Tuesday, November 12, 2013

यह हमारा निकम्मापन है या लालच?

सरकारें जनता के लिए बहुत सारे काम करती हैं, जैसे स्वास्थ्य सेवाएं सुलभ कराती हैं, शिक्षण संस्थाएं  चलाती हैं, रेल और बस चलाती हैं, डाकघरों और बैंकों का संचालन करती हैं और भी काफी कुछ करती हैं. सैद्धांतिक रूप से कोई सरकार कभी अपव्यय  नहीं करना  चाहती इसलिए अक्सर  होता यह है कि मांग की तुलना में पूर्ति कम होती है और लोगों को इंतज़ार करना पड़ता है. हारी-बीमारी में आप अस्पताल पहुंचते तो पाते हैं कि वहां पंजीकरण से लगाकर डॉक्टर को दिखाने तक और फिर जांच कराने से लगाकर भर्ती होने तक और फिर अगर ज़रूरत हो तो ऑपरेशन वगैरह करवाने तक हर जगह लम्बी प्रतीक्षा कतार है. आपको कहीं जाना है तो पता लगता है कि ट्रेन में एक महीने की वेटिंग है, डाकखाने जाते हैं तो एक पोस्टकार्ड खरीदने या एक रजिस्ट्री करवाने के लिए आधा घण्टा क्यू में खड़ा रहना पड़ता है. और आज़ादी के बाद से हम सब यह करते-करते इतने अभ्यस्त हो चुके हैं कि प्रतीक्षा करना हमें अखरता भी नहीं है.

ऐसा नहीं है कि सरकारें जनता की ज़रूरतों के प्रति असंवेदनशील होती हैं. वे इन सुविधाओं में वृद्धि भी करती हैं, लेकिन सरकारी कार्यप्रणाली ही कुछ ऐसी है कि सोचने और करने के बीच वक़्त का काफी लम्बा फासला रहता है. किसी अस्पताल की शैयाओं और डॉक्टरों की संख्या में वास्तव में वृद्धि होते होते इतना समय लग जाता है कि तब तक ज़रूरत फिर काफी बढ़ चुकी होती है और वह वृद्धि ऊँट के मुंह में जीरे के समान लगने  लगती है.

जब से देश में निजीकरण की हवा बहने लगी है, बहुत सारी सुविधाएं निजी क्षेत्र में भी उपलब्ध होने लगी हैं और जो लोग साधन सम्पन्न हैं वे निशुल्क सुलभ सरकारी सेवाओं की बजाय इन सशुल्क सेवाओं की तरफ भी जाने लगे हैं. निजी अस्पताल, निजी स्कूल कॉलेज, निजी बैंकों, कूरियर सेवाओं  वगैरह  का कारोबार खूब फल फूल रहा है. निश्चय ही कुछ मामलों में ये निजी सेवाएं सरकारी सेवाओं से बेहतर भी हैं. इनके परिसर बेहतर प्रबन्धित हैं,  और यहां जो लोग सेवाएं देते हैं, उनका व्यवहार भी आम तौर पर सरकारी सेवा देने वालों के व्यवहार से बेहतर होता है. बात  को स्पष्ट कर दूं. सरकारी सेवा देने वालों का व्यवहार दाता जैसा होता है और वे हमेशा आप पर एहसान करने वाली मुद्रा में रहते हैं, जबकि निजी क्षेत्र में जिन लोगों से आपका साबका पड़ता है वे आपके साथ अधिक सम्मानपूर्ण बर्ताव करते हैं, क्योंकि उन्हें मालूम होता है कि आपकी शिकायत उनकी नौकरी को ख़तरे में डाल सकती है.

लेकिन इधर मैं यह देख रहा हूं कि निजी क्षेत्र भी कई मामलों में सरकारी क्षेत्र जैसा होता जा रहा है. बहुत सारे मित्रों को स्मरण होगा कि जब हमारे यहां कूरियर सेवाओं की शुरुआत हुई थी तो हर चिट्ठी की पावती (जिसे पीओडी – प्रूफ ऑफ डिलीवरी कहा  जाता था) मिलती थी. अब मैं पाता हूं कि कुछ बहुत महंगी कूरियर सेवाओं के सिवा अधिकांश में यह व्यवस्था नहीं  रह गई है. आप किसी महंगे अस्पताल में जाते हैं और पाते हैं कि वहां भी पहले पर्ची बनवाने के लिए और फिर डॉक्टर को दिखाने के लिए आपको खासा इंतज़ार करना पड़ता है. उन लोगों को तो अपनी सुविधाओं का विस्तार करने में और नए लोगों की भर्ती करने में उन तमाम बाधाओं से नहीं गुज़रना पड़ता है जिनसे सरकारी तंत्र को गुज़रना पड़ता है, फिर भी हालात एक से क्यों होते हैं? निजी शिक्षण संस्थाओं की तो बात ही मत कीजिए. वहां के शिक्षकों से बात कीजिए तो शोषण की अनेक व्यथा-कथाएं आपको सुनने को मिल जाएंगी. कम वेतन, अधिक से अधिक काम. अब अगर ऐसे शोषित शिक्षक बच्चों से दुर्व्यवहार भी करें तो क्या ताज्जुब? कभी-कभी लगता है कि निजी और सरकारी शिक्षा  संस्थानों में बस परिसरों और शिक्षकों की टीम टाम का फर्क़ रह गया है.
                                
इस स्थिति की हास्यास्पद और एक हद तक अपमानजनक परिणति हाल ही में नगर के एक लोकप्रिय ग्राम्य रिसोर्ट में देखने को मिली. यह स्थल पर्यटकों के बीच बेहद लोकप्रिय है और गुलाबी नगरी में आने वाला हर पर्यटक एक बार तो यहां ज़रूर ही जाना चाहता है. इस बार वहां जाना हुआ तो मौज मज़े की बजाय भीड़-भड़क्के का माहौल देखने को मिला. यानि जितनी उस स्थान की क्षमता है उससे काफी अधिक पर्यटक वहां थे. और इस सबकी दारुण परिणति इस बात में हो रही थी कि वहां की भोजनशाला में प्रवेश करने से पहले आपको लगभग एक घण्टा धक्का-मुक्की वाले क्यू में खड़े रहना पड़ रहा था. कह सकता हूं कि लंगरों का माहौल इससे बेहतर होता है. हालत यह थी कि अन्दर लोग पंगत में बैठ कर जीम रहे थे और दरवाज़े पर खड़े लोग आंखें गड़ाये अपनी तमाम भंगिमाओं से जैसे उन्हें कह रहे थे – ‘अबे भुक्खड़! अब तो उठ! बहुत भकोस लिया!’ मैं सोच रहा था कि अगर ये लोग अपनी सुविधाओं का  विस्तार नहीं कर सकते तो कम से कम यह तो कर सकते हैं कि अपने इस स्थल की क्षमता निर्धारित  कर दें और उससे अधिक लोगों को विनम्रतापूर्वक वापस लौटा दिया करें! पश्चिम के अपने प्रवासों के दौरान मैंने देखा है कि हर रेस्तरां के बाहर यह अंकित होता है कि उसमें कितने लोगों को लिए जगह है और वे लोग उस क्षमता से अधिक लोगों को प्रवेश नहीं देते हैं. हमारे यहां अगर ऐसा नहीं होता है तो इसे आप हमारा लालच कहेंगे या निकम्मापन? 


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जयपुर से प्रकाशित अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत दिनांक 12 नवंबर 2013 को प्रकाशित आलेख  का मूल पाठ. 

Tuesday, November 5, 2013

प्रवक्ता प्रशिक्षण महाविद्यालय

इधर जब से वीवीआईपी लोगों के सरकारी मेहमान बनने का सिलसिला परवान चढ़ा है, उनके प्रवक्ताओं की मांग और महत्व में भी बड़ा उछाल आया है. जब तक ये सरकारी मेहमान नहीं बने थे, किसी को पता भी नहीं था कि इनके पास भी प्रवक्ता नामक पुछल्ला है. लेकिन जब से हुज़ूर अन्दर हुए हैं, प्रवक्ता ही हैं जो बिना नागा छोटे पर्दे पर अपनी काबलियत के जलवे बिखेरते नज़र आते हैं. इन प्रवक्ताओं का काम है बड़ा मुश्क़िल. आखिर दागदार को बेदाग साबित करना कोई बच्चों का खेल थोड़े ही है! जैसा ये  खुद कहते हैं, आजकल मीडिया ट्रायल का ज़माना है और उसी मीडिया ट्रायल में ये अपने पूरे दमखम के साथ अपने मालिक को पाक दामन साबित करने के लिए तमाम तरह के करतब करते नज़र आते हैं.

मुझे यह उम्मीद है कि वीवीआईपी लोगों के सरकारी मेहमान बनने का यह सिलसिला चलता रहेगा और इसलिए इनके प्रवक्ताओं की मांग भी बढ़ेगी. शिक्षा के क्षेत्र में अपने लम्बे अनुभव और फिलहाल फुर्सत में होने के कारण मैं सोच रहा हूं कि क्यों न एक प्रवक्ता प्रशिक्षण महाविद्यालय खोल लिया जाए! इस दिशा में मैंने कुछ चिंतन किया है. उसी को आपके सामने पेश कर रहा हूं. अगर आप भी कुछ सुझाव देंगे तो मेरी योजना और बेहतर हो जाएगी, और अगर आपका समर्थन मिला तो मैं जल्दी ही यह महाविद्यालय शुरु करके देश की सेवा कर सकूंगा.  इतना  तो मैंने जान ही लिया है कि अपने यहां जो कुछ भी होता है वो देश के लिए होता है, खुद के लिए नहीं. यहां तक कि अपनी जेब का पैसा खर्च करके तीर्थ यात्रा पर जाने वाले भी अपने लिए कुछ नहीं मांगते हैं, देश के लिए ही मांगते हैं.

