Tuesday, May 2, 2017

बिना अपराध किए ही भुगती 23 साल की सज़ा

अमरीका के क्लीवलैण्ड की अदालत ने एविन किंग नामक एक उनसठ वर्षीय व्यक्ति को बाइज़्ज़त बरी कर दिया है. एविन अपनी गर्ल फ्रैण्ड क्रिस्टल हडसन की हत्या के इलज़ाम में तेईस बरसों से  जेल में था.  क्रिस्टल का शव जून 1994 में उनके अपार्टमेण्ट की एक अलमारी में पाया गया था. अदालत  के दस्तावेज़ों के अनुसार जब क्रिस्टल का शव वहां पाया गया तब एविन किंग भी वहीं मौज़ूद थे और उनका एक जैकेट उसी अलमारी में शव के पास मिला था. क्रिस्टल की मृत्यु पीटने और गला दबाने से हुई थी. उनके साथ दुराचार किये जाने  के प्रमाण भी मिले थे. क्रिस्टल हडसन के शव पर वीर्य और उनकी उंगलियों के नाखूनों में किसी अन्य व्यक्ति की त्वचा की कोशिकाएं पाई गई थीं. उस समय  अदालत ने  वैज्ञानिक सबूतों, अपार्टमेण्ट में एविन किंग की मौज़ूदगी और उनके बयानों की असंगतता इन सबको  अपने फैसले का आधार बनाया. कुल मिलाकर यह कहानी बनाई गई कि क्रिस्टल ने किसी अन्य व्यक्ति से दैहिक सम्बंध बनाए थे और एविन किंग ने उनकी हत्या की थी. इस कथा का आधार यह बात थी कि पाए  गए  वीर्य का मिलान एविन से नहीं हुआ और त्वचा की कोशिकाओं की जांच की कोई तकनीक तब उपलब्ध नहीं थी. एविन किंग को आजन्म कारावास की सज़ा सुना दी गई.

इसके बावज़ूद एविन किंग बार-बार कहता रहा कि वह बेगुनाह है. उसकी गुहार अदालत ने तो नहीं सुनी, लेकिन लेकिन सन 2003 में शुरु हुए ओहियो इन्नोसेंस प्रोजेक्ट के लोग उसकी मदद के लिए आगे आए. प्रोजेक्ट के लोगों का  मानना है कि फोरेंसिक साइंस का असंगत  इस्तेमाल ग़लत फैसलों का दूसरा सबसे बड़ा कारण है. उनकी दलील थी कि डीएनए टेस्टिंग के क्षेत्र में हुई प्रगति की वजह से इस फैसले पर पुनर्विचार करना आवश्यक हो गया है. इन्हीं आधारों पर इन्नोसेंस प्रोजेक्ट वाले पूरे देश में कोई साढ़े तीन सौ मामलों में पुनर्विचार की गुहार लगा रहे हैं. प्रोजेक्ट के लोगों के सतत प्रयासों की वजह से 2009 में प्रमाणों की फिर से डीएनए टेस्टिंग की गई और उसमें यह पाया गया कि वीर्य और त्वचा कोशिकाएं एक ही व्यक्ति की थीं और वह व्यक्ति एविन किंग नहीं था. लेकिन जांच के इस परिणाम को भी आसानी से स्वीकार नहीं किया गया. अभियोग पक्ष एविन किंग की सज़ा को ज़ारी रखने की ज़िद करता रहा और एक काउण्टी जज महोदय ने नई सुनवाई की अनुमति देने तक से इंकार कर दिया. लेकिन, जैसा प्राय: कहा जाता है, आखिरकार सच की जीत हुई. ओहियो इन्नोसेंस प्रोजेक्ट अब तक पच्चीस लोगों को इस तरह का न्याय दिला पाने में कामयाब रहा है.

लेकिन सवाल यह है कि क्या एविन किंग को वास्तव में न्याय मिला है? उसने पूरे तेईस बरस जेल की सलाखों के पीछे काटे हैं. उसने कहा भी है कि जब आप सलाखों के पीछे होते हैं तो मरे जैसे ही होते हैं. इन तेईस बरसों में एविन की मां अपने बेटे की रिहाई का ख़्वाब आंखों में पाले ही इस दुनिया  को अलविदा कह गई. जिस दिन उसे जेल भेजा गया तब उसकी बेटी  तेरह बरस की और बेटा ग्यारह बरस का था. इन 23 मनहूस बरसों में उसने अपने बच्चों को बढ़ता हुआ नहीं देखा. खुद वह खासा बूढ़ा होकर जेल से बाहर आएगा. ओहियो प्रोजेक्ट ने जो कुछ किया वह बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन जो त्रास बेगुनाह एविन किंग ने भुगता है और जो इस बीच उसने खोया है वह सब उसे कोई नहीं लौटा सकता है.

एविन किंग की यह व्यथा कथा पढ़ते हुए मुझे बेसाख़्ता प्रख्यात हिंदी कथाकार मन्नू भण्डारी की एक कहानी  याद आ रही है. कहानी  का शीर्षक है सज़ा’. इस कहानी में किसी और की बेईमानी की सज़ा एक निर्दोष व्यक्ति को दे दी जाती है. मुकदमा चलता है और खूब लम्बा खिंचता है. अंत में उसकी निर्दोषिता प्रमाणित होती है और वह रिहा कर दिया जाता है, लेकिन इस बीच उसका पूरा परिवार उसकी सज़ा का दंश झेलता है. यहां कहानीकार जैसे कहती हैं कि जो व्यक्ति अपराधी था ही नहीं, उसके इस तथाकथित अपराध की सज़ा तो पूरे परिवार ने भुगत ली.  ज़ाहिर है कि सवाल यही है कि क्या वाकई कोई न्याय हुआ है? यही सवाल एविन किंग की इस कथा को पढ़ते हुए हम सबके मन में उठना चाहिए. आखिर ऐसा क्या हो कि अदालतें ग़लत फैसले न करें, और यदि कभी कर भी दें तो उनमें जल्दी से जल्दी संशोधन कैसे हो, ताकि जो दोषी नहीं है उसे बेवजह  सज़ा न भुगतनी पड़े. इस तरह के प्रसंग हमारी चिंतन प्रक्रिया को धार देते हैं, इन्हें जानने-पढ़ने की यही सबसे बड़ी सार्थकता है.


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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक स्तम्भ कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत  मंगलवार, 02 मई, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पठ. 

Wednesday, April 19, 2017

भले लोगों से खाली नहीं है हमारी दुनिया!

दुनिया के बहुत सारे देशों में, जिनमें हमारा भारत भी एक  है सेवाओं की सराहना स्वरूप टिप देना आम बात है. इधर अपने देश में तो कई रेस्तराओं ने बिल में ही बाकायदा सर्विस चार्ज के नाम पर टिप वसूल करना  शुरु कर दिया है. यह जानना रोचक होगा कि दुनिया के कुछ देश ऐसे भी हैं जिनमें टिप देने का प्रचलन नहीं है, और जापान में तो अगर आप किसी को टिप दें तो वह अपमानित महसूस करेगा. अमरीका में हाल में खुले एक जापानी रेस्तरां ने तो बाकायदा अपने बिलों पर यह छपवा रखा है कि हमारे स्टाफ को उनकी सेवाओं के बदले पर्याप्त वेतन दिया जाता है, इसलिए आपकी ओर से दी जाने वाली कृतज्ञता राशि स्वीकार नहीं की जाएगी.

