Tuesday, February 11, 2014

यादें सांस्कृतिक कार्यक्रमों की

पिछले कुछ बरसों से जनवरी-फरवरी के महीने अपने प्रांत में शिक्षण संस्थाओं में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए आरक्षित हो गए हैं. अगस्त में छात्र संघों के चुनाव होते हैं, फिर नेताओं की उपलब्धता के अनुसार उनका उद्घाटन होता है (आजकल तो छात्र संघ कार्यालयों का उद्घाटन अलग से होने लगा है) और फिर साल बदलते-बदलते सांस्कृतिक कार्यक्रमों का मूड बनने लगता है. अपनी पैंतीस से भी ज़्यादा  सालों की नौकरी के दौरान मुझे सांस्कृतिक कार्यक्रमों  के अनगिनत रोचक और मज़ेदार अनुभव हुए हैं. आज उन्हीं  में  से कुछ आपसे साझा कर रहा हूं.

जिस  ज़माने की मैं बात कर रहा हूं उस ज़माने में मेरे उस कॉलेज में विद्यार्थियों को नाटक करने का बड़ा शौक था. एक पूरी सांझ नाट्य संध्या के नाम से आयोजित की जाती थी और कम से कम दस-बारह एकांकी मंचित किए जाते थे. कलाकारों का उत्साह अपनी जगह और दर्शकों की हिम्मत अपनी जगह. दोनों में जैसे रस्साकसी चलती थी. उस रात नाट्य संध्या का संयोजन मैं कर रहा था. तेज़ सर्दी थी. कोई छठा या सातवां नाटक ख़त्म हुआ था, मैंने अगले नाटक की उद्घोषणा की और नेपथ्य में अपनी कुर्सी पर आ बैठा. कोई चार-पांच मिनिट हुए होंगे कि उस नाटक के कलाकार भी स्टेज छोड़ वहीं आने लगे. मुझे ताज्ज्जुब हुआ. पूछा क्या हुआ? तो बजाय कुछ बोलने के उन्होंने मुझे मंच की तरफ जाने का इशारा कर दिया.  जाकर  देखा तो ‘ऐसी तनहाई का जवाब नहीं’ वाला आलम था. पूरा पाण्डाल खाली पड़ा था. बेचारे किसके लिए नाटक करते?

थोड़ा और पीछे की तरफ लौटता हूं तो याद आता है कि उस छोटे कस्बे में सहशिक्षा का कॉलेज होने के बावज़ूद लड़कियां मंच पर आने में झिझकती थीं. लड़कियों की भूमिकाएं लड़कों को ही निबाहनी पड़ती थीं. हम लोग एक साहित्यिक नाटक कर रहे थे और सभी चाहते थे कि उसमें नायिका का रोल कोई लड़की ही करे. कई छात्राओं से बात की लेकिन सभी ने अपने मां-बाप की मनाही की दुहाई देते हुए मना कर दिया. अंतत: एक साथी प्राध्यापिका ने मां बाप को मनाने की ठानी और वे बड़े उत्साह के साथ एक लड़की के घर जा पहुंची. अभिभावकों ने भी गर्मजोशी से उनका स्वागत किया, चाय-पानी करवाया. लेकिन जैसे ही उन्होंने यह अनुरोध किया कि वे अपनी बेटी को नाटक में अभिनय करने की अनुमति दें, मां-बाप के तेवर एकदम से बदल गए. दोनों एक स्वर में बोले: “देखो मैडम जी, नौकरी आप करती हो. आपको जो करना है कर लो. हमारी बेटी तो स्टेज पर न आज जाएगी और न कल!” कहना गैर ज़रूरी है कि उस साल वो  नाटक नहीं हुआ.

एक साल तो और भी मज़ेदार वाकया हुआ. मैं नृत्य प्रतियोगिता का प्रभारी था. प्रभारी के नाते मेरी सबसे बड़ी फिक्र यह थी कि कोई अशालीन प्रस्तुति न हो जाए. एक शाम मैं नृत्य प्रस्तुतियों की स्क्रीनिंग कर रहा था. उन दिनों कैसेट पर संगीत बजाकर नृत्य किए जाते थे. ज़्यादातर विद्यार्थी फिल्मी और राजस्थानी गाने बजाकर उनपर नृत्य करने के इच्छुक थे. तभी एक सीनियर छात्र काफी बड़ा कैसेट प्लेयर लेकर आया. मैंने उससे पूछा कि वो किस गाने पर नृत्य करेगा, तो उसने कुछ लापरवाही के भाव से कहा, सर! मैं इंगलिश गाने पर डांस करूंगा.  मैंने उससे गाने का नाम जानना चाहा तो उसने फिर वही जवाब दुहरा दिया. शायद  उसे लगा होगा कि ये हिंदी के प्रोफेसर साहब भला अंग्रेज़ी गाने की अदरक का स्वाद क्या जानते होंगे! ख़ैर! उसने अपना कैसेट प्लेयर सेट किया, अपना हुलिया दुरुस्त किया और अपने एक साथी को इशारा किया तो उसने प्लेयर का प्ले बटन दबा दिया और इसने थिरकना-मटकना शुरु कर दिया. तीन-चार सैकण्ड बीते होंगे कि मुझे समझ में आ गया कि जिस ‘इंगलिश’ गाने पर वो डांस  करना चाहता है वो फ्रेंच संगीतकार शेरोने का उन दिनों कुख्यात नम्बर लव इन सी-माइनर था  जिसमें  शारीरिक सम्बंधों के  संकेत देने वाले ड्रम और  कामोत्तेजक ध्वनियां थीं. ज़ाहिर है कि मैं उस नम्बर से भली  भांति परिचित था (अखिर हम भी तो जवान थे) और उस पर डांस करने की अनुमति देने का तो कोई सवाल ही नहीं उठता था. मैंने फौरन संगीत बंद करने का इशारा किया, और कहा कि वह अपने डांस के लिए कोई और गाना चुन ले. वह विद्यार्थी बार-बार कह रहा था कि सर यह अंग्रेज़ी गाना है, और मैं इसी पर डांस करना चाहता हूं,  और मैं था कि बार-बार उससे कह रहा  था कि वो कोई और गाना चुने. उसे लग रहा था कि मुझे अंग्रेज़ी गाना समझ में नहीं आ रहा है जबकि  मुझे वो नम्बर  कुछ ज़्यादा ही समझ में आ रहा था. चचा ग़ालिब ने शायद  ऐसी ही किसी स्थिति में कहा  होगा: 
यारब न  वो समझे  हैं  न समझेंगे  मेरी बात
दे और दिल उनको जो न दें मुझको ज़ुबाँ और.

●●●

लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत 11 फरवरी, 2014 को जब हिंदी के प्राध्यापक ने जाना अंग्रेज़ी गाना शीर्षक से प्रकाशित टिप्पणी का मूल आलेख. 

Wednesday, February 5, 2014

जब ज्योतिष में मेरे अविश्वास को चुनौती मिली

आप इसे मात्र एक तथ्य कथन के  रूप में लें  कि ज्योतिष  में मेरा तनिक भी विश्वास  नहीं है. कृपया इसे इस शास्त्र अथवा विज्ञान अथवा विद्या – यह जो भी हो, पर मेरी किसी टिप्पणी के रूप में न पढ़ें. हर इंसान की कुछ कमज़ोरियां और कुछ ज़िदें होती हैं, तो मेरी भी है, बस! मां-बाप ने मेरी जन्म पत्री बनवा दी, तो बनी हुई रखी है. मेरे परिवार वालों ने मेरे बच्चों की जन्म पत्रियां बनवा दीं, वो हमने अपने बच्चों को दे दीं. यदा-कदा बच्चे चाहते हैं तो उनकी इच्छानुसार उनकी जन्म पत्रियां दिखाकर जो बताया जाता है वो उन तक पहुंचा भी देते हैं. यानि ज्योतिष  को लेकर किसी तरह की नकारात्मक कट्टरता का भाव भी मन में नहीं है.  लेकिन जैसा मैंने कहा, मैंने कभी किसी ज्योतिषी को अपना हाथ नहीं दिखाया, और न कभी किसी पण्डित से अपना भविष्य पूछा.

बहुत मज़े की बात यह कि यह सब मैं इसलिए लिख रहा हूं कि जीवन में कम से कम एक अनुभव मुझे ऐसा हुआ जिसने मेरे इस अविश्वास को हिला डाला. 

बात करीब ढाई दशक पुरानी है. मेरा  ट्रांसफर एक कॉलेज से दूसरे कॉलेज में हो गया था और मैं उसे निरस्त कराने के लिए बार-बार राजधानी के चक्कर लगा रहा था. ऐसे ही एक चक्कर के दौरान तीन-चार दिन जयपुर में टिकना पड़ा. तब संयोग से मेरे साथ मेरे ही  कॉलेज के भौतिक शास्त्र के एक प्रोफेसर मित्र भी समान कष्ट के निवारण के लिए ठहरे हुए थे. ज्योतिष में उनकी बहुत अच्छी गति थी. अगर कोई पूछता तो वे  तर्क संगत व वैज्ञानिक तरह से गणना आदि करके भविष्य बता दिया करते थे. परेशानी के उस आलम में मैं भी उनसे पूछ बैठा कि मेरा ट्रांसफर कब तक निरस्त हो जाएगा! उन्होंने बाकायदा लम्बी चौड़ी गणना करके मुझे एक तारीख बताई, कि इस तारीख को, मान लीजिए बारह तारीख को,  मेरा काम हो जाएगा.