मेरी सोच  यह है कि  इस महाविद्यालय में प्रवेश के लिए किसी शैक्षिक योग्यता की  कोई ज़रूरत नहीं होनी चाहिए. जो भी चाहे प्रवेश ले सकता है. लेकिन अगर वो लफ्फाज हो, अगर बिना रुके, बिना किसी की टोका-टोकी से  प्रभावित हुए, और बिना यह सोचे कि जो वह बोल रहा है उसका पूछे गए सवाल से कोई लेना-देना है भी या नहीं, तो वो हमारे महाविद्यालय का एक बेहतर विद्यार्थी साबित हो सकता है. प्रवेश मिल जाने के बाद हम सबसे पहले तो उसे सौ दौ सौ शेर, इतने ही श्लोक और दस-बीस उद्धरण अंग्रेजी के रटवाएंगे. एक पीरियड  प्रैक्टिकल का  भी होगा  जहां विद्यार्थियों को बहुत ऊंची आवाज़ में बोलने का अभ्यास कराया जाएगा. उस कालांश  में उन्हें यह भी सिखाया जाएगा कि अगर सामने वाला कोई वज़नी तर्क दे, या उनसे कोई ऐसा सवाल पूछ लिया जाय जिसका जवाब उनके पास न हो या जिसका जवाब देना उसके बॉस के हितों के अनुकूल न हो तो किस  तरह उन्हें  अपनी आवाज़ को तार सप्तक तक ले जाकर सामने वाले की आवाज़ को दबा देना है. जब सामने वाले की बात या उसका सवाल लोग सुनेंगे ही नहीं तो बॉस के हित की कुछ न कुछ रक्षा तो हो  ही जाएगी.

हम अपने इन विद्यार्थियों को यह भी सिखाएंगे कि एंकर या चर्चा के अन्य प्रतिभागी चाहे उनके बारे में कितनी ही प्रतिकूल टिप्पणी क्यों न करे, उन्हें  अविचलित रहना चाहिए. मसलन सामने वाला कहे कि हमने जो पूछा है आप उसका जवाब नहीं दे रहे हैं, तो भी इसे उसको अनसुना करके वही कहते रहना चाहिए और अगर कुछ और न सूझे तो उसी बात को दुबारा-तिबारा कहने से भी नहीं हिचकना चाहिए. हम अपने इन विद्यार्थियों को बहुत सारी शाश्वत और सैद्धांतिक बातें भी कंठस्थ करवा देंगे ताकि जब ये किसी ऐसे सवाल में  उलझें जिसका जवाब देना इनके मालिक के हित में न हों तो वह सिद्धांत चर्चा शुरु कर दें और सामने वाले से पूरी दबंगई से पूछें कि बताओ आप इससे सहमत हो या नहीं! अगर सामने वाला प्रतिप्रश्न करे कि इस बात का मूल चर्चा से क्या सम्बन्ध है तो इन्हें चाहिए कि उसी बल्कि उससे भी अधिक अत्मविश्वास से अपने खज़ाने से दूसरा प्रसंग निकाल कर सामने वालों के मुंह पर दे मारें! वे हतप्रभ रह जाएंगे और आपका काम बन जाएगा.

हमारा सबसे अधिक बल इस बात पर होगा कि हमारे यहां प्रशिक्षण लेने वालों में आत्मविश्वास भरपूर  मात्रा में आ जाए. हम ठोकपीट कर उन्हें ऐसा बना देंगे कि किसी भी स्थिति में उनका आत्मविश्वास न डगमगाए. अपने प्रशिक्षण को बेहतर बनाने के लिए हम ऑडियो वीडियो सामग्री की भी खूब मदद लेंगे और कुछ कामयाब प्रवक्ताओं, कुछ बाबाओं, कुछ नेताओं, कुछ कॉमेडी कलाकारों के वीडियो बार-बार अपने विद्यार्थियों को दिखा कर उनके अनुभव को धार देंगे.

हमें पूरा भरोसा है कि हमारे यहां से प्रशिक्षित प्रवक्ता अधम से अधम, नीच से नीच, पापी से पापी बॉस का बहुत कामयाबी से बचाव कर सकेंगे और टीवी के पर्दे पर होने वाली बहसों और चर्चाओं में उन्हें उजली छवि वाला साबित कर पाएंगे.   जैसा मैंने शुरु में ही कह दिया है इस क्षेत्र में रोज़गार की अपरिमित सम्भावनाएं हैं और उनमें और वृद्धि की पूरी उम्मीद है.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक 'न्यूज़ टुडै' में मेरे साप्ताहिक कॉलम 'कुछ इधर कुछ उधर' के अंतर्गत दिनांक 5 नवंबर, 2013 को किंचित परिवर्तित रूप में प्रकाशित  मेरी टिप्पणी  का मूल आलेख! 

Wednesday, October 30, 2013

कौन बदला है: समय, संगीत या सुनने वाले?

जयपुर से प्रकाशित अपराह्न समाचार पत्र न्यूज़ टुडै में 'कुछ इधर कुछ उधर' शीर्षक से मरा एक साप्ताहिक कॉलम पिछले कुछ समय से प्रकाशित हो रहा है. इस बार मैंने स्वर्गीय मन्ना डे को याद करते हुए एक टिप्पणी लिखी थी. कुछ व्यावहारिक कारणों  से  वह टिप्पणी प्रकाशित नहीं हो सकी और मुझे उसमें थोड़ा परिवर्तन करना पड़ा. 

यहां ये दोनों टिप्पणियां प्रस्तुत हैं. पहले मेरी मूल टिप्पणी, और फिर उसके नीचे वो टिप्पणी जो बदलाव के बाद आज 30 अक्टोबर को प्रकाशित हुई. 

1. 
हाल ही में जयपुर में ए आर रहमान को कंसर्ट में देखने-सुनने का मौका मिला. क्या तो चकाचक इंतज़ाम और क्या झक्कास प्रस्तुतियां! तीन घण्टे कब और कैसे बीते पता ही नहीं चला. रोशनी की चकाचौंध, तकनीक के नायाब चमत्कार, लगभग कानों  को फाड़ देने वाली (लेकिन फिर भी  कर्कश नहीं) ध्वनि. और भीड़! उसका तो कहना ही क्या! युवा लोग जिस तरह कुर्सियों पर खड़े होकर और अनवरत नाचते हुए उस कंसर्ट का आनन्द ले रहे थे उसे देखना एक अलग तरह का अनुभव था. और जब इतना सब कुछ हो तो यह बात करने की ज़रूरत ही कहां रह जाती है कि उस कंसर्ट में क्या गाया और क्या बजाया गया! हमारे आस-पास जो भीड़ थी, उसे भी शायद इस बात से कम ही ताल्लुक था कि रहमान और उनकी मण्डली क्या गा-बजा रही है! उन्हें मतलब था तो इस बात से कि वे अपने खर्चे पैसों का पूरा मज़ा लें, और अपने मोबाइलों में जितना ज़्यादा मुमकिन हो उन क्षणों को कैद कर लें ताकि बाद में दोस्तों और परिचितों को बता सकें कि वे भी वहां मौज़ूद थे.  इससे यह न समझ लिया जाए कि उस कंसर्ट में संगीत नहीं था, या दोयम दर्ज़े का था. बेशक बेहतरीन संगीत वहां था, लेकिन जो लोग वहां, और कम से कम हमारे इर्द-गिर्द थे, उनकी बहुत कम रुचि उस संगीत में थी. रहमान के संगीत बद्ध किए सुरीले गानों में तो और भी कम.

यह बात मुझे बहुत शिद्दत से याद आई मन्ना डे के निधन की खबर पढ़ने के बाद. असल में जैसे ही मैंने मन्ना डे के निधन की खबर पढ़ी, मुझे कुछ बरस पहले पढ़ी एक कहानी याद आने लगी. कहानी जाने-माने कवि कुमार अम्बुज की लिखी हुई थी, और मन्ना डे को लेकर थी. कहानी का शीर्षक मुझे तुरंत याद नहीं आया. मैंने फेसबुक की अपनी वॉल पर उस कहानी का ज़िक्र किया, और कोई दस मिनिट भी नहीं बीते होंगे कि एक मित्र ने वह कहानी वहां पोस्ट कर दी. मैंने भी फिर से वह कहानी पढ़ी. कहानी का शीर्षक है ‘एक दिन मन्ना डे’. यह कहानी पढ़ते हुए ही मुझे रहमान के इस कंसर्ट का खयाल आया. मैं सोचने लगा कि फर्क संगीत में है या संवेदनाओं में? इस कहानी में नरेटर मन्ना डे का एक कंसर्ट सुनने  जाता है और वहां ‘प्रसाधन’ में अनायास उसकी मुलाकात एक अजीब इंसान से हो जाती है. वह आदमी रुंआसा है. जब हमारा नरेटर उससे उसकी उदासी का सबब पूछता है तो हमें पता चलता है कि वो आदमी इस बात को लेकर फिक्रमंद है कि मन्ना डे, जो 86 बरस के हो गए हैं, जब नहीं रहेंगे तो क्या होगा! – अजीब दुःख है ना यह! लेकिन वो आदमी सच्चा संगीत रसिक है, डूब कर संगीत सुनता है, बल्कि संगीत को ओढ़ता-बिछाता है. अपने प्रिय गायक को सुनते हुए महसूस करता है कि जैसा वो सामने गाते हैं वैसा कोई भी तकनीक प्रस्तुत नहीं कर सकती है. उसे इस बात का भी अफसोस है कि आज पुराने और अच्छे  गाने ढूंढे से भी नहीं मिलते हैं. और इसीलिए उसे फिक्र है कि डेढ़ सौ  दो सौ साल बाद लोग मन्ना डे की आवाज़ कैसे सुन पाएंगे!  हमारा नरेटर उसके ग़म को हल्का करने के लिए मज़ाक में कहता भी है कि तीस-चालीस साल बाद तो हम दोनों भी नहीं रह जाएंगे, फिर आप इतनी दूर की फिक्र क्यों कर  रहे हो, जिसके जवाब में वो कहता है कि  ‘आप नहीं समझ सकते!’


