Sunday, February 7, 2010

सहायता की ज़रूरत विषेषज्ञों को भी होती है


एक बहुत दिलचस्प उक्ति है कि अस्पताल बीमार लोगों के लिए उपयुक्त स्थान नहीं है. इसलिए नहीं है कि यह स्थान ऐसी अनेक बातों और चीज़ों से भरा होता है जो आपकी सेहत के लिए ख़तरनाक होती हैं, जैसे छोटे-बड़े इन्फेक्शन, निदान या दवा देने में होने वाली चूकें और मानवीय भूलों की वजह से पैदा हो सकने वाली अनगिनत जटिलताएं. अस्पताल में मानवीय भूलों के होने को रोकना लगभग नामुमकिन ही है. तो, क्या यह संभव है कि कोई व्यक्ति या कुछ व्यक्तियों का समूह ऐसा कुछ उपक्रम करे कि सब कुछ 100 प्रतिशत सही हो जाए? बाल्टीमोर के जॉन हॉपकिंस मेडिकल सेंटर के क्रिटिकल केयर स्पेशलिस्ट डॉ पीटर प्रोनोवोस्ट ने कुछ ऐसा ही प्रयास किया, और उनके प्रयास को बोस्टन के एक जनरल सर्जन और न्यूयॉर्कर के स्टाफ राइटर डॉ अतुल गवाण्डे ने अपनी नई किताब द चेकलिस्ट मेनिफेस्टो: हाऊ टू गेट थिंग्स राइट का आधार बनाया है. गवाण्डे मानवीय भूलों को दो हिस्सों में बांटते हैं: अज्ञान से उपजी भूलें और अकुशलता से उपजी भूलें, यानि वे भूलें जो इस वजह से होती हैं कि हम अपनी जानकारी का सही इस्तेमाल नहीं करते. गवाण्डे मानते हैं कि आज की दुनिया में ज़्यादातर ग़लतियां इस दूसरी वजह से होती हैं. अनेक उदाहरण देकर वे बताते हैं कि आज के शल्य चिकित्सक का काम इतना जटिल हो गया है कि भले ही वह कितना ही कुशल क्यों न हो, ज़रूरी कदमों में से कोई एक क़दम उठाना भूल सकता है, अपने मरीज़ से कोई एक ज़रूरी सवाल पूछना भूल सकता है या काम के दबाव और तनाव की वजह से हर तरह की आकस्मिकता का सामना करने की तैयारियों में कहीं चूक कर सकता है.

डॉ अतुल गवाण्डे बताते हैं कि डॉ पीटर प्रोनोवोस्ट ने अपने प्रयास के लिए उड्डयन इंडस्ट्री से एक अवधारणा ली. पाइलट लोग विमान उड़ाने से पहले एक एक जांच सूची (चेकलिस्ट) में अंकित बिंदुओं के आधार पर जांच किया करते हैं. डॉ प्रोनोवोस्ट ने आई सी यू की केवल एक आम समस्या से निपटने के लिए इस चेकलिस्ट रणनीति को अपनाया. समस्या थी सेण्ट्रल इण्ट्रावीनस लाइन्स वाले रोगियों में संक्रमण हो जाने की. उन दिनों हॉपकिंस आई सी यू में हर नौ में से एक लाइन संक्रमित हो जाती थी जिसकी परिणति रोगी की बीमारी के लंबी होने से लेकर उसकी मौत तक में हुआ करती थी. डॉ प्रोनोवोस्ट ने उन पांच कामों की एक सूची बनाई जो किसी भी डॉक्टर को इण्ट्रावीनस लाइन के इस्तेमाल से पहले करने थे: साबुन से हाथ धोयें, मरीज़ की चमड़ी को एक ख़ास एण्टीसेप्टिक से साफ़ करें, मरीज़ के पूरे शरीर को रोगाणुहीन आवरण से ढकें, मास्क, टोपी रोगाणुहीन गाउन और दस्तानें पहनें, और जहां सुई लगाई गई है वहां रोगाणुहीन ड्रेसिंग करें.

