भी है. बल्कि कड़वी सचाई तो यह है कि इन कारणों और जापान की बहुत कुशल तीव्र गति की रेलों के फैलाव की वजह से ग्रामीण जापान की रेल व्यवस्था बुरी तरह से चरमराने लगी है. बहुत सारे स्टेशन ऐसे हैं जहां यात्री भार इतना कम हो चुका है कि उन्हें बन्द कर देने के सिवा और कोई विकल्प ही नहीं बचा है.

जापान  के सुदूर उत्तर में एक द्वीप है होक्काइडो, जिसके निकट एंगारु नामक एक कस्बा है. पिछले कुछ बरसों में यहां से गुज़रने वाली कम से कम बीस रेलें बन्द की जा चुकी हैं.  इसी एंगारु कस्बे के नज़दीक के एक रेल्वे स्टेशन कामी-शिराताकी को भी बन्द करने की प्रक्रिया तीन बरस पहले शुरु कर दी गई थी. लेकिन इसी प्रक्रिया के दौरान जापानी रेल  अधिकारियों का ध्यान इस बात की तरफ़ गया कि  पिछले कुछ समय से एक यात्री लगभग नियमित रूप से इस स्टेशन से रेल में चढ़ता और वहीं उतरता है. अधिक पड़ताल की गई तो पता चला कि वह इकलौता यात्री और  कोई नहीं एक स्कूली छात्रा है जो इस स्टेशन से रेल में बैठकर अपने स्कूल जाती है और इसी रेल  से शाम को लौट आती है. जब जापानी रेल अधिकारियों को यह बात पता चली तो उन्होंने क्या किया? उन्होंने इस स्टेशन और इस रेल को बन्द करने के अपने निर्णय को स्थगित कर दिया. इसलिए स्थगित कर दिया ताकि वो छात्रा  निर्बाध रूप से स्कूल जा सके. जापानी रेल अधिकारियों ने फैसला किया कि यह रेल मार्च 2016 में वित्तीय वर्ष की समाप्ति तक चलती रहेगी. 2016 को इसलिए चुना गया ताकि तब तक वो लड़की  अपनी स्कूली पढ़ाई पूरी कर लेगी.  

और जैसे इतना ही पर्याप्त न हो, जापान के रेल अधिकारियों ने एक और बात की. इस रेल का टाइमटेबल उस छात्रा के स्कूल के टाइमटेबल  के अनुरूप बनाया जाता है. अगर उसका स्कूल किसी दिन बन्द है तो उस दिन रेल नहीं चलती है और अगर किसी दिन जल्दी छुट्टी होती है तो उस दिन रेल भी जल्दी आती है. इसे कहते हैं प्रशासन की संवेदनशीलता. वैसे तो अपने देश में भी प्रभावशाली जन के लिए इस तरह की ‘संवेदनशीलता’ की ख़बरें समाचार माध्यमों में आती ही रहती हैं, लेकिन एक अनाम-सी स्कूली छात्रा  के लिए इस तरह का निर्णय करने की यह अनूठी घटना हम सबके मन में एक सपना तो जगाती ही है. शायद इसी तरह के सपने की बात राष्ट्रपिता बापू ने भी हर आँख का आंसू पोंछने की तमन्ना ज़ाहिर करते हुए की थी.

जापान के रेल विभाग के इस प्रशंसनीय फैसले को उचित ही पूरी दुनिया में सराहा गया है. एक चीनी आधिकारिक प्रसारक की फेसबुक पोस्ट में जब यह बात सामने आई तो तुरंत ही इसे 5700 बार साझा किया गया और बाईस हज़ार लोगों ने इसकी सराहना की. हरेक ने  इस बात की खुले मन से सराहना की ही. एक व्यक्ति ने वहां जो लिखा, वह बहुत महत्वपूर्ण है. उसके शब्द हैं: “भला कौन होगा जो ऐसे देश के लिए जहां की सरकार एक अकेले  के लिए इतना करने को तैयार हो, अपने प्राण तक न्यौच्छावर  नहीं कर देना चाहेगा? सुशासन का असल रूप यही तो है कि वो सीधे ग्रासरूट्स  तक पहुंचे. उसके लिए हर नागरिक का महत्व होना  चाहिए. कोई बच्चा तक पीछे नहीं छूटना चाहिए!” 

हम जापान से बुलेट ट्रेन ले रहे हैं, तो उम्मीद करनी चाहिए कि उसके साथ जापानी  रेल प्रशासन की सुशासन की यह भावना भी स्वत: चली आएगी.  

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर  कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 01 मार्च, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, February 23, 2016

जाओ, पहले अपने पवित्र होने का प्रमाण पत्र लेकर आओ!

