Thursday, December 27, 2007

ऐसे भी पढा जा सकता है किताब को

पेरिस विश्वविद्यालय में फ्रेंच साहित्य के प्रोफेसर और प्रतिष्ठित मनोविश्लेषक पियरे बेयार्ड की बहु चर्चित किताब का मूल फ्रेंच से जेफ्री मेहलमान द्वारा किया गया अंग्रेज़ी अनुवाद ‘हाऊ टू टाक अबाउट बुक्स यू हेवण्ट रेड’ इधर खूब पढा जा रहा है. बावन वर्षीय प्रोफेसर बेयार्ड ने इस मज़ेदार और ऊपर से हल्की लगने वाली किताब के माध्यम से उन लोगों की मदद करने का रोचक प्रयास किया है जो विद्वत्समाज में इस बात से शर्मिन्दगी महसूस करते हैं कि उन्होंने कोई खास क्लैसिक या चर्चित किताब नहीं पढी है. बेयार्ड पहले तो उन्हें यह कहकर दिलासा देते हैं कि न पढने वालों की बिरादरी बहुत बडी है. वे बताते हैं कि पॉल वेलेरी को लेखकों से उनकी अन-पढी किताबों की तारीफ के अनेक तरीके आते थे और मोन्तेन को अपना पढा प्राय: याद नहीं रहता था. इतना ही नहीं, बेयार्ड ग्राहम ग्रीन, डेविड लॉज आदि उपन्यासकारों के ऐसे अनेक चरित्रों की भी याद दिलाते हैं जो पढने की ज़रूरत पर ही प्रश्न चिह्न लगाते रहे हैं. इतना करने के बाद बेयार्ड किसी किताब को बिना पढे उसके बारे में बात करने के तरीके सुझाते हैं. यह करते हुए वे बलपूर्वक कहते हैं कि पढना क़तई ज़रूरी नहीं है, और वे खुद अनेक पुस्तकों को बिना पढे या महज़ उनके पन्ने पलट कर उनके बारे में अपने विद्यार्थियों को प्रभावशाली व्याख्यान दे चुके हैं.
किताब का रोचक हिस्सा वह है जहां बेयार्ड आपको यह सलाह देते हैं कि अगर आप किसी सुसंस्कृत, सुपठित समुदाय में किसी पुस्तक की चर्चा के दौरान फंस जाएं तो क्या करें! वे सलाह देते हैं कि आपको भी उसी तरह की किसी अन्य किताब का ज़िक्र छेड देना चाहिए, या उसी लेखक की किसी अन्य किताब की बात करने लग जाना चाहिए. अगर यह मुमकिन न हो तो अपनी ही लिखी किसी किताब या उस किताब पर जिसे आप लिखना चाहते हैं, बात करने लग जाना चाहिए. वैसे आप वह भी कर सकते हैं जो अनेक समीक्षक करते हैं: किताब की भूमिका पढ लें और उसका अंतिम अध्याय देख लें. इतना भी सम्भव न हो तो उसकी विषय सूची ही देख लें. और अगर आपका सामना किसी पुस्तक के लेखक से ही हो जाए तो? बेयार्ड सलाह देते हैं कि आप उनसे कहें कि यह आपकी उत्कृष्टम रचना है, या कि इस बार तो आपने कमाल ही कर दिया. यानि विस्तार में जाए बगैर प्रशंसा करें. और फिर आहिस्ता से चर्चा को रचना से हटाकर रचनाकार पर ले आएं. हर लेखक खुद के बारे में बात करके प्रसन्न होता है.
वैसे वास्तव में यह किताब एक किताब विरोधी का सर्जन नहीं है. खुद लेखक ने कहा है कि “यह किताब एक ऐसे काल्पनिक चरित्र की सृष्टि है जो न पढने की डींगें हांकता है, और वह चरित्र मैं नहीं हूं.” उन्होंने ऐसी किताब क्यों लिखी, इसका जवाब उन्होंने यह कहकर दिया है कि वे फ्रांस के लोगों, विद्यार्थियों और आमजन के मन में बैठे उस सांस्कृतिक डर को भगाना चाहते थे जो साहित्य को लेकर उत्पन्न कर दिया गया है. यहीं यह बता देना भी आवश्यक है कि फ्रांस में किताबों को बहुत पवित्र माना जाता है और वहां लेखक की हैसियत धर्मगुरु और रॉक स्टार के बीच की है. वस्तुत: पाश्चात्य संस्कृति ने किताबों को लगभग उसी तरह पूजा की वस्तु बना दिया है जिस तरह उसने स्तनों और धन को बना दिया है. हमारा पढना एक ऐसे क्षयकारी आदर्शवाद से संचालित होता है जो हमें एक प्रच्छ्न्न लज्जा भाव से भरता रहता है कि हमें इस किताब को और अधिक अच्छी तरह से पढना चाहिये था. बेयार्ड इसे गलत मानते हैं. वे किसी भी किताब को शब्दश: पढने के पक्ष में नहीं हैं और कहते हैं कि असल पढना तो करीब-करीब न पढना ही है. इसे और खोलते हुए वे कहते हैं कि न पढने से आशय कुछ ऐसी सकारात्मक वैकल्पिक क्रियाओं से है जिन्हें हमें अपनाना और अपने बच्चों को भी सिखाना चाहिए, जैसे किताबों के आवरणों को देखना और उनके आरम्भिक अंशों को पढना वगैरह. बेयार्ड मानते हैं कि किसी किताब की गहन जानकारी से अधिक महत्वपूर्ण है किसी ‘सामूहिक पुस्तकालय’ के परिप्रेक्ष्य में उस किताब की अवस्थिति से परिचित होना. सामूहिक पुस्तकालय से उनका आशय है उस तरह की किताबों का समूह. बेयार्ड का कहना है कि किताब को आरम्भ से अंत तक पढने के अलावा और तरह से भी पढा जा सकता है. यहां-वहां से, या पन्ने पलटकर. आखिर किताब की महता तो उसमें सर्वत्र विद्यमान होती है. आप पन्ने पलटते हैं तब भी उसकी श्रेष्ठता के सम्पर्क में तो आते ही हैं. इसके अलावा, किताब की महत्ता इस बात में भी तो निहित होती है कि उसकी समग्र अवधारणा आपके जीवन से कैसे बावस्ता होती है.

दर असल इस किताब का उद्देश्य है लोगों को अधिक आज़ादी के साथ पढने के लिए प्रेरित करना. इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए ही लेखक ने एक गम्भीर विषय को हास्य के माध्यम से प्रस्तुत किया है.
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Discussed book:
How to Talk About Books You Haven’t Read
By Pierre Bayard
Translated from French By Jeffrey Mehiman
Published By Bloomsbury, USA
Pages 208
$ 19.95

राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट 'जस्ट जयपुर' में मेरे साप्ताहिक कॉलम 'वर्ल्ड ऑफ बुक्स' के अंतर्गत 27 दिसम्बर 2007 को प्रकाशित.
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