घटनाक्रम कुछ इस तरह चला कि दस तारीख को, यानि उनकी बताई तिथि से दो दिन  पहले मुझे मेरा इच्छित आदेश मिल गया. अपना मनचाहा हो जाने की खुशी के साथ-साथ मेरे मन में एक दुष्टतापूर्ण  खुशी यह भी थी कि ज्योतिष ग़लत साबित हो गया. मैं बड़ी खुशी-खुशी वो आदेश लेकर जब उस कॉलेज में पहुंचा जहां से रिलीव होकर मुझे फिर से अपने पसन्दीदा कॉलेज में पद भार ग्रहण करना था तो वहां के प्राचार्य ने उस आदेश को पढ़कर कहा कि उस आदेश के आधार पर तो वे मुझे रिलीव नहीं कर सकते. मैंने भी आदेश को ध्यान  से पढा  तो पाया कि एक  क्लर्कीय ग़लती की वजह से उसमें कॉलेजों के नाम में उलटफेर हो गई है और जहां से मुझे रिलीव होना है उस  कॉलेज की बजाय जहां मुझे ज्वाइन करना है उस कॉलेज का नाम लिख दिया गया है. मैंने प्राचार्य जी को समझाने की बहुत  कोशिश की कि यह महज़ एक क्लैरिकल मिस्टेक है, और इस आदेश का  कोई अन्य अर्थ निकल ही नहीं सकता है,  लेकिन वे मेरी बात से सहमत होकर भी उस आदेश को स्वीकार करने का ख़तरा  उठाने को  तैयार नहीं हुए. अब मेरे पास इस बात के सिवा कोई चारा नहीं था कि मैं उस आदेश को लेकर फिर से पाँच  सौ किलोमीटर दूर राजधानी जाऊं और आदेश को संशोधित करवा कर लाऊं. तब तक इण्टरनेट आदि हमारी ज़िन्दगी में नहीं आए थे, और आज जब आ गए हैं तब भी सरकारी काम तो अपनी ही तरह से होते हैं.

रात भर की यात्रा कर जयपुर आया, सम्बद्ध अधिकारी के सम्मुख उपस्थित हुआ, उनसे अपनी पीड़ा बयान की, उस आदेश में संशोधन करवाया, उसे लेकर फिर पाँच  सौ किलोमीटर की यात्रा कर अपने अनचाहे कार्यस्थल पर पहुंचा, प्राचार्य जी के समक्ष वो नया आदेश पेश किया, उसके आधार पर वहां से अपने इच्छित कॉलेज में ज्वाइन करने के लिए रिलीव हुआ और वहां से रिलीव होते ही अस्सी किलोमेटर की यात्रा कर अपने इच्छित कॉलेज में पहुंचकर फिर से ज्वाइन किया. कहना अनावश्यक है कि यह काम उसी बारह तारीख को हुआ जिसकी भविष्यवाणी मेरे उक्त प्रोफेसर मित्र ने की थी.

अगर इस एक घटना को प्रमाण माना जा सके तो मैं मानने को विवश हो गया कि ज्योतिष एक विश्वसनीय शास्त्र है, बशर्ते कोई उसको बरतने की योग्यता रखता हो. क्योंकि इस घटना के बाद मेरे जीवन में ऐसा कोई मौका नहीं आया जब मुझे  किसी भविष्यवक्ता की शरण में जाना पड़ा हो, इसलिए मैं यह नहीं कह सकता कि  मेरा उक्त अनुभव संयोग था या कुछ और!      

 ●●●
जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम 'कुछ इधर कुछ उधर' के अन्तर्गत दिनांक 4 फरवरी, 2014 को 'क्लर्क की भूल ने करा दिया ज्योतिष पर यकीन' शीर्षक से प्रकाशित मेरे आलेख का मूल पाठ.  

Friday, January 31, 2014

विज्ञापन की हद्द!

हमारा देश विविधता  में एकता का ही नहीं एकता में विविधता का भी देश है.  अगर आपको एकाधिक गांवों-कस्बों-शहरों में रहने का मौका मिला हो तो आपने देखा होगा कि एक-से लगने वाले रीति-रिवाज़ों के पालन और निर्वहन में भी कुछ न कुछ स्थानीय विविधता ज़रूर होती है. आपने देखा होगा कि मकर संक्रांति अलग-अलग शहरों में अलग–अलग तरह से मनाई जाती है, तो दशहरे के मौके पर अहमदाबाद में फाफड़ा जलेबी खाने की अलग ही परम्परा है. यह विविधता उत्सवों में ही नहीं शोक में भी देखने को मिलती है. उदयपुर में मैंने पाया कि ‘उठावना’ (यानि तीये की बैठक) के बाद एकत्रित सभी लोग निकटवर्ती किसी मंदिर में जाते हैं, जबकि जयपुर में इस बैठक का स्वरूप थोड़ा अलग होता  है. न केवल बैठक का स्वरूप अलग होता है, अलग-अलग रुचि के लोग उसमें भी और थोड़े बहुत बदलाव कर लेते हैं.

मसलन, कुछ समय पहले तक आम रिवाज़ यह था कि पण्डित जी गरुड़ पुराण के एक अंश  का वाचन किया करते थे. धीरे-धीरे जब कुछ लोगों  को यह अरुचिकर लगने लगा तो उन्होंने इसकी बजाय पण्डितजी के श्रीमुख से उपदेशात्मक या वैराग्य मूलक प्रवचन कराने शुरु कर दिए. कुछ और लोगों ने अपनी रुचि के अनुसार प्रवचन की जगह संगीत को दे दी, और यथा सामर्थ्य एकल गायक  या पूरी टीम को वाद्यों के साथ भजन गायन के लिए बुलाया जाने लगा. इनमें भी लोगों ने अपनी-अपनी रुचि के अनुसार भजन करवाने के प्रबन्ध  किए. कुछ ने सगुण  भजन चुने तो कुछ ने निर्गुण. हमारे एक सुरुचि सम्पन्न साहित्यकार मित्र के निधन पर आयोजित बैठक में कुमार गन्धर्व के निर्गुण भजन बजाए गए. 
   
जयपुर में तीये की बैठक में सबसे ख़ास बात मैंने समय की पाबन्दी की पाई. आम तौर पर एक घण्टे  की बैठक ठीक समय पर (मौसम के अनुसार) शाम चार या पाँच बजे शुरु होती है और ठीक एक घण्टा पूरा होते-होते उसके समापन की कार्यवाही शुरु हो जाती है. अगर न हो तो कोई न कोई समझदार बन्दा  ‘पण्डितजी, तुलसी पत्र वितरित करवाइये’ जैसा कोई वाक्य बोल कर पण्डितजी को चेता भी देता है. बहुत नज़दीक के लोग ही ठीक समय पर आते हैं और पूरे समय रहते हैं, जबकि अधिकांश लोग लगभग आधा घण्टा बीतने के बाद आते हैं और बार-बार घड़ी देख कर बैठक के विसर्जन का इंतज़ार करते रहते हैं.

सभा के अंत में पण्डितजी यह निर्देश देते हैं कि “अब दिवंगत की छवि पर पुष्प  अर्पित किए जाएंगे,  पहले घर के लोग और फिर अन्य लोग यह काम करें!”  उदयपुर में मैंने देखा कि व्यवसाय कुशल फोटोग्राफर अख़बार में शोक सन्देश देखकर फोटो तैयार कर यथासमय शोक वाले घर पहुंच जाते हैं और उस फोटो की अच्छी खासी राशि वसूल कर लेते हैं. उस शोक की घड़ी में भला मोल-भाव कौन कर सकता है? लेकिन जयपुर की एक तीये की बैठक का अनुभव मुझे भुलाये नहीं भूलता है. वही आज साझा कर रहा हूं.

