Tuesday, April 21, 2015

सुन्दर होने के फायदे और नुकसान

पिछले दिनों हमारे देश के नेताओं की ज़बान फिसलने के जो बहुत सारे मामले सामने आए उनमें से कई का सम्बन्ध रंग और रूप से भी था. हमारे देश में सामान्यत: गोरे रंग को सौन्दर्य  का  एक ज़रूरी घटक मान लिया जाता है, हालांकि दुनिया के और देशों में इसका उलट भी है. पश्चिमी देशों में जहां गोरा रंग आम है, सौन्दर्य में वृद्धि के लिए सूरज की तेज़ धूप की मदद से टैनिंग कर त्वचा को ताम्बई बना कर सुन्दरता की तरफ क़दम बढ़ाये जाते हैं. यही बात शरीर के दुबले और मोटे होने को लेकर भी है. दुनिया में अगर कहीं खाया पीया होना सुन्दरता का पर्याय माना जाता है और दुनिया के और बहुत सारे देशों के अनुकरण पर पिछले दिनों हमारे देश में भी साइज़ ज़ीरो के प्रति गहरे आकर्षण के भी हम सब गवाह रहे हैं.

सुन्दरता के घटक चाहे जो हों, इतना तै है कि आपका सौन्दर्य आपको बिना मांगे ही बहुत सारे फ़ायदे सुलभ करा देता है. अमरीका की उत्तर कैरोलिना विश्वविद्यालय की दो समाज मनोवैज्ञानिकों लिसा स्लैटरी वॉकर और टोन्या फ्रेवर्ट ने हाल ही में एक अध्ययन कर यह जाना कि व्यक्ति की सुन्दरता उसे बहुत सारे फायदे स्वत: दिला देती है. आप जिनके सम्पर्क में आते हैं वे अनजाने में ही यह मान लेते हैं कि अगर आप सुन्दर हैं तो आपमें कुछ अतिरिक्त प्रतिभा भी होगी ही.  इसे हमारे देश में प्रचलित सत्यं शिवम सुन्दरम  उक्ति के साथ भी मिलाकर देखा जा सकता है. वॉकर और फ्रेवर्ट ने अपने अध्ययन में पाया कि शिक्षण संस्थाओं में भी विद्यार्थियों  की सुन्दरता  उनके शिक्षकों पर सकारात्मक प्रभाव डालती है और अपने विद्यार्थियों का मूल्यांकन करते हुए वे सुदर्शन विद्यार्थियों के प्रति अधिक उदार रहते हैं.

और जब ये विद्यार्थी शिक्षण संस्थाओं से निकल कर रोज़गार के क्षेत्र में जाते हैं तो उनकी खूबसूरती वहां भी उनके लिए फायदेमन्द साबित होती है.  अधिक आकर्षक लोग कॉर्पोरेट जगत की सीढ़ियां ज़्यादा तेज़ी  से चढ़ते हैं और अधिक पैसा कमाते हैं. अमरीका में एमबीए स्नातकों पर किए गए एक अध्ययन से ज्ञात हुआ कि एक ही समूह में कम और ज़्यादा आकर्षक कार्मिकों के वेतन आदि में दस से पन्द्रह प्रतिशत का फर्क़ था, और इस तरह अधिक आकर्षक कार्मिक अपने पूरे सेवा काल में करीब डेढ करोड़ रुपये ज़्यादा कमाता है.

ज़्यादा और कम सुन्दर के बीच यह भेदभाव और भी बहुत सारी जगहों पर पाया गया. मसलन अदालतों में भी पाया गया कि सुन्दर व्यक्ति को अपेक्षाकृत  मुलायम दण्ड मिला और अगर वकील सुदर्शन था तो वह न्यायालय से अधिक अनुकूल फैसले  करवाने में कामयाब रहा. इन उदाहरणों से, जिनकी पुष्टि हमारे अपने अनुभवों से भी होती है यह माना जा सकता है कि अगर जीवन की अन्य बातें, मसलन आपकी अकादमिक योग्यता आदि समान हो तो आपके व्यक्तित्व का सौन्दर्य आपको कुछ अतिरिक्त फायदे पहुंचाने में सफल रहता है.

लेकिन इस तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है, जिसकी तरफ  सामन्यत: किसी का ध्यान नहीं जाता है. वॉकर और फ्रेवर्ट का अध्ययन ऐसे भी कुछ प्रकरण सामने लाता है जहां सुन्दरता फायदे की बजाय नुकसान का सौदा साबित होती है. इन प्रकरणों में कुछ में लिंग भेद है और कुछ सबके लिए एक जैसे हैं. ये मनोवैज्ञानिक बताती हैं कि कई बार जब किसी उच्च पद के लिए अधिकारी का चयन किया जाना होता है तो  अधिक सुन्दर प्रत्याशी को यह सोचकर छोड़ दिया जाता है कि वो शायद कठोर निर्णय ले पाने में कम सक्षम साबित हो. एक बहुत मनोरंजक बात इस अध्ययन में यह भी सामने आई कि जब चनयकर्ता और प्रत्याशी समान लिंग वाले यानि स्त्री-स्त्री या पुरुष-पुरुष होते हैं तो वहां चयनकर्ता का ईर्ष्या भाव अधिक आकर्षक प्रत्याशी के प्रतिकूल चला  जाता है. हमारे  यहां भी तो बाबा तुलसीदास कुछ ऐसी ही बात कह गए हैं कि मोहे न नारी नारी के रूपा. पश्चिम की एक ऑनलाइन डेटिंग साइट ओके क्यूपिड का अनुभव भी कुछ-कुछ इसी तर्ज़ पर है. इस साइट ने पाया कि जिन लोगों के प्रोफाइल पिक्चर्स एकदम बेदाग थे उनकी तुलना में उन्हें डेटिंग पार्टनर ज़्यादा आसानी से मिले जिनकी पिक्चर्स ऐसी बेदाग नहीं थी. बताया गया गया कि प्रत्याशियों की एकदम मुकम्मिल छवि से दूसरा पक्ष आतंकित हो जाता है और पहल करने में सकुचाने लगता है. 
इस अध्ययन की  सबसे मज़ेदार किंतु त्रासद बात तो यह है कि ज़्यादा सुन्दर लोगों को  इसलिए कम उम्दा चिकित्सा सुविधा मिल पाती है कि चिकित्सकगण भी उनके रोग को कम गम्भीरता से लेते हैं. शायद वे सुन्दरता को स्वास्थ्य का पर्याय मान बैठते हैं. इस तरह जब सुन्दरता के फायदे और नुकसान दोनों हमारे सामने हैं तो बहुत स्वाभाविक है कि हम यह सोचें कि हमें मदद किससे मिलती है सुन्दरता से, या उसके अभाव से? लेकिन यह सोचने से पहले यह भी तो जानना होगा कि सुन्दरता क्या है!

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 21 अप्रेल 2015 को सुन्दर हैं तो जितने फायदे उतने नुकसान शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, April 14, 2015

समाज की दीवारों से टकराता सोशल मीडिया

समाज और इसके मीडिया यानी सोशल मीडिया में इन दिनों एक और  उफान आया हुआ है। हालांकि यह उफान अभी सोशल मीडिया की दीवारों से टकरा कर अपने जोर की आजमाइश ही कर रहा है, पर नई पीढ़ी की मानसिकता के बदलाव की तेज़ गति को देखते हुए लगता नहीं कि यह उफान उन दीवारों को तोड़ कर वास्तविक सोशल लाइफ तक पहुंचने में बहुत देर लगाएगा। दरअसल यह उफान बहुत सारे मुद्दों से बन कर अपनी गति पकड़ रहा है। अगर आप यह अनुमान लगा रहे हैं कि इन में पहला मुद्दा माई चॉइस वीडियो के जरिए दिए जा रहे संदेश का है, तो आपका अनुमान सही है। यह संदेश कई मायनों में आजादी की बात कर रहा है। वैसे हमारे समाज के कुछ विद्रोही लोग अर्से से इस आजादी का उपभोग करते और इसे सम्मान देते रहे हैं। देह को आधार बना कर बनाए गए इस वीडियो पर मिली-जुली  प्रतिक्रियाएं आई हैं, पर एक तथ्य यह भी है कि आधुनिकतम समाज का तमगा हासिल किए पश्चिम में भी अभी विवाहेतर संबधों को स्वीकृति का सम्मान नहीं दिया गया है। 


माई चॉइस को फाइनली माई चॉइस ही रहने दिया जाए तो बेहतर है। इसके बाद एक और मुद्दा है जिसे संसार भर की आधी आबादी  अपनी आधी उम्र तक झेलती है और जिसके बारे में लगभग सभी वयस्कों को पता होता है पर सार्वजनिक रूप से जिसकी चर्चा करना लगभग शर्मिंदगी वाला मामला माना जाता है। यह मुद्दा भी आजकल सोशल मीडिया की दीवारों से टकरा रहा है। महिलाओं के ‘उन दिनों’ का। हालांकि फेसबुक पर पिछले काफी समय से इस दौरान महिलाओं को होने वाली तकलीफों  और इसके प्रति सामाजिक नजरिए को कई महिलाओं ने अपनी कविताओं और अन्य पोस्ट्स के माध्यम से उठाया है। पर हाल ही में भारतीय मूल की एक कनाडाई लेखिका रूपी कौर  ने इस अनुभव से संबंधित एक फोटो इन्स्टाग्राम पर शेयर किया  लेकिन  इस साइट ने इस फोटो को  पॉलिसी विरुद्ध बता कर दो बार हटा दिया। इस पर रुपी कौर ने बहुत जायज सवाल उठाया कि आखिर इसमें शर्मिन्दगी की क्या बात है? और अंतत: साइट को भी रूपी कौर से क्षमा याचना करने और इस फोटो को फिर से स्वीकृति देने को विवश  होना पड़ा.


