Thursday, September 5, 2013

अपने अध्यापक साथियों को याद करते हुए....

अपने करीब साढ़े तीन दशक के अध्यापन  काल में अनगिनत शिक्षकों का साहचर्य मिला. उनमें से हरेक की कोई न कोई ख़ासियत थी. लेकिन वक़्त बीतने के साथ बहुत सारी स्मृतियां धूमिल होती जाती हैं. आज अगर चाहूं तो भी उनमें से बहुतों के नाम भी  याद नहीं कर पाता हूं. अभी पिछले दिनों फेसबुक की दीवाल पर एक पुराना फोटो पोस्ट  करते हुए यह बात और भी शिद्दत से महसूस हुई. लेकिन यह बहुत स्वाभाविक है. उम्र का इतना असर हो होगा ही.  फिर भी, आज शिक्षक दिवस पर अपने कुछ साथी ख़ास तौर पर याद आ रहे हैं.  सिरोही  कॉलेज में कुछ समय के लिए कहीं और से स्थानांतरित  होकर आए एक साथी जिनका चेहरा तो याद आ रहा है, नाम याद नहीं आ रहा इस सूची में सबसे ऊपर हैं. उन्होंने अपने विदाई समारोह में बहुत गर्व पूर्वक कहा था कि उन्होंने अपने जीवन में एक भी कक्षा  नहीं पढ़ाई है. तब शायद लगभग पन्द्रह साल तो वे नौकरी कर ही चुके थे. विदाई समारोह के बाद जलपान करते हुए मैं अनायास ही उनसे पूछ बैठा था, “और इस बात पर आपको कभी शर्म भी महसूस नहीं हुई?” इसी अनुभव की पुनरावृत्ति एक बार और हुई. तब मैं अध्यापन की दुनिया से शैक्षिक प्रशासन की दुनिया में आ चुका था और अपनी नौकरी के आखिरी पायदान पर था.  वहां एक साथी मिले, जिनका नाम मैं काफी सुनता रहा था और मेरा खयाल था कि वे गम्भीर अकादमिक रुझान वाले हैं. लेकिन वो छवि खुद उन्होंने ही बड़ी सहज निर्ममता से ध्वस्त कर दी. एक दिन खुद किसी सन्दर्भ में बताने लगे कि उन्होंने (अपने तीसेक बरस के) अध्यापन काल में एक भी कक्षा नहीं पढ़ाई! अपने शैक्षिक प्रशासन काल में मैंने ऐसे कई लोगों के बारे में भी जाना जिन्होंने बाह्य दुनिया में काफी नाम कमाया है और जिनकी छवि बहुत बड़े विद्वानों की है. लेकिन शिक्षा विभाग में रहते हुए भी, किसी न किसी तरह जोड़ तोड़ करके वे पढ़ाने से, कॉलेजों में जाने से, बचते रहे. कभी प्रतिनियुक्ति के बहाने तो कभी और किसी बहाने वे ऐसी जगहों पर काबिज होते रहे जहां उन्हें पढ़ाना न पड़े. आज उनके बारे में सोचता हूं तो मन में सबसे पहले यही सवाल उठता है कि आखिर वे कैसे विद्वान थे? अगर उन्हें पढ़ाने से इतनी ही वितृष्णा थी तो अध्यापक बने ही क्यों? और जिन्होंने ली हुई तनख्वाह के बदले में अपेक्षित दायित्व का निर्वहन नहीं किया, वे भला क्यों और कैसे विद्वान थे? लेकिन समाज में उनका बड़ा मान है. बहुत कुशलता से उन्होंने अपनी छवि जो निर्मित की  है.