कहानी में आगे क्या होता है, यह बात यहां प्रासंगिक नहीं है इसलिए मैं भी  उसे छोड़ता हूं और वापस रहमान पर लौटता हूं. मतलब उनके श्रोताओं-दर्शकों  पर. मैं  सोच रहा था कि इतनी  भारी भीड़ में क्या एक भी श्रोता ऐसा  होगा जो इस महान संगीतकार के बारे में इस तरह से सोचता होगा? इस कहानी में तो वो व्यक्ति कहता है कि “ज़रूरत पड़ने पर मन्ना डे को मैं अपना खून, अपनी किडनी, अपना लिवर तक दे सकता हूं. लेकिन मन्ना डे  को यह बात मालूम होनी चाहिए ताकि वक़्त-ज़रूरत आने पर वे किसी तरह का संकोच न करें!” रहमान के इस कंसर्ट को देखते-सुनते हुए मुझे लगा कि समय बहुत बदल गया है. आज शायद संगीत को ऐसे लगाव के साथ नहीं सुना जाता  है. लोग  उसमें डूबते  नहीं हैं, बस सतह पर ही तैर कर लौट आते हैं. उनके  पास खूब  सारा पैसा है, दो-चार पाँच दस  हज़ार रुपये  का टिकिट खरीदते हैं और चाहते हैं  कि बदले में जो मिले वह पूरी तरह से ‘पैसा वसूल’ हो. अपनी तरफ से सुख को निचोड़ लेने  में वो भी कोई कसर नहीं छोड़ते हैं.  हो सकता है मेरा सोचना ग़लत हो. व्यक्ति  नहीं बदला हो, संगीत ही बदल गया हो. शायद आज के संगीत को उस तरह से सुना ही नहीं जा सकता हो जिस तरह से मन्ना डे के ज़माने के संगीत को सुना जाता था.  आप क्या सोचते हैं?  

2. 
मन्ना डे चले गए! वैसे भी, इधर संगीत में जिस तरह के बदलाव हुए हैं उनके चलते मन्ना डे केन्द्र में नहीं रह गए थे. कुछ उम्र का तकाज़ा भी था. उम्र का असर आवाज़ पर पड़ना स्वाभाविक है और जिस फिल्मी दुनिया के लिए मन्ना डे गाते रहे, उसमें बूढों के लिए गाने की सम्भावनाएं नहीं के बराबर है. लेकिन मैं जिस बदलाव की बात करना चाहता हूं वह कलाओं से हमारे रिश्तों में  आया बदलाव है. राजेन्द्र यादव के निधन पर बहुत सारे लोगों ने याद किया है कि किस तरह वे उनकी किताबों खरीदने के लिए बेताब रहा करते थे. यही हाल संगीत का भी रहा है. मैं अपने एक मित्र से जुड़ा एक अनुभव आपसे साझा करना चाहता हूं.  बात 1967 की है. वर्ष  इसलिए याद है कि उसी साल मैंने नौकरी शुरु की थी. अपने एक प्राध्यापक साथी के घर गया तो उनके पास मोहम्मद रफी और बेग़म अख़्तर की आवाज़ वाला गालिब की ग़ज़लों का एक एल पी देखा. मैंने उनसे इसरार किया कि वे मुझे वह रिकॉर्ड सुनवाएं. उन्होंने बहुत सरलता से जवाब दिया कि उनके पास रिकॉर्ड प्लेयर नहीं है. मैंने तुरंत  पूछा कि अगर आपके पास रिकॉर्ड  प्लेयर नहीं है तो फिर आपने यह एल  पी क्यों खरीदा? उनका दिया जवाब आज भी मुझे ज्यों का त्यों याद है! उन्होंने कहा, “दुर्गा बाबू! जब मेरे पास पैसे इकट्ठे हो जाएंगे तभी तो मैं रिकॉर्ड प्लेयर खरीदूंगा. लेकिन तब अगर यह रिकॉर्ड न मिला तो? इसलिए अभी खरीद कर रख लिया है.”  

और उनकी कही यह बात मुझे मन्ना डे के निधन की खबर पढ़ने के बाद बहुत शिद्दत से याद आई. असल में जैसे ही मैंने मन्ना डे के निधन की खबर पढ़ी, मुझे कुछ बरस पहले पढ़ी एक कहानी याद आने लगी. कहानी जाने-माने कवि कुमार अम्बुज की लिखी हुई थी, और मन्ना डे को लेकर थी. कहानी का शीर्षक मुझे तुरंत याद नहीं आया. मैंने फेसबुक की अपनी वॉल पर उस कहानी का ज़िक्र किया, और कोई दस मिनिट भी नहीं बीते होंगे कि एक मित्र ने वह कहानी वहां पोस्ट कर दी. मैंने भी फिर से वह कहानी पढ़ी. कहानी का शीर्षक है ‘एक दिन मन्ना डे’. यह कहानी पढ़ते हुए ही मुझे अपने उन प्रिय मित्र का खयाल आया. मैं सोचने लगा कि आज कितना कुछ बदल गया है!  इस कहानी में नरेटर मन्ना डे का एक कंसर्ट सुनने  जाता है और वहां ‘प्रसाधन’ में अनायास उसकी मुलाकात एक अजीब इंसान से हो जाती है. वह आदमी रुंआसा है. जब हमारा नरेटर उससे उसकी उदासी का सबब पूछता है तो हमें पता चलता है कि वो आदमी इस बात को लेकर फिक्रमंद है कि मन्ना डे, जो 86 बरस के हो गए हैं, जब नहीं रहेंगे तो क्या होगा! – अजीब दुःख है ना यह! लेकिन वो आदमी सच्चा संगीत रसिक है, डूब कर संगीत सुनता है, बल्कि संगीत को ओढ़ता-बिछाता है. अपने प्रिय गायक को सुनते हुए महसूस करता है कि जैसा वो सामने गाते हैं वैसा कोई भी तकनीक प्रस्तुत नहीं कर सकती है. उसे इस बात का भी अफसोस है कि आज पुराने और अच्छे  गाने ढूंढे से भी नहीं मिलते हैं. और इसीलिए उसे फिक्र है कि डेढ़ सौ  दो सौ साल बाद लोग मन्ना डे की आवाज़ कैसे सुन पाएंगे!  हमारा नरेटर उसके ग़म को हल्का करने के लिए मज़ाक में कहता भी है कि तीस-चालीस साल बाद तो हम दोनों भी नहीं रह जाएंगे, फिर आप इतनी दूर की फिक्र क्यों कर  रहे हो, जिसके जवाब में वो कहता है कि  ‘आप नहीं समझ सकते!’


कहानी में आगे क्या होता है, यह बात यहां प्रासंगिक नहीं है इसलिए मैं भी उसे छोड़ता हूं और बदले हुए वक़्त पर लौटता हूं. आज कलाओं  की उपलब्धता बढ़ी है लेकिन उनके साथ हमारा लगाव वैसा नहीं रह गया है जैसा पहले हुआ करता था.  इस कहानी में वो व्यक्ति कहता है कि “ज़रूरत पड़ने पर मन्ना डे को मैं अपना खून, अपनी किडनी, अपना लिवर तक दे सकता हूं. लेकिन मन्ना डे  को यह बात मालूम होनी चाहिए ताकि वक़्त-ज़रूरत आने पर वे किसी तरह का संकोच न करें!” क्या आज भी यही स्थिति है? क्या आज हममें से कोई अपने प्रिय कवि, कथाकार, गायक, चित्रकार वगैरह के लिए इस तरह की बात सोच या कह सकता है? हमारे पास पैसे की आमद बढ़ी है, तकनीक ने चीज़ों को सहज और सुलभ कर दिया है. लेकिन जिस  परिमाण में यह सब हुआ है, उसी अनुपात में इनसे हमारी संलग्नता कम हुई है. क्या इस बात पर फिक्र  नहीं होनी चाहिए? 
   

Tuesday, October 22, 2013

महाभोज जारी आहे....

महाभोज जारी आहे...