पण्डितजी के प्रवचन और तुलसी पत्र के वितरण  के बाद जब स्वर्गीय की छवि पर पुष्पांजलि अर्पित करने की बारी आई तो लोग पण्डितजी के सामने से होकर दिवंगत को पुष्प अर्पित करने के लिए पंक्तिबद्ध होकर बढ़ रहे थे. अपने हारमोनियम के साथ बिराजे पण्डित जी उनमें से हरेक के हाथ में कुछ प्रदान करते जा रहे थे. यह तो नई बात थी. मैं जानने को व्याकुल हो उठा कि पण्डितजी क्या प्रदान  कर रहे हैं? जब मेरी बारी आई तो मैंने भी अपने आगे वालों के बर्ताव का अनुकरण करते हुए पण्डितजी के आगे अपना हाथ बढ़ा दिया! पण्डितजी ने एक सुमुद्रित कार्ड मेरे भी हाथ में थमा दिया. दिवंगत की तस्वीर पर पुष्प अर्पित करने के बाद मैंने उस कार्ड को ठीक से पढ़ा तो  समझ में आया कि वह पण्डितजी का बिज़नेस  कार्ड था, जिसका आशय था कि जब भी  आपको इस तरह की ज़रूरत पड़े, मैं सेवा के लिए सहर्ष प्रस्तुत हूं! अब अगर इस संदेश का अनुवाद करूं तो अर्थ यह होगा कि आपके घर-परिवार में मृत्य होने पर मैं अपनी सेवाएं देने को हाज़िर हूं! पता नहीं, यह अनुवाद पढ़कर  आपको कैसा लग रहा है, मुझे तो क़तई अच्छा नहीं लगा. व्यापार और विज्ञापन की भी कोई तो हद्द होती है! आप कैसे किसी को यह कह सकते हैं कि अपने अमंगल में मुझे याद कीजिए! मुझे नहीं मालूम कि पण्डितजी ने अपना कार्ड छपवाते और उसे बांटते हुए यह सब सोचा होगा या नहीं! शायद  नहीं ही सोचा होगा. अगर सोचा होता तो वे इस तरह अपना विज्ञापन नहीं करते!

●●●
लोकप्रिय दैनिक समाचार पत्र न्यूज़ टुडै में प्रकाशित मेरे साप्ताहिक कॉलम 'कुछ इधर कुछ उधर' के अंतर्गत 28 जनवरी, 2014 को 'तीये की बैठक में भी प्रचार कर रहे थे पण्डितजी' शीर्षक से प्रकाशित लेख का मूल! 

Tuesday, January 21, 2014

जब पूरा आलेख ही बांच दिया गया.....

एक ज़माना था जब तमाम नेता, छोटे हों या बड़े, कुछ नितान्त  औपचारिक अवसरों को छोड़कर, मौलिक भाषण दिया  करते थे. वे भाषण  न केवल उनके व्यक्तित्व और उनके सोच के परिचायक होते थे, उनसे लोग प्रेरणा भी लेते थे और यथासमय  उन्हें उद्धृत भी करते थे. महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरु, राममनोहर लोहिया, जे. बी कृपलानी उन नेताओं में से हैं जिनके भाषण बहुत ग़ौर से सुने जाते थे. लेकिन आहिस्ता-आहिस्ता स्थितियां बदलीं और हम लोग इस बात के गवाह हैं कि हमारे माननीय नेताओं ने अब यह यह काम आउटसोर्स कर दिया है. अब स्थिति यह है लगभग सारे के सारे भाषण औरों के द्वारा तैयार किये हुए होते  हैं और भाषण देने वालों की स्थिति प्लेबैक सिंगर्स जैसी होकर रह गई है. अब भाषण देने वाले का मूल्यांकन भी भाषण में निहित  विचारों के आधार पर कम, उसकी भाषण देने की कला के आधार पर अधिक होने लगा है. तब और अब के इस अंतर को देखता हूं तो बरबस अपने साथ घटी एक घटना याद आ जाती है. घटना का ताल्लुक संक्रमण काल से है, यानि जब मौलिक भाषण भी दिए जाते थे और (औरों के द्वारा) लिखित भाषण  भी पढ़े जाते थे.

राजस्थान साहित्य अकादमी का कोई साहित्यिक आयोजन था जो माउण्ट आबू के राजभवन  में हो रहा था. महामहिम उसका उद्घाटन भाषण पढ़ रहे थे. यह सर्व विदित है कि राज्यपाल ऐसे मौकों पर लिखित भाषण ही पढ़ते हैं. लेकिन उनका वो भाषण कुछ ज़्यादा ही लम्बा था.  ख़त्म ही नहीं हो रहा था. श्रोताओं की असहजता बढ़ती जा रही थी. अगर कोई और जगह होती  या  बात सामान्य साहित्यिक गोष्ठी की होती तो लोग अनेक प्रकार से अपनी ऊब व्यक्त कर सकते थे. और कुछ नहीं तो उठकर बाहर तो जा ही सकते थे. लेकिन यह राजभवन का मामला था. प्रोटोकोल का अनकहा दबाव सब पर था.

मेरे पास ही बैठे थे हिन्दी के एक बड़े आलोचक, और उससे भी पहले मेरे गुरु. उन्होंने मुझसे कान में पूछा – “यह कचरा इन्हें दिया किसने?” मैंने बहुत शालीनता से उनके कान में जवाब दिया- “आप ही के इस शिष्य ने!” कहना अनावश्यक है कि अगर राजभवन की शालीनता की चादर हमारे ऊपर न फैली होती तो हम दोनों ने एक छत-फाड़ू ठहाका ज़रूर लगाया होता!
अब ज़रा बात साफ़ कर दूं.

वे राजस्थान में साहित्यिक सक्रियता के उजले दिन थे. राजस्थान साहित्य अकादमी का स्वर्ण काल. पूरे प्रांत में, हर छोटे-बड़े कस्बे में साहित्यिक आयोजनों की धूम मची हुई थी. कहीं आंचलिक  साहित्यकार सम्मेलन हो रहे थे, तो कहीं सृजन साक्षात्कार. कहीं पाठक मंच की गोष्ठी हो रही थी तो कहीं  कोई उपनिषद.  इसी  क्रम में राजस्थान के इकलौते हिल स्टेशन  माउण्ट आबू पर  भी एक साहित्यिक संगोष्ठी का आयोजन किया गया था. राजस्थान के राज्यपाल के ग्रीष्मकालीन आबू प्रवास का लाभ उठाते हुए उन्हें इस आयोजन का उद्घाटन करने के लिए आमंत्रित किया गया और उन्होंने भी सहर्ष अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी. उद्घाटन सत्र राजभवन के सभा कक्ष में ही रखा गया.

मैं उन दिनों राजकीय महाविद्यालय सिरोही में हिंदी पढ़ाता था. यहीं यह याद दिलाता चलूं कि माउण्ट आबू सिरोही जिले में ही स्थित है.  शायद ऐसी कोई प्रक्रिया होती होगी, तभी सिरोही के कलक्टर महोदय के यहां से मेरे महाविद्यालय के प्राचार्य जी के पास इस आशय का अनुरोध आया कि वे महामहिम के भाषण के लिए अमुक विषय पर कुछ नोट्स उपलब्ध कराएं. जैसी सरकारी रिवायत है, प्राचार्य जी ने वह अनुरोध मुझ तक सरका दिया. और मैंने भी तुरंत कोई चालीस-पचास पन्नों की सामग्री उनके माध्यम से कलक्टर महोदय के पास भिजवा दी. इस सामग्री में राजस्थान के हिन्दी साहित्य पर लिखा मेरा अन्यत्र प्रकाशित तीसेक पन्नों का एक सर्वेक्षणपरक  आलेख  भी था. इस सूचनाप्रद आलेख  में नामोल्लेख अधिक था. मेरा  खयाल था कि महामहिम के लिए भाषण तैयार करने वाले इस सामग्री में से अपने काम की चीज़ें निकाल  लेंगे और कुछ अपनी तरफ से जोड़कर उनके लिए एक अवसरोचित भाषण तैयार कर देंगे. आखिर उन्होंने नोट्स ही तो मांगे थे. अब मैं तो इसे राजभवन के सम्बद्ध अधिकारी की ज़र्रानवाज़ी ही कहूंगा कि उन्हें मेरा वह सर्वेक्षणपरक लेख इतना भाया कि उसे ज्यों का त्यों महामहिम से पढ़वा लेने के लिए प्रस्तुत कर दिया. हां, मेरे गुरुजी को ज़रूर वो कचरा लगा. और उन्होंने वैसा ही कह दिया. अगर उन्हें भी यह  पता होता कि उसका मूल लेखक कौन है तो वे भी शायद ऐसा न कहते. बहरहाल! तब जो  बात अपवाद थी, अब आम हो चुकी है.

●●●  
लोकप्रिय अपराह्न दैनिक 'न्यूज़ टुडै' में मेरे साप्ताहिक  कॉलम 'कुछ इधर कुछ उधर' के अंतर्गत दिनांक 21 जनवरी, 2014 को 'महामहिम से बंचवा दिया पुराना आलेख' शीर्षक से प्रकाशित संस्मरण का मूल आलेख!   

Tuesday, January 7, 2014

बेवजह तारीफ़ कौन करता है?

दिल्ली में भी नई सरकार बन गई. राजस्थान में बन ही चुकी है. केन्द्र में भी बन जाएगी. जैसे ही कोई नई सल्तनत गद्दीनशीन  होती है, उसे मुबारक़बाद  देने वालों और उसकी शान में कसीदे पढ़ने वालों  की कतार  लग जाती है. यह स्वाभाविक भी है और एक हद तक उचित भी. आखिर किसी भी नए की सफलता की कामना की ही जानी चाहिए. लेकिन जो लोग कतारबद्ध   होकर मुबारक़बाद  पेश करते और गुणगान करते हैं, क्या वे वाकई  अपनी शुभकामना ही दे रहे होते हैं, या उनका कोई हिडन एजेण्डा भी होता है?

