Tuesday, January 30, 2018

बदलाव आ तो रहा है लेकिन आहिस्ता-आहिस्ता!

भारत की तरह दुनिया के बहुत सारे देशों में यह रिवाज़ है कि शादी के बाद पत्नी पति का उपनाम अपना लेती है. मेरी शादी हुई तो मेरी पत्नी गुप्ता से अग्रवाल हो गई. लेकिन इधर के बरसों में जब से स्त्री अस्मिता विषयक चेतना प्रबल होने लगी है, बहुत सारी स्त्रियां शादी के बाद भी अपने पुराने उपनाम के साथ ही जीने लगी हैं. कला-संस्कृति वगैरह की दुनिया में तो यह रिवायत पहले से थी, हालांकि इसके कारण दूसरे थे. इधर एक नया चलन यह भी देखने में आया है शादी के बाद पति-पत्नी दोनों के नामों को मिलाकर एक नया नाम रचा जाने लगा है. हाल में हमने देखा कि मीडिया में विराट कोहली और अनुष्का शर्मा को विरुष्का नाम से सम्बोधित किया गया. लेकिन इधर लंदन से एक रोचक ख़बर आई है जहां दक्षिण पूर्वी लंदन के एक प्राइमरी स्कूल शिक्षक मिस्टर रोरी कुक ने शादी के बाद अपना नाम बदलकर रोरी डियरलव कर लिया. कहना अनावश्यक है कि डियरलव उनकी पत्नी का उपनाम है. जब वे शादी के लिए ली गई छुट्टियां बिताकर स्कूल पहुंचे और उनके स्कूल की एक छात्रा ने उनसे नाम में किये गए इस बदलाव की वजह जाननी चाही तो उन्होंने अपनी शादी की अंगूठी दिखाते हुए सहज भाव से उत्तर दिया कि उन्होंने शादी के कारण अपना नाम बदला है. अपनी बात को और साफ़ करते हुए उन्होंने उस छात्रा से कहा, “देखो, जब आप शादी करते हो तो आपको यह चुनाव करना होता है कि आप कौन-सा नाम रक्खोगे. आप अपना नाम रख सकते हो, आप और आपकी जीवन साथी एक-सा नाम रख सकते हैं, आप कोई नया नाम रख सकते हो, वगैरह. मैंने अपनी पत्नी वाला नाम रखना पसंद किया है.” इतने विस्तृत उत्तर का औचित्य बताते हुए श्री डियरलव ने कहा कि बच्चे अपने स्कूल में जो देखते हैं उसे वे सहज रूप से स्वीकार कर लेते हैं. अपने नाम के बदलाव के बारे में उन्हें बताकर मैंने उन्हें नए विचार से परिचित कराने का प्रयास किया है. मिस्टर डियरलव के स्कूल के विद्यार्थियों ने उनके नाम के इस बदलाव को सहज रूप से स्वीकार कर लिया लेकिन उनके कई सहकर्मियों की प्रतिक्रियाओं से लगा कि वे इस बात को पचा नहीं सके हैं. किसी ने कहा कि यह बहुत अजीब है, तो किसी और ने व्यंग्य करते हुए कहा कि मिस्टर डियरलव बहुत मॉडर्न है. लेकिन मिस्टर डियरलव ने इस तमाम प्रतिक्रियाओं को बहुत सहजता से ग्रहण किया. शायद उन्हें इन मिली-जुली प्रतिक्रियाओं का पहले से अनुमान था.  

इन सज्जन के जीवन में तो इस कदम से कोई ज़्यादा दिक्कतें नहीं आईं, उन्हीं के देश में ऐसा ही करने के इच्छुक एक युवक के मां-बाप ने तो उनकी शादी में शामिल होने से ही मना  कर दिया. उनकी बेबाक प्रतिक्रिया वही थी जो ऐसे मामलों में सामान्यत: अपने देश में भी होती है. उन्हें लगा कि उनका बेटा जोरू का ग़ुलाम हो गया है. वैसे भी, ब्रिटिश समाज अपेक्षाकृत परम्परा-प्रेमी समाज माना जाता है. इंगलैण्ड और वेल्स में आज भी जो विवाह प्रमाण पत्र ज़ारी किये जाते हैं, उनमें युगल के पिता का ही नाम अंकित होता है, मां का नहीं. वहां कुछ सांसदों ने पिछले साल एक विधेयक प्रस्तुत कर यह आग्रह किया भी था कि विवाह के प्रमाण पत्रों में वर-वधू के माता और पिता दोनों के नाम अंकित किये जाने चाहियें. वैसे, बदलाव की बयार बहने तो वहां भी लगी है, तभी तो सन 2014 में समान सेक्स के विवाह को वैधता प्रदान कर दी गई थी.

बावज़ूद इन सारी बातों के, यह भी एक तथ्य है कि कम से कम इंगलैण्ड में तो ऐसे पुरुषों  की संख्या बढ़ती जा रही है जो विवाह के बाद अपनी पत्नी का उपनाम अंगीकार करते हैं. पिछले ही बरस किये गए एक सर्वेक्षण के अनुसार अब हर दस में से एक युवा ऐसा कर रहा है. ऐसा करने वालों में से एक, एक तिब्बती बौद्ध मेडिटेशन इंस्ट्रक्टर चार्ली शॉ का कहना है कि आज के समय में यह मानकर चलना कि शादी के बाद पत्नी अनिवार्यत: पति का उपनाम धारण करने लगेगी, निहायत ही बेहूदा बात है. लेकिन खुद अपने बारे में उनका यह भी कहना था कि उनके ऐसा  करने के मूल में कोई फेमिनिस्ट सोच नहीं था. उन्होंने तो ऐसा करके अपनी पत्नी के प्रति अपने लगाव को रेखांकित किया और साथ ही यह संदेश भी देना चाहा कि हमारे समाज में अभी भी पितृसत्तात्मक रुझान मौज़ूद हैं और अगर हम चाहें तो अपने स्तर पर उसके आगे घुटने टेकने से मना कर सकते हैं. यह देखना दिलचस्प होगा कि अभी छिटपुट स्तर पर होने वाले इन बदलावों को व्यापक सामाजिक स्वीकृति मिलने में कितना समय  लगता है.


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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 30 जनवरी, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 
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