चुनाव का बिगुल बज गया है. योद्धा अपने-अपने हथियार लेकर और जिरह बख्तर धारण कर युद्ध के लिए तैयार हो गए हैं. अभी वार्मिंग अप चल रहा है. असल युद्ध तो थोड़ा दूर है. पहले युद्ध होगा, फिर महायुद्ध. युद्ध बोले तो विधान सभा के चुनाव, और महायुद्ध बोले तो लोक सभा के चुनाव. वैसे आजकल यह युद्ध शब्द इतना लोकप्रिय हो चला है कि सब जगह युद्ध ही होता है. सुरों का युद्ध, शब्दों का युद्ध और यहां तक कि पकवान बनाने का भी युद्ध! ऐसे में चुनाव जो कि लड़ा जाता है, वो तो युद्ध है ही.  जब युद्ध होगा तो शोर-शराबा (यलगार हो!) भी होगा, खून-खराबा भी होगा और मार-काट भी होगी. तैयारियां जारी है. शोर-शराबा शुरु हो ही चुका है. शब्दों के तीर-तलवार-गोले-बम सब चल रहे हैं. आक्रमण  और प्रति आक्रमण जारी हैं. एक पक्ष दूसरे पर वार करता है तो दूसरा पक्ष पहले पर पलट वार करता है. एक पक्ष गरजता है, जवाब में दूसरा पक्ष बरसता है. रोज़ यह हो रहा है. रण भूमि हैं अख़बार और टेलीविज़न का पर्दा. एक पक्ष अपने शब्द बाण छोड़ता है तो हमें पता चल जाता है कि दूसरा पक्ष कितना पतित है, लेकिन दूसरे ही दिन जब दूसरा पक्ष अपने तरकश के तीर चलाकर  इस पक्ष के कपड़े तार-तार करता है तो हमें पता लगता है  कि कम तो यह पक्ष भी नहीं है. नागनाथ – सांपनाथ वाला मामला है.  और इन्हीं अधमों-पतितों-निकम्मों-नाकारों-बेगैरतों वगैरह में से किसी को हमें अपना बहुमूल्य वोट देना है. मुझे लगता है कि मतदान का दिन आते-आते तो हम अपने तमाम उम्मीदवारों के बारे में, उनके प्रतिपक्षियों की कृपा से,  इतना ज़्यादा जान जाएंगे कि बजाय किसी को वोट देने के नोटा (उपर्युक्त में से कोई नहीं) के विकल्प का प्रयोग  करना ही ज़्यादा सही लगेगा.

लेकिन क्या यह नोटा का विकल्प स्थिति में कोई बदलाव लाएगा? क्या आपके-मेरे और अपन जैसे बहुत सारों के ‘इनमें से कोई नहीं’ विकल्प को चुन लेने से इनमें से किसी एक का चुना जाना रुक जाएगा? कोई न कोई चुना तो फिर भी जाएगा! बस इतना-सा फर्क़ पड़ेगा कि चुनाव के बाद आने वाली खबरों में एक इबारत और जुड़ जाएगी, कि इतने प्रतिशत मतदाताओं ने इनमें से किसी को भी योग्य नहीं पाया! यानि किसी को न चुनने से तो किसी ऐसे  उम्मीदवार को जो हमारे मानदण्डों पर सबसे ज़्यादा खरा साबित हो रहा हो, चुनना ही बेहतर होगा.

अभी के तमाम शोर-शराबे में मुझे बार-बार मन्नू भण्डारी का लोकप्रिय उपन्यास ‘महाभोज’  याद आ रहा है. सरोहा नामक एक गांव में एक दलित युवक बिसेसर की हत्या हो जाती है. इस मामूली आदमी की हत्या अचानक महत्वपूर्ण इसलिए हो जाती है कि डेढ महीने बाद ही वहां विधानसभा की एक खाली सीट के लिए उपचुनाव होना है. मैदान में एक तरफ दा साहब और उनके समर्थक हैं तो दूसरी तरफ सुकुल बाबू और उनके समर्थक. ये लोग किस निर्ममता से उस बेचारे बिसेसर की मौत को अपने लिए एक महाभोज में तब्दील  कर देते हैं यही इस उपन्यास का कथ्य है. आज जब अपने नेताओं की ज़बानी मैं यह सुनता हूं कि इस पक्ष ने यह नहीं किया और उस पक्ष ने वो नहीं किया, इसने ग़रीबी नहीं हटाई और उसने महंगाई कम नहीं की, इसने मस्जिद नहीं बचाई और उसने मन्दिर नहीं बनाया, तो मुझे यही एहसास होता है कि मैं, इस देश का आम नागरिक,  खेत में पड़ी एक लाश हूं और ऊपर आकाश में बहुत सारे गिद्ध मुझे अपना जीमण बनाने को मेरे सर के ऊपर मण्डरा रहे हैं! 


बस एक चुप-सी लगी है....

इन दिनों निर्वस्त्र करने का अभियान ज़ोरों पर है. पहले एक बाबा जी का नम्बर लगा, फिर उनके सपूत का. वो वो बातें सामने आईं कि दिल दहल गया. लेकिन जिस समय में हम रह रहे हैं उसमें सच और झूठ के बीच अंतर करना बहुत मुश्क़िल हो गया है. अगर बाबा जी पर आरोप लगाने वाले तमाम संचार माध्यमों पर अपनी बात कह रहे हैं  तो ऐसे भी लोगों की कमी नहीं है जो इन तमाम आरोपों के मूल में किसी मां-बेटे का ‘हाथ’  देख रहे हैं. वैसे अपने देश में यह आम परम्परा है. जब भी किसी पर कोई आरोप लगता है,  मैं इंतज़ार करने लगता हूं कि अब कोई न कोई वीर पुरुष (या वीरांगना) आकर यह कहेगा/कहेगी कि यह सब अमुक का रचा हुआ षड़यंत्र है. और मुझे निराश नहीं होना पड़ता है. नेताओं और बाबाओं के बाद इस बार बहुत दिन बाद साहित्य के एक बाबा का भी नम्बर लगा. इन दिनों पत्र-पत्रिकाओं से ज़्यादा चहल-पहल फेसबुक और ट्विट्टर पर रहती है. तो पिछले दिनों इसी  सोशल मीडिया पर हिन्दी के एक जाने-माने कथाकार और स्त्री विमर्श के पुरोधा के बर्ताव को लेकर खूब हो-हल्ला हुआ. असल में हुआ यह कि एक युवा कथाकार ने एक लम्बा वक्तव्य जारी कर अपने साथ हुए दुर्व्यवहार के सन्दर्भ में इस वरिष्ठ कथाकार की स्त्री-विषयक संवेदनहीनता को रेखांकित किया. फिर तो कढ़ी में उबाल आना ही था. एक अन्य चर्चित यात्रा वृत्तांतकार ने इस पूरे वृत्तांत को दूसरे एंगल से देखा-दिखाया और उसके बाद बहुत सारे शब्द वीर मैदान में कूद पड़े. साहित्य पीछे रह गया, चर्चा के केन्द्र में साहित्यकार, उनके शब्द और कर्म के बीच का अंतर, उनकी नैतिकता, उनका सामाजिक चिंतन  जैसे मुद्दे आ गए. वो-वो बारीक बातें की गईं कि अपने अनपढ़ होने का एहसास शिद्दत से होने लगा. इस सारे विमर्श की ख़ास बात यह रही कि युवा कथाकार ने तो विस्तार से अपनी बात कही, लेकिन वरिष्ठ कथाकार अब तक मौन व्रत धारण किए हैं. जब तक उनका पक्ष सामने नहीं आ जाता, तस्वीर धुंधली ही रहेगी. जिज्ञासु हंसों को नीर-क्षीर विवेक के लिए वरिष्ठ कथाकार की पत्रिका के अगले अंक का बेसब्री से इंतज़ार है.   


जयपुर से प्रकाशित अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत 22 अक्टोबर, 2013 को किंचित सम्पादित रूप में प्रकाशित टिप्पणियों का मूल रूप.  


Wednesday, October 16, 2013

और ज़रा-सी दे दे.....

और ज़रा-सी दे दे

बड़े विकट समय में जी रहे हैं हम लोग. ‘साईं इतना दीजिए जा में कुटुम समाय, मैं भी भूखा ना रहूं साधु ना भूखा जाए’ वाला वो वक़्त बहुत पीछे छूट चुका है जब हमारी ज़रूरतें सीमित हुआ करती थीं और जितना हमारे पास होता था, उससे बहुत अधिक की चाह नहीं होती थी और इतना समय हमारे पास होता था कि अपनी ज़िन्दगी के प्याले का रस चख सकें.  अब सब कुछ बदल गया है. ‘थोड़ा है थोड़े  की ज़रूरत है’  सिर्फ एक फिल्मी गाने के बोल हैं, हमारे जीवन का मूल मंत्र नहीं.  ‘और ज़रा-सी दे दे साक़ी’ वाली हालत है हम सबकी.

अभी कल ही कुछ दोस्त सदी के महानायक की चर्चा कर रहे थे. किसी इण्टरव्यू में खुद उन्होंने बताया था कि उन्हें तनिक भी फुर्सत नहीं होती है. होगी भी कहां से? क्या-क्या नहीं करते हैं वे! फिल्में, टीवी, विज्ञापन और भी न जाने क्या-क्या! सीमेण्ट से लगाकर तेल और पेन बाम तक सब कुछ तो बेचते हैं वे. गुजरात भी. एक मित्र दुःखी होकर बोल पड़े, आखिर क्या करेंगे वे इतने पैसों का? हां, इन कामों में से ज़्यादातर तो वे पैसों के लिए ही करते हैं! अपनी अनेक बीमारियों और बढ़ती उम्र के बावज़ूद वे इतना कर लेते हैं, इस बात  की तारीफ की जाए या इसके लिए उनसे सहानुभूति व्यक्त की जाए?
  