मुझे बरसों पहले अपने एक पुराने विद्यार्थी से हुए संवाद की याद आ  रही है. छात्र जीवन से ही साहित्य में उसकी रुचि थी. आहिस्ता-आहिस्ता स्थानीय अखबारों में और फिर छोटी-मोटी पत्रिकाओं में उसकी कविताएं नज़र आने लगी थीं. अब तो खैर उसका शुमार प्रांत के वरिष्ठ कवियों में होता है.

बात उस समय की है जब राजस्थान  साहित्य अकादमी ने अपनी मुख पत्रिका के लिए हर छह महीने में सम्पादक बदलने की एक विलक्षण योजना चलाई थी. मैंने लक्ष्य किया कि जैसे ही किसी नए सम्पादक के सम्पादन वाला पहला अंक आता, उससे अगले ही अंक में उस पर अनिवार्यत: एक प्रतिक्रिया मेरे इस सुयोग्य पूर्व शिष्य की भी ज़रूर छपती. प्रतिक्रिया यही होती कि “आपने आते ही इस पत्रिका का कायाकल्प  कर दिया है.”  प्रतिक्रिया की ध्वनि यह होती कि इससे पहले जो पत्रिका रसातल तक जा पहुंची थी, आपने अपने सम्पादन के पहले ही अंक में उसे आसमान पर ले जाकर टाँग  दिया है. मज़े की बात यह कि हर संपादक खुशी-खुशी इस तरह के पत्र को प्रकाशित भी कर देता. 

लगातार तीन अंकों में एक-सी प्रतिक्रिया देखकर मैं थोड़ा आश्चर्यचकित था. और संयोग यह हुआ कि उन्हीं दिनों उस पूर्व शिष्य और तत्कालीन युवा कवि से मिलने का कोई अवसर भी आ गया. मैंने कुछ विनोद भाव से उसकी एक-सी प्रतिक्रिया के बारे में पूछ लिया. उसने बेहद ईमानदारी और सहज भाव से जो बताया, उसका सार यह है कि “गुरुजी, मैं तो हर सम्पादक को यह लिखता हूं कि आप महान हैं, और आपने इस पत्रिका को अभूतपूर्व  ऊंचाइयों तक पहुंचाया है.  और यह लिखने के साथ ही यह भी लिख देता हूं कि मेरी कुछ कविताएं प्रकाशनार्थ संलग्न है. आम तौर पर तो सम्पादक जी मेरी उन कविताओं को तुरंत प्रकाशित कर देते हैं....”  

यहीं मैंने उसे टोका और पूछा  कि “अगर कोई सम्पादक तुम्हारा पत्र तो प्रकाशित कर दे, कविताएं न करे  तो?”   

उसने बहुत ईमानदारी से कहा, “हां, कभी-कभी ऐसा भी होता है. तब  मैं प्रशंसा का ऐसा ही एक पत्र और लिखता  हूं. प्रशंसा की मात्रा थोड़ी और बढ़ा देता हूं, और लगे हाथों पिछले सम्पादक की थोड़ी आलोचना भी कर देता हूं. मेरा यह फॉर्मूला काम कर जाता है. कविताएं छप जाती हैं.”  

अब उसकी बातों में मुझे मज़ा आने लगा था. मैंने पूछा, “कोई सम्पादक बहुत ही ढीठ हो और प्रशंसा  की हेवी डोज़ का भी उसपर कोई असर न हो तो फिर क्या करते हो?”  

मुझे यह जानकर बड़ा गर्व हुआ  कि मेरा वह शिष्य अब अपनी रचनाओं को प्रकाशित करने की कला में पारंगत  हो चुका था. उसने कहा, “गुरुजी, मेरे पास इसका भी इलाज है.”  मैंने पूछा, “वह क्या है?”  तो उसने बताया, “फिर मैं सम्पादक को एक पत्र और लिखता हूं. और उसमें लिखता हूं कि जब से आपने इस पत्रिका का सम्पादन दायित्व  सम्हाला है, इसका स्तर निरंतर नीचे गिरता जा रहा है. अगर आपने जल्दी ही कुछ कदम नहीं उठाए तो यह पत्रिका एकदम कूड़ा हो जाएगी, और कबाड़ी भी इसे लेने से मना कर देंगे. आपकी इस पत्रिका से मेरा पुराना रिश्ता रहा है इसलिए मैं इसके स्तर को लेकर बहुत चिंतित हूं. पत्रिका के गिरते स्तर को सम्हालने के लिए अपनी कुछ कविताएं आपकी भेज रहा हूं..... और मेरा यह नुस्खा अब तक तो नाकामयाब  नहीं रहा है.”  

मैं उसकी सूझ-बूझ का कायल हो चुका था. कविताएं वो भले ही कैसी भी लिखता हो, यह समझ उसमें पर्याप्त थी कि उन्हें छपवाया कैसे जाए!

आज जब नई बनी सरकारों के अपना  काम शुरु करने से पहले ही उनका प्रशस्तिगान करने वालों की आवाज़ें सुनता हूं तो मुझे अपने उस विद्यार्थी की याद आ जाती है.  हो सकता है  कि इन प्रशस्तिगायकों में से बहुत सारे ऐसे हों जिन्हें किसी सरकार से कोई स्वार्थ न साधना  हो और  महज़ सद्भावना के वशीभूत हो ही वे ऐसा कर रहे हों;  लेकिन यह भी बहुत पक्की बात है कि अधिकांश  कीर्तनकार मेरे उस विद्यार्थी की सोच से सहमति रखने वाले ही होंगे.


●●●  

लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत दिनांक 07  जनवरी 2014 को प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.  

Tuesday, December 24, 2013

जब एक विद्यार्थी ने पूरे कॉलेज को मामू बना डाला

प्रदेश में नई सरकार बन गई है और उसने जोर-शोर से काम शुरु कर दिया है. आम तौर पर सरकारें या तो शुरु में सक्रिय होती हैं या उस वक़्त जब उनके अस्तित्व पर कोई संकट आता है,  वरना तो वे सरक-सरक कर ही चलती हैं. उम्मीद की जानी चाहिए कि राजस्थान की नई सरकार इस धारणा को मिथ्या साबित करेगी और जन आकांक्षाओं पर खरी उतरेगी.  बहरहाल, मुझे आज याद आ रहा है 1975 का इमर्जेंसी का वो दौर जब तत्कालीन प्रधानमंत्री ने अपनी कुर्सी बचाने के लिए तमाम प्रजातांत्रिक नागरिक अधिकारों को  स्थगित कर दिया.  

उन दिनों प्रधानमंत्री का  बीस सूत्री कार्यक्रम बहुत उत्साह से प्रचारित किया जा रहा था. जनता को बताया जा रहा  था कि यह कार्यक्रम उसकी हालत बदल देगा. सरकारी संस्थाओं पर यह अनकहा दबाव था कि वे जी-जान से इसके प्रचार-प्रसार में जुट जाएं. कुछ दबाव और इससे भी अधिक सरकारी अमले की वफ़ादारी. हर तरफ बीस-बीस का ही शोर था.  मैं उन दिनों राज्य के एक छोटे कस्बे के एक महाविद्यालय में हिन्दी पढ़ाया करता था. मेरे महाविद्यालय के प्राचार्य जी को भी अपनी वफ़ादारी  दिखाने का जोश चढ़ा  और उन्होंने आनन-फानन में बीस सूत्री कार्यक्रम से होने वाले फायदों पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन  करने की घोषणा कर डाली. उस छोटे कस्बे के छोटे महाविद्यालय में कोई सभा भवन तो था नहीं. एक बड़े कमरे में वह गोष्ठी आयोजित की गई. हर संस्थान में, और ख़ास तौर पर शिक्षण संस्थानों  में ऐसे कुछ लोग अवश्य ही होते हैं जो किसी भी विषय पर अपने अमूल्य विचार प्रस्तुत करने को सदा सुलभ रहते हैं. हक़ीक़त तो यह है कि ऐसे वीर पुरुषों के दम पर ही इस किस्म के  आयोजन सम्पन्न किए जाते हैं. संस्था प्रधान भी यही चाहता है कि कुछ लोग प्रस्ताव के पक्ष में कुछ सुन्दर-सुन्दर विचार व्यक्त कर दें और सुख शांति पूर्वक रस्म अदायगी हो जाए!  और यही उस गोष्ठी में भी हुआ. विद्वान प्राध्यापकों ने बताया कि बीस सूत्री कार्यक्रम के आते ही देश की तक़दीर बदलने की शुरुआत हो चुकी है और बस कुछ ही समय में सब कुछ फर्स्ट क्लास हो जाने वाला है. ‘मौका भी है, दस्तूर भी’ का निर्वहन करते हुए एक से बढ़कर एक अच्छी-अच्छी  बातें की गईं.