एक और सज्जन  की याद आ रही है जो अब दुनिया में नहीं हैं. मेरे सहकर्मी थे. उस ज़माने में जब पी-एच.डी भी कम होते थे, वे डी.लिट थे. हम लोग एक छोटे-से कॉलेज में थे. जिन लोगों को कॉलेजों की दुनिया का ज़रा भी अन्दाज़ा है वे जानते हैं कि कॉलेजों में प्राध्यापकों को पढ़ाने के अलावा भी बहुत सारे काम करने होते हैं. जैसे कॉलेज की पत्रिका निकालना, छात्रसंघ के चुनाव करवाना, अनुशासन बनाए रखने में संस्था प्रधान की सहायता करना, एन.एस.एस, एन.सी.सी. आदि का काम करना, सह-शैक्षिक और शिक्षणेत्तर गतिविधियां आयोजित करना आदि-आदि. प्राचार्य लोगों की रुचि और रुझान के अनुसार ये काम उन्हें सौंपते हैं और लोग कमोबेश निष्ठा से ये काम करते हैं. हम सभी ने किए हैं. लेकिन जिन साथी को मैं स्मरण कर रहा हूं वे इनमें से किसी भी काम को हाथ नहीं लगाते थे. उन्होंने अपने चारों तरफ एक ऐसा प्रभा मण्डल बना रखा था कि इतना बड़ा विद्वान भला ऐसा काम कैसे करेगा? अगर किसी प्राचार्य ने कभी उन्हें कोई काम सौंपना भी चाहा तो उन्होंने यह कहते हुए कि मैं अपनी तरह का इकलौता विद्वान हूं, उस काम को करने दृढ़ता  से इंकार कर दिया. मैं कभी यह नहीं समझ पाया कि उनकी विद्वत्ता संस्था के लिए किस काम की थी? मेरे मन में तब यह सवाल अकसर उठता था कि किसी संस्था के लिए इस तरह के विद्वान ज़्यादा उपयोगी हैं, जो तिनका भी नहीं तोड़ते, या वे उत्साही प्राध्यापक ज़्यादा उपयोगी हैं, जिनके पास ऐसी कोई विरल डिग्री भले ही न हो, लेकिन वे संस्था का हर काम करने के लिए सदा  तैयार रहते हैं?  
     
और जब मैं यह चर्चा कर रहा हूं तो उन महान लोगों की तो कोई बात कर ही नहीं रहा हूं जिन्होंने वैसे तो नितांत लो-प्रोफाइल रखा, विद्वान वगैरह  की भी कोई छवि नहीं निर्मित की, लेकिन कॉलेज शिक्षा विभाग में नौकरी करते हुए भी पढ़ने-पढ़ाने से कभी कोई ताल्लुक नहीं रखा. ऐसे लोगों में से अनेक का ताल्लुक बड़े अफसरों और नेताओं वगैरह  से होता है और ये लोग किसी दन्द फन्द में पड़े बग़ैर चुपचाप अपनी तनख़्वाह लेते हैं और मज़े करते हैं. दुर्भाग्य की बात यह है कि ऐसे लोगों की संख्या निरन्तर बढ़ती जा  रही है.  


लेकिन जब मैं इन तमाम लोगों को याद कर रहा हूं तो एक अलग तरह के साथी की याद भी मुझे आ रही है. मेरे ये साथी भौतिक शास्त्र के प्राध्यापक थे, और बहुत उम्दा प्राध्यापक थे. उनका हर विद्यार्थी उनके ज्ञान और उनकी अध्यापन शैली का मुरीद था. इस बात को कहने की ज़रूरत नहीं है कि भौतिक शास्त्र एक ऐसा विषय है जिसमें ट्यूशन का प्रचलन बहुत ज़्यादा है. लेकिन मेरे ये साथी ट्यूशन नहीं करते थे. बिल्कुल भी नहीं करते थे. ऐसा नहीं है कि ये कोई खानदानी अमीर थे और इन्हें पैसों की ज़रूरत नहीं थी. अगर ऐसा होता तो  इनकी पत्नी क्यों नौकरी करने के लिए रोज़ बसों के धक्के खातीं? लेकिन ट्यूशन ये नहीं करते थे. अपनी बात को सुधार कर कहूं तो यह कि वे फीस लेकर ट्यूशन नहीं करते थे. साल में दो-चार प्रतिभाशाली लेकिन साधन विहीन बच्चों को वे घर पर पढ़ाते भी थे. फीस की बात वे करते ही नहीं और जब विद्यार्थी बहुत ज़ोर देता तो उनका एक ही जवाब होता. जवाब यह होता कि जब तुम पढ़ लिखकर नौकरी करने लग जाओ, तो इसी तरह किसी को पढ़ा देना, बस यही मेरी फीस होगी. उन्होंने कभी अपने इस काम की चर्चा नहीं की, कभी इसके लिए कोई इनाम नहीं मांगा. बस, अपनी तरह अपना काम करते रहे. यह एक संयोग ही था कि अपनी नौकरी के आखिरी चरण  में हम दोनों को फिर से एक साथ काम करने का मौका मिला, और वहां भी मैंने उनमें वही आदर्श देखा. कहना अनावश्यक है कि ऐसे बहुत सारे लोग होंगे. ऐसे भी और वैसे भी. 
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