अपने देश में जारी होने वाले कुछ अजीबो गरीब फतवों और खापों के फरमानों से अगर आप पर्याप्त दुःखी न हो चुके हों तो ज़रा दूर देश के इस फैसले के बारे में भी जान लीजिए. आज मैं बात कर रहा हूं सुदूर दक्षिण अफ्रीका की जहां के क्वाज़ुलु नैटाल इलाके के एक ज़िले उथुकेले की मेयर दुदु माज़िबुको ने एक ऐसा आदेश ज़ारी किया है जो आपको सोचने को मज़बूर करेगा कि अभी इक्कीसवीं सदी चल रही है या दसवीं-बारहवीं सदी. जिस नगरपालिका की ये मेयर हैं उसने इस साल से अपने यहां के युवाओं को उच्च शिक्षा के लिए वार्षिक छात्रवृत्तियां प्रदान करने की घोषणा की थी. बताया गया कि वैसे तो यह नगरपालिका अपने इलाके के सौ से ज़्यादा विद्यार्थियों को उच्च अध्ययन के लिए यह छात्रवृत्ति प्रदान करती है लेकिन इस बरस इसमें एक और प्रावधान जोड़ कर  इसे केवल उन छात्राओं तक सीमित कर दिया गया  है जो इस आशय का प्रमाण पत्र प्रस्तुत करेंगी कि वे उस तिथि विशेष तक कुंवारी (वर्जिन) हैं. और क्योंकि इस योजना का लाभ छात्रा के शिक्षण संस्थान में अध्ययन के तमाम वर्षों तक देय है, इसे प्राप्त करने की इच्छुक  छात्रा को अपनी छात्रवृत्ति का नवीनीकरण कराने के लिए हर बरस इस आशय का  प्रमाण पत्र देना होगा.  बताया गया है कि इस बरस सोलह छात्राओं ने इस आशय का प्रमाण पत्र देकर यह छात्रवृत्ति प्राप्त कर ली है.

बहुत स्वाभाविक है कि इस आदेश पर तीव्र प्रतिक्रियाएं हुई हैं. मानव अधिकार समूहों और लैंगिक समानता के पक्षधरों ने उचित ही यह सवाल उठाया है कि कौमार्य की जांच की शर्त केवल युवतियों पर ही क्यों लागू  की जा रही है?  उन्होंने इसे व्यक्ति की निजता का हनन भी माना है. एक एक्टिविस्ट जेसिका थॉर्प ने इस भेदभाव  को भी रेखांकित किया है कि छात्रों को तो उनके कौमार्य या उसकी  अनुपस्थिति के लिए पुरस्कृत या दंडित नहीं किया जाता है जबकि छात्राओं पर यह मापदण्ड लागू किया जा रहा है. वहां के अनेक जाने-माने शिक्षाविदों ने खुलकर यह बात कही है कि सेक्सुअली  सक्रिय होने का शिक्षा ग्रहण करने से कोई सम्बन्ध नहीं है और इस कारण सेक्स को शिक्षा प्राप्त करने के अवसरों के साथ जोड़ना अनुपयुक्त है. मेयर महोदया ने अपने निर्णय को उचित ठहराते हुए कहा था  कि कौमार्य का प्रमाण देने का यह प्रावधान लड़कियों को पवित्र और सेक्सुअल गतिविधियों से दूर रखकर उन्हें अपनी पढ़ाई पर ध्यान केन्द्रित करने में मददगार साबित होगा. एक स्थानीय रेडियो स्टेशन से अपने प्रसारण में उन्होंने फरमाया, “हमारे वास्ते तो यह एक तरीका है आपको इस बात के लिए धन्यवाद देने का कि आपने अभी तक अपने आप को खुद के लिए बचाए रखा है और तब तक बचाए रखेंगी जब तक कि  आप डिग्री या प्रमाण पत्र प्राप्त नहीं कर लेतीं.”

जब मेयर महोदया के इस फैसले की ज़्यादा ही आलोचना  हुई तो उन्होंने कहा कि यह योजना तो उस इलाके में एच आई वी, एड्स और अवांछित गर्भधारण के मामलों को नियंत्रित  करने के लिए लाई गई है. वैसे, यह बात सही है कि दुनिया में एच आई वी का फैलाव दक्षिण अफ्रीका में बहुत ज़्यादा है. 2013 के आंकड़ों  के अनुसार उस देश में 63 लाख लोग इससे ग्रस्त थे. वहां के अपराध के आंकड़े बताते हैं कि साल 2014-2015 के मध्य सेक्सुअल अपराधों के 53, 617  मामले  दर्ज़  हुए थे, हालांकि जानकारों का कहना है कि असली तस्वीर तो इससे भी बुरी है.

लेकिन इन  आंकड़ों  के बावज़ूद इस बात से कोई सहमत नहीं हो पा रहा है कि मेयर महोदया का यह फरमान उचित है और इससे हालात सुधर जाएंगे.   देश के जेण्डर समानता के अध्यक्ष तक ने कह दिया है कि भले ही मेयर के इरादे नेक हों,  हम कौमार्य के आधार  पर छात्रवृत्ति देने के उनके निर्णय  से सहमत नहीं हैं. यह तो गर्भधारण और कौमार्य के आधार पर लैंगिक भेदभाव का मामला है और लड़कों के भी खिलाफ़ है.” यहीं यह बात भी ग़ौर तलब है कि दक्षिण अफ्रीका में सहमति से यौन सम्बध कायम करने की उम्र 16 बरस है और कुछ अपवादों में इसे घटाकर 12 से 16 बरस तक भी लाया जा सकता है. बल्कि इस जानकारी के सन्दर्भ में तो छात्रवृत्ति के लिए कौमार्य परीक्षण की शर्त और अधिक असंगत प्रतीत होने लगती है. यह शर्त और अधिक  हास्यास्पद इस जानकारी से भी लगने लगती है कि कौमार्य परीक्षण जुलु परम्पराओं के आधार पर किए जाने की बात कही गई है. जुलु परम्परा में यह परीक्षण वृद्धाएं करती हैं जो आम तौर पर किसी लड़की की आंखों और  उसके चलने के ढंग को देखकर ही फैसला सुना देती हैं कि वो कुमारी है या नहीं.
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगल्वार, 23 फरवरी, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.