गोष्ठी समापन की तरफ़ बढ़ रही थी, तभी एक विद्यार्थी ने संयोजक से अनुरोध किया कि वह भी अपने विचार व्यक्त करना चाहता है. छोटा महाविद्यालय था, सभी सबको जानते थे. किसी तरह के ख़तरे की कोई आशंका नहीं थी. वो विद्यार्थी वैसे भी अच्छा वक्ता और लोकप्रिय डिबेटर था. अत:  संयोजक ने सहर्ष उसे बोलने की अनुमति दे दी. उस विद्यार्थी ने अन्य बातों के अलावा यह भी कहा कि प्रधानमंत्री जी ने बीती रात अपने बीस सूत्री कार्यक्रम में पाँच  सूत्र और जोड़े हैं और अब यह पच्चीस सूत्री कार्यक्रम हो गया है. उसने यह बात इतने आत्मविश्वास से कही कि बाद वाले किसी भी वक्ता ने न केवल उसकी  बात का खण्डन नहीं किया, पच्चीस सूत्री कार्यक्रम की ही आरती गाई. बाद में तो संयोजक ने भी उस गोष्ठी को प्रधानमंत्री के पच्चीस सूत्री कार्यक्रम के नाम कर दिया और प्राचार्य जी ने भी पच्चीस सूत्री कार्यक्रम की शान में ही कसीदे पढ़े.  आज की बात होती तो जब वह विद्यार्थी बोल रहा था तभी किसी ने अपने मोबाइल पर गूगल करके उसके कथन की सत्यता को जांच भी लिया होता. लेकिन याद रखें, वो ज़माना, इण्टरनेट का तो दूर,  टीवी का भी नहीं था. ख़बरों का एक मात्र माध्यम था सरकारी रेडियो या फिर 24 घण्टों में एक बार आने वाला अख़बार. यानि विद्यार्थी के कथन को तत्काल जांचने का कोई तरीका उपलब्ध ही नहीं था.  

गोष्ठी बहुत बढ़िया तरह से सम्पन्न हो गई. लेकिन कुछेक लोगों के मन में यह बात ज़रूर खटकती रही कि प्रधानमंत्री जी ने अपने बीस सूत्री कार्यक्रम को बढ़ाकर पच्चीस सूत्री कर दिया, और उन्हें ख़बर तक नहीं हुई! ऐसा कैसे हो गया? घर जाकर रेडियो सुना, तो पाया कि वहां तो बीस सूत्री कार्यक्रम का ही कीर्तन जारी था. किसी भी बुलेटिन में पच्चीस सूत्र नहीं थे. अगले दिन स्टाफ रूम में यही चर्चा थी. हरेक यही ताज्जुब कर रहा था कि जिन पच्चीस सूत्रों की बात उस विद्यार्थी ने कल की थी, वे तो कहीं थे ही नहीं.

ज़ाहिर है कि उस विद्यार्थी ने हम सबको मामू बना दिया था. आज भी वो घटना याद आती है तो उस विद्यार्थी के आत्मविश्वास भरे कौतुक और हम सबके अपनी जानकारी पर भरोसे की कमी को याद करते हुए एक मुस्कान उभर आती है.
 ●●●
लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत दिनांक 24 दिसम्बर 2013 को प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.     

Tuesday, December 17, 2013

घर से बाहर घर जैसा खाना

भारतीय मध्यवर्ग के जीवन में बहुत तेज़ी से जो बदलाव आ रहे हैं उनमें से एक खान-पान को लेकर है. कहा जाता रहा है कि यह वर्ग अपने खान-पान की रुचियों को लेकर बहुत प्रयोगशील नहीं है, लेकिन यह स्थिति अब धीरे-धीरे बदल रही है. मध्यवर्ग भी अपने खान-पान को लेकर खासा प्रयोगशील  होता जा रहा है, जिसका प्रमाण  हैं हर शहर-कस्बे में नए नए खुलते जा रहे किसम-किसम के और देश-देश के  व्यंजनों के आउटलेट्स.

मध्यवर्ग में बाहर खाने का प्रचलन भी बहुत तेज़ी से बढ़ा है. बहुत ज़्यादा समय नहीं बीता है जब इस वर्ग  में बाहर खाने-पीने को लेकर संकोच ही नहीं, अस्वीकार का भी भाव हुआ करता था. लेकिन अब हालत यह हो गई है कि अगर आप सप्ताहांत में बाहर खाना खाना चाहें तो आपको एक से ज़्यादा जगहों पर घूमना पड़ सकता है या काफी प्रतीक्षा करनी पड़ सकती है. न केवल सप्ताहांतों में, तीज-त्यौहारों पर भी बाहर खाने का चलन बढ़ता जा रहा है. छोटे-मोटे पारिवारिक आयोजन रेस्तराओं में होने लगे हैं और अब तो भाई-दूज जैसे मौकों पर भी बहन-भाई घर की बजाय रेस्तरां को पसन्द करने लगे हैं. करवा चौथ जैसे अवसरों पर तो यह बात और जुड़ जाती है कि पति व्रत  रखने वाली प्रेमिल पत्नी को चूल्हे-चौके के झंझट से बचा रहा है.  बाहर खाने को स्त्री मुक्ति के साथ भी जोड़ कर देखा जाने लगा है. वही बात कि कम से कम एक दिन तो स्त्री को घर के इस तरह के कामों से मुक्ति मिले.

लोगों के खान-पान की आदतों में आए बदलाव को बाज़ार में आ रहे नए-नए व्यंजनों या उनके सहायक पदार्थों की भारी भीड़ में भी देखा जा सकता है. अनेक तरह के पैकेट आने लगे हैं जिन्हें ‘बस दो मिनिट’ में कम से कम मेहनत में आप टेबल पर लाकर खाने  योग्य बना सकते हैं. रेडीमेड मसाले या तैयार अदरक लहसुन मिर्ची इमली  आदि के पेस्ट भी इसी श्रंखला में हैं. इस सबके बीच जो बात मुझे सबसे मज़ेदार लगती है वो यह है कि चीज़ों को बेचने के लिए क्या-क्या किया जाता है.

आप देखेंगे कि बाज़ार में जो उत्पाद बेचे जाते हैं वे आपको बताते हैं कि उनका उपयोग करके आप घर पर होटल जैसा खाना तैयार कर उसका मज़ा ले सकते हैं. यहां एक साथ अर्थशास्त्र और स्वाद शास्त्र की मदद लेकर आपको आकर्षित किया जाता है. होटल में जाना महंगा होता है, इसलिए आप उस उत्पाद का प्रयोग कर घर पर ही होटल वाले शानदार स्वाद का मज़ा ले लीजिए!  लेकिन आपने यह  भी देखा होगा कि बहुत सारे होटल, और उनमें भी वो जो खासे महंगे होते हैं, आपको ‘घर जैसे खाने’ का लालच देते हैं. उनके विज्ञापनों को देखकर अक्सर मुझे विज्ञापन लिखने वालों की सूझ-बूझ पर सन्देह होने लगता है. फिर सोचता हूं कि हो सकता है यह निमंत्रण उन ‘बेचारों’ के लिए हो जिन्हें नौकरी या टूअर आदि के कारण घर से बाहर रहना पड़ रहा हो और जो घर को बुरी तरह मिस कर रहे हों! मैंने कभी  इस तरह के रेस्तरां के व्यंजनों का स्वाद नहीं चखा है. लेकिन जानने की उत्सुकता ज़रूर है कि क्या वे लोग भी घिया की सब्ज़ी, मूंग की दाल और जली हुई, कड़ी या कल सुबह की बची रोटी सर्व करते हैं?

और इसी से मुझे याद आ रहा है अपने एक मित्र के साथ घटित एक प्रसंग. एक दिन मुलाक़ात हुई तो बातचीत  से पता चला कि उनके सामने के दो दाँत भूतपूर्व हो गए हैं. कारण  पूछा तो उन्होंने बताया कि कल उनकी धर्म पत्नी जी ने जो रोटी  बनाई थी वो बहुत कड़ी थी! मैंने बहुत सहज भाव से कहा, “तो आपको खाने से मना कर देना चाहिए था!” और उन्होंने उससे भी अधिक सहज भाव से जवाब दिया, “वो ही तो किया था!” आशा करता हूं कि घर जैसा खाना खिलाने का वादा करने वाले होटल यह भी ज़रूर करते होंगे.

असल में यह जो बाहर खाने-वाने का चलन बढ़ा है इसमें एक बहुत बड़ी भूमिका इस बात की भी है कि स्त्रियां बहुत बड़ी तादाद में घर से बाहर निकल कर नौकरी वगैरह करने लगी हैं. यह स्वाभाविक ही है कि जब उन्होंने एक अतिरिक्त ज़िम्मेदारी ओढ़ी है तो अपने पहले वाले दायित्वों में से कुछ को वे हल्का करें. अब तो नई पीढ़ी  में बहुत सारे युगल ऐसे भी देखने को मिल जाते हैं जो सुबह आठ बजे नौकरी पर निकलते हैं और रात नौ बजे लौटते हैं. उनके यहां किसी भी पत्नी  से यह उम्मीद करना कि दिन भर की कड़ी मेहनत के बाद वो अपने पतिदेव के सम्मान में गरमा गरम खाना तैयार कर परोसेगी, न केवल अव्यावहारिक, बल्कि अमानवीय भी होगा. और मुझे लगता है कि अगर हम स्त्रियों का बाहर काम करना स्वीकार कर सकते हैं तो फिर लोगों के बाहर खाना खाने को भी उसी सहज भाव से स्वीकार करना चाहिए.  
●●●


जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय  अपराह्न दैनिक  न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत 17 दिसम्बर, 2013 को  होटल में घर का स्वाद...अजब पहेली शीर्षक से प्रकाशित टिप्पणी का मूल आलेख! 