उधर ये बातें हो रही थीं और इधर मेरे मन के पर्दे पर रूसी कथाकार टॉल्स्टाय की प्रसिद्ध  कहानी ‘एक व्यक्ति को कितनी ज़मीन चाहिए’ चल रही थी  जिसका भावानुवाद हमारे अपने जैनेन्द्र कुमार ने कितनी ज़मीन शीर्षक से किया था. इस कहानी का नायक पोखम नामक एक किसान है. एक रात वह सपना देखता है कि उसके राज्य में मुनादी हो रही है कि जो भी बिना श्रम किए धनी होना चाहता है, वह कल सबेरे मैदान में आयोजित प्रतियोगिता में भाग लेकर अपनी किस्मत आजमा सकता है.  दो तीन बहुत आसान शर्ते हैं.  प्रतियोगी सूर्योदय के पहले प्रतियोगिता स्थल पर पहुंच जाए. सूर्य निकलते ही  उसे दौडऩा प्रारंभ करना होगा.  दिनभर दौड़कर वह जितनी जमीन को घेर लेगा, वह उसकी अपनी हो जाएगी, लेकिन सूर्यास्त के समय  उसे ठीक उसी स्थल तक पहुंचना होगा, जहां से उसने दौड़ प्रारंभ की थी. पोखम दौड़ता चला जाता है. पचास-साठ मील ज़मीन नाप लेता है लेकिन सूर्य के डूबते-डूबते जैसे ही वह लौट कर दौड़ शुरु होने वाली जगह पहुंचता है, उसकी सांसें थम जाती है. “किस्मत की खूबी देखिए टूटी कहां कमन्द दो-चार हाथ जबके लबे-बाम रह गया” से भी बुरी स्थिति. जितनी ज़मीन उसने नापी थी, वो सब अब उसके लिए बेमानी हो जाती है. उसके भाईबंद और पड़ोसी उसे दफनाने के लिए वहीं साढ़े तीन हाथ लम्बा और दो हाथ चौड़ा एक गड्ढा खोदते हैं. उसे बस उतनी-सी ही ज़मीन की तो ज़रूरत थी!

सदी के महानायक तो खैर फिर भी मेहनत करते हैं और कमाते हैं, अपने चारों तरफ हम ऐसे ऐसे महापुरुषों  को देखते या उनके बारे में पढ़ते सुनते हैं जो तमाम ग़ैर कानूनी तरीकों से पैसा बटोरने में लगे हैं और जिनकी धन-लिप्सा का कोई ओर छोर नहीं है.  मैं अक्सर सोचता हूं कि वे इस धन का करेंगे क्या? क्या उन्हें कभी इसका आनंद लेने की फुर्सत भी मिलेगी या कि वे भी एक दिन  उस अभागे पोखम की तरह..... 
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चीयर्स!


सामाजिक मीडिया हमारे समय की एक नई प्रवृत्ति है. पहले लोग  प्रत्यक्ष मिला करते थे, अब वर्चुअल स्पेस में मिलते हैं. पहले हमें अपने सामाजिक वृत्त (सोशल सर्कल) पर गर्व होता था, अब हम इस बात पर गर्व करते हैं कि फेसबुक पर हमारे इतने दोस्त हैं और हमारी किसी टीप को इतने लाइक्स मिले हैं. कई लोग इस बदलाव पर बहुत दुःखी होते हैं – क्या से क्या हो गया!  लेकिन  मुझे इस बदलाव का कोई मलाल नहीं है. भाग-दौड़ भरी ज़िन्दगी में, फैलते जा रहे शहरों में, ट्रैफिक की मारा-मारी में, भला पहले की तरह का मेल-मिलाप कैसे मुमकिन है? और अगर वो मुमकिन नहीं है तो उसका जैसा भी विकल्प है, उसका स्वागत क्यों न किया जाए! मुझे तो अच्छा लगता है जब मेरे जन्म दिन पर सौ दौ सौ चार सौ ‘मित्र’ मुझे मुबारक़बाद  देते हैं! जिन लोगों से मैं कभी भी नहीं मिला हूं, और शायद कभी मिलूंगा भी नहीं, वे अगर मेरे बारे में सोचते हैं और मेरी खुशी में इज़ाफा करने के लिए चन्द लमहे निकालते हैं तो मुझे खुश क्यों नहीं होना चाहिए? जब हालात तेज़ी से बदलते जा रहे हैं तब हम भी अपने तौर-तरीके क्यों ना बदलें! अंतत: दोस्तों, सारी बात आपके नज़रिये की है. आप चाहें तो गिलास को आधा खाली मान कर टसुए बहा लें और चाहें तो उसे आधा भरा हुआ मान कर सेलिब्रेट कर लें!  


जयपुर से प्रकाशित अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में प्रकाशित मेरे साप्ताहिक कॉलम इधर उधर के अंतर्गत 15 अक्टोबर 2013  को प्रकाशित किंचित संक्षिप्तिकृत टिप्पणियों का मूल पाठ.  

Thursday, October 10, 2013

इधर-उधर : 1



भाभीजी – आप तो ऐसी न थीं!

भारतीय समाज में कुछ रिश्ते हंसी-मज़ाक और छेड़छाड़ के लिए भी जाने जाते हैं. जैसे देवर-भाभी का रिश्ता, या जीजा-साली का रिश्ता. कहना अनावश्यक है कि इन रिश्तों में शरारत का जो तत्व मुमकिन रहा है उसकी भी अपनी मर्यादाएं रही हैं. सब कुछ इस तरह से मुमकिन रहा कि रिश्तों की शुचिता पर कोई आंच  न आए. लेकिन बदलते वक़्त का आप क्या करेंगे? पिछले कुछ समय से एक भाभी विशेष की हमारे यहां बड़ी चर्चा रही है. और चर्चा भी कुछ ऐसी कि सरकार को उस पर रोक लगाने को भी मज़बूर होना पड़ा. जी हां, मेरा इशारा उन्हीं तीन अक्षरों के नाम वाली भाभीजी की तरफ है. नाम  इसलिए नहीं ले रहा हूं कि अगर संयोग से किन्हीं भाभीजी का भी नाम वही हो तो उन्हें बेवजह शर्मिन्दा न होना पड़े. इधर हाल ही में वे ही भाभीजी फिर से चर्चा में हैं. चर्चा की वजह यह है कि उन भाभीजी के कार्टून किरदार के रचयिता को अब अपने कार्टून के लिए मॉडल के रूप में एक सचमुच की अदाकारा मिल गई हैं, और वे इस बात को छिपा भी नहीं रही हैं कि अब उन भाभीजी के रूप में उनका ही चेहरा-मोहरा इस्तेमाल किया जाएगा. बल्कि  छिपाना तो दूर, वे तो आह्लादित हैं कि अब अनगिनत युवा अपनी फैंटेसियों में उन्हें शुमार कर सकेंगे. क्या इसे हमारे समाज में विकसित हो रही नई नैतिकता के रूप में देखा जाना चाहिए? कुछ समय पहले तक जिस बात से लोगों को लज्जा का अनुभव होता था, अब नहीं होता है. वैसे तो कला जगत में, और विशेष रूप से साहित्य और फिल्मों में यह बदलाव काफी पहले से नज़र आने लगा था! साहित्य के घनघोर पाठकों को  कृष्णा सोबती की ‘मित्रो मरजानी’  ज़रूर याद होगी जो पूरी ठसक और धौंस के साथ अपने शरीर और मन की चाह की बात बहुत बिन्दास शब्दावली में करती है. यहीं यह भी याद दिलाता चलूं कि यह 1967 की रचना है. कृष्णा सोबती की यह चारित्रिक सृष्टि मित्रो अपने पति सरदारी लाल से सम्पूर्ण शारीरिक सुख न मिलने पर सिर्फ  कुढ़ती ही नहीं, अपनी कुढ़न को सास और देवरानी के सामने खुलकर व्यक्त भी करती है और पति की ग़ैर हाज़री में उसके दोस्त प्यारो से नैन मटक्का भी कर लेती है. ‘इस देह  से जितना जस-रस ले लो वही खट्टी कमाई है’ कहने वाली मित्रो जब बच्चा न होने के बारे में अपनी सास और जेठानी से ताने सुनती है पलटकर कह देती है कि तुम्हारे लाल में ही दमखम नहीं है तो मैं क्या करूं? वह तो यह सवाल तक उठा लेती है कि ‘अपने लड़के बीज डालें तो पुण्य, दूजे डालें तो पाप!’ इस बिन्दास मित्रो के अलावा  साहित्य में भाभियां तो इतनी  मिल जाती हैं कि उनके लिए अलग से भाभीवाद नामक एक बाड़ा ही बनाया जा चुका है.  फिल्मों में तो नैतिकता के स्थापित मानों को ध्वस्त करने और नई नैतिकता गढ़ने के इतने प्रसंग मिल जाएंगे कि उनके लिए एक कॉलम तो क्या एक पोथा भी कम होगा.  लेकिन फिर भी यह कहना ज़रूरी है  कि इस अभिनेत्री द्वारा ‘उन’ भाभीजी के रूप में अपनी आकृति के इस्तेमाल की इस घोषणा को एक ऐसी घटना के रूप में देखा जाना चाहिए जिसके शायद दूरगामी परिणाम हों!


