Thursday, December 20, 2007

सूचना प्रौद्योगिकी, चीन और भारत

आज की दुनिया की आर्थिक हलचलों के किसी भी जागरूक अध्येता से पूछें कि वर्तमान समय का सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक बदलाव क्या है, तो उत्तर इसके सिवा कुछ और हो ही नहीं सकता: चीन और भारत का अभ्युदय. बात को आगे बढाएं और जानने की कोशिश करें कि दुनिया के जिस उद्योग-व्यवसाय पर अब तक पश्चिम का वर्चस्व रहा है, उस पर इस अभ्युदय का क्या प्रभाव हो सकता है, तो निश्चय ही कई उत्तर मिलेंगे. यह स्वाभाविक भी है.

एक प्रसिद्ध सूचना प्रौद्योगिकी सलाहकार समूह गार्टनर से सम्बद्ध दो जाने-माने विश्लेषकों जेम्स एम. पॉपकिन और पार्थ आयंगार की नई किताब ‘आई टी एण्ड द ईस्ट: हाऊ चाइना एण्ड इण्डिया आर आल्टरिंग द फ्यूचर ऑफ टेक्नोलॉजी एण्ड इन्नोवेशन’ ने यही किया है. बेशुमार आंकडों, तथ्यों और उनके गहन विश्लेषण से वैश्विक अर्थव्यवस्था की जटिलताओं को समझने के प्रयत्न में जब वे चीन और भारत के लिए कहते हैं कि ऐसे प्रतिस्पर्धी हमने अपने जीवन में तो देखे नहीं, तो उनसे असहमत होना कठिन होता है.
किताब मोटे तौर पर तीन मुख्य खण्डों में विभाजित है. पहला खण्ड भारत को, दूसरा चीन को और तीसरा संयुक्त रूप से दोनों को समर्पित है. लेखक ने चाइना और इण्डिया को मिलाकर एक नया शब्द गढा है: चिण्डिया. प्रथम दो खण्डों में क्रमश: भारत व चीन के इतिहास, अर्थ तंत्र और उसकी दिशाओं का वर्णन है. इन खण्डों में प्रत्येक देश के लिए 2012 तक की अर्थ-यात्रा की परिकल्पना भी की गई है. ऐसा करते हुए हर देश के लिए तीन सम्भावित मार्गों पर विचार किया गया है. भारत के बारे में लेखक द्वय को सर्वाधिक सम्भावना यह लगती है कि यहां संरचनात्मक सुधार तो खूब होंगे लेकिन शैक्षिक संस्थानों पर अभिजात वर्ग का वर्चस्व बरकरार रहेगा. इस कारण हेव्ज़ और हेव नॉट्स के बीच की खाई भी बनी रहेगी. लेखक द्वय कहते हैं कि एक बन्द सरकारी व्यवस्था वाला देश होने की वजह से चीन के भविष्य की कल्पना का खाका खींचना अपेक्षाकृत कठिन है. हो सकता है, चीन एक गतिशील उद्यमी ताकत बन जाए, या फिर संरक्षणवादी खोल में जा घुसे. दोनों देशों की बात करते हुए वे कहते हैं कि इन्हें ऐसी राह चुननी चाहिए जो एक दूसरे की कमज़ोरियों और ताकतों से तालमेल रख सके. अगर ऐसा किया गया तो भारत और चीन हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर दोनों ही के बाज़ारों की ऐसी ताकत बन जाएंगे जिससे मानव संसाधन और लागत, किसी भी मोर्चे पर पार पाना किसी भी देश के लिए कठिन होगा.
भारत और चीन दुनिया के श्रेष्ठतम कम्प्यूटर वैज्ञानिक और सूचना प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ तैयार कर रहे हैं. पश्चिम की बडी से बडी कम्पनियां अपना असेंबली कार्य तो पहले ही से इन दोनों देशों को आउटसोर्स कर रही हैं, अब तो वे नवाचारों के लिए भी इनकी तरफ देखने लगी हैं. फिर भी, एक अध्ययन यह बताता है कि चीन के केवल दस प्रतिशत स्नातक ही वैश्विक निगमों में सीधे भर्ती की पात्रता रखते हैं, शेष के लिए कम से कम छह माह का प्रशिक्षण आवश्यक होता है. भारत की स्थिति भी बहुत भिन्न नहीं है. हालांकि भारत के कुल सेवा निर्यात का उनचास प्रतिशत(वर्ष 2003-04 में 25 बिलियन डॉलर) सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में ही है और इसमें प्रतिवर्ष छत्तीस प्रतिशत की दर से इज़ाफा हो रहा है, और अगर इतना ही काफी न हो तो यह भी कि दुनिया के ऑफ शोरिंग का दो तिहाई भारत को ही मिल रहा है, हमारी शिक्षा व्यवस्था अभी भी संतोषप्रद नहीं है. यहां के स्नातकों में से मात्र पच्चीस प्रतिशत ही बहुराष्ट्रीय निगमों में सीधे प्रवेश की योग्यता रखते हैं. इसके अलावा, लाइसेंस परमिट के झमेलों के मामलों में हम अमरीका से ही नहीं, चीन से भी बदतर स्थिति में हैं. इंफ्रास्ट्रक्चर की कमियां तो हैं ही, क्षेत्रीय और धार्मिक विवाद, सरकार में घुसे अपराधी तत्व, नीतियों पर बेवजह की खींचतान, भाषाओं की विविधता आदि भी तस्वीर को धुंधलाने में अपना अपना योग देते हैं. ये ही कारण हैं कि वर्ष 2004-05 में भारत को बाह्य निवेश के रूप में साढे पांच बिलियन डॉलर मिले, जबकि उसी अवधि में चीन को एक सौ तरेपन बिलियन डॉलर की प्राप्ति हुई. चीन का प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय उत्पाद भी भारत से दुगुना है.
इस तरह की अन्य अनेक किताबों की तरह यह किताब भी पश्चिम के और विशेष रूप से वहां के बहुराष्ट्रीय निगमों के नज़रिये से लिखी गई है, लेकिन इसके बावज़ूद यह हमें अपनी कमियों और क्षमताओं को समझने में बहुत मदद देती है. इस तरह की किताबें यह भी बताती हैं कि भारत और चीन में किस तरह पश्चिम की दिलचस्पी बढती जा रही है. कहना अनावश्यक है कि इस बढती दिलचस्पी का सबसे ज़्यादा फायदा हमारी युवा पीढी को मिलना है.
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Disucssed Book :
IT and the East: How China and India Are Altering the Future of Technology and Innovation
By: James M. Popkin and Partha Iyengar
Published by: Harvard Business School Press
Hardcover, 226 pages.

राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट जस्ट जयपुर में मेरे साप्ताहिक कॉलम वर्ल्ड ऑफ बुक्स में 20 दिसम्बर 2007 को प्रकाशित.


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