लेकिन इसी टिप ने हाल में एक यादगार प्रसंग भी रच डाला. आज उसी की चर्चा. अपनी पढ़ाई ज़ारी रखने के इरादे से कैलिफोर्निया से हवाई आई इक्कीस वर्षीया कायला ने सपने में भी यह नहीं सोचा होगा. सोचा था कि यहां रहकर स्कूली पढ़ाई ज़ारी रखना आसान होगा, लेकिन महंगी शिक्षा और और जीवन निर्वहन के बहुत ज़्यादा खर्चे ने उसके सपनों को तार-तार कर दिया. घर किस मुंह से लौटतीहवाई में रहकर ही एक चीज़केक फैक्ट्री में नौकरी और एक रेस्तरां में वेटर का काम करने लगी ताकि कुछ पैसा जुट जाए और वो पढ़ाई पूरी करने के अपने सपने की तरफ फिर से लौट सके. और तभी यह अकल्पनीय बात हुई! एक दिन उसके रेस्तरां में तीन ऑस्ट्रेलियाई मेहमान आए. दस बरस की एक लड़की और उसके साथ एक स्त्री-पुरुष जिन्होंने बताया कि वे आजन्म  मित्र हैं. अनायास कायला और उनके बीच बातचीत होने लगी. उन्होंने कायला के बारे में जानना चाहा तो उसने अपनी रामकहानी सुना  दी. ज़ाहिर है कि पढ़ाई पूरी करने के उसके अधूरे रह गए सपने का भी ज़िक्र हुआ. कायला ने सोचा कि मेहमानों ने सामान्य शिष्टाचार का निर्वहन करते हुए उससे सारी बातचीत की है. शायद हुआ भी यही था. लेकिन मात्र यही नहीं. कुछ और भी. मेहमानों के जाने के बाद बारी कायला के चौंक जाने की थी. उसने पाया कि वे लोग दो सौ डॉलर के बिल का भुगतान करने के साथ उसके लिए बिल की राशि से दुगुनी राशि की टिप भी छोड़ गए हैं. कायला ने बाद में एक समाचार चैनल को बताया कि उसके पास अपने भावों को व्यक्त करने के लिए समुचित शब्द नहीं थे, लेकिन वो चाहती थी कि उन लोगों को बांहों में भर ले.

संयोग यह हुआ कि बातचीत के दौरान उन लोगों ने यह भी बता दिया था कि वे किस होटल में रुके हुए हैं. कायला को यह ज़रूरी लगा कि वो एक बार प्रयास करके देखे और अगर वे उदार मेहमान उसे मिल जाएं तो उनके प्रति कृतज्ञता ज़रूर व्यक्त कर  दे. वो तुरंत एक थैंक यू कार्ड और पुष्पगुच्छ लेकर उस होटल जा पहुंची. यह जानकर कि  वे लोग अभी भी वहीं हैं, उसने रिसेप्शन पर ये दोनों चीज़ें उनके लिए छोड़ीं और लौट आई. उसने अपना फर्ज़ अदा कर दिया था. बात यही ख़त्म हो जानी चाहिए थी. लेकिन हुई नहीं. असल करिश्मा तो इसके बाद हुआ. अगले दिन वे तीनों फिर उसी रेस्तरां में आए और उन्होंने कायला से कहा कि वे उसे दस हज़ार डॉलर देना चाहते हैं ताकि वो अपनी पढ़ाई ज़ारी रख सके.

ऐसा होगा, यह तो उसने सपने में भी नहीं सोचा था. क्या बोलती वह? कुछ देर बाद उसने कहा कि वह उन अजनबियों से इतनी बड़ी राशि कैसे ले सकती है? और इसके जवाब में उन्होंने इसरार किया कि उनकी खुशी के वास्ते उसे यह सहायता स्वीकार कर लेनी चाहिए. उन्होंने यह भी आग्रह किया कि कायला उनकी पहचान उजागर न करे, वे अनाम ही रहना चाहते  हैं. कायला विवश होगई उनके आग्रह के आगे, उसने उनकी दी सहायता स्वीकार कर ली, लेकिन उसके मन में यह भाव फिर भी मौज़ूद था कि वो उनके इस एहसान का बदला कैसे चुकाएगी? और इसके जवाब में उन लोगों ने जो कहा वह अदभुत है. उन्होंने कहा कि अगर वो अपना सपना ठीक से साकार कर लेगी, इसके बाद और बड़ा सपना देखने लगेगी और एक बेहतर इंसान बन जाएगी तो उनका एहसान पूरी तरह चुक जाएगा. वह उऋण हो जाएगी.

कायला का कहना है कि उन लोगों ने वाकई उसके जीवन को बदल दिया है. सिर्फ उसकी आर्थिक स्थिति को ही नहीं, बल्कि चीज़ों को देखने का उसका नज़रिया भी उन्होंने बदल दिया है. कायला ने उचित ही यह उम्मीद भी ज़ाहिर की है कि उनकी उदारता का यह वृत्तांत सब को यह बात याद दिलाता रहेगा कि दुनिया अभी भी भले लोगों से खाली नहीं हुई है. उसका यह भी कहना है कि आप निष्ठा से अपना काम करते रहें, उसका फल ज़रूर मिलेगा.


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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 18 अप्रैल, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, April 11, 2017

कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना!

उन प्रसाधन कक्षों में, जिनका रख-रखाव सलीके से किया गया हो, दर्पण का होना सामान्य और स्वाभाविक बात है. अपने देश में सरकारी भवनों की बात अगर छोड़ दें तो मॉल्स वगैरह के साफ-सुथरे और बेहतर तरीके से संधारित टॉयलेट्स में दर्पण अनिवार्यत: होते हैं. और दर्पणों की जितनी ज़रूरत सार्वजनिक स्थलों के प्रसाधन कक्षों में होती है, उतनी ही स्कूलों के प्रसाधन कक्षों में भी होती है. अगर थोड़ा हास्य स्वीकार्य हो तो यह और जोड़ दूं कि दर्पण की ज़रूरत छात्रों के प्रसाधन कक्षों से भी अधिक छात्राओं के प्रसाधन कक्षों में होती है. इस प्रसाधन कक्ष में दर्पणविषयक चर्चा से भारत के सरकारी स्कूलों को अलग कर लेना बेहतर होगा. ख़ास तौर पर लड़कियों के स्कूलों को, क्योंकि उनमें दर्पण का सवाल तो तब उठेगा जब प्रसाधन कक्ष होंगे. लेकिन सब जगह तो ऐसे हालात नहीं हैं. ख़ास तौर पर अमरीका जैसे देश में, जहां सर्वत्र साफ सुथरे प्रसाधन कक्ष अपवाद नहीं नियम की तरह मौज़ूद हैं. तो आज चर्चा  इसी अमरीका के कैलिफोर्निया राज्य में स्थित एक हाई स्कूल की. पिछले महीने वहां के लागुना हिल्स हाई स्कूल में जो  बदलाव हुआ, जिसकी चर्चा आज सर्वत्र हो रही है.