Tuesday, December 10, 2013

आगे की सुध ले....

चुनावों का एक दौर  पूरा हुआ. कुछ लोगों ने इसे  सत्ता का सेमी फाइनल भी कहा. और भी बहुत कुछ कहा. लेकिन फिलहाल मैं अभिव्यक्ति  पर, शब्दों के प्रयोग पर कोई विमर्श  शुरु नहीं कर रहा हूं. इसकी बजाय दो-तीन बातों पर आप सबका ध्यान खींचना चाह रहा हूं.

पहली बात तो यह कि करीब-करीब सब जगह इस बार रिकॉर्ड मतदान  हुआ. आज़ादी के इतने बरसों बाद हमारा मतदाता जागरूक होकर अपने मताधिकार का प्रयोग करने में अधिक सजग हुआ है, यह तो खुशी की बात है ही, प्रसन्नता इस बात की भी है कि निर्वाचन विभाग ने विभिन्न संचार माध्यमों का सदुपयोग कर मतदान के पक्ष में माहौल बनाया और अन्य बहुत सारे घटकों ने इस माहौल को अपना समर्थन देकर मज़बूत किया. परिणाम हम सबके सामने है. इससे यह भी भरोसा होता है कि अगर कोई काम मन लगाकर किया जाए तो उसके परिणाम भी निश्चित  रूप से सामने आते  हैं.

दूसरी बात यह है कि इस बार चुनाव परिणाम बहुत अप्रत्याशित रहे हैं. शायद  हर दफ़ा रहते हैं, लेकिन इस बार कुछ अधिक रहे. न जीतने वालों ने इतनी बड़ी जीत की उम्मीद की थी और न हारने वालों ने इतनी बड़ी हार की आशंका मन में रखी थी. ख़ास तौर पर अपने प्रांत राजस्थान में. मीडिया के अनुमान, एक्ज़िट पोल, ओपीनियन पोल, पण्डितों की भविष्यवाणियां – सब पीछे रह गए. यह अलग बात है कि परिणाम आ जाने के बाद पण्डित लोग (मेरा मतलब है राजनीतिक पण्डित लोग) अपनी-अपनी तरह से इन परिणामों की व्याख्या करते हुए दर्शा रहे हैं कि यह तो होना ही था. मेरा मन करता है कि उनसे पूछूं कि हुज़ूर अगर आप जानते थे तो पहले क्यों नहीं बोले? लेकिन फिर लगता है कि कुछ न कुछ कहना उनकी भी तो विवशता है. अब इस विवशता में वे अगर अपनी विद्वत्ता का भी थोड़ा तड़का लगा रहे हैं, तो इसे क्षम्य माना जाना चाहिए. लेकिन ये जो परिणाम सामने आए हैं, मुझे लगता है कि ये जाने वाली सरकार के लिए तो महत्व रखते ही हैं, आने वाली सरकार के लिए उससे भी अधिक महत्व रखते हैं. इन परिणामों  के बाद हमारे जन प्रतिनिधियों को, राजनीतिक दलों को, शासकों को, सरकारों  को यह बात समझ में आ जानी चाहिए कि जनता न तो सहन करती है और न माफ़. वो अब इतनी समझदार हो गई है कि उसके हाथ में जो ताकत है उसका इस्तेमाल कर आपको अर्श पर ले जा सकती है तो फर्श पर भी पटक सकती है. यानि आप उसकी उपेक्षा न करें.

और यह बात इस बार जो सरकार बनने वाली है उसके लिए तो और अधिक महत्व रखती है. इसलिए रखती है कि आज़ादी के बाद हमारे प्रांत की यह कदाचित पहली ऐसी सरकार होगी जिसके सामने इतना छोटा विपक्ष होगा. लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका को कम करके नहीं आंका जाना चाहिए, लेकिन इस बार जनता जनार्दन ने जो जनादेश दिया है उसमें संभवत: सत्ता पक्ष को ही यह दायित्व भी सौंप दिया है कि अपने कामों की निगरानी भी वह खुद करे. यह बहुत बड़ा दायित्व है. इस सरकार को निरंकुश हो जाने के फिसलन भरे किंतु मोहक मार्ग से खुद अपना बचाव करना होगा.

कभी-कभी मुझे लगता है कि हमारे देश में किसी भी सरकार के लिए जनाकांक्षाओं की कसौटी पर खरा उतरना नामुमकिन है. अगर आप एक नागरिक के रूप में मुझसे जानना चाहें तो मेरी तमन्ना यही होगी  कि मुझसे कम से कम टैक्स लिया जाए और सरकार  मुझे ज़्यादा से ज़्यादा दे. मेरे सारे काम वो करे. आम लोगों की इस अव्यावहारिक तमन्ना को कोई पूरा नहीं कर सकता. लेकिन दो चीज़ें तो हो ही सकती हैं. एक तो यह कि टैक्स लेने और सुविधाएं देने के बीच वाज़िब संतुलन बनाया जाए, और दूसरे यह कि जनता को यह भरोसा दिलाया जाए कि जितना उससे लिया जा रहा है, उसका सदुपयोग हो रहा है. अब तक की त्रासदी यही रही है कि लोगों को लगा है कि उनसे टैक्स आदि के रूप में जो लिया जा रहा है उसका सही उपयोग नहीं हो रहा है.

और एक आखिरी बात. अब तक तो यही देखने में आया है कि चुनाव से पहले जो लोग मतदाता को यह एहसास दिलाते नज़र आते थे कि मतदाता ही सर्वोपरि है, चुनाव परिणाम आने और विजयी हो जाने के बाद  वे पहुंच से परे हो जाते हैं. जनता की सुध उन्हें पूरे पाँच बरस बाद ही आती है. जो लोग जीत कर आए हैं, उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि अब जनता इस बात को स्वीकार नहीं करने वाली है. उन्हें पूरे पाँच  बरस अपने मतदाताओं से जीवंत सम्पर्क बनाए रखना  होगा, और उनकी आशाओं-आकांक्षाओं की न केवल खोज-खबर  लेनी होगी, उनकी पूर्ति के लिए यथासम्भव  प्रयास भी करते रहना होगा. अगर ऐसा न किया गया तो जनता को 2013 को दुहराने में कोई संकोच नहीं होगा.

●●●
जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम 'कुछ इधर कुछ उधर' में 10 दिसम्बर, 2013  को प्रकाशित टिप्पणी का मूल आलेख.       

Tuesday, December 3, 2013

हम तो लुट गए खड़े ही खड़े

शादियों का सीज़न पूरे यौवन पर है. सड़क पर निकलिये  तो आपको कहीं पता चलेगा कि ये देश वीर जवानों का है और थोड़ा आगे निकलेंगे तो मेरे यार की शादी है की नाचती-गाती  मुनादी सुनाई देगी. शादी का मतलब सबके लिए अलग-अलग होता है. दूल्हा दुल्हन के लिए अलग, उनके मां-बाप के लिए अलग, रिश्तेदारों के लिए अलग, और उन ‘मानस के राजहंसों’ के लिए अलग जिन्हें बुलाने को स्नेह निमंत्रण भेजे जाते हैं. इन बेचारे मानस के राजहंसों  की हालत हर आने वाले निमंत्रण के साथ पतली होती जाती है. महीने के बजट में उस निमंत्रण पत्र का मान कैसे फिट होगा, ज़्यादातर मध्यमवर्गीय लोगों  के  लिए यह सोच उस शादी के समारोह के उल्लास की समस्त सम्भावनाओं पर भारी पड़ा जाता है.
 
मुझे अपनी नौकरी के वे शुरुआती दिन याद हैं जब हमारे कॉलेज में कोई बीसेक प्राध्यापक हुआ करते थे और कॉलेज के किसी भी विद्यार्थी के परिवार में अगर शादी होती तो वो अपने किसी विश्वास पात्र को इस बात के लिए तैनात करता कि वो सारे प्राध्यापकों को लेकर आए और उनका विशेष ध्यान रखे. जीमण, जी हां, तब जीमण होते थे, ज़मीन पर पंगत में बैठ कर होता था और तीन-चार युवा हम सबको मनुहार कर-करके जिमाते थे. भरपेट जीम लेने के बाद बारी आती थी ‘आशीर्वाद’ देने की. तब लिफाफों का प्रचलन नहीं हुआ था. हमारे एक साथी इस काम में माहिर माने जाते थे इसलिए  हम सब उनको आगे करते और वे अपने हाथ में एक-एक रुपये के पाँच  नोट ताश  के पत्तों की तरह जमा कर वर या वधू के पिताश्री को भेंट करते. साथ-साथ वे हें-हें भी करते जाते. हम सब भी उनका अनुसरण करते. 