और इन बातों के बाद एक समाचार जिसने बरबस ही हमारे चेहरों पर एक मुस्कुराहट ला  दी। दरअसल समाचार ही कुछ ऐसा था कि यादों के कोठार से काफी कुछ निकल पड़ा। बात सत्तर के दशक के मध्य की है जब मैं नया-नया प्राध्यापक बन कर राज्य के एक मझोले कस्बे में पहुंचा था और अपने एक वरिष्ठ साथी की मेज़बानी का लुत्फ ले रहा था। एक दिन हम दोनों बाज़ार गए तो उन्होंने अन्य सारी खरीददारी कर चुकने के बाद उस दुकानदार से रहस्यपूर्ण अन्दाज़ में ‘चीज़’  भी देने का अनुरोध किया। सामान लेकर लौटते हुए मैंने अपनी बेवक़ूफी में उनसे पूछ लिया कि ‘चीज़’  जैसी चीज़ को उन्होंने इस तरह रहस्य भरे अन्दाज़ में क्यों मांगा? और तब उन्होंने घुमा फिराकर मुझे बताया कि चीज़ शब्द का प्रयोग असल में उन्होंने किस वस्तु के लिये किया था। उसके कुछ बरस बाद भी, जब सरकार की ‘हम दो हमारे दो’ नीति के उत्साहपूर्ण क्रियान्वयन के तहत विभिन्न सरकारी विभागों में वह चीज़ निशुल्क वितरण के लिए उपलब्ध कराई जाती थी तो हम अपने कॉलेज के बाबू से बिना संज्ञा का प्रयोग किए, सर्वनाम या संकेत की मदद से वह चीज़ मांगा करते थे। हममें से शायद ही कभी किसी ने नाम लेकर कहा हो कि मुझे यह चाहिये। अब इसे आप संस्कार कहें, संकोच कहें, शालीनता कहें, गोपनीयता कहें या और कुछ भी कहें. वस्तु स्थिति यही थी।


अब तक तो आप समझ ही गए  होंगे कि मैं किस ‘चीज़’  की बात कर रहा हूं। और यह प्रसंग मुझे याद आया इस बात से कि सरकार ने सरकारी उपक्रम से बन कर बिक रहे कंडोम की पैकेजिंग को सुधारने का निर्णय लिया है। वह भी उस दौर में जब उनके प्रतिद्वंद्वी पैकेजिंग और विज्ञापन में उससे कई गुना आगे निकल चुके हैं।  बहरहाल उदारीकरण से पहले के सरकारी सक्रियता के दौर में भी भारत की जनसंख्या को थामे रखने वाले उस ब्रांड को बचाने के लिए भी यदि अब सरकार कुछ करती है तो उसके लिए हमारी तो शुभकामनाएं ही हैं। पर क्या एक सरकारी उत्पाद विज्ञापन और पैकेजिंग के मामले में अपने व्यावसायिक प्रतिद्वन्दियों को टक्कर दे सकेगा?  मर्यादा के बन्धन आड़े नहीं आएंगे? लेकिन आप भी सोचिये कि  जिस देश में कामसूत्र लिखा गया, जहां खजुराहो तराशा गया और इन सबसे ऊपर जहां काम को भी उतना ही महत्वपूर्ण माना गया जितना धर्म, अर्थ और मोक्ष को माना गया, क्या वहां ऐसी कोई मज़बूरी होनी चाहिए
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़  टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, दिनांक 14 अप्रेल, 2015 को प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.  

Tuesday, March 24, 2015

हमारे परिवेश की देन है नकल

बिहार में मैट्रिक की परीक्षा में अपने परिजनों को नकल करवाने के लिए दीवार पर चढ़े अभिभावकों और शुभ चिंतकों की तस्वीर इण्टरनेट पर और अन्य समाचार माध्यमों में आने के बाद एक बार फिर से परीक्षाओं में नकल को लेकर गम्भीर चर्चाएं शुरु हो गई हैं. बात किसी एक राज्य की या अन्य राज्यों की तुलना में उसके बदतर होने या न होने की नहीं है. शिक्षा से जुड़े लोग इस बात  से भली भांति अवगत हैं कि आम तौर पर जो शिक्षा एवम परीक्षा प्रणाली हमारे यहां प्रचलन में है  उसमें नकल को रोक पाना लगभग असम्भव है. हर परीक्षार्थी नकल नहीं करता है और हर जगह नकल करने वालों की संख्या भी समान नहीं होती है, लेकिन अगर कोई यह कहता है कि सिर्फ अमुक जगह ही नकल होती है तो स्पष्ट ही वह उस जगह विशेष के साथ अन्याय कर रहा है.
अपने लगभग साढ़े तीन दशकों लम्बे अध्यापन काल में मैंने नकल के अनेक रूप देखे हैं. कुछ विद्यार्थी नकल के लिए अपने कौशल का, छल का इस्तेमाल करते हैं तो कुछ बाहु बल का. और ऐसा भी नहीं है कि सारा दोष विद्यार्थियों का ही है. बहुत बार शिक्षक या संस्था प्रमुख, और विशेष रूप से निजी संस्थाओं वाले अपने विद्यार्थियों को नकल करने की सुविधा उपलब्ध करते हैं या नकल करने में उनकी सहायता करते हैं. हम सब अंतत: एक ही समाज और एक ही परिवेश की उपज हैं इसलिए इसे बहुत अस्वाभाविक भी नहीं माना जाना चाहिए. जब कोई रिश्वत लेकर या देकर काम करवा सकता है तो भला उसे नकल से क्यों गुरेज़ होगा?

यह लिखते हुए मुझे एक प्रसंग याद आ रहा है. मैं एक कॉलेज का प्राचार्य था और इसलिए स्वभावत:  अपने कॉलेज के परीक्षा केन्द्र का अधीक्षक भी था. सरकार ने नकल रोकने के लिए जो बहुत सारे कदम उठाये थे उनमें से एक यह भी था कि जो भी परीक्षार्थी नकल करते हुए पकड़ा जाए उसके खिलाफ पुलिस में एफ आई आर भी अनिवार्यत: दर्ज़ करवाई जाए. इस वजह से स्थानीय पुलिस प्रशासन से कई कई दफा सम्पर्क भी होता रहता था. एक दिन स्थानीय पुलिस के एक अधिकारी जी का फोन आया और उनके स्वर में जो अतिरिक्त मिठास थी, उसने मुझे अनायास ही चौकन्ना कर दिया. पहले तो वे इधर उधर की बातें करते रहे, फिर बड़े सहज भाव से बोले कि उनका साला भी मेरे केन्द्र से परीक्षा दे रहा है और उसकी परीक्षा अभी शुरु होने ही वाली है. मैंने अपनी मासूमियत को बरक़रार रखते हुए साले साहब  के लिए उन्हें बेस्ट ऑफ लक कहा, और बात को दूसरी तरफ मोड़ना  चाहा, लेकिन वे वहीं रुके रहे, और फिर बोले कि मैं उसका ध्यान रखूं. अब मैं समझ गया था कि वे क्या चाहते थे! लेकिन उस वक़्त  नासमझ बना रहना ही सुविधाजनक था, इसलिए मैंने उनसे कहा कि वे आश्वस्त रहें, हमारे यहां उसे कोई असुविधा नहीं होगी. सारे कमरों में पंखे हैं, और पानी भी ठण्डा ही पिलाया जाता है. अब उन्हें भी सीधे ही अपनी बात कहना ज़रूरी लगा, सो बोले: “नहीं सर, वो ऐसा है कि इस साल वो ठीक से पढ़ाई नहीं कर सका है, इसलिए आप उसका ज़रा ध्यान रख लें तो.....”  बात बिल्कुल साफ थी. अब मैं भी कुछ मज़े लेने के मूड में आ चुका था. तुरंत बोला, “अरे हां, मुझे भी एक काम याद आ गया है.”  पुलिस अधिकारी जी तो ऑब्लाइज़ करने के लिये जैसे तैयार ही बैठे थे. “‘सर हुक्म कीजिए”. “वो ऐसा है कि मेरा  भी एक साला है. ज़्यादा पढ़ लिख नहीं सका, और घर की आर्थिक स्थिति भी ठीक नहीं है. अगर आप आज रात उसे कहीं सेंध लगा लेने दें तो...”  और मैं अपना  वाक्य पूरा करता उससे पहले ही उन्होंने फोन काट दिया. मेरा मकसद तो पूरा हो ही गया था.

और नकल की बात करते हुए मुझे अपने स्कूली जीवन के एक सहपाठी  की और याद आ रही है. बहुत ही कुशल नकलची था वो. तेज़ से तेज़ वीक्षक की आंखों में धूल झोंककर नकल कर लेने में माहिर. लेकिन फिर भी नकल का कोई लाभ उसके परिणाम में देखने को नहीं मिलता. आखिर हमने अपने एक शिक्षक से इस बात का राज़ पूछ ही लिया. उन्होंने बताया कि वह बन्दा अपने आगे-पीछे वाले किसी अन्य परीक्षार्थी से पूछता कि किताब में कहां से कहां तक टीपना है और फिर यथावत कॉपी में उतार डालता. परिणाम यह कि ‘बच्चों, तुम पिछले अध्याय में पढ़ चुके हो’ और ‘देखो चित्र संख्या  7’ जैसे वाक्य भी उसकी उत्तर पुस्तिका में पाए जाते. अब ऐसे अतुलनीय विद्यार्थी को तो कोई असाधारण परीक्षक ही पुरस्कृत कर सकता था.