कम्प्यूटर पर पाटा संस्कृति का पुनर्जन्म 


पहले घरों के बाहर चबूतरे हुआ करते थे जहां शाम ढले दिन-भर के कामकाज से मुक्त हो बुज़ुर्ग लोग दिन भर के घटनाक्रम की जुगाली किया करते थे. बीकानेर में तो एक अलग पाटा संस्कृति ही विकसित हो गई थी. लेकिन समय के साथ काफी कुछ बदला है. चबूतरे और पाटे अब अपनी रौनक खो चुके हैं. अलबत्ता मॉर्निंग वॉक के नाम पर सुबह-सुबह पार्कों वगैरह  में मिलने वाले लोग घूमते-फिरते वही काम किसी सीमा तक कर लेते हैं. लेकिन इधर मार्क जुगकरबर्ग जी की कृपा से दुनिया भर के उन लोगों को जो कम्प्यूटर से परहेज़ नहीं बरतते हैं, एक नई पाटा संस्कृति सुलभ हो गई है. जी हां. मेरा इशारा फेसबुक की तरफ ही है. यहां लोग खुलकर अपनी कहते हैं और दूसरों की सुनते - मेरा  मतलब पढ़ते  हैं. अपना दिल टूटने से लगाकर नमो-ममो तक के हाल-चाल और उस हाल-चाल पर हर तरह की टीका-टिप्पणी का रस यहां लिया जा सकता है. कुछ लोग इस सार्वजनिक मंच पर आकर अपने गन्दे पोतड़े (डर्टी लिनेन!) धोते हैं तो कुछ इसे आत्म प्रचार का सर्वश्रेष्ट माध्यम मानकर इसका भरपूर इस्तेमाल कर दूसरों को हलकान किए रहते हैं.  फेसबुक का सबसे मज़ेदार फीचर है टैग करना! टैग करना बोले तो अपने हाथों में आपका चेहरा पकड़ कर उसे अपनी तरफ घुमा कर कहना, ज़रा सुनिए तो! किसी ने कोई कविता लिखी और कर दिया चालीस-पचास साहित्य रसिकों को टैग! किसी को किसी बाबा की कोई बात पसन्द आई तो सौ सवा सौ लोगों तक उस बात को पहुंचाना अपना पुनीत कर्तव्य और अधिकार मान बैठे. यह मर्ज़ एक महामारी का रोग ले चुका है. हमारे शहर के ही एक कवि-कथाकार-पत्रकार  मित्र तो इस रोग से इस हद तक पीड़ित हुए कि उन्होंने बाकायदा घोषणा करके टैग करने का अपराध करने वालों को अनफ्रैण्ड करने की हिंसक कार्यवाही तक कर डाली. फेसबुक की दुनिया में अगर कोई किसी को अनफ्रैण्ड करता है इस बात का बहुत बुरा माना जाता है. अनफ्रैण्ड करना एक तरह से जाति बहिष्कार का ही नया संस्करण है. अब किसी का पुनर्जन्म होगा तो इतना बदलाव तो होगा ही!



जयपुर से प्रकाशित अपराह्न-दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम 'इधर-उधर' में 09 अक्टोबर 2013 को किंचित संक्षिप्त रूप में प्रकाशित टिप्पणियों का मूल पाठ.  

Wednesday, October 9, 2013

हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन....

आज इलाहाबाद  की एक संस्था से एक पत्र आया तो कई पुरानी यादें ताज़ा हो गईं.


पहले इस पत्र की बात कर ली जाए. 


इलाहाबाद की इस संस्था अखिल भारतीय हिन्दी सेवी संस्थान के प्रचार मंत्री और ‘ठेंगे पर सब मार दिया’ जैसे विलक्षण नाम वाले मासिक के सम्पादक मधुकर मिश्र जी ने अपने पत्र द्वारा मुझे सूचित किया  मेरा "शुभ नाम संस्थान में ‘राष्ट्रभाषा-गौरव’ तथा ‘साहित्य-शिरोमणि’ मानद उपाधि के लिए प्रस्तावित” हुआ है. उन्होंने अपने पत्र में मुझे सलाह दी कि यदि मुझे यह प्रस्ताव स्वीकार हो तो “संस्थान के नियमों का समय से पालन करते हुए” पंजीकरण कराने की कृपा करूं. संस्थान का सम्बद्ध  नियम यह है कि “मानद उपाधि हेतु आमंत्रित साहित्यकार”  मात्र 2100/- की राशि भेजे.  पत्र प्राप्त करने वाले को कोई असुविधा न हो इसलिए इस पत्र में यह भी स्पष्ट कर दिया गया  कि यह राशि (जिसे पंजीकरण  राशि का सम्मानजनक नाम दिया गया है) मनी ऑर्डर (या बैंक ड्राफ्ट) के ज़रिये भेजी जाए और यह भी कि राशि श्री राजकुमार शर्मा (जिनके परिचय में बताया गया है कि वे “वर्चस्वी पत्रकार/ साहित्यकार/ सदगृहस्थ-संत”  और ‘जागरण’ के प्रधान सम्पादक तथा ‘ठेंगे पर सब मार दिया’ के सलाहकार सम्पादक हैं) के व्यक्तिगत नाम से ही भेजी जाए और यह भी कि “अध्यक्ष  या संस्थान का उल्लेख न करें क्योंकि बैंक अकाउण्ट राजकुमार शर्मा जी के शुभ नाम से है.”   


मैंने महज़ विनोद के लिए यह बात फेसबुक पर पोस्ट कर दी, तो स्वाभाविक ही है कि अनेक मित्रों की किसम-किसम की प्रतिक्रियाएं भी वहां आईं. कुछेक मित्रों ने यह लिखा कि उन्हें भी ऐसा ही प्रस्ताव मिला है, तो कुछेक ने चुटकियां भी लीं. लेकिन इसी सब के बीच अमरीका में रह रहे हमारे एक मित्र ने मीडिया दरबार (mediadarbar.com)  नामक एक वेबसाइट का एक लिंक भी पोस्ट कर दिया जिसमें विस्तार  से यह खबर छपी है कि  “हिंदी और पंजाबी के प्रख्यात साहित्यकार और मीडिया विशेषज्ञ अमुक जी (नाम जान-बूझकर नहीं दे रहा हूं –दुर्गा.)  को अखिल भारतीय हिंदी सेवी संस्थान, इलाहाबाद की ओर से राष्ट्र भाषा गौरव प्रतिष्ठित पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा.  हिंदी सेवी संस्थान ने ‘उन’ के दो दशक से ज्यादा समय में हिंदी साहित्य के प्रति किए कार्यों को देखते हुए उन्हें यह सम्मान देने की घोषणा की है.  संस्थान के सचिव और संपादक मधुकर मिश्र के मुताबिक, हिंदी साहित्य में डा. अमुक जी के अमूल्य योगदान को देखते हुए उन्हें इस राष्ट्रीय स्तर के प्रतिष्ठित पुरस्कार से सम्मानित करने का फैसला किया गया है.”  कहना अनावश्यक है कि इस ख़बर के स्रोत स्वयं सम्मानित साहित्यकार महोदय ही होंगे. यह सम्भावना इस बात से भी पुष्ट  होती है कि इस समाचार में आगे उनकी अनेक उपलब्धियों  का बखान है. सम्मानित करने वाली संस्था के पास शायद ही वे तमाम जानकारियां हों. इस तरह की संस्थाएं आपकी उपलब्धियों का लेखा-जोखा रखने की जहमत नहीं उठाया करतीं.  यह देखना बहुत मज़ेदार है कि जो कृत्य हम सबको हास्यास्पद (या कहें अपमानजनक) लग रहा है उसी को डॉ अमुक जी ने अपने सम्मान की तरह प्रचारित कर डाला है.

और यह सब पढ़ते हुए मुझे अपने ही शहर जयपुर के एक और स्वनामधन्य तथाकथित लेखक की याद हो आई. असल में वे शिक्षा से जुड़े थे, मैनेजमेण्ट के व्यक्ति थे,  एक बड़े और नामी कॉलेज के प्राचार्य थे, और खूब उत्साही थे. मेरे भूतकालिक प्रयोग का कोई बुरा अर्थ न लें. वे स्वस्थ हैं, लेकिन बस आजकल उनकी सक्रियता कम हो गई है. नाम उनका इसलिए भी नहीं ले रहा हूं कि अकादमिक क्षेत्रों में उनकी कोई पहचान नहीं है. उनके बारे में भी स्थानीय स्तर के अखबारों में बहुत थोड़े-थोड़े अंतरालों से इस तरह के सम्मानों की ख़बरें छपती रहती थीं. उन सम्मानों में आम तौर पर उन्हें भारत की, एशिया की या विश्व की महान प्रतिभाओं/ लेखकों/शिक्षाशास्त्रियों आदि में शुमार किया जाना  बताया जाता था. हम लोग जो इस तरह के सम्मानों की हक़ीक़त  से वाक़िफ थे, इन खबरों को पढ़कर मुस्कुरा कर रह जाते थे. लेकिन एक बार, शुद्ध शरारत के भाव से मैंने उन्हें फोन कर ऐसे ही किसी सम्मान पर जब बधाई दी तो उन्होंने जिस विनम्रता से मेरी  बधाई को स्वीकार किया, उसका मैं कायल हुए बिना नहीं रह सका. मुझे मानना पड़ा कि उन्हें इस सम्मान की सम्माननीयता में तनिक भी संशय नहीं है. 

और इन्हीं दो बातों से मेरी कुछ पुरानी  यादें  ताज़ा हो आईं. बात शायद 1980 के आसपास की है. तब मैं राजकीय महाविद्यालय, सिरोही में हिंदी पढ़ाता था. एक दिन डाक में  एक लिफ़ाफ़ा आया. उसके भीतर रखे सुमुद्रित पत्र  में लिखा था कि वह संस्था (या कम्पनी) देश की विभिन्न क्षेत्रों की चुनी हुई प्रतिभाओं  की एक डाइरेक्टरी (निर्देशिका) प्रकाशित करने जा रही है और उसमें प्रकाशन के लिए मेरे नाम का भी चयन किया गया है. मुझसे अपना विस्तृत परिचय और प्रकाशनोपरांत उस डाइरेक्टरी  को रियायती मूल्य पर खरीदने के सहमति पत्र पर हस्ताक्षर मांगे गए थे. उस पत्र के साथ एक प्रारूप भी  संलग्न था जिसमें मैं अपनी तरह के अन्य विशेष योग्यता वाले मित्रों के नाम सुझा सकता था. और इसके बाद इस तरह के पत्र आने का एक क्रम ही बन गया. धीरे-धीरे पता चला कि कॉलेज  के अन्य साथियों के पास भी वैसे ही पत्र आते  हैं. इन पत्रों में प्रकाशित होने वाली डाइरेक्टरियों के शीर्षक बदलते थे, शेष सब कुछ अपरिवर्तित  रहता था. एक दिन मुझे  न जाने क्या सूझा कि उनके भेजे हुए प्रारूप में अपने कॉलेज के सभी चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों (यानि चपरासियों) के नाम भरकर भेज दिए. और लीजिए! पन्द्रह दिन भी नहीं बीते होंगे कि मेरे कॉलेज के सारे चतुर्थ श्रेणी  कर्मचारियों के नाम वे सफेद आकर्षक लिफाफे आ पहुंचे जिनमें उन्हें यह सूचित किया गया था कि उनके नाम का चयन विश्व की सर्वोत्कृष्ट प्रतिभा के रूप में किया गया है. अभी मैंने अपने जिन स्थानीय मित्र का ज़िक्र किया, वे इसी तरह की उपलब्धियों का ढिंढोरा बरसों तक पीटते रहे हैं.