इस स्कूल की  छात्राओं के प्रसाधन कक्ष से दर्पण हटा दिये गए. उनकी जगह छोटी-छोटी पट्टिकाएं लटका दी गईं, जिनपर कुछ खूबसूरत जुमले लिखे हुए थे. मसलन: “आप खूबसूरत हैं. आप मुकम्मल हैं. आप महत्वपूर्ण हैं. आप बहुत अच्छी हैं. आप सबसे अलहदा हैं. आप स्मार्ट हैं. आप विलक्षण हैं. आप अकेली नहीं हैं” वगैरह. कहना अनावश्यक है कि ये सारे जुमले सकारात्मक हैं और जो इन्हें पढ़ेगी उनमें  आशा, उल्लास  और ऊर्जा का संचार होगा. इस मंज़र की कल्पना कीजिए कि आप दर्पण देखने को आगे बढ़ते हैं, उम्मीद करते हैं कि उसमें अपना चेहरा देखेंगे लेकिन वहां आपके चेहरे की बजाय आपको यह संदेश मिलता है कि आप खूबसूरत हैं! कैसा लगेगा आपको? जो जवाब आपकी ज़ुबां पर आएगा, कदाचित वही भाव इस स्कूल की छात्रा सब्रीना के मन में उस वक़्त रहा होगा, जब उसने  अपने स्कूल के छात्रा प्रसाधन कक्ष में यह बदलाव लाने के बारे में सोचा होगा. यह सत्रह वर्षीय लड़की अपने स्कूल में काइण्डनेस क्लब नामक एक गतिविधि का संचालन करती है और इसी गतिविधि के अंतर्गत उसने स्कूल में एक सप्ताह मनाया, जिसका शीर्षक था: व्हाट इफ...    यानि क्या हो अगर ऐसा हो. और योजना बनाई कि इस सप्ताह के हर दिन वो अपने सहपाठियों को एक संदेश देगी. जैसे, एक दिन उसने यह संदेश दिया कि क्या हो अगर हम अधिक प्रेम से रहें!और यह सप्ताह मनाने के लिए इस तरह के संदेश तैयार करते हुए उसने सोचा कि क्यों न इन संदेशों को प्रसाधन कक्ष में लगा दिया जाए? अपने स्कूल प्रशासन से भी उसे सहमति और सहयोग हासिल हुए और जैसा बाद में स्कूल की गतिविधियों की डाइरेक्टर  चेल्सिया मैक्सेल ने कहा, सबरीना ने उस सेमेस्टर के लिए इस बात को अपना लक्ष्य ही बना लिया कि वो पूरे स्कूल परिसर में सकारात्मक संदेशों का प्रसार करेगी. और इस तरह जो गतिविधि सिर्फ एक सप्ताह के लिए शुरु की गई थी, उसके स्वागत से प्रफुल्लित होकर स्कूल प्रशासन ने तै किया है कि वे इसे ज़ारी रहने देंगे. इस बारे में खुद सबरीना ने जो कहा है वो ग़ौर तलब है. उसने कहा है कि “मैंने यह कभी नहीं सोचा है कि मैं ऐसा कुछ कर रही हूं जिससे औरों की ज़िंदगी प्रभावित हो. मैं तो बस यह जानती हूं कि मेरे इस काम से उनका एक दिन थोड़ा ज़्यादा उजला हो सकता है या उनका मनोबल थोड़ा बढ़ सकता है. लेकिन मुझे नहीं लगता कि इस काम का कोई बहुत बड़ा असर  होगा.” लेकिन सबरीना ने इससे आगे जो कहा है वो बहुत महत्वपूर्ण है. उसने कहा है कि “हमारे इन संदेशों ने लोगों को यह याद रखने में मदद की है कि हम में से हरेक खूबसूरत है, हरेक महत्वपूर्ण है, हरेक बेहद अच्छा है और हरेक के साथ समानता का बर्ताव किया जाना चाहिए. मैंने ऐसा  इस कारण किया है कि मैं इस बात को लेकर बेहद जुनूनी हूं कि हरेक महत्वपूर्ण है और हरेक का खयाल रखा जाना चाहिए.”

लेकिन खूब सराहे गए इस प्रयास को सभी ने स्वीकार नहीं किया है. कुछ लोगों का कहना है कि भले ही यह काम नेक इरादों से किया गया हो, दर्पण को हटाकर हम यथार्थ की अनदेखी करने का ग़लत काम कर रहे हैं. ऐसे लोग चाहते हैं कि सकारात्मकता और यथार्थ से आंख मिलाने से कतराने को अलग-अलग करके देखा जाए. और भी कुछ बातें कही गई हैं. यह सब पढ़ते हुए हो सकता है, आपको वो गाना याद आ जाए: कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना!    


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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अन्तर्गत मंगलवार, 11 अप्रेल, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, April 4, 2017

इतनी भी आसान नहीं है एमबीए की डगर

व्यवसाय की दुनिया में अपने लिए जगह बनाने के इच्छुक अधिकांश युवाओं  का सपना  होता है कि वे किसी प्रतितिष्ठित बिज़नेस स्कूल से एमबीए कर लें.  माना जाता है कि इस पाठ्यक्रम का हिस्सा बनकर आप वो सब सीख लेते हैं जो किसी भी कामयाब कम्पनी के लीडर को आना चाहिए. यही वजह है कि दुनिया के  चुनिंदा बिज़नेस स्कूल्स में एमबीए  पाठ्यक्रमों में प्रवेश पाना बहुत आसान नहीं होता है. लेकिन जितनी यह बात सच है उतनी ही सच यह बात भी है कि पिछले कुछ बरसों में पूरी दुनिया में एमबीए पढ़ाने वाले शिक्षण संस्थानों की संख्या में बहुत तेज़ वृद्धि हुई है और एमबीए उपाधिधारी युवाओं की ऐसी बाढ़ आई है कि उनके लिए ठीक-ठाक सी नौकरी प्राप्त करना भी कठिन हो गया है. ये दोनों बातें परस्पर विरोधाभासी भले ही लगें,  हैं सच. पारम्परिक पाठ्यक्रम को पढ़कर एमबीए करने वालों की इस स्थिति  को देखते हुए अब दुनिया के बहुत सारे देशों के विश्वविद्यालय अपने एमबीए पाठ्यक्रमों  का रुख विशेषज्ञता के अब तक अनछुए इलाकों की तरफ मोड़ रहे हैं. ऐसे ऐसे नए विषयों के पाठ्यक्रम सुनने को मिल रहे हैं कि ताज्जुब होता है.

उदाहरण के लिए ब्रिटेन की लिवरपूल यूनिवर्सिटी ने पिछले दो बरसों से  घुड़दौड (होर्सरेसिंग) में एमबीए का दो-साला पाठ्यक्रम चला रखा है. ज़ाहिर है कि यह पाठ्यक्रम उन युवाओं के लिए है जो इस खेल उद्योग में किसी वरिष्ठ प्रशासनिक या अग्रणी दायित्व का निर्वहन करने का ख़्वाब देखते हैं. इस कोर्स में मार्केटिंग,  स्पॉन्सरशिप  जैसी पारम्परिक बातों के अलावा खेल  विषयक नियम कानून, घोड़ों की देखभाल और उनकी  सेहत विषयक ज्ञान भी दिया जाता है. व्यावहारिक अनुभव प्रदान करने के लिए विद्यार्थियों को रेस दिखाने के लिए ले जाया जाता है और अश्व प्रजनन केंद्रों की पूरी कार्य प्रणाली का अवलोकन भी कराया जाता है. महत्वपूर्ण बात यह है कि यह पाठ्यक्रम शुरु करने का सुझाव खुद ब्रिटिश  होर्सरेसिंग प्राधिकरण और इसी तरह की अन्य संस्थाओं की तरफ से आया था. इन संस्थाओं ने महसूस किया कि अगर उन्हें इस व्यवसाय विशेष के लिए विशेष रूप से विधिवत प्रशिक्षित प्रबंधक मिल जाएं तो वे अपना काम और बेहतर तरीके से कर सकेंगी.   

इसी लिवरपूल  विश्वविद्यालय ने कोई बीसेक बरस पहले फुटबॉल में एमबीए का एक विशेषीकृत पाठ्यक्रम शुरु किया था जो अभी भी खासा लोकप्रिय है. इसकी लोकप्रियता इस तथ्य से भी समझी जा सकती है कि जहां होर्सरेसिंग कोर्स की दो बरस की पढ़ाई की कुल लागत साढे साथ हज़ार ब्रिटिश  पाउण्ड प्रति वर्ष है वहीं फुटबॉल वाले कोर्स की एक बरस की पढ़ाई की लागत पंद्रह हज़ार ब्रिटिश पाउण्ड है और अगर कोई विदेशी इसे पढ़ना चाहे तो उसे साढे इक्कीस हज़ार पाउण्ड खर्च करने होते हैं. 

विश्वविद्यालयों का सोच यह है कि अगर सभी अपने यहां एमबीए का पाठ्यक्रम चला रहे हैं तो हमें बाज़ार में टिके रहने के लिए कुछ अलग करना होगा. इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी समझ लिया है कि किसी खास क्षेत्र में अपनी जगह बनाने के लिए बहुत ज़रूरी है कि कुछ अलहदा और ख़ास किया जाए. यही अलग करने का भाव इन अजीब लगने वाले पाठ्यक्रमों में देखा जा सकता है. विश्वविद्यालय ही नहीं, विद्यार्थी भी इस बात को समझ रहे हैं. एक तियालीस वर्षीया फ्रांसिसी महिला का कहना है कि इण्टरनेशनल बिज़नेस और मार्केटिंग  में मास्टर्स डिग्री धारी होने के बावज़ूद उन्हें असंतोषप्रद नौकरियां ही मिलीं और इस वजह से वे बार-बार नौकरियां बदलने को मज़बूर हुईं, लेकिन आखिर में अपना घर बेच कर उन्होंने तैंतीस हज़ार पाउण्ड खर्च कर जब फ्लोरिडा विश्वविद्यालय से एविएशन (उड्डयन) मैनेजमेंट में डिग्री हासिल की तो उन्हें उनकी मनपसंद नौकरी भी मिल गई.