इस प्रयोग पर टिप्पणी करते हुए डॉ गवाण्डे कहते हैं कि ये पांच काम कोई अजूबे नहीं थे. हर डॉक्टर इनके बारे में जानता है, और इसलिए जब ऐसे सामान्य कामों के लिए चेकलिस्ट बनाने की बात की गई तो उस का मखौल उड़ाया गया. लेकिन, डॉ प्रोवोनोस्ट जानते थे कि डॉक्टर लोग कम से कम एक तिहाई दफा तो इनमें से किसी न किसी काम को टाल ही जाते थे. इसलिए उन्होंने यह चेकलिस्ट आई सी यू की नर्सों को दी और अस्पताल प्रशासन के सहयोग से इसकी पालना सुनिश्चित की. नर्सों को कहा गया कि वे अपनी सूची में एक-एक काम को चैक करें और यदि कभी कोई डॉक्टर उनमें से कोई काम न करे तो पहले उनसे करने का अनुरोध करे और यदि वह फिर भी न करे तो अस्पताल प्रशासन को सूचित कर उस काम को करवाये. और ऐसा ही किया गया. परिणाम? हॉपकिंस अस्पताल में इन्फेक्शन दर ग्यारह प्रतिशत से घट कर शून्य प्रतिशत पर आ गई. डॉ प्रोनोवोस्ट ने हिसाब लगाया कि इस व्यवस्था के लागू करने से दो साल में तियालीस इंफेक्शन रोके गए, आई सी यू में होने वाली आठ मौतें रोकी गईं और अस्पताल प्रशासन का बीस लाख डॉलर खर्च कम हुआ. अपने इस प्रयोग की सफलता के बाद डॉ प्रोनोवोस्ट ने आई सी यू की अन्य स्थितियों के बारे में भी चेक लिस्टें तैयार कीं. ज़ाहिर है कि डॉक्टरों ने यह कहते हुए प्रतिरोध भी किया कि उनका काम इतना जटिल है कि उसे ऐसी सरल चेकलिस्टों तक सीमित नहीं किया जा सकता.

डॉ गवाण्डे ने विस्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू एच ओ) के साथ काम करते हुए दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के अस्पतालों में यही चेकलिस्ट पद्धति लागू करके देखी. जो अस्पताल उन्होंने अपने प्रयोग के लिए चुने उनमें तांजानिया के दूरस्थ इलाकों में स्थित दस लाख लोगों का इलाज करने वाला एक सामान्य–सा अस्पताल था तो सिएटल में स्थित वाशिंगटन विश्वविद्यालय का एक ऐसा हाई टेक अस्पताल भी था जिसका बजट पूरे तांजानिया के बजट से दुगुना था. इन लोगों ने सर्जिकल केयर के लिए एक उन्नीस बिंदुओं वाली चेकलिस्ट का इस्तेमाल किया और पाया कि सिर्फ़ छह ही महीनों में खर्च में एक भी डॉलर की वृद्धि के बगैर इन तमाम अस्पतालों में सर्जरी के बाद वाली जटिलताओं में छत्तीस प्रतिशत की और मृत्यु दर में सैंतालीस प्रतिशत की कमी हुई है.

इस सफलता से उल्लसित होकर डॉ गवाण्डे ने अपनी इस चेकलिस्ट पद्धति को कई अन्य क्षेत्रों में भी इस्तेमाल किया. डॉ गवाण्डे ने वायुयान निर्माता कंपनी बोइंग से काफी कुछ सीखा. अब वे यह कह पाने की स्थिति में हैं कि एक अच्छी चेकलिस्ट छोटी होनी चाहिये, और महत्वपूर्ण स्टेप्स से ही संबद्ध होनी चाहिये. सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि चैकिंग शीर्षस्थ व्यक्ति द्वारा नहीं की जानी चाहिये. हवाई जहाज के कॉकपिट में चेकलिस्ट को-पायलट द्वारा पढी जाती है, और इसीलिए, ऑपरेशन रूम में यह काम नर्स द्वारा किया जाना चाहिये.

यह और ऐसे अनेक उदाहरण देकर डॉ गवाण्डे संदेश यह देना चाहते हैं कि इक्कीसवीं शताब्दी की तकनीक की जटिलताओं को सरलतम तरीकों से सुलझाया जा सकता है. गवाण्डे की बहुत महत्वपूर्ण सलाह यह है कि आधुनिक दुनिया में यह बहुत ज़रूरी हो गया है कि हम एक बार फिर से उस चीज़ को समझें जिसे दक्षता कहा जाता है, और यह समझें कि सहायता की ज़रूरत विशेषज्ञों को भी हुआ करती है और सफलता इसी बात पर निर्भर करती है कि विशेषज्ञों में भी इतनी विनम्रता हो कि वे यह स्वीकार करें कि सहायता की ज़रूरत उन्हें भी है.
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Discussed book:
The Checklist Manifesto: How to Get Things Right
By Atul Gawande
Published by Metropolitan Books
Hardcover, 224 pages.
US $ 24.50

राजस्थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्ट में मेरे पाक्षिक कॉलम किताबों की दुनिया के अंतर्गत रविवार, दिनांक 07 फरवरी, 2010 को प्रकाशित.








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