Sunday, September 15, 2013

शिक्षक दिवस पर स्मरण अपने ‘गुरुजी’ का!


 लगभग 35 साल खुद शिक्षक रह चुकने के भी दस बरस बाद भी मेरे मन में अपने अनेक शिक्षकों की स्मृतियां संचित  हैं.  करीब 16 बरसों (उन दिनों पूर्व प्राथमिक जैसा कुछ तो होता नहीं था) के अपने अध्ययन काल में अनेक शिक्षकों से पढ़ने और सीखने का मौका मिला. उनमें से बहुतों  की स्मृति तो  धूमिल होते-होते अब लगभग अदृश्य हो गई है, लेकिन कुछ की स्मृति कुछ इस तरह से ताज़ा है जैसे आज भी मैं उनसे शिक्षा ग्रहण कर रहा हूं. कभी मौका मिला तो उनमें से कुछेक को सलीके से स्मरण करूंगा, अभी तो अपने (निस्संकोच कह सकता हूं) सर्वाधिक प्रिय ‘गुरुजी’ को याद करना चाहूंगा. जी हां, वे मेरे लिए ‘सर!’ न होकर ‘गुरुजी’  ही थे.

मैं बात कर रहा हूं मोहन लाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ प्रकाश आतुर की. अपने ज़माने के बहुत लोकप्रिय कवि थे वे, राजनीतिकर्मी भी और राजस्थान साहित्य अकादमी के ‘न भूतो न भविष्यति’ अध्यक्ष भी. उदयपुर के महाराणा भूपाल कॉलेज में 1961 में पहली बार बी.ए. प्रथम वर्ष के विद्यार्थी के रूप में मैं उनके सम्पर्क में आया,  लेकिन स्नातक अध्ययन के तीन वर्ष बहुत सामान्य रहे. बी.ए. पास करने के बाद विषम पारिवारिक परिस्थितियों के कारण मेरी पढ़ाई पर विराम लग गया, लेकिन एक संयोग की वजह से, डॉ आतुर के सहज स्वाभाविक और खुले व्यक्तित्व ने उस विराम को पूर्ण विराम बनने से पहले अल्प विराम में परिवर्तित कर एम. ए. हिंदी में मेरे प्रवेश का, और इसी के साथ मुझे अपना बना लेने का पथ प्रशस्त कर दिया. उनसे विद्यार्थी का मेरा रिश्ता दो बरस का ही नहीं रहा.  बाद में जब मैंने पी-एच.डी. करने का फैसला किया तो उन्हीं को अपना गाइड बनाया और 1984 में उनका पहला पी-एच.डी. होने का सौभाग्य भी प्राप्त किया. सितम्बर 1989 में उनके स्वर्गवास होने तक उनसे मेरा रिश्ता न सिर्फ बना रहा, लगातार प्रगाढ़ होता गया. मुझे अब भी अच्छी तरह से याद है कि उदयपुर में उनकी स्मृति में आयोजित एक श्रद्धांजलि सभा में अनायास मेरे मुंह से यह बात निकल गई थी कि “मैं नहीं जानता कि पुनर्जन्म होता है या नहीं होता है. लेकिन अगर मेरा एक और जन्म हो तो मैं चाहूंगा  कि मेरा वो जन्म  प्रकाश  आतुर के बेटे के रूप में ही हो.”

वे एक प्रभावी शिक्षक थे, अपने विषय पर उनकी बहुत मज़बूत पकड़ थी. लेकिन उनकी जो बात उन्हें सामान्य शिक्षक से अलग करती है वो है अपने विद्यार्थियों के प्रति उनका गहनतम अनुराग. आर्थिक अभावों से भरे अपने विद्यार्थी काल  में उनकी निजी लाइब्रेरी की अनगिनत किताबों ने मुझे कभी यह महसूस नहीं होने  दिया कि  ‘काश! यह किताब भी  मेरे पास होती.’  उनकी किताबों को मैंने ऐसे बरता जैसे मेरे पिताजी उन्हें मेरे वास्ते खरीद कर रख गए हों! और किताबें ही क्यों, उनके प्रभाव का प्रयोग भी तो ऐसे ही किया. लेकिन ऐसा  हुआ कैसे? मैं परम संकोची, और उस ज़माने में कॉलेज शिक्षक का अलग ही रुतबा होता था. मुझ जैसा अति सामान्य और संकोची विद्यार्थी किसी प्रोफेसर के नज़दीक आ सके, इसकी दूर-दूर तक कोई सम्भावना नहीं थी. लेकिन फिर भी यह चमत्कार हुआ. और इस चमत्कार के मूल में था उनका अपना वत्सल व्यक्तित्व.  एक अनुभव को साझा करने से खुद को रोक नहीं पा रहा हूं. जिस दिन मुझे पी-एच.डी. की उपाधि मिलना तै हुआ उस दिन,  तब प्रचलित प्रथा के अनुसार,  शाम को एक बड़ी दावत मुझे आयोजित करनी चाहिए थी. लेकिन वो दावत डॉ आतुर ने अपने घर पर रखी. उस दावत में जो बहुत सारे लोग शरीक थे उनमें से एक तो आज केन्द्र सरकार में काबीना मंत्री हैं. दावत से ठीक पहले, मैंने बहुत संकोच के साथ  डॉ आतुर से अनुरोध किया कि इस दावत का व्यय भार मुझे वहन करने की अनुमति दें! लगभग तीस बरस बीत जाने के बाद भी उनका गुस्से से तमतमाया चेहरा मेरी स्मृति में ज्यों का त्यों बना हुआ  है. “तुम कौन होते हो? तुम कैसे कर सकते हो यह? आज डॉ आतुर के बेटे को पी-एच.डी. मिली है, तो खुशी भी वो ही मनाएगा!”


मैं चाहूं तो भी गिनती नहीं कर सकता कि कितनी बार उदयपुर में उनके घर भोजन किया और शाम बिताई है! जीवन में हर सुख दुःख में उनका वरद हस्त मुझ पर रहा. उन्होंने मुझे सब कुछ दिया, और बदले में मुझसे कभी कुछ  भी नहीं चाहा. आज जीवन की सन्ध्या वेला में जब पीछे मुड़कर देखता हूं तो पाता हूं कि डॉ आतुर ने मेरे जीवन की धारा बदल दी. अगर  वे  मेरी ज़िन्दगी में न आए होते तो मैं न जाने कहां और कैसा होता? उन्होंने मुझे पढ़ने को प्रेरित किया. उन्होंने मुझे साहित्य से जोड़ा. उन्होंने कॉलेज शिक्षक बनने की मेरी दबी हुई आकांक्षा को खाद-पानी दिया. उन्होंने मेरी पीठ पर हाथ रख कर मेरी रीढ़ को सीधी रहने की क्षमता प्रदान की. यह मेरा सौभाग्य था कि गुरु के रूप में मुझे वे मिले. उनकी पावन स्मृति को नमन! 
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