तो अनंत है यह नकल पुराण. मुझे तो इसका समाधान परीक्षा प्रणाली में बदलाव में ही नज़र आता है, और उसकी फिलहाल कोई सम्भावना नज़र नहीं आती.


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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत  मंगलवार, 24 मार्च, 2015 को 'नकल करवानी है तो लगवाने दो सेंध' शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.      

Tuesday, March 17, 2015

दही बड़ा, कटोरी और पार्किंग

इधर  लगातार तीन शादियों में, मतलब शादी की दावतों में, जाने का मौका मिला और तीनों जगह एक जैसे अनुभव हुए. उन अनुभवों के बारे में मैं इस कॉलम में नहीं लिखता, अगर एक और अनुभव ने मुझे यह बात कह डालने को विवश न कर दिया होता. पहले शादी की दावतों का अनुभव. अपनी प्लेट में सलाद सब्ज़ियां वगैरह लेकर जब दही बड़े के काउण्टर तक पहुंचा तो इधर उधर नज़र दौड़ाई कि कहीं कटोरियां रखी हुई मिल जाएं. जब मुझे नज़र न आई तो वहां खड़े बैरे से पूछा, और उसने जवाब दिया कि कटोरियां दाल की काउण्टर पर है, सब लोग वहां से ला रहे हैं. अगर चाहूं तो मैं भी वहां जाकर ले आऊं. और ठीक यही अनुभव जब बाद की दो दावतों में भी हुआ तो मैं सोचने को मज़बूर हुआ कि आखिर केटरर्स को यह बात समझ में क्यों नहीं आती कि जहां दही बड़े रखे हैं वहीं उनके लिए कटोरियां भी रख दी जाएं! आखिर दही बड़ा तो कोई प्लेट में रखकर खाएगा नहीं.

और इस बात की तरफ मेरा ज़्यादा ध्यान जिस अनुभव से गया, वह यह है. इधर तीन दिन में दो बार जयपुर हवाई अड्डे पर जाने का अवसर आया. जिन्हें नहीं मालूम है उनकी जानकारी के लिए यह बात बताता चलूं कि जयपुर हवाई अड्डे पर निजी वाहनों के लिए एक ख़ास व्यवस्था है. जैसे ही आप हवाई अड्डा परिसर में प्रवेश करते हैं आपको एक पार्किंग टिकिट दिया जाता है जिस पर आपके प्रवेश करने का समय अंकित होता  है. अगर आपको सिर्फ किसी को हवाई अड्डे पर छोड़ना या वहां से लेकर  आना है  तो जल्दी से जल्दी से जल्दी यह काम कर लौट आएं, निकास पर अपनी वह पर्ची दें और अगर आपको आठ मिनिट से कम का समय लगा है तो बिना कोई शुल्क चुकाए चले आएं. इस तरह के सामान्य काम के लिए यह अवधि पर्याप्त है.  लेकिन अगर आप किसी के विदा होने तक वहां रुकना चाहते हैं, या वहां पहले पहुंच कर अपने अतिथि के आने की प्रतीक्षा करना और उन्हें लेकर आना चाहते हैं तो ज़ाहिर है कि आपको आठ मिनिट से ज्यादा का वक़्त लगेगा और तब आपको साठ रुपया पार्किंग शुल्क देना होगा. प्रीमियम पार्किंग के लिए तो यह शुल्क और अधिक है. तो अपनी इन दोनों हवाई अड्डा यात्राओं में मैंने पाया कि जवाहर सर्कल से थोड़ा आगे बढ़ते ही और ख़ास तौर पर टर्मिनल 2 वाली सीधी सड़क पर एक पूरी लेन एक के पीछे एक खड़ी हुए कारों से भरी हुई रहती है. होता यह है कि अपने मेहमानों को लेने आने वाले लोग बजाय साठ रुपया पार्किंग शुल्क खर्च करने के सड़क किनारे अपनी गाड़ी खड़ी कर उसी में बैठे रहते हैं और जैसे ही उनका अतिथि हवाई अड्डे से मय लगेज बाहर निकल कर उन्हें फोन करता है वे अन्दर  जाकर उसे लिवा लाते हैं. कहना अनावश्यक है कि इस काम के लिए जितने समय गाड़ी हवाई अड्डे के भीतर रहती है उसके लिए पार्किंग शुल्क देय नहीं होता है. यानि सड़क किनारे खड़ी गाड़ियों की यह कतार पार्किंग शुल्क बचाने वालों की होती है. उस सड़क पर यह नज़ारा आम है.

इस मंज़र को देखते हुए मुझे कुछ बरस पहले की अपनी अमरीका यात्रा की याद हो आई. वहां के सिएटल-टकोमा हवाई अड्डे पर मैंने पाया कि सामान्य सशुल्क पार्किंग एरिया के अतिरिक्त एक सेल पार्किंग एरिया और है जहां वही सुविधा बाकायदा सुलभ है जिसको जयपुर के नागरिकों ने अवैध तरह से हासिल कर रखा है. यानि आप गाड़ी खड़ी कीजिए, उसमें बैठे रहिये (यह ज़रूरी है) और जैसे ही आपके अतिथि का कॉल आए, जाकर उन्हें लिवा लाइये. वहां गाड़ी खड़ी रखने के लिए आपको कोई पार्किंग शुल्क  नहीं देना होता है. इतना ज़रूर है कि  उस सेल पार्किंग एरिया में आप अधिकतम तीस मिनिट तक अपनी गाड़ी खड़ी रख सकते हैं. लेकिन वहां के प्रशासन को इस तीस मिनिट की अवधि का निर्वाह करवाने के लिए कोई व्यवस्था नहीं करनी पड़ती है. लोग स्वत: इस समय सीमा का पालन  कर लेते हैं.

अब अमरीका के इस अनुभव को याद करते हुए मैं सोचता हूं कि आखिर क्यों हम लोगों की ज़रूरत को देख समझ तदनुसार व्यवस्था नहीं करते हैं? जब लोग जयपुर हवाई अड्डे पर पार्किंग शुल्क से बचने के लिए उस तेज़ यातायात वाली सड़क की एक लेन रोकने की अवांछित हरकत करने को मज़बूर हैं तो क्या प्रशासन को उनकी ज़रूरत को समझ तदनुसार व्यवस्था नहीं कर देनी चाहिए? और चलिये प्रशासन से तो संवेदनशीलता और सूझ-बूझ की  उम्मीद करना बहुत व्यावहारिक नहीं होगा, हमारे केटरर और शादियों पर इतना ज़्यादा खर्च  करने वालों को भी अगर यह नहीं सूझता कि दही बड़ों के पास कटोरियां भी रख दी जाएं,  तो मान लेना चाहिए कि गड़बड़ हमारी मानसिक बनावट में ही है.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 17 मार्च, 2015  को दही बड़े की कटोरियों जैसा पार्किंग का सवाल शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.     

Tuesday, March 10, 2015

क्या अतीत एक शरणगाह है?

ऐसे अनुभव बहुत बार होते हैं. कल फिर हुआ. कल अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस था ना! एक  आयोजन में शामिल होने का मौका अपन को भी मिला. मैं जब भी किसी आयोजन में जाता हूं मुझे शादी की दावत याद आए बिना नहीं रहती है. मुझे शादी की सारी दावतें एक जैसी लगती हैं. एक जैसा मेन्यू और एक जैसा माहौल. फर्क़ होता है तो बस अंकों का. कहीं तीन मिठाइयां तो कहीं पांच. और ऐसा ही अनुभव वैचारिक अथवा अकादमिक आयोजनों में जाकर  भी होता है. वही स्वागत, वही माल्यार्पण, वही लम्बे-लम्बे भाषण, वही आभार प्रदर्शन, वही स्मृति चिह्न समर्पण, वही समय की कमी की शिकायत और वही पारस्परिक तारीफें. अंतर  सिर्फ इस बात का कि इस आयोजन में मंच पर तीन विशिष्ट जन और उसमें सात.  फिर भी इसे शिकायत न माना जाए! असल में हमने अपने कार्यक्रमों का एक सांचा गढ़ लिया है और हर सम्भव कोशिश करते हैं कि जो भी करें वो उसी सांचे के अनुरूप हो. अंग्रेज़ी में जिसे आउट ऑफ द बॉक्स कहते हैं उस तरह से सोचने या करने का साहस हम कर  नहीं पाते हैं, इसलिए जैसा चलता आ रहा है वैसा ही चलता चला जाता है. और इस सबके बावज़ूद मैं इन कार्यक्रमों में जाता हूं, सोत्साह जाता हूं, शिरकत करता हूं और हर बार कुछ न कुछ नया जान-सीख-ले कर लौटता हूं. प्राय: यह भी सोचता हूं कि अगर मुझे कोई कार्यक्रम करना होगा तो मैं कौन नौ की तेरह कर लूंगा! वो सांचा तो मेरे भी सामने रहेगा.