लेकिन ऐसा नहीं है कि इस अति विशेषीकृत शिक्षा को सब पसंद ही कर रहे हैं. प्रबंधन के बहुत सारे विशेषज्ञों का कहना है इस प्रकार के पाठ्यक्रमों में चुने हुए विषय पर इतना अधिक ध्यान और समय दिया जाता है कि बिज़नेस की आधारभूत बातों को बताने-पढ़ाने के लिए बहुत कम गुंजाइश बच रहती है, और इस तरह मूल प्रबंधन विषय उपेक्षित रह जाता है. कुछ जानकारों का यह भी कहना है इन  विशेषीकृत  विषयों को अभी बाज़ार में पूरी तरह स्वीकृति नहीं मिल पाई है इसलिए इन्हें पढ़ने वालों की राह बहुत सुगम नहीं है. यह भी कहा जाने लगा है कि किसी ख़ास  विषय में एमबीए करने वालों के लिए नौकरी चुनने के मौके बहुत सीमित हो जाते हैं. इस बारे में सबसे मज़ेदार टिप्पणी तो एक अंतर्राष्ट्रीय एडमिशन काउंसिलिंग कम्पनी के सीईओ ने की है. उनका कहना है  कि बहुत सम्भव है कि किसी स्पेशलाइज़्ड विषय में एमबीए करने वाले को किसी (जनरल)  एमबीए के अधीन काम करना पड़ जाए!


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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ उधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 04 अप्रैल, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, March 21, 2017

पुरुषों की तुलना में स्त्रियों को ज़्यादा होता है तनाव

हाल में हुई  एक  शोध से यह पता चला है कि जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं का बुरा असर   पुरुषों की बजाय स्त्रियों पर ज़्यादा पड़ता है. ब्रिटेन की फिज़ीयोलॉजिकल सोसाइटी के माध्यम से लगभग दो हज़ार वयस्कों पर करवाई गई इस शोध के माध्यम से यह जानने का प्रयास किया गया था कि जीवन में घटित होने वाली महत्वपूर्ण घटनाएं पुरुषों को अधिक प्रभावित करती हैं या महिलाओं को. हालांकि उक्त सोसाइटी ने यह शोध एक भिन्न उद्देश्य से कराई थी,  इसके निष्कर्षों को अनेक तरह से समझा जा सकता है. सोसाइटी ने यह शोध लोगों में इस बात की जागरूकता के प्रसार  के लिए कराई थी कि शरीर की कार्यप्रणाली पर   तनावों का बहुत गहरा असर पड़ता है इसलिए लोगों को यथासंभव तनावों से बचना चाहिए. सोसाइटी का मानना है कि तनाव के दौरान उनका सामना करने के लिए हमारी देह जो हॉर्मोन्स  रिलीज़ करती है वे रक्त प्रवाह में घुल मिल जाते हैं, और इसका कुप्रभाव हमारे हृदय, पाचन तंत्र और रोग निरोधक तंत्र पर पड़ता है. यही नहीं, बार-बार पैदा होने वाले और लम्बे समय तक बने रहने  वाले तनावों की वजह से दीर्घकालीन शारीरिक समस्याएं भी पैदा हो सकती हैं. यही वजह है कि फिज़ीयोलॉजिकल सोसाइटी ने एक पूरे साल के कार्यक्रम तनावों को समझने-समझने को समर्पित किये हैं और इस शृंखला  के  अंतर्गत सार्वजनिक व्याख्यान और सेमिनार आयोजित किये जाएंगे. 

जिस रिपोर्ट की हम यहां चर्चा कर रहे हैं उसे ज़ारी करते हुए फिज़ीयोलॉजिकल सोसाइटी की नीति और  संचार समिति की अध्यक्षा ने एक बहुत अर्थपूर्ण बात कही है. उनका कहना है आधुनिक विश्व अपने साथ जिस तरह के तनाव ला रहा है, पचास बरस पहले उनकी कल्पना तक नामुमकिन थी. अपनी बात को स्पष्ट करते हुए उन्होंने तनाव उपजाने और बढ़ाने वाली  दो चीज़ों के नाम लिये हैं: सोशल मीडिया और स्मार्ट फोन्स.

सोसाइटी की यह शोध 1967 में की गई बहुत विख्यात होम्स और राहे के  तनाव विषयक अध्ययन की ही अगली कड़ी है. जहां इस 1967 वाले अध्ययन में जीवन की कुल 43 महत्वपूर्ण घटनाओं के आधार पर तनाव का आकलन किया गया था, वर्तमान अध्ययन में घटनाओं की संख्या को घटाकर मात्र अठारह कर दिया गया है. यह माना गया है कि बहुत सारी घटनाएं या तो एक दूसरे में समायोजित हो जाती हैं या अब उतनी महत्वपूर्ण नहीं रह गई हैं. इस बार के अध्ययन में जिन अठारह घटनाओं को आधार बनाया गया है वे ये हैं: जीवन साथी का निधन, कारावास, बाढ़ या आग के कारण घर का नुकसान, गम्भीर बीमारी, काम से निकाल दिया जाना, दीर्घकालीन सम्बंध का टूट जाना, पहचान की चोरी, आर्थिक समस्या, नई नौकरी की शुरुआत, शादी की तैयारियां, पहले बच्चे का जन्म, आने जाने में नष्ट होने वाला समय, आतंकवादी ख़तरे, स्मार्टफोन का खो जाना,  छोटे से बड़े घर में जाना, ब्रेक्सिट, छुट्टियां मनाने जाना, अपने काम में कामयाबी या पदोन्नति.

इस अध्ययन में इन अठारह महत्वपूर्ण घटनाओं के संदर्भ में यह पड़ताल की गई है कि इनमें से किन के कारण पुरुषों को और किन के कारण स्त्रियों को ज़्यादा तनाव होता है,  और सबसे ज़्यादा चौंकाने वाली बात यही है कि सारी की सारी अठारह घटनाओं की वजह से पुरुषों की तुलना में स्त्रियों को अधिक तनाव होता है. तनाव का आकलन दस के पैमाने पर किया गया है, और उदाहरणार्थ यह पाया गया है कि जीवन साथी की मृत्य की वजह से पुरुषों को 9.13 और स्त्रियों को 9.7 तनाव होता है. इसके बाद पुरुषों और स्त्रियों में होने वाले तनाव का अंतर भी अंकों  में प्रदर्शित किया गया है. इस तालिका के अनुसार स्त्री पुरुष में सर्वाधिक यानि 1.25 का अंतर आतंकवादी खतरे के मामले में पाया गया है. पुरुष इससे 5.19 और स्त्रियां 6.44 तनाव महसूस करती हैं. इससे कुछ कम यानि 0.74 तनाव अंतर गम्भीर रोग के मामले में और उससे कुछ और कम यानि 0.71 अंतर आर्थिक मामलों अथवा बड़े घर में जाने के मामले में पाया गया है. मज़े की बात यह कि स्त्री और पुरुषों के तनावों में सबसे कम यानि 0.19 का अंतर पहली संतान के जन्म को लेकर है. एक रोचक बात यह भी है कि ज़्यादा से कम तनाव का क्रम स्त्री और पुरुष में एक-जैसा है लेकिन अलग-अलग घटनाओं में वह तनाव का अंतर घटता बढ़ता रहता है. इस अध्ययन में यह भी पाया गया कि जहां बीमारी के मामले में उम्र बढ़ने के साथ तनाव की तीव्रता बढ़ती है वहीं स्मार्टफोन्स न्स  के मामले में इसका उलट होता है, यानि इस वजह से युवा पीढ़ी अधिक तनावग्रस्त होती है. 

अंतर चाहे जितना हो, इस अध्ययन से यह तो पता चल ही गया है कि विभिन्न घटनाओं का असर पुरुषों की तुलना में स्त्रियों पर ज़्यादा होता है.  स्वाभाविक ही है कि यह बात उनके लिए एक चेतावनी भी है.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 21 मार्च, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, March 14, 2017

ऐसा पुरस्कार जिसे पाकर कोई खुश नहीं हो सकता!