जो लोग इस तरह के सम्मान- पुरस्कार आदि बांटते (बेचते?) हैं उनका हित तो बहुत स्पष्ट है. यह उनके धन्धे का एक तरीका है. सामान नहीं बेचा, सम्मान बेच लिया. बल्कि सामान में तो कुछ लागत भी लगती है, सम्मान तो बिना लागत का माल है.  बिना कुछ खर्च किए  कमाई हो जाए तो क्या बुरा है!  मुझे लगता है कि जितने लोगों को वे इस तरह के प्रस्ताव पत्र भेजते हैं, उनमें से अगर दस-बीस प्रतिशत लोग भी उनका प्रस्ताव स्वीकार कर लेते होंगे (और इतने तो अवश्य ही करते होंगे) तो उनकी दुकान अच्छी तरह चल जाती होगी. लेकिन मैं अक्सर यह सोचता हूं कि जिन लोगों में थोड़ी भी प्रतिभा है, थोड़ी भी समझ  है, और थोड़ा-भी आत्म सम्मान है, वे भला इस तरह के प्रस्ताव क्यों स्वीकार करते होंगे? क्या उन्हें यह लगता है कि उनके पास जितनी प्रतिभा है वो इतने से सम्मान के लिए भी नाकाफी है? वे जो भी करते या रचते हैं उससे उन्हें कोई सम्मान नहीं मिलने वाला है. इसलिए चलो सम्मान खरीद ही क्यों ना लिया जाए? किसे  पता चलेगा? उनकी समझ का स्तर शायद यही है कि वे सोचते हैं कि ऐसा सम्मान सिर्फ उन्हीं को प्रस्तावित किया जा रहा है! और सम्मान बेचने वाले और उन जैसे खरीदने वाले के अलावा किसी को इस सौदे की भनक भी नहीं लगेगी. और या फिर यह भी मुमकिन है कि वे बहुत शातिर हों और यह मानते हों कि क्या फर्क़ पड़ेगा, अगर कुछ लोग इस सम्मान  की हक़ीक़त  को जानते भी होंगे तो. सभी तो नहीं जानते होंगे! अगर अख़बार में सम्मान की खबर हज़ार लोग पढ़ेंगे तो उनमें से आधे तो मान ही लेंगे कि सम्मान उनकी महानता की वजह से मिला है. अगर इतने लोग भी उनको महान मान लेंगे तो उनका अहं तो संतुष्ट हो ही जाएगा. शायद ऐसे ही लोगों के दम पर सम्मान बेचने वालों की दुकानदारी चलती रहती है.
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medaidarbar.com पर  और फिर दिनांक 08 अक्टोबर 2013 को जनसत्ता के 'समांतर' कॉलम में प्रकाशित टिप्पणी.  

Sunday, September 29, 2013

राजनीति पर मूर्ति का आवरण

28 सितम्बर 2013 की टाइम्स ऑफ  इण्डिया में लेखक और पूर्व राजनयिक श्री पवन के वर्मा का एक लेख छपा है 'व्हेन आर्ट मास्क्स पॉलिटिक्स'. मुझे यह लेख इतना ज़्यादा अच्छा लगा कि तुरंत इसका अनुवाद करने बैठ गया. तो प्रस्तुत है इस लेख का मेरा किया अनुवाद:  


नरेन्द्र मोदी एक उम्दा वक्ता हैं और बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार चुने जाने के बाद  हरियाणा के रेवाड़ी में उनके पहले सार्वजनिक भाषण ने इस बात के पर्याप्त  प्रमाण भी दे दिए हैं. लेकिन सरदार पटेल की उनकी भरपूर  तारीफ से मुझे आश्चर्य हुआ है. मोदी ने घोषणा की है कि वे भारत के हर गांव से लोहा इकट्ठा  करके गुजरात में स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी से दुगुनी ऊँचाई की सरदार पटेल की एक मूर्ति लगवाएंगे जो दुनिया की सबसे बड़ी मूर्ति होगी.

मुझे आश्चर्य इसलिए हुआ  कि सरदार पटेल ही वे व्यक्ति थे जिन्होंने उस आरएसएस पर प्रतिबन्ध लगाया था जिसके सदस्य नरेन्द्र मोदी 15 बरस की कच्ची उम्र में बने थे और खुद उनकी स्वीकारोक्ति के अनुसार जिसका उनके जीवन और चिंतन प्रक्रिया को ढालने में अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थान रहा है. जब 2 फरवरी, 1948 को “देश में काम कर रही आज़ादी को ख़तरे में डालने वाली और देश के नाम को कलंकित करने वाली नफरत और हिंसा की शक्तियों को उखाड़ फेंकने के”  अपने इरादे  के तहत भारत सरकार ने आरएसएस पर प्रतिबन्ध लगाया तब पटेल ही भारत के गृह मंत्री थे.

आरएसएस के तत्कालीन सरसंघचालक गुरु माधव सदाशिव गोलवलकर के नाम लिखे अपने 11 सितम्बर, 1948 के एक पत्र में सरदार आरएसएस के नेताओं की बेबाक भर्त्सना करते हैं: “उनके सारे भाषण साम्प्रदायिक विष से भरे हुए हैं. हिन्दुओं में जोश का संचार करने और उनके संरक्षण के लिए संगठित करने के लिए ज़हर फैलाना ज़रूरी नहीं था. इस ज़हर के अंतिम परिणाम के रूप में देश को गांधीजी के मूल्यवान जीवन से हाथ धोना पड़ा.”

महत्वपूर्ण बात यह है कि महात्मा गांधी की हत्या में आरएसएस और हिन्दू महासभा की भूमिका को लेकर सरदार  के मन में कभी कोई संशय नहीं था. पण्डित नेहरु को लिखे 27 फरवरी, 1948 के पत्र में वे यह बात बहुत स्पष्टता के साथ कहते हैं: “हिंदू महासभा की कट्टर शाखा ने सीधे सावरकर के निर्देशन में इस षड़यंत्र की योजना  तैयार की और इसे क्रियान्वित  किया.... निस्संदेह आरएसएस और हिन्दू महासभा के जो लोग गांधी के सोचने के तरीकों और उनकी नीतियों के विरोधी थे उन्होंने उनकी हत्या का स्वागत किया.”  

श्यामा प्रसाद मुखर्जी को लिखे एक अन्य पत्र (18 जुलाई, 1948) में वे इसी स्थिति  को  दुहराते हैं: “जहां तक आरएसएस और हिन्दू महासभा का सवाल है...हमारी रिपोर्ट्स इस बात की पुष्टि करती हैं कि इन दोनों संगठनों और ख़ास तौर पर पहले वाले संगठन की वजह से देश में एक ऐसा वातावरण बनाया गया जिसमें यह भयंकर त्रासदी सम्भव  हो सकी.”

प्रसंगवश, हालांकि अपने मुकदमे के समय नाथू राम गोडसे ने आरएसएस के साथ अपने किसी स्पष्ट सम्बन्ध से इंकार किया था, कई वर्षों के बाद जनवरी, 1994 में फ्रण्टलाइन पत्रिका को दिए गए एक इण्टरव्यू में उनके भाई गोपाल सच्चाई को लेकर एकदम स्पष्ट थे: “सभी भाई आरएसएस में थे, नाथूराम, दत्तात्रेय, मैं और गोविंद. बल्कि आप कह सकते हैं कि हम लोग अपने घर की बजाय आरएसएस में ही बड़े हुए. हमारे लिए वह एक परिवार की तरह था. नाथूराम आरएसएस में एक बौद्धिक कार्यवाह बन गए.  उन्होंने भी यह कहा है और इसे कभी छोड़ा  नहीं.” 

सरदार पटेल गांधीजी और उनके समावेशी नज़रिये के पक्के अनुयायी  थे. जिस संगठन आरएसएस ने मोदी का मार्गदर्शन  किया और उनके दुनियावी नज़रिये को गढ़ा उसके प्रति उनका प्रबल विरोध एक दस्तावेज़ी सच्चाई है. तो फिर पटेल को अपना कर और उनके प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए उनकी दुनिया की सबसे बड़ी मूर्ति बनाकर मोदी क्या कहने की कोशिश कर रहे हैं?

एक विचार तो यह हो सकता है कि आरएसएस के बारे में सरदार की राय से मोदी सहमत हों. आखिर इतने बड़े मुद्दे पर एक उत्साही प्रशंसक और उसके नव प्राप्त नायक के बीच इतना घोर मतभेद तो नहीं हो सकता है. अगर हो तो मोदी को स्पष्ट ऐसा कहना चाहिए. और अगर नहीं तो उन्हें  इस बात को स्वीकार करना चाहिए कि वे चुने हुए विस्मरण और स्वार्थपूर्ण छल के एक सोच-समझे  प्रयास के द्वारा पटेल को सिंहत्व प्रदान कर रहे हैं, यानि देश के एकीकरण के लिए पटेल के प्रयास का गुणगान और जिन लोगों ने साम्प्रदायिक उन्माद और हिंसा की राजनीति के द्वारा देश को तोड़ने की कोशिश की उनके बारे में उनके कठोर विचारों की जानबूझकर अवहेलना.  