तो मैं बात कल के कार्यक्रम की कर रहा था. कार्यक्रम के दो भाग थे. कुछ विशिष्ट महिलाओं का सम्मान और एक विचार गोष्ठी. उस विचार गोष्ठी में इन सम्मानित महिलाओं में से कुछ और कुछ अन्य स्त्री-पुरुष वक्ता  थे. अवसर के अनुरूप विचार गोष्ठी का विषय महिला सशक्तिकरण के आकलन से सम्बद्ध था. संयोग से इस गोष्ठी का पहला वक्ता मैं था और मैंने बहुत बेबाकी से यह बात कही कि यह विषय ऐसा नहीं है कि आप अधिकार पूर्वक कोई एक पक्ष चुन सकें. आप न तो यह कह सकते हैं कि महिला सशक्तिकरण के मामले में हालात जस के तस हैं, और न यह कह सकते हैं कि आज की महिला पूरी  तरह से सशक्त और समर्थ हो चुकी है. मेरे बाद बोलने वाले वक्ताओं ने अपनी अपनी दृष्टि से स्थिति का आकलन प्रस्तुत किया और मुझे स्वीकार करना चाहिए कि हरेक की बातों में कुछ न कुछ नया और  विचारोत्तेजक था. और इसी नए के लिए तो हम इस तरह के आयोजनों में जाते हैं!

लेकिन एक वक्ता का वक्तव्य इन सबसे हटकर था. वे ‘देवभाषा’  के विद्वान थे और उन्होंने अपनी बात शास्त्रों में गाई गई स्त्री महिमा से शुरु की. एक वक्ता के रूप में हममें से बहुतों को बहुत बार वर्तमान तक आने के लिए अतीत का सीढ़ी की मानिंद प्रयोग करना पड़ता है. लेकिन थोड़ी देर में लग गया कि वे अतीत के स्वर्णकाल में ही विचरण करना चाहते हैं. अतीत से उनका मोह  इतना प्रगाढ़ और तृप्त कर डालने वाला था कि वर्तमान तक आने की उन्हें कोई आवश्यकता ही महसूस नहीं हो रही थी. और अतीत भी तथ्य कथन या सजीव चरित्रों के माध्यम से नहीं, सुभाषितों के माध्यम से. यानि कुछ कुछ इस तरह कि जब हमारे शास्त्रों में लिख दिया गया है कि स्त्रीदेवी है, शक्ति  स्वरूपा है, तो बस है! अब और सोच विचार की ज़रूरत ही क्या है?

जैसा कल इस वक्तव्य के रूप में सामने आया, वैसा उन बहुत सारी गोष्ठियों में सामने आता है जिनमें समकाल की किसी अवस्था पर विचार किया जा रहा होता है. और गोष्ठियों में ही क्यों? हमारे रोज़मर्रा के जीवन में भी बहुत बार ऐसा होता है कि जब बात हमारी हो रही होती है तो हम उसे खींच कर अपने पुरखों तक ले जाते हैं. हमारे टू बी एच के के फ्लैट में कोई आता है तो हम बलपूर्वक यह बताए बिना नहीं रहते हैं कि हमारे पुरखे तो हवेलियों के स्वामी थे. मेरे पड़ोस में एक बच्चा था, कोई ढाई तीन साल का. अक्सर मेरे पास आ जाता था. मैं जब भी उससे उसके बारे में कुछ पूछता, जैसे यह कि तेरे पास कितनी पेंसिलें हैं, तो उसका जवाब हमेशा अपने बड़े भाई के बारे में होता, कि गौरव के पास सात पेंसिलें हैं. उस बच्चे के मन में कोई चालाकी नहीं थी, लेकिन फिर भी वो अपने सहज बोध से अपनी हीनता को छिपाने के लिए अपने भाई की आड़ लेता था. लेकिन हम जो पढ़े लिखे हैं, और बहुत सोच-विचार के बाद कुछ कहते हैं, वे भी जब वर्तमान की बात करने के लिए अतीत की आड़ लेते हैं तो इसे क्या कहा जाए?

शुतुरमुर्ग के बारे में तो सुना है ना आपने!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, दिनांक 10 मार्च, 2015 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.   

Tuesday, March 3, 2015

किताबें अब झांकती हैं फेसबुक की दीवारों से

गुलज़ार साहब की एक बहुत मशहूर नज़्म है – किताबें झांकती हैं बन्द अलमारी के शीशों से/ बड़ी हसरत से ताकती हैं, महीनों अब मुलाकातें नहीं होतीं.  किताबों के परिदृश्य में पिछले चन्द  बरसों में जो बदलाव आया है उसे देखते हुए मुझे यह नज़्म पुरानी लगने लगी है. बहुत पुरानी बात नहीं है जब मेरी भाषा हिन्दी में सामान्यत: किताब का एक संस्करण ग्यारह सौ प्रतियों का होता था. तब जो मुद्रण तकनीक प्रचलित थी उसके लिहाज़ से भी शायद इतनी प्रतियों से कम छापना व्यावहारिक नहीं होता था. बहुत सारी किताबों की, जिनमें पाठ्य पुस्तकें और लुगदी साहित्य का ज़िक्र ख़ास तौर पर किया जा सकता है, इससे काफी ज़्यादा प्रतियां भी छपती  थीं. लोकप्रिय उपन्यासकार गुलशन नन्दा के एक उपन्यास ‘झील के उस पार’  की पांच लाख प्रतियों के छपने और बिकने की चर्चा काफी समय तक होती रही थी. और बात ऐसी भी नहीं है  कि सिर्फ लुगदी साहित्य ही बिकता रहा है. हिन्दी में ही तुलसी और प्रेमचन्द की बात तो छोड़िये, धर्मवीर भारती का ‘गुनाहों का देवता’, भगवतीचरण वर्मा का ‘चित्रलेखा’, श्रीलाल शुक्ल का ‘राग दरबारी’, शिवानी और नरेन्द्र कोहली के अनेक उपन्यास, दुष्यंत कुमार का ग़ज़ल  संग्रह ‘साये में धूप’  उन बहुत सारी किताबों में से कुछ हैं जो खूब बिकी हैं और अब भी बिकती हैं. संस्करण, और पुनर्मुद्रण की इस चर्चा को आगे बढ़ाने से पहले इस बात का ज़िक्र भी करता चलूं कि विदेशी हैरी पॉटर वगैरह को तो छोड़िये, हमारे अपने मुल्क के लोकप्रिय कथाकार चेतन भगत के हालिया प्रकाशित उपन्यास ‘हाफ़ गर्लफ्रैण्ड’ की बीस लाख प्रतियों के पहली खेप में और एक  साल में इससे दस लाख और प्रतियों के बिकने की चर्चाएं खूब हो चुकी हैं. और यह बात तब जब हम यह कहते नहीं थकते हैं कि अंग्रेज़ी इस देश के मात्र दो प्रतिशत की भाषा है. 

लेकिन इन्हीं तमाम बातों  के बरक्स यह एक त्रासद सच्चाई है कि हिन्दी की आम किताब  का संस्करण अब ग्यारह सौ प्रतियों से सिकुड़ते-सिकुड़ते तीन सौ, बल्कि उससे भी कम तक आन पहुंचा है. और यह कहते हुए मैं उस नए प्रिण्ट ऑन डिमाण्ड नामक फिनोमिना की बात नहीं कर रहा हूं जिसमें संख्या की कोई बात रह ही नहीं गई है:  अगर आपको एक प्रति चाहिये तो एक छाप कर दे दी जाती है. बेशक यह बात मुमकिन हुई  है नई मुद्रण तकनीकी की वजह से जहां पुस्तक के पाठ को कम्पोज़ करके कम्प्यूटर में सेव करना और यथावश्यकता प्रतियां मुद्रित कर लेना सम्भव हो गया है. अब भला क्यों कोई प्रकाशक ज़्यादा प्रतियां छापने में अपने कागज़, लागत तथा गोदाम की स्पेस को ब्लॉक करे? और इसी स्थिति ने हिन्दी में एक नई प्रजाति को पनपाया है. उस नई प्रजाति ने अपना नाम तो अभी पुराने वाला  ही रखा है – प्रकाशक, लेकिन असल में काम वह मुद्रक का करता है. जैसे पहले आप किसी प्रिण्टर के पास जाकर अपनी बिल बुक, शादी या मौत मरण का कार्ड छपवा लाते थे, वैसे ही अब इस नए प्रकाशक के पास जायें, और पैसे देकर अपने लिखे को छपवा लें. उसे इस बात से कोई मतलब नहीं है कि आप कैसा, क्या और क्यों छपवा रहे हैं? आपने पैसे दिये, उसने छाप दिया. बेचने की परवाह भी उसे नहीं करनी है. इसलिए वो ज़्यादा प्रतियां भी नहीं छापता  है. उतनी ही  छापता  है जितनी छापने  के आपने पैसे दिये हैं. दस-बीस प्रतियां अपने पास रखकर शेष सारी वो आपको दे देता है. और आपके पास भी  उन्हें बेचने का कोई तंत्र तो है नहीं, सो कुछ प्रतियां आप दोस्तों, रिश्तेदारों को सप्रेम  भेंट करते हैं, कुछ माननीय समीक्षकों को सादर ‘समीक्षार्थ’ प्रेषित करते हैं और बस हो जाते हैं साहिबे दीवान! अरे, यह सब कहते हुए मैं एक ख़ास बात तो भूल ही गया. किताब छपवा लेने के बाद दो ज़रूरी काम आप सबसे पहले करते हैं. पहला तो यह कि फेसबुक और ट्विट्टर जैसे सोशल मीडिया पर उस किताब की खबर प्रसारित  कर ‘सबको मालूम है सबको खबर हो गई’ का माहौल बनाते हैं और फिर उसके लोकार्पण का जुगाड़ बिठाते हैं. लोकार्पण चाहे जैसा और चाहे जिस स्तर का हो, उसकी सचित्र खबर भी इन माध्यमों पर एकाधिक बार प्रसारित करना आप नहीं भूलते. अनेक लोकार्पण तो इतने हास्यास्पद होते हैं कि कुछ पूछिये मत. लेकिन वह ज़िक्र फिर कभी.  आपकी किताब चाहे किसी लाइब्रेरी और किसी पाठक तक न भी पहुंचे, फेसबुक आदि की दीवार से उसकी छवि ज़रूर नुमायां होती रहती है, और इसीलिए मुझे लगता है कि मैं गुलज़ार साहब की इस  नज़्म को संशोधित करके कहूं – किताबें झांकती हैं फेसबुक की दीवारों से.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 03 मार्च, 2015 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.        

