Sunday, March 7, 2010

कैसे हो बेहतर तरह से काम


2005 में प्रकाशित बहु-चर्चित पुस्तक अ होल न्यू माइंड: व्हाय राइट-ब्रेनर्स विल रूल द फ्यूचर के लेखक डेनियल एच पिंक अपनी हालिया प्रकाशित किताब ड्राइव: द सरप्राइज़िंग ट्रुथ अबाउट व्हाट मोटिवेट्स अस में यह कहकर हमें चौंकाते हैं कि कुछ करने के लिए हम क्यों प्रेरित होते हैं इसके बारे में हमारा अब तक का सोच ग़लत है. अनेक वैज्ञानिक पड़तालों का हवाला देकर वे स्थापित कर देते हैं कि कुछ करने न करने के बारे में पुरस्कार और दण्ड की व्यवस्था उपयुक्त नहीं है और इससे समस्याओं के सर्जनात्मक समाधान तलाशने की कामगारों की क्षमता घटती है.

पिंक बताते हैं कि अन्य सभी जीवधारियों की ही तरह मनुष्य की भी पहली प्रेरक शक्ति तो जीवित या बचे रहने की आकांक्षा है. इसे मोटिवेशन 1.0 कहा जा सकता है. यह शुद्ध रूप से जैविक प्रेरक शक्ति है. हमारी दूसरी प्रेरक शक्ति, जिसे पिंक ने मोटिवेशन 2.0 का नाम दिया है पुरस्कार और दण्ड से चालित होती है और यह भी पशु जगत के समान ही है. यह अपेक्षाकृत बाह्य प्रेरक शक्ति है. फर्क सिर्फ इतना है कि केवल मनुष्य ही इस प्रेरक शक्ति का उपयोग कर भवन और संगठन तक बल्कि इससे भी ज़्यादा का निर्माण कर सकते हैं. यह मोटिवेशन 2.0 बहुत लंबे समय से विद्यमान है और एक तरह से हमारे अस्तित्व का हिस्सा ही बन चुका है. लेकिन अब स्थितियां बदल रही हैं. पैसा, सुविधाएं या नौकरी चले जाने का डर जैसी चीज़ें अब अपना प्रभाव खोती जा रही हैं. लोग बिना किसी लाभ की आकांक्षा के ऑनलाइन एन्साइक्लोपीडिया विकीपीडिया या एक नए ऑपरेटिंग सिस्टम लाइनक्स के लिए काम कर रहे हैं.

पिंक बताते हैं कि मोटिवेशन 2.0 का आधार दो बातें हैं: किसी काम के लिए पुरस्कार से आप वह काम और अधिक करेंगे और दण्ड मिलने पर वह काम कम करेंगे. पिंक के अनुसार जो लोग इस तरह, यानि बाह्य पुरस्कारों के लिए काम करते हैं उन्हें टाइप एक्स कहा जा सकता है. पिंक आज के समय में इस प्रवृत्ति को सही नहीं मानते और कहते हैं कि इसके कम से कम सात ख़तरे हैं- इससे मोटिवेशन खत्म हो सकता है, कार्य निष्पादन की क्षति हो सकती है, सर्जनात्मकता नष्ट हो सकती है, सद्व्यवहार खत्म हो सकता है, धोखेबाजी की संभावना बढ़ सकती है, शॉर्टकट और अनैतिक व्यवहार की प्रवृत्ति बढ़ सकती है, लोग लती हो सकते हैं, और अल्प कालिक सोच को बढ़ावा मिल सकता है. पिंक तो यहां तक कहते हैं कि दुनिया में 2008 में जो भीषण आर्थिक संकट पैदा हुआ वह भी इसी मोटिवेशन 2.0 की उपज था. और इसीलिए, पिंक की सलाह है कि हमें मोटिवेशन 2.0 से मोटिवेशन 3.0 की तरफ बढ़ जाना चाहिए. तो क्या है यह मोटिवेशन 3.0 ?

पिंक के अनुसार, आप जो करना चाहें वह करने की आज़ादी, चुनौती स्वीकार करने का माद्दा और जो काम आप हाथ में लें उसे आनंदपूर्वक भली भांति पूरा करें यही है मोटिवेशन 3.0 और इसके मूल में है टाइप आई व्यवहार. अपनी बात के समर्थन में पिंक गूगल की 20% टाइम व्यवस्था का हवाला देते हैं. इस व्यवस्था के तहत गूगल अपने कर्मचारियों को उनके काम के कुल घण्टों के 20 प्रतिशत में उनका मन चाहा नया काम करने की आज़ादी देता है. और इससे बहुत सारे नए विचार सामने आते हैं जिससे कंपनी को फायदा होता है.

अब सवाल यह है कि स्वयं को या स्वयं की टीम को टाइप एक्स से टाइप आई में कैसे रूपांतरित किया जाए? इस सवाल का जवाब पिंक किताब के उत्तरार्ध में देते हैं. वे सलाह देते हैं कि लोग जो और जैसे कर रहे हैं उसमें उन्हें स्वायत्तता दी जाए. साथ ही उन्हें यह एहसास कराया जाए कि जो भी वे कर रहे हैं वह बहुत महत्वपूर्ण है. पिंक इसके लिए तीन चीज़ों को महत्वपूर्ण मानते हैं: 1. स्वायत्तता, यानि अपनी ज़िन्दगी को अपनी तरह से जीने का हक़, 2. निष्णातता, यानि जो भी महत्वपूर्ण है उसे और अधिक अच्छी तरह से करने की आकांक्षा, और 3. उद्देश्य, यानि स्व से इतर के लिए कुछ करने की आकांक्षा. बकौल पिंक, बेस्ट बाय जैसी बहुत सारी कंपनियां ऐसा ही कर रही हैं. तीन भागों में विभक्त इस किताब के तीसरे भाग में टाइप आई के लिए एक टूल किट है जो आपको अब तक सीखी बातों को प्रयोग में लाने के तरीके सिखाती है.

यह सारी चर्चा करते हुए पिंक हमारे स्कूलों पर भी एक टिप्पणी करते हैं और कहते हैं कि ये नई पीढी को काम के प्रति अनुरक्त और प्रेरित करने में नाकामयाब रहे हैं. इनका तो सारा ज़ोर परीक्षाओं में अच्छे अंक प्राप्त करने तथा अप्रासंगिक रटंत को बढावा देने में रहा है. इसके अलावा भी, स्कूल कला संगीत और व्यायाम जैसी गतिविधियों में निरंतर कटौती करते जा रहे हैं, जबकि ये गतिविधियां विद्यार्थियों के मानसिक क्षितिजों का विस्तार करती हैं.
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Discussed book:
Drive: The Surprising Truth About What Motivates Us
By Daniel H. Pink
Hardcover: 256 Pages
Published by: Riverhead
US $ 26.95

राजस्थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्ट में मेरे पाक्षिक कॉलम किताबों की दुनिया के अंतर्गत रविवार, 07 मार्च, 2010 को प्रकाशित.








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