पुरस्कार पाकर हर कोई खुश होता है. अपने प्रयास और काम की सराहना तथा स्वीकृति भला किसे नापसंद होगी?  लेकिन हाल में सुदूर जापान में घोषित किये गए एक पुरस्कार ने हमें यह कहने को मज़बूर कर दिया है कि हर पुरस्कार के बारे में यह बात कहना उचित नहीं है. कुछ पुरस्कार ऐसे भी हो सकते हैं जिन्हें पाकर पाने वाला सम्मानित नहीं लज्जित महसूस करता है. पिछले दिनों जापान की एक प्रमुख विज्ञापन एजेंसी देंत्सु इंकॉर्पोरेटेड के साथ ऐसा ही हुआ है. जापान के पत्रकारों और नागरिक अधिकारों के रक्षकों के एक समूह ने इस विज्ञापन एजेंसी को मोस्ट ईविल कॉर्पोरेशन ऑफ द ईयर अवार्ड से नवाज़ा है. अब भला कौन कम्पनी होगी जो यह खिताब पाकर खुश हो!

अब यह भी जान लिया जाए कि इस कम्पनी को यह खिताब क्यों दिया गया है? पुरस्कार देने वाले संगठन की चयन समिति के एक सदस्य, जापान के जाने-माने फिल्म निदेशक तोकाची सुचिया के कम्पनी  नाम भेजे संदेश से इस सवाल का आंशिक जवाब मिल जाता है. उन्होंने लिखा है: “डियर देंत्सु इंकॉर्पोरेटेड, आपकी एक नई कर्मचारी, 24 वर्षीया मात्सुरी ताकाहाशी ने 25 दिसम्बर, 2015 को आत्म हत्या कर ली. उसको 105 घण्टे ओवरटाइम करना पड़ा था,  जो बहुत ज़्यादा था. इसके अलावा वो अपने बॉस लोगों द्वारा सताए जाने से त्रस्त थी और मानसिक रूप से दबाव में भी थी.” ताकाहाशी की इस आत्महत्या से पहले इस संस्थान का एक और कर्मचारी, वह भी  24 वर्षीय ही था, 1991 में अपनी जान गंवा चुका था. इनके अलावा, सन 2013 में हुई एक तीस वर्षीय कर्मचारी की मृत्यु को भी उससे बहुत ज़्यादा काम करवाने का परिणाम माना जा रहा है.

दुनिया के विभिन्न देशों में जहां ज़्यादातर कामकाज निजी क्षेत्र में केंद्रित है, नियोक्ता अपने कर्मचारियों से ज़्यादा से ज़्यादा काम लेने की कोशिश करते हैं, और ऐसा करते हुए वे उनकी सेहत और क्षमता की भी प्राय: अनदेखी कर जाते हैं. कर्मचारी की यह विवशता होती है कि अपनी नौकरी बनाए रखने के लिए वो अपनी सेहत और जान पर खेल कर भी नियोक्ता के आदेश का बढ़ चढ़  कर पालन करे. संस्थानों के लिए कोई नया कर्मचारी नियुक्त करने की बजाय पहले से कार्यरत कर्मचारी को ओवरटाइम राशि का भुगतान कर काम लेना अधिक लाभप्रद होता है. शायद यही सोच रहा होगा जब उक्त देंत्सु कम्पनी ने मात्सुरी ताकाहाशी पर काम का इतना बोझ लाद दिया था कि वह हर रोज़ बमुश्क़िल दो घण्टे की नींद ले पाती  थी.

ज़्यादा पड़ताल करने पर यह बात भी सामने आई है कि यह कम्पनी अपने कर्मचारियों  से आग्रह करती रही है कि वे देंत्सु के दस नियमोंकी पालना करें. ये दस नियम किस तरह के होंगे यह जानने के लिए मात्र एक नियम को देख लेना पर्याप्त होगा. इस नियम में कर्मचारियों से कहा गया है कि “अपने काम को पूरा करने से पहले कभी भी, किसी  भी हाल में छोड़ें नहीं. यहां तक कि अगर आप मर जाएं तो भी उसे न छोड़ें.” स्वाभाविक ही है कि इस नियम पर लोगों की तीखी प्रतिक्रियाएं हुई हैं और मात्सुरी ताकाहाशीके परिवार जन और उनके वकीलों के अनुरोधों के बाद अब देंत्सु के प्रबंधन ने कहा है कि अब कर्मचारियों को जो निर्देश पुस्तिकाएं दी जाएंगी, उनमें से इन नियमों को हटा दिया जाएगा.

एक तरफ जहां अपने मुनाफ़े के लिए कर्मचारियों का शारीरिक और मानसिक शोषण करने वाली अनगिनत और बेहद ताकतवर कम्पनियां हैं वहीं ऐसे छोटे-छोटे संगठन भी हैं जो अपनी-अपनी तरह से इस तरह के अमानवीय शोषण के खिलाफ़ आवाज़ उठा रहे हैं. जापान में जिस संगठन ने यह पुरस्कारप्रदान किया है, वह भी कोई बहुत बड़ा संगठन नहीं है. लेकिन इसके बावज़ूद यह उसके अस्तित्व का पांचवां बरस है.  यह संगठन कुटिल और दुष्ट कम्पनियों  द्वारा अपने कर्मचारियों से लिये जाने वाले ज़्यादा काम, उनको सेक्सुअल एवम अन्य तरीकों से सताए जाने, उन्हें परेशान करने, कम तनख्वाह देने, और अस्थायी कर्मचारियों के साथ भेदभाव बरतने जैसे विभिन्न अन्यायों की पड़ताल करता  है. अपने काम और प्रयासों की जानकारी देते हुए इस संगठन के एक महत्वपूर्ण सदस्य, जो इसकी चयन समिति के भी सदस्य हैं, ने एक बेहद महत्वपूर्ण बात कही है. उनका कहना है कि “यह पुरस्कार किसी को बदनाम करने के लिए नहीं दिया जाता है. इसका मकसद तो यह चेतना पैदा करना है कि हमारे समाज में इस तरह की कम्पनियों के बने रहने का कोई औचित्य नहीं है.” वे अपने प्रयासों की अपर्याप्तता से भली भांति परिचित हैं, तभी तो कहते हैं कि “वक़्त  बीतने के साथ इन कम्पनियों के बारे में समाचारों को भी भुला  दिया जाएगा. लेकिन यह पुरस्कार देते हुए हम हरेक से यह उम्मीद करते हैं कि वो यह बात याद रखे कि ऐसी खराब कम्पनियां अभी भी मौज़ूद हैं.”

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 14 मार्च,  2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, March 7, 2017

बहुत कुछ सकारात्मक और शिक्षाप्रद भी है वीडियो गेम्स में

जब भी आज के बच्चों और किशोरों की चर्चा होती है, वह घूम फिर कर उन बहुत सारी चीज़ों के इलाके में प्रवेश कर जाती है जो इनकी मानसिकता को दूषित या विकृत कर रहे हैं. और इस इलाके में जो  नाम आते हैं उनमें बहुत महत्वपूर्ण होता है वीडियो गेम्स का नाम. अगर आप अपने घर-परिवार या जान-पहचान वालों के बच्चों और किशोरों से उनके प्रिय वीडियो गेम्स के नाम और उनकी विषय वस्तु के बारे में पड़ताल करें तो पाएंगे कि उनमें से ज़्यादातर को बंदूकों और मार-धाड़  वाले गेम्स बेहद पसंद हैं. स्वाभविक ही है कि दुनिया भर के सोचने-समझने वाले लोग यह मानते हैं कि इस तरह के वीडियो गेम्स बच्चों किशोरों और युवाओं की मानसिकता पर बहुत बुरा असर डाल रहे हैं. लेकिन इन खेलों का आकर्षण इतना प्रबल है कि इन चिंतकों और इनकी बात से सहमत अभिभावकों के सारे प्रयासों के बावज़ूद इनकी लोकप्रियता घट नहीं रही है.