Tuesday, February 24, 2015

विवाह, विदाई और वर-वधू

कोई पांचेक साल बाद फिर अहमदाबाद जाने का सुयोग जुटा. पिछली बार गया था तो साबरमती आश्रम के माहौल और अदालज री बाव की सुखद स्मृतियां बहुत दिनों तक मन प्राण को मुदित करती रही थीं. इस बार अमदावाद नी गुफा, जिसे हुसैन दोषी गुफा के नाम से भी जाना जाता है,  सूची में सर्पोपरि थी. जाने की वजह इस बार भी वही थी:  एक विवाह समारोह में सहभागिता. हम मध्यमवर्गीय लोगों के जीवन में अधिकांश यात्रा प्रसंग तो इन्हीं सामाजिक वजहों से आते हैं. याद आया कि पिछली बार की यात्रा में वरमाला के बाद वर-वधू को ‘आशीर्वाद’ यानि लिफाफा  देने और फोटो खिंचवाने के लोग किस तरह पंक्तिबद्ध अपनी बारी की शालीन प्रतीक्षा कर रहे थे! जब एक जन फोटो वगैरह खिंचवा कर हटता तभी दूसरा आगे जाता. मेरे लिए यह दृश्य विलक्षण और परम आनंदपूर्ण था. इस बार फिर इसी दृश्य को देख कर मुदित होने का आकांक्षी था. परिवार और आयोजन स्थल वही थे  अत: स्वाभाविक है कि अतिथि समुदाय भी कमोबेश वही था. लेकिन मेरे सुख की पुनरावृत्ति नहीं हुई. आप कुछ और समझें उससे पहले ही स्पष्ट कर दूं कि होस्ट परिवार ने वैसी कोई व्यवस्था रखी ही नहीं. और एक तरह से तो अच्छा ही हुआ. मैं तो हर शादी में जाकर बेचारे वर-वधू के बारे में सोच कर दुखी होता हूं कि इतने सारे मेहमानों के साथ फोटो खिंचवा कर स्माइल देते-देते वे कितने पस्त हो जाते  होंगे! असल में शादी का यह फोटो सेशन एक ऐसी बेकार की रिवायत है जिससे जितनी जल्दी छुटकारा पा सकें, पा लिया जाना चाहिये. न घर वाले कभी उन तस्वीरों को देखते होंगे न मेहमानों को कभी वे तस्वीरें देखने को मिलती होंगी! फिर इतनी ज़हमत किस लिए?

इस विवाह का एक दृश्य मुझे बहुत लम्बे समय तक याद रहेगा. हम लोग विवाह में वधू पक्ष की तरफ से सम्मिलित थे. अंतरजातीय विवाह था. वर और वधू दोनों पक्षों ने सहज स्वाभाविक उल्लास से इस रिश्ते को स्वीकार किया और पूरे मन से विवाह समारोह का आयोजन किया. विवाह की रस्में दोनों समाजों की प्रथानुसार सम्पन्न की गईं. दृश्य यह था. वर वधू मंच पर खड़े थे. वधू की मां ने कन्यादान की रस्म पूरी की और मंच से नीचे उतरते उतरते उनकी रुलाई बहुत ज़ोर से फूट पड़ी. उन्हें यह लगा होगा कि बस, अब इस क्षण से मेरी बेटी ‘पराई’ हो गई. इस प्रतीति पर भला कौन होगा जो द्रवित होने से खुद को रोक सके. बहुत स्वाभाविक था यह. लेकिन तभी मेरी नज़र दुल्हन की तरफ चली गई. और मुझे यह देखकर अत्यधिक अचरज हुआ कि वह  इस भाव प्रवाह से एकदम अछूती, अपने अनुराग में मुदित-मगन थीं. जी, आप ग़लत न समझें. यह लिखते हुए मेरे मन में उस युवती  के प्रति किसी भी तरह की शिकायत  का कोई भाव नहीं है. यह एक छवि भर है.

असल में, इस दृश्य के बारे में लिखने की ज़रूरत मुझे इसलिए महसूस हुई कि इसने दो एक महीने पहले सम्पन्न एक और विवाह की याद मेरे मन में ताज़ा कर दी. उस विवाह में हम लोग वर पक्ष की ओर से सम्मिलित थे. वह विवाह भी हमारे बाद वाली पीढ़ी की संतति का ही था, और प्रेम  विवाह ही था जो दोनों पक्षों के अभिभावकों की आनंदपूर्ण सम्मति से सम्पन्न हुआ था. उस विवाह के बाद वर या वधू किसी ने फेस बुक पर जो बहुत सारी तस्वीरें पोस्ट की थीं उनमें से एक तस्वीर और उस पर आई हुई बहुत सारी मज़ेदार प्रतिक्रियाओं की स्मृति ने मुझे इस दृश्य के बारे में लिखने को प्रेरित किया. वह तस्वीर विदाई के क्षणों  की थी जिसमें वधू के साथ-साथ वर भी लगभग रुदन मुद्रा में था. इसी बात को लेकर वर-वधू के मित्रों ने अपनी प्रतिक्रियाओं में वर की मैत्रीपूर्ण खिंचाई की थी. हम सब जानते हैं कि रोना बहुत संक्रामक होता है. अगर आपके पास कोई रोने लगे तो आप अपने को भी वैसा ही करने से रोक नहीं पाते हैं. तो उस समय जब दुल्हन अपने मां-बाप से विदा लेते हुए रोने लगी होगी तो उसके वियोग भाव से दूल्हा भी अप्रभावित नहीं रहा होगा और उसी क्षण को फोटोग्राफर ने कैद कर लिया था. लेकिन हमारे यहां इस बात को कोई कैसे स्वीकार कर ले कि जब दुल्हन विदा हो रही  है तो दूल्हा भी रुंआसा हो जाए! तो ये थी विवाहों की दो छवियां. और हां, बात तो मैंने अमदावाद नी गुफा के ज़िक्र से शुरु की थी. गूगल कर चुकने के बाद भी हम यह न जान पाए थे कि उसे शाम चार बजे से पहले नहीं देख सकते, इसलिए भरी दोपहर वहां जाकर भी उसे देखे बिना लौटना पड़ा. यानि अहमदाबाद एक बार  और जाने का  कम से कम एक आकर्षण  तो मन में है ही!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत 24 फरवरी, 2015 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.   

Tuesday, February 17, 2015

जैसी दुनिया इधर है वैसी ही उधर भी है


इधर हाल ही में दूरस्थ देश हंगरी की एक ख़बर पढ़ी तो बड़े कष्ट के साथ यह अनुभूति हुए बग़ैर नहीं रही कि कुछ मामलों में दुनिया एक-सी है. पहले ख़बर तो बता दूं आपको. हंगरी के शहर माको में एक व्यवस्था है कि साल के पहले जन्मे बच्चे को मेयर द्वारा ढाई सौ पाउण्ड की राशि प्रदान की जाती है. इस साल इस राशि का हक़दार बना रिकार्डो रैक्ज़ नामक बच्चा, और उसके मां-बाप के साथ उसकी तस्वीर वहां के अखबारों में छपी. यहां तक तो सब ठीक था. इस तस्वीर के छपने के बाद हंगरी की दक्षिणपंथी जोब्बिक पार्टी के उपनेता इलोड नोवाक ने अपने फेसबुक पन्ने पर इस नवजात और इसकी मां की तस्वीर इस सूचना के साथ लगाई कि यह बालक  23 वर्षीया जिप्सी मां की तीसरी संतान है. उन्होंने यह भी लिखा कि “हंगरी मूल के लोगों की आबादी दिन पर दिन कम होती जा रही है और बहुत जल्दी हम अपने ही देश में अल्पसंख्यक  बन जाएंगे. फिर एक दिन ऐसा आएगा जब वे हंगरी का नाम बदलने का फैसला लेंगे. उस वक़्त हम देश की सबसे बड़ी समस्या  से रू-ब-रू होंगे.” और यहीं आपको यह भी बता दूं कि इस जोब्बिक पार्टी के  समर्थक जिप्सियों के लिए अक्सर यह कहते हैं कि “ये चूहों और परजीवियों की तरह पैदा होते हैं.” इलोड नोवाक के इस वक्तव्य पर खूब  प्रतिक्रियाएं हुईं. आशा है कि आपको अब तक यह बात तो स्पष्ट हो ही गई होगी कि क्यूं इस प्रसंग से मुझे अपने देश की कष्टप्रद अनुभूति हुई. इस बात को और आगे बढाऊं उससे पहले क्यों न मशहूर शायरा फहमीदा रियाज़ की एक लोकप्रिय नज़्म की कुछ पंक्तियां आपको सुनाता चलूं? वे लिखती हैं:

तुम बिल्कुल हम जैसे निकले
अब तक कहाँ छिपे थे भाई
वो मूरखता, वो घामड़पन
जिसमें हमने सदी गंवाई
आखिर पहुँची द्वार तुम्हारे 
अरे बधाई, बहुत बधाई।

इसी नज़्म के एक अन्य बंद में वे कहती हैं:

कौन है हिंदू, कौन नहीं है
तुम भी करोगे फ़तवे जारी
होगा कठिन वहाँ भी जीना
दाँतों आ जाएगा पसीना
जैसी तैसी कटा करेगी
वहाँ भी सब की साँस घुटेगी

यानि क्या भारत, क्या इसके पड़ोसी मुल्क और क्या अन्य देश – सबके हाल एक जैसे हैं. चलिये फिर से हंगरी वाले प्रसंग पर लौट जाएं!