तब से अब तक देश की सारी नदियों में बहुत सारा पानी बह गया है. जीमण  की  जगह वृषभ भोज ने ले ली है. मेरा मतलब है बफ़े डिनर से  है. यह इतना आम हो गया है कि अब लोगों ने इसका उपहास करना भी बन्द कर दिया है. बफ़े डिनर के साथ-साथ शादियों का आकार इतना बड़ा होने लगा है कि न बुलाने वाला आपको पहचानता है और न आप अपने होस्ट को जानते हैं. एक शादी में आव भगत करने वाली सजी-धजी विनम्र  युवतियों  को मैं बहुत देर तक घर परिवार की सदस्याएं मानकर उनका अभिवादन करता रहा. और एक अन्य शादी में पहुंच कर शीतल पेय आदि ग्रहण करने के बाद जब अचानक एक पुराने मित्र से भेंट हुई और थोड़ी इधर-उधर की बातें  हुई मुझे पता चला कि जिस शादी में मुझे शामिल होना है वो तो दूसरी तरफ के पाण्डाल में है. ऐसे अनेक किस्से हैं.

जब भी शादियों की बात होती है, मुझे बरसों पहले की एक घटना याद आए बग़ैर नहीं रहती है. मेरे एक प्रिंसिपल महोदय की बेटी की शादी थी. प्रिंसिपल भी ऐसे वैसे नहीं, अंग्रेजों के जमाने के जेलर-नुमा. उनके यहां शादी में हमने पहली बार देखा कि ‘आशीर्वाद’ स्वीकार करने के लिए बाकायदा एक काउण्टर लगाया गया था, जिस पर उनके एक नज़दीकी  रिश्तेदार तैनात थे. ज़ाहिर है कि वे हममें से किसी को नहीं जानते थे. वैसे तो उस ज़माने में शादियों का आकार क्योंकि छोटा होता था, वर या वधू के परिवार के लोग हर मेहमान से  व्यक्तिश: परिचित हुआ करते थे.  लेकिन यह तो अफसर की बेटी की शादी का मामला था. इसलिए व्यवस्था भी अलग तरह की थी. तब तक लिफाफों का प्रचलन नहीं हुआ था. नोट नंगे  ही दिए जाते थे. हममें से एक-एक प्राध्यापक जाता, उन रिश्तेदार महोदय के सामने अपना पाँच रुपये का नोट पेश करता, वे नाम पूछते और उसी नोट पर वह नाम लिखकर अपने हाथ में लिए एक हैण्ड बैग में रख लेते. इस तरह हम सब मुलाजिमों ने अपना दायित्व निर्वहन कर लिया. तभी शहर के एक नामी वकील साहब वहां आए. उन्होंने बड़ी ठसक से अपनी जेब से सौ रुपये का नोट निकाला, और उन प्रभारी रिश्तेदार महोदय को पेश किया. तब क्योंकि शादी में आशीर्वाद के लिए पाँच  रुपये का रेट फिक्स्ड था, रिश्तेदार महोदय ने बहुत सहज भाव से उस सौ रुपये के नोट पर उन वकील साहब का नाम लिखा और अपने उस हैण्ड बैग से हम सबके दिए हुए नोट  निकाल कर उन वकील साहब को दे दिए.
सोच सकते हैं, तब हम सबके दिल पर क्या गुज़री होगी? बेहोश  होकर धराशायी होने में बस थोड़ी ही कमी रही. अफसोस केवल अपने पाँच  रुपयों का नहीं था, उससे भी ज़्यादा फिक्र इस बात की थी कि प्रिंसिपल साहब के दरबार में हमारा ‘आशीर्वाद’ गैर हाज़िर पाया जाएगा तो उनको कितना बुरा लगेगा! औरों की मैं नहीं जानता, मुझे तो अपने प्रिय कवि नीरज बुरी तरह याद आ रहे थे – कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

लेकिन क्या ज़माना था वो भी!

●●●


जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न  दैनिक न्यूज़ टुडै में प्रकाशित होने वाले म्रे साप्ताहिक  कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत दिनांक 03 दिसम्बर 2013 को प्रिंसिपल के दरबार  में हमारा 'आशीर्वाद' गैर हाज़िर शीर्षक से प्रकाशित टीप का मूल आलेख. 

Tuesday, November 26, 2013

चुनावी ड्यूटियों के मज़ेदार अनुभव

राजनीतिक दलों, उम्मीदवारों और आम जनता के लिए चुनाव का चाहे जो मतलब हो, अधिकांश  सरकारी कर्मचारियों के लिए तो चुनावी ड्यूटी एक बहुत बड़े संकट का पर्याय होती है. तीन-चार दिन घर से बाहर, किसी अजनबी और सुविधा विहीन जगह पर रहना और एक ऐसे महत्वपूर्ण दायित्व का निर्वहन करना जिसमें किसी छोटी  से छोटी चूक की बहुत बड़ी सज़ा अवश्यम्भावी हो,  भला किसको रास आ सकता है? शायद यही वजह है कि हर चुनाव के समय सरकारी कर्मचारी इन ड्यूटियों से मुक्ति पाने के लिए तमाम तरह के जुगाड़ करते देखे जाते हैं. लेकिन फिर भी ड्यूटी तो करनी ही  होती  है, लोग करते भी हैं, और उसके मज़े भी लेते हैं.

अपनी तीन दशक लम्बी  नौकरी में मैंने नगरपालिका से लगाकर लोक सभा तक के तमाम चुनाव करवाए हैं. कॉलेज के चुनाव तो खैर करवाए ही हैं और अब बिना किसी संकोच के कह सकता हूं कि जिसने कॉलेज के चुनाव करवा लिए वो कहीं के भी चुनाव को दांये-बांये हाथ का नहीं, हाथ की एक उँगली का खेल समझ सकता है. हमने भी इसी भाव से तमाम चुनाव करवाए और खूब मज़े लेकर करवाए. अब पीछे मुड़ कर देखता हूं तो याद आता है कि हमें चुनाव का सबसे रोचक हिस्सा उसका प्रशिक्षण लगता था. प्रशिक्षण का दायित्व आम तौर पर प्रशासन वाले लोगों का होता था और हम कॉलेज शिक्षा  वालों और प्रशासन के बीच छत्तीस  का रिश्ता  जग जाहिर है. यह प्रशिक्षण कार्यक्रम हमें उन लोगों की खिंचाई का अवसर देता था.

पढ़ाने लिखाने वालों में किताबों को चाट जाने का शौक तो होता ही है. हमारे कुछ साथी भी चुनाव की मार्ग दर्शिका को लगभग घोट कर पी जाया करते थे. और उसके बाद वे प्रशिक्षण कार्यक्रम में प्रशिक्षण देने वालों से वो वो बारीक सवाल करते कि  उनसे जवाब देने नहीं बनता. एक बार हुआ यह कि जो सज्जन प्रशिक्षण दे रहे थे, उनके पास हमारी शंका का कोई तर्कपूर्ण समाधान नहीं था. लेकिन वे अपनी कमी तो भला कैसे स्वीकार करते! तो उन्होंने बड़े आत्मविश्वास के साथ हमारे प्रश्नकर्ता साथी को कहा कि अगर वैसी स्थिति आए तो आपको अपना कॉमन सेंस इस्तेमाल करना चाहिए. उनका उत्तर अपनी जगह सही था,  और हम सब करते भी यही हैं. लेकिन यहां तो बात मज़े लेने की थी ना! सवाल करने वाले हमारे साथी अपनी जगह से उठे, दो कदम आगे बढ़े, इधर-उधर देखा और बोले, “वो तो हम कर ही लेंगे, लेकिन आप तो यह बताइये कि इस बारे में ऑफिशियल प्रावधान क्या है?” और जैसे ही उन्होंने अपनी बात पूरी की, हममें से भी बहुत सारे लोग उनकी हां में हां मिलाते हुए उठ खड़े हुए. कलक्टर महोदय ने जैसे-तैसे बात को सम्भाल कर मामले का पटाक्षेप किया. 