लेकिन इधर एक नई बात सामने आई हैं जो चौंकाने के साथ-साथ प्रसन्न भी करती है. वीडियो खेलों के जानकारों ने बताया है कि सारे के सारे वीडियो गेम्स हिंसक और क्रूर नहीं हैं. उनमें से बहुत सारे खेल सदाचरण भी सिखाते हैं और सादगी एवम पवित्रता से परिपूर्ण ग्राम्य जीवन की तरफ भी ले जाते हैं. असल में खेलों की इस दुनिया में बहुत विविधता है और जिनके कारण इस दुनिया को बुरी निगाहों से देखा जाता है उन खेलों के अलावा अनगिनत खेल ऐसे भी मौज़ूद हैं जो आपको जीवन के सकारात्मक पक्षों की तरफ ले जाते हैं. और जैसे इतना ही पर्याप्त न हो, हिंसा प्रधान खेलों में भी ऐसे बहुत सारे खेल हैं जो हिंसा के बहाने उसके कारणों पर सोचने को मज़बूर कर अंतत: आपको हिंसा से दूर ले जाते हैं. इस तरह के खेलों को इनके विशेषज्ञ अध्येताओं ने गम्भीरया सहानुभूति परक खेलों का नाम दिया है. 

इन खेलों की तरफ पूरी दुनिया का ध्यान इस वजह से भी गया है कि हाल में संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी इनका नोटिस लिया है. यूनेस्को की एक इकाई महात्मा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ एज्यूकेशन फॉर पीस (UNESCO-MGIEP) ने हाल में टोरण्टो के एक शोधार्थी को यह दायित्व सौंपा है कि वो इस तरह के खेलों का गम्भीर और विशद अध्ययन कर एक रिपोर्ट तैयार करे. टोरण्टो के रॉयल सेण्ट जॉर्ज  कॉलेज के इस शिक्षक पॉल दरवासी का स्पष्ट मत है कि अगर ठीक से इनका प्रयोग किया जाए तो वीडियो गेम्स सम्वेदनाओं के प्रेरक बनने के मामले में फिल्म और किताबों जैसे पारम्परिक माध्यमों की तुलना में अधिक प्रभावशाली साबित हो सकते हैं. अपनी बात को और स्पष्ट करते हुए वे कहते हैं कि इन वीडियो खेलों की ख़ास बात यह है कि जब आप इन्हें खेलते हैं तो आप खुद निर्णय भी करते और उन निर्णयों के परिणामों से भी दो-चार होते हैं. और इस सबके कारण  आप स्थितियों के यथार्थ के और अधिक निकट जा पहुंचते हैं. पॉल दरवासी का मत है कि इन खेलों में भिन्न-भिन्न  नज़रिये और जीवनानुभव वाले लोगों के बीच अधिक गहरी समझ विकसित करने की अपार सम्भावनाएं छिपी हुई हैं. उन  के मत की पुष्टि ऊपर उल्लिखित इंस्टीट्यूट के डाइरेक्टर अनंता दुरैप्पा ने भी यह कहते हुए की है कि वीडियो खेल पारम्परिक कक्षा अध्यापन से अधिक प्रभावी हैं. 

इन गंभीर अथवा सहानुभूतिपरक खेलों में से बहुत सारे ऐसे हैं जो हाल की त्रासदियों या चर्चित घटनाओं जैसे ईरानी  क्रांति, बोस्नियाई युद्ध के दौरान साराजेवो के घेराव, 1994 के रवाण्डा के नरसंहार आदि पर आधारित हैं. लेकिन  इन सारे खेलों की ख़ासियत यह है कि जब आप इन्हें खेलते हैं तो आप शक्तिशाली न होकर अरक्षितता की अवस्था में होते हैं. आप जो भी कदम उठाते हैं वह खुद बंदूक उठाने जितना ही रोमांचक होता है, लेकिन इन खेलों का नियोजन कुछ इस तरह से किया गया है कि इन्हें खेलते हुए आप खबरों को नई निगाह से देखने, दूसरों के साथ बर्ताव के नए तौर–तरीकों और अपने मत का अधिक विवेक सम्मत प्रयोग करने के लिए प्रशिक्षित होते हैं.

इन सब बातों के कारण सामाजिक न्याय की शिक्षा के क्षेत्र में इस तरह के खेलों की उपादेयता से यूनेस्को इतना प्रभावित हुआ है कि खुद उसने भी अपने स्तर पर दो खेल लॉंच करने का निर्णय कर लिया है. ऐसा एक खेल  है वर्ल्ड रेस्क्यू जो बस रिलीज़ होने ही वाला है और इसमें खिलाड़ियों से चाहा गया है कि वे रोग, वनोन्मूलन और सूखे जैसी वैश्विक समस्याओं के समाधान तलाश करें. दूसरा खेल जो अब तक अनाम है, उसमें खिलाड़ियों के सामने यह चुनौती रखी जाएगी कि वे अल्प कालीन सम्पदा सृजन और दीर्घ कालीन संवहनीयता के बीच संतुलन कैसे साधें.

उम्मीद करनी चाहिए कि वीडियो गेम्स के इस सकारात्मक पहलू से हमारी दुनिया को बेहतर बनाने में कुछ मदद मिलेगी.


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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 07 मार्च, 2017 को 'बहुत कुछ शिक्षाप्रद भी है वीडियो गेम्स में' शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, February 28, 2017

जिसे आप देखते हैं वो भी आपको देख सकता है!



भारत में टेलीविज़न कार्यक्रमों के संदर्भ में प्राय: टीआरपी की चर्चा होती है. कार्यक्रम प्रसारित करने वाले चैनल और उन कार्यक्रमों के बीच अपने उत्पादों के विज्ञापन दिखाने वालों के लिए इस टीआरपी की अहमियत से हम सब भली भांति परिचित हैं. लेकिन अमरीका में बात इससे काफी आगे निकल चुकी है, और ज़ाहिर है कि आज जो वहां हो रहा है वो देर-सबेर अपने यहां भी हो ही जाएगा. वहां ऐसी बहुत सारी कम्पनियां सक्रिय हैं जो आपके टीवी देखने के तौर तरीकों का बहुत ज़्यादा बारीकी से अध्ययन करती हैं.

ऐसी ही एक कम्पनी टीविज़न है जिसने बोस्टन, शिकागो और डलास क्षेत्र में दो हज़ार घरों के करीब साढ़े सात हज़ार टीवी दर्शकों की टीवी  देखने की आदतों का सूक्ष्म अध्ययन करने के लिए इन घरों में टीवी सेट्स के ऊपर एक छोटा-सा  उपकरण रख दिया है और इस उपकरण के माध्यम से वे लोग यहां तक लक्ष्य करते हैं कि घर का कौन-सा  सदस्य किस प्रोग्राम को देखते हुए कितनी बार आपनी आंखें उस प्रोग्राम से हटाता है, कितनी बार वो अपने फोन को देखता है और कितनी बार मुस्कुराता या नाक भौं सिकोड़ता है. यह उपकरण टीवी देखने वालों की आंखों का सूक्ष्म अध्ययन  करता है. इन सारी जानकारियों के विश्लेषण से यह पता लगाया जाता है कि कौन-सा प्रोग्राम या कौन-सा कमर्शियल अधिक गहन दर्शक जुटा पा रहा है.  यानि यह जानने का प्रयास किया जाता है कि जो लोग किसी ख़ास समय में एक चैनल को ट्यून करके एक ख़ास  प्रोग्राम चला रहे हैं, वे उस प्रोग्राम  को कितनी तल्लीनता से देख रहे हैं.  कम्पनी इस प्रोग्राम में सहभागिता के लिए सहमत होने वालों को कुछ धनराशि भी प्रदान करती है. और साथ ही वह यह आश्वासन भी देती है कि भाग लेने वालों की पहचान सार्वजनिक नहीं की जाएगी. रिकॉर्ड मात्र यह होता है कि अमुक समय में टीवी देखते हुए घर क्रमांक पंद्रह के दर्शक क्रमांक एक सौ बीस  का बर्ताव यह था.