इस पूरे प्रसंग का मानवीय पक्ष उभरता है इस बालक रिकार्डो के मां-बाप सिल्विया और पीटर के वक्तव्यों से. पीटर का परिवार मोका शहर के किनारे बसे एक छोटे-से गांव में रहता है और वहां का एकमात्र रोमा (जिप्सी) परिवार है. पीटर सामुदायिक काम करते हैं और ट्रैक्टर तथा  हार्वेस्टर चलाना सीख रहे हैं. उनकी दोनों बेटियां अभी किण्डरगार्टेन  में हैं. पीटर एक ऐसी सुकूनभरी ज़िन्दगी के आकांक्षी हैं जिसमें मीडिया और राजनीति का कोई दखल न हो. उनका कहना है कि हमें, यानि जिप्सियों और हंगेरियनों को,  सिर्फ चमड़ी के रंग के आधार पर अलग किया जाता है जबकि हमारे दिल, खून और हमारी आत्मा सब एक हैं. पीटर और सिल्विया दोनों ही बार-बार यह बात कहते हैं कि हो सकता है हंगरी में कोई नस्लवाद हो, लेकिन उन्होंने इससे पहले कभी उसका अनुभव नहीं किया. “हम इस शहर में रहना पसन्द करते हैं. यहां सभी हमारे प्रति बहुत दयालु हैं.”  लेकिन असल मार्के की बात कही सिल्विया ने. उनके एक-एक शब्द से उनकी पीड़ा व्यक्त होती है. उन्होंने कहा, “लोगों को उनके जन्म के वक़्त से ही निशाना नहीं बनाना  चाहिए. मेरा बच्चा जब 18 साल का हो जाएगा तो वह यह फ़ैसला लेगा कि उसे रोमा के रूप में पहचाना जाए या नहीं. इसमें उसकी क्या ग़लती अगर वो पिछले साल के आखिरी दिन मध्यरात्रि  के कुछ लमहों के बाद इस दुनिया  में आया.”

यह बात बहुत विडम्बनापूर्ण लगती है कि जिसे आपने नहीं चुना है, जैसे अपना जन्म, उससे  जुड़ी तमाम बातें बिना आपकी सम्मति के आप पर लाद दी जाएं! इस बालक रिकार्डो रैक्ज़ ने यह चुनाव नहीं किया है कि वो रोमा है या हंगेरियन, लेकिन इलोड नोवाक महोदय उसे रोमा होने का दण्ड देने के लिए ज़रा भी इंतज़ार नहीं करना चाहते. इसी सन्दर्भ में अपने  सुधि पाठकों को याद दिला दूं कि हिन्दी में बनी कम से कम दो फिल्में तो मुझे तुरंत याद आ रही  हैं जो इस तरह की विडम्बनापूर्ण स्थितियों को सामने लाती हैं. एक है आचार्य चतुरसेन शास्त्री के इसी नाम के उपन्यास पर 1961 में यश चोपड़ा द्वारा बनाई गई ‘धर्मपुत्र’ और दूसरी भावना तलवार निर्देशित 2007 में रिलीज़ हुई ‘धर्म’. फिलहाल हम तो यही आशा कर सकते हैं कि जब हंगरी का यह बालक रिकार्डो बड़ा होगा  तो उसे आज से बेहतर दुनिया मिलेगी.
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जयपुर से प्रकाशित  लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत इसी शीर्षक से आज 17 फरवरी, 2015 को प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.

Tuesday, February 10, 2015

जो नापसन्द उसके भी हक़ में खड़ा हूं मैं

कॉमेडी के भी अनेक रूप हैं और उन रूपों  में से एक है रोस्टिंग. बताया जाता है कि इसकी शुरुआत 1949 में न्यूयॉर्क में हुई और फिर यह कॉमेडी रूप पूरी दुनिया में प्रचलन में आ गया. रोस्टिंग का अर्थ है भूनना, और इस कॉमेडी रूप में किसी जाने-माने व्यक्ति के साथ बतौर कॉमेडी यही सुलूक किया जाता है. मैं यहां रोस्टिंग का ज़िक्र वर्ली, मुम्बई में हाल ही में हुए एक बहुचर्चित कार्यक्रम के सम्बन्ध में कर रहा हूं. देश के एक जाने-माने स्टैण्डअप कॉमेडियन समूह जिसका पूरा नाम लिखने में मुझे संकोच हो रहा है, ने ए आई बी रोस्ट नाम से एक चैरिटी कार्यक्रम का आयोजन किया जिसमें दो फिल्म स्टारों अर्जुन कपूर और रणवीर सिंह को रोस्ट किया गया. मास्टर  शेफ की भूमिका निबाही करण जोहर ने और उनका साथ दिया इस समूह ए आई बी की पूरी टीम ने, जिसमें एक महिला कॉमेडियन भी थीं. पता चला कि इस शो का टिकिट चार हज़ार रुपये का था और करीब चार हज़ार दर्शकों ने इस शो को लाइव देखा.

जैसा कि यह समूह हमेशा करता है, शो के बाद इसने शो की रिकॉर्डिंग यू ट्यूब पर अपने चैनल पर पोस्ट कर दी. और बस वहीं से हंगामे की शुरुआत हो गई. सोशल मीडिया पर तो इस कार्यक्रम को लेकर गरमा गरम बहसें हुई ही, कुछ लोग अदालत तक भी जा पहुंचे. कुछ की धार्मिक भावनाएं आहत हुईं तो कुछ को इस कार्यक्रम की विषय वस्तु और भाषा शैली पर गम्भीर आपत्तियां थीं. जब बात निकली तो उसे दूर तक जाना ही था. वह अभिव्यक्ति की आज़ादी के जाने-पहचाने मुकाम तक भी जा पहुंची.

इस कार्यक्रम में ऊपर उल्लिखित दो कलाकारों का जी भर कर मखौल उड़ाया गया, बल्कि कहें उनकी ऐसी-तैसी की गई. न केवल उनके साथ ऐसा किया गया, वहां उपस्थित अनेक फिल्मी सितारों के साथ भी यही सुलूक किया गया. मंच पर मौज़ूद इस कॉमेडी ग्रुप के सदस्यों ने जहां औरों के साथ भरपूर बदतमीज़ी की, उन्होंने खुद पर भी कोई रहम नहीं किया. यानि कुछ-कुछ होली का-सा माहौल रहा वहां कि जो भी सामने आए उसे रंग दो. रंग नहीं तो कीचड़ ही सही. वहां न स्त्री-पुरुष का कोई लिहाज़ था, न भाषा का कोई संयम. आप जितनी खुली, नंगी और अशालीन भाषा की कल्पना कर सकते हैं उससे भी ज़्यादा निर्वसन और आहत करने वाली भाषा वहां थी.

लेकिन इसके बावज़ूद, अगर यू ट्यूब वाले उस वीडियो को, जिसे आपत्तियों के बाद अब हटा लिया गया है, प्रमाण मानें, तो वहां उपस्थित सभी लोगों ने इसका  भरपूर मज़ा लिया. जिन्हें रोस्ट किया गया वे तो इतना ज़्यादा उछल रहे थे कि लग रहा था यह उनके जीवन का सर्वश्रेष्ठ अवसर  है. हो सकता है उन्हें यही करने के लिए पैसे दिये गए हों! लेकिन वहां मौज़ूद दर्शक? वे भी तो भरपूर लुत्फ ले रहे थे!

और यहीं से मैं भी उलझन में पड़ जाता हूं. मैं बहुत दूर तक अभिव्यक्ति की आज़ादी का समर्थक हूं. वहां तक जहां कि वह किसी और की आज़ादी का अतिक्रमण न करे. इन चार हज़ार लोगों को इस रोस्टिंग से कोई आपत्ति नहीं थी. बल्कि उन्होंने इसका खूब आनंद लिया. और ये कोई मासूम बच्चे नहीं थे. कार्यक्रम सार्वजनिक न होकर केवल उनके लिये था जो जानते हैं कि उसकी विषय वस्तु क्या है. यू ट्यूब पर जो वीडियो पोस्ट किया गया उसके प्रारम्भ में ही बहुत स्पष्टता से बाद की विषय वस्तु की सूचना देते हुए दर्शकों को सावचेत कर दिया गया था. ये ही बातें हैं जो मुझे उलझन में डाल रही हैं.

बेशक, मुझे इस कार्यक्रम की विषय वस्तु और भाषा आदि तनिक भी पसन्द नहीं आए. बल्कि मैंने आहत ही महसूस किया. लेकिन किसी ने मुझे बाध्य तो नहीं किया कि मैं उसे देखूं. बल्कि किसी ने निमंत्रित भी नहीं किया. मेरी मर्जी थी कि मैंने उसे देखा. जीवन में बहुत सारी चीज़ें होती हैं,  मसलन कोई फिल्म, कोई किताब, कोई गाना, कोई तस्वीर, कोई फल, कोई सब्ज़ी, कोई नेता, कोई अभिनेता - जिन्हें मैं देखता हूं और पसन्द नहीं कर पाता हूं, लेकिन क्या मैं उन पर रोक लगाने की मांग करता हूं? बहुत मुमकिन है कि जो मुझे पसन्द न आए उसे भी बहुत सारे लोग पसन्द करते हों!