अपनी नौकरी के उत्तर काल में जब अपनी वरिष्ठता के चलते मुझे ज़ोनल मजिस्ट्रेट के रूप में चुनाव ड्यूटी करने का मौका मिलने लगा  तो एक साथी ने एक मज़ेदार पाठ पढ़ाया. ड्यूटी के बाद हमको एक प्रतिवेदन भरना होता है जिसमें यह बताना होता है कि अपने दायित्व निर्वहन के दौरान हमें किन-किन परेशानियों से रू- ब- रू होना पड़ा और हमने उन स्थितियों में क्या किया. हम लोग आम तौर पर ‘कोई परेशानी नहीं आई’ लिखकर काम चलाते रहे. लेकिन एक मित्र ने, शायद अपने अर्जित अनुभव के आधार पर हमें सलाह दी कि हम ऐसा कभी नहीं लिखें. उन्होंने कहा कि हम ऐसा कुछ लिखें कि  वहां दो या अधिक गुटों के बीच पारस्परिक तनाव की वजह से स्थिति काफी विकट हो गई थी, लेकिन ‘अधोहस्ताक्षरकर्ता’ ने अपनी सूझ-बूझ का इस्तेमाल कर स्थिति को  सम्हाल लिया. ज़ाहिर है कि ऐसी  इबारत बिना किसी प्रमाण के लिखी जा सकती है. और इससे सम्बद्ध अधिकारी अप्रत्यक्ष रूप से बहुत दक्ष भी घोषित हो जाता है.   

एक और प्रसंग याद आता है. चुनाव करवा कर जब लौटते हैं तो स्वाभाविक है कि सारे लोग बहुत हैरान-परेशान और थके-मांदे होते हैं. चुनाव की सामग्री  और मत पेटियां वगैरह जमा करवाना शायद सबसे कठिन काम होता है. भीड़भाड़, धक्का-मुक्की और हरेक को ‘पहले मैं’ की जल्दी. प्रशासनिक अमले की अपनी दिक्कतें होती हैं. हम लोग भी रात नौ-साढ़े नौ बजे चुनाव करवा कर लौटे थे और अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे. तभी हमारे एक वरिष्ठ साथी भी मतदान सम्पन्न करवा कर लौटे. देखा कि सामान जमा करवाने में काफी देर लगने वाली है, तो सीधे उच्चाधिकारियों के पास पहुंचे  और बोले कि देखिये, मुझे रात को दिखाई नहीं देता है, इसलिए मैं तो घर जा रहा हूं. जब आपको सुविधा हो अपनी सामग्री मेरे घर से मंगवा लेना. उनका इतना कहना था कि जैसे पूरे अमले में बिजली दौड़ गई. सभी जानते हैं कि अगर एक भी मत  पेटी जमा होने से रह जाए तो कैसा हड़कम्प मचता है! अफसरों ने अतिरिक्त व्यवस्था  करके सबसे पहला उनका सामान जमा किया, और वे हम सबको हिकारत की नज़रों से देखते हुए विजयी  भाव से प्रस्थान कर गए.

●●●
जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक 'न्यूज़ टुडै' में आज दिनांक 26 नवम्बर, 2013 को प्रकाशित हुए मेरे साप्ताहिक कॉलम 'कुछ इधर कुछ उधर' के अंतर्गत प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, November 19, 2013

बूढों के लिए कोचिंग क्लास की ज़रूरत

अखबारों में प्राय: बुज़ुर्गों से दुर्व्यवहार या  उनकी उपेक्षा के समाचार पढ़ने को मिलते हैं. जहां भी दो-चार हम उम्र लोग मिलते हैं, अक्सर यही रोना रोया जाता है कि आजकल बूढ़े मां-बाप की कोई फिक्र नहीं करता है. लेकिन मेरे एक वरिष्ठ साहित्यिक मित्र अक्सर यह कहते हैं कि अगर उनके पास संसाधन हों तो वे वरिष्ठ लोगों के लिए कोचिंग क्लासेस लगाना चाहेंगे. उनका बहुत स्पष्ट विचार है कि अपनी बहुत सारी पीड़ाओं के लिए वरिष्ठ जन स्वयं उत्तरदायी हैं. 

मुझे भी लगता है कि हालात उतने बुरे तो नहीं हैं जितने मान लिए गए हैं, और यह भी कि अगर आपको कोई कष्ट न हो तो भी आपके शुभचिंतक भरसक कोशिश करते हैं कि आप महसूस  करें कि आप भयंकर कष्ट में हैं. यानि इस बात को एक सच के रूप में पंजीकृत कर लिया गया है कि नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी को फूटी आंखों भी नहीं देखना चाहती है! होता यह है कि जब  वृद्ध या वरिष्ठ लोग अपने बच्चों के साथ रहते हैं और अगर वे कभी कोई काम करते हैं, जैसे सब्ज़ी लेने चले जाते हैं या अपने पोते पोतियों को स्कूल छोड़ने लेने चले जाते हैं तो उन्हीं  के साथी ताना मारते हैं और उनके मन में यह बात बिठा देते हैं कि उनका शोषण किया जा रहा है. और इस तरह जीवन में  जिस बात का आनंद  लिया जाना चाहिए उसी को वे बतौर सज़ा या शोषण  देखने समझने लगते हैं.

क्या सारा दोष नई पीढ़ी का है? क्या  पुरानी पीढ़ी से कहीं कोई चूक नहीं हो रही है? जब मैं इस बात पर सोचता हूं तो पाता हूं कि हममें से बहुत सारे लोग इस बात को आसानी से स्वीकार नहीं कर पाते हैं कि अब हम निर्णायक नहीं रहे हैं. आप जब खुद गाड़ी चलाते हैं और जब आप गाड़ी चलाने वाले के बगल में बैठते हैं तब  में कुछ फर्क़ होता है. आप बगल में बैठकर भी चाहेंगे कि गाड़ी वैसे ही चलाई जाए जैसे आप चाहते हैं तो जो गाड़ी चला रहा है उसे असुविधा होगी. स्वस्थ बात तो यह होगी कि आप चैन से बैठें और उसे अपने विवेकानुसार गाड़ी चलाने दें. इस तरह वो भी अपना कर्तव्य निर्वहन करेगा और आप  भी यात्रा का आनंद लेंगे. लेकिन क्या ऐसा होता है? हम कभी यह मानने को तैयार ही नहीं होते हैं कि हमसे बेहतर ड्राइवर कोई और हो सकता है.

बड़ी विडम्बना यह है कि इस गतिशील जीवन में हम  स्थिरता चाहते हैं. हम चाहते हैं कि हम सदा अभिभावक बने रहें, और हमारे बच्चे भी कभी बड़े न हों! एक तरह से हम अपने पूर्वजों की संन्यास और वानप्रस्थ आश्रम वाली व्यवस्था को भी नकारने का हर सम्भव प्रयास करते हैं. बाप यह नहीं चाहता कि बेटा अपने विवेकानुसार अपना काम करे और मां यह नहीं चाहती कि बहू अपनी पसन्द और अपनी सुविधा के अनुसार घर चलाए!

पिछले कुछ बरसों में भारत में जीवन शैली में बहुत बदलाव आए हैं. आज से दस पन्द्रह बरस वाला जीवन अब विलुप्त हो गया है. आज की पीढ़ी का  खान-पान, पहनावा, लोक व्यवहार सब कुछ बदल चुका है. नए ज़माने में रह रही हमारी संतान को उसी नई जीवन-शैली के अनुरूप आचरण करना होता है. लेकिन दिक्कत यह होती है कि हमारे लिए समय ठहरा हुआ है और हम चाहते हैं कि हमारी संतान के लिए भी वो ठहरा हुआ ही रहे, जो मुमकिन नहीं है. टकराव की एक बड़ी वजह यह भी होती है. एक आदर्श स्थिति यह हो सकती है कि हम अपनी जीवन शैली को चाहे न बदलें, उन्हें यानि नई पीढ़ी  को अपनी आवश्यकताओं के अनुसार जीवन जीने की प्रसन्नतापूर्ण छूट दें.

जब अपने बुज़ुर्गों के साथ युवाओं के बर्ताव की बात होती है तो चलते-चलते  प्राय: दो-चार हाथ पश्चिम  को भी जड़ दिए जाते हैं. हम शिखर पर हैं और वो गर्त में हैं – यह भाव आम है. अब जब हमने पश्चिमी जीवन  शैली को पूरी तरह अपना लिया है, समय आ गया है कि हम यह भी देखें कि उन्होंने इस स्थिति का सामना करने के लिए अपने यहां क्या सुरक्षा प्रबन्ध किए हैं! कभी हमारे यहां संयुक्त परिवार प्रथा थी जो परिवार में सभी को– बुज़ुर्गों को और बच्चों को भी-  पर्याप्त सुरक्षा देती थी. अब बहुत सारे कारणों  से संयुक्त परिवार लगभग खत्म हो गए हैं. ऐसे में हमें वैकल्पिक व्यवस्थाएं तो करनी ही होंगी. अगर हमने कामकाजी माताओं के शिशुओं के लिए डे केयर सेण्टर या क्रेश (Creche) जैसी सुविधाओं को स्वीकार किया है तो रिटायरमेण्ट होम्स और वृद्धाश्रमों (कोई सम्मानजनक नाम भी हो सकता है) को भी खुले मन से स्वीकार करने को तैयार रहना चाहिए. अगर बीते ज़माने में वानप्रस्थ की कल्पना थी तो आज वृद्धाश्रम क्यों स्वीकार्य नहीं हो सकता?  जीवन अपनी गति से चलेगा. बदलना तो हम को ही होगा.
●●●  
लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में प्रकाशित मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत 19 नवम्बर, 2013 को प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.