अमरीका जैसे देश में इस तरह के अध्ययनों की महत्त इसलिए और बढ़ जाती है कि एक मोटे अनुमान के अनुसार वहां कम्पनियां टीवी पर विज्ञापनों पर  हर बरस सत्तर बिलियन डॉलर की बहुत बड़ी राशि  खर्च करती है और उनके लिए यह जानना बेहद ज़रूरी होता है कि लोग उनके कमर्शियल वाकई देख भी रहे हैं या नहीं. यहीं यह भी बताता चलूं कि इस नई व्यवस्था से पहले अमरीका में यह काम करने में नील्सन कम्पनी अग्रणी मानी जाती थी जो सिर्फ़ यह पता करती थी कि किसी प्रोग्राम को कितने लोग देख रहे हैं. यह कम्पनी अपने 42,500 परिवारों से प्राप्त जो आंकड़े जुटाती थी उनके आधार पर अमरीकी कम्पनियां यह तै करती रही हैं कि वे अपने विज्ञापन का बजट कहां-कहां खर्च करें. लेकिन अब क्योंकि दुनिया बहुत जटिल होती जा रही है दर्शकों की रुचियों के अध्ययन  के तौर तरीके भी बदल रहे हैं. एक तो यही बात कि आज का दर्शक एक ही समय में अनेक काम (मल्टीटास्किंग) करता रहता है.  

टीविज़न की ही तरह एक और कम्पनी है सिम्फ़नी एडवांस्ड मीडिया जिसने अमरीका के साढे- सत्रह हज़ार लोगों के एण्ड्रॉयड मोबाइल  फोनों पर एक एप स्थापित किया है, जो यह रिकॉर्ड  करेगा कि वे अपने फोन पर क्या-क्या देखते हैं. इतना ही नहीं, इस एप में यह भी अंकित किया जाएगा कि सम्बद्ध व्यक्ति जो देख रहा है वह कहां पर, मसलन घर पर, बस में या किसी बार में, देख रहा है. कम्पनी इसके लिए हर माह पांच से बारह डॉलर तक उस व्यक्ति को देगी. इसी तरह एक और कम्पनी है रियलिटी माइन जिसने पांच हज़ार लोगों लगभग नब्बे डॉलर प्रति वर्ष देकर उनके इण्टरनेट कनेक्शन की जासूसी करने की अनुमति हासिल की है.

इन सारी कोशिशों का मकसद यह जानना है कि आज का उपभोक्ता अपने मीडिया को किस तरह बरत रहा है. कहना अनावश्यक है कि इस तरह प्राप्त की गई जानकारी का प्रयोग कार्यक्रमों को बेहतर बनाने और विज्ञापनों की पहुंच तथा प्रभाव को को और प्रभावशाली बनाने के लिए किया जाना है. लेकिन इस पूरे किस्से का एक और पहलू है जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता और वह है उपभोक्ता की निजता के हनन का. कहा जा सकता है कि जो किया जा रहा है वह उपभोक्ता की अनुमति और  सहमति से किया जा रहा है, लेकिन ज़िंदगी के और क्षेत्रों की तरह ही यहां भी काफी  कुछ ऐसा हो रहा है जो अनुचित है. हाल में यह बात भी सामने आई है कि अमरीका की ही इंटरनेट से जुड़े टीवी प्रसारण वाली सबसे बड़ी कम्पनी ने इस आरोप से मुक्ति  पाने के लिए कि वो  लाखों स्मार्ट टीवी उपभोक्ता के टीवी देखने के  आंकड़े बग़ैर उनकी इजाज़त और जानकारी के इकट्ठा करती और बेचती रही है सवा दो मिलियन डॉलर देने की पेशकश की है.
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 28 फरवरी, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. ,

Tuesday, February 21, 2017

उसने जान लिया है कि जीवन में धन ही सब कुछ नहीं है

सामान्यत: हम सोचते हैं कि अगर हमें खूब सारा  धन मिल जाए तो हमारे  सारे कष्ट दूर और सारे सपने साकार हो जाएंगे. निश्चय ही ब्रिटेन  की सुश्री जेन पार्क ने भी सन 2013 में अपनी ज़िंदगी का पहला लॉटरी टिकिट खरीदते वक़्त ऐसा ही सोचा होगा. लेकिन देश  की सबसे कम उम्र यूरोमिलियन्स विजेता बनने के बाद महज़ तीन-चार बरसों में उनकी सोच इतनी बदल चुकी है कि अब तो वे उस लॉटरी कम्पनी पर कानूनी  कार्यवाही तक करने के बारे में सोच रही हैं जिसने उन्हें रातों रात इतना अमीर बना दिया. जेन पार्क को इस लॉटरी में एक लाख मिलियन पाउण्ड यानि भारतीय मुद्रा में  क़रीब साढ़े आठ करोड़ रुपये मिले थे. स्वभावत: इन पैसों से उन्होंने प्रॉपर्टी खरीदी, अपनी खूबसूरती बढ़ाने पर खासा खर्चा किया, एक महंगी गाड़ी खरीदी और जमकर सैर सपाटा किया. कल तक जो चैरिटी वर्कर थी, वह अपने आप को डेवलपर कहने लगीं. उनके जीवन में भौतिक साधनों की इफ़रात हो गई. लोग उन्हें देखते तो ठण्डी आहें भरते और कहते कि काश! हमारे पास भी उतना पैसा हो जितना इस लड़की के पास है. लेकिन खुद जेन पार्क बहुत जल्दी इस वैभव से इतनी त्रस्त हो गईं कि उन्हें लगने लगा कि भले ही  उनके पास भौतिक साधनों की भरमार हो, उनका जीवन तो एकदम रिक्त है. इस वैभव से दुखी होकर वे तो यहां तक कह बैठीं कि “मेरा खयाल था कि यह राशि मिल जाने से मेरी ज़िंदगी दस गुना बेहतर हो जाएगी, लेकिन हक़ीक़त यह है कि यह दस गुना बदतर हो गई है. कितना अच्छा होता कि मैंने यह लॉटरी जीती ही ना होती और मेरी जेब एकदम खाली होती!”

जेन ने जब यह लॉटरी जीती तब उनकी उम्र सत्रह बरस थी. अब इक्कीस बरस की हो चुकने और ऐसी अमीरी से उपजे खूब सारे तनाव झेल चुकने के बाद उन्हें लगता है कि ब्रिटेन में लॉटरी का टिकिट खरीदने के लिए न्यूनतम उम्र सोलह बरस है और यह बहुत कम है. इसे कम से कम अठारह बरस तो होना ही चाहिए. लेकिन यह  निर्णय तो वहां की संसद करती है. जेन पार्क ने सन 2015 में अपने बॉय फ्रैण्ड मार्क स्केल्स को स्नेककहते हुए त्याग दिया. वजह यह रही कि उनके दोस्तों ने उन्हें बताया कि उसकी एकमात्र दिलचस्पी उनकी सम्पत्ति में थी. इसके बाद वे अपने एक और बॉय फ्रैण्ड कॉनोर जॉर्ज से भी अलग हो गईं. यह किस्सा खासा मनोरंजक किंतु त्रासद भी है. जब जॉर्ज इबिज़ा में किशोरों के एक हॉलिडे पर जाने लगा तो जेन ने उसे हिदायतों  की एक सूची थमाई जिसके अनुसार उसे हॉलिडे में किसी भी लड़की से बात नहीं करनी थी और उस द्वीप पर छुट्टियां मनाते हुए हर वक़्त जेन का डिज़ाइन किया हुआ वो टी शर्ट पहने रहना था जिस पर इस कन्या की तस्वीर बनी हुई थी. समझा जा सकता है कि ये बातें जेन के असुरक्षा  बोध की परिचायक थीं. अलगाव तो होना ही था.  उसके बाद से वे ऐसे बॉय फ्रैण्ड की तलाश में  ही हैं जिसकी दिलचस्पी उनके वैभव में न हो. डिज़ाइनर वस्तुओं को खरीदते-खरीदते वे ऊब चुकी हैं और अमरीका और  मालदीव जैसी चमक-दमक भरी जगहों और बेहद महंगे रिसोर्ट्स  में छुट्टियां बिताने से अब वे इतनी तंग आ चुकी हैं कि साधारण और सस्ती जगहों पर छुट्टियां मनाने के लिए तरसने लगी  हैं.