इस बात के  सुनिश्चित प्रमाण उपलब्ध  हैं कि मोदी को बीजेपी का नेतृत्व प्रदान करने के राजनीतिक चयन के बारे में आरएसएस ने एक महत्वपूर्ण  भूमिका निबाही है. ये प्रमाण इस बारे में भी बहुत स्पष्ट हैं कि मोदी आरएसएस की विचारधारा से बेहद प्रभावित हैं. जब सबसे ज्यादा समय तक और सर्वाधिक ‘सफल’ आरएसएस मुखिया गोलवलकर सरसंघचालक थे (1940-73) तब मोदी एक प्रचारक थे.

कहा जाता है कि मोदी ने उनकी तारीफ में एक किताब भी लिखी थी. तो क्या वे गोलवलकर के बहुत स्पष्टता से कहे गए इन विचारों से भी सहमत हैं कि भारत अनन्य रूप से एक हिन्दू राष्ट्र है, जिसमें अन्य विश्वासों वाले लोगों के लिए कोई जगह नहीं  है यहां तक कि उन्हें नागरिक अधिकर भी प्राप्त नहीं हैं? क्या वे, यहूदियों को समूल नष्ट कर देने के कृत्य को देश के लिए सबसे बड़े गर्व की बात मानने के लिए नाज़ी जर्मनी की गोलवलकर की तारीफ का भी समर्थन करते हैं? क्या वे भी गोलवलकर की ही तरह यह मानते हैं कि मनुस्मृति ही, जो कि शूद्रों  को ब्राह्मणों की सतत सेवा में लगाना चाहती है और स्त्रियों की अधीनता की बात करती है, देश के लिए एकमात्र वैध कानून है? मेरा खयाल है कि बीजेपी ने अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में इस प्रतिगामी सोच का महत्व कम करने और अपनी  राजनीतिक अपील का विस्तार करने का एक साहसिक प्रयास किया था.  लेकिन मोदी के उत्थान के साथ बीजेपी की निर्देशक विचारधारा के रूप में आरएसएस के  मूल दर्शन की वापसी हुई है.

अगर सरदार पटेल इस घटनाक्रम को देख रहे होंगे तो निस्संदेह वे बहुत दुःखी और साथ ही बहुत नाराज़ भी होंगे. नाराज़ इस बात के लिए कि जिनका  उन्होंने खुले तौर पर विरोध किया  वे ही चालाकी के साथ उन्हें अपना रहे हैं. और दुःखी इस बात के लिए कि उनके ये नए भक्त भारत  का जो प्रारूप पेश कर रहे हैं वह  उस प्रारूप से कितना अलहदा है जिसके लिए उन्होंने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया था.
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Sunday, September 15, 2013

शिक्षक दिवस पर स्मरण अपने ‘गुरुजी’ का!


 लगभग 35 साल खुद शिक्षक रह चुकने के भी दस बरस बाद भी मेरे मन में अपने अनेक शिक्षकों की स्मृतियां संचित  हैं.  करीब 16 बरसों (उन दिनों पूर्व प्राथमिक जैसा कुछ तो होता नहीं था) के अपने अध्ययन काल में अनेक शिक्षकों से पढ़ने और सीखने का मौका मिला. उनमें से बहुतों  की स्मृति तो  धूमिल होते-होते अब लगभग अदृश्य हो गई है, लेकिन कुछ की स्मृति कुछ इस तरह से ताज़ा है जैसे आज भी मैं उनसे शिक्षा ग्रहण कर रहा हूं. कभी मौका मिला तो उनमें से कुछेक को सलीके से स्मरण करूंगा, अभी तो अपने (निस्संकोच कह सकता हूं) सर्वाधिक प्रिय ‘गुरुजी’ को याद करना चाहूंगा. जी हां, वे मेरे लिए ‘सर!’ न होकर ‘गुरुजी’  ही थे.

मैं बात कर रहा हूं मोहन लाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ प्रकाश आतुर की. अपने ज़माने के बहुत लोकप्रिय कवि थे वे, राजनीतिकर्मी भी और राजस्थान साहित्य अकादमी के ‘न भूतो न भविष्यति’ अध्यक्ष भी. उदयपुर के महाराणा भूपाल कॉलेज में 1961 में पहली बार बी.ए. प्रथम वर्ष के विद्यार्थी के रूप में मैं उनके सम्पर्क में आया,  लेकिन स्नातक अध्ययन के तीन वर्ष बहुत सामान्य रहे. बी.ए. पास करने के बाद विषम पारिवारिक परिस्थितियों के कारण मेरी पढ़ाई पर विराम लग गया, लेकिन एक संयोग की वजह से, डॉ आतुर के सहज स्वाभाविक और खुले व्यक्तित्व ने उस विराम को पूर्ण विराम बनने से पहले अल्प विराम में परिवर्तित कर एम. ए. हिंदी में मेरे प्रवेश का, और इसी के साथ मुझे अपना बना लेने का पथ प्रशस्त कर दिया. उनसे विद्यार्थी का मेरा रिश्ता दो बरस का ही नहीं रहा.  बाद में जब मैंने पी-एच.डी. करने का फैसला किया तो उन्हीं को अपना गाइड बनाया और 1984 में उनका पहला पी-एच.डी. होने का सौभाग्य भी प्राप्त किया. सितम्बर 1989 में उनके स्वर्गवास होने तक उनसे मेरा रिश्ता न सिर्फ बना रहा, लगातार प्रगाढ़ होता गया. मुझे अब भी अच्छी तरह से याद है कि उदयपुर में उनकी स्मृति में आयोजित एक श्रद्धांजलि सभा में अनायास मेरे मुंह से यह बात निकल गई थी कि “मैं नहीं जानता कि पुनर्जन्म होता है या नहीं होता है. लेकिन अगर मेरा एक और जन्म हो तो मैं चाहूंगा  कि मेरा वो जन्म  प्रकाश  आतुर के बेटे के रूप में ही हो.”

वे एक प्रभावी शिक्षक थे, अपने विषय पर उनकी बहुत मज़बूत पकड़ थी. लेकिन उनकी जो बात उन्हें सामान्य शिक्षक से अलग करती है वो है अपने विद्यार्थियों के प्रति उनका गहनतम अनुराग. आर्थिक अभावों से भरे अपने विद्यार्थी काल  में उनकी निजी लाइब्रेरी की अनगिनत किताबों ने मुझे कभी यह महसूस नहीं होने  दिया कि  ‘काश! यह किताब भी  मेरे पास होती.’  उनकी किताबों को मैंने ऐसे बरता जैसे मेरे पिताजी उन्हें मेरे वास्ते खरीद कर रख गए हों! और किताबें ही क्यों, उनके प्रभाव का प्रयोग भी तो ऐसे ही किया. लेकिन ऐसा  हुआ कैसे? मैं परम संकोची, और उस ज़माने में कॉलेज शिक्षक का अलग ही रुतबा होता था. मुझ जैसा अति सामान्य और संकोची विद्यार्थी किसी प्रोफेसर के नज़दीक आ सके, इसकी दूर-दूर तक कोई सम्भावना नहीं थी. लेकिन फिर भी यह चमत्कार हुआ. और इस चमत्कार के मूल में था उनका अपना वत्सल व्यक्तित्व.  एक अनुभव को साझा करने से खुद को रोक नहीं पा रहा हूं. जिस दिन मुझे पी-एच.डी. की उपाधि मिलना तै हुआ उस दिन,  तब प्रचलित प्रथा के अनुसार,  शाम को एक बड़ी दावत मुझे आयोजित करनी चाहिए थी. लेकिन वो दावत डॉ आतुर ने अपने घर पर रखी. उस दावत में जो बहुत सारे लोग शरीक थे उनमें से एक तो आज केन्द्र सरकार में काबीना मंत्री हैं. दावत से ठीक पहले, मैंने बहुत संकोच के साथ  डॉ आतुर से अनुरोध किया कि इस दावत का व्यय भार मुझे वहन करने की अनुमति दें! लगभग तीस बरस बीत जाने के बाद भी उनका गुस्से से तमतमाया चेहरा मेरी स्मृति में ज्यों का त्यों बना हुआ  है. “तुम कौन होते हो? तुम कैसे कर सकते हो यह? आज डॉ आतुर के बेटे को पी-एच.डी. मिली है, तो खुशी भी वो ही मनाएगा!”


मैं चाहूं तो भी गिनती नहीं कर सकता कि कितनी बार उदयपुर में उनके घर भोजन किया और शाम बिताई है! जीवन में हर सुख दुःख में उनका वरद हस्त मुझ पर रहा. उन्होंने मुझे सब कुछ दिया, और बदले में मुझसे कभी कुछ  भी नहीं चाहा. आज जीवन की सन्ध्या वेला में जब पीछे मुड़कर देखता हूं तो पाता हूं कि डॉ आतुर ने मेरे जीवन की धारा बदल दी. अगर  वे  मेरी ज़िन्दगी में न आए होते तो मैं न जाने कहां और कैसा होता? उन्होंने मुझे पढ़ने को प्रेरित किया. उन्होंने मुझे साहित्य से जोड़ा. उन्होंने कॉलेज शिक्षक बनने की मेरी दबी हुई आकांक्षा को खाद-पानी दिया. उन्होंने मेरी पीठ पर हाथ रख कर मेरी रीढ़ को सीधी रहने की क्षमता प्रदान की. यह मेरा सौभाग्य था कि गुरु के रूप में मुझे वे मिले. उनकी पावन स्मृति को नमन!