हम यह देख रहे हैं कि असहिष्णुता तेज़ी से पैर पसार रही है. जो बात हमें पसन्द नहीं उसे हम समूल नष्ट कर देना चाहते हैं – यह भूलकर कि किसी को वो पसन्द भी हो सकती है. ऐसे में क्या एक बार फिर उस वाल्तेयर को याद नहीं किया जाना चाहिए जिसने कहा था कि “हो सकता है मैं आपके विचारों से सहमत न हो पाऊं फिर भी विचार प्रकट करने के आपके अधिकार की रक्षा करूंगा.” 

आप क्या सोचते हैं?

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़  टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार दिनांक 10 फरवरी 2015 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.  

Tuesday, February 3, 2015

वो कहते हैं ना कि हर चीज़ को देखने के दो नज़रिये होते हैं -   गिलास आधा खाली है, या गिलास आधा भरा हुआ है, तो जहां बहुत सारे मित्र इस बात से बहुत व्यथित हैं कि आज राजनीति में अभिव्यक्ति का स्तर बहुत गिर गया है और बड़े नेता भी बहुत छोटी बातें करने लगे हैं, मैं इस बात को इस तरह देख कर प्रसन्न हूं कि आज राजनीति के हवाले से भाषा और शब्दों पर भी गम्भीर विमर्श होने लगा है. लोग बहुत भावुकता के साथ उन दिनों को याद करते हैं जब बड़े नेता बड़े रचनाकार भी होते थे, गांधी, नेहरु राजेन्द्रप्रसाद आदि ने न केवल आत्मकथाएं लिखीं, साहित्यिक समुदाय ने भी उन आत्मकथाओं को हाथों-हाथ लिया. उस ज़माने के बहुत सारे राजनेता ऐसे थे जिनके साहित्य की दुनिया के बड़े हस्ताक्षरों से आत्मीय और अंतरंग रिश्ते थे. इनमें राममनोहर लोहिया का नाम बहुत ज़्यादा स्मरण किया जाता है. बहुत सारे राजनेताओं ने अपनी-अपनी तरह से साहित्य सृजन भी किया और साहित्यिक बिरादरी ने अगर लम्बा समय बीत जाने के बाद भी उन्हें याद रखा हुआ है तो माना जाना चाहिए कि उस सृजन में साहित्य भी रहा होगा, वर्ना जब आप कुर्सी पर होते हैं तो आपकी यशोगाथा गाने वाले आपको शून्य से शिखर पर पहुंचा कर भी दम नहीं लेते हैं, लेकिन आपके भूतपूर्व होते ही सारा मजमा उखड़ जाया करता है.


लेकिन मैं बात कुछ और कर रहा था. इधर हममें से बहुतों को लगता है कि हमारे बड़े (और छोटे भी) राजनेताओं को शायद अपनी तर्क क्षमता पर कम भरोसा रह गया है इसलिए वे फूहड़, अभद्र और अस्वीकार्य भाषिक अभिव्यक्ति का सहारा लेने को मज़बूर हो गए हैं. हममें से जो थोड़े बहुत भी पढ़े लिखे हैं वे अपने दैनिक जीवन में बहुत गुस्से की स्थिति में भी शायद कभी उस तरह की बातें नहीं करते हैं. आखिर शिक्षा आपको संस्कार तो देती ही है ना! वो आपको सलीके से बात कहने का कौशल भी सिखाती है. अगर आपको कभी भाषिक कौशल की बेहतरीन बानगियां देखने का मन करे तो मनोहर श्याम जोशी के उपन्यास ‘कुरु कुरु स्वाहा’ को कहीं से भी पढ़ना शुरु कर दें. लेकिन इधर हमारे माननीय गण जिस तरह की  भाषा में अपनी बात कह रहे हैं वो एक तरफ़ और हममें से बहुत सारे उनकी कही बातों को जिस तरह समझ कर लाठियां या तलवारें भांजने में जुटे हैं वो दूसरी तरफ. बहुत बार तो वह हो जाता है जिसे फिल्म ‘प्यासा’  के उस गाने में मरहूम साहिर लुधियानवी साहब ने बखूबी  कह दिया था – जाने क्या तूने कही, जाने क्या मैंने सुनी! असल में हो यह रहा है कि कहने वाला चाहे जो कहे, हम वही सुन रहे हैं जो हम सुनना चाहते हैं. फिर बेचारा वो लाख कहे कि ‘मैंने ऐसा तो नहीं कहा था’, हम अपने कानों में रुई डाल लेते हैं. और इधर जब से हमारे समाज में सोशल मीडिया का प्रचलन बढ़ा है स्थितियां और विकट होती जा रही हैं. अखबार तो चौबीस घण्टे में एक बार ही निकलता है, रेडियो दूरदर्शन पर बहुत संयम बरता जाता है, लेकिन यह जो नया औज़ार हमारे हाथों में आ गया है, बहुत बार लगता है जैसे वो  कहावत सही सबित हो गई है! कौन-सी? अरे भाई वही...आप समझ लीजिए ना. अगर मैं लिखूंगा तो पता नहीं किस-किस की भावनाएं आहत हो जाएं! इशारा कर देता हूं. वो कहावत जिसमें   किसी प्राणी के हाथ में दाढ़ी बनाने का औज़ार आ जाने वाली बात कही गई है. बेसब्री इतनी अधिक है कि पूरी बात पढ़े-सुने या समझे बिना ही वीर जन मैदान में कूद पड़ते हैं.

और शायद इसी बेसब्री का एक परिणाम यह भी हो रहा है कि जो बात एक बार कह दी जाती है, वही बार-बार गूंजती रहती है. जैसे किसी ने एक बार कह दिया कि पत्रकारों को तटस्थ होना चाहिए, तो बस जिसकी बात हमें पसन्द न आई उसपर हमने फौरन तटस्थ न होने का इल्ज़ाम मढ़ दिया. कोई यह सुनना या सोचना नहीं चाहता कि अखिर इस तटस्थ शब्द का सही अर्थ क्या है! तट पर स्थित. यानि जो धार में न हो, किनारे पर हो. यानि जो किसी एक का पक्ष न ले! अब, ज़रा एक बात सोचिये! क्या आप एक अपराधी और उसे दण्डित करने वाले में से किसी एक को नहीं चुनेंगे और तटस्थ रहेंगे? और यह भी याद रखिये कि ज़िन्दगी हमेशा स्याह और सफेद ही नहीं होती है. उसके और भी अनेक रंग होते हैं. तब आप अपने विवेक से ही चुनाव करते हैं. राष्ट्रकवि दिनकर ने क्या  खूब कहा है:

समर शेष है,  नहीं पाप का  भागी केवल व्याघ्र,
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।

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लोकप्रिय अपराह्न  दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, दिनांक 03 फरवरी, 2015 को असम्बद्ध  भाषा, राजनीति और हम लोग शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.  

Tuesday, January 27, 2015

जयपुर साहित्य उत्सव: बात निकली है तो.........

साल 2015 के  जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल का भी समापन हो गया. यह आयोजन हमारे समय की सबसे बड़ी सफलताओं की गाथा है. सन 2005 में मात्र चौदह अतिथियों की उपस्थिति में प्रारम्भ हुआ यह आयोजन इतने कम समय में दुनिया का सबसे बड़ा निशुल्क साहित्यिक उत्सव  बन जाएगा – यह कल्पना तो इसके आयोजकों ने भी नहीं की होगी. एक मोटे अनुमान के अनुसार इस बरस भी इस उत्सव में कुल उपस्थिति ढाई  लाख के  करीब रही.  यह आयोजन एक तरफ जहां जयपुर और भारत को विश्व के मानचित्र पर प्रभावशाली तरीके से रेखांकित करता है, पर्यटन  और अन्य सम्बद्ध व्यवसायों की उन्नति में योगदान करता है वहीं साहित्य, कलाओं और विचारों पर मुक्त चिंतन का विरल अवसर भी प्रदान करता है. इस आयोजन  की सराहना इस बात के लिए भी की जानी चाहिए कि इसकी सफलता से प्रेरित होकर पूरे देश में साहित्य उत्सवों का सिलसिला चल निकला है. हमारे अपने प्रांत में भी अनेक नए साहित्य और कला उत्सव होने लगे हैं.

लेकिन गम्भीर साहित्य के कद्रदां इस आयोजन  से तनिक भी प्रभावित नहीं हैं. बल्कि वे तो इससे बहुत नाराज़ हैं. उन्हें न तो साहित्य का उत्सवीकरण पसन्द आता है न साहित्य की परिधि का इतना विस्तार कि उसमें सब कुछ समा जाए. उन्हें लगता है कि राजनीति, खेल, फिल्म, फैशन,  ग्लैमर आदि की चर्चाएं लोगों को भ्रमित और साहित्य  से विमुख करती हैं. हमारे समय के बेस्ट सेलर लेखकों की उपस्थिति  भी उन्हें पसन्द नहीं आती है, क्योंकि वे तो उन्हें लेखक ही नहीं मानते हैं. गम्भीर साहित्यिक बिरादरी को इस आयोजन से एक बड़ी शिकायत इसके अंग्रेज़ी और अंग्रेज़ियत की तरफ झुकाव से भी है. वे इसे भारतीय भाषाओं के प्रति आक्रामक षड़यंत्र के रूप में भी देखते हैं. शुरु-शुरु में राजस्थानी साहित्यकार भी अपनी अवहेलना से नाराज़ थे लेकिन आयोजकों ने उनकी सहभागिता बढ़ाकर उन्हें तो एक सीमा तक संतुष्ट कर दिया है.

इन सब बातों के बावज़ूद, दुनिया भर के लेखकों और साहित्य  प्रेमियों का इतनी बड़ी तादाद में इस आयोजन में शरीक होना एक ऐसी परिघटना है जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता. पूरे पांच दिन तक हर रोज़ छह स्थानों पर छह सत्रों का एकदम समय की पाबन्दी के साथ होना और उनमें बहुत बड़े जन समूह का शिरकत करना साधारण बात नहीं है. इस साल सारे ही सत्र हाउस फुल से कम नहीं थे और चर्चा के विषय या चर्चा करने वालों के बारे में उपस्थित जन की जानकारियां चकित कर डालने वाली थी. उन्हें तमाशबीन कहना उनके असम्मान से अधिक अपने पूर्वाग्रह  का प्रदर्शन होगा. हां, इतने बड़े आयोजन में तमाशबीनों या मौज मज़े के लिए आने वालों की तादाद भी कम नहीं रही. और इसे अस्वाभाविक भी नहीं माना जाना चाहिए और न इस बात को भूला जाना चाहिए कि यह है तो उत्सव ही.

हममें से जितना ताल्लुक साहित्य से है वे प्राय: साहित्य में लोगों की घटती रुचि की शिकायत करते पाए जाते हैं. हम हिन्दी भाषी लेखकों (और हिन्दी शिक्षकों)  की शिकायत समाज अंग्रेज़ी के बढ़ते जा रहे प्रचलन और प्रभाव को लेकर भी होती है. किसी खासे बड़े शहर में भी आपको किताब की दुकान ढूंढनी पड़ती है और अगर दुकान मिल जाए तो वहां जाकर हिन्दी की किताब ढूंढनी पड़ती है. हिन्दी प्रकाशक की आम शिकायत यह होती है कि लोग हिन्दी की किताबें खरीदते ही नहीं हैं. और इसी के समानांतर हमारे ही समय और समाज में अंग्रेज़ी की किताबें धड़ल्ले से बिक रही हैं और उनके लेखक अमीर और स्टार बनते जा रहे हैं. यानि लोग किताबें तो खरीदते हैं मगर हिन्दी की नहीं, अंग्रेज़ी की.

क्या इस बात पर कोई विचार सम्भव है कि क्यों हिन्दी की किताबें कम और अंग्रेज़ी की किताबें अधिक बिकती हैं? और यह भी कि क्या वाकई  हिन्दी की किताबें कम बिकती हैं? पुस्तक मेलों और प्रकाशकों की हालत को देखकर तो यह भी नहीं लगता. तो क्या गम्भीर और साहित्यिक पुस्तकें कम बिकती हैं, और इतर किस्म की किताबें धड़ाधड़ बिक जाती हैं? और क्या यह बात भी है कि हिन्दी में लोकप्रिय लेखन का अभाव है? या इस बात के सूत्र प्रकाशकों के अपने गणित से जुड़ते हैं?  

मुझे लगता है कि जयपुर साहित्य उत्सव हमें बहुत सारी बातों पर गम्भीर विमर्श के लिए  भी प्रेरित करता है. इस उत्सव की सार्थकता, प्रासंगिकता, इसकी उपलब्धियों, इसकी खामियों इन सब पर विचार करते हुए क्या हर्ज़ है अगर हम इस बात  पर भी विचार करें कि कैसे लोगों को पुस्तकों की तरफ आकृष्ट किया जा सकता है और कैसे लेखक-पाठक के बीच की खाई को छोटा किया जा सकता है? इधर साहित्य उत्सवों के कारण पूरे देश में जो माहौल  बना है उसका अपनी भाषा के बेहतर और गम्भीर साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिए भी किया जाना चाहिए.  
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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगल्वार, 27 जनवरी, 2015 को जयपुर साहित्य उत्सव: बात निकली है तो दूर तक जाएगी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.  

Tuesday, January 20, 2015

सेल्फी वेल्फी मैं क्या जानूं रे.....

दुनिया बहुत तेज़ी से बदल रही है. जीवन पहले की तुलना में निरंतर अधिक सुगम होता जा रहा है. यह बात अलग है कि उसे सुगम करने वाले साधनों को जुटाने के लिए हमें अधिक श्रम और प्रयास करने पड़ रहे हैं जिनकी वजह से सुगमता का आनंद लेने के अवकाश में कटौती भी होती जा रही है. कुछ समय पहले तक जिन चीज़ों और कामों के लिए हमें खूब पापड़ बेलने पड़ते थे वे या उनमें से अधिकांश अब हमारे एक हल्के-से इशारे पर होने लगे हैं. इन सब बातों के उदाहरण देकर मैं आपका कीमती वक़्त बर्बाद नहीं करना चाहता. मैं तो आपके सोच को दूसरी तरफ ले जाना चाहता हूं.

हमारे सुख सुविधाओं को  बढ़ाने वाले इन साधनों के विस्तार में बाज़ार की बहुत बड़ी भूमिका है. असल में पूरा का पूरा बाज़ार इसी मूल मंत्र पर फल फूल रहा है कि वो अपने उपभोक्ताओं के जीवन को कैसे और अधिक सुगम बनाए. और इसी मूल मंत्र के इर्द गिर्द और बहुत सारी चीज़ें बड़े नामालूम तरीकों से बहुत कुशलता के साथ बुन दी जाती हैं. मसलन सुविधा को बड़े सुनियोजित लेकिन अदृश्य तरीकों से आपके स्टेटस के साथ जोड़ दिया जाता है. यह सब करने में विज्ञापन की भूमिका तो होती ही है, आजकल अन्य अनेक माध्यम भी यह सब करने में  जुटे नज़र आते हैं. बड़े और प्रभावी लोगों की जीवन शैली की चर्चा करके बहुत सारे उत्पादों और ब्राण्डों की ज़रूरत कब और कैसे आपके मन में जगा दी जाती है, आप खुद नहीं जान-समझ पाते हैं. अब उत्पाद ही नहीं बेचे जाते, जीवन-शैली भी बेची जाती है और  बेचने से पहले उसे खरीदने की चाह भी आपके मन में उगाई जाती है.

इस सारे खेल में रोचक बात यह रहती है कि कैसे किसी चीज़ को पहले बेकार या अनुपयोगी घोषित  किया  जाता है और फिर उसी को विण्टेज या दुर्लभ के नाम पर महंगे मोल में बेच दिया जाता है. और इसी तरह जिसकी आपको ज़रूरत न हो उसे भी आपकी ज़रूरत के रूप में स्थापित कर आपके मन में कृत्रिम अतृप्ति जगाकर एक अनुपयोगी उत्पाद को भी मनचाहे दामों पर आपको बेच दिया जाता है. अगर कभी शांत चित्त से आप इस सारे कारोबार को देखें तो बहुत रोचक चीज़ों की तरफ आपका ध्यान जाएगा.

बहुत पुरानी बात नहीं है जब लोग लम्बी चिट्ठियां लिखकर अपनी भावनाओं का इज़हार  किया करते थे. फिर टेलीफोन आया और आते ही उसने सुविधा का विस्तार करने के साथ-साथ पूरे मोहल्ले में आपकी इज़्ज़त में भी चार चांद लगा दिये. और फिर आया मोबाइल, यानि  पूरी दुनिया आपकी मुट्ठी में. लेकिन मोबाइल अपने साथ एक ब्राण्ड वैल्यू भी लेकर आया. आप किसी से बात कर पा रहे हैं, इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण यह हो गया कि आपके हाथ में जो हैण्ड सेट है वह किस ब्राण्ड का और  कितना महंगा है. और इसी के साथ आहिस्ता-आहिस्ता उस हैण्ड सेट में और सुविधाएं भी जुड़ने लगीं और अब तो हाल यह है कि मनुष्य से अधिक उसका मोबाइल स्मार्ट हो गया है. मोबाइल आया तो कुछ समय बाद  एक कैमरा भी उसमें घुस गया. यहां तक तो ठीक. अब शुरु होता है वो मज़ेदार खेल  जिसकी बात मैं करना चाहता हूं. मोबाइल में पीछे की तरफ वाला एक कैमरा अपर्याप्त  लगा तो आगे भी एक कैमरा जोड़ दिया गया. और इसी के बाद एक नई चीज़ हमारे जीवन में घुसी – सेल्फी! घुसी नहीं, घुसाई गई. अपने कैमरे से अपना फोटो आप पहले भी ले  सकते थे, लेकिन बाकायदा विज्ञापन करके सेल्फी समर्थ मोबाइल बेचे जाने लगे. और जब सेल्फी आ गई तो भला वेल्फी को आने से कौन रोक सकता था? वेल्फी यानि  स्व-वीडियो. और जब सेल्फी-वेल्फी  आई तो  उनमें मददगार बहुत सारे एप्स भी आए और एक डण्डी भी आ गई – सेफी स्टिक.

लेकिन हाल ही में इस सेल्फी-वेल्फी परिवार में जिस नए सदस्य का आगमन हुआ है वो सबसे अधिक हास्यास्पद  है. इस सदस्य का नाम है बेल्फी. बेल्फी यानि अपनी खींची हुई अपने नितम्बों की छवि! कहा जाता है कि किम कार्दाशियां, जिन्हें अपनी देह के इस भाग के प्रदर्शन में विशेष रुचि रहती हैं इस नई प्रवृत्ति की मुख्य प्रेरिका  हैं. इस बेल्फी के लिए अलग से डण्डियां  भी बाज़ार में आने को हैं  और उनकी खूब बिक्री की सम्भावनाएं हैं. मैं बस यह सोच रहा हूं कि सेल्फी-वेल्फी-बेल्फी के बाद कौन-सी ‘–फी’   की बारी है?

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 20 जनवरी, 2015 को इसी शीर्षक से प्रकाशित  आलेख का मूल पाठ.