इस सारे किस्से का एक किरदार वो लॉटरी कम्पनी भी है जिसने जेन पार्क के जीवन में इतनी उथल-पुथल पैदा की है. इस प्रसंग में केमलोट समूह नामक इस लॉटरी कम्पनी के एक प्रतिनिधि का बयान भी ध्यान  देने योग्य है. अपनी सफाई पेश करते हुए उन्होंने कहा है कि सुश्री जेन पार्क के इनाम जीतने के फौरन बाद कम्पनी ने एक स्वतंत्र वित्तीय और विधिक पैनल का गठन किया और जेन का सम्पर्क उन्हीं के आयु वर्ग के अन्य इनाम विजेताओं से करवाने और पारस्परिक अनुभवों के आदान-प्रदान का प्रबंध किया. कम्पनी की तरफ़ से यह भी बताया गया कि जेन के विजेता बनने के बाद से कम्पनी लगातार उनसे सम्पर्क बनाए हुए है और उन्हें अपना संबल प्रदान करने के लिए तत्पर है. लेकिन इस बात का फैसला तो अंतत: विजेता को ही करना होता है कि उन्हें कोई सहयोग लेना है या नहीं लेना है. बावज़ूद इस बात के कम्पनी उन्हें सहयोग देने को सदैव प्रस्तुत रहेगी. लॉटरी के औचित्य अनौचित्य पर तमाम  बातों से हटकर कम्पनी के इस सोच की तो प्रशंसा की ही जानी चाहिए.

सुश्री जेन पार्क का यह वृत्तांत  उन लोगों के लिए आंखें खोल देने वाला हो सकता है जो मान बैठे हैं कि जीवन की सारी समस्याओं का एकमात्र हल पैसा है.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर  अंतर्गत मंगलवार, 21 फरवरी, 2017 को  प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, February 14, 2017

बहुत सारे विकल्प मौज़ूद हैं वैलेण्टाइन डे के

मनुष्य का स्वभाव भी क्या शै है! अपनी नापसंदगी का इज़हार करने के लिए भी यह कैसे-कैसे तरीके इज़ाद कर लेता है! अब देखिये ना, अगर एक पड़ोसी देश अपनी हरकतों की वजह से हमें नापसंद है तो हम किसी पर अपना गुस्सा निकालने के लिए कह देते हैं कि तुम वहां चले जाओ, या हम तुम्हें वहां भेज देंगे. इस अभिव्यक्ति में अज़ीब बात यह है कि सामान्यत: विदेश जाकर लोग खुश होते हैं, और अगर कोई और उन्हें भेज रहा हो तो कहना ही क्या! लेकिन विदेश यात्रा का यह प्रस्ताव एक अलग ही धुन सुनाता है. यह बात मुझे इससे मिलते-जुलते एक संदर्भ में अनायास याद आ  गई. आज वैलेण्टाइन डे है. यानि प्रेम का दिन. हमारे उत्सवों की सूची में हाल में जुड़ा एक नाम. भले ही देश के अधिसंख्य युवाओं का यह सर्वाधिक लाड़ला उत्सव हो, बहुत हैं जो इस दिन का नाम आते ही व्यथित, कुपित, आक्रोशित वगैरह हो जाते हैं. उन्हें लगता है कि यह उत्सव नहीं, पश्चिम से आया एक ख़तरनाक वायरस है. बहुतों को यह बाज़ार की नागवार हरकत लगता है. बहुतों को लगता है कि इस विदेशी बीमारी ने हमारी युवा पीढ़ी को पथभ्रष्ट कर दिया है. आदि-आदि. अगर आप भी इन बहुतों में से एक हैं, तो आगे की बातें विशेष रूप से आपको ही सम्बोधित हैं. और अगर आप इन बहुतों में से एक नहीं हैं, तो भी कोई बात नहीं. अपना सामान्य ज्ञान बढ़ा लेने में भी कोई हर्ज़  नहीं है.

यह जो 14 फरवरी का दिन है, इसे दुनिया के बहुत सारे देशों में अलग-अलग नामों से मनाया जाता है. अंकल सैम के देश यानि अमरीका में यह  दिन सिंगल्स अवेयरनेस डे के रूप में मनाया जाता है. इस दिन के आद्याक्षरों को जोड़ने से बनता है अंग्रेज़ी शब्द सैड, और अगर आप भी वैलेण्टाइन डे को नापसंद करने वालों में से हैं तो स्वाभाविक ही है कि आपको इस दिन का सैड होना बहुत अच्छा लगेगा. अमरीका में इस दिन अकेले लोग अपने अकेलेपन का उत्सव मनाते हैं और सोशल  मीडिया पर अपने जैसों को शुभ कामनाएं देते हैं या उनका हौंसला बढ़ाते हैं. अगर अमरीकियों की यह सात्विक नापसंदगी आपको अपर्याप्त लगे तो ज़रा कोरिया के बारे में जान लीजिए. वहां यह दिन ब्लैक डे यानि स्याह दिवस के रूप में मनाया जाता है. वजह वही है, यानि अकेलापन. इस दिन वहां के साथी विहीन लोग रेस्तराओं में एकत्रित होते हैं और अपना तमाम रंज-ओ-ग़म एक ख़ास किस्म की सस्ती लेकिन स्वादिष्ट  चीनी-कोरियाई डिश में डुबो देते हैं. इस डिश में  ब्लैक बीन की सॉस में नूडल्स परोसे जाते हैं, जिन पर पोर्क और सब्ज़ियां सजी होती हैं. काले रंग की सॉस वाले नूडल्स के चटकारे लेकर ग़म ग़लत करने का यह उत्सव कोरिया में पिछले दस बरसों में काफी लोकप्रिय हुआ है. अमरीका और कोरिया की ही तरह चीन में भी एक दिन सिंगल्स डे के रूप में मनाया जाता है. हालांकि वहां यह सिंगल्स डे ग्यारह नवम्बर को मनाया जाता है, मैं यहां इसका ज़िक्र इसलिए करना उचित समझ रहा हूं कि वहां नब्बे के दशक में यह दिन वैलेण्टाइन डे के प्रति विरोध स्वरूप मनाया जाने लगा था. मज़ेदार बात यह कि चीन में इस दिन एकल जन अपने लिए खरीददारी करते हैं. इस दिन उनकी सक्रियता का आलम यह है कि सन 2013 में चीन की सबसे बड़ी ऑनलाइन शॉपिंग कम्पनी ने अकेले इस दिन पौने छह बिलियन अमरीकी डॉलर बटोरे. इस राशि की विशालता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि यह सारे अमरीकी खुदरा व्यापारियों की एक दिन की कमाई की  ढाई गुना है.

लेकिन ऐसा भी नहीं है कि सारी दुनिया तैयब अली (यानि प्यार की दुश्मन) है! फिनलैण्ड ने इस दिन को फ्रैण्डशिप डे का नाम देकर  एक सात्विक रंगत प्रदान कर दी है, हालांकि वहां भी इसे दोस्तों और प्रेमियों के दिन के रूप में ही मनाया जाता है. लेकिन इन सबसे अलहदा और दिलचस्प है चार महाद्वीपों के  करीब चालीस देशों में सन 2003 से मनाया जा रहा क्वर्कीअलोन डे. इस दिन को मनाने के विचार का मूल है साशा कागन की किताब क्वर्कीअलोन: मेनिफेस्टो फॉर अनकम्प्रोमाइज़िंग रोमाण्टिक्स.  इस दिन को मनाने वालों का यह स्पष्ट दावा है कि उनकी अवधारणा वैलेण्टाइन डे के विरोध में नहीं है. वे तो बस रोमांस, दोस्ती और स्वतंत्र भाव का उत्सव मनाना चाहते हैं. वे हर तरह के प्रेम का समर्थन करते हैं, चाहे वह रोमाण्टिक हो, प्लैटोनिक हो, पारिवारिक हो, या अपने आप से हो. उनकी असहमति वैलेण्टाइन डे के बाज़ारीकरण से है और वे चाहते हैं  कि लोग खुलकर खुशियां मनायें, भले ही वे अकेले  हों. अब, यह तो एक ऐसा विचार है जिससे शायद ही किसी को कोई असहमति हो!
तो आप भी सोच लीजिए, कि आज आपको कौन-सा डे मनाना है?

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में पेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 14 